Tuesday, May 24, 2016

पोखर के बहाने कड़े सवाल

हाल ही में मिथिला के कुछ ग्रामीण इलाक़ों में जाना हुआ। मेरे लिए कोसी के इस पार यानि सीमांचल के तरफ़ से उधर जाना हमेशा से सुखद रहा है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि पानी संकट को लेकर इन दिनों हर जगह चर्चा हो रही है।

एक किसान के तौर पर मैं ख़ुद इस संकट से जूझ रहा हूं। ऐसे में जब आँखों के सामने एक से बढ़कर एक पोखर दिख जाए तो आप किसानी मन का अंदाज़ा लगा सकते हैं। पोखर में स्थिर पानी और उसके महार पर खेलते बच्चों को देखकर किसान का मन हरा हो गया। मनिगाछी के समीप एक गाँव ब्रह्मपुरा जाना हुआ था।

मैंने गाँव घुमते हुए एक पोखर की तस्वीर उतार ली और उसे जब फ़ेसबुक और ट्विटर पर डाला तो प्रतिक्रिया में जो टिप्पणियाँ आई तो अंदाज़ा लगा कि गाम-घर को लेकर महानगरों में बसे लोगों के मन में कितना प्रेम है। वैसे कुछ लोगों ने सवाल भी उठा दिया कि क्या सचमुच में पोखर में पानी है या फिर गूगल देवता की तस्वीर है!

ख़ैर, गाँव अभी भी कई चीज़ों को संजोकर रखे हुए है। गाँव ही है जिसके बदौलत डाइनिंग टेबल आबाद है। ऐसे में गाँव की बातें ख़ूब होनी चाहिए। गाँव की उन सभी चीज़ों पर ध्यान रखने की ज़रूरत है, जो हम सभी की ज़रूरतें पूरा कर रही है। साथ ही किसानी समाज कहाँ ग़लती कर रहा है, इस पर भी सवाल उठाए जाने चाहिए।

ऐसे में पग-पग पोखर की बात करने वाले मिथिला जैसे क्षेत्र को नज़दीक से जानने -समझने की आवश्यकता है। केवल माछ-मखान और पान के अलावा जल संरक्षण के लिए भी वहाँ लोग काम कर रहे हैं। यह काम एक से नहीं हो सकता, यह समूहिकता को दर्शाने वाला काम है। मछली और मखान तो व्यावसायिक खेती है। किसानी भाषा में हम इसे नक़दी फ़सल कहते हैं लेकिन जब जल संरक्षण की बात आती है तो हम चुप्पी साध लेते हैं।

पोखर निजी संपत्ति बनकर रह जाती है। लेकिन यक़ीन मानिए यदि हम पानी को लेकर गम्भीर नहीं हुए तो एक अजीब स्थिति इधर भी पैदा हो जाएगी। किसी भी इलाक़े को मराठवाड़ा बनने में देर नहीं लगती है।

बात इसकी नहीं है कि हम किस पर दोष मढ़े । दोष सब पर मढ़े जा चुके हैं । अब हम आपस में एक दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं लेकिन यह भी सत्य है कि खेत को खेत हम किसान ही हैं जो नहीं बने रहने दे रहे हैं। खेत का दोहन हम करते आए हैं। साल में चार फ़सलें तक हम उपजा लेते हैं, धरती मैया को आराम नहीं मिलता है। बोरिंग से अनवरत पानी निकाला जा रहा है। ऐसे में जल स्तर गिरना तो तय है। यह भी सच है कि हम किसान ही हैं जो पोखर को सूखा रहने के लिए विवश कर दिए हैं। हम पानी निकाल तो रहे हैं लेकिन जल-संरक्षण नहीं कर रहे हैं।

हमें अपनी ग़लती स्वीकार कर सामूहिक स्तर पर पानी के लिए पोखर को ज़िन्दा करना होगा। जान लीजिए , जिस दिन हम प्रकृति के अनुसार किसानी करने लगेंगे , दिक़्क़तें कम होनी शुरू हो जाएगी। हाँ, यह अलग बात है कि मौसम की मार के सामने हम विवश हो जाते हैं लेकिन हर बार ऐसा ही होगा यह तो ज़रूरी नहीं है। किसानी करते हुए लड़ना पड़ता है, इसे सहज भाव में स्वीकार कर हमें आगे बढ़ना होगा।

