Monday, September 26, 2016

धान के नाम पर ...


किसानी एक ऐसा पेशा है जिसकी कमान मौसम के हाथ है. यदि आप खेती को कंपनी की नज़र से देखेंगे तो आपको यह कहना होगा कि किसानी पेशे का सीईओ 'मौसम' ही है. आप खेत में लाख मेहनत कर लें, परिणाम मौसम के अनुसार ही होगा. इधर , पिछले कुछ दिनों से ख़ूब बारिश हो रही है. ऐसे में हम जैसे किसानी कर रहे लोग काफी परेशान हैं. दरअसल खेतों में धान की फ़सल है और इस बारिश की वजह से धान की बालियों को बहुत नुक़सान हो रहा है. हालांकि, हम यह जानते हैं कि यह सब प्रकृति के हाथ में है लेकिन जिस फ़सल को पिछले तीन महीने से हम पाल-पोस रहे थे उसे डूबते देखकर दुःख हो रहा है. ख़ैर, इन सबके बीच सब कुछ प्रकृति के हाथों सौंपकर आपका यह किसान धान शब्द से जुड़ी बातें खोजने में जुट गया है.

बाबूजी की पुरानी डायरी पलटते वक़्त पता चलता है कि पहले धान का नाम बहुत ही प्यारा हुआ करता था, मसलन 'पंकज' 'मनसुरी' , 'जया', 'चंदन', 'नाज़िर', 'पंझारी', 'बल्लम', 'रामदुलारी', 'पाखर', 'बिरनफूल' , 'सुज़ाता', 'कनकजीर' , 'कलमदान' , 'श्याम-जीर', 'विष्णुभोग' आदि. लेकिन नब्बे के दशक से अचानक ये नाम गुम हो गए और इनकी जगह बना हायब्रिड नस्ल के धान के बीज का बाज़ार जिसे अंकों में पहचाना जाने लगा, जैसे 1121 बासमती, 729, 1010 आदि. लेकिन जब मैं धान को लेकर जानकारी इकट्ठा करने लगा तो पता चला कि जापान की दो प्रमुख कम्पनियां होंडा और टोयोटा का अर्थ धान होता है. होंडा का मतलब मुख्य धान खेत और टोयोटा का मतलब बम्पर फसल वाला धान खेत. जापान में एक हवाई अड्डा है- नरीटा, इसका अर्थ है लहलहाता धान खेत. सच पूछिए तो एक किसान के तौर पर मुझे जापान पर नाज़ होने लगा है. एक मुल्क ने अपनी प्रमुख कम्पनियों, हवाई अड्डों आदि का नाम फ़सलों पर रख रहा है और एक हमलोग है जो धान के नाम को  बदलने में लगे हैं.  

गूगल करिएगा तो पता चलेगा कि दुनिया का 90 प्रतिशत धान एशिया में ही उगाया और खाया जाता है. धान के पौधे को हर तरह की जलवायु पसंद है. नेपाल और भूटान में 10 हजार फुट से ऊंचे पहाड़ हों या केरल में समुद्रतल से भी 10 फुट नीचे पाताल-धान दोनों जगह लहराते हैं. ऐसे में जापान ने धान और धान के खेतों की जो ब्रांडिंग की है इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए.

वैसे आपने कभी इस बात का पता लगाया है कि धान के नाम पर अपने देश में कोई कंपनी है या फिर कोई व्यावसायिक प्रतिष्ठान है? सारी लड़ाई अन्न को लेकर है. हम सभी अपनी ज़िंदगी सुख-चैन से जीने के लिए मेहनत करते हैं ताकि डाइनिंग टेबल पर हम भोजन कर सकें और दूसरों को भी खिला सकें लेकिन दूसरी ओर खेतों में लहलहाती फ़सलों के नाम पर क्या हम किसी कम्पनी का नाम नहीं रख सकते? या अपने घर का नाम हम धान- गेहूं- मक्का- गन्ना के उन्नत नस्लों के नाम पर नहीं रख सकते?

जापान में धान को प्रधानता दी जाती है. ऐसी बात नहीं है कि वहां अन्य फसलों की खेती नहीं होती है लेकिन यह बड़ी बात है कि वहां खेत का अर्थ धान के खेत से जुड़ा है. वहां धान की आराधना की बड़ी पुरानी परंपरा है. गूगल किया तो पता चला जापान के ग्रामीण इलाक़ों में धान-देवता इनारी का मंदिर होता ही है. जापान में एक और देवता हैं, जिनका नाम है- जीजो है. जीजो के पांव हमेशा कीचड़ में सने रहते हैं. कहते हैं कि एक बार जीजो का एक भक्त बीमार पड़ गया, भगवान अपने भक्तों का खूब ध्यान रखते थे. उसके खेत में जीजो देवता रात भर काम करते रहे तभी से उनके पांव कीचड़ में सने रहने लगे. इन कहानियों को पढ़कर अहसास होता है बाहर के मुल्कों में फसलों के कितना स्नेह देते हैं.

हम भी धान को कम स्नेह नहीं देते. हमारे यहां तो धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है. धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है. बौद्ध  साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध के पिता का नाम था- शुद्धोदन यानी शुद्ध चावल. वट वृक्ष के नीचे तप में लीन गौतम बुद्ध ने एक वन-कन्या सुजाता के हाथ से खीर खाने के बाद बोध प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए. इस कहानी को पढ़कर लगता है शायद इसी वजह से 70 के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाक़ों में एक पुरानी नस्ल की धान का नाम 'सुज़ाता' होगा. इस धान का चावल बहुत ही सुगन्धित हुआ करता था.

यह सब गूगल और गाम के लोगों के बातचीत के आधार पर लिख रहा हूं.  हमारे गांव के भोला ऋषि बताते हैं कि पहले हर कोई गांव में धान को लेकर गर्व करता था. हमारे यहां इस तरह का धान होता है तो हमारे यहां इतना सुंदर...तब लोग एक दूसरे को खेत और अनाज के ज़रिये भी जाना करते थे. भोला ने बातचीत में धीमे से बताया- हम सब वैसे रोज ही मोटा चावल खाते हैं लेकिन मेहमान को महीन चावल खिलाते हैं, एकदम कनकजीर! "

आज जापान के नाम से धान के जुड़े होने की जानकारी इकट्ठा करते हुए लगा कि हमारे पास भी धान को लेकर कितनी सारी कहानियां हैं, कितने प्यारे- प्यारे नाम हैं. काश, यहां भी कोई बड़ी कम्पनी धान के नाम पर खुलती! मंत्रालयों का नामकरण जब भी होता है तो जी करता है प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखूं कि मंत्रालय न सही लुटियंस ज़ोन स्थित मंत्रियों, सांसदों के कोठियों का नाम वे फ़सलों के सुंदर सुंदर प्रजातियों पर रख दें, आख़िर सरकार ही तो कहती है - 'भारत एक कृषि प्रधान देश है.'

(मूलत: एनडीटीवी ख़बर पर प्रकाशित
http://khabar.ndtv.com/news/blogs/girindranath-jhas-blog-theres-a-lot-in-the-name-of-paddy-1466473?pfrom=home-flicker


Sunday, September 25, 2016

पितृपक्ष, बारिश और बाबूजी

गाम में आज सुबह से बारिश ही बारिश। झमाझम बरखा में खेतों के बीच जाना हुआ। जहाँ पानी अधिक, वहाँ छै-छप-छै करती मछलियाँ :)

उधर, तेज़ हवा और बारिश की वजह से धान को नुक़सान हुआ है। इस बार बारिश का अन्दाज़ ख़तरनाक है। गाम घर के डाक वचनों के मुताबिक़ दशहरा के अंत तक बारिश का मौसम बना रहेगा। ऐसे  में  आलू की बुआई भी प्रभावित होगी।

गाम में आज दिन भर यह सब सुनते हुए बाबूजी बहुत याद आए। वे मौसम के गणित को डाक वचन के आधार पर हल किया करते थे और इसी आधार पर खेती भी करते थे। देखिए न इन दिनों पितृपक्ष भी चल रहा है। शास्त्रों के अनुसार इस दौरान हम अपने पितरों को याद करते हैं, उन्हें तर्पण अर्पित करते हैं।

बाबूजी हर दिन तर्पण करते थे, वे पुरखों को याद करते थे। शास्त्रीय - धार्मिक पद्धति के अलावा वे एक काम और किया करते थे, वह था अपने पूर्वजों के बारे में बच्चों को जानकारी देना। दादाजी की बातें वे बड़े नाटकीय अन्दाज़ में सुनाते थे। उसमें वे शिक्षा, व्यवहार के संग खेती- बाड़ी को जोड़ते थे।

पितृपक्ष की परंपरा को समझने- बूझने के दौरान आज बाबूजी की बहुत याद आ रही है। लगता है वे भी कहीं से बारिश में खेतों में टहल रहे हैं। हर दिन जब संघर्ष का दौर बढ़ता ही जा रहा है और सच पूछिए तो चुनौतियों से निपटने का साहस भी बढ़ता ही जा रहा है, ऐसे में लगता है कि बाबूजी ही मुझे साहस दे रहे हैं। अक्सर शाम में पूरब के खेत में घूमते हुए लगता है कि वे सफेद धोती और बाँह वाली कोठारी की गंजी में मेरे संग हैं।

धान की बालियाँ जब पानी में झुक गई है, तो मैं परेशान हो जाता हूं कि तभी लगता है वे कंधे पे हाथ रखकर कह रहे हों कि सब ठीक हो जाएगा। ऐसा हर वक़्त लगता है कि वे कुछ बताकर फिर निकल जाते हैं। दुःख बस इस बात का होता है कि  वे बताते भी नहीं हैं कि कहाँ निकल रहे हैं।

लोग पितृपक्ष में परंपराओं के आधार पर बहुत कुछ करते हैं, मैं कोई अपवाद नहीं। लेकिन मैं उन चीज़ों से मोहब्बत करने लगा हूं, जिसे बाबूजी पसंद किया करते थे। खेत, पेड़-पौधे, ढ़ेर सारी किताबें और उनकी काले रंग की राजदूत।

बाबूजी की पसंदीदा काले रंग की राजदूत को साफ़ कर रख दिया है, साइड स्टेण्ड में नहीं बल्कि मैन स्टेण्ड में। वे साइड स्टेण्ड में बाइक को देखकर टोक दिया करते थे और कहते थे : " हमेशा सीधा खड़े रहने की आदत सीखो, झुक जाओगे तो झुकते ही रहोगे..."

सच कहूं तो अब अपने भीतर, आस पास सबसे अधिक बाबूजी को महसूस करता हूं। पितृपक्ष में लोगबाग कुश-तिल और जल के साथ अपने पितरों को याद करते हैं। लेकिन मैं अपनी स्मृति से भी अपने पूर्वजों को याद करता हूं क्योंकि स्मृति की दूब हमेशा हरी होती है और इस मौसम में सुबह सुबह जब दूब पर ओस की बूँदें टिकी रहती है तो लगता है मानो दूब के सिर पे किसी ने मोती को सज़ा दिया है।

आज बाबूजी से जुड़ा सबकुछ याद आ रहा रहा है।दवा, बिछावन, व्हील चेयर, किताबों वाला आलमीरा...सबकुछ आँखों के सामने है लेकिन बाबूजी नहीं हैं।

इस बीच अखबारों, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल पर कितना कुछ छ्प रहा है लेकिन मैं किसे बताऊं? लिखते रहने का सम्मान मिला लेकिन उन्हें कुछ भी दिखा न सका। मैं पितृपक्ष में हर दिन सबकुछ उन्हें अर्पित करता हूं। वे मेरे लिए एक जज्बाती इंसान थे लेकिन यह भी सच है कि वे ऊपर से एक ठेठ-पिता थे। 



Thursday, September 15, 2016

हिन्दी दिवस : 'खिचड़ी' को 'चावल मिश्रित दाल' लिखने की क्या जरूरत...

उत्तर बिहार के अधिकांश इलाक़ों में पिछले कुछ दिनों से लगातार बारिश हो रही है, जिसका असर धान के खेतों में  दिखने लगा है. धान में बालियां आ गईं हैं और यही वक़्त होता है जब उसे पानी की सबसे ज्यादा ज़रूरत होती है. दोपहर बाद जब बारिश रुकी तो खेतों में लगी फ़सलों को देखने निकल पड़ा. रास्ते में गांव के सबसे मेहनती किसान राजेश से मुलाक़ात होती है. हाल-चाल के बाद राजेश जेब से मोबाइल निकालते हुए पूछता है - भाई जी, बारिश की वजह से मोबाइल का टावर ग़ायब हो गया है क्या? ज़रा देखिए तो, नेटवर्क सर्च करते हैं न तब नो सर्विस डिस्पले होने लगता है.


  • पहले तो मैंने तत्काल राजेश के सवालों का हल निकाल दिया फिर सोचने लगा कि कितनी आसानी से तकनीक ने आख़िर एक निरक्षर इंसान को साक्षर बना ही दिया. तकनीक ने उसे ऐसी हिन्दी और अंग्रेजी सिखा दी, जिसकी बदौलत वह बाज़ार की भाषा समझने लगा है. आप देखिए न एक ही वाक्य में राजेश ने किस तरह हिन्दी के संग अंग्रेज़ी के शब्दों को शामिल कर अपनी बात रख दी, वो भी आत्मविश्वास के साथ.  आज जब हर तरफ हिन्दी दिवस की बातें हो रही है तो ऐसे में आपका यह किसान जिसे खेत के संग क़लम -स्याही से भी मोहब्बत है, आपसे गांव- घर की बोली-बानी में हिन्दी के नए प्रयोगों पर बात करने बैठा है. मैं उन मसलों पर बात करना चाहता हूं जिसे आपलोगों ने अपने हिन्दी दिवस के साप्ताहिक कार्यक्रम के 'हिन्दी नेटवर्क' से बाहर कर दिया है.



गांव के विद्यालयों में 'मिड डे मील' का जो बोर्ड लगा रहता है, उसकी हिन्दी से आपको परिचित करवाने की इच्छा है. महानगरों में तो आप सभी बड़े बड़े बैनरों या फिर सरकारी दफ़्तरों के तथाकथित हिन्दी पखवाड़े से संबंधित वाक्यों में ग़लती तो खोजते ही हैं लेकिन मुझे यहां ' मिड डे मील' के स्थायी बोर्ड की हिन्दी रुला देती है. बस एक शब्द से ही आप मेरी बात समझ जाएंगे और वह शब्द है- 'चावल मिश्रित दाल'. अब ज़रा सोचिए इस शब्द के बारे में. मिड डे मील से जुड़ी एक शिक्षिका ने बताया की इस शब्द का अर्थ है : 'खिचड़ी'. मैं सोचने लगा आख़िर खिचड़ी लिखने में क्या दिक़्क़त है.


ख़ैर, सरकारी बोर्ड की भाषायी कहानी ज़्यादा न खिंचकर अब गाम-घर की बोली- बानी की बात सुनाता हूं. गांव की बोली में हिन्दी के सरलीकरण से उपजे एक शब्द की कहानी मेरे पास है. खेती की दुनिया में शामिल होने के दौरान जब कदंब के पौधे लगा रहा था तब गाम के विष्णुदेव काका ने पूछा- 'क्या गाम को बनभाग बनाने का इरादा है?' बाद में पता चला कि काका ने ' वन विभाग' के लिए नया शब्द खोजा है- 'बनभाग'. काका ने पहले तो जंगल को लेकर तंज कसा लेकिन इसके साथ उन्होंने जो बात कही, उसमें आपको हिन्दी की ख़ूबसूरती मिलेगी. काका ने कहा- 'बनभाग बसने के बाद गाम की शोभा बढ़ जाएगी मुन्ना.' सचमुच 'शोभा' शब्द जिसमें जुड़ जाए उस वाक्य की सुंदरता बढ़ ही जाती है.

मेरे प्रिय लेखक फणीश्वर नाथ रेणु का एक संस्मरण है, जिसमें उन्होंने बताया कि कैसे एक सरकारी अधिकारी को उनके गांव में एक नया शब्द मिला. तो होता यह है कि एक बार रेणु के गांव एक अधिकारी जीप से आते हैं. खेत में एक किसान को मड़ुआ (रागी) रोपते देख अधिकारी ने उससे पूछा- धान छोड़कर मड़ुआ क्यों रोपते हो? उस किसान का जवाब बड़ा मज़ेदार था, उसने कहा 'साहेब आपकी गाड़ी तो चार ही पहिए पर चलती है न! फिर यह पांचवां पहिया पीछे क्यों लगा है? जैसे आपका यह पांचवां पहिया वैसे ही हमारे लिए मड़ुआ! धान नहीं हुआ तो मड़ुआ तो होगा ही.' रेणु लिखते हैं कि उस अधिकारी ने तुरंत मड़ुआ के लिए एक नया शब्द इजाद कर दिया- ' स्टेपनी क्रॉप'. आज भी हमारे गांव में निरक्षर किसान भी आपसी बातचीत में इस अंग्रेज़ी शब्द का इस्तेमाल करता है.

कार्यालय वाली हिन्दी से इतर मेरे गांव में जो हिन्दी है उसमें अंग्रेज़ी भी देसज रंग में आपको मिल जाएगी. मैं इसके ख़िलाफ़ एकदम नहीं हूं. भाषा अपनी राह ख़ुद बना लेती है. मसलन जब गांव में किसी से अनबन होता है तो एक ही शब्द का इस्तेमाल होता है- 'कनटेस'.  जैसे इन दिनों इस्माइल चाचा का अकरम चाचा के साथ कनटेस ( कॉन्टेस्ट) चलता है, ऐसे में गोपाल किसका 'सपोट' (सपोर्ट) करेगा? जहां तक होगा इस्माइल चाचा का 'प्रोटेस' (प्रोटेस्ट) ही करेगा. दरअसल गांव के हर टोले में ऐसा एक आदमी ज़रूर होता है जो अपने समय  के अनुसार एक नया शब्द गढ़ लेता है.

हिन्दी की बातें करते हुए आपका यह किसान जाने किस मोड़ पर भटक गया पता भी नहीं चला. तो हिन्दी दिवस के मौके पर किसी गांव का कार्यक्रम बनाइए और यक़ीन मानिए जब लौटकर शहर आइएगा तो आपके पास मुस्कुराने के लिए ढ़ेर सारे शब्द और एक से बढ़कर एक कहानियां होंगी. लेकिन इसके लिए पहले आपको मुखौटा उतारना होगा. दरअसल, भागमभाग जिंदगी में हम सब मुखौटा लिये भागते रहते हैं. तो चलिए आप भी हमारे साथ गाम घर और वहां करते हैं अपने मन की, आज की हिन्दी की बात.



(इस लेख से जुड़े सर्वाधिकार NDTV के पास हैं। इस लेख के किसी भी हिस्से को NDTV की लिखित पूर्वानुमति के बिना प्रकाशित नहीं किया जा सकता। इस लेख या उसके किसी हिस्से को अनधिकृत तरीके से उद्धृत किए जाने पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।)

Thursday, September 08, 2016

शहाबुद्दीन-सीवान-तेज़ाब

माननीय मुख्यमंत्री जी

नमस्कार।

राष्ट्रीय जनता दल से जुड़े मो. शहाबुद्दीन के मसले पर आपको यह चिट्ठी लिख रहा हूं। शहाबुद्दीन, सीवान और तेजाब कांड, तीनों का नाम एक साथ सामने आते ही  जेहन में कई खौफनाक यादें ताजा हो उठती है।

मेरे बड़े भाई पुष्यमित्र लिखते हैं : "इसे स्वीकारने में कोई हर्ज नहीं कि हम लोग शहाबुद्दीन से डरते हैं।  उसके जेल से बाहर आने की खबर सुनकर डरते हैं, वह सीवान जेल में होता है तो सीवान के भले लोग डरते हैं। पत्रकार भी डरते हैं। राजवीर हत्या कांड को कौन भूल सकता है। लड़कों को तेजाब से नहला कर मारना कौन भूल सकता है। भले आप कामरेड चंद्रशेखर की हत्या की बात भूल जाये... हम नहीं भूल सकते। हम यहीं रहते हैं इसलिए शहाबुद्दीन के कानून के शिकंजे से बाहर निकलने की खबर से डरते हैं..."

मुख्यमंत्री जी, जैसा आपको पता ही होगा कि मो. शहाबुद्दीन को बुधवार को चर्चित तेजाब कांड से जुड़े एक मामले में हाईकोर्ट से जमानत मिल गई  इस जमानत ने उसके जेल से बाहर आने के दरवाजे खुल गए हैं। शहाबुद्दीन ने गुरुवार को भागलपुर के विशेष केंद्रीय कारा में बेल बांड भरा है और शुक्रवार को उसके रिहा होने की संभावना है।

मुख्यमंत्री जी, आप तो सबकुछ जानते हैं। आपने ही शहाबुद्दीन का भय हमलोगों के दिमाग़ से हटाया था लेकिन वह एक बार फिर बाहर आ रहा है।

नीतीश जी, जैसा कि आपको पता ही होगा 2004 में 16 अगस्त को अंजाम दिए गए दोहरे हत्याकांड में सीवान के एक व्यवसायी चंद्रकेश्वर उर्फ चंदा बाबू के दो बेटों सतीश राज (23) और गिरीश राज (18) को अपहरण के बाद तेजाब से नहला दिया गया था, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी।

इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह चंदा बाबू के सबसे बड़े बेटे राजीव रोशन (36) थे। मामले की सुनवाई के दौरान 16 जून, 2014 को राजीव की भी हत्या कर दी गई। इसके ठीक तीन दिन बाद राजीव को इस मामले में गवाही के लिए कोर्ट में हाजिर होना था। चंदा बाबू और उनकी पत्नी कलावती देवी अब अपने एकमात्र जीवित और विकलांग बेटे नीतीश (27) के सहारे अपनी बची हुई जिंदगी काट रहे हैं।


पिछले साल दिसंबर में ही सीवान की एक स्थानीय अदालत ने इस हत्याकांड में राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के अलावा तीन अन्य लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। नीतीश जी 'बिहार में बहार है' आपका नारा था, आपको हमने प्रचंड बहुमत देकर चुना।


तहलका पत्रिका में निराला भाई की रिपोर्ट में चंदा बाबू कहते हैं - "मेरे तीन बेटों की हत्या हुई, बेटों की हत्या का मुआवजा भी नहीं मिला। यह शिकायत है मेरी नीतीश कुमार से। खैर, अब क्या किसी से शिकायत. खुद से ही शिकायत है कि मैं कैसी किस्मत का आदमी हूं, जो शासन, व्यवस्था, कानून, खुद से… सबसे हार गया...."

वैसे यह तय है कि सरकार चंदा बाबू के मामले में शायद ही सुप्रीम कोर्ट जाये! लेकिन यदि बिहार सरकार सुप्रीम कोर्ट जाती है तो लोगों का सरकार पर विश्वास मज़बूत होगा।

ख़ैर, बांकी जो करना है आपको ही करना है। आशा है आप बिहार की जनता की   आवाज़ सुनेंगे। हम एक बार फिर आपसे गुज़ारिश करते हैं कि आप चंदा बाबू को न्याय दिलाने में सहायता करें।


आपका

गिरीन्द्र नाथ झा

ग्राम-चनका
पोस्ट - चनका
ज़िला-पूर्णिया

ठगने का नारा है- जय किसान!

जिस नारे से मुझे सबसे ज़्यादा चिढ़ है, वह है- 'जय जवान, जय किसान'।  दरअसल 'जवान और किसान ' को मुल्क में बड़ी मासूमियत से पेश किया जाता रहा है।  मानो ये दोनों नाम अपने भाग्य का रोना रोते हों और कोई बड़ी शक्ति आकर इन्हें सहारा देती हो और यह भरोसा देती हो: " सब ठीक हो जाएगा, आप सब यूँ ही खेत और सीमा पर लड़ते रहिए".  किसान और जवान आराम से ठग लिए जाते हैं। वे इस बात को लेकर बहस ही नहीं करना चाहते हैं कि उनकी जय जय आख़िर क्यों? जब वे मुश्किल में रहते हैं तो  फिर उनके नाम  का जयकारा क्यों?

पिछले तीन साल से खेत में समय व्यतीत करते हुए मैं यह अनुभव कर रहा हूं कि
आप सब किसान को केवल सब्सिडी और मुआवज़े के लिए रोते - बिलखते देखना पसंद करते हैं। दरअसल यह नज़रिया आपने आज नहीं बनाया बल्कि वर्षों पहले इसकी बुनियाद रखी गई थी।

आप सब किसानी कर रहे लोगों को भूमि अधिग्रहण के नाम सड़क जाम करते हुए देखते आए हैं। किसान को सूखा, बाढ़, आँधी और बिन मौसम बारिश के चपेट में सबकुछ लूटाते हुए एक बने-बनाए फ़्रेम में अबतक देखते आए हैं। लेकिन आपने कभी उससे यह सवाल नहीं पूछा कि जब आप अपनी ज़मीन किसी बिल्डर या कम्पनी को बेच देते हो तब मिलने वाले पैसे से बचे खेत में उन्नत तरीक़े से खेती क्यों नहीं करते हो? बच्चों की शिक्षा में निवेश क्यों नहीं करते हो? केवल एसयूवी में निवेश क्यों? आख़िर बड़े जोत वाले किसान भी किसानी छोड़कर महानगर का रूख क्यों कर रहे हैं? या यह सवाल क्यों नहीं पूछा जा रहा कि वे खेती की ज़मीन बेचकर फ़्लैट क्यों ख़रीद रहे हैं।

वहीं दूसरी ओर किसानी को लेकर एक और नज़रिया है। आप सोचिए जब कोई किसान ख़ुश दिखता है, मौसम की मार सहने के बाद भी अपनी रोज़ी रोटी चला रहा होता है, खेत में नए प्रयोग कर रहा होता है और किसानी समाज को रोजगार भी  दे रहा होता है...तो ऐसी बातें सुनकर आपके चेहरे का भाव ऐसा क्यों बन जाता है मानो किसी दूसरे ग्रह का प्राणी खेत में आ गया हो! आख़िर किसान ख़ुश क्यों है? यह बात जब कई लोग सुनते हैं तो परेशान हो जाते हैं।

बात यह है कि हम सबलोगों को किसानों को लेकर अपना नज़रिया बदलना होगा। इस समाज को सब्सिडी- मुआवज़े के राग से छुटकारा दिलाना होगा। आख़िर हम कबतक ख़ुद ही अपने पेशे को कोसते रहेंगे? कबतक अपने बच्चों को खेती से दूर रहने की सलाह देते रहेंगे? नज़रिए को लेकर जितनी ग़लती आपकी है उतनी हम किसानी कर रहे लोगों की भी है।

गुज़रे इन तीन साल में मेरी मुलाक़ात गिनती के ऐसे किसानों से हुई है जो यह न कहता हो कि 'मैं ऋण में हूं' हम सब बिना मेहनत किए पैसे उठाकर खेती करते हैं और फिर बैंक को लौटाने के वक़्त फ़सल बर्बाद होने का रोना रोने लगते हैं। ऐसे में जय किसान का नारा पॉलिटिकल हो जाता है और चुनावी गणित के गुणा भाग में किसान सबसे मासूम निशाना बन जाता है।

पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा-लोकसभा चुनाव तक आपने कभी सुना है कि किसानों के लिए यह कहा गया हो कि आप शानदार फ़सल उपजाएँ, सरकार हाथों-हाथ ख़रीद लेगी? नहीं सुना होगा आपने। आपने सुना होगा- बोरिंग के लिए अनुदान मिलेगा, डीज़ल अनुदान, किसान क्रेडिट कार्ड, मनरेगा के तहत मिट्टी ढोते रहिए, रोज़गार मिलता रहेगा... आदि-आदि। जबकि सच यह है कि ऐसे वादे सुनकर हम किसानी कर रहे लोग और आलसी होते जा रहे हैं।

ज़रा सोचिए, बीड़ी-तम्बाकू आदि के लिए तो हमारे पास पैसा है लेकिन पाँच से दस रूपए के कदंब के पौधे के लिए हम सरकार पर निर्भर हैं! आख़िर क्यों? बाग़वानी के लिए भी हमको ऋण चाहिए, हम इतना ऋणी क्यