Monday, August 15, 2016

धन्यवाद रेल मंत्री जी

अबतक मैं रेल मंत्री  (@sureshpprabhu )के ट्विटर पर सक्रिय होने की बात सुनता आया था। ख़बरों में पढ़ता था। इससे पहले एक ट्रेन के लगातार देर से चलने के सम्बंध में दो बार मैंने भी शिकायत भी की थी ट्विटर के ज़रिए लेकिन कोई जवाब नहीं आया था और मैं निराश हो गया।

लेकिन 14 अगस्त को रेल मंत्रालय के आधिकारिक ट्विटर हेंडल ने जिस तरह से मेरी शिकायत पर तत्काल कार्यवाही की उससे मेरा उनके ट्विटर हेंडल पर भरोसा बढ़ा है।

बात यह हुई कि मैं गाड़ी संख्या 12506 नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस से आनंद विहार दिल्ली से कटिहार लौट रहा था। हम एसी थ्री के बी-3 कोच में यात्रा कर रहे थे। रात  दस बजे के क़रीब मुग़लसराय जंक्शन से पहले मैंने देखा कि हमारे कोच का अटेंडेंट कुछ लोगों के साथ शराब पी रहा है। इसके बाद नशे में वह कोच में घूम घूमकर यात्रियों को तंग करने लगा। मना करने पर भी वह सुन नहीं रहा था।

मैंने अन्य यात्रियों से कहा कि हम सब मिलकर शिकायत करते हैं लेकिन कई यात्रियों ने कहा कि नार्थ ईस्ट ट्रेन में यह आम बात है। यहाँ सभी शराब पीते हैं।

इसके बाद मैंने तुरंत रेल मंत्री सुरेश प्रभु के ट्विटर हेंडल को मेंशन कर अपनी बात रखी। मैंने लिखा कि जब अटेंडेंट ही शराब पी रहा तो क्या हम सुरक्षित यात्रा कर रहे हैं?'

पाँच मिनट के भीतर ही ट्विटर के ज़रिए मुझसे संपर्क किया गया और पीएनआर के आधार पर शिकायत नंबर तैयार किया गया और उसके बाद तुरंत रेलवे सुरक्षा बल के एक अधिकारी दो जवान के साथ मेरे पास आए और तुरंत अटेंडेंट को बुलाया और पूछताछ शुरू कर दी। तब रात के साढ़े दस बज रहे थे।

इसके बाद अन्य सभी कोच में भी रेलवे के सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया। मेरा मानना है कि यदि इस प्रकार रेल मंत्रालय सक्रिय रहता है तो यह अच्छी ख़बर है। मैं रेल में यात्रा करने वालों से कहना चाहूँगा कि वे सफ़ाई और अन्य असुविधा के सम्बंध में लगातार शिकायत करें।

शुक्रिया रेल मंत्रालय।

Friday, August 12, 2016

सखी दिल्ली के नाम

डियर दिल्ली,

आज तुमसे गुफ़्तगू करने मन है। दरअसल तुम्हारे पास आने के बाद खो जाता हूं। बात यह है मेरी प्यारी दिल्ली, कि तुम मेरे सब ख़ास लोगों को अपनी बाहों में समेटे हुए हो और जब भी आता हूं सबसे मिलने का वादा अधूरा ही रह जाता है !

और देखो न ! इन गुज़रे 14 साल में तुमने ख़ुद को इतना बदला है और बाहों को इतना फैलाया है कि ग़ाज़ियाबाद, नॉएडा, ग्रेटर नॉएडा, वैशाली, कौशाम्बी, वसुंधरा, फ़रीदाबाद ये सब मुझे तुम्हारी बहनें लगने लगी है।

मैं महसूस करने लगा हूं कि इन सब इलाक़ों को तुमने अपने प्रभाव में कर लिया है। यार, तुम तो पहले से ही मायावी रही हो। तुमने मुझे डूबना सीखाया है। 2002 की एक सर्द शाम मॉल रोड पे तुमने मुझे कहा था : 'जो डूबा सो पार..' लेकिन आजतक 'पार' को मैं समझ न सका हूं।

यार दिल्ली, यह तो मैं हर समय स्वीकारता हूं कि तुमने ही मुझे बसावटों से इश्क़ करना सीखाया, तुमने ही मुझे ययावर बनाया लेकिन अब जब टुकड़ों-टुकड़ों में दिल्ली आता हूं तो मन अपना अधूरा रह जाता है, प्यासा ही लौटता हूं, किसी से मिल नहीं पाता। तुम्हारे विस्तार में खो जाता हूं।

मेरी प्यारी दिल्ली,  ढेर मनमीत हैं तुम्हारे यहाँ लेकिन यही सोचकर फिर लौट जाता हूं कि "बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की...। हर बार आता हूं और हर बार मुलाक़ात अधूरी ही रह जाती है।

तुमने पहले रिंग रोड पे घुमाया, फिर मेट्रो से और अब 'ओला' की माया में लपेट रही हो। तुम बड़ी ऊँची आवाज़ में अब कहती हो कि दूरियाँ अब सिमट रही है। लेकिन प्यारी दिल्ली अप्पन अब थक जाते हैं। जहाँ जाता हूं वहीं रूक जाता हूं।

दरअसल पिछले कुछ साल से कुछ ख़बर ही नहीं  कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की...बस चलता जा रहा हूं।

एक चीज़ और कहनी है मेरी सखी दिल्ली तुमसे, तुमने जो ख़ुद का विस्तार किया है न, प्रवासियों को अपना बनाने के लिए, वह अन्दाज़ बड़ा मायावी है यार।

ख़ैर, रात में तुम्हें देखकर मैं बुदबुदाने लगता हूं: "उजाले की परियाँ नहाने लगीं/ सितारों  को शायद ख़बर ही नहीं/
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की..."

और चलते - चलते दिल्ली रानी, एक गुज़ारिश है तुमसे, सबकुछ करना, अपना विस्तार करना, साम्राज्य बढाना, चकमक -चकमक होना लेकिन यार! 'लूटियंस-ज़ोन' दूसरा मत बसाना। मुझे 'लूटियंस कल्चर' से बहुत्ते डर लगता है।

बस इतना ही कहना था डियर दिल्ली।

तुम्हारा

गिरीन्द्र

Thursday, August 11, 2016

डिजीटल इंडिया' बनाम 'रूरल इंडिया'

आज बातों ही बातों में आपको एक साल पीछे ले जाना चाहता हूं। 2015 के जुलाई की पहली तारीख को केंद्र सरकार ने डिजिटल इंडिया सप्ताह की शुरुआत की थी। आज साल भर बाद ये पुरानी बातें इसलिए याद दिला रहा हूं क्योंकि मेरे गाँव में इनदिनों राशन कार्ड के ज़रिए मिलने वाली सुविधाओं को  लाभुकों के बैंक एकाउंट्स से जोड़ने की पहल हो रही है लेकिन अबतक डिजिटल इंडिया की मूलभूत सुविधाएँ गाँव तक पहुँची ही नहीं है और कागज पर सर्वे जारी है। तो ऐसे में क्या डिजिटल इंडिया से रुरल इंडिया दूर होता जा रहा है।

एक साल पुराने डिजीटल इंडिया का नारा अब किस हालत में है या फिर यह नारा क्या मायने रखता है, इसे समझना होगा। सरकार चाहती है कि डिजीटल इंडिया के मार्फ़त लोगों को रोजमर्रा की सभी सुविधाएं पहुचाई जाए, यह बढ़ियाँ बात है लेकिन मेरे गांव तक या फिर देश के कई ग्रामीण इलाके तक यह सुविधा अबतक क्यों नहीं पहुँची, यह एक बड़ा सवाल है। ऐसे में यह गांव वाला सरकार के डिजीटल इंडिया के नारे पर लंबी बात करना चाहता है।

याद करिए, सरकार ने डिजीटल इंडिया अभियान को नौ क्षेत्रों में बांटने की कोशिश की थी। एक ग्रामीण के तौर पर सरकार की जिस बात को लेकर मैं उस वक़्त और आज भी असमंजस में हूं वो है ब्रॉडबैंड हाइवे।

इसके तहत देश के आख़िरी घर तक ब्रॉडबैंड के ज़रिए इंटरनेट पहुंचाने की बात थी। ऐसे में सबसे पहला जो सवाल कौंध रहा है वो है गांव तक कैसे ब्रॉडबैंड पहुंचेगी। दरअसल ब्रॉडबैंड हाइवे की शुरुआत आप्टिक फाइबर नेटवर्क से होती है । ऐसे में गांव गांव तक फाइवर नेटवर्क का तार बिछाना सबसे बड़ी चुनौती है। उन गांवों तक सरकार को पहुंचना होगा जहां तक अभी भी न सड़क पहुंच पाई है और न ही बिजली।