ब्रह्मपुरा गाँव के उस पोखर ने तो मेरे जैसे किसान को यही कहानी सुनाई है। और हाँ, यदि हम सब पोखर को बचाने की ठान लें तो दिक़्क़तें भी देर-सवेर छू-मंतर हो जाएगी। सुंदर गाँव, सुंदर पोखर, पेड़-पौधे किसकी आँखों को पसंद नहीं है। इसे हम ग्राम्य पर्यटन के नज़रिए से भी देख सकते हैं। हमारे गाम में बाहर से लोग आएँगे, ठहरेंगे। इसे भी एक रूप दिया जा सकता है। साफ़ सफ़ाई रखने की ज़रूरत है। हरकुछ के लिए हम सरकार को तो दोषी नहीं ठहरा सकते हैं, हमें भी कुछ करना होगा, बस कुछ अलग करना होगा हम सभी को अपनी माटी के लिए।


(प्रभात ख़बर के कुछ अलग स्तम्भ में प्रकाशित :24 मई2016)

Tuesday, May 10, 2016

शाम अब सुहानी होती है



बिहार में इन दिनों पंचायत चुनाव हो रहे हैं। महात्मा गांधी ने गाँव में स्वराज की बात कही थी, इन चुनावों में लोगों के जोश को देखकर अब यक़ीन होने लगा है कि गाँव-घर अब और मज़बूत होगा। ग़ौर करने की बात यह भी है कि बिहार इस साल चम्पारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष भी मना रहा है और इसी बीच सूबे के मुख्यमंत्री ने संपूर्ण शराबबंदी का एलान कर दिया है। यह सब बता रहा है कि बिहार अब कई स्तरों पर ख़ुद को बदल रहा है और एक ब्राण्ड के तौर भी उभर रहा है। 

हाल ही में गाँव के दक्षिण टोले में शाम को  जाना हुआ। वहाँ बच्चे पढ़ रहे थे। एक नौजवान सभी को पढ़ा रहा था। कुछलोग मचान पर गाँव की राजनीति पर चर्चा कर रहे थे। तभी एक महिला बाहर आती है और मुझे बताती है 'नीतीश कुमार की वजह से आप यह सब देख पा रहे हैं नहीं तो ये सभी न बच्चे को पढ़ने देते न इतनी शांति से मचान पर बैठे मिलते। सब शाम ढलते ही अपनी दुनिया में रम जाते थे।' 

नीतीश कुमार के फ़ैसले  का असर सबसे निचले पायदान पर दिखने लगा है लेकिन अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। हाल ही में दरभंगा में एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने कहा था कि ‘कुछ अंग्रेजी बोलने वाले लोग’ जो कि खाने-पीने को किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार बताकर इसकी आलोचना कर रहे हैं, हम ऐसे अंग्रेजी बोलने वालों को स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि शराब मौलिक अधिकार का हिस्सा नहीं है। बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पिछले पांच अप्रैल से प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी लागू की है। 

अब करना ये होगा कि नीतीश के इस निर्णय को हमसबको सहारा देना होगा। हाल ही में महाराष्ट्र से कुछ लोग आए थे और उनलोगों ने नीतीश कुमार से मुलाक़ात कर उनके फ़ैसले की सराहना की। अब चाहिए यह कि समाज के हर तबके के लोग जिनकी बातों को असर जनमानस पर पड़ सकता है वे शराबबंदी के समर्थन में मुहिम चलावें। बॉलीवुड के लोग सामने आएँ, यह ज़रूरी है। आख़िर शराब क्यों ख़राब है, यह खुलकर बोलें। 

