Sunday, October 06, 2019

कुमारी भोजन

दुर्गा पूजा के दौरान छोटी बच्चियों को देवी मानकर भोजन कराने की परंपरा है। अष्टमी और नवमी को तो खास तौर पर।

पूजा के दौरान पंखुड़ी को जब कुमारी भोजन के लिए एक जगह ले गया और फिर वापस उसके संग घर लौटा तो बेटी पूछ बैठी कि आज सब मुझे प्रणाम क्यूं कर रहे हैं? पंखुड़ी के सवाल ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि हम सब कितने बहुरुपिये हैं, कितने तरह के मुखौटे लगाए जीवन जी रहे हैं।

एक तरफ जहां बेटे को लेकर तमाम तरह की धारणाएं बनी हैं कि बेटा ही कुल बढ़ाएगा आदि-आदि। या बेटी बचाओ जैसी बातें, वहीं जब दुर्गा पूजा में कुमारी भोजन के लिए बेटी की खोज करते लोगों को देखता हूं और फिर कुमारी भोजन के बाद दो-तीन मिनट बेटी की पूजा करते लोगों को देखता हूं तो लगता है कि हम कितने तरह का नाटक रचते हैं।

कुमारी भोजन की यह परंपरा हर जगह दिखती है। वहीं पूजा के मेले में छेड़छाड़ की घटनाएं भी आम है। एक तरफ कुमारी पूजा भोजन वहीं दूसरी तरफ लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं..

हम मुखौटे में जीने लगे हैं। धर्म के नाम पर बेटी की पूजा वहीं बेटे के लिए मन्नत मांगते लोग भी हैं और सबसे खतरनाक बेटियों के साथ छेड़छाड़ और हिंसा।

ऐसे में कुमारी भोजन को लेकर पंखुड़ी के सवाल ने तो एक पल के लिए सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि क्या जवाब दिया जाए लेकिन लगा कि मुझे भी मुखौटा उतार कर बेटी से बात करनी चाहिए। 

Saturday, October 05, 2019

किताबों के संग बाबूजी

आज बाबूजी का जन्मदिन है। वे होते तो आज 68 साल के रहते। ज़िंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव के बीच उन्हें आज भी रहना चाहिए था, ताकि वे देखते हम सबको...हालांकि यही एक चीज है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं कह सकते...

उनका जीवन खेत-पथार के संग किताबों के संग रमता था। वे पढ़ते थे, खूब पढ़ते थे। उनकी एक समृद्ध लाइब्रेरी हुआ करती थी, वे किताब बाँटते थे। उनकी कई आदतों में एक था- किताब बांटना। 17 साल की उम्र में उन्होंने एक निजी पुस्तकालय बनाया, जिसे वे समृद्ध करते रहे। धान, पटुआ, मूंग, गेंहूँ के संग वे दुआर को किताब से भी सजाते रहे।

हमने कभी उन्हें अपना जन्मदिन मनाते नहीं देखा लेकिन जब घर में कई पुरानी किताबों को देखता हूँ तो उस पर किताब खरीदने की तारीख पढ़ता हूँ तो वह 5 अक्टूबर होता है, मतलब जन्मदिन पर वे किताब खरीदते थे।

यह सब लिखते हुए अपने भीतर खुद को टटोलने लगता हूं। आज जब पूर्णिया में किताब की दुकान पर जाना हुआ तो लगा कि बाबूजी ने ही आज यहां भेजा है।

हिंदी की नई नई किताबें बाबूजी पूर्णिया में जिस दुकान से खरीदते थे, वहीं चला गया। लालमुनि काका की दुकान से किताबें खरीदकर और फिर मोटरसाइकिल के कैरियर में बांध कर बाबूजी चनका लौटते थे।

आज लालमुनि काका की दुकान में उनकी प्रिय किताब  'रागदरबारी' दिख गई। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का 41 वां संस्करण आया है।

हमने सातवीं बार फिर से श्रीलाल शुक्ल जी इस किताब की खरीदारी की। दरअसल छह लोग बारी -बारी से पढ़ने ले गए और फिर लौटकर 'रागदरबारी' घर न आ सका।

