Tuesday, February 21, 2017

करवट लेता खेती का पेशा



किसानी करते हुए खेत के अलावा उन गाँव तक पहुँचने की इच्छा हमेशा रही है जहाँ बहुत कुछ अलग हो रहा है। इसी अलग देखने की ख़्वाहिश लिए हाल ही में बिहार के पूर्वी चम्पारण के कुछ ग्रामीण इलाक़ों में जाना हुआ। पूर्वी चम्पारण के पकड़ीदयाल अनुमंडल का एक गाँव है चैता। यह गाँव मेरे लिए अलग कई वजह से है, जिसमें एक लीची का बग़ान भी है।  दूर-दूर तक लीची के सुंदर पेड़, गेहूँ के नवातुर पौधों को खेत में समेटे किसान और सबसे बड़ी बात साक्षर और जागरूक किसानों की बड़ी टोली।

जब भी देश  के किसी हिस्से में किसानी कर रहे लोग आर्थिक रूप से सबल दिखते हैं तो मन बाग़-बाग़ हो जाता है। यह सब क़रीब  से देखना और महसूस करना मेरे लिए हमेशा से सुकून देने वाला रहा है। इसकी एक वजह यह भी  है कि हमने ख़ुद खटारा खेती और महान किसान की बात को हमेशा  से ठुकराया है।

पूर्णिया से लगभग चार सौ किलोमीटर की दूरी तय कर हम चैता नाम  के एक ख़ुशहाल गाँव पहुँचे थे। गाँव में दाख़िल होते ही जिस चीज पर नज़र टिकी वह थी 'मोटर साइकिल चलाती एक लड़की'।  गाँव-घर में साइकिल चलाती लड़की दिख जाती है लेकिन बाइक चलाती आत्मविश्वासी लड़की पहली बार देखने को मिला। वह लड़की बेझिझक मोटर साइकिल चला रही थी। सचमुच गाँव बदल रहा है।

वैसे चैता नाम के इस गाँव से मेरा जुड़ाव शाश्वत गौतम की वजह से हुआ।  शाश्वत गौतम मेरी पीढ़ी के ऐसे युवा हैं जो किसानी की नई परिभाषा गढ़ने जा रहे हैं। अमेरिका के जार्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर चुके शाश्वत के भीतर गाँव है। एक ऐसा गाँव जो किसानों के लिए बहुत कुछ करने के लिए उतारू है, जिसके भीतर किसान के अनेक रूप हैं, जो किसानी को मुनाफ़े का पेशा समझता है। शाश्वत मेरे मनमीत इस लिए भी हैं क्योंकि वे कृषि आधारित उद्योग की बात करते हैं,  वे लीची की मार्केटिंग, ब्रांडिंग की बात करते हैं। वे लीची या किसी अन्य फल को व्यापारी  के हाथों बेचने की बात नहीं करते हैं बल्कि उसका उद्योग स्थापित करने  वकालत करते हैं ।

अमेरिका  में पढ़ाई और फिर वहीं नौकरी करते हुए भी उनके भीतर किसान जिस तेवर में ज़िंदा है, उससे हम जैसे बनते किसानों को सीख लेनी चाहिए।  वे अब देश लौटकर किसानी की नई दुनिया गढ़ने की तैयारी में लग गए हैं।

विदेश की चकाचौंध वाली ज़िंदगी के बीच चम्पारण के चैता गाँव के अपने गेहूँ के खेत में जब शाश्वत घुमा रहे थे और मुझसे किसानी की बात कर रहे थे तो लगा मानो किसी ऐसे 'किसान नेता' से गुफ़्तगू कर रहा हूं, जिसकी जड़ें गाँव के खेत-खलिहान में नीचे तक जमी हुई है।  बिहार को सचमुच ऐसे ही किसान की ज़रूरत है, जिसके पास ज्ञान का भंडार हो, जो बड़ी संख्या में किसानों को साथ लेकर चल सकता हो और सबसे बड़ी बात खटारा बन चुकी किसानी की दुनिया में जो कृषि आधारित उद्योग की बात करता हो।

