Wednesday, March 04, 2015

रेणु के नाम एक पतरी


रेणु बाबा को प्रणाम!



बहुत दिनों से इच्छा थी कि आपको पाती लिखूं लेकिन हिम्मत नहीं कर पा रहा था। आज जब जीवन के प्रपंच में फंसकर  जीवन जीने की कला सीख रहा हूं तो हिम्मत जुटा कर आपको लिखने बैठा हूं।

कागजी किताबों फाइलों के अनुसार आज (4 मार्च) आपका जन्मदिन है। देखिए न, हर साल इस दिन मैं आपके लिए अपने भीतर कुछ न कुछ करता रहा हूं लेकिन इस साल कुछ नहीं कर पा रहा हूं इसलिए चिट्ठी लिखने बैठ गया हूं। अपने भीतर आपके पात्रों को विचरन करने के लिए छोड़कर शब्दों की माला पिरोने बैठ गया हूं। मेरा मन बाबूजी के आलमीरे से  मैला आंचल निकालकर पढ़ने की जिद कर रहा था लेकिन बाबूजी को पलंग पर जीवन और मौत से जूझते देखकर मैंने परती परिकथा निकाल ली है।

परती परिकथा के बहाने आपसे लंबी गुफ्तगू करने इच्छा रही है ठीक वैसे ही जैसे गुलजार से मुझे उनके गीतों पर कभी बात करनी है। एक बात कहूं बाबा ! बाबूजी की बीमारी मुझे आपसे और नजदीक करने लगी है। मां को उनकी अनवरत सेवा करते देखकर मैं बस आखें मूंद लेता हूं फिर सोचने लगता हूं कि आपने किस तरह परती परिकथा की एक उल्लेखनीय नारी पात्र गीता देवी को रचा होगा। गीता देवी जितेंद्र नाथ की मैम मां थीं। आज आपके जन्मदिन पर मैं बार बार गीता देवी को स्मरण कर रहा हूं।

रेणु बाबा, एक बात जानते हैं आप! इन दिनों मैं कई दफे आपके घर यानि औराही जा चुका हूं। आपके आंगन में पांव रखते ही मुझे कबीराहा माठ की याद आने लगती है। आंगन की माटी के स्पर्श से मन साधो साधो करने लगता है। इस बार हम सोचे थे कि चार मार्च को धूम धाम से आपके गाम में आपका जन्मदिन मनाएंगे लेकिन अफसोस हम कर नहीं सके। फिर सोचे पू्र्णिय़ा में करेंगे..लेकिन यहां भी नहीं। बाबा, मैं सरकारी सहायता से आपके नाम पर कार्यक्रम करने से डरने लगा हूं ..पता नहीं क्यों ? सरकारी क्या किसी भी सहायता से । जीवन का प्रपंच मुझे ऐसे कामों से दूर करन लगा है । ऐसे में मैं मन ही मन आपको याद कर लेता हूं।

खैर, एक बात और, हमने उस घर को भी छू लिया है जिसके बरामदे पर आपने लंबा वक्त गुजारा। आपके साहित्यिक गुरु सतीनाथ भादुड़ी के बासा को हमने देख लिया है। हालांकि वह बासा अब बिक चुका है लेकिन खरीददार के भीतर भी हमने सतीनाथ-फणीश्वरनाथ को पा लिया है। पता नहीं आपको लिखते वक्त मैं रुहानी क्यों हो जाता हूं लेकिन सच यही है कि आप मेरे लिए कबीर हैं। बहुत हिम्मत जुटाकर यह सब लिख रहा हूं बाबा। क्योंकि मुझे इस जिंदगी में जिस बात का सबसे ज्यादा मलाला रहेगा वह है- आपको नंगी आखों से न देख पाना। हालांकि मन की आंखों से तो आपको देखता ही रहा हूं।

याद है न आपको तीन साल पहले कानपुर में आज ही के दिन आप सपने में आए थे.....साथ में लतिका जी भी थीं। उस सपने में मैं टकटकी लगाए ‘लतिका-रेणु’ को देखने लगा। आखिर मेरा जुलाहा मेरे घर आया था। मैं अपने शबद-योगी को देख रहा था। आपके मैला आंचल में जिस तरह  डॉक्टर प्रशांत ममता की ओर देखता है न, ठीक वही हाल मेरा था। मैं भी एकटक अपने ‘ममता’ को देख रहा था, – विशाल मैदान!… वंध्या धरती!… यही है वह मशहूर मैदान – नेपाल से शुरु होकर गंगा किनारे तक – वीरान, धूमिल अंचल...

और एक बात कहनी थी आपसे..मेरी एक किताब आ रही है- राजकमल प्रकाशन से। हालांकि किताब को लेकर तरह तरह की बातें होने लगी है लेकिन मुझे खुद पर भरोसा है। बाद बांकि आप पर छोड़ दिया हूं। बाबूजी यदि ठीक रहते तो वो भी आपको इस बात के लिए चिट्ठी लिखते लेकिन अफसोस वो भी आज बिछावन पर अचेत लेटे हैं। दरअसल आपने जिस परती को अपनी परिकथा के लिए चुना था वह अपनी अपनी अनुभव संपदा में सबसे अधिक उर्वरा थी और आप आने वाली पीढियों को भी इस उर्वरा के बारे में बताते रहे हैं।

बाबा, इन दिनों जब जीवन में तमाम तरह के झंझावतों को झेल रहा हूं तो अक्सर आपको याद करता हूं । जानते हैं क्यों? क्योंकि आप मेरे लिए ऐसे शख्स हैं जिसने जीवन में बहुत कुछ भोगा और सहा है...और इसी वजह से आप ऊपर से बहुत हल्के और हंसमुख दिखाई देते हैं। आपने कभी अपनी पीड़ा दूसरों पर नहीं थोपी। बाबूजी हमसे कहा करते थे कि ऐसे लोगों की शालीनता उन्हें अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करने से रोकती है।

आपके बारे में निर्मल वर्मा कहते थे कि जिस तरह कुछ साधु संतों के पास बैठकर ही असीम कृतज्ञता का अहसास होता है, हम अपने भीतर धुल जाते हैं, स्वच्छ हो जाते हैं , रेणु की मूक उपस्थिति हिंदी साहित्य में कुछ ऐसी ही पवित्रता का बोध कराती है। ' निर्मल वर्मा की यह पंक्ति मैं आपके लिए हर जगह दोहराता रहा हूं। आप मेरे लिए संत लेखक हैं। आपको गुस्सा आता होगा कि यह लड़का संत संत क्यों कह रहा है लेकिन बाबा, बात यह है कि आपने अपने लेखन में किसी चीज को त्याज्य या घृणास्पद नहीं माना। आपने हर  जीवित तत्व में पवित्रता, सौंदर्य और चमत्कार खोजेन की कोशिश की और ऐसा केवल संत ही कर सकता है।


आपके लेखन पर चर्चा करना मुझे कभी रास नहीं आया। मुझे तो बस आपकी बातें करने में आनंद आता है..देहातित आनंद।

बाबा, तो अब आज्ञा दीजिए। बाबूजी को दवा देने का वक्त आ गया है। पलंग पर लेटे लेटे वे मुझे देख रहे हैं, शायद वो भी मुझे कुछ कहना चाहते हैं...आप भी कुछ कहिए न बाबा....

आपका
गिरीन्द्र नाथ झा
ग्राम- चनका, पोस्ट- चनका, जिला-पूर्णिया, बिहार
4 मार्च, 2015

Monday, March 02, 2015

गांव - देहात और वो गुदरी माई

किसानी करते हुए बीते दिनों को याद करना इन दिनों जैसे रुटिन का हिस्सा बन गया है। कोसी नदी की एक उपधारा कारी कोसी के कछार पर बसे अपने गांव में मक्का की खेती करते हुए आपका किसान बीस साल पीछे अपने बचपन में खो जाने की जिद करने लगा है। यादों में वह एक बरगद पेड़ को फिर से जानने की कोशिश करने लगा है, जिसे आस पड़ोस के गांव-देहात के लोग पूजने आया करते थे। नाम था उसका ‘गुदरी माई’। पेड़ किस तरह लोगों को और गावों को जोड़ता है, हमने इसे ग्रामीण परिवेश में ही सीखा। शायद गांव कनेक्शन यही है क्योंकि गांव हमें जोड़ना सीखाता है न कि तोड़ना।

बचपन में कारी कोसी पर बने पुराने लोहे पुल को पारकर दुर्गा पूजा में लगने वाले मेले में दाखिल होने से ठीक पहले एक पुराने बरगद पेड़ पर लाल, उजले, हरे रंग के कई कपड़े टंगे दिखते थे। बैलगाड़ी से उतरकर लोगबाग आंखे मूंदकर बुदबुदाते थे और फिर कपड़े के कुछ-एक टुकड़े पेड़ की डाली में बांध देते थे। न अगरबत्ती की सुगंध न कोई दीप लेकिन इसके बावजूद भी यह पूजा की एक पद्दति थी, जो आज भी है।

इन दिनों किसानी करते हुए अपना मानस गुदरी माई के आसपास चक्कर लगाने लगा है  खुद को 20 साल पीछे रखकर आज गुदरी माई को याद करने का जी कर रहा है। खेत की पगडंडियों पर चलते हुए आज यादों में अपनी दुनिया रचने की इच्छा है।

कारी कोसी पर बने लोहे के पुल पर पहुंचने से पहले एक लाल रंग का मकान दिखता था, वही थी रामनगर डयोढ़ी लेकिन हमें तो चंपानगर जाना होता था। हमारी बैलगाड़ी आगे निकल पड़ती थी। चंपानगर डयोढ़ी के पास से गुजरते हुए मन में अजीब से छनछनाहट दौड़ पड़ती थी। वहां संगीत की आराधना होती थी। अंचल में ख्याल गायिकी की तस्वीर गढ़ी जाती थी। कुमार श्यामानंद सिंह ठाकुर जी की अराधना शास्त्रीय संगीत के जरिए करते थे। फुटबॉल मैच का आयोजन होता था, कुश्ती के अखाड़े लगते थे।  लेकिन अभी मेरी याद में ड्योढ़ी से अधिक वह बरगद का पेड़ ही नाच रहा है।

