Friday, December 02, 2016

खेत की पाती, किसान के नाम

मेरे प्यारे किसान
ख़ुश रहो।

ऐसा कम ही होता है जब माँ अपने बेटे से यह पूछे कि ' कैसे हो? ' माँ तो अक्सर यही पूछती है 'ख़ुश हो न ! कोई दिक़्क़त नहीं है न ? ' लेकिन इस बार जब मुल्क में सब पैसे के लिए लाइन में लगे हैं, ठीक उस वक़्त जब तुम्हारी दिक़्क़तों को लेकर सबने चुप्पी साध ली है, तब लगा कि माँ अपने बेटे का हालचाल ले, अपनी संतान को हिम्मत दे। तो इसलिए मैंने सोचा कि आज तुमसे लंबी बातें करूँ।

बेटे, मुझे पता है इस बार तुम अपनी खेती से घर नहीं चला पाओगे, मुझे पता है कि तुमने पैसे के अभाव में इस बार जुताई भी ठीक ढंग से नहीं की है। मुनाफ़े की बात मैं नहीं करूँगी, क्योंकि मुझे पता है कि किसान को उतना ही पैसा मिलता है जितना उसने मुझमें (खेत) लगाया, वह भी यदि मौसम साथ दे तो ।  मुनाफ़े का खाता तो किसी और के पास है। मैं उस 'और' की बात नहीं करूँगी, आज तो बस तुम्हारी बात करूँगी।

माना कि पैसे के अभाव में तुम्हारी खेती ख़राब हो रही है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं है न कि तुम हार मान लो। याद करो दो साल पहले जब तूफ़ान की तबाही में तुम्हारी खेती लूट गई थी। मराठवाड़ा के किसानों की पीड़ा तो तुम जानते ही हो न ! बेटे, हार मत मानो, लड़ो।

इतना तो तय है कि तुम्हारा चूल्हा नहीं बुझेगा। ये अलग बात है कि इस बार आँगन-दुआर अन्न की बदौलत चहकेगा नहीं लेकिन इसका मतलब ये थोड़े है कि तुम हाथ पर हाथ रखकर केवल सोचते रहोगे। आओ, आगे आओ और नोट के लिए तड़पाने वालों को दिखा दो कि हम बिन खाद के भी अच्छी फ़सल उगा सकते हैं।

मुझे पता है कि मुल्क के हुज़ूर ने बिना तैयारी के बड़े नोटों पर रोक लगा दी लेकिन ये भी सोचो कि किसानों की राय लेकर किस सरकार ने कोई बड़ा क़दम उठाया है ?

बेटे, तुम लोग हमेशा से ठगे गए हो और इस बार भी ऐसा ही हुआ है। 'जय जवान- जय किसान' का नारा बस ठगने के लिए है। ऐसे में तुम सबको अपने लिए ख़ुद ही रास्ता बनाना होगा। ये सच है कि सरकार और बाज़ार ही सबकुछ तय करती है लेकिन यह जान लो, तुम्हारे बिना न सरकार हो सकती है और न ही बाज़ार सज पाएगी।  ऐसे में अब तुम सब ही तय करो कि खेती किसके लिए करना है !

किसान के बेटे-बेटियाँ  भी किसान बने, ठाठ से रहे, यह तब ही होगा जब तुम अपनी खेती से बाज़ार को चलाओगे। याद रहे, बाज़ार तुमसे है न कि तुम बाज़ार से हो। यदि सरकार कोई बड़ा फ़ैसला लेने से पहले उद्योगपतियों से राय ले सकती है तो फिर तुमसे क्यों नहीं ? जानते हो, इसकी वजह क्या है , दरअसल तुम सब संगठित नहीं हो, ऋण के नाम पर बहुत जल्दी ख़ुश हो जाते हो और तुरंत निराश भी। मन मजबूत करो बेटे।