चैता में लीची के किसान और बग़ान बड़ी संख्या में हैं। यहाँ सब्ज़ी की भी अच्छी खेती दिखी। किसान समाज यहाँ मुझे तेवर में दिखा। यह तेवर जातीय गुणा-गणित के जाल से काफ़ी ऊपर दिखा। हर जाति के लोग उत्साह में खेती की दुनिया में रमे दिखे।  खेती उपजाऊ, टिकाऊ और सबसे बड़ी बात बिकाऊ हो सके इसके लिए शाश्वत गौतम के पास ढेर सारी योजनाएँ हैं, जिसमें कई पर  वे काम भी कर रहे हैं।  सच कहूँ तो इस गाँव में दो दिन गुज़ारने के बाद जिस शख़्स की मुझे सबसे अधिक याद आ रही थी,  वे हैं बुलंदशहर  के भारत भूषण त्यागी जी। त्यागी जी भी खेती को मुनाफ़े का सौदा बनाने में जुटे हैं, उनकी उम्र अधिक है लेकिन मन उनका भी युवा किसान का ही है। यह सही बात है कि किसानी को मुनाफ़े  का सौदा बनाना आसान नहीं है लेकिन आप इस  बात को भी नहीं काट सकते हैं कि यदि कृषक समाज एकजुट होकर खेती करने लगे तो बड़े  से बड़े उद्योगपति हम किसानों के चौपाल में बैठने लगेंगे।

इस रंग बदलती दुनिया में अब किसानों को अपना अन्दाज़ बदलना होगा। मुनाफ़े की बात करनी होगी, खेती और पैसे की बात करनी होगी। पारम्परिक खेती और वैज्ञानिक खेती  के बीच कृषि आधारित उद्योग की बात ऊँचे स्वर में करनी होगी। इस मुल्क को अब पेशेवर किसान की ज़रूरत है, जो आँकडें की बात कर सके और उपज  से लाभ हासिल कर भी दिखा दे। दुनिया  के अलग अलग मुल्कों में कृषि। आधारित उधोगों को नक़दीक  से देखने वाले शाश्वत गौतम  से मेरे  जैसे किसान को बड़ी उम्मीदें हैं। उम्मीदें इसलिए भी क्योंकि किसानी  का पेशा अब करवटें लेने लगा है।

Wednesday, February 01, 2017

गाम से बजट की बातें

सरस्वती पूजा के कारण गाम में लाउड स्पीकर की आवाज़ बुलंद है। बुनिया की महक चारों तरफ़ है लेकिन इन सबके बीच रेडियो के ज़रिए वित्त मंत्री अरुण जेटली की आवाज़ सुनता रहा।  मंत्री जी की भी आवाज़ बुलंद थी।  लाख-करोड़-अरब की बातें सुनकर मन बसंत हुआ जा रहा था। बीच में जब जेटली जी पोलिटिकल फ़ंडिंग की बात सुना रहे थे तो लगा मानो कोई राग-बसंत का आलाप ले रहा हो ! ख़ैर, मंत्री जी का उच्चारण बढ़ियाँ लग रहा है लेकिन जनता को बजट की रेसिपी कैसी लग रही है, ये तो साँझ तक पता चलेगा।

खेत में आलू के पत्ते अब सूख चुके हैं। गाम का इंदल मंडल पहुँचा है। रेडियो से वित्त मंत्री जी का अंग्रेज़ी बजट भाषण सुनकर इंदल कहता है- " अंग्रेज़ी में भाषण सुन रहे हैं भाईजी । आलू भी सुन रहा है देखिए न पत्ता भी सूखा गया है। वैसे अंग्रेज़ी में ख़ाली पैसे का गप्प हो रहा है न ? ई ज़रा बताइए कि जनधन खाता में कुछ पैसा गिरेगा भी ? "

मन कर रहा है कि वित्त मंत्री जी तक इंदल की बातें पहुँचाऊं लेकिन क्या वे सुनेंगे हमारी बात। वैसे यह सच है कि लूटियंस की चकमक दिल्ली को इस तरह की बात कभी नहीं हज़म हुई है।