लोगबाग और अंचल की स्मृति को खंगालने के बाद पता चला कि हमारे इलाके में मंदिर मस्जिद से दूर 'ऊपरवाला' गाछ-वृक्ष में वास करता आया है। काली मंदिर भी काली-थान कहलाती है। जमीन के एक छोटे से टुकड़े में खड़ा एक बूढ़ा पेड़ 'बाबूजी थान' जाने कब बन गया, पता नहीं हैं। यहां इतिहास स्मृति की पोथी में बैठ जाती है, जिसे खंगालना पड़ता है। जोगो काका कहते हैं कि अभी भी पू्र्णिमा की रात सफेद घोड़े पर ब्रह्म (देवता टाइप) आते हैं, उन्हीं का है यह 'बाबूजी थान'। मैं अक्सर पू्र्णिमा की रात उस जंगल में गुजारने की कोशिश करता हूं, ताकि महसूस कर सकूं अंचल की स्मृति को।

गांव देहात की स्मृति यही है। यहां दिखावा कुछ भी नहीं है। लोगबाग जीवन को यहां जीते हैं खेत-पथार के लिए..अन्न के लिए। मेरी गुदरी माई की कहानी भी उसी स्मृति की श्रेणी में आती है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन यानि अष्टमी को चंपानगर में लगने वाले मेले में दाखिल होने से पहले लोग गुदरी माई के पास  पहुंच जाते थे, मन्नतें मांगने। ‘मांगना’ अजीब शब्द है, कई अर्थ निकल आते हैं। मांगना शब्द से यह गीत याद आने लगता है- "अर्जियां सारी मैं चेहरे पे लिख के लाया हूं, तुमसे क्या मांगूं तुम खु़द ही समझ लो मौला। दरारे-दरारे है माथे पे मौला, मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला...।"

खैर, मन्नतें पूरी  होने पर लोगबाग उस बरगद पेड़ के किसी टहनी पर एक कपड़ा टांग देते थे, नए कपड़े नहीं पुराने। पता नहीं इसकी शुरुआत कैसे हुई होगी लेकिन अध्ययन करने पर कई कथाओं को विस्तार मिल सकता है। हम इसकी शुरुआत कर सकते हैं, यादों को सहेज सकते हैं। इन दिनों लगातार कबीर की साखियों पर ध्यान लगाने की वजह से गुदरी माई की याद और भी तेज हो गई है। दरअसल कबीर को पढ़ते वक्त इस तरह के कई ख्याल आते हैं। "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली...।"

हाल ही में दिल्ली, कानपुर, कुशीनगर के रास्ते पूर्णिया के अपने गांव चनका आने पर मुझे गुदरी माई में पीरबाबा दिखने लगे हैं, मैं याद करते हुए बौरा जाता हूं। कानपुर में कैंट इलाके में दाखिल होते ही वहां हमें एक पीर बाबा से सामना होता है। पता चला कि हर गुरुवार को वहां भीड़ जुटती है लेकिन मुझे वहां जलने वाली अगरबत्ती से उठने वाली  सुगंध अपनी ओर खींचती है और मैं सिर झुका लेता हूं...। मैं फिर अपनी यादों के जरिए चनका से कानपुर पहुंच जाता हूं। सोचता हूं कि गुदरी माई ने न जाने कितने लोगों की अर्जियां सुनी होगी..क्या हम बाद में उसे याद करने की भी जरुरत महसूस करते हैं?  मशीन की तरह बनती जा रही जिंदगी में क्या हमारा नाता गाछ-वृक्षों से यूं ही बना रहेगा? ऐसे सवाल इन दिनों खूब तंग करने लगे हैं।

Monday, February 23, 2015

खेती से भंग हो रहा मोह

नहरखेतपगडंडीगाछ-वृक्षचिडियों की आवाजेंबरसात में माटी की सुगंधधनरोपनी के वक्त कादो से सने रोपनी करते लोगों के पैर..। आप समझ रहे होंगे कि लिखने वाला’ रुहानी होता जा रहा है लेकिन बात यह है कि लिखने वाला’ किसानी करने वाले लोगों की बात करना चाहता है। अपनी कथाओं के जरिए जन-मानस को गांव से करीब लाने वाले लेखक फणीश्वर नाथ रेणु अक्सर कहते थे कि खेती करना कविता करना हैकहानी लिखना है..।