देश भर में कई सामाजिक संगठन हैं, उन्हें बीड़ा उठाना होगा। यह हम सब का सामाजिक दायित्व है। गाम से लेकर शहर तक सामाजिक बदलाव लाने की ज़रूरत है। सोच में बदलाव लाने की ज़रूरत है। स्वच्छता के क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख संस्था सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने  बिहार में शराबबंदी को लेकर मुख्यमंत्री की पहल की प्रशंसा की है और कहा है कि यह समाज के विकास के लिए साहसिक कदम है। उन्होंने समाज शास्त्रियों से शराबबंदी के प्रभाव का अध्ययन करने की अपील करते हुए कहा कि यह निकट भविष्य में सामाजिक संरचना में सीधे तौर पर बदलाव लाएगा। पाठक की तरह अन्य लोग भी खुले मंच से ऐसी बातें कहें ताकि लोग यह समझे कि शराबबंदी को लेकर राजनीति नहीं होगी, यह समाज के सम्पूर्ण विकास के लिए ज़रूरी है। 

मेरा मानना है कि सुलभ की तरह अन्य संस्थाएँ, प्रभावी सामाजिक कार्यकर्ता, अभिनेता, उद्योगपति नीतीश कुमार के फ़ैसले को समर्थन दें ताकि लोगबाग के मानस से शराब जैसी चीज़ की दाग़ ही ख़त्म हो जाए। सुलभ का अपना बहुत बड़ा नेटवर्क है, वह काफ़ी कुछ कर सकती है। हम आप भी अपने स्तर से कर सकते हैं। बस आगे आना होगा। सुलभ जैसी और भी कई संस्थाएँ हैं, उसे आगे आना होगा, ताकि देश के हर गाँव की वह महिला जो अपने घरवाले की नशे की आदत की वजह से परिवार को टूटते देख रही थी, वह आराम से अपने परिवार के संग शाम में बैठ सके और खुलकर बोले- ' अब शाम सुहानी होती है...'


(प्रभात ख़बर के कुछअलग स्तंभ में १० मई को प्रकाशित)



Saturday, May 07, 2016

हमें हर साल लड़ना पड़ता है...

चनका से लौटकर पूर्णिया डेरा आ चुका हूं। सुबह से लेकर शाम तक लूट चुके खेतों को देखता रहा बस! आँखों के सामने प्रकृति की विनाश लीला देखता रहा, तेज़ हवा के प्रचंड रूप को देखकर डर गया।

कदंब के किशोर पेड़, मोहगनी और एमशोल जैसे लम्बे सुंदर पेड़, जिनकी उम्र छह से आठ साल होगी, सब टुकड़े टुकड़े हो गए।  प्रकृति की मार सबसे ख़तरनाक होती है, किसानी करते हुए यह जान सका। हर साल हमलोग लड़ते हैं, कई लोगों ने  सलाह दी, खेतों में कुछ अलग हो लेकिन जब आँधी आती है न, तब नया करने से डरने लगता हूं।

सुबह चनका पहुँचते ही मौसम की मार खेतों में आँखों के सामने देखने लगा। आम से लदे पेड़ की डालियाँ ज़मीन पर लेटने लगी। सैकड़ों आम जिन्हें पकना था एक महीने बाद, सब टूट कर बिखर गये। लीची बाड़ी में जाने के बाद मन और खट्टा हो गया। कटहल की तो पूछिए मत, पेड़ ही गिर पड़े।

मक्का की वह फ़सल जिसे हमने देर से बोया था, वह तो रूठ गया मुझसे। अभी तो मक्का के दाने  में दूध ही आया था। किसान का दर्द मुआवज़े के गणित से दूर है और हाँ, मैं निजी तौर पर इससे दूर रहना भी चाहता हूं।

बाँस बाड़ी की क्षति शब्द में बयां नहीं कर सकता। जानते है क्यों? दरअसल यह महीना बाँस में नए कोपल आने का है, बाँस का परिवार इसी महीने बढ़ता है और प्रकृति की लीला देखिए, आधे घंटे में बाँस बाड़ी की झुरमुट ज़मीन पर। हमारा नक़दी फ़सल ख़त्म!

यही आजकी कहानी थी। कुछ तस्वीरें हैं। काले मेघ की तस्वीरें हैं, जिसे देखकर मन को ठंडक पहुँचेगी यदि आप गरमी झेल रहे होंगे लेकिन इसी तस्वीर के बाद ही तूफ़ान को हमने झेला।

यक़ीन मानिए हम हारेंगे नहीं, जिनसे हमने अपने खेतों में कुछ नया करने का वादा किया है, ज़रूर करूँगा। हम रिस्क उठाएँगे, हार नहीं मानेंगे, बस किसानों पर आपलोग भरोसा बनाए रखिए, किसानी समाज जो हर साल आपके लिए अन्न उपजाता है, उसे स्नेह दीजिए। सरकार तो है ही , देर सवेर वह सुन ही लेती है। आप सब भी गाँव को देखिए आपदा के समय में। हमसब माँगते नहीं हैं, बस चाहते हैं कि दुख-सुख में दूसरे पेशे के लोग भी खेतों तक पहुँचे। खेत किसी एक का नहीं होता, यह सबका होता है।

किसानी करते हुए, लिखते पढ़ते हुए पिछले तीन साल से यही सब भोग रहा हूं, हँसते हुए खेत-पथार को समझ रहा हूं। महाराष्ट्र में पानी संकट से जूझ रहे किसानों की सुनता हूं तो मन टूट जाता है लेकिन उनके लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है, उन्हें भी नहीं हारना है, और हमें भी नहीं। मराठवाड़ा के किसानी समाज का  दर्द महसूस कर सकता हूं, लेकिन उन्हें भी हारना नहीं है क्योंकि 'सब दिन होत न एक समाना' हमारे दिन भी हँसी ख़ुशी के आएँगे, ख़ुद पर, माटी पर और पानी पर भरोसा रखिए।

हर बुरे वक़्त से कुछ नया सीखता हूं, आज सुबह की आपदा से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। और क्या कहूँ-'सबहि नचावत राम गोसाईं'

आपका

किसान

Tuesday, May 03, 2016

रेणु के गाँव में मूंगफली

खेती -बाड़ी करते हुए अक्सर अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु के गाँव आना - जाना लगा रहता है। वहाँ जाना मेरे लिए हमेशा से सुखद रहा है। हर बार वहाँ से लौटकर कुछ नया 'मन' में लाता आया हूं। पिछले शनिवार की बात है, राजकमल प्रकाशन समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम चनका आए थे, दिन भर के लिए।  उन्हीं के संग रेणु के 'गाम-घर' जाना हुआ।

किताबों और लेखकों के दुनिया में रमे रहने वाले निरूपम भाई से जब गाँव में मुलाक़ात हुई तो उनका एक अलग ही मन पढ़ने को मिला। उनके भीतर किसान का मन भी है, यह मुझे अबतक पता नहीं था। रेणु का लिखा पढ़ता हूं तो पता चलता है कि वे अक्सर किताबों की दुनिया में रमे रहने वालों को अपने खेतों में घुमाते थे। उन्होंने एक संस्मरण  लिखा है- "कई बार चाहा कि, त्रिलोचन से पूछूँ- आप कभी पूर्णिया जिला की ओर किसी भी हैसियत से, किसी कबिराहा-मठ पर गये हैं? किन्तु पूछकर इस भरम को दूर नहीं करना चाहता हूं। इसलिए, जब त्रिलोचन से मिलता हूं, हाथ जोड़कर, मन ही मन कहता हूं- "सा-हे-ब ! बं-द-गी !!"

सच कहिए तो इस किसान की भी इच्छा रहती है कि कोई गाम आए तो उसे पहले खेतों में घुमाया जाए। उस व्यक्ति से कुछ सीखा जाए। कबीर की वाणी है-'अनुभव गावे सो गीता'।

ख़ैर, प्रचंड गरमी में निरूपम भाई चनका के मक्का के खेतों में टहलते हुए थके नहीं बल्कि मुझे समझाने लगे कि मक्का के अलावा और क्या क्या हो सकता है। कोसी का इलाक़ा जिसे मक्का  का 'हब' कहा जाता है वहाँ का किसानी समाज अब फ़सल चक्र को छोड़ने लगा है, मतलब दाल आदि की अब खेती नहीं के बराबर होती है, ऐसे में एक ही फ़सल पर सब आश्रित हो चुके हैं। हालाँकि मक्का से नक़द आता है लेकिन माटी ख़राब होती जा रही है। इस बात को लेकर निरूपम भाई चिंतित नज़र आए।