महादलित बस्ती का भोला ऋषि को मोतियाबिंद की शिकायत है। ७० साल का भोला आया हुआ है। वह भी रेडियो के बग़ल में बैठ गया लेकिन उसे पता नहीं है कि मंत्री जी क्या बोल रहे हैं। उसने कहा- " क्या बाबू, मोदी जी मन की बात कर रहे हैं का ! " कि तभी सुनाई दिया जेटली साब बोले हैं - "दलितों के कल्‍याण के लिए 52,393 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. एससी/एसटी और अल्‍पसंख्‍कों का फंड बढ़ा..." मैंने बस भोला ऋषि का चेहरा देखा, वैसा ही शांत-चित्त चेहरा। भोला  ने कहा कि सड़क सब बनेगा कि हम इस जीवन में पक्का सड़क न देख पाएँगे। मैं उसे कैसे बताता कि बजट के भाषण  में पीएम ग्राम सड़क योजना के लिए 19 हजार करोड़ रुपये का इंतजाम किया गया है। दरअसल इस तरह की घोषणाओं  को गाम तक पहुँचने में वक़्त लगता है।

बजट जब ख़त्म हुआ तब जोगो काका आए। उन्हें बजट आदि की बातें पसंद है लेकिन आज वे बसंत पंचमी की पूजा में ज़्यादा व्यस्त रहे। जाते वक़्त उन्होंने कहा- " सब तो ठीक है लेकिन मोदी सरकार के इस वक़ील मंत्री ने अशौच (किसी व्यक्ति की मौत का दिन) में बजट पेश कर दिया है, ई ठीक नै लगा। "

ग़ौरतलब है कि संसद में बजट पेश होने से पहले लोकसभा अध्‍यक्ष सुमित्रा महाजन ने लोकसभा में पूर्व मंत्री ई अहमद के निधन पर शोक प्रकट किया। सदन ने 2 मिनट का मौन रख उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

बजट का भाषण ख़त्म होते ही हम सरसों की खेत देखने निकल गए। मधुमक्खी और तितलियाँ मँडरा रही है...

#Budget2017

Monday, January 23, 2017

ज़मीन और नीम

एक जिद जमीन की भी होती है, जिसके संग कागज का मोह जुड़ा होता है। कागज भी कमाल का!  जमीन की दिशा-दशा-मालिकाना सब कागज की उस पुड़िया में बंधी रहती है और जिद देखिए हर कोई उसे अपने हिस्से रखने की जुगत में लगा रहता है।

जमीन मायावी है, जमीन तिलस्मी है। लेकिन मैं इस मायावी जमीन पर अब 'नीम' लगाना चाहता हूँ। नीम, जिसे गाँव का दवाखाना कहा जाता है, नीम जिसे सूर्य का प्रतिबिम्ब माना जाता है। खेती को खटारा मानने वालों को खेत की दुनिया में डुबकी लगाना चाहिए और गाँव में वक़्त गुज़ारना चाहिए।

दरअसल मैं जमीन को कागजी दांव-पेंच से आगे एक जीवन की तरह देखता हूं। आप इसे एक किसान की माया कह सकते हैं, भरम मान सकते हैं लेकिन कदंब, बांस आदि के बाद अब नीम के पौधे लगाने की योजना है। ताकि मोह केवल जमीनी कागज का ही ना रहे बल्कि मोह प्रकृति से भी बना रहे, नीम की तरह।

यह सब इसलिए क्योंकि हम सब किसानी कर रहे लोग ज़मीन में उलझकर जीवन से अक्सर परेशान हो जाते हैं। उन कागजों में उलझकर किसानी पेशे का आनंद नहीं उठा पाते हैं। यह परेशान करने वाला सवाल है। लेकिन परेशान होकर जीवन जीने की आख़िर क्या ज़रूरत है, इसपर भी विचार करना चाहिए। सब्सिडी  का लोभ और ऋण की लालसा किसान को कमज़ोर करती है। हो सकता है कि यह बात आपको पसंद  न आए लेकिन ज़मीन की लड़ाई अब इसी  के आसपास घूम रही है। ऐसे में पेड़ से प्रेम करना हम किसानों को सीखना होगा। ज़मीन की काग़ज़ी लड़ाई से कहीं आगे निकलकर माटी से इश्क़ करना होगा। ज़मीन बेचने की लत से छूटकारा तब ही मिलेगा जब हम धरती मैया के गोद में खेलेंगे और पौधे लगाएँगे। खटारा होती खेती में आइये हम सब मिलकर नई जान फूंकते हैं, ठीक उसी तरह जैसे हमारे पुरखे करते थे जंगल से प्रेम, नीम और आँवला जैसे पेड़ से प्रेम। 

Tuesday, January 10, 2017

बाबूजी की याद आ रही है..

पिता ऐसे पेड़ होते हैं, जिसकी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत होती है कि हम उससे लिपटते चले जाते हैं और अंतत: उसमें खो जाते हैं। इस खो जाने का अपना आनंद है। पता नहीं, हर कोई इसमें खोना चाहता होगा कि नहीं लकिन मैं तो ऐसा जरुर  चाहता हूं।  जब बाबूजी मुझसे बहुत दूर चले गए हैं तब उनकी जड़ों में लिपटने की चाह और बढ़ गयी है।


आज शहर से अपने गाँव जाते वक्त मेरी नजर एक बूढ़े शख्स पर टिक गयी जो लाठी के सहारे कदम बढ़ा रहा था. उम्र उसकी 80 के करीब होगी। बूढ़ा शख़्स सात -आठ साल के एक लड़के को थामे था। वह बूढ़ा उस लड़के को सहारा दे रहा था कि वह लड़का उस बुजुर्ग को थामे था, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन यह अहसास जरूर हुआ कि हम सब जड़ों में लिपटने की जुगत में रहते हैं। यही जुगत शायद जीने की आश को बचाए रखती है।

नहर के एक छोर पर उन दोनों को देखकर मुझे बाबूजी की याद सताने लगी। दरअसल हम सब स्मृति में जीवन तलाशते हैं। स्मृति की दूब हमेशा हरी बनी रहे, हम सब ऐसा सोचते हैं। कोई हमारे बीच से गुजरकर भी मन में एक पगडंडी बनाकर निकल जाता है, जिसकी लकीर पर हम जीवन भर चलते रहने की मंशा पाल बैठते हैं।   लेकिन नियति जो चाहती, होता तो वही है। कबीर की वाणी ऐसे में मुझे याद आने लगती है। गाम का कबीराहा मठ मुझे खींचने लगता है। मैं खुद ही बुदबुदाने लगता हूं- "कबीरा कुआं एक है..और पानी भरे अनेक..। "

फिर जीवन में फकीर की खोज में लग जाता हूं तो कबीर का यह लिखा सामने आ जाता है-  "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे. सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली बला..।"  

आज गाम-घर करते हुए यही सब सोचता रहा। इस बीच धूप की दुनिया बादलों में कब बदल गयी पता भी नहीं चला। दिन में आज धूप खिली थी। ठंड में धूप की आश होती है। ठंड में ओस की बूँदें और कुहासे को लेकर कई यादें हैं मन के भीतर, कई कहानियां हैं, कई नायक-नायिकाएं हैं..लेकिन फिलहाल आलू और मक्का के खेत का कैनवास ही मन में घर बनाए हुए है।  

ठंड में सुबह-सुबह कुहासे में मक्का के खेतों की हरियाली और भी मायावी दिखने लगती है। बाबूजी हमारी साल भर की रोजी-रोटी के लिए जी-तोड़ मेहनत करते थे। ट्रैक्टर से घंटों खेतों को समतल करते थे। देखिए न उन खेतों में अब मक्का के संग कदम्ब अपनी कविता-कहानी हमें सुनाने की जिद कर रहा है। इस अहसास के साथ कि बाबूजी भी ये सब सुन रहे होंगे, मैं आंखें बंद कर उन्हें याद कर लेता हूं। यह जानकर कि मेरा यह भरम भी टूट जाएगा एक दिन...   हर रोज शहर से गांव करते हुए इन दिनों एक साथ ऐसी ही कई चीजें मन में चलती रहती है।

Tuesday, January 03, 2017

ग्रीटिंग कार्ड का गुज़रा ज़माना

देखिए फिर एक नया साल आ गया और हम-आप इसके साथ कदम ताल करने लगे। शायद यही है जिंदगी, जहां हम उम्मीद वाली धूप में चहकने की ख्वाहिश पाले रखते हैं। उम्मीद पर ही दुनिया क़ायम है। हम सब बेहतर कल की उम्मीद करते हैं। नए साल में हम सब इन्हीं उम्मीदों को लेकर संदेशों का आदान-प्रदान करते हैं। सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफार्मों के ज़रिए उम्मीद भरी शुभकामनाएँ हम सब भेजते रहे लेकिन  इस बीच ग्रिटिंग्स कार्ड को समेटे लिफाफे कहीं खो गए। याद कीजिए पुराने दिनों को जब नए साल में हम डाकिए का इंतजार किया करते थे। लाल-पीले-गुलाबी लिफाफों में डाक टिकट चिपकाए जब वह आता तो दूर बैठे लोगों की याद ताजा हो जाती थी। हम स्कूल दिनों में हॉस्टल से घर भेजा करते थे ग्रिटिंग्स कार्ड। उसकी अपनी भाषा हुआ करती थी। 'हैप्पी न्यू ईयर' कहने का अंदाज हुआ करता था। अब कागज के पन्नों में अपनी भावनाओं को रंगों में समेट कर दोस्तों-परिजनों को भेजा करते थे।

हमारे-आपके घर में आज भी ऐसी कई ग्रिटिंग्स होगी, जिसे हमने नववर्ष पर प्राप्त किया था। यदि कोई कार्ड आपके पास आज भी सुरक्षित है तो याद कीजिए उन पुरानी यादों को, उन अनुभवों को शायद आगे चल ये बातें फोटो एलबम की तरह हो जाएगी। उस वक्त आप कहेंगे कि फ़लां वर्ष में मेरे एक दोस्त ने मुझे यह कार्ड भेजा था।

यह सच है कि इलेक्ट्रॉनिक युग में ईमेल- मोबाइल- फ़ेसबुक-व्हाटसएप्प एक सुविधाजनक साधन बनकर सामने आई है, लेकिन इस बीच कागज के पन्नों पर उकेरे शुभकामना संदेशों को भी भूलना ठीक नहीं है। इस बार जब पहली जनवरी की सुबह आपने किसी को शुभकामना संदेश भेजा था तो वह पलक झपकते ही आपके मित्र तक पहुँच गई होगी, लेकिन डाक से कार्ड भेजने के लिए आप कम से कम पाँच दिन पहले उस मित्र- भाई-बहन-या अन्य रिश्तेदारों को याद करते थे।

कागज,चिट्‍ठी,लिफाफा,पोस्‍टकार्ड, नव वर्ष की मंगलकामना वाले खत और उनपर सुंदर लिखावट से उकेरे गए मोती जैसे शब्‍द। जब पाती लिखी जाती तो जतन से सहेजी भी जाती। कहीं पानी से भींग ना जाए। रोशनाई तैयार की जाती, पहले करची कलम के नोक पैने किए जाते, फिर गोटी वाली स्याही को गरम पानी में भिंगोया जाता। जब कार्ड लिख लिया जाता तो किताब के पन्‍नों के बीच संभालकर रख लेते जब तलक वह लिफाफा लाल रंग के सरकारी डब्‍बे में ना गुम होता।

इन सबके बावजूद सोशल नेटवर्क पर नए साल के मौक़े पर जो कुछ लिखा गया उसे भी नज़रंदाज नहीं किया जा सकता है। एक से बढ़कर एक फ़ेसबुक स्टेटस और ट्वीट किए जाते हैं। मुझे फेसबुक के स्टेटस उम्मीद वाली धूप ही लगती है और इसी बीच सुशील भाई का एक पुराना स्टेटस याद आ जाता है-  “ साल बदले तो बदले, ईमान न बदले।“

यह सब लिखते हुए अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु के पात्र भिम्मल मामा याद आने लगते हैं, जिसे बार-बार दौरा पड़ता है लेकिन इसके बावजूद उसका ईमान नहीं डोलता है। वहीं बावनदास याद आते हैं, जिसने दो ही डग में इंसानियत को नाप लिया था।

खैर, आइये हम सभी 2017 में उम्मीदों के धूप सेकते हैं, मन के खाली डिब्बे को भरते हैं लेकिन  साथ ही ईमान को भी बचाए रखना है। सोशल मीडिया युग में मुखौटा लगाए हम सबको रेणु का लिखा याद रखना होगा - नए साल में 'मुखौटा' उतारकर ताजा हवा फेफड़ों में भरें ... 

Saturday, December 31, 2016

किसान की डायरी-३१ दिसंबर, २०१६

साल के आख़िरी दिन में अपनी लीची बाड़ी में कुछ बुज़ुर्ग लोगों से बातचीत में लगा हूं। रामनरेश चाचा कह रहे हैं - " ई मोदी -मोदी करते हुए नोटबंदी  का गाना कब चालू हो गया, कुछ पता ही नहीं चला, ख़ैर, अभी तो पम्पसेट चलाना है बाबू, मक्का में पटवन की ज़रूरत है। "  सरकार के इस फ़ैसले की बात नए साल में भी जारी रहेगी। लेकिन इन सबके बावजूद हम किसानी कर रहे लोग खेतों में जुटे हैं ,  एक नई आशा और उत्साह के साथ।

इस वक्त फसल को पानी की जरूरत है , ऐसे में किसानी समाज खेतों की प्यास मिटाने में लगा है। 2016 के अंतिम दिन हम फसल के संग उम्मीद लिए खेतों में घूम रहे हैं। फट-फट करता पम्प सेट आज मुझे खींच रहा है। यदि शास्त्रीय संगीत की बारीकियों की जानकारी होती तो यक़ीन मानिए इसमें भी कोई राग खोज लेता।

जिन खेतों में मक्का है वह आज पटवन से खुश है और उसकी ख़ुशी से ही मेरे जैसा किसान अपने घर-आँगन-दुआर को खुश करेगा। यह सब लिखते हुए गाँव के लच्छो चाचा की बात याद आ रही है। पटवन  के वक़्त वे अचानक सरकार के ख़िलाफ़ हो गए। हमने कहा कि चाचा पहले खेत में पानी छोड़ा जाए फिर हम मोदी के ख़िलाफ़ आपकी चर्चा में शामिल होंगे। इस पर चाचा ने कहा , " प्रधानमंत्री सिंचाई योजना के बारे  में पता है न तुमको! इस योजना  का लड्डू चखा है कि नहीं ? "

लच्छो चाचा की बातें इस बात की तरफ़ इशारा करती है कि  इस साल गाँव में भी लोगबाग सरकारी योजनाओं को लेकर खुलकर बात कर रहे हैं।

वैसे 2016 किसानी कर रहे मेरे जैसे लोगों के लिए ख़ास रहा, नोटबंदी को छोड़कर। धान की पैदावार इस बार अच्छी हुई, लेकिन नोटबंदी के कारण धान की बिक्री प्रभावित हुई।

वैसे किसानी के पेशे में हमें हमेशा आशावान बने रहना होता है। हम सब तो   बस खेत में बीज देकर चुप हो जाते हैं और सबकुछ कथा के नायक प्रकृति के भरोसे छोड़ देते हैं । इन सबके बीच धरती मैय्या हमें भरोसा देती रहती है कि 'सब अच्छा ही होगा' । इसी आशा के संग हर किसान 12 महीने गुजार देता है। सब अपने गुल्लक में आशा की किरण को बनाये रखने की कोशिश तो जरूर ही करता है।

यही वजह है कि आने वाले 2017 को लेकर हम सब आशावान है। देखिये न अभी एक महीने पहले की ही बात है, धान उपजाकर कोई भगैत-विदापत में डूबा है तो कोई बेटी की विदागरी में लगा है। हालांकि नोटबंदी के कारण धान की बिक्री ने इस बार हमें निराश किया लेकिन इसके बावजूद सब रमे हैं अपनी दुनिया में। गाम-घर की दुनिया यही है, यहां तनख्वाह तो नहीं है लेकिन उत्सव जरूर है। पल में ख़ुशी और पल में सन्तुष्ट हो जाना किसान की आदत है। पूर्णिया जिला में किसानी कर रहे लोग अक्सर कहते हैं - "खेती नै करब त खायब कि और खेती स निराश भ जायब त जियब केना..."

बाबूजी हमेशा कहते थे "जब फसल तुम्हें निराश कर दे तब उससे बात करो। खेत में टहलने लग जाओ। आशा बलवती होती है, इसे दुहराने लगो।"

बाबूजी की कही बातों को याद करते हुए आज डायरी लिखने जब बैठा हूँ तो लगता है सब सुंदर ही होगा। 2017 कल आ रहा है, नये साल में नए फसलों के संग हम खूब बातें करेंगे। नवान्न की पूजा करेंगे। मक्के के दानों को सहेजेंगे, धान की बालियों से प्रेम करेंगे , गेहूं की भूरे रंग की ब्रश की माफिक बाली को माटी से स्पर्श करते देखेंगे।

आशा है मुल्क के अलग अलग हिस्सों में मेहनतकश किसानी कर रहे लोग निराश नहीं होंगे। उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम हर कोने के किसान खेत से इश्क करेंगे...माटी से सोना उपजाने की कोशिश करेंगे... हिम्मत नहीं हारेंगे, एकजुट होंगे।

(किसान की डायरी-31 दिसंबर 2016)

Thursday, December 22, 2016

चनका रेसीडेंसी और हमारे पहले मेहमान की बात

चनका रेसीडेंसी और इयान वुलफ़ोर्ड

देखते-देखते चनका रेसीडेंसी के पहले गेस्ट राईटर इयान वुलफ़ोर्ड का एक हफ़्ते का चनका प्रवास ख़त्म हो गया। उनके संग हम सात दिन रहे। वे चनका में ग्रामीण संस्कृति, ग्राम्य गीत और खेत-पथार को समझ-बूझ रहे थे और मैं इस रेणु साहित्य प्रेमी को समझने-बूझने में लगा था। रेणु मेरे प्रिय लेखक हैं, वे मेरे अंचल से हैं। मुझे वे पसंद हैं 'परती परिकथा' के लिए और लोकगीतों  के लिए।  इयान वुलफ़ोर्ड भी रेणु साहित्य में डूबकर कुछ न कुछ खोज निकालने वालों  में एक हैं।

रेसीडेंसी में इयान हर दिन रेणु साहित्य में शामिल लोकगीतों पर बात करते थे। उन्होंने रेणु के गाँव औराही हिंगना में लंबा वक़्त गुज़ारा है। उनके पास उन लोक कलाकारों की बातें हैं, जिनका रेणु  ने ज़िक्र किया है। ठिठर मंडल, राम प्रसाद या फिर जय नारायण, चमेनी देवी, रेणु की पत्नी पद्मा देवी आदि इन सभी की कहानी इयान के पास है। मैं घंटों उनसे इन लोक कलाकारों  के बारे बातें करता रहा। विदापत नाच की बातें हो या फिर रसप्रिया  का मोहना, इन सब में इयान डूब जाने वाले शख़्स हैं। उनके पास विदापत नाच  के मूलग़ैन रामप्रसाद  का लंबा विडियो इंटरव्यू है। इयान उन्हें 'बिहारी सुपरस्टार' कहते हैं। अफ़सोस अब न रामप्रसाद हैं और  न ही ठिठर मंडल।

इयान को कबिराहा मठों से बहुत लगाव है। उन्हें निर्गुण सुनना पसंद है। हम उन्हें चनका स्थित सोनापुर कबीर मठ  ले गए। वहाँ के कबीरपंथी चिदानंद स्वरूप से इयान  ने लंबी बातें की, निर्गुण से लेकर सगुण तक की बातें की। मैं इन दोनोंकी बातें सुनता रहा। मन के भीतर रेणु की लिखी यह बातें बजने लगी -

" कई बार चाहा कि, त्रिलोचन से पूछूँ- आप कभी पूर्णिया जिला की ओर किसी भी हैसियत से, किसी कबिराहा-मठ पर गये हैं? किन्तु पूछकर इस भरम को दूर नहीं करना चाहता हूं। इसलिए, जब त्रिलोचन से मिलता हूं, हाथ जोड़कर, मन ही मन कहता हूं- "सा-हे-ब ! बं-द-गी !!"

रेसीडेंसी के ज़रिए मैं ख़ुद से भी बातें करना चाहता हूं। इयान  ने मुझे इसका मौक़ा दिया। इन छह दिनों  में हमने एक बार फिर से मैला आंचल, परती परिकथा, रसप्रिया तीसरी कसम, पंचलाइट जैसी रचनाओं को इयान  के ज़रिए समझने की कोशिश की। व्यक्तिगत तौर  पर कहूं तो रेणू की लिखी बातें कब हमारे अंदर बैठ गई, हमें ख़ुद पता नहीं है,ठीक गुलजार की रूमानियत की तरह, कोल्ड कॉफी के फेन की तरह। रेणु की दुनिया हमें प्रशांत (मैला आंचल का पात्र) की गहरी मानवीय बेचैनी से जोड़ती है, हीरामन (तीसरी कसम का पात्र) की सहज, आत्मीय आकुलता से जोड़ती है। वह हमें ऐसे रागों, रंगों, जीवन की सच्चाई से जोड़ते हैं जिसके बिना हमारे लिए यह दुनिया ही अधूरी है। अधूरे हम रह जाते हैं, अधूरे हमारे ख्वाब रह जाते हैं। इयान जैसे रेणु प्रेमी  से मिलकर  मन  के भीतर ऐसे ही बातें बजती रही।

इयान के साथ हम रेणु ग्राम भी गए। दिन भर रेणु के घर- आँगन करते रहे हम सब। वहाँ भी इयान ने लोक-कलाकार जयनारायण, सुमिता देवी और चमेनी देवी से बातें की। मैं यह बात इसलिए साझा कर रहा हूं क्योंकि इयान  से मुझे फ़ील्ड नोट्स पर काम करते रहने की सीख मिली। यही सीख मुझे सदन झा सर से भी मिलती रही है।

इयान लोगबाग से ख़ूब बातें करते हैं और उसका नोट तैयार करते हैं। ऐसे में कबीर की उस वाणी से अपनापा बढ़ जाता है, जिसमें  वे कहते हैं - " अनुभव गावै सो गीता। " रेणु रोज की आपाधापी के छोटे-छोटे ब्योरों से वातावरण गढ़ने की कला जानते थे। अपने ब्योरो, या कहें फिल्ड नोट्स को वे नाटकीय तफसील देते थे, ठीक उसी समय वे हमें सहज और आत्मीय लगने लगते हैं।

चनका रेसीडेंसी की शुरुआत इयान से हुई है, जिसमें रेणु बसते हैं, इसलिए लगता है आगे भी सब सुंदर ही होगा। इसी बीच इयान के रहते हुए पूर्णिया पुलिस की ' मेरी पाठशाला' भी चनका  में लग गई। 'मेरी पाठशाला ' की शुरुआत पूर्णिया  के पुलिस अधीक्षक निशांत कुमार तिवारी ने किया है। वे लेखक भी हैं। ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से उनकी दो किताबें  आ चुकी हैं। रेसीडेंसी  के लिए यह भी अच्छा रहा कि आस्ट्रेलिया के ला ट्रोब यूनिवर्सिटी  के प्रोफ़ेसर इयान वुलफ़ोर्ड का एक ऐसे पुलिस अधीक्षक से मुलाक़ात हो गई जो कुछ अलग कर रहे हैं। दोनों  के बीच साहित्य पर लंबी बातें हुई।

रेसीडेंसी प्रोग्राम आरंभ करना असंभव रहता यदि फ़ोटोग्राफ़ी में दिलचस्पी रखने वाले चिन्मया नंद सिंह का सहयोग नहीं मिलता। उन्होंने रेसीडेंसी के विचार से लेकर इसके पहले प्रोग्राम तक में अपना पूरा समय दिया।

किसानी करते हुए चनका को लेकर जो ख़्वाब पाले हैं, उसे पूरा करना है। और चलते-चलते रेणु की इन बातों में डुबकी लगाइए, जिसमें उन्होंने एक कीड़े की बात की है  -

 "एक कीड़ा होता है- अंखफोड़वा, जो केवल उड़ते वक्त बोलता है-भन-भन-भन। क्या कारण है कि वह बैठकर नहीं बोल पाता? सूक्ष्म पर्यवेक्षण से ज्ञात होगा कि यह आवाज उड़ने में चलते हुए उसके पंखों की है। सूक्ष्मता से देखना और पहचानना साहित्यकार का कर्तव्य है। परिवेश से ऐसे ही सूक्ष्म लगाव का संबंध साहित्य से अपेक्षित है।”