Saturday, October 28, 2006



'मैंने अमृता को जी लिया, अमृता ने मुझे'


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इमरोज़कलाकार और अमृता के साथी ------------------

इमरोज़ की तमाम कृतियों में अमृता साथ नज़र आती हैं.
मुझे अमृता की वो नज़्म याद है- मैं तैनू फिर मिलांगी....
आज भी वो नज़्म वैसे ही गूँज रही है. मैं उसे सुन रहा हूँ. तो जो अच्छा लगता है, वो याद भी रहता है.
अमृता तीन सालों तक बीमार रही और फिर चली गई पर मैं इससे साहित्य को हुए नुक़सान को क्यों याद करूँ.
मैं उन दिनों को ही याद करूँगा जिनमें साहित्य को उससे लाभ मिला है. मैं नुक़सान को ही क्यों देखूँ.
कोई आदमी अपने बुढ़ापे में बहुत कुछ नहीं कर पाता है. जिस्म ही साथ नहीं देता.
अमृता तो लिख सकती थीं पर जिस्म ही साथ नहीं दे रहा था.
उसने कभी इनकार तो नहीं किया कि वो नहीं लिखना चाहती. उसने तो तब तक लिखा, जब तक उसके शरीर ने उसका साथ दिया.
उसके साथ रहना बिल्कुल सहज लगता था, बिल्कुल सहज. जो अमूमन लोगों में नहीं होता. ख़ासकर शादियों में तो बिल्कुल नहीं होता.
यहाँ तो सहज रहते हुए 40 सालों से ज़्यादा जी लिए.
उसने मुझे जी लिया, मैंने उसे जी लिया.
अमृता के अंतिम संस्कार में एक-दो साहित्यकार ही आए.
इतने सारे साहित्यकार हैं दिल्ली में, पर न तो बीमारी के वक़्त कोई आया और न ही आज.
अजीत कौर आई थीं, कुछ एक और थे पर बाकी तमाम नहीं.
पर अमृता को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता.
फिर समकालीन क्या कभी अपने साथ के लोगों का साथ देते हैं. किसी मुल्क में नहीं देते. यह सिर्फ़ हमारे मुल्क की ही समस्या नहीं है.
पहले तो उसे प्रोत्साहित ही नहीं करता तो फिर मिलेगा क्या.
तो एक जगह की बात नहीं है, सब जगह का यही हाल है.
वो जब तक मर नहीं जाता, उसके बारे में बात नहीं करते हैं.
कई दिनों से कैनवस छूटा हुआ है पर मुझे लगता है कि जीना ज़रूरी है, पेंटिंग करना ज़रूरी नहीं.
अगर आगे कभी कैनवस पर काम शुरू किया तो अमृता का प्रभाव भी रहेगा.
जो अच्छा असर होता है, वो तो रहता ही है, यह भी रहेगा.

Friday, October 27, 2006

बिस्‍मिल्‍ला की शहनाई.... (नरेश शांडिल्‍य की कविता)


नरेश शांडिल्‍य की कविता

——बिस्‍मिल्‍ला की शहनाई

बिस्मिल्ला की शहनाई है
या वसंत की अंगड़ाई है
इक कमसिन के ठुमके जैसी
रुन-झुन हिलते झुमके जैसी
इक पतंग के तुनके जैसी
नखरीली-सी उनके जैसी
कभी बहकती कभी संभलती
छजती चढती गली उतरती
रस-रस भीगे मस्‍त फाग-सी
धीरे-धीरे पींग बढ़ाती
झुकी हुई इक अमराई है
बिस्मिल्ला की शहनाई है
…………………………
………………………॥
मधुबन में कान्हा की आहट
भीड़ बीच इक तनहाई है
बिस्मिल्ला की शहनाई है

Thursday, October 26, 2006

भगवान अंग्रेजी में बतिया रहे हैं......न?


A CHAT WITH GOD

God: Hello. Did you call me?n

Man: Called you? No.. who is this?n
God: This is GOD. I heard your prayers. So I thought I will chat.n

Man: I do pray. Just makes me feel good. I am actually busy now. I am in the midst of something..n
God: What are you busy at? Ants are busy too.n
Man: Don't know. But I cant find free time. Life has become hectic. It's rush hour all the time.n
God: Sure. Activity gets you busy. But productivity gets you results. Activity consumes time. Productivity frees it.n
Man: I understand. But I still can't figure it out. By the way, I was not expecting YOU to buzz me on instant messaging chat.n
God: Well I wanted to resolve your fight for time, by giving you some clarity. In this net era, I wanted to reach you through the medium you are comfortable with. n

Man: Tell me, why has life become complicated now?n

God: Analysis is what makes it complicated. Stop analyzing life. When you analyze you surmise. But when you believe you achieve. n

Man: why are we then constantly unhappy?
n God: Your today is the tomorrow that you worried about yesterday. You are worrying because you are analyzing. Worrying has become your habit. That's why you are not happy. n
Man: But how can we not worry when there is so much uncertainty?n

God: For humans, uncertainty is inevitable, but worrying is optional.n

Man: But then, there is so much pain due to uncertainty..n

God: Pain is inevitable, but suffering is optional.n
Man: If suffering is optional, why do good people suffer?n
God: Diamond cannot be polished without friction. Gold cannot be purified without fire. Good people go through trials, but don't suffer. With that experience their life becomes better not bitter. Also good people see opportunity in every adversity, the opportunity which makes them turn to Me, the God. n

Man: You mean to say such experience is useful?n

God: Yes. In every terms, Experience is a hard teacher. She gives the test first and the lessons afterwards.n Man: But still, why should we go through such tests? Why can't we be free from problems?n
God: Problems are Purposeful Roadblocks Offering Beneficial Lessons to Enhance Mental Strength. Inner strength comes from struggle and endurance, not when you are free from problems.n


Man: Frankly in the midst of so many problems, we don't know where we are heading…n

God: If you look outside you will not know where you are heading. Look inside. Looking outside, you dream. Looking inside, you awaken.
Eyes provide sight. Heart provides insight.n
Man: Sometimes not succeeding fast seems to hurt more than moving in the right direction.
What should I do?n
God: Success is a measure as decided by others. Satisfaction is a measure as decided by you.
Knowing the road ahead is more satisfying than knowing you rode ahead.
You work with the compass. Let others work with the clock.n
Man: In tough times, how to stay motivated?n God: Always look at how far you have come rather than how far you have to go.
Always count your blessing, not what you are missing.
n Man: What surprises you about people?n
God: when they suffer they ask, "why me?" When they prosper, they never ask "Why me".
Everyone wishes to have truth on their side, but few want to be on the side of the truth.
n
Man: Sometimes I ask, what life is, why am I here. I can't get the answer.n
God: Before anything is created, the purpose is clearly defined in the mind of the Creator, i.e. Me.
If you use your tiny, immature brain to philosophize and speculate what life is etc., it is only going to frustrate you more and more.
Instead use such questions to help you achieve the goal of self-realization. n
Man: How can I get the best out of life?n
God: Face your past without regret. Handle your present with confidence. Prepare for the future without fear.n
Man: One last question. Sometimes I feel my prayers are not answered.n
God: There are no unanswered prayers. At times the answer is NO.n
Man: Thank you for this wonderful chat. I am so happy to start the New Day with a new sense of inspiration.n
God: Well. Keep the faith and drop the fear.
Don't believe your doubts and doubt your beliefs.
Life is not misery but discovery, discovery of true love, real happiness and perfect peace.
Trust me. Life is wonderful if you know how to live.

Wednesday, October 25, 2006

kailash kher....alaha ke bande




एक दिन था जब उसे संगीत सिखाने वाले गुरु कहा करते थे कि उसकी आवाज़ अच्छी नहीं है इसलिए वह गाना छोड़कर परचून की कोई दूकान ही खोल ले.
लेकिन उसे लगन थी और विश्वास कि वह गाना ही गाएगा.
उसके इस विश्वास ने रंग दिखाया और आज वह मुंबई की फ़िल्मी दुनिया में अपनी पहचान बना चुका है.
इस गायक का नाम है कैलाश खेर. वही ‘अल्लाह के बंदे....’ और 'रंग दे...' गाने वाले वाले कैलाश खेर.
हालांकि यह रास्ता भी आसान नहीं था.
उन्होंने कई दिन मुंबई स्टेशन पर गुज़ारे, रात भर जागकर चाय पीकर, इधर उधर घूमते हुए.
मेरठ में पैदा हुए और दिल्ली में पले बढ़े कैलाश खेर बताते हैं कि उनका बचपन बेहद ग़रीबी में बीता और न तो फ़िल्म देखने की सुविधा थी और न ही गाने आदि सुनने का अवसर.
फ़िल्मों में सूफ़ी संगीत के लिए जगह बनाने का जो अवसर मुझे मिला है उसे मैं अपने लिए सम्मान का एक बड़ा अवसर मानता हूँ

कैलाश खेर
पर संगीत सीखने का सुर था सो सीखने लगे.
वैसे संगीत की आरंभिक शिक्षा मिली थी अपने पिता महाशय जी से लेकिन बाद में उन्होंने बहुत से गुरुओं से शिक्षा ली.
संघर्ष के दिन
फिर लगा कि संगीत से रोज़गार शायद न चले तो वे क्राफ़्ट आदि भी सीखने लगे. साथ में उर्दू की शिक्षा भी ली.
आख़िरकार उन्होंने गायन को ही अपना भविष्य बनाने के की ठान ली और मुंबई चल पड़े.
बात करते हुए कैलाश खेर ने याद किया कि वे मुंबई चले तो गए थे लेकिन वे किसी को पहचानते नहीं थे. पैसे सिर्फ़ इतने थे कि स्टेशन पर रहकर खाने के लिए पैसे बचाए जाएँ.

वे सूफ़ी संगीत ही गाते रहना चाहते हैं
वे बताते हैं कि वहीं स्टेशन पर उनकी कुछ दोस्ती हुई और उसी के भरोसे उन्हें पहला काम मिला नक्षत्र हीरे के लिए जिंगल गाने का. वे याद करते हैं कि उनके पास बस या ट्रेन के भी पैसे नहीं थे और वे बिना टिकट स्टूडियो तक रिकॉर्डिंग के लिए गए.
आज तो ‘अल्लाह के बंदे…’ ने अपने झंडे गाड़ रखे हैं और वहां लोग इज़्ज़त के साथ गाने के लिए बुलाते हैं. तीन सौ से अधिक जिंगल गा चुके हैं और स्वदेश फ़िल्म में शाहरुख ख़ान के लिए गाने का मौक़ा मिला है. पैसा भी ठीक मिलने लगा है.
लेकिन वे अभी भी धरातल पर हैं और अपने संघर्ष के दिनों को भूले नहीं हैं.
वे कहते हैं, "फ़िल्मों में सूफ़ी संगीत के लिए जगह बनाने का जो अवसर मुझे मिला है उसे मैं अपने लिए सम्मान का एक बड़ा अवसर मानता हूँ."
लेकिन वे यही गाते रहना चाहते हैं.

सातों दिन भगवान के, क्या मंगल, क्या पीर...

निदा फ़ाज़लीशायर और लेखक


मेरा एक दोहा है-

"सातों दिन भगवान के, क्या मंगल, क्या पीर
जिस दिन सोए देर तक, भूखा रहे फक़ीर."

इस दोहे को लिखे हुए कई साल बीत गए थे. आज अचानक याद आ गया. इसके याद आने की वजह महाराष्ट्र के पावरलूम के शहर मालेगाँव में आठ सितंबर को हुए आतंकवादी धमाके हैं. जिनकी लपेट में आए 32 लोग मौत के घाट उतर गए.
100 से अधिक घायलों में बड़ी संख्या उन भिखारियों की बताई गई जो शबे बरात के दिन, दूर-दूर से चल कर, वहाँ की रहमानी मस्जिद के सामने और मस्जिद के थोड़े फ़ासले पर बड़ा कब्रिस्तान के इर्द-गिर्द बैठे थे.
जो भीख माँग कर रोटी-रोज़ी चलाते हैं वे धर्मों के बँटवारों को नहीं मानते. उनके लिए मंदिर के भगवान, मस्जिद के रहमान या मालेगाँव के बड़ा कब्रिस्तान में कब्रों के निशान...सब बराबर होते हैं.
राजनीति भिखारियों की इस धर्मनिर्पेक्षता की विशेषता से परिचित होती है इसीलिए कभी उनके माथे पर तिलक लगाकर रामसेवक बना दिया जाता है. कभी उनके सर पर टोपी रखकर, अल्ला हो अकबर का नारा लगवाया जाता है और कभी राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन के लिए उन्हें गाँव खेड़ों से बुला लिया जाता है.
जिधर भी रोटी बुलाती है, ग़रीबी उधर चली जाती है. ग़रीबी की दुनिया खाते-पीते लोगों की दुनिया की तरह सीमाओं और सरहदों में नहीं बँटती. इसकी दुनिया रोटी से शुरू होती है और रोटी पर ही समाप्त होती है. वह ख़ुदा को मूरत या कुदरत के रूप में नहीं सोचती.
इस ग़रीबी के लिए आसमान और ज़मीन दो बड़ी रोटियों के समान हैं जिनमें उसकी अपनी रोटी भी छुपी होती है, जिसको पाने के लिए कभी वह भजन गाती है, कभी कलमा दोहराती है और कभी जीसस की प्रतिमा के आगे सर झुकाती है.

ग़रीबी का एक शायर

ताजमहल की नगरी के 19वीं सदी के शायर मियाँ नज़ीर,
ग़ालिब के सीनियर समकालीन थे. आदमी के चिंतन और दृष्टि में उसका वर्ग झाँकता नज़र आता है. इसी वर्ग के लिहाज़ से ग़ालिब की चितंन के केंद्र मौत, ज़िंदगी, ख़ुदा और कायनात थे जबकि नज़ीर जो घर-घर जाकर बच्चों को पढ़ाने वाले उस्ताद थे, उनके विषय रोटी, मुफ़लिसी और ख़ैरात थे...वह खाते-पीते लोगों की दुनियाँ में भूखों, नंगों और फक्कड़ों के शायर थे.
उनके इसी अपराध के कारण एक लंबे समय तक साहित्य की आलोचना ने उन्हें मुँह नहीं लगाया.
कबीर की तरह नज़ीर को भी इतिहास ने बहुत देर से अपनाया. नज़ीर जन-कवि थे और साधारण जन की तरह उनकी क़िस्मत में भी ग़रीबी के रास्ते में भागती-दौड़ती रोटी का पीछा करना था. ग़ालिब पेट भरे दर्शन के फ़नकार थे और नज़ीर भूख में रोटी की तलाश के कलाकार थे.
ग़ालिब फरमाते हैं-"दिल ढूँढ़ता है फिर वही फ़ुरसत के रात दिनबैठे रहें तसव्वुर-ए-जानाँ किए हुए"
ग़ालिब को प्रेमिका की कल्पना के लिए फ़ुरसत की दरक़ार थी और नज़ीर की शायरी ग़रीबी के रोग से बीमार थी.
नज़ीर के रोटीनामे की पंक्तियाँ हैं-"पूछा किसी ने यह किसी कामिल फक़ीर सेयह महरो माह हक़ ने बनाए हैं काहे केवह सुन के बोला बाबा,