डिजीटल इंडिया का नारा व्यक्तिगत तौर पर मुझे बहुत ही पसंद है लेकिन किया बिहार या देश के अन्य राज्यों के उन गांवों को अबतक इसमें शामिल किया जा चुका है जो अभी भी विकास की रौशनी से दूर है? यह एक बड़ा सवाल है।

डिजीटल इंडिया के तहत सरकार पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्रोग्राम की बात कहती रही है। लेकिन जरा सोचिए जिस गांव में बिजली और सड़क नदारद है वहां तक आप ऐसे ख्वाब कैसे पहुंचाएंगे। यदि पहुंचाते भी हैं तो कितना वक्त लगेगा आपका, यह समझना होगा। हर पंचायत तक इस योजना को पहुंचाना कठिन चुनौती है। सरकार ई-गवर्नेंस की भी बात कर ही है। इसका अर्थ ये है कि वो सरकारी दफ्तरों को डिजीटल बनाना चाहती है और सेवाओं को इंटरनेट से जोड़ने का ख्वाब रखती है। इन सभी को अमली जामा पहनाने के लिए काफी मशक्कत करनी होगी। सरकार को हर सरकारी कर्मचारी को डिजीटल कार्यक्रम से रूबरू कराना होगा, ट्रेनिंग देनी होगी।

डिजीटल इंडिया प्रोग्राम के तहत सरकार ई-क्रांति की बात कहती रही है। मैं इस क्रांति को अभी तक समझ नहीं पा रहा हूं। मैं खुद गांव में रहकर स्मार्ट फोन के जरिए इंटरनेट का इस्तेमाल करता हूं, इंटरनेट के माध्यम से देश-विदेश के लोगों से जुड़ता हूं लेकिन ऐसा हर कोई करेगा, इसकी क्या गारंटी है। हर किसी के पास फोन, हर किसी के पास मोबाइल या कंप्यूटर की सुगमता चुनौती है। जिस देश में अभी भी अन्न-जल भी चुनौती है। जहां हर दिन लाखों लोगों का चूल्हा आज भी बड़ी मुश्किल से जल रहा है वहां डिजीटल उपकरण की उपलब्धता की गारंटी देना एक सपना ही लगता है। लेकिन इन तमाम विरोधाभासों क बावजूद एक नए सुबह की तो हम आशा रख ही सकते हैं।

सरकार इस मुहिम को हर गाँव तक ले जाना चाहती है। इसके तहत शुरू में कुछ गाँवों में से एक में सरकारी कंप्यूटर हब होंगे, जहाँ जाकर ग्रामीण उस कंप्यूटर पर लॉगइन कर सकते हैं। गौरतलब है कि डिजिटल इंडिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी वादों में से एक है। ये उनके दो बड़े प्रोजेक्ट यानी मेक इन इंडिया और स्किल्ड इंडिया से जुड़ा है। ऐसे में लोगों की निगाहें उन पर टिकी है।

एक ग्रामीण के तौर पर, जिसे डिजीटल इंडिया के नारे से प्रेम है, जो इंटरनेट के जरिए अभी भी अपना काम गांव –देहात से कर रहा है, वह चाहता है कि सरकार इस ख्वाब को हकीकत में बदलने के लिए मिशन मोड में काम करे। गांव-गांव, कस्बे-कस्बे तक इंटरनेट पहुंचाने के लिए व्यापक स्तर पर काम करना होगा। आधारभूत ढांचे का निर्माण करना होगा। इसमें भारी खर्च होगी। डिजीटल फाइबर केबल पूरे देश में नहीं है, इसके लिए काम करना होगा। पूरे देश में केबल बिछाना होगा। पहाड़ों, नदियों, जंगलों से होकर हर गांवों तक केबल ले जाना कितना कठिन काम है इसका अनुमान हम लगा सकते हैं। लेकिन हम एक नागरिक के तौर पर तो साल भर बीत जाने के बाद भी सरकार पर विश्वास कर ही सकते हैं।

Saturday, July 23, 2016

धनरोपनी महोत्सव का ख़्याल !

पिछले तीन सालों से सक्रिय रूप से किसानी कर रहा हूं। इस दौरान कई बार ख्याल आया कि क्यों न धनरोपनी महोत्सव मनाया जाए। ऐसे लोगों को खेत में उतारा जाए जो हैं तो माटी से दूर लेकिन जिनका मन माटी से जुड़ा है।

दरअसल खेत की तरह ही मुझे इंटरनेट कि दुनिया से लगाव है। ख़ासकर वेब की दुनिया के उन अड्डों को खंगालना मुझे अच्छा लगता है जिसे वे लोग चला रहे हैं जो अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच अपने शौक़ को बचाये रखने के लिए कुछ रचनात्मक काम कर रहे हैं। धनरोपनी महोत्सव में ऐसे ही लोगों को शामिल करने का मन है। खेती बाड़ी के संग क़लम-स्याही करते हुए ऐसे कई लोगों के सम्पर्क में आया जिन्हें गाम-घर की दुनिया से ख़ूब लगाव है। ऐसे लोग सही अर्थों में गाँव से जुड़े हैं, आप कह सकते हैं कि ऐसे लोगों के मन के तार हर वक़्त गाँव की आवो-हवा से जुड़ी रहती है।

पूर्णिया में पिछले तीन साल से खेती बाड़ी में सक्रिय रहने की वजह से अलग अलग क्षेत्र के कई लोगों से मुलाक़ात होती रही है। एक किसान के तौर पर मैं उन लोगों को खोजता हूं जिनका मन गाम-घर की दुनिया में रमता है। इसी कड़ी में मेरी मुलाक़ात एक युवा आईपीएस अधिकारी निशांत कुमार तिवारी से होती है।

निशांत कुमार तिवारी को फ़ोटोग्राफ़ी का शौक़ है, वे लेखक हैं, जिनकी किताबें ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित हो चुकी है, वे ब्लॉग भी लिखते हैं लेकिन जिस चीज़ की वजह से मैं उनकी तरफ़ खींचा चला गया, वह है उनका 'गाँव कनेक्शन'। रविवार को छुट्टी के दिन उनका गाँव के समीप दौरा था। दोपहर में  काम के बाद उनका फ़ोन आता है कि वे गाँव घूमना चाहते हैं। एक आईपीएस अधिकारी अपने तमाम व्यस्त कार्यक्रम के बीच समय निकालकर गाँव पहुँचता है और घंटों प्रकृति के संग गुफ़्तगू करता है अपने कैमरे की सहायता से। एक किसान के तौर मैं उन्हें देखता हूं और उनके प्रकृति प्रेम में डूब जाता हूं।

मुझे अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु याद आने लगते हैं। उनके पात्र सुरपति राय और भवेशनाथ याद आने लगते हैं। परती परिकथा में रेणु लिखते हैं कि भवेशनाथ परती के विभिन्न रूपों का अध्ययन करने आए हैं। कैमरे का व्यू फ़ाइंडर उनकी अपनी आँख है। भवेश मन ही मन सोचते हैं, तीस साल ! बस , तीस साल और ! इसके बाद तो सारी धरती इंद्रधनुषी हो जाएगी। तब तक रंगीन फ़ोटोग्राफ़ी का भी विकास हो जाएगा। झक-झका-झक-झका!

निशांत तिवारी जब अपने कैमरे से खेत-खलिहान, प्रवासी पक्षियों के झुंड और पुराने पेड़ में पक्षियों के घोंसलों को क़ैद कर रहे थे, उस वक़्त मेरे मन में रेणु की लिखी बातें चल रही थी, जैसे ही वर्तमान में दाख़िल होता हूं तो लगता है - हाँ, रेणु ने ठीक ही कहा था, गाँव से जुड़े लोग समय निकालकर ज़रूर आएँगे।

इस तरह के लोगों से लम्बी बातें करते हुए हम अंचल के और क़रीब आ जाते हैं। बाबूजी के फ़ोटो एलबम पलटते वक़्त एक तस्वीर हाथ आई थी, वह तस्वीर एक खेत की है जिसमें बाबा नागार्जुन हैं, फणीश्वर नाथ रेणु हैं और फ़ारबिसगंज के बिरजू बाबू हैं। सबसे मज़ेदार बात ये है कि सभी धनरोपनी कर रहे हैं। सभी के पैर कीचड़ से सने हैं। यह तस्वीर देखकर इस किसान का मन एक बार फिर से खेत में एक उत्सव मनाने के लिए तड़प उठता है।

पिछले साल एक अमेरिकी दम्पति डेविड और लिंडसे फ़्रेनसेन गाँव आए थे। उस वक्त खेत में मक्का था। धनरोपनी के बारे में हमने जब उन्हें बताया तो वे भी इसे लेकर उत्सुक दिखे। ग्राम्य जीवन ऐसी ही छोटी छोटी चीज़ों में सुख तलाशता आया है। निशांत तिवारी जैसे लोगों से मिलकर और गाँव के प्रति लगाव को देखकर एक उम्मीद बँधतीहै कि ग्राम्य जीवन को एक नया रूप ज़रूर मिलेगा, ऐसे में एक अलग अन्दाज़ में धनरोपनी महोत्सव तो बनता ही है। इस आद्रा नक्षत्र के बाद खेत के कादो में हम ज़रूर करेंगे धनरोपनी महोत्सव , आप आ रहे हैं न ! 

Monday, July 18, 2016

बाबूजी

एक साल गुज़र गया। वक़्त किसके लिए और कब ठहरा है ? किसी के लिए तो नहीं। पिछले साल 18 जुलाई को ही बाबूजी अनंत यात्रा पर चले गए। आज सुबह से मन टूटा हुआ है, यह तारीख़ न आए...स्मृति में बाबूजी के चले जाने की तारीख़ न आए, ऐसा मैं साल भर सोचता रहा लेकिन ऐसा किसके लिए हुआ है ? लेकिन मैं यह भरम पाले बैठा था, ख़ुद को भरम में रखने के लिए...

जबसे होश संभाला, बस यही जाना कि बाबूजी चनका से पूर्णिया गए हैं या फिर दरभंगा-मधुबनी या फिर कोर्ट -कचहरी के चक्कर में पटना आदि जगह ...लेकिन वे सबकुछ छोड़कर अनंत यात्रा पर चले गए, यह आज भी मैं यक़ीन नहीं कर पा रहा हूं। वे हैं, यहीं आसपास। मैं हमेशा उस पलंग को देखता हूं, जहाँ वे लेटे रहते थे...

उनकी बीमारी ने मुझे उनके और क़रीब ला दिया था। याद करता हूं तो रोयें खड़े हो जाते हैं। हमेशा लड़ने वाला, जीवन में संघर्ष कर सबकुछ हासिल करने वाला इतनी जल्दी हार जाएगा, किसी ने सोचा नहीं था। उनके मित्र कहते हैं कि वे हारने वालों में नहीं थे, वे लड़ने वाले थे लेकिन बीमारी ने उनके मन को तोड़ दिया।

लगातार दो साल वे बिछावन पर लेटे रहे। छह महीने उन्होंने 'बेड सोर' से लड़ाई की। पूरे शरीर में घाव।लेकिन इस दौरान भी उनके चेहरे का भाव किसी संत का आभास कराता था। वो भी तब जब घाव पर बेटाडिन दवा लगाई जाती थी। मैं सिहर जाता था, यह जानते हुए कि ये दवा घाव के फंगस को हटाने का काम करती है लेकिन दर्द भी तेज करती है कुछ देर के लिए ...लेकिन वे इस दौरान भी कभी विचलित नहीं हुए।

आज यह सब लिखते हुए मैं ख़ुद से लड़ रहा हूं। डर रहा हूं, एक भय भीतर में समा गया है। मैं उस भय को अब बहुरुपिया मानने लगा हूं। याद करता हूं उस दौरान भी उनकी दवाई के लिए जूझता रहता था। एक तरफ़ खेत तो दूसरी तरफ़ बिछावन पर बाबूजी।

बाबूजी, आज आप सामने नहीं हैं लेकिन चनका को लेकर जो कुछ आप सोचते थे, वह सब हो रहा, धीरे-धीरे। हालाँकि मुझे पता है आप ही सबकुछ मुझसे करवा रहे हैं।

खेती-बाड़ी-क़लम-स्याही करते वक़्त ईमानदार बने रहने की पूरी कोशिश करता हूं। अफ़सोस है कि आपको बहुत कुछ नहीं दिखा सका। आपका चनका जब भी ख़बरों में आता है तो लगता है यह सब आप ही कर रहे हैं।