बेटे, निराश मत हो, यह साल भी बीत जाएगा, निराशा के बादल को उड़ा दो। ख़ूब मेहनत करो। माँ तुम्हारे संग है, इस बार उपज कम होगी लेकिन अगली बार सरकार से सवाल करना कि बड़े फ़ैसले लेने से पहले किसान से वह क्यों नहीं कुछ पूछती है।

बात-बात पर डिजिटल और एप्प की बात करने वालों से कहो कि खेत में क़दम रखे, माटी की बात करे। डरो मत, सवाल करो और सरकार से कहो कि किसानी इस मुल्क का सबसे बड़ा रोज़गार सेक्टर है और वह इस सेक्टर को केवल वोट बैंक न समझे।

तुम्हारी
धरती माँ

(Ndtvkhabar.com पर प्रकाशित)

Friday, November 18, 2016

भरोसा एक बड़ी चीज़ है!


भरोसा एक बड़ी चीज है. हम-आप किस पर भरोसा करते हैं, सारा खेल उसी पर है. किसान को बीज पर भरोसा होता है, नौकरीपेशा को ऑफिस पर होता है, तो मरीजों को अपने डॉक्टर पर. भरोसा खत्म होते ही मन में उधेड़बुन शुरू.
प्राइवेट अस्पतालों की चकाचौंध भरी इस दुनिया में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सदर अस्पतालों को लेकर लोगों को अपने अनुभवों को सार्वजनिक करना चाहिए. मेरे गांव में एक हेल्थ सेंटर है, लेकिन वहां केवल दवाइयां दी जाती हैं. ऐसे में रोगी को इलाज के लिए या तो प्रखंड मुख्यालय जाना पड़ता है या फिर जिला मुख्यालय के सदर अस्पताल. ऐसी धारणा है कि जिनके पास पर्याप्त पैसा नहीं होता है, वे ही सरकारी अस्पतालों की तरफ रुख करते हैं.  
गांव का जीवछ बात-बात पर डॉक्टर के पास जाता है. डॉक्टर मतलब उसके लिए नर्सिंग होम है. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र वह जाना ही नहीं चाहता है. एक दिन बातचीत में उसने कहा कि दिल्ली में सबसे  बड़ा अस्पताल है- एम्स. इस पर जीवछ ने कहा कि अस्पताल तो एम्स की तरह ही होना चाहिए. हमने बताया कि एम्स भी सरकारी संस्थान है. सरकारी शब्द सुन कर जीवछ उछल गया. उसने कहा तब तो सरकारी अस्पतालों पर हम लोगों को भरोसा करना चाहिए! 
जीवछ की बातों को सुन कर लगा कि भरोसा हम पैदा कर सकते हैं यदि सुविधाएं दी जायें. सरकारी संस्थानों के स्वास्थ्य सेवाओं के हाल पर गांव में रहनेवालों को बोलना होगा. हमारे एक मित्र ने तमाम सुख-सुविधाओं के बावजूद सरकारी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया है. वे कहते हैं सरकारी अस्पतालों के डॉक्टर योग्य होते हैं. साथ ही अस्पताल में सरकार की ओर से तमाम इंतजाम कराये जाते हैं. ऐसे में लोगों को सरकारी अस्पतालों के प्रति अपना रवैया बदलना चाहिए. सरकारी अस्पतालों की साख ही कुछ ऐसी बन गयी है कि लोगों को वहां बेहतर इलाज के बाद भी भरोसा नहीं होता. सरकारी मशीनरी को ऐसी धारणा बदलने की दिशा में भी काम करना चाहिए. 
मेरे एक मित्र का कहना है कि जिस देश में राजनेताओं को सरकारी अस्पतालों से ज्यादा प्राइवेट अस्पताल पर भरोसा रहता हो, वहां आम लोगों को सरकारी अस्पतालों पर थोड़ा भरोसा कम होता है. कुछ दिन पहले एक खबर आयी थी कि तमिलनाडु के एक कलेक्टर ने अपनी छह साल की बेटी को एक सरकारी स्कूल में दाखिला दिलवाया है. भरोसा इसी का नाम है. सरकारी स्कूल में किसी अफसर, नेता, व्यापारी, उद्योगपति, डॉक्टर और किसी ऐसे व्यक्ति के बच्चे नहीं पढ़ते, जो उच्च या मध्यवर्ग में आते हैं. जो महंगे निजी स्कूल में नहीं जा सकते, वे किसी सस्ते निजी स्कूल में जाते हैं, लेकिन सरकारी स्कूल में नहीं जाते. 
ठीक वैसे ही जैसे इस वर्ग के लोग और उनके रिश्तेदार सरकारी अस्पताल में इलाज के लिए नहीं जाते. एम्स और पीजीआइ जैसे कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन वहां भी वे तब जाते हैं, जब जेब जवाब दे जाती है या और कोई चारा नहीं होता. यदि हम सब मिल कर सरकारी संस्थानों पर भरोसा करने लगेंगे, तो स्थिति बदल जायेगी. 
यकीन मानिये, समाज की परिस्थितियां उस दिन बदलेंगी, जिस दिन हर राजनेता और अधिकारी अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजने और इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों में जाने लगेंगे. यह ऐसा समय है, जब हम भ्रष्टाचार जैसी समस्या पर खूब बात कर रहे हैं. ऐसे समय में हम सब यह भी सोचें कि जो कुछ भी सरकारी है, वह धीरे-धीरे निकृष्ट क्यों होता जा रहा है. आइये, हम सब मिल कर भरोसा करें.