बाबूजी, दोपहर में पढ़ते थे। वे जब किताबों में रम जाते तो कुछ नहीं करते। पढ़ते हुए जहां वे रुक जाते, उन पन्नों के बीच धान की बालियां सूखा कर रखते थे, स्मृति के लिए।

बाबूजी का जन्मदिन और किताबों की चर्चा करना इसलिए भी रास आता है क्योंकि वे कहते थे कि आने वाली पीढ़ी को घर में कुछ किताबें भी मिलनी चाहिए। पुस्तकालय से उन्हें लगाव था, संस्थागत हो या फिर निजी, वे पुस्तकालय को पूरा स्नेह देते थे।

अपने जीवन के सबसे कठिन दौर में , जब बीमारी की वजह से वे कम बोलते थे और उठ नहीं सकते थे तब उन्होंने मुझसे कहा था कि लाइब्रेरी की सभी किताबें एक सामुदायिक पुस्तकालय को दे दिया जाए। उन्होंने अपनी खरीदी अधिकांश किताबें मधुबनी जिला स्थित यदुनाथ सार्वजनिक पुस्तकालय को दे दी। उस वक्त मैंने कहा था कि कुछ किताबें घर में रहने दीजिए, मुझे उनका किताब घर चाहिए था। लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया और जो उन्होंने कहा, वह मुझे हमेशा याद रहेगा; उन्होंने कहा था- " किताब खरीदने की आदत डालो, किताब के लिए पैसे खर्च करो, अन्य खर्च पर नियंत्रण कर किताब की दुकान में समय बिताओ..."

आज बाबूजी नहीं हैं लेकिन किताब की दुनिया उनकी जगमग कर रही है। हम सबकी आदत में किताब पढ़ना शामिल है। किताबें हमें भीतर से समृद्ध करती है, किताबें हमें विपरित से विपरित परिस्थितियों में राह दिखाती है।

Friday, October 04, 2019

क्या है अपने लिए सोशल नेटवर्क

इंटरनेट ने जिस तेजी से हमारी ज़िंदगी में पैठ बनाई है, उससे आभास होता है कि हम अभी और इसके भीतर भटकेंगे। वैसे भी जीवन में यदि भटके नहीं तो फिर जीवन ही क्या ! हम सभी बोलचाल की भाषा में तकनीकी शब्दों का बख़ूबी इस्तेमाल करने लगे हैं और यही वजह है कि इंटरनेट की बनाई आभासी दुनिया में हम आराम से घुल-मिल चुके हैं। गाँव-घर   का चौपाल हो या फिर शहर के चौक-चौराहे, अब ये सब भी वर्चुअल होने लगे हैं। मानो 'वर्चुअल वर्ल्ड' ने असल ज़िंदगी पर वर्चस्व क़ायम कर लिया हो। 

वैसे मेरा मानना है कि हमलोगों को  इंटरनेट के प्रयोग करने की आदत जब से पड़ी है, तब से ही मन की दीवारें छोटी पड़ने लगी है और लगता है कि कभी भी यह दीवार टूट सकती है। यह सोचकर अच्छा भी लगता है कि हम सभी विस्तार के लिए पुरानी सीमाओं को तोड़ रहे हैं। 

इस दुनिया में गोता लगाते हुए ऐसा लगता है मानो मैं यहां सदियों से भटक रहा हूं, सारे के सारे चेहरे परिचित नजर आते हैं। जब गाँव से दूर था तब इसीके ज़रिए अपनी अंचल की यादों की पोटली खोला करता था। तब भी मुझे यहाँ अपनी जमीं दिखती थी। सच पूछिए तो शुरुआत  से ही रेडिफ, याहू, हॉट मेल और फिर अब जीमेल-फ़ेसबुक-ट्विटर से यारी कभी महंगी नहीं पड़ी। सब एक दूसरे से जुड़ते चले गए और मेरे 'मैं' का विस्तार होता चला गया। साथ ही साथ घर की बाउंड्री का भी विस्तार होने लगा। 

पहले ऑरकुट और फिर फेसबुक व ट्विटर की मेरे मानस में उपस्थिति भी कुछ-कुछ ऐसी ही है। मेरा मानना है कि इन सबने हम सभी के ' मैं 'का विस्तार किया है। कबीर कहते हैं न- "बिन धरती एक मंडल दीसे/बिन सरोवर जूँ पानी रे/गगन मंडलू में होए उजियाला/बोल गुरु-मुख बानी हो जी…"

इंटरनेट के विभिन्न सोशल नेटवर्किंग चैनल मेरे लिए यही कर रहे हैं। ये सब मेरे लिए कबीर रच रहे हैं, गुलजार बो रहे हैं और तो और, कुछ रेणु के बीज भी बो रहे हैं। ऐसे में मुझे यह दुनिया भी किसानी लगती है और आभासी दुनिया में भी मैं काश्तकार बन जाता हूं, जो मेरा मूल है।  

ऑरकुट के दोस्त फेसबुक के प्लेटफ़ार्म पर कॉमन हो गए तो जिले के पड़ोसी और संबंधी यहां और भी करीबी बन गए। व्हाटसअप की दुनिया हमें चिट्ठी पतरी वाले दिनों  में लेकर चली जाती है। 

इस दुनिया में दोस्तों की आवाजाही लगातार बनी रहती है। यहाँ बेबाक़ होकर हम सब एक दूसरे की आलोचना करते हैं, प्रेम करते हैं, मानो बनारस के किसी घाट पर पंडित छन्नू लाल मिश्रा कह रहे हों- नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी/ पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी….। 

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दोस्तों को एकजुट करने में उम्र कभी बाधा नहीं बनी। 70 साल के राधेश्याम वर्मा भी दोस्तों की लिस्ट में शामिल हैं तो 14 साल का नीतिन भी। राधेश्याम जी किताबों पर चर्चा करते हैं तो नीतिन फिल्मों पर बात करता है। हरी बत्ती जलते देख (चैट) सब एक हो जाते हैं। बातचीत औपचारिक से कब आत्मीय हो जाती है पता ही नहीं चलता। 

अक्सर फेसबुक के चौराहे पर कई लोग टकराते हैं। ऐसे अवसरों पर लगता है, मानो यह कोई स्टेज हो, जहां सब हर दिन सज-धज के आते हैं और अपने किरदार को निभाकर निकल जाते हैं, अपने घर की ओर। और मैं, इन सबमें अपना चेहरा खोजने जुट जाता हूं। तभी पर्दे के पीछे से रवींद्र नाथ टैगोर के शब्द गूंजने लगते हैं-  विश्वरुपेर खेलाघरे/ कतई गेलेम खेले/ आपरूप के देखे गेलेम/दुटि नयन मेले../जाबार दिने...

हमने कभी भी इस दुनिया को आभासी नहीं माना, और न ही ख्वाब। हम इसमें भी एक शहर बसाते हैं, एक चौक तैयार करते हैं। ऐसे लोगों से और करीब आते हैं, जिससे मन की बातें थोक के भाव में कर सकें, जिन्हें ड्राइंगरुम में बुलाकर अच्छी चाय पिला सकें.... सब अपने हैं यहां, कोई नहीं है पराया....। आइए, आप भी मेरे गाँव के खेतों की दुनिया की तरह फेसबुक आंगन में दाखिल हो जाइए, कुछ बात करते हैं, कुछ कहानियां गढ़ते हैं, कुछ गीत गाते हैं। बस यह ध्यान रहे, आभासी दुनिया हमारे असल दुनिया पर हावी न हो जाए। 


Wednesday, October 02, 2019

'पूर्णिया में गांधी'

पिछले कुछ दिनों से लगातार बारिश हो रही थी। सबकुछ पानी-पानी था। फिर अचानक दो अक्टूबर को धूप उग आती है। सबकुछ सामान्य सा लगने लगता है। जीवन यही है। हम यहां धूप-छांव का ही खेल देखते हैं और इसी खेल में हम न जाने कितने रंगों में अपने भीतर भरम पाल लेते हैं। ऐसे ही वक्त हमें गांधी के मूल्यों की प्रासंगिकता का ख्याल आता है कि यह सुहाना भऱम एक दिन सबका टूट जाएगा और बस रह जाएगा आपका सच। आपका सच ही आपकी छवि तैयार करता है।

घर में बाबूजी की ढेर सारी डायरी है, वे रोज अपनी डायरी लिखते थे, जिसे हाथ लगाने का मौका तब मिला जब वे हमें छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गए। बाबूजी की सभी डायरी के ऊपर गांधी जी की छवि अंकित है, दरअसल ये डायरी ‘बिहार खादी ग्रामोद्योग संघ’ की है, जिसका नाम ही है- ‘सर्वोदय डायरी’। हम इन्हीं डायरी के जरिए गांधी के करीब पहुंचे। बचपन में बापू किताबों के जरिए आते हैं और फिर उम्र बढ़ने के साथ हम उनके और करीब होते चले जाते हैं।
एक अक्टूबर की बात है, पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार जी से बात होती है और दो अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर एक संवाद गोष्ठी के आयोजन की रुपरेखा तैयार होती है।

गांधी शब्द से अपनापा है, ऐसे में शहर के कुछ लोगों का साथ मिलता है और जिला समाहरणालय परिसर में गांधी के मूल्यों की प्रासंगिकता पर बातचीत शुरु होती है। गांधी को समझने की कोशिश करते हुए हमने यह जाना कि महात्मा को सत्य और संवाद में भरोसा था। उनके बहिष्कार में भी एक संवाद था। आज पूर्णिया में गांधीजी की 150 वीं जयंती पर आयोजित इस कार्यक्रम में हमने उसी संवाद को महसूस किया। हमने जिलाधिकारी की सहजता में गांधी का संवाद पर जो भरोसा था, उसे महसूस किया।

कार्यक्रम में तीन वक्ता थे, डॉक्टर निरुपमा राय, विषेख चौहान और चंद्रकांत जी। इन तीनों ने अपने विचार रखे। सुनकर बहुत कुछ सीखने को मिला। लेकिन जिस चीज ने मुझे आकर्षित किया, वह था अधिकारियों के साथ लोगों का सीधा संवाद। पुस्तकालय की बात हुई, किताब पढ़ने की आदत को लेकर बातें हुई, स्वच्छता की बात हुई, यह सभी बातें एक दूसरे के साथ सीधा संवाद के तरीके से हुई, ऐसा नहीं हुआ कि कोई एक बोलता जा रहा है और बांकी लोग बस सुन रहे हैं।

हमने कार्यक्रम में गांधी जी के प्रिय भजनों को बांसुरी के सुर में सुना। गांधी के साथ संगीत का अपना अलग ही महत्व है। निजी तौर पर गांधी जी के बारे में बहुत कुछ जानने का अवसर हमें लेखक रामचंद्र गुहा देते हैं। रामचंद्र गुहा की लेखनी से परिचय के सूत्रधार बनते हैं - सुशांत झा। सुशांत भाई ने रामचंद्र गुहा की किताबों का अनुवाद किया है। गांधी जी के शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफ़र पर गुहा ने 'गांधी भारत से पहले' किताब लिखी है और उनकी दूसरी किताब जिसने मुझे गांधी जी के क़रीब पहुंचाने का काम किया वह है - 'भारत गांधी के बाद.'

बचपन से सुनता आया हूं कि गांधी जी बिहार दौरे में पूर्णिया प्रवास भी करते थे। यहां उनके नाम पर दो मुख्य आश्रम हैं, एक टिकापट्टी में और दूसरा रानीपतरा में। आज जब जिला समाहरणालय परिसर में गांधीजी के बारे में बात हो रही थी तो लग रहा था कि गांधी यहीं कहीं आसपास हैं और पंचायती राज पर अपनी बात रख रहे हैं। दरअसल गांधी जी की सादगी हम सबको उनके करीब लाती है। कोई आदमी इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रख सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। आज के कार्यक्रम में एक युवा ने जिस सहजता से पुस्तकालय को लेकर सवाल किया और जिलाधिकारी ने जिस सादगी से जवाब दिया, उस पर और लंबी बात होनी चाहिए। जिलाधिकारी ने बड़ी सादगी से कहा कि सबकुछ संघर्ष से हासिल होता है। वे चाहते तो कह सकते थे कि सबकुछ हो जाएगा लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं कहा, यही सहजता, सरलता बताती है कि हमें गांधी के और करीब आना चाहिए। राहुल जी ने ठीक ही कहा कि हमें महात्मा गांधी के भीतर की अच्छाइयों के संग उनके चरित्र का सम्यक व निष्पक्ष मूल्यांकन भी करना चाहिए,  तब जाकर ही हम गांधी को लेकर संवाद कर सकते हैं।