ख़ुदा तुम को ख़ैर देहम तो न चाँद समझें,

न सूरज ही जानतेबाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँ."
किसका हाथ
आंतक कौन फैलाता है, इसके पीछे किसका हाथ है, कौन इसके आगे है, कौन इसके साथ है... ये ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तरों की तलाश सोचने वालों को मुसलसल भटकाता रहता है. इन सवालों के जवाब सब अपने-अपने सीमित दायरों में टटोलते नज़र आते हैं. कोई इस्लाम को इसका दोषी मानता है, कोई इसे ईसाइयत के रूप में पहचानता है.
कोई धर्म के नाम पर, अमरीका, लंदन, कश्मीर आदि पर निशाना लगाता है और कोई इसके जवाब में, हंसती-गाती ज़मीन को अफ़गानिस्तान और बग़दाद बनाता है. सबके पास अपने तर्क हैं अपनी दलीलें हैं.
जिसकी पब्लिसिटी जितनी अच्छी है, उसकी दलील उतनी ही सच्ची है. पिछले दिनों मैंने एक गज़ल लिखी थी, उसका मतला यूँ है-
"जैसी जिसे दिखे यह दुनिया,वैसी उसे दिखाने दोअपनी-अपनी नज़र है सबकीक्या सच है, यह जाने दो"
यह सच, जिसे मैंने ‘जाने दो’ के साथ जोड़ा है, सदियों से मुट्ठी-भर लोगों के शोषण का शिकार है...इस सच को छुपाने के लिए, बड़ी-बड़ी स्कीमें बनाई जाती हैं, रंग-बिरंगी तस्वीरें छपवाई जाती हैं, नई-नई दीवारें ढहाई जाती हैं, तरह-तरह की नकाबें पहनाई जाती हैं और इस तरह आम आदमी की सोच की आज़ादी पर कुंडी चढ़ाई जाती है.
हमारा समाज चरवाहों और भेड़ों का समाज है. चरवाहे गिनती में भले ही कम हों लेकिन उनकी हाँकने वाली लकड़ियों का ख़ौफ़ ज़्यादा होता है. भेड़ें गणना में चाहे कितनी ही अधिक हों, उनका धर्म चरवाहों के पीछे चलना होता है. वे यूं ही चल रही हैं. सदियों से चल रही हैं. क्योंकि उन्हें चुप-चुप चलने वाली भेड़ उसी ईश्वर, गॉड या ख़ुदा ने बनाया है, जिसने चरवाहे को बनाया है.
ख़ुदा के हुक्म से इनकार, नरक का द्वार है. हमारे समाज में धर्मों ने हमेशा इस महाशक्ति को डिक्टेटर के रूप में सोचा है और प्रचारित किया है. इस सोच के प्रचार ने आदमी के संघर्ष को नपुंसक बना दिया है. इस नपुंसकता के ख़िलाफ़ जो आवाज़ उठाता है, मुजरिम ठहराया जाता है.
इस ज़ुर्म का आरोप मेरे लेखन पर भी लग चुका है. मेरे कई शेरों और कविताओं पर काफी ले-दे हुई है उनमें से एक शेर यूँ है-
"खुदा के हाथों में मत सौंप सारे कामों को बदलते वक़्त पर कुछ अपना इख़्तियार भी रख"
'अपने इख़्तियार' की बात, रब्वूल आलमीन (सारे आलमों का ख़ुदा) के समक्ष गुस्ताख़ी समझी जाती है. ईश्वर के इसी तानाशाह के रूप के आदेशानुसार, द्रोपदी दाँव पर लगाई जाती है, दारा शिकोह को मौत की सज़ा सुनाई जाती है और पति के साथ ज़िंदा पत्नी जलाई जाती है. और जब इसके विरोध में आवाज़ उठाई जाती है, तो मराठी संत कवि तुकाराम की पोथी उनसे छीन कर नदी में बहाई जाती है.
कौन है वह
कुछ साल पहले मुंबई के कई इलाक़े, शराब के ग़ैर-क़ानूनी अड्डों में जगमगाते थे. वहाँ स्कॉच से ठर्रे तक हर प्रकार की शराब मिलती थी...शराबों के ब्रांडों के हिसाब से, पीने वालों की सोचें भी ऊँची-नीची होती थीं.
अलग-अलग मेज़ों को सजाए लोग नशा कर रहे थे. उन्हीं में एक मैं भी था. स्कॉच वाली मेज़ से आवाज़ आई "माई डियर, गॉड इज़ ए कॉन्सेप्ट, वह दिखाई न देकर हर जगह है."
इंडियन व्हिस्की वाले इसी विषय पर बोल रहे थे, "वह भले ही नज़र न आए लेकिन इस पर विश्वास करने से मन को सुकून मिलता है."
इन्हीं में एक फ़कीर जो अपनी दिन भर की थकन मिटाने को ठर्रे के साथ बैठा था, ख़ामोशी से दोनों तरफ़ की बातें सुन रहा था…सुनते-सुनते वह एकदम झल्लाकर बोला, "भाई साहब मैं देर से सुन रहा हूँ, इधर वाले कह रहे हैं ईश्वर दिखाई नहीं देता. उधर वाले बोलते हैं वह नजर नहीं आता. मेरी राय तो यह है कि वह केवल विचार है और इसलिए दिखाई नहीं देता क्योंकि उसने जैसी दुनिया बनाई है. ऐसी दुनिया बनाकर वह किसी को मुँह दिखाने के क़ाबिल नहीं है. इसीलिए वह हमेशा छुपा रहता है."
ग़रीबी किसी रूप की हो, किसी इलाक़े की हो, वह एक बैंकड्राफ्ट की तरह है जिसे हर कोई जेब में डाले घूमता है और जहाँ ज़रूरत होती है उसे कैश करा लेता है.
लीडर उसे कैश कराके कुर्सी पाता है, चित्रकार उसे केश कराके चित्र बनाता है, शायर/कवि उसे केश कराके मानवता का परचम लहराता है. ग़रीबी सब की ज़रूरत है. इसके होने से ही समाज की चमक-दमक है. दुनिया में चहल-पहल है.
प्रेमचंद्र की एक मशहूर कहानी 'कफ़न' के बारे में एक दलित आलोचक की टिप्पणी याद आती है. उसने कहा था प्रेमचंद दलितों के मध्यमवर्गीय हमदर्द थे. स्वयं दलित नहीं थे, इसीलिए पत्नी और बहू की मौत से उगाए चंदे को शराब बनकर पीते हैं और आलू भूनकर खाते हैं. इस सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ वही उठाते हैं....
मालेगाँव की ख़बर पढ़कर मैंने एक गज़ल कही थी, उसका एक शेर है-
"कहीं की भूख हो हर खेत उसका अपना हैकहीं की प्यास हो आएगी वह नदी की तरफ़."

Tuesday, October 24, 2006

photos of SRK

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'कलाकार नहीं जानता अपना योगदान'






देश-विदेश में अपने संगीत का जादू जगा चुके हैं पंडित जसराज
भारतीय शास्त्रीय संगीत के विश्वविख्यात गायक, पंडित जसराज 75 वर्ष के हो गए हैं. भारतीय शास्त्रीय संगीत को उनका योगदान पिछले छह दशकों से भी ज़्यादा समय से मिल रहा है.
प्रस्तुत है इस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश-


जीवन के 75 बसंत पार करके आज कैसा अनुभव कर रहे हैं?


बहुत ही सुंदर अनुभूति हो रही है पर कई लोगों के न होने का दुख भी है. ख़ासकर उन लोगों के बिछुड़ने का, जिनसे सीखकर और जिनके सानिध्य से ही आज इस मुकाम तक पहुँचा हूँ.


संगीत के क्षेत्र को आपका बहुत बड़ा योगदान है. आज इस अवस्था तक आकर आप को क्या लगता है, जीवन में संगीत यात्रा कहाँ तक पहुँची है?


कई बार ऐसा होता है कि गाते-गाते स्वरों को खोजने लगता हूँ, ढूँढने लगता हूँ कि कहीं से कोई सुर मिल जाए. उस दिन लोग कहते हैं कि आपने तो आज ईश्वर के दर्शन करा दिए

पंडित जसराज

यह कह पाना बहुत कठिन है कि कितनी साँसें लेनी हैं, कितने कार्यक्रम करने हैं. मैं नहीं मानता कि संगीत के क्षेत्र में मेरा कोई योगदान है. मैं कहाँ गाता हूँ. मैंने कुछ नहीं किया है. मैं तो केवल माध्यम मात्र हूँ. सब ईश्वर और मेरे भाईजी की कृपा और लोगों का प्यार है.
कई बार ऐसा होता है कि गाते-गाते स्वरों को खोजने लगता हूँ, ढूँढने लगता हूँ कि कहीं से कोई सुर मिल जाए. उस दिन लोग कहते हैं कि आपने तो आज ईश्वर के दर्शन करा दिए और जिस दिन मुझे लगता है कि मैंने बहुत अच्छा गाया, कोई पूछ बैठता है, पंडित जी, आज क्या हो गया था.
पर हाँ, मैं ये मानता हूँ कि हर कलाकार, जो इस देश में पैदा हुआ और जिसने अपनी जगह बनाई है, उसका संगीत को एक बड़ा योगदान होता है. ये योगदान तो लोग ही सही-सही बता सकते हैं. कलाकार अपने योगदान को नहीं जान पाता.
आज शास्त्रीय संगीत को लेकर कई तरह के प्रयोग हो रहे हैं. कई कलाकार अपने एलबम जारी कर रहे हैं. इसे किस रुप में देखा जाए?
ये मेरी दृष्टि से किसी बड़ी बहस का विषय नहीं है. नए कलाकारों ने अपने स्तर पर मेहनत करके अपनी जगह बनाई है और आज एक बड़ी संख्या ऐसे कलाकारों को सुन रही है.
कई कलाकारों ने अपने काम के जरिए शास्त्रीय संगीत के प्रसार को बढ़ाया है और दुनियाभर में लोग उनको सुन रहे हैं, यह सकारात्मक संकेत है.

सरोदवादक उस्ताद अमजद अली ख़ान


भारत के प्रसिद्ध सरोदवादक उस्ताद अमजद अली ख़ान के अनुसार इस दौर में लोग संगीत को आँखों से सुन रहे हैं, कानों से नहीं.
उस्ताद अमजद अली ख़ान ने कहा,"आज के दौर में भारतीय संगीत पूरी तरह से पश्चिमी देशों से प्रभावित नज़र आता है जिसकी वजह से धीरे-धीरे हम अपनी असल पहचान खोते जा रहे हैं."
उनके अनुसार 'वेस्ट्रानाइज़ेशन' के कारण ही 'आज हमें अपनी तहज़ीब पर नाज़ नहीं रहा.' वे कहते हैं कि अगर किसी हिंदुस्तानी या फिर पाकिस्तानी के साथ मुलाक़ात के बाद ऐसा महसूस हो कि किसी अंग्रेज़ से बातचीत कर रहे हैं तो इससे ज़्यादा अफ़सोस की कोई बात नहीं हो सकती है.
उस्ताद अमजद अली ख़ान का मानना है कि पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित होने में कोई बुराई नहीं है लेकिन 'उसकी ज़रूरत हमारे संगीत में बिल्कुल नहीं है.'
छह बरस की उम्र से सरोद बजाने की शुरुआत करने वाले अमजद अली ख़ान पिछले 50 साल से ज़्यादा समय से सरोद बजा रहे हैं.
उनके अनुसार शास्त्रीय संगीत की शिक्षा प्राप्त करने के दौरान संगीत से ज़्यादा अदब पर ज़ोर दिया जाता है इसीलिए किसी भी व्यक्ति को बेहतरीन संगीतकार बनने के लिए संगीत की शिक्षा प्राप्त करना बेहद ज़रूरी है.
प्रसिद्ध सरोदवादक के अनुसार भारत में बंगाल, महाराष्ट्र और दक्षिण भारतीय में शास्त्रीय संगीत और गायकी की समझ वाले लोगों की संख्या सबसे ज़्यादा है और उन लोगों के सामने साज़ बजाने का मज़ा अलग ही होता है.
औलाद का हक़
पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित होने में कोई बुराई नहीं है लेकिन 'उसकी ज़रूरत हमारे संगीत में बिल्कुल नहीं है

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उस्ताद अमजद अली ख़ान
पिछली पाँच पीढ़ियों से ख़ानदान की परंपरा को आगे बढ़ाने के बाद अब उस्ताद अमजद अली ख़ान के दोनों बेटे अमन और अयान इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं.
अपने दोनों बेटों की सरोद में दिलचस्पी का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा कहते हैं, "शुरू से ही यही कोशिश थी कि दोनों बच्चों का रूझान अच्छे संगीत की तरफ हो और वह ही हुआ."
उनका मानना है कि उनके बेटों की कामयाबी में सबसे मुख्य किरदार उनकी माँ सुभालक्ष्मी का है क्योंकि हर इंसान का 'पहला गुरू' उसकी माँ होती है.
जब उनसे पूछा गया कि क्या शिक्षा देते समय उन्होंने अपने अन्य शिष्यों से किसी तरह का अन्याय किया, तो उनका कहना था कि मंजिल पर पहुँचाने वाला ऊपर वाला है.
उन्होंने कहा कि जिस तरह ख़ुशबू को कोई छिपा नहीं सकता उसी तरह बदबू भी छिप नहीं सकती और जो 'शागिर्द अच्छा होगा उसे रोका नहीं जा सकता.'
उनका ये भी कहना था कि औलाद को ये हक़ जन्म से प्राप्त होता है कि वह अपने माता-पिता से प्रशिक्षण ले और इस हक़ को कोई छीन नहीं सकता.

Sunday, October 22, 2006

sahar


शहर की इस दौड़ में दौड़ के करना क्या है? जब यही जीना है दोस्तों तो फ़िर मरना क्या है? पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िक्र है भूल गये भीगते हुए टहलना क्या है? सीरियल्स् के किर्दारों का सारा हाल है मालूम पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुर्सत कहाँ है? अब रेत पे नंगे पाँव टहलते क्यूं नहीं? 108 हैं चैनल् फ़िर दिल बहलते क्यूं नहीं? इन्टरनैट से दुनिया के तो टच में हैं, लेकिन पडोस में कौन रहता है जानते तक नहीं. मोबाइल, लैन्डलाइन सब की भरमार है, लेकिन जिग्ररी दोस्त तक पहुँचे ऐसे तार कहाँ हैं? कब डूबते हुए सुरज को देखा त, याद है? कब जाना था शाम का गुज़रना क्या है? तो दोस्तों शहर की इस दौड़ में दौड़् के करना क्या है जब् यही जीना है तो फ़िर मरना क्या

Thursday, October 19, 2006

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इन द लाईन आफ फायर"


परवेज मुर्शरफ की किताब "इन द लाईन आफ फायर" के कुछ अंश...
बेनजीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ़

अपनी किताब में परवेज़ मुशर्रफ़ ने पूर्व प्रधानमंत्रियों बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ़ की कड़ी आलोचना की है. उनका मानना है कि नवाज़ शरीफ़ का व्यक्तित्व उनके निरंकुश पिता अब्बा जी के कारण नष्ट हो गया. अपनी किताब में मुशर्रफ़ ने नवाज़ शरीफ़ के घर पर एक डिनर का ज़िक्र किया है. उन्होंने लिखा है- अब्बा जी का व्यक्तित्व इतना कठोर था कि दोनों नवाज़ और शाहबाज़ शांति से छोटे बच्चों की तरह बैठे थे. दोनों अपने पिता के बेटे से ज़्यादा दरबारी लग रहे थे. जुल्फ़िकार अली भुट्टो के बारे में मुशर्रफ़ का कहना है कि उन्होंने अपने को लोकतंत्र के मसीहा के रूप में पेश किया लेकिन उन्होंने निरंकुश की भांति शासन किया. उन्होंने नवजात औद्योगिक आधार को नष्ट करने और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के लिए भुट्टो को ज़िम्मेदार ठहराया.
अब्दुल क़दीर ख़ान

पाकिस्तानी परमाणु कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले अब्दुल क़दीर ख़ान के बारे में भी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने विस्तार से लिखा है. मुशर्रफ़ ने लिखा है कि कैसे अब्दुल क़दीर ख़ान उनसे मिलने आए और फिर उन्होंने उन्हें उनके पद से हटाया. उन्होंने लिखा है कि अब्दुल क़दीर ख़ान 1987 से इस तरह के काम में शामिल थे. उनके साथ कहूटा लेबॉरेटरी के पाँच-छह वैज्ञानिक भी शामिल थे. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने लिखा है कि क़दीर ख़ान ने अपनी आज़ादी का फ़ायदा उठाया और ईरान से उनका संपर्क था. उन्होंने लिखा है कि दुबई के ज़रिए ये काम होता था, जिनमें यूरोपीय और भारतीय नागरिक भी शामिल थे. मुशर्रफ़ ने स्वीकार किया है कि उन्हें तो क़दीर ख़ान के बारे में थोड़ी-बहुत ही जानकारी थी. लेकिन सबसे ज़्यादा जानकारी उन्हें अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए से मिली.
आगरा शिखर सम्मेलन