Thursday, November 10, 2016

गाँव की यात्रा करिए मुख्यमंत्री जी!

नीतीश जी,
नमस्कार।

साल भर पुरानी आपके नाम लिखी तब की एक चिट्ठी की बात आज फिर से कर रहा हूं क्योंकि एक बार फिर आप यात्रा पर निकले हैं।

मुख्यमंत्री जी, बापू के सत्याग्रह की भूमि चम्पारण से आपने यात्रा शुरू की है। आपने सड़क-बिजली-साइकिल और अब शराबबंदी से सूबे को पहचान दी है। अब जब आप यात्रा पर निकले ही हैं तो गुज़ारिश है कि गाम-घर को आप देखें। बिजली-सड़क की स्थिति को आप अपनी आँखों से देखें और महसूस करें। बिहार की बड़ी आबादी जो गाँव में बसी है, उसकी नज़र आप पर है नीतीश जी।

अभी भी जब कोई सरकारी अधिकारी किसी सुदूर देहाती इलाक़े का दौरा करते हैं तो पूरे गाँव में एक भरोसे का वातावरण पैदा हो जाता है, विश्वास बहुत बड़ी चीज़ है। आप पर लोगों  भरोसा किया और सूबे की कमान आपको मिली।

आज अख़बार की ख़बर पढ़कर जब गाँव  के पलटन ऋषि  ने मुझसे पूछा 'मुख्यमंत्री जी फिर से बिहार घूम रहे हैं, गाम भी आएँगे क्या?' तो फिर से आपको यह पाती लिखने बैठ गया। चुनाव के वक़्त 'बिहार में बहार है ' की बात की गई थी। गाँव में ' बहार 'को देखने अब आपको आना होगा मुख्यमंत्री जी। यक़ीन मानिए यदि  आप अपनी यात्रा  में गाँव  में प्रवास करते हैं तो आपको अलग अनुभव होगा ही साथ ही  गाँव  का भी विकास होगा।

नीतीश जी, आपने बापू के सत्याग्रह की भूमि से निश्चय यात्रा की शुरुआत की है और बापू ग्राम स्वराज की बात करते थे। ऐसे  में आप सूबे के ग्राम पंचायतों  में प्रवास कर हक़ीक़त जान सकते हैं। गाँव  के लिए आपने जो विकासपरक योजनाएँ बनाईं हैं वह ज़मीन पर पहुँचा है या नहीं उसे देखने की ज़रूरत है। आपकी कई महत्वकांक्षी योजनाएँ गाम-घर  के लिए है।