फणीश्वर नाथ रेणु ने एक दफे कहा था
, “एक एकड़ धरती में धान उपजानाउपन्यास लिखने जैसा है।  लेखन का ही आनंद मिलेगा खेती करने में। साथ ही वे खेती को एक अलग नजरिए से लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- "आबरन देवे पटुआपेट भरन देवे धान। पूर्णिया के बसइयारहै चदरवा तान।" रेणु को पढ़ते हुए आप किसी किसानी करने वाले से यह सवाल पूछ सकते हैं कि क्या आप किसान हैं?  क्योंकि किसानी को बयां करना सबसे कठिन काम है।
चलिए आपसे न पूछकरसवाल करने वाला खुद से यह सवाल करता हैदरअसल किसानी पृष्ठभूमि में जिसका मानस तैयार हुआ हैवह भी ऐसे सवाल पर लंबी चुप्पी साध लेता है। हालांकि अभी भी किसानी की दुनिया में खुश्बू बरकरार हैबस हिंदुस्तानी समाज का नजरिया बदल गया है। रेणुकोसी के जिस इलाके में पटसन (जूट) की खेती से खुशहाल रहने वाले किसानी युग की चर्चा करते थेअब वह युग बदल गया है। पटसन के जगह पर पहले सूरजमुखी ने किसानों को खुशहाल बनायाफिर मक्का ने और अब वह जगह लकड़ी ले रहा है।

इन सब उदाहरणों के संग खेती छोड़ने वाले लोगों का भी जिक्र जरुरी है। आखिर ऐसी क्या वजह सामने आ गई बिहार के कोसी इलाके के तथाकथित बड़े किसानों का खेती से मोह भंग हो गया
यह एक बड़ा सवाल है और इसी के आसपास क्या आप किसान हैं’ जैसा सवाल उठ खड़ा हुआ है।  इन सबके बीच फेसबुक पर मेरे एक दोस्त की टिप्पणी है-  पूर्णिया का ही कोई आदमी समझ सकता है कि पटुआ की सोंधी खुशबू किसान की आत्मा को तर कैसे करती होगी और ललका भदईया चौर (चावल) का भात की महिमा क्या होती है...।” 
पूर्णियाकटिहारअररियाकिशनगंजमधेपुरासहरसा जिले के ग्रामीण इलाकों में खेती एक पुरानी परंपरा को ढ़ो रही हैजिसकी वजह से खेती का जोड़-घटाव खराब हो रहा है। क्या आप किसान हैं?  के सकारात्मक जवाब के लिए किसानी के अंदाज को पेशेवर ढंग से पेश करने की भी जरुरत है। ऐसी बात नहीं है कि धानगेंहू या अन्य किसी नकदी फसल के बदौलत एक परिवार का भरन पोसन नहीं हो सकता है। बस किसानी का अंदाज बदलना होगा।

दरअसल
इस सवाल के बीच में दो तरह के लोग अतृप्त’ हुए खड़े हैं। एक ऐसे किसानजिनके पास जमीन है और जो पहले खुट्टा गाड़कर गांव में जमे रहते थे और उसी के संग लोग काम करते थे। (कृप्या इन अतृप्त जमात के बीच हम-आप भूमि-वितरण को न खड़ा करें क्योंकि राजनीति करने वाले इसका हल कभी नहीं निकालेंगे क्योंकि वे पिछले कई दशकों से इसी की बदौलत अपनी दुकान चला रहे हैं। हमें खुद इसका हल निकालना होगासकारात्मक तरीके से।) अब सवाल उठता है कि फिर ऐसी तस्वीर कैसे उभर गई कि दोनों जमात गांव से दूर हो गए। ऐसे में यह भी सवाल लाजमी है कि क्या उन इलाकों में अब खेती ही नहीं हो रही हैक्योंकि जमीन वालेकाम करने वाले हैं ही नहीं। दरअसल इन सबके संग एक दूसरी तस्वीर भी तैयार हुईवह पलायन के भीतर पलायन का है। गांव से पलायन का रुख शहर का रास्ता तय करता है लेकिन यह भी जानने की जरुरत है कि एक पलायन का रास्ता गांव से गांव का भी है। ये ऐसे लोग होते हैंजो नकदी फसल के लिए एक ही जिले के दूसरे गांव का रुख करते हैं।

कोसी के अधिकांश इलाकों में पलायन का यह रुप सबसे अधिक देखा जा रहा है। मेहनतकश लोगों की बड़ी जमात पहले पंजाब
हरियाणादिल्ली आदि जगहों से मेहनत कर आते हैंकुछ पूंजी जमा करते हैं और फिर उन किसानों के संपर्क में आते हैंजो अब शहर का रास्ता अपना चुके हैं। यहीं आकर खेती एक कांट्रेक्ट का रुप अख्तियार करती है। ये मेहनतकश प्रवासी किसान अधिक भूमि वाले किसानों के खेतों को ठेके पर लेते हैं और शुरु होती है नकदी फसल की एक नई फिल्मजिसमें फसल के लिए नकद का प्रावधान है। इस फिल्म का नायक एक प्रवासी किसान होता हैजिसमें परिस्थितियों के संग कदम मिलाने की ताकत होती है। किसानी की नई परिभाषा गढ़ते इन लोगों को करीब से समझने की जरुरत है। इसमें प्रवासियों की मनोस्थिति को भी जानना होगा। समाजशास्त्र के अध्येताओं को इस पर नजर डालने की जरुरत है। मीडिया को इस ओर देखना होगाताकि एक बड़े तबके का किसानी व्यवस्था से मोह भंग न हो और जब यह सवाल कोई पूछे कि क्या आप किसान हैं ? ” तो जवाब सकारात्मक ही आएइसकी गारंटी मिले।