वर्ष 2001 में हुए आगरा शिखर सम्मेलन के बारे में राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने लिखा है कि उनको और उस समय भारत के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी वाजपेयी को 'उन दोनों से ऊपर किसी व्यक्ति' के कारण 'अपमान' झेलना पड़ा. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने लिखा है कि दो बार उन्होंने आगरा में अपना कार्यक्रम कम करके लौटने का फ़ैसला किया था क्योंकि समझौते को लेकर भारत अपने वादे से मुकर गया था. उन्होंने लिखा है कि उनके राजनयिकों ने उन्हें ऐसा न करने के लिए मनाया. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के मुताबिक तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ दो बार हुई बातचीत के बाद एक 'संतुलित' संयुक्त घोषणा पत्र तैयार किया गया था. घोषणापत्र में आतंकवाद की आलोचना की गई थी और यह भी स्वीकार किया गया था कि कश्मीर का हल ज़रूरी है. उन्होंने किताब में लिखा है कि घोषणापत्र पर हस्ताक्षर के लिए समारोह 17 जुलाई को होटल जेपी पैलेस में होने वाला था. सारी तैयारियाँ पूरी थीं. कुर्सियाँ भी तैयार थीं, जिन पर बैठकर दोनों नेता हस्ताक्षर करने वाले थे. मुशर्रफ़ ने आगे लिखा है- एक घंटे बाद मेरे तत्कालीन विदेश मंत्री अब्दुल सत्तार ने मुझे सूचित किया कि भारत पीछे हट गया है क्योंकि केंद्रीय कैबिनेट ने इसे नामंज़ूर कर दिया है. लेकिन आगरा में केंद्रीय कैबिनेट नहीं थी. मैं बहुत नाराज़ हो गया. मैंने आवेश में तुरंत इस्लामाबाद लौटने का फ़ैसला कर लिया था. मुशर्रफ़ के मुताबिक़ उनके राजनयिकों ने उन्हें शांत किया. उन्होंने बाद में उन्हें घोषणापत्र का मसौदा फिर से तैयार करने की अनुमति दी और उस शाम अजमेर जाने की अपनी यात्रा स्थगित कर दी. वे आगे लिखते हैं- "फिर से मसौदा तैयार करने के लिए दो-तीन घंटे तक शब्दों और वाक्यों को लेकर काफ़ी बखेड़ा भी हुआ. आख़िरकार मेरी टीम लौटी और उन्होंने संकेत दिया की सफलता मिल गई है." राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने लिखा है कि वे भी नए मसौदे पर राज़ी हो गए थे. उन्होंने लिखा है- जैसे ही वे हस्ताक्षर के लिए रवाना होने वाले थे कि उन्हें फिर संदेश मिला कि भारत एक बार फिर पीछे हट गया है. मैंने तुरंत वापस लौटने का फ़ैसला किया. लेकिन मेरे विदेश मंत्री ने मुझे मनाया कि मैं जाने से पहले वाजपेयी जी को फ़ोन कर लूँ. मैं राजनयिक प्रोटोकॉल को पूरा करने के लिए तैयार हो गया हालाँकि मैं ऐसा नहीं चाहता था. उन्होंने रात के 11 बजे तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाक़ात का भी ज़िक्र किया है. मुशर्रफ़ लिखते हैं- मैंने बड़े रुखेपन से उनसे कहा कि ऐसा लग रहा है कि हम दोनों के ऊपर भी कोई है जिसके पास हम दोनों की बातों को रद्द करने का अधिकार है. मैंने यह भी कहा कि आज हम दोनों का अपमान हुआ है. वाजपेयी जी ख़ामोश बैठे थे. मुशर्रफ़ ने आगे लिखा है कि वाजपेयी जी उस क्षण का लाभ उठाने से चूक गए.
अमरीका
अमरीका पर 11 सितंबर के हमलों के बाद विदेश उप मंत्री रिचर्ड आर्मिटेज़ से अपनी मुलाक़ात के बारे में भी राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने ज़िक्र किया है. मुशर्रफ़ ने लिखा है- रिचर्ड आर्मिटेज़ ने वही कहा जो कॉलिन पॉवेल ने मुझसे कहा था. उन्होंने ये तो कहा ही था कि आप या तो हमारे साथ हो या हमारे ख़िलाफ़. ये भी कहा गया था कि अगर हम आतंकवादियों का साथ चुनेगें तो हमें ऐसी बमबारी के लिए तैयार रहना होगा, जिससे पाकिस्तान पाषाण युग में पहुँच जाएगा. ये एक चौंकानेवाला धमकी थी. लेकिन यह स्पष्ट था कि अमरीका ने अपना मन बना लिया है. मुशर्रफ़ ने आगे लिखा है- सवाल ये था कि अगर हम उनका साथ नहीं देते हैं तो क्या हम उनका मुक़ाबला कर सकते हैं क्या हम उनके हमले का सामना कर सकते हैं. इसका जवाब था- नहीं. हमारी सेना नष्ट हो जाती. उन्होंने लिखा है कि अमरीका इस स्थिति का फ़ायदा उठाकर हमारे परमाणु हथियार और अर्थव्यवस्था को बर्बाद कर देता. मुशर्रफ़ ने अपनी किताब में राष्ट्रपति बुश का कम ही ज़िक्र किया है. लेकिन एक जगह वे लिखते हैं कि राष्ट्रपति बुश अल क़ायदा के सिर्फ़ तीन नेता का नाम जानते हैं. मई 2005 में ख़ुद मुशर्रफ़ ने फ़ोन करके राष्ट्रपति बुश को बताया था कि अबू फ़राज अल लिब्बी पकड़े गए हैं. मुशर्रफ़ ने लिखा है कि कैसे इस ख़बर पर राष्ट्रपति बुश ने उत्साहित होकर प्रतिक्रिया दी थी. अपनी किताब में राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने दावा किया है कि अल क़ायदा के 369 संदिग्ध सदस्यों को सौंपने के लिए अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए ने पाकिस्तान को गुप्त रूप से लाखों डॉलर दिए थे.
करगिल युद्ध


करगिल युद्ध को राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने अपनी जीत के रूप में पेश किया है. उन्होंने लिखा है कि भारत हमले की योजना बना रहा था और इसलिए नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान ने भी सैनिकों को तैनात किया. उन्होंने लिखा है कि भारत ने शिमला समझौते के बावजूद आगे बढ़ने की कोशिश की. पाकिस्तान ने अपना कौशल अच्छी तरह दिखाया. भारत पाकिस्तान की नई शक्ति को पूरी तरह भूल चुका था. मुशर्रफ़ ने लिखा है कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस स्थिति का लाभ उठाया जो तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के लिए शर्मनाक था. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने करगिल ऑपरेशन को पाकिस्तानी सेना के लिए 'बहुत अहम' बताया. उन्होंने लिखा है कि पहले कश्मीर में आज़ादी की लड़ाई लड़ रहे मुजाहिदीन इसमें लड़ रहे थे लेकिन बाद में पाकिस्तानी सेना भी इस युद्ध में शामिल हुई. मुशर्रफ़ ने आगे लिखा है कि पाकिस्तानी सेना के पाँच बटालियन भारतीय सेना के चार डिविज़न के आगे डटे रहे. उन्होंने लिखा है कि उस समय के अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की मांग को नवाज़ शरीफ़ ने स्वीकार किया और इसी कारण पाकिस्तानी फ़ौज वापस हटी. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने स्पष्ट तौर पर लिखा है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ योजना बनाने से लेकर उसे कार्यान्वित करने में शामिल थे. करगिल के बारे में मुशर्रफ़ का कहना है कि कश्मीर मसले के समाधान की दिशा में जो भी क़दम उठाए गए हैं वह करगिल संघर्ष के कारण ही है.
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की किताब 'इन द लाइन ऑफ़ फ़ायर' बाज़ार में आ गई है. पहले से ही इस किताब को लेकर काफ़ी उत्सुकता थी. विमोचन से पहले ही इसके अंश कई पत्र-पत्रिकाओं में आने शुरू हो गए थे. इस किताब में करगिल युद्ध, पाकिस्तान की परमाणु शक्ति और 11 सितंबर के हमलों के बाद पाकिस्तान की कूटनीति के बारे में 'कई जानकारियों' की चर्चा है. पहली बार उन्होंने स्वीकार किया है कि करगिल युद्ध में पाकिस्तानी सेना भी शामिल थी. इससे पहले उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा था. इस किताब में उन्होंने लिखा है कि भारत हमले की तैयारी कर रहा था इसी कारण पाकिस्तान ने ऐसा किया. किताब में उन्होंने 11 सितंबर के हमलों के बाद अमरीका की उस धमकी का भी ज़िक्र किया है, जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान को ये तय करना है कि या तो वह अमरीका के साथ है या फिर आतंकवादियों के साथ. राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ हुए आगरा शिखर सम्मेलन का भी ज़िक्र किया है. साथ ही पाकिस्तान के दो पूर्व प्रधानमंत्रियों बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ़ के बारे में भी लिखा है. परमाणु वैज्ञानिक अब्दुल क़दीर ख़ान के बारे में भी उन्होंने विस्तार से लिखा है.