बिहार में रोजगार का अधिक से अधिक से सृजन हो, यह आशा है आपसे। ताकि गाँव देहात से महज चार-पांच हजार रूपए कमाने के लिए कोई युवा बाहर न चला जाए। यदि आप गाँव घूमेंगे तो पलायन  की पीड़ा महसूस  पाएँगे। आप इस पर सोचियेगा नीतीश जी। भरोसा है कि आप मेरे जैसे किसान की बात सुनियेगा जिसे बिहार पर भरोसा है, अपनी माटी में भरोसा है।

माननीय मुख्यमंत्री जी एक किसान के तौर पर हम आशा करेंगे कि आप इस बार अपनी यात्रा में गाँव को मुख्य एजेन्डे में रखेंगे ताकि गाम-घर का विकास हो।

एक किसान
गिरीन्द्र नाथ झा
चनका
पूर्णिया

Saturday, November 05, 2016

पापा, NDTV देखो न !

कल देर रात साढ़े दस के क़रीब घर पहुँचा। कैंपस में दाख़िल होते ही पंखुड़ी ने हुक्म सुना दिया- "पापा अब तुम भी टीवी देखना शुरू करो, एनडीटीवी। अरे वही, जिसमें रवीश अंकल रात में दिखते हैं। आज तो मज़ा आ गया पापा, रवीश अंकल के प्रोग्राम में कार्टून नेटवर्क की तरह आवाज़ें आ रही थी, दो लोग आए थे। एक बात पता है पापा, मोदी सरकार ने सबसे कहा है कि चैनल पर केवल हँसाओ। अब तो तुमको टीवी देखना ही होगा मेरे साथ। "

पंखुड़ी की बातें सुनते हुए मुझे न हँसी आ रही थी और न ही ग़ुस्सा। पिछले छह महीने से टीवी एकदम नहीं देख रहा हूं। पंखुड़ी का पूरा जोर कार्टून नेटवर्क पर रहता है, इसलिए टीवी पर उसी का राज चलता है। ख़बरों के लिए मैं न्यूज पोर्टल क्लिक करता हूं। लेकिन आज जिस अन्दाज़ में पंखुड़ी ने मुझे बताया कि न्यूज़ चैनल पर केवल हँसाया जाएगा, सुनकर मैं सन्न हूं। यूट्यूब के ज़रिए रवीश का कार्यक्रम देखा। जब हुकूमत एक दिन के लिए एनडीटीवी इंडिया पर प्रतिबंध लगाने जा रही है, ऐसे वक़्त में रवीश ने जो तेवर दिखाया है, वह क़ाबिले तारीफ़ है। लेकिन वहीं पाँच साल की बच्ची का प्राइम टाइम देखना और उस पर यह टिप्पणी करना- " एक बात पाता है पापा, मोदी सरकार ने सबसे कहा है कि चैनल पर केवल हँसाओ..." यह सुनकर लगता है कि आख़िर हम कहाँ जा रहे हैं।

रवीश ने व्यंग के बाण छोड़े, हम -आप समझ गए लेकिन छोटे बच्चे, जिन्हें टीवी की लत है, वे सब प्राइम टाइम के दो बेहतरीन मेहमान  की कला को कार्टून नेटवर्क का चरित्र समझ रहे हैं। जिन्होंने रवीश का प्राइम टाइम देखा होगा, वे ' बाग़ों में बहार है' का अर्थ समझ रहे होंगे।

मेरा मानना है कि जब भी कहीं प्रतिबंध की बातें सुनाई दे तब ख़ूब पढ़ना चाहिए, लिखना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हमें मिली है। कल देर रात तक पढ़ता रहा, कुछ किताबें लेकर बैठ गया। कुलदीप नैयर की किताब 'फ़ैसला' कई दिनों से पढ़ रहा हूं बार-बार। पंखुड़ी जैसी छोटी बच्ची के ज़ुबान पर मोदी सरकार की बातें आना, मुझे डरा भी रहा है। यदि लोकसभा चुनाव के तुरन्त बाद मोदी जी का वह भाषण आपको याद है तो सुनिएगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि बच्चे-बच्चे की ज़ुबान पर मोदी है और यही बच्चे बाद में वोटर बन जाएँगे।

पंखुड़ी अक्सर कार्टून नेटवर्क के एक प्रोग्राम 'रोल नंबर 21' की कहानी सुनाती है, जिसमें कृश नाम के स्कूली बच्चे को उसका प्रिंसिपल कनिष्क ख़ूब तंग करता है। वह उसे बोलने नहीं देता है। आज एनडीटीवी को लेकर जो बहस हो रही है, उसे सुनते हुए, पढ़ते हुए मुझे पंखुड़ी के पसंदीदा सीरियल ('रोल नंबर 21') की ख़ूब याद आ रही है।

यह सब टाइप करते हुए गुलज़ार की लिखी एक पंक्ति अभी याद आ रही है - "हमारा हुक्मरान बड़ा कमबख़्त है, जागते रहो ! " सोचता हूं कि आख़िर मीडिया आलोचना न करे तो क्या करे? केवल तारीफ़? क्या पत्रकार बस यही रटे कि बाग़ों में बहार है। यह अजीब समय है।

इस 'गोबर-गोईठा काल' में सभी पत्रकारों को पीआर एजेंसी खोलना चाहिए। हुक्मरानों की ख़ूब बड़ाई करनी चाहिए , जलेबी की तरह।  लेकिन तभी इंडियन एक्सप्रेस के राजकमल झा की बातें याद आने लगती है कि यदि सरकार आलोचना करे तो उसे ईनाम समझना चाहिए। इस घुप्प अंधेरे में राजकमल झा, रवीश कुमार जैसे पत्रकारों को पढ़कर-सुनकर एक उम्मीद तो जगती है। गाम-घर-खेती -बाड़ी करते हुए यह समझ में आ गया है कि अंधेरा मिटाने के लिए एक लालटेन ही काफ़ी है। और हाँ, अपनी बात रखने की आज़ादी हम-सबके लिए और इस मुल्क के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है। बोल की लब आज़ाद हैं तेरे। और चलते-चलते अटल बिहारी वाजपेयी जी की इन पंक्तियों को पढ़िए और बांचिए। इन चार पंक्तियों को उन्होंने आपातकाल के बाद एक रैली में सुनाया था-

"बाद मुद्दत के मिले हैं दीवाने,
कहने- सुनने को बहुत हैं अफ़साने,
खुली हवा में ज़रा साँस तो ले लें,
कब तक रहेगी आज़ादी, कौन जानें..."

Saturday, October 29, 2016

उत्सव के महीने में संथाली टोले की बात

धान की तैयारी में लगा हूं। लोगबाग धान के बाद खेतों को आलू और मक्का की बुआई के लिए तैयार कर रहे हैं। पहाड़ी चिड़ियाँ खेतों में चहक रही हैं। इसी बीच  धन्वन्तरि जयंती मनाने की योजना बनती है। शहर से दूर गाँव में।

अपना गाँव अभी भी बाजार के धनतेरस से दूर है। इस दौर में भी अक्टूबर-नवंबर में  धन हमारे लिए 'धान' ही है। हम तन और मन से इस धन के लिए मेहनत करते हैं। इसी धान से हम साल भर के लिए चावल और बांकी बचे धान से धन हासिल करते हैं। इस वजह से हम बाजार की चकमक अभी भी दूर हैं।