तय कार्यक्रम के मुताबिक़ मैं और चिन्मयानन्द उन्हें लेकर रेणु के गाँव औराही हिंगना निकल पड़े। रास्ते भर सड़क के दोनों किनारे खेतों में केवल मक्का ही दिखा। रेणु के घर के समीप एक खेत दिखा, जिसे देखकर लगा मानो किसी ने हरी चादर बिछा दी हो खेत में। मेरे मन में रेणु बजने लगे- ' आवरन देवे पटुआ , पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैया रहे चदरवा तान' ! मेरे मन में रेणु बज ही रहे थे कि निरूपम भाई ने कहा ' यह जो आप देख रहे हैं न , मैं खेती की इसी शैली की बात करना चाहता हूं'।  अब तक परेशान दिख रहे निरूपम भाई के चेहरे की रौनक़ लौट आई। दरअसल खेत में मूँगफली की फ़सल थी, एकदम हरे चादर के माफ़िक़। साठ के दशक में रेणु की लिखी एक बात याद आ गयी जिसमें वे धान के अलावा गेहूँ की खेती कहानी के अन्दाज़  सुनाते हैं। बाबूजी कहते थे कि रेणु गेहूँ के खेत को पेंटिंग की तरह शब्दों में ढ़ालकर हम सभी के मन में बस गए।

दरअसल खेती को लेकर निरूपम भाई की चिंता को सार्वजनिक करने की ज़रूरत है क्योंकि यदि अलग ढंग से खेती करनी है तो हम किसानी समुदाय के लोगों को सामान्य किसानी से हट कर बहुफसली, नकदी और स्थायी फसलों के चक्र को अपनाना होगा। सच कहिए तो निरूपम भाई के आने की वजह से रेणु के गाँव में मूँगफली की खेती देखकर मन मज़बूत हुआ कुछ अलग करने के लिए।

ग़ौरतलब है कि तिलहन फसलों में मूँगफली का मुख्य स्थान है । इसे जहाँ तिलहन फसलों का राजा कहा जाता है वहीं इसे गरीबों के बादाम की संज्ञा भी दी गई है। इसके दाने में लगभग 45-55 प्रतिशत तेल(वसा) पाया जाता है जिसका उपयोग खाद्य पदार्थो के रूप में किया जाता है। इसके तेल में लगभग 82 प्रतिशत तरल, चिकनाई वाले ओलिक तथा लिनोलिइक अम्ल पाये जाते हैं। तेल का उपयोग मुख्य रूप से वानस्पतिक घी व साबुन बनाने में किया जाता है। इसके अलावा मूँगफली के तेल का उपयोग क्रीम आदि के निर्माण में किया जाता है।

पहले कभी इस इलाक़े में रेत वाली मिट्टी में मूँगफली उगाया जाता था। फिर सूरजमुखी की तरफ़ किसान मुड़े लेकिन फिर अचानक नब्बे के दशक में किसानों ने पटसन और इन सभी फ़सलों को एक तरफ़ रखकर मक्का को गले लगा लिया लेकिन अब चेत जाने का वक़्त आ गया है। बहुफ़सलों की तरफ़ हमें मुड़ना  होगा। पारम्परिक खेती के साथ साथ हम किसानी कर रहे लोगों को अब रिस्क उठाना होगा। खेतों के लिए नया गढ़ना होगा। कुल मिलाकर देश भर में हर किसान की एक ही तकलीफ है, वह नक़द के लिए भाग रहा है। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। सरकारें किसानों के लिए कई ऐलान करने में जुटी हैं, लेकिन साफ है, जमीन पर बड़े बदलाव नहीं हो रहे हैं। आइये हम सब मिलकर बदलाव करते हैं, कुछ अलग किसानी की दुनिया में भी करते हैं।

( प्रभात ख़बर के कुछ अलग स्तंभ में प्रकाशित- 3 मई 2016)