Wednesday, October 18, 2006

बांग्लादेश के बैंक को नोबेल शांति पुरस्कार


बांग्लादेश के ग्रामीण बैंक और इसके संस्थापक प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस को वर्ष 2006 का नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की गई है.
यह बैंक ग़रीब लोगों को स्वरोजगार के लिए सामूहिक रूप से कर्ज़ देता है.
लघु वित्त संगठन की तरह काम कर रहे इस बैंक की योजना बुनियादी स्तर पर बेहद सफल रही है.
आम तौर पर ऐसे लोग इस बैंक के ग्राहक हैं जो बड़े बैंकों से कर्ज़ प्राप्त करने में अपने को असहाय पाते हैं.
प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस ने पुरस्कार मिलने पर कहा, "मैं बेहद खुश हूँ. यह हमारे लिए और बांग्लादेश के लिए बहुत बड़ा सम्मान है. इससे हमारे काम को पहचान मिली है. बांग्लादेशी होने के नाते मुझे गर्व है कि हमने दुनिया को कुछ दिया है."
वो कहते हैं, "इससे ग़रीबों को उनके अधिकार दिलाने के हमारे अभियान को मान्यता मिली है. हमें उम्मीद है कि हमारा बनाया हुआ मॉडल पूरी दुनिया में फैलेगा."
उन्हें और ग्रामीण बैंक को बतौर पुरस्कार 14 लाख डॉलर की राशि मिलेगी.
प्रशंसा
नॉर्वे की नोबेल पुरस्कार समिति के मुताबिक प्रोफ़ेसर मोहम्मद यूनुस अपनी सोच को धरातल पर उतारने में सफल रहे जिससे बांग्लादेश के लाखों लोगों को फायदा पहुँचा है.
ओस्लो में नोबेल समिति के अध्यक्ष ऊला डानबोल्ट म्योएस ने कहा कि मोहम्मद यूनुस और ग्रामीण बैंक को "सामाजिक और लोकतांत्रिक विकास में योगदान" के लिए सम्मानित किया गया है.
भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने नोबेल पुरस्कार मिलने पर मोहम्मद यूनुस को बधाई दी है.
उन्होंने हेलसिंकी में पत्रकारों से कहा, "प्रोफ़ेसर यूनुस हमारे मित्रों में से एक हैं और उन्होंने छोटे स्तर पर कर्ज देने का जो अभियान शुरु किया है उससे ग़रीबी से कैसे निपटा जाए इसकी सीख मिलती है."
कार्य प्रणाली
वर्ष 1974 में बांग्लादेश में आए भयानक अकाल से सबक लेते हुए अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस ने एक ऐसे बैंक का ख़ाका तैयार किया जिसकी पहुँच हर ज़रूरतमंद के दरवाज़े तक हो.
वर्ष 1976 में प्रोफ़ेसर यूनुस ने चटगाँव विश्वविद्यालय के सहयोग से प्रयोग के तौर पर कुछ गाँवों में इस योजना को लागू किया.
धीरे-धीरे लोगों में जागरुकता बढ़ी और इस बैंक की मदद से स्वयं सहायता समूहों ने स्वरोजगार का रास्ता अपनाना शुरू किया.
बैंक की सफलता को देखते हुए बांग्लादेश सरकार से वर्ष 1983 में इसे क़ानूनी तौर पर बैंक के रूप में मान्यता मिल गई.
महिलाएँ
बांग्लादेश के ग्रामीण इलाक़ों में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर ग्रामीण बैंक की सुविधाओं का फायदा उठाया है.
मई 2006 तक के आँकड़ों के मुताबिक बैंक से लगभग 63 लाख लोगों ने क़र्ज़ लिया है जिनमें 96 फ़ीसदी महिलाएँ हैं.
पूरे बांग्लादेश में ग्रामीण बैंक की दो हज़ार 185 शाखाएँ हैं और 69 हज़ार 140 गाँवों तक इसकी पहुँच है.

Thursday, October 12, 2006

बाल मज़दूरी का अर्थशास्त्र



भारत में रेस्तराँ,ढाबों और घरों में 14वर्ष से कम उम्र के बच्चों के काम करने पर प्रतिबंध लगाने संबंधी विधेयक आने वाला है लेकिन इन बच्चों पर अच्छी खासी अर्थव्यवस्था निर्भर करती है.
दिल्ली के मोती बाग़ इलाके में एक ढाबे पर बर्फ की सिल्लियां तोड़ता आठ साल का दिलबाग बात करने से कतराता है क्योंकि ठीक सामने उसका मालिक खड़ा है.
बार-बार पूछने पर वो बताता है कि वो नेपाल से आया है और ढाबे पर काम करने के उसे हर महीने 800रुपए मिलते हैं.
काम वही बर्तन धोना,पानी पिलाना और रोटी बनाना.
एक के ख़र्च में दो
देखिए एक छोटा बच्चा काम करेगा तो उसे अधिक से अधिक हज़ार रुपए दिए जाते हैं. कोई बड़ा आदमी होगा तो दो ढाई हज़ार से कम पर काम नहीं करेगा. मतलब एक के वेतन में दो बच्चों से काम कराया जाता है

मैंने जब दिलबाग के मालिक से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने साफ़ मना कर दिया कुछ कहने से. ऐसी ही हालत दिल्ली के कई और ढाबों में काम कर रहे बच्चों की है.
दिल्ली के एक अन्य इलाक़े के ढाबा मालिक शहज़ाद बात करते हैं क्योंकि उनके ढाबे में 14 साल से कम का बच्चा नहीं है.
वो बताते हैं,"देखिए एक छोटा बच्चा काम करेगा तो उसे अधिक से अधिक हज़ार रुपए दिए जाते हैं.कोई बड़ा आदमी होगा तो दो ढाई हज़ार से कम पर काम नहीं करेगा.मतलब एक के वेतन में दो बच्चों से काम कराया जाता है."
काम में दम, दाम में कम यही नीति है बच्चों के साथ. ढाबे पर ही नहीं, घरों में भी बच्चे काम करते हैं और एक ऐसे ही व्यक्ति ने हमसे बात कि नाम उजागर न करने की शर्त पर.
घरेलू नौकर
वो कहते हैं कि उनके घर पर एक बच्चा काम करता था लेकिन भाग गया.
यह पूछे जाने पर वो बच्चों से क्यों काम कराते हैं तो उनका तर्क था कि बच्चे कम पैसे पर तो मिलते ही हैं वो भाग नहीं सकते, बड़े नौकर पैसे लेकर भाग भी जाते हैं.
उन्हें दस अक्तूबर को आने वाले विधेयक के बारे में भी कुछ पता नहीं है लेकिन वे साफ कहते हैं कि दिल्ली में कई घरों में ऐसे बच्चे काम कर रहे हैं.
भारत में तक़रीबन आठ से दस करोड़ बाल श्रमिक हैं जो विभिन्न उद्योगों में लगे हुए हैं.अगर इनके स्थान पर वयस्क काम करें तो क्या अंतर होगा वेतन का.
एक बच्चे को अगर 1500 रुपए वेतन मिला तो वेतन हुआ 15000 करोड़ रुपए. इसकी जगह पर एक वयस्क हो तो ढाई हज़ार लेगा तो समझ लीजिए दस करोड़ वयस्कों के लिए कितना पैसा हो गया