ख़ैर, पहली बार धनतेरस हमने गाम में कुछ अलग अन्दाज़ में मनाया। आगे दीपावली और छठ है, वह भी हम माटी की ख़ुश्बू में ही मनाने जा रहे हैं। धनतेरस के दिन शहर से लोगबाग आए थे। बाबूजी ने जो लीची बाड़ी हमलोगों के लिए सज़ाकर रखी है, हमने वहीं कुछ कुर्सी-टेबल रख दिया था। पेड़ की छांव की वजह से टेंट की ज़रूरत ही नहीं पड़ी।  वहाँ शहर के लोगों ने जंगल की बातें की, जंगल में पाए जाने वाले औषध की बातें की। कई लोगों ने पारंपरिक चिकित्सा की  भी बातें की। लेकिन शुरू से अंत तक मेरा मन अपने संथाली भाईयों के मृदंग, ढाक और डिगडिगी पर टिका था।

भागमभाग जीवनशैली में संथाली बस्ती के लोगों से मिलकर मुझे हमेशा सुकून मिला है। मुझे उनकी ही बोली -बानी में रामायण सुनना अच्छा लगता है क्योंकि वे राम-सीता की बातें तो करते हैं लेकिन इन सबके संग धरती मैया के बारे में जो वे बताते हैं, उसमें मुझे माटी का प्रेम मिलता है। वे राम को किसान के तौर पर पेश करते आए हैं, लोकगीतों में। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर हमने उन्हें मंच मुहैया कराया।

एक चीज़ जो संथाली दुनिया की मुझे खिंचती है, वह है उनका दिखावा से दूर रहना। वे अभी भी मीडिया की चकाचौंध से दूर रहना चाहते हैं। इस दौर में जब हर कोई छपने की जुगत में रहता है, ऐसे में अपना संथाली टोला कैमरे की माया की चपेट में नहीं है। एक छोटे से आयोजन में ख़बर की महत्ता से अधिक शामिल लोगों का नाम प्रमुखता से अख़बारों की सुर्ख़ियों में रहता है। हम सभी छपने के लिए व्याकुल रहते हैं। लेकिन यह छटपटाहट संथाल में नहीं है, वे अभी भी इन सबसे दूर हैं।

मुख्यधारा के नाम पर हम 'विकास और सुधार' का जो फ़ार्मूला रटते रहते हैं, उसकी व्याख्या आप इनके सामने आज भी नहीं कर सकते हैं। ऐसे में इनके पास जो ज्ञान है, उसे समझने की आवश्यकता है। कबीर ने कहा है-" अनुभव गावै सो गीता"। दरअसल जो अनुभव उनके पास है उसे आत्मसात करने की ज़रूरत है। उनके मृदंग की थाप को ध्यान से सुनना होगा, थाप के व्याकरण को समझना होगा। संगीत के जानकारों को इनसे बात करनी चाहिए।

सच तो यह है कि प्रकृति की गोद में रहते हुए उनके चेहरे की चमक में हम गाम-घर की ख़ुशी खोज सकते हैं। इनके बच्चों की स्मरण शक्ति के सामने मेमोरी कार्ड शून्य है।

इन दिनों जब देश भर में स्वच्छता की वकालत ज़ोर-शोर से हो रही है तब इवेंट कंपनियों के ब्राण्ड मैनेजरों को संथाली टोला में क़दम रखना चाहिए। इस समाज के लोगबाग जिस अन्दाज़ में साफ़-सफ़ाई रखते हैं, मानो हर दिन उनके लिए दीपावली हो। ये सब स्वच्छता वाला विज्ञापन नहीं देखते हैं।

संथाली टोले के माटी से लिपे-पुते घर देखकर शायाद रंग-रौनक़ करने वाली कम्पनियां सोचने को मजबूर हो जाए। इंदिरा आवास के नाम पर जो आधे-अधूरे घर बनाए जाते हैं, वह आपको संथाल टोला में नहीं मिलेगा। भले ही इंदिरा आवास का पूरा पैसा उन्हें न मिला हो लेकिन वे घर को 'अंडर-कंस्ट्रक्शन' मोड में नहीं रखते हैं, यहाँ भी वे अपनी लोककला आपको दिखा देंगे।