Tuesday, April 26, 2016

पछिया हवा और पुराना पोखर

पिछले एक हफ़्ते से गाँव में पछिया हवा का ज़ोर है। लोगबाग सहमे हैं क्योंकि आगज़नी की घटना सबसे अधिक इसी हवा के ज़ोर में होती है। उधर, पछिया हवा का प्रभाव गाँव के पुराने पोखर में भी देखने को मिल रहा है। एक तरफ़ सूरज का प्रचंड ताप तो दूसरी ओर तेज़ हवा।   ऐसे मौसम में जल स्तर नीचे गिर जाता है   और पोखर सूख जाता है।

पछिया हवा की वजह से पानी के बाद अब पोखर का कीचड़ भी सूखने के कगार पर है। कीचड़ों पर दूब उग आए हैं। प्यासी -भूखी वनमुर्गी  झुंड बनाकर दूब के आसपास मँडराती रहती है। प्रचंड धूप में भी इन चिड़ियों को देखकर लगता है कि हम कितने आलसी हो गए हैं। हम सब धूप से डरने लगे हैं और धूप में निकलते भी हैं तो 'सनस्क्रीन क्रीम' लगाकर, जबकि यह तो प्रकृति के व्याकरण का हिस्सा है, इसे स्वीकार करना चाहिए, संघर्ष करना चाहिए।

ख़ैर, दूसरी ओर पोखर के पूरब के खेत में पटवन के बाद जमा पानी में कीड़ों को ढूँढने के लिए बगूले आए हुए हैं। दो दिनों से लगातार मक्का के खेतों में पटवन हो रहा है। दरअसल नहर में पानी आता नहीं है तो ऐसे में किसानी समाज पम्पसेट पर निर्भर हो चुका है।

खेत में पटवन के कारण आए बगूले पोखर में भी ताका-झाँकी कर लेते हैं। पोखर के आसपास जंगली बतकों के बच्चे 'पैक-पैक' करती हुई चक्कर मार रही है। सिल्ली चिड़ियाँ तो पोखर में जहाँ कुछ पानी बचा है उसमें डुबकी लगा रही है। जब पूरे देश में पानी को लेकर बातचीत हो रही है, बहस हो रही है , उस वक़्त किसानी कर रहे लोग खेतों में संघर्ष कर फ़सल की रक्षा कर रहे  हैं साथ ही जीव-जंतुओं को पानी भी मुहैया करा रहे हैं। कभी इस पर भी बात होनी चाहिए।

उधर, पोखर के कीचर में कोका के फूल आए हैं। गरमी में इस फूल की सुंदरता देखने वाली होती है। नीले और उजले रंग में डूबे इस फूल को देखकर मन में ठंडी बयार चलने लगती है। देखिए न  इस तपती गरमी में पोखर को देखकर मुझे कोसी की उपधारा 'कारी-कोसी' की याद आ रही है। बचपन में गाम की सलेमपुरवाली काकी कारी कोसी के बारे कहानी सुनाती थी। कहती थी कि डायन -जोगिन के लिए लोग सब कारी कोसी के पास जाते हैं। लेकिन हमें तो चाँदनी रात में कारी कोसी की निर्मल धारा में अंचल की ढेर सारी कहानियाँ दिखती थी।

बंगाली मल्लाहों के गीत सुनने के लिए कारी कोसी पर बने लोहे के पुल पर खड़ा हो जाता था। बंगाल से हर साल मल्लाह यहाँ डेरा बसाते थे और भाँति-भाँति की मछलियाँ फँसाकर बाज़ार ले जाते थे। इस पुल से ढेर सारी यादें जुड़ी हैं। यहाँ से दूर दूर तक परती ज़मीन दिखती है, बीच-बीच में गरमा धान के खेत भी हैं।

क़रीब दस साल पहले तक बंगाली मल्लाह कारी-कोसी के तट को हर साल बसाते थे, धार की जमीन में धान की खेती करते हुए सबको हरा कर देते थे। ये सभी मेहनत से नदी-नालों-पोखरों में जान फूँक देते थे। यह समुदाय ख़ुद में सफलता की कहानी है, जिसने मेहनत कर कोसी के कछार को सोना उपजाने वाली माटी बनाया और फिर हमें सौंपकर निकल गए, मुसाफ़िर की तरह। मल्लाह समुदाय के लोगों ने इलाक़े को अलग तरह की खेती और मछली पालन के अलावा बांग्ला गीतों का भी दीवाना बनाया। सुबह और शाम में कारी कोसी के किनारे बसी बस्तियों के क़रीब से गुज़रते हुए आज भी बांग्ला गीतों की आवाज सुनने को मिल जाती है।

गाँव का बिशनदेव उन बंगाली मछुआरों की बस्ती में ख़ूब जाया करता था और जब लौटकर आता तो  उसके हाथ में चार-पाँच देशी काली मछली और कुछ सफ़ेद मछलियाँ होती थी। यह सब अंगना में बने चूल्हे के पास रखकर वह कहता- 'सब भालो, दुनिया भालो, आमि-तुमि सब भालो, दिव्य भोजन माछेर झोल.....'

बिशनदेव की इस तरह की बातों को सुनकर गाम में सबने उसका नामकरण 'पगला बंगाली' कर दिया था। काली मछलियों को लेकर वह ढ़ेर सारी कहानियाँ सुनाता था। हम सब उसकी बातों में डूबकर पूर्णिया से पश्चिम बंगाल के मालदा ज़िला पहुँच जाते थे।

अब बिशनदेव नहीं है लेकिन आज पछिया हवा के बीच पुराने पोखर के नज़दीक से गुज़रते हुए कारी-कोसी की यादें ताजा हो गयी।

Monday, April 25, 2016

आम फलों का राजा है, लड़ना उसको आता है

पंखुड़ी को जब पढ़ाने बैठता हूं तो वह ढ़ेर सारे सवाल पूछती है। मुझे उसके सवालों से काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है। सुबह की बात है, आम को लेकर बात चली तो मैंने कहा- "फ़लों का राजा आम है"। पंखुड़ी ने तुरंत सवाल दागा "पपीता क्यों नहीं? अनार क्यों नहीं?....

पंखुड़ी को जैसे -तैसे समझाकर संतुष्ट कर दिया कि तमाम फलों में आम ही स्वादिष्ट है इसलिए वह राजा है। लेकिन बाद में आम के बारे में सोचने लगा। आख़िर आम राजा क्यों कहलाता है? किसानी करते हुए आम को मैं कितना समझ सका हूँ, इसके बारे में सोचने लगा।

दोपहर में चनका में बग़ीचे में आम के नये फलों को तेज़ धूप और पछिया हवा के झोंकों में अपने ही डंटल से टकराते देखा तो अहसास हुआ कि 'राजा' होना आसान काम नहीं है। पेड़ में मंज़र आते ही उसे पहले तेज़ हवा और बारिश से जूझना पड़ता है, हर साल।

बीस दिन पहले की ही तो बात है, छोटे-छोटे नवातुर आम के फलों को ओलों से लड़ना पड़ा था। सैंकड़ों छोटे-छोटे आम ज़मीन में मिल गये , जो लड़ सके आज पेड़ में हैं। अब भी धूप में वे लड़ रहे हैं।

आम की लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है। अभी तो आँधी-तूफ़ान का एक दौर बाँकि है, इसमें जो बच जाएँगे वे ही टिक पाएँगे हमारे- आपके लिए।

प्रचंड गरमी की ताप को सहने की शक्ति कोई आम से सीखे। देखने में हरा है, तपती दोपहरी में हमारी आँखों को ठंडक मिलती है इसे देखकर, लेकिन अपने भीतर यह अंगारे को छुपाए हुए है।

आम के पेड़ की पत्तियों में चिटियाँ घर बना लेती है तो कभी मधुमक्खी। गिलहरी तो इसके क़रीब चिपकी रहती है। आम में सहन शक्ति है। इसमें सामूहिकता की कला है। प्रकृति ने इसे सबको संग लेकर चलना सीखाया है।

मैं इस मौसम में जब भी आम को देखता हूं , लगता है कि हम लड़ने से कितना डरते हैं। जबकि आम चार-पाँच महीने लगातार लड़ता रहता है , हमारे -आपके लिए। ऐसे में सबसे बड़े 'लड़ेय्या' तो आम ही है। राजा कोई यूँ ही नहीं कहलाता है, इसके लिए लड़ना पड़ता है। 