आलोक पुराणिक, अर्थशास्त्री
अर्थशास्त्री आलोक पुराणिक बताते हैं,"देश में क़रीब दस करोड़ बाल श्रमिक हैं.एक बच्चे को अगर 1500 रुपए वेतन मिला तो वेतन हुआ 15000 करोड़ रुपए. इसकी जगह पर एक वयस्क हो तो ढाई हज़ार लेगा तो समझ लीजिए दस करोड़ वयस्कों के लिए कितना पैसा हो गया."
पुराणिक का कहना है कि बाल श्रम से फायदा न केवल ढाबों या मालिकों को है बल्कि बाल श्रमिकों का परिवार भी चलता है जो बहुत ग़रीब होते हैं .
वो बताते हैं कि जब तक बाल श्रम का यह आर्थिक ढाँचा तोड़ा नहीं जाता इसे रोकना मुश्किल है.
उल्लेखनीय है कि भारत में ख़तरनाक उद्योगों मसलन, माचिस और आतिशबाज़ी में पहले ही बच्चों के काम करने पर प्रतिबंध है लेकिन वो काम कर रहे हैं.
ऐसे में ढाबों पर या घरों में उनके काम करने पर प्रतिबंध कैसे लागू होगा ये कहना मुश्किल है.
अगर एक बार के लिए मान लिया जाए कि इस पर पूरी तरह प्रतिबंध संभव है तो उद्योगों को भी भारी नुकसान होगा या कहें कि उनके उत्पाद मँहगे हो जाएँगे.
हर सामाजिक समस्या का आर्थिक पहलू महत्वपूर्ण होता है वैसा ही बाल श्रम के साथ भी है जिसे रोकने के लिए सरकार को इसके विभिन्न पक्षों यानी माँ-बाप की ग़रीबी, बच्चों की शिक्षा और इन पर आधारित उद्योगों पर ध्यान देना होगा.

जेएनयू , जवानी,वामपंथ


वामपंथ और वामपंथी. ये दो शब्द ज़ेहन में आते ही छवि उभरती है एक ऐसे शख्स की जिसकी दाढ़ी और बाल बढ़े हुए है, मुंह में सिगरेट, घुटनों पर फटी हुई जींस और सींक सलाई जैसे तन पर खादी का स्टाइलिश कुर्ता.
मुंह खुलता है तो मार्क्स और लेनिन की चौपाइयों के साथ ढेर सारा सिगरेट का धुंआ भी बाहर आता है ऐसा सुना था, लेकिन उत्तर भारत में वामपंथ का द्वीप कहे जाने वाले जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी के चर्चित गंगा ढाबे पर रात में पानी के पतलेपन को मात देती चाय और बिना आलू के आलू परांठे खाते हुए कई रातें द्वंद्वात्मक भौतिकवाद पर बहस में शरीक हुआ हूं. जिसमें यदा कदा नीत्से, दांते, हॉब्स, रुसो जैसे नाम भी सुनने को मिलते थे.
यहां चुनावों के दौरान बहस थोड़ी गर्मागर्म होती है.
लोग बताते हैं अब ढाबे पर बहस की संस्कृति कम हो गई है.
ढाबे पर अब विचारों की उत्तेजना हाथापाई तक पहुंच जाती
इसी इमारत के पास होते है सभी धरने प्रदर्शन
वामपंथी विचारधारा को सही मायने में मानने वालों की एक बात बहुत ही अच्छी है कि वो अपने साथियों का बचाव करते हैं अगर उससे ग़लती हो गई हो तो भी.
बहस और तर्क में विश्वास रखते हैं. उनका अपना अस्तित्व नहीं होता. वो पहले कॉमरेड होते हैं बाद में कुछ और.
कई पढ़ने वाले होते है जिनमें से ज़्यादातर अब ब्रिटेन और अमरीका का रुख करने लगे हैं.
यहीं पर सीताराम येचुरी, प्रकाश करात और गदर को सुनने का भी मौका मिला और सवाल पूछने का भी. छोटा सा बदलाव देखा कि ये नेता पहले अंग्रेज़ी बोलते थे, धीरे धीरे हिंदी भी बोलने लगे हैं.
मैंने एक वोट से चुनाव हारने वाले वामपंथियों का गम देखा है और भारी अंतर से जीतनेवाले वामपंथियों की खुशी भी देखी है. दुख में भी वही गंगा ढाबा और खुश हों तो भी उसी ढाबे पर इनकी पार्टियां होती हैं.
वामपंथी छात्रों को देखकर एक बात का अहसास ज़रुर होता है कि विचारों में शक्ति होती है लेकिन फिर यह देखकर दुख होता है कि अधिकतर वामपंथी नेता जेएनयू की चहारदीवारी से निकलते ही दूसरी पार्टियों में शामिल हो जाते हैं.
जब मैने ऐसे ही एक छात्र नेता से इसका कारण पूछा तो जवाब मिला "जवानी में वामपंथी न हुए तो जवानी किस काम की. बाद में तो बहुत कुछ सोचना पड़ता है."
लेकिन सब ऐसे नहीं होते. कई वामपंथी छात्र नेता बाहर निकल कर भी आम लोगों के लिए काम करते हैं.
कई छात्र विदेशों का भी रुख कर रहे हैं ख़ासकर अमरीका.
सालों साल अमरीका का विरोध करने के बाद इन बुद्धिजीवियों का अमरीका की ओर रुख करना चौंकाता ज़रुर है लेकिन इस सवाल का जवाब लंदन में मिला कि अब जेएनयू में बहस के लिए न तो जगह है और न ही तर्क करने वाले.
तर्क करने वाले का सम्मान तक नहीं होता लिहाज़ा विदेश का रुख करना पड़ता है.

'डॉक्टर मामू का ढाबा'



मामू की कोशिश होती है खाने के दौरान सभी ग्राहकों से एक बार बात ज़रुर करने की
पीएचडी कर के लोग प्राध्यापक बनते हैं, शोध करते हैं किताबें लिखते हैं लेकिन एक शख्स ऐसे भी हैं जो पीएचडी कर के ढाबा चला रहे हैं लेकिन अपनी मर्ज़ी से अपनी खुशी से.
ये हैं दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु विश्विद्यालय में चल रहा 'मामू का ढाबा'. मामू इसलिए क्योंकि पूरे परिसर में उन्हें इसी नाम से जाना जाता है.
मामू का पूरा नाम परिसर में शायद ही कोई जानता है और मामू की पत्नी भी उन्हें इसी नाम से बुलाती हैं.
उर्दू भाषा में पीएचडी करने के बाद ढाबा चलाने की क्यों सोची. यह सवाल मामू को नाराज़ नहीं करता है.
वो कहते हैं "ऐसा नहीं है कि मुझे कोई और नौकरी नहीं मिली लेकिन नौकरी में करने में दिलचस्पी कम ही रही. आज़ाद ख्याल हूं और खाना बनाने का शौक रखता था. बस शुरु कर दिया ढाबा."
मामू ईटीवी में उर्दू ख़बरें पढ़ चुके हैं. रेडियो से भी वास्ता रहा है और एक ज़माने में सेंटर फॉर डेवलपिंग स्ट्डीज़ में योगेन्द्र यादव के साथ काम कर चुके हैं.
पढ़ाई के मामले में मामू कभी फिसड्डी नहीं रहे और जेएनयू के उनके नंबर काफी अच्छे रहे. मामू की शायरी और दिलजोई पूरे कैंपस में लोकप्रिय है और शायद ही कोई ऐसा शख्स है जो उन्हें नहीं जानता हो.
खाना और खिलाना
मामू के ढाबे का एक उसूल है. खाने के साथ हंसी फ्री मिलती है.
यह हाज़िरजवाब इंसान भोजन के साथ साथ तफरीह भी करता है ताकि लोग खुशी खुशी खाना खा सकें.
मामू बताते हैं कि पहले वो घर पर और उससे पहले होस्टलों के मेस में खाना बना कर दोस्तों को खिलाते थे और तारीफें सुनकर उन्हें लगता था कि मज़ाक किया जा रहा है.
मामू का किचन सबके लिए खुला है जहां मामू एक सब्ज़ी खुद ज़रुर बनाते हैं
वो कहते हैं " पहले तो लगा कि लोग झूठी तारीफ़ कर रहे हैं लेकिन इसी तारीफ़ को सच मानते हुए अपने दिल की बात मानने की शुरुआत कर दी. "
यह पूछे जाने पर कि क्या जेएनयू में आने वाले छात्र उन्हें देखकर क्या सोचते होंगे, मामू कहते हैं कि उनका फलसफा साफ है. दिल की बात मानो, दिल जो कहता है वो करो बस.
ढाबा चलाने में मामू की कई लोग मदद करते हैं. भीड़ हो तो दोस्त काउंटर पर बैठ जाते हैं ताकि मामू खाना बनाने और खिलाने का काम कर सकें.
तो क्या दोस्ती के नाम पर दोस्त पैसे कम देते हैं, मामू कहते हैं "नहीं, नहीं, ऐसे इक्का दुक्का ही लोग हैं. बाकी सब समझते हैं कि मेरा भी धंधा है. "
भविष्य
अपने भविष्य के बारे में मामू कहते हैं कि वो आने वाले दिनों में खान पान से ही जुड़े रहना चाहते हैं.
मौका मिले तो दिल्ली में एक बेहतरीन रेस्तरां खोलने और रेसिपी की क़िताब लिखने की योजना है मामू की.
वो कहते हैं "पीएचडी की है. पीएचडी का अर्थ ही है रिसर्च करना, विषय कोई भी हो. रिसर्च करना सीखा है. शौक खाना बनाने का है तो क्यों न इसी क्षेत्र में रिसर्च किया जाए.जल्दी ही किताब लिखूंगा खाना बनाने पर. "
मामू के ढाबे के खाने के बारे में लोगों की राय बस यही है कि खाना घर जैसा मिलता है. किचन में घुसकर जो चाहे बनवाया जा सकता है. पैसे बाद में भी दिए जा सकते हैं.
सबसे बड़ी बात खाने के साथ मामू का हंसी मजाक हाजमा ठीक करने का भी काम करता है.
चलते चलते मामू का पूरा नाम बता दिया जाए. पूरा नाम ' मोहम्मद शहज़ाद इब्राहिमी'.