ऐसे में उत्सव के इस महीने में जब हम सब रंगोली सजाने और सेल्फ़ी लेने में जुटे हैं, एक बार गाँव-घर की तरफ़ जाना चाहिए। यक़ीन मानिए आप ख़ाली हाथ नहीं लौटेंगे, कुछ न कुछ नया लेकर आप ज़रूर आएँगे। 

Wednesday, October 26, 2016

धनतेरस के दिन चनका में कुछ अलग

यदि धनतेरस के दिन बाज़ार से फ़ुर्सत हो तो आइये हम सब मिलकर गाँव-घर में करते हैं असली 'धन' की पूजा-अर्चना। असली धन, मतलब 'स्वास्थ्य, प्रकृति और कृषि'।

गाम-घर में इन दिनों धनकटनी का मौसम है। खेतों को नए फ़सलों के लिए सजाया- सँवारा जा रहा है। हम किसानी कर रहे लोग अपने घरों के सामने धान की तैयारी में लगे हैं।

ऐसे अवसर पर हम अपने गाँव में इस बार धन्वंतरी जयंती मनाने जा रहे हैं, जिसमें हम किसानों के संग उन पेड़ -पौधों की बात करेंगे जो हमारे लिए दवा का काम करती है। उन फ़सलों की बात करेंगे जो हमारे स्वास्थ्य के लिए फ़ायदेमंद है। हम आदिवासी टोले के अपने लोगों से जानेंगे कि वे किस तरह जंगली फूल -पौधों से दवा बना लेते हैं। संथाली दोस्तों के ढोल की थाप को सुनने की इच्छा है, जिसके ज़रिए वे आज भी इलाज करते हैं। यह सबकुछ हम पेड़-पौधों के बीच करेंगे। शहर की आपाधापी से दूर।

यदि आप भी आना चाहते हैं तो आपका स्वागत है 'चनका' गाँव में। आइये कुछ वक़्त गाम-घर को देते हैं, खेत -पथार की दुनिया को समझते हैं।

(28 अक्टूबर , दिन शुक्रवार, समय सुबह  10 बजे से)

मुलायम की संयुक्त परिवार वाली पीड़ा

उत्तर प्रदेश में इन दिनों जो कुछ हो रहा है, वह सबकुछ सामने है, बताने की ज़रूरत नहीं है। अब कुछ भी छुपा नहीं है। यूपी के सत्ताधारी दल का आंतरिक कलह फ़िलहाल मुल्क के डाइनिंग टेबल लिए अँचार बन गया है, जिसमें हर कोई अपने लिए स्वाद ढूँढ रहा है।

इस पूरे मसले को कोई मुख्यमंत्री अखिलेश की नज़र से देख रहा है तो कोई पार्टी सुप्रीमो नेताजी की आँखों से, लेकिन एक घोर पारिवारिक इंसान के तौर पर भी इस पूरे घटनाक्रम को देखना चाहिए।

हम सभी बचपन से महाभारत की कहानी में भाई-भाई की लड़ाई की बातें सुनते आए हैं। कौरव-पांडव की लड़ाई, धृतराष्ट्र का पुत्र प्रेम.... । यह सब बताता है कि किस तरह पुत्र प्रेम में अंधे होकर धृतराष्ट्र ने सत्ता के लिए भाई के संतानों के ख़िलाफ़ दुर्योधन के तांडव को सहर्ष स्वीकार कर लिया।

महाभारत कथा को ध्यान  में रखकर उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी दल  के उठापटक को देखने की ज़रूरत है। मुलायम की कहानी को यदि आप ग़ौर से एक अ-राजनीतिक नज़र से देखेंगे तो पाएँगे कि किस तरह परिवार के लिए एक आदमी बेटे से झगड़ रहा है।