एक श्रोता के तौर पर मैं सभा कक्ष में कुछ देर के लिए यह सोचने लगा कि गांधी कितनी सहजता से आज भी हम सभी के भीतर यात्रा कर रहे हैं, भले हम माने या ना माने। बात यह है कि महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी, यह उनकी आत्मा से उपजी थी, जब उन्होंने देखा था कि ब्रिटिश हुकूमत में भारत का आम आदमी भूखा और नंगा बना दिया गया है तो उन्होंने अपना कपड़ा खुद बुना और खुद धोया। यही सादगी हमें चंपारण से लेकर देश दुनिया की सैर कराती है और यह भरोसा दिलाती है कि गांधी कभी भी अप्रसांगिक नहीं होंगे।

हमें गांधी को और समझने की जरुरत है, इसके लिए हमें बहुत पढना होगा। जिलाधिकारी और अन्य वक्ताओं ने ठीक ही कहा कि हमें गांधी को समझने के लिए उनके लिखे को पढ़ना होगा। निजी तौर पर यह कार्यक्रम मेरे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मैं संवाद को देखना चाहता था, जहां सवाल ज्यादा हो और भाषण कम। दरअअसल हमें 'गांधी' शब्द को इसलिए भी समझना होगा क्योंकि महात्मा ही वह शख़्स थे, जिन्होंने आज़ादी मिलने के दिन जश्न मनाने के बजाय शोक मनाने का फ़ैसला किया था। आज़ादी का नायक कलकत्ता में शोक मना रहा था तो सरहद पार मशहूर शायर फ़ैज़ कह रहे थे -
"ये दाग- दाग उजाला, ये सबगजीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं..."

दरअसल गांधी भरम में नहीं जीते थे, उन्हें यथार्थ से प्रेम था, इसलिए वे जश्न से कोसों दूर शोक मनाते हुए भी संवाद स्थापित कर रहे थे।

Tuesday, October 01, 2019

गाम-घर में शौचालय की बात करिये

हाल ही में गांव में एक लड़के से मुलाकात हुई। उसके हाथ में स्मार्टफ़ोन की श्रेणी का एक महँगा मोबाईल था। वह दिल्ली में खाना बनाने का काम करता है। संतोष नाम के उस लड़के ने बताया कि इस बार उसने 13 हजार रुपये में मोबाईल खरीदा है। हमने पूछा कि घर में शौचालय है? संतोष ने तपाक से कहा - " शौचालय नहीं है। यह काम तो सरकार का है न , हम क्यों बनवाएँ ? " संतोष की बातों से पता चलता है कि हम सरकारी योजनाओं से कितने अनभिज्ञ हैं और वहीं दूसरी ओर दिखावे के पीछे किस तरह भाग रहे हैं और कैसे उन चीजों को अभी भी नकार रहे हैं जिसका संबंध हमारे स्वास्थ्य और स्वच्छता है। लेकिन चकाचौंध ने हमारी आंखों को अपने वश में कर लिया है और जब कोई सवाल करता है तो हम सरकार की तरफ़ ऊँगली उठा देते हैं।

गूगल करते हुए संयुक्त राष्ट्र की एक रपट पढ़ने को मिली, जिसके अनुसार अपने देश में लोग शौचालय से ज्यादा मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हैं। अब बताइए, जरुरत किस चीज की है और हम किस चीज में लगे पड़े हैं। यह भी सच है कि सरकार शौचालय बनाने के लिए पैसा देती है, लेकिन दुख की बात है कि इस जरूरी चीज के लिए भी हमें जागरूक कोई करता है तो हमारी आंख खुलती है।

अभी भी ग्रामीण समाज शौचालय को लेकर गंभीर नहीं है। सरकारी आंकड़ों पर लंबी बहस हो सकती है लेकिन ग्राउंड जीरो कुछ और कहता है। गांव-देहात में मोबाइल और महंगी बाइक आपको हर जगह मिल जाएंगे लेकिन क्या हर घर में शौचालय दिखते हैं? यह बड़ा सवाल है। युवाओं को इन मुद्दों पर सोचना होगा और पहल करनी होगी।

यह सब लिखते हुए मुझे डॉ बिन्देश्वर पाठक की अनूठी पहल पर बात करने की इच्छा हो रही है। उनकी संस्था सुलभ इंटरनेशनल ने शौचालय के क्षेत्र में बड़ा काम किया है। बिहार से उन्होंने अपना काम आरंभ किया और आज वे दुनिया भर में जाने जाते हैं। देश और विदेश में उनके काम की सराहना की जाती है।

डॉ बिन्देश्वर पाठक ने भी तो चार दशक पहले कदम ही उठाया होगा न! तो फिर हम कदम बढ़ाने से क्यों झिझक रहे हैं। मैला शब्द को हटाने के लिए, हर घर में शौचालय को शामिल करने के लिए और भी लोगों को सामने आना होगा। इन दिनों हम सब स्टार्टअप की बात करते हैं। हर कोई नया करना चाहता है। ऐसे में शौचालय के निर्माण और इसके प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए क्यों नहीं कुछ हम भी नया करें। अभी भी गाँव में लोग कहते हैं कि हमारे पास शौचालय बनाने के लिए जगह कहाँ है। जबकि
हमें यह मालूम होना चाहिए कि गङ्ढे वाले शौचालय का निर्माण मात्र एक मीटर व्यास में भी किया जा सकता है। थोड़ी सी जगह मे इस तरह के शौचालय का निर्माण कराया जा सकता है। चूंकि यह जलबंध शौचालय है अत: इससे बदबू भी नहीं आती है। दरअसल हमें स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना होगा। हम अपने स्तर पर भी यह काम कर सकते हैं। ऋण लेकर हम बाईक या ट्रेकटर ख़रीद सकते हैं तो फिर शौचालय को क्यों न हम प्राथमिकता दें।

सरकारी आँकड़ों के इतर हमें अपने स्तर पर भी यह पता लगाना चाहिए कि कितने लोग अपने घरों में शौचालय बनवा चुके हैं मोबाइल एप बनाने वाली कंपनियों से जुड़े युवाओं को इन विषयों पर सोचना चाहिए कि क्या ऐसा एप तैयार किया जा सकता है कि हम यह  पता लगा लें कि सरकारी आंकड़ों में जिन घरों में शौचालय की बनने की पुष्टि है वह सच है यह गलत। इस तरह के प्रयास करने की जरुरत है।
गूगल से ही पता चला कि 'गोटा-गो’ एक ऐसा एप है, जिसे कुणाल सेठ ने 2010 में तैयार किया था। खास बात यह है कि यदि आप घर से बाहर हैं और आपको टॉयलेट यूज करना हो तो यह एप आपको आपकी लोकेशन के आसपास के सभी पब्लिक टॉयलेट्स की जानकारी आपके मोबाइल फोन के स्‍क्रीन पर उपलब्‍ध कराएगा वो भी नक्‍शे के साथ।

गाँव में शौचालय निर्माण को लेकर निजी स्तर पर भी काम करने की जरुरत है। ग्रामीणों को, पंचायत प्रतिनिधियों को स्वास्थ्य और स्वच्छता के बारे में बताने की ज़रूरत है। निर्मल-स्वच्छ गाँव बनाने के लिए सभी को साथ आना होगा, हमें कुछ अलग और नया करना होगा।

Sunday, September 29, 2019

पूर्णिया का 'बंगाल' दुर्गाबाड़ी

पूर्णिया में बंगाल है। इसी बंगाल ने पूर्णिया को एक समय सजाया-सँवारा था।

इसी पूर्णिया में दुर्गाबाड़ी है, बांग्ला भाषी लोगों का एक पुराना मोहल्ला। इस मोहल्ले में टहलते हुए हम बंगाल हो आते हैं,  रामकृष्ण-विवेकानन्द-दक्षिण  काली हो आते हैं।

पिछले छह साल से लगातार दुर्गा पूजा में इस मोहल्ले में कोलकाता देखता हूँ, रबिन्द्र संगीत सुनता हूँ,  'आन्दोलोके मंगलालोके ..' को समझता -बूझता हूं।