Friday, February 13, 2015

गांव-देहात में लगी वेब मीडिया की चौपाल

चनका एक गांव है जो बिहार के पूर्णिया जिला में स्थित है। आप को यह जानकर हैरानी होगी कि इस गांव से दो साल पहले तक जिला और आसपास के लोग भी अनजान थे, जबकि यह एक पंचायत है। वो भी ऐसा पंचायत जहां अभी तक पक्की सड़क नहीं पहुंची है। बिजली भी हर टोले में नहीं है। इन तमाम विरोधाभासों के बीच यह गांव पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में अपने पांव पसार रहा है।
सोशल मीडिया के जरिए या कहिए इंटनेट के जरिए चनका गांव को वेब जगत में लोग जानने लगे हैं। इसी कड़ी में जनवरी की 18 तारीख को यहां फेसबुक, ट्विटर और ब्लाग की दुनिया से जुड़े लोग इकट्ठा हो गए और सभी ने मिलकर सजा ली फेसबुक की चौपाल। 

अभी तक बड़े शहरों के कॉफी हाउस या सेमिनार हॉल में या फिर गूगल हैंगआउट के जरिए लोगबाग के मिलने जुलने की खबर सुनता आया था लेकिन ख्य़ाल आया क्यों न गांव में ऐसा किया जाए। जब सोचा तो भरोसा नहीं था कि 10 लोग भी इकट्ठा होंगे लेकिन जब बैठक में 50 से अधिक लोग जमा हो गए तो पता चला कि डिजिटल नेटवर्क क्या चीज है।
सोशल मीडिया मीट में बिहार के विभिन्न इलाकों और पड़ोसी देश नेपाल से ऐसे लोग चनका गांव पहुंचे जो फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर सक्रिय हैं। इस गांव में भले ही सड़क नहीं पहुंची हो लेकिन मोबाइल पर 2 जी और 3 जी पहुंच चुका है। ऐसे में हमने सोचा क्यों न इसी माध्यम के जरिए गांव की आवाज दूर तलक तक पहुंचाई जाए। सरकार या प्रशासन का रोना रोने से अच्छा है कि हम अपने स्तर पर जहां तक हो सके गांव के लिए काम करें। आखिर गांव कनेक्शन भी तो यही है न। 

हमने फेसबुकियों के इस जुटान का नाम ‘सोशल मीडिया मीट’ दिया था। चनका को हमने इसलिए चुना क्योंकि जहाँ पहुंचने के लिए अभी भी ढंग की सडक नहीं है, लेकिन आभासी दुनिया से संपर्क के लिए इंटरनेट उपलब्ध है। तरह-तरह के लोग इस आयोजन में पहुंचे थे। कोई वामपंथी था, तो कोई उत्तर आधुनिक विमर्शकार। कोई आरएसएस का प्रचारक था तो कोई पत्रकार।

सोच और भाषा में सब अलग-अलग, लेकिन सबों को जोड़ रही थी एक अदृश्य तरंग। यह तरंग इंटनेट का महाजाल ही है।  लगभग पूरे दिन के इस जुटान में मुख्य रूप से सोशल मीडिया के लोकतंत्र पर चर्चा हुई। हमारा ऐसा मानना है कि  फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग जैसे सोशल मीडिया से जुड़े लोग जब शहर से गांव की ओर मुड़ते हैं तो कहानी ही बदल जाती है। हम जिसे आभासी दुनिया मानते हैं, उसी दुनिया के लोग जब असर में गांव देहात और वहां के लोगबाग से मिलते हैं तो ढेर सारी नई बातें निकलकर सामने आती है। फणीश्वर नाथ रेणु के कथा और रिपोतार्जों के लोकप्रिय होने के पीछे ग्राम्य जीवन की ताकत ही है क्योंकि वे उसे देखकर फिर लिखते थे।
बैठक में गाँव के विकास पर कई सुझाव आए और उस पर चर्चा हुई। सबने एक सुर में गाँव के विकास में इंटरनेट और सोशल मीडिया के योगदान को महत्वपूर्ण माना। साथ ही लोगों ने अपने अनुभवों को साझा किया। गीत संगीत का भी दौर चला।

सोशल मीडिया मीट में इसके अलावा ग्रामीण भारत, डिजिटाइलेजशन और सोशल मीडिया से जुड़े तमाम मुद्दों पर इस बैठक में चर्चा हुई।  बैठक में मुख्य रूप से नेपाल से आए युवा उद्यमी प्रवीण नारायण चौधरी, वरिष्ठ साहित्यकार और बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तारानंद वियोगी, स्टील ऑथॉरटि ऑफ इंडिया के सेवानिवृत अधिकारी एनके ठाकुर, शिक्षाविद राजेश मिश्र,  प्राचीन धरोहरों की रक्षा पर काम करने वाले अमित आनंद, अंचल पर काम कर रहे चिन्मयानंद सिंह सहित कई लोग शामिल थे।