दरअसल हम जिस पीढ़ी के हैं, वे एकल परिवार में भरोसा रखते हैं। हम फ़्लैट  में सिमटे लोग हैं। लेकिन अभी भी संयुक्त परिवार की कमान जिसके पास है, उससे पूछिए मुलायम सिंह यादव पर इस वक़्त क्या गुज़र रहा होगा।

मुलायम एक पिता से पहले एक भाई का धर्म निभाना चाहते हैं। उन्होंने जो कुनबा खड़ा किया, उसमें भाई पहले आए न कि संतान। संयुक्त परिवार के मूल में यही बात है और इसी मूल से डरकर हमलोग एकल होते चले गए। इस बात को स्वीकार करना चाहिए। अखिलेश यादव अपनी जगह पर ठीक भी हो सकते हैं। वे हो सकता है राहुल गांधी न बनना चाहते हों।

वैसे यह बात कटु सत्य है कि राजनीति में पचास वर्षों से अधिक समय से सक्रिय मुलायम इस वक़्त अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहे हैं। उन्हें पार्टी को बचाना है लेकिन इससे भी महत्व वे अपने परिवार की एकजुटता को बनाए रखने को दे रहे हैं।

परिवार एक रहे, शायद यही वजह है कि वे खुलकर अखिलेश को कहते हैं - 'तुम हवा में घूमते हो अखिलेश! क्या तुम अकेले चुनाव जीत सकते हो? शिवपाल के कामों को कभी भूल नहीं सकता। "

राजनीति, पार्टी और सत्ता के गणित से दूर रहने वाले इस शख़्स को यूपी के इस पूरे प्रकरण ने मुलायम सिंह यादव के बहाने राजनीति में अकेले चलने और 'मैं ही हूं' के फ़ार्मूले को समझने के लिए बाध्य कर दिया है। दरअसल यह वर्चस्व की लड़ाई है और यह जंग अब हर जगह दिख जाती है। सब अपने लिए लड़ते हैं, आगे बढ़ने  लिए। लेकिन संयुक्त परिवार का जो व्याकरण है उसके फ़ार्मूले में इस 'वर्चस्व ' कोई महत्व नहीं है। वहाँ 'कर्ता' ही सबकुछ निर्धारित करता है।

समाजवाद की परिभाषा से इतर इस पूरे घटनाक्रम पर नज़र डालते हुए मैं केवल इसे एक परिवार को बचाये रखने की लड़ाई के तौर पर देख रहा हूं। मैं ग़लत भी हो सकता हूं लेकिन संयुक्त परिवार में रहने के अनुभव के तौर पर यह कह सकता हूं कि भाई -बहन को विश्वास में रखते हुए ही संयुक्त परिवार की अस्मिता और धन-सम्पत्ति की रक्षा हो सकती है। यदि ऐसा नहीं होगा तो सड़क पर आने में देर भी  नहीं लगेगी। रहीम का दोहा है न -
"सुनि इठलैहैं लोग सब, बाटि न लैहै कोय.."

संयुक्त परिवार में दोस्तों का भी अहम स्थान होता है और दोस्ती भी पीढ़ी दर पीढ़ी चलती है। दादा के मित्र की संतानें पोते-पोतियों के भाई-बहन बन जाते हैं। संयुक्त परिवार में हर किसी को साथ लेकर चलना होता है और यह तभी मुमकिन है जब परिवार के मुखिया की बातों पर लोग भरोसा करेंगे। जैसे ही भरोसा टूटा, परिवार बँट जाता है। राजनीति जो पाठ पढ़ाए लेकिन परिवार की पाठशाला को हमें नहीं भूलना चाहिए।और चलते - चलते अनवर जलालपुरी की इन पंक्तियों को पढ़ा जाए-
"धृतराष्ट्र आंखों से महरूम थे
मगर यह न समझो कि मासूम थे "