बांग्ला फ़िल्म में बिहारी बने अभिषेक



अभिषेक 'अंतरमहल' से पहले एक और बांग्ला फ़िल्म में काम कर चुके हैं
ऋतुपर्णो घोष की नई बांग्ला फिल्म 'अंतरमहल' अभिषेक बच्चन की दूसरी बांग्ला फिल्म है, जबकि निर्देशक ऋतपर्णो ने इसी फिल्म के साथ निर्माण के क्षेत्र में भी कदम रखा है.
इस सप्ताह शुरू हुई यह शूटिंग पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के विभिन्न इलाकों के अलावा शांतिनिकेतन में अक्तूबर के पहले सप्ताह तक चलेगी.
अगले सप्ताह से फिल्म के बाकी कलाकार यानी जैकी श्राफ और सोहा अली ख़ान के दृश्यों की भी शूटिंग होगी.
जब इतने नामी-गिरामी कलाकार जुटे हों, तो जाहिर है फिल्म का बजट भी ज्यादा होगा लेकिन घोष इसके बारे में बताने को तैयार नहीं हैं.
यह दरअसल हिंसा वाली फिल्म है. इसकी कहानी में उन्नीसवीं सदी की धार्मिक और सामंती हिंसा का चित्रण किया गया है
निर्माता निर्देशक ऋतुपर्णों घोष
वे मानते हैं कि निर्माता भी होने के कारण बजट की बात तो हमेशा दिमाग में रहती ही है. अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए अभिषेक पहली बार इस फिल्म में मैथिली भाषा का एक गाना भी गाएँगे.
अभिषेक इससे पहले अपनी फिल्म 'युवा' की शूटिंग के लिए कोलकाता आए थे. ऋतुपर्णो के शब्दों में, “युवा देखने के बाद उनको लगा था कि 'अंतरमहल' में यह भूमिका अभिषेक ही निभा सकते हैं.”
फ़िल्म की पटकथा ख़ुद लिखने वाले ऋतुपर्णो कहते हैं कि “यह फिल्म ताराशंकर बंद्योपाध्याय की कहानी 'प्रतिमा' पर आधारित है."
कई बड़े कलाकार
इस फिल्म में जैकी श्राफ जमींदार बने हैं, रूपा गांगुली और सोहा अली उनकी पत्नियाँ. अभिषेक ने इसमें बज्रभूषण नामक एक ऐसे बिहारी मूर्तिकार की भूमिका निभाई है जो काम की तलाश में बंगाल आने के बाद यहीं बस जाता है.
यह चरित्र ही ऐसा है, और फिर मैं बांग्ला उतनी अच्छी तरह नहीं बोल पाता
अभिषेक बच्चन
इससे फिल्म में भाषा की समस्या भी खत्म हो गई है. अभिषेक के ज्यादातर संवाद हिंदी में ही हैं.
अभिषेक कहते हैं कि "यह चरित्र ही ऐसा है, और फिर मैं बांग्ला उतनी अच्छी तरह नहीं बोल पाता."
हल्की दाढ़ी इस चरित्र की माँग थी इसलिए अभिषेक ने दाढ़ी बढ़ा ली है. फिल्म में इस मूर्तिकार ने मां दुर्गा की एक ऐसी प्रतिमा बनाई है जिसकी शक्ल जमींदार परिवार की बहू की शक्ल से मिलती है.
अभिषेक ने इससे पहले राजा सेन की बांग्ला फिल्म 'देश' में भी काम किया था.
क्या मम्मी या पापा ने बांग्ला फिल्म में काम करने के बारे में कोई टिप्पणी की थी? इस पर उनका जवाब है कि "मम्मी-पापा बिन माँगे कोई सलाह नहीं देते."
खुद ऋतुपर्णो का अपनी फिल्म के बारे में कहना है कि "यह दरअसल हिंसा वाली फिल्म है. इसकी कहानी में उन्नीसवीं सदी की धार्मिक और सामंती हिंसा का चित्रण किया गया है."
अक्तूबर के पहले सप्ताह तक यह फिल्म बन कर तैयार हो जाएगी.
यह महज संयोग ही है कि जब अभिषेक यहाँ बांग्ला फिल्म की शूटिंग में व्यस्त हैं तो उनके पिता अमिताभ बच्चन की एक बांग्ला फिल्म 'ओरा कारा' (वे कौन हैं) यहां भीड़ का नया रिकार्ड बना रही है.

Monday, October 09, 2006

chote sarkar




अभिषेक को सफलता थोड़ी देर से मिली थी
अब तो कामयाबी अभिषेक बच्चन के क़दम चूम रही है. लेकिन एक समय ऐसा भी था जब एक के बाद एक फ़्लॉप फ़िल्में दे रहे थे जूनियर बच्चन.
अभिषेक की नाकामी से फ़िल्म इंडस्ट्री वाले उतने चिंतित नहीं रहते थे. लेकिन छोटे सरकार को अपने माता-पिता के सामने सबसे ज़्यादा शर्मिंदगी उठानी पड़ती थी.
अभिषेक कहते हैं, "मेरी हर फ़िल्म के ट्रॉयल शो के बाद जब मैं अपने माँ-पापा का उतरा हुआ चेहता देखता था. तो मुझे बहुत ख़राब लगता था. दो इतने महारथी एक्टर और मैं उनका असफल बेटा. मुझे यह बात बहुत सताती थी."
अभिषेक बताते हैं कि एक समय वे ट्रॉयल शुरू होते ही थियेटर से निकल जाते थे ताकि उन्हें अपने माँ-पापा का उतरा चेहरा न देखना पड़े.
आख़िर जब अभिषेक की पहली हिट फ़िल्म धूम आई, तो घर में एकदम फ़िल्मी सीन हुआ. जब आदित्य चोपड़ा ने अभिषेक को फ़ोन करके बताया कि फ़िल्म हिट हो गई है तो अभिषेक ने सबसे पहले ये ख़बर अपनी माँ जया बच्चन को दी.
बस फिर क्या था! जया रोने लगीं और जूनियर बच्चन को गले से लगा लिया. उस दिन को याद कर अभिषेक कहते हैं, "सचमुच वो एक फ़िल्मी सीन था. मुझे तो हिंदी फ़िल्म का बैक ग्राउंड म्यूज़िक भी सुनाई दे रहा था."