आपसे ही विपरीत से विपरीत परिस्थिति में लड़ना सीखा है बाबूजी। याद करता हूं जब भी पैथोलॉजिकल जांच में आपका सोडियम गिरा हुआ और सूगर लेवल हाई देखता था तो मैं खुद चक्कर खा जाता था। इलोकट्रेट इम्बैलेंस आपके लिए नई बात नहीं थी लेकिन मैं डर जाता था क्योंकि हमेशा अपने कन्धे पर भार उठाने वाले शख्स को इस कदर लाचार मैंने नहीं देखा था लेकिन तभी आपकी एक चिट्ठी की याद आ जाती है जो आपने मुझे 2003 में भेजी थी दिल्ली के गांधी विहार पते पर। रजिस्ट्रड लिफाफे में महीने के खर्चे का ड्राफ्ट था और पीले रंग के पन्ने पर इंक कलम से लिखी आपकी पाती थी।

बाबूजी, आपने लिखा था कि “बिना लड़े जीवन जिया ही नहीं जा सकता। लड़ो ताकि जीवन के हर पड़ाव पर खुद से हार जाने की नौबत न आए।“ आपकी इन बातों को जब याद करता हूँ तो ताक़त मिलती है।

बाबूजी, आपके चनका में बाहर से लोगों की आवाजाही ख़ूब बढ़ गयी है। पढ़ने-लिखने में रमे रहने वाले लोग आते हैं तो लगता है मानो आप अपने बैठकखाने से सबकुछ देख-सुन रहे हैं। यक़ीन मानिए, आपने जो सोच रखा था, वो ज़रूर पूरा होगा। बस, बाबूजी ...आप मेरे कंधे पे यूँ ही हाथ रखते रहिए, आपके स्पर्श से शक्ति मिलती है।

Monday, July 04, 2016

बारिश में 'आत्मालाप'

बारिश का मौसम है। अक्सर समय पर बारिश होती नहीं है और हम जैसे किसानी कर रहे लोग डीज़ल फूँककर खेत को धनरोपनी के लायक बनाते हैं, ख़ूब कादो -कीचड़ करते हैं और फिर नन्हें-नन्हें धान के पौधों को पंक्ति में लगाकर धरती मैया का शृंगार कर डालते हैं। दरअसल धान को हम बेटी मानते हैं, धान की बालियाँ हमारे घर -दुआर को रौशन करती है, वो हमें प्यार देती है, बिना किसी आशा के ...

आज पूर्णिया से चनका आते वक़्त धान के खेतों के बारे में ही सोच रहा था। सड़क के दोनों तरफ़ धनरोपनी हो रही थी। हम भी अपने धार वाले इलाक़े में धनरोपनी करा रहे हैं। मौसम साथ दे रहा है, इन दिनों जमकर बारिश हो रही। बरखा इस बार धरती मैया की प्यास बुझा देगी, एक किसान के तौर पर हम तो यही आशा करते हैं, हर साल।

बाबूजी की पहली बरसी आ रही है। पिछले साल ईद के दिन वे हम सबको अकेले छोड़ चले गए, अनंत यात्रा पर। वक़्त बड़ी तेज़ी से गुज़र जाता है, पता भी नहीं चलता है। उनकी पहली बरसी हम सब भाई-बहन गाँव में कर रहे हैं। उन्होंने चौदह साल की उम्र से किसानी शुरू की, खेतों को वे प्रयोगशाला मानते थे। फिर एक दिन वे थक गए और बिछावन पर लेट गए। शायद कर्म करते हुए एक दिन हर कोई ऐसा ही करता है। थक जाना भी तो सत्य ही है न!  दर्शन में 'निज़ाम से नैना मिलाने की बात' कही गयी है। बाबूजी को बिछावन पर लेटे देखकर मुझे अक्सर यही लगता था। उनकी आँखों को देखते हुए लगता था, मानो मुझे वे कह रहे हों- " मैं तो निज़ाम से नैना लगा बैठी रे..."

मुझे याद है, कॉलेज के दिनों में निज़ामुद्दीन के दरगाह के पास एक फ़क़ीर मिले थे। उन्होंने कहा था कि दुख की निंदा मत करिए, उसे स्वीकार करिए। बाबूजी को जब भी देखता, लगता कि वही फ़क़ीर मुझे सबकुछ दिखा रहे हैं। इस बारिश में फ़क़ीर बाबा की एक वाणी याद आ रही है- " एक सूरतिया के दो है मूरतिया.."

आज जब ख़ूब बारिश हो रही है और हम खेत से रोपनी कराने के बाद दुआर लौटे हैं तो पता नहीं इतना कुछ क्यों याद आ रहा है। कभी लगता है बाबूजी ऊपर से मुझे बता रहे हैं मन को भिंगने दो, खेत की तरह ताकि मन के भीतर जो कुछ है वह विचार के रूप में अंकुरित हो जाए। ठीक वैसे ही जैसे बीज फ़सल बनकर हमारे बख़ारी को गुलज़ार करता है।

यह सब सोचते हुए बरामदे की खिड़की से बाहर देखता हूं। सामने सागवान के बड़े बड़े पत्ते पानी में नहाकर और भी हरे दिखने लगे हैं। सभी गाछ-वृक्ष इस बारिश में चहकते दिख रहे हैं। अहाते में जहाँ पानी लगा है वहाँ कचबचिया चिड़ियाँ डुबकी लगा रही है। पीछे के खेत में बनमुर्गी खेल रही है। आम के पेड़ पर एक नीलकंठ पंख फैलाये बैठी है।

आज इस बारिश में मन के सारे तार खुलते जा रहे हैं। बारिश अभी थमी है, हवा चल रही है, पत्ते भिंगकर और भी सुंदर लगने लगे हैं। सेमल के पेड़ को देखकर मैं बाबूजी के और क़रीब चला जाता हूं। जीवन के आख़िरी दिनों में वे मुझे रुई से भी हल्के लगने लगे थे, मानो हवा में उड़कर वे हम सब के भीतर बैठ गए हों। उदय प्रकाश की इन पंक्तियों की तरह-

"मैं सेमल का पेड़ हूं
मुझे ज़ोर-ज़ोर से झकझोरो और
मेरी रुई को हवा की तमाम परतों में
बादलों के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह
उड़ जाने दो...."

Sunday, June 19, 2016

बाबूजी



गाम में अपने अहाते में बैठा हूं। खेत में ट्रेक्टर का हल फट-फट की आवाज़ देकर माटी को ऊपर-नीचे कर रहा है। हल्की धूप है लेकिन हवा में ठंडापन है। कहीं आस-पड़ोस में बारिश हुई है। शायद उत्तर की तरफ़। ये सब महसूस करते हुए बाबूजी की बहुत याद आ रही है। अक्सर जब गाँव में अकेले  होता हूं, लगता है बाबूजी के सामने खड़ा हूं, वे काठ वाली कुर्सी पर बैठे हैं और माटी  और फ़सल की बातें मुझे समझा रहे हैं। ऐसे वक़्त में आँखें मूंद लेता हूं और पलकों को ख़ूब भींगने देता हूं।

साल भर पहले बाबूजी बिछावन पर थे, लगभग दो साल तक वे ख़ुद से जूझते रहे।  उस संघर्ष को केवल वे ही समझ पा रहे थे, मैं केवल उन्हें देख रहा था। डॉक्टर- दवा के संग उन्होंने दोस्ती कर लंबी चुप्पी साध ली थी। उनके डॉक्टर मित्र केके घोष हर दो दिन पर उनका हाल-चाल लेते थे। कभी फ़ोनपर तो कभी डेरा पहुँचकर।

सोडियम गिरता था तो वे अचेत हो जाते। दीदी सब सहम जाती। काकाजी उनके सिरहाने बैठे रहते थे। वे उन्हें बार-बार टोकते थे। इन सबके बीच बाबूजी अपने भाई को एकटक देखते रहते थे।

हम भाई-बहनों को उनका दुःख जीवन के व्याकरण की तरह लगने लगा था, कभी हम उलझ जाते थे तो कभी उनके संग रोने लगते। उन्हीं दिनों हम उनकी नज़रों से सबकुछ देखने लगे थे। बाबूजी की चुप्पी को समझने लगे थे। माँ तो उनकी ख़ामोशी की भाषा को समझ चुकी थी शायद बहुत पहले।

बाबूजी बिछावन पर लेटे शांत मुद्रा में दुःख को मानो पी रहे थे। बिजली के बिछावन पर वे साधु की तरह मुझे लगते थे, सफ़ेद धोती में। हमें उनका हमेशा साथ चाहिए था। माँ , हर वक़्त उनकी सेवा में लगी रहती थीं। माँ भीतर-भीतर रोती रहती थी, मैं बस चुपचाप मन ही दुःख सह लेता था।

बाबूजी, जब तक खड़े थे उनसे आँख मिलाकर बात नहीं कर पाया। मेरी आँखें हमेशा झुकी रही। लेकिन जब उन्होंने बिछावन पकड़ा तो रोज यह कहना पड़ता है कि बाबूजी आँखें खोलिए, दवा खाइये...तो मैं घंटों तक अंदर से डरा महसूस करता था। उनसे आँख मिलाने की हिम्मत तब भी नहीं कर पा रहा था।

बाबूजी को जब रोज बिछावन से उठाता था और फिर वहीं लेटाता तो उनके शरीर को छूने भर से अजीब की शक्ति मिलती थी, आज भी उनका स्पर्श महसूस करता हूं तो शक्ति मिलती है, सच तो यह है कि बाबूजी के स्पर्श करने से जो शक्ति मिली  उसे मैंने खुद को खुद से लड़ने के लिए बचाकर रखा है।

मुझे आज याद आ रहा है दसवीं पास करने के बाद जब बाबूजी ने टाइटन की कलाई  घड़ी दी थी तो कहा था - "वक्त बड़ा बलवान होता है। वक्त हर दर्द की दवा भी अगले वक्त में देता है। "

एक बार सातवीं में गणित में कम अंक आने पर बाबूजी गुस्सा गए थे। उन्होंने डपटते हुए कहा था - "जीवन गणित है और तुम उसी में पिछड़ गए..." फिर उन्होंने 12वीं में कॉमर्स विषय लेने को कहा और चेतावनी दी थी कि इसमें पिछड़ना नहीं है। पढ़ाई को लेकर उनका अनुशासन अलग था, इसमें उन्होंने समझौता नहीं किया और  इसी अनुशासन ने नए लोगों से मिलने और हमेशा पढ़ते रहने की आदत लगा दी।

बाबूजी ने हमेशा लोगों को सहारा दिया लेकिन इलोकट्रेट इम्बैलेंस की वजह से वे टूट गए थे। हमेशा अपने कन्धे पर भार उठाने वाले शख्स को इस कदर लाचार देखकर मेरा मन टूट जाता था। मैं उस वक़्त सबसे अधिक टूट गया जब उनके लिए व्हील चेयर खरीदकर लाया था। रास्ते में रूककर खूब रोया था। दरअसल मैंने कभी भी बाबूज़ी को सहारा लेकर चलते नहीं देखा था ...सहारा देते हुए ही देखा।

आज जब चनका में रेसीडेंसी बनाने की तैयारी में जुटा हूं तब बाबूजी की लाइब्रेरी की याद आने लगी है। फ़ूस का एक सुंदर सा घर था, १२ काठ की आलमारी थी।बाबूजी ने दादाजी के नाम से वह लाइब्रेरी तैयार की थी। मुझे कुछ कुछ याद है। लेकिन उन्होंने लाइब्रेरी की सैंकडों किताबें बांट दी।

दिल्ली में तब पढ़ाई करता था, छुट्टी में पूर्णिया आया था मैंने तब बाबूजी से पूछा कि किताबें जो लोग ले जाते हैं वो तो लौटा नहीं रहे हैं? आपने कहा था- “किताब और कलम बांटनी चाहिए। लोगों में पढ़ने की आदत बनी रहे, यह जरुरी है। देना सीखो, सुख मिलेगा। “

आप चले गए लेकिन मुझे पता है आप यहीं हैं, इसलिए हर दोपहर चनका में रहता हूं। खेत जाता हूं, जहाँ आप माटी में मिल गए, उसे स्पर्श करता हूं।

कटहल, आम, जामुन के गाछ फल से लदे हैं। दोपहर में गाम के बच्चे उसमें लिपटे रहते हैं , चमगादरों की तरह ...मैं बस उन्हें हँसते खिलखिलाते देखता रहता हूँ। आप सबके लिए कुछ न कुछ लगाकर चले गए बाबूजी...