इसी मोहल्ले में सतीनाथ भादुड़ी जी का बासा है, हालांकि उनका घर बिक चुका है लेकिन मोहल्ले की सड़क भादुड़ी जी के नाम से है। हर साल शारदीय नवरात्र में रबिन्द्र संगीत सुनने हम यहां आते हैं और पूर्णिया को महसूस करते हैं।

आज से शारदीय नवरात्र आरम्भ है लेकिन मौसम का मिज़ाज अनुकूल नहीं है लेकिन उम्मीद है दो-चार दिन में सबकुछ ठीक हो जाएगा और हम सब दुर्गा पूजा के उत्सव का आनंद उठाएँगे।

Monday, September 16, 2019

हिंदी

हम सब जो छोटे छोटे शहरों से निकलकर बड़े बड़े शहरों में काम-काज या पढ़ाई के लिए अपनी जगह तलाशने जाते हैं तो हमारे साथ हमारी भाषा भी यात्रा कर रही होती है। मेरे लिए हिंदी वही भाषा है। यह हमारी सोच से लेकर हमारे कर्म की भाषा है।

हिंदी पट्टी के लोग अपने जीवन की यात्राओं के अलग अलग मोड़ पर अपनी भाषा की बदौलत जय-जय कर रहे हैं। इस दौर में हिंदी के लोग अपने अपने कार्यक्षेत्र में खूब चमक रहे हैं। उनकी चमक का अहसास छोटे-छोटे शहरों में भी महसूस किया जा सकता है। बॉलीवुड अभिनेता पंकज त्रिपाठी इसके सबसे मजबूत उदाहरण हैं। आप ऊंचाई हासिल करने के बाद अपनी भाषा को कितना स्नेह देते हैं, यही चीज आपको ऑर्गेनिक बनाती है।

इन सबके बीच एक बड़ा सवाल यह भी जेहन में उठता है कि हम लोग जो छोटे शहर या गाम-घर में स्थापित हो चुके हैं, ऐसे लोग हिंदी के लिए क्या कर रहे हैं? यह सवाल एक कड़वा सच है, जिसे हमें स्वीकार करना होगा।

भले ही हम डिजिटल हो चुके हैं लेकिन क्या हम अपने शहर में हिंदी की किताबों की दुकानों में जाते हैं? क्या डिजिटल दौर में हिंदी के लिए हम ऑनलाइन कुछ कर रहे हैं? ये सब कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब की खोज के लिए हम अक्सर छोटे शहर में लोगों से बात करते हैं।

हिंदी की समृद्धि हमसे ही है। हमें हिंदी को समृद्ध करना होगा। पहले लोग कहते थे कि अंग्रेजी ही बाजार की भाषा बनी रहेगी लेकिन अब हिंदी ने डिजिटल से लेकर बाजार के चारों तरफ अपना झंडा बुलंद कर लिया है। ऐसे में हमारा भी दायित्व बनता है कि हम व्यक्तिगत स्तर पर अपनी भाषा के लिए कुछ न कुछ करते रहें।

दरअसल हिंदी हमारे लिए अभिव्यक्ति की भाषा तो है ही साथ ही इस भाषा के ज़रिए हमलोगों की रोज़ी-रोटी की तलाश भी पूरी होती है। हिंदी हमें इस भीड़ में पहचान देती है।

हम जहां हैं, वहां अपने काम काज से हिंदी को समृद्ध कर सकते हैं। मोबाइल-कंप्यूटर की दुनिया में देवनागरी का सुलभ होना एक क्रांति है। जैसे ही स्क्रीन पर हिंदी टाइपिंग सुलभ तरीक़े से उभरने लगी, हम हिंदी वालों को लाभ मिलना शुरू हो गया। डिजिटल दुनिया में हिंदी की दमदार उपस्थिति देवनागरी के सुलभ होने से संभव हुई है। मोबाइल स्क्रीन पर टाइप करते हुए हम पूरी दुनिया से संवाद कर रहे हैं। ऐसे में हम अपने स्तर पर हिंदी के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। अब वह वक्त नहीं है कि हम यह कहें कि असली चमकती हिंदी की दुनिया महानगर में ही है या फिर सिनेमा के पर्दे पर। आईए हम अपने अपने स्तर से हिंदी की दुनिया में कुछ अलग, कुछ नया करते हैं।