वैसे हमारे मन में एक शंका भी थी। हमें लग रहा था कि लोगों का जो स्वभाव हमें फेसबुक पर देखने को मिलता है, वास्तविक दुनिया में भी वे वैसे ही हैं या नहीं। लेकिन हमें तब राहत मिली जब यह अहसास हो गया कि आमंत्रण पर आए सभी लोग एक ढंग की ही बातें करते हैं। हम समझ गए कि फेसबुक या सोशल मीडिया के अन्य मंचों पर सक्रिय सभी लोग नकाबपोश नहीं हैं। वे जो वेब पर लिखते हैं, वैसे ही वास्‍तविकता में भी हैं।

रेणु की धरती पर फेसबुकिया यारों के इस चौपाल को सफल ही कहा जा सकता है क्योंकि जमा हुए लोगों ने एक सुर में कहा और माना कि हमारे गांव में कोई बाहरी लोग नहीं विकास करेंगे। ये हमें खुद ही करना होगा।

Saturday, January 24, 2015

एक खत बसंत के नाम

सरसों के खेत में पंखुरी

ठंड जाती है तो तुम आ जाती हो, हां तुम ठीक समझ रही हो मैं तुम्हारी ही बात कर रहा हूं। तुम्हारी ही। हां, तुम्हारी ही। तुम बसंत हो। पीले रंग से मोहब्बत कराने की आदत तुम्हारी ही संगत से आई है। एक मौसम हजार अफसाने लिए जब तुम आती हो तो मैं पत्ते को छूकर कह देता हूं कि तुम आ गई हो। 

तुम सखी हो न, इसलिए आने की आवाज सुन लेता हूं। हल्की ओस के बूंद से पत्ते की चमक देखकर, तुम्हारी रंगत का पता चल जाता है। खेत में सरसों के पीले फूल के चारों ओर उड़ती तितलियां वाजिब ही कहती है कि तेरे रंग में ही नशा है, जिसमें डूबकर ही कोई तुझे पा सकता है।

तुम्हें याद है न बसंत, जब तुम्हें पहली बार मैं जान सका था। कुछ याद आ रहा है कि नहीं ?, अरे खेत के मंडेर पर चलते वक्त जब पहली बार सरसों के पौधे से हाथ मिले थे, एक सफेदी हाथ में लगी थी, पीले फूल स्याह काली कमीज
 से चिपक गए थे। मैं जानता हूं तुम मुझे देख रही थी। मेरी उमर कम थी लेकिन मन के उस कोने में तुमने दस्तक दे थी।

 मैं जानता हूं, तुम्हारे प्यार करने का अंदाज ऐसा ही होता है। हर साल तुम कम दिनों के लिए आती हो लेकिन जैसे ही आती हो रंग में मुझे सरोबार कर लेती हो। जानती हो तुम्हारे आने की आहट से ही मैंने मेंहदी हसन को जाना। तुम्हारी वजह से मैंने उनकी गजलों को समझा।

 अपने भीतर तुम्हारे होने के अहसास के बाद मैंने यह गजल सुनी-     “मुझे  तुम नजर से गिरा तो रहे हो , मुझे तुम कभी भी भुला न सकोगे,  न जाने मुझे  क्यूँ ये यकीन हो चला है,  मेरे प्यार को तुम मिटा न सकोगे..।” तुम अपने संग एक हवा लाती हो, जिसमें अजीब सा नशा होता है। कई बार पूछना चाहा कि क्या तुम भी नशा करती हो?

 रामचंदर को जानती हो न, जिसके साथ मैं बरसों पहले सरसों के खेत देखने गया था और उस पीले रंग के सफेदी के बहाने तुमसे मुलाकात हुई थी। उसीने बताया था कि तेरे साथ जो हवा आती है न उसमें गांजा से भी ताकतवर नशा है। एक ही कश में कोई भी बौरा सकता है?  मैं उसी नशे की बात कर रहा हूं।

 एक बात और जानती हो। गाम के ठाकुर स्थान का मंहत सरजनवा कहता है कि कबीर को जानने के लिए तुम्हें समझना जरुरी है। वैसे तो मैं सरजना की बातों में अक्सर उलझ जाता हूं लेकिन आज उसने तुम्हारे लिए जब यह कहा- “ न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,  उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?”  तो मैं सोच में पड़ गया। इस सवाल का भी इस बार तुम जवाब देना। 

Thursday, January 01, 2015

नए साल में ईमान जरुर बचाकर रखें :)

देखिए फिर एक नया साल आ गया है और हम-आप इसके साथ कदम ताल करने लगे हैं। शायद यही है जिंदगी, जहां हम उम्मीद वाली धूप में चहकने की ख्वाहिश पाले रखते हैं। उधर, उम्मीदों के धूप-छांव के बीच आपका किसान सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर उम्मीद के लिए लिखे जाने वाले शब्दों को देखने में जुटा है, दोस्तों के फेसबुक स्टेटस को पढ़ रहा है और टि्विट पीपुल्स की 140 शब्दों की कथाओं के तार पकड़ रहा है।