Friday, April 15, 2016

गाम-घर और रामनवमी

हमारी स्मृति में रामनवमी गांव की कहानियों से भरी हुई है। कल देर रात किशनगंज से लौटकर सुबह-सुबह गाँव पहुँचा तो हर टोले में पताका लहराते लोग मिले। सलीम चाचा ने अपनी बांसबाड़ी से महादलित  टोले के लिए बारह बाँस दिए हैं ताकि  वे सब भी अपने देवस्थान पर नया पताका लहरा सकें। यही सब देखकर लगता  है कि गाँव अभी भी 'धर्म की ड्रामेबाज़ राजनीति और बयानबाज़ी व अफ़वाहों के बाज़ार' से दूर है।

बचपन की यादों वाली पोटली खोलता हूं तो  याद आता है गांव में रामनवमी से पहले बाजार का सारा हिसाब किताब चुकता किया जाता था। दुकानदार वो चाहे हिंदू हो य मुस्लिम, वे बही खाते का रजिस्टर नया तैयार करते थे और पुराने का सारा हिसाब- किताब बराबर करने की कोशिश करते थे। बाबूजी की भी कॉपी बदल जाती थी। लाल और हरे इंक से नई कॉपी  में बही -खाते की शुरूआत होती थी।

आज हम भले ही कंप्यूटर बिलिंग के दौर में जी रहे हैं लेकिन गांव घरों में आज भी छोटे और बड़े दुकानदार लाल रंग का बही खाता रखते हैं और रामनवमी के दिन पुराने रजिस्टर को एक तरफ रखकर नए रजिस्टर में हिसाब किताब शुरु कर देते हैं।झूठ क्यों कहूँ,  मैंने  भी आज रजिस्टर के बदले फ़ोन के 'नोट्स' में हिसाब-किताब लिखकर उसे 'सेव' कर दिया लेकिन रामनवमी   से  पहले बाबूजी  का गुलाबबाग़ से थोकभाव  में रजिस्टर मंगवाना अब भी मन में है। उनकी लिखी डायरी पढ़ता हूं तो रोमांचित हो जाता हूं।

ख़ैर, बचपन की यादों में डुबकी लगाने पर मेरे सामने कुतुबुद्दीन चाचा का चेहरा दौड़ने लगता है। गांव में उनकी छोटी से एक परचुन दुकान थी, जिसमें जरुरत के सभी सामान मिलते थे। साल भर गांव  वाले उनसे सामान लेते थे। कोई नकद तो कोई उधार। उधार लेने वालों का नाम एक लाल रंग के रजिस्टर में कुतुबुद्दीन चाचा दर्ज कर लेते थे। मुझे याद है कि वे रामनवमी से पहले उधार लेने वाले घरों में पहुंचने लगते थे और विनम्रता से कहते थे कि रामनवमी से पहले कर्ज चुकता कर दें ताकि नए रजिस्टर में उनका नाम दर्ज न हो।

कुतुबुद्दीन चाचा की बातों को याद करते हुए लगता है कि रामनवमी के बारे में हम कितना कुछ लोगों को सुना सकते हैं। खासकर उन लोगों को जो धर्म को चश्मे की नजर से हमें दिखलाने की कोशिश करते हैं। धार्मिक सौहार्द का इससे बढ़कर और क्या उदाहरण हो सकता है। जहां तक मुझे याद है कि व्यापारी वर्ग लाल रंग का एक कार्ड भी घरों तक पहुंचाया करते थे, जिसमें जहां रामनवमी की शुभकामना से संबंधित बातें लिखी होती थी वहीं बही-खाते के निपटारे की बात उसी शालिनता से लिखी रहती थी। यह कार्ड मुस्लिम दुकानदार भी छपवाते थे।

गांव-घर की स्मृति सबसे हरी होती है। दूब की तरह, जिस पर हर सुबह ओस की बूंद अपनी जगह बनाए रखती है। रामनवमी की स्मृति दूब की तरह ही निर्मल है। वहीं रामवनवी की शोभा यात्रा का आनंद भी मन में कुलांचे मार रहा है। गांव से शहर की दूरी हम जल्दी से पाटना चाहते थे ताकि शहर की शोभायात्रा का आनंद उठा सकें। मेला घूम सकें...ग़ुब्बारे  ले सकें....