आभासी दुनिया में लोगों के स्टेटस पढते हुए लगता है कि जीवन में कितना कुछ सीखना अभी बांकी है। लोगबाग अपने अनुभवों को यहां उड़ेल रहे हैं तो कोई तस्वीरों और शुभकामना संदेशों के जरिए लोगों से जुड़ रहा है। 2015 के पहले दिन मुझे 2102 की एक जनवरी याद आ रही है, जब कुछ लोग एक से बढ़कर एक फेसबुक स्टेटस डाल रहे थे।

 उन्हीं में से एक स्टेटस अपने प्रिय सदन झा का था, उन्होंने  तब लिखा था- “ मुझे खाली डिब्बा  हमेशा से मोहित करता रहा है..।“ आपके किसान  को यह वाक्य तिलिस्म की तरह लगा, डीडी पर एक जमाने में दिखाए जाने वाले चंद्रकांता की याद आई, जहां अक्सर क्रूर सिंह यक्कू कहते हुए हथेली के जरिए एक डिब्बा बना देता था।

दरअसल हम उम्मीद कहीं भी देख लेते हैं, खाली कमरों में भी और मानुष से भरे कमरे में भी, जहां विचारों का अविरल प्रवाह हो रहा हो या फिर गाम की नहर, जिसमें बलूहाई पानी बह रही हो।2012 की पहली जनवरी को सदन झा ने अपने फेसबुक वाल आगे लिखा था कि खाली डिब्बा अच्छा लगने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें भरा हुआ डिब्बा अच्छा नहीं लगता है। वे कहते हैं- “ लेकिन खाली बर्तन में आप तमाम सपनों और हसरतों को संजो सकते हैं। नये साल की शुभकामनायें कुछ इसी तरह की हैं। फोन पर एक साथ भेजे गये संदेश,  ईमेल और फेसबुक पर अन्य  हजारों के साथ आये विशेज में अपनेपन की गर्माहट,  तकनीकि के खेल और नये साल की कर्मकांड के बीच यह साल खाली केनवास सा सामने है… सपनों के रंग के इंतजार में, आपकी हसरतों का राह तकते. ।”

इस पूरी विचार प्रक्रिया को पढ़ते हुए यही खयाल आता है कि खाली डिब्बे में भर जाने की हिम्मत होती है। डिब्बे के ऊपर रंग भर दें तो और भी सुंदर। खालीपन से भारीपन की यात्रा, आहिस्ता आहिस्ता जारी रहती है, बस साल बदलता जाता है। जब सदन झा खाली केनवास की बात करते हैं तब जवाहर लाल यूनीवर्सिटी के लाल दीवारों की याद आती है, जहां हाथों से लिखी बातें मन के कमरे में पहुंच जाती थी। मुझे फेसबुक के स्टेटस उम्मीद वाली धूप ही लगती है और जिस चीज से मैं इस धूप का आनंद उठाता है वह सचमुच में एक खाली डिब्बा ही हैं, जिसे  जाने कब से भरता आ रहा हूं।

 2012 की पहली जनवरी को अपने जे सुशील यानि सुशील झा का स्टेटस पढ़ने को मिलता है। वे लिखते हैं- “ साल बदले तो बदले, ईमान न बदले।“  सच कहिए तो इसे पढ़कर मैं आज भी एक पल के लिए ठहर जाता हूं।

 मुझे आज सन 2015 की पहली जनवरी को सुशील झा के स्टेटस के बहाने सदन झा के खाली डिब्बे में बदलते साल की अनवरत कथा के बीच ‘ईमान’ नाम का एक पात्र दिखने लगा है।

मैं फिलहाल अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु के पात्र भिम्मल मामा को याद करने लगा हूं। वही भिम्मल मामा जिन्हें बार-बार दौरा पड़ता है लेकिन इसके बावजूद उनका ईमान नहीं डोलता है..। वहीं बावनदास भी याद आ रहे हैं, जिन्होंने केवल दो डग में इंसानियत को नाप लिया था।

 जे सुशील भाई का 2012 का स्टेटस इन्हीं बातों को याद दिलाता रहता है। सच पूछिए तो भरम से परे दुनिया को देखने की ख्वाहिशों को पालने की इच्छा बढ़ने लगी है। खैर, 2015 में आप उम्मीदों के धूप सेकते रहिए, खाली डिब्बे को भरते रहिए साथ ही ईमान को बचाए रखिए। आलू और मक्कका की खेती करते हुए मैं मुखौटा उतारना अब जान गया हूं। सच पूछिए  तो  अब शहरी मुखौटा  उतार चुका हूं । मैं अब रेणु की ही वाणी में चिल्ला कर कह सकता हूं - नए साल में 'मुखौटा' उतारकर ताजा हवा फेफड़ों में भरें ...। और हां, ईमान जरुर बचाए रखें :) 

नबका साल जिंदाबाद !

Monday, December 22, 2014

यह साल भी बीत कर विगत हो जाएगा

किसानी करते हुए, साल के जिस माह से मुझे सबसे अधिक लगाव होता है, वह दिसंबर ही है. इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है. लेकिन तभी अहसास होता है कि यह साल भी बीत कर विगत हो जाएगा- ठीक उसी तरह जैसे धरती मैया के आंचल मेँ न जाने कितनी सदियां ..कितने बरस दुबक कर छुपे बैठे हैँ।

फिर सोचता हूं तो लगता है कि हर किसी के जीवन के बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे, इन्हीं महीने के पल-पल को जोड़कर हम-आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं। किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान हर चार महीने में एक जीवन जीता है। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा।

 चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन्हीं चार महीने के सुख-दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते हैं। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीवन जीता है। इसके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल बोने के बाद किसान इस बात कि परवाह नहीं करता है कि फल अच्छा होगा या बुरा..वह सबकुछ मौसम के हवाले कर जीवन की अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है।

किसानी करते हुए जो अहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हूं। इस आशा के साथ कि किसानी को कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अभी-अभी विभूतिभूषण बंद्योपाद्याय की कृति ‘आरण्यक’ को एक बार फिर से पूरा किया है। बंगाल के एक बड़े जमींदार की हजारो एकड़ जमीन को रैयतो में बांटने के लिए एक मैनेजर पूर्णियां जिले के एक जंगली इलाके में दाखिल होता है। जिस कथा शिल्प का विभूति बाबू ने ‘आरण्यक’ में इस्तेमाल किया है, वह अभी भी मुझे मौजू दिख रहा है। पू्र्णिया जिला की किसानी अभी भी देश के अन्य इलाकों से साफ अलग है। इस अलग शब्द की व्याख्या शब्दों में बयां करना संभव नहीं है। इसे बस भोग कर समझा जा सकता है।

खैर, 2014 के अंतिम महीने में मेरे जैसा किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबा पड़ा है। इस आशा के साथ कि आने वाले नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया जाएगा लेकिन जीवन का गणित कई बार सोचकर भी अच्छा परिणाम नहीं देता है। बाबूजी बिस्तर पर सिमट गए हैं। बस यही सोचकर मेरी किसानी कथा ठहर सी जाती है। 

वैसे विगत छह -सात महीने में संबंधों के गणित को समझ चुका हूं इसलिए जीवन को लेकर नजरिया बदल चुका हूं। यह जान लेने का भरम पाल बैठा हूं कि पहाड़ियों के बीच बहती नदी पहाड़ी के लिए होती है, आम के पेड़ों में लगी मंजरियां आम के लिए होते हैं और गुलाब के पौधे पर उगे तीखे कांटे गुलाब के लिए होते हैं। यह लिखते हुए मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के आवारगी का एक साल याद आता है और मुखर्जीनगर इलाके का एक रेस्तरां, जहां एक शाम एक दोस्त से मुलाकात हुई थी, जिसने बड़े दार्शनिक अंदाज में कहा था- “जानते हो, लगातार गिरती और उठती पलकें आंखों के लिए होती है न कि दुनिया देखने के लिए....’” 

समय के गुजरने के साथ-साथ और किसानी करते हुए उस दोस्त का दर्शन थोड़ा बहुत समझने लगा हूं। किसानी करते हुए ही यह अहसास हुआ है कि हम लोग जिंदगी को लेकर इतने दार्शनिक अंदाज में बातें इसलिए करते हैं क्योंकि हम यह भरम पाल बैठते हैं कि हम जो जीवन जी रहे हैं वह आसान नहीं है। जबकि सत्य कुछ और है। दरअसल जीवन को जटिल हम खुद बनाते हैं, मकड़ी का जाल हम-आप ही उलझा रहे हैं। दिनकर की वह कविता याद आने लगी है, जिसमें वे कहते हैं- “आदमी भी क्या अनोखा जीव है, उलझने अपनी ही बनाकर, आप ही फंसता और बैचेन हो न जगता न सोता है .....”

इन सबके बीच ठंड का असर बढ़ता जा रहा है। सुबह देर तक कुहासे का असर दिखने लगा है। सबकुछ मेघ-मेघ–बादल-बादल सा लगने लगा है। बाबूजी यदि ठीक रहते तो कहते कि इस मौसम में आलू की किसानी करते वक्त सावधानी बरतनी चाहिए, फसल नष्ट होने की संभावना अधिक रहती है। किसानी करते हुए मुझे मेघ और मौसम से अजीब तरह का लगाव हो गया है। बादलों को समझने – बुझने लगा हूं। ब्रेन हैमरेज के बाद से बाबूजी को बिस्तर पर ही देख रहा हूं, शायद वो भी आंखें मूंदे खेत-खलिहान को ही देख रहे होंगे, ऐसा भरम मैं पाले बैठा हूं। इस आशा के साथ कि मेरा भरम टूटे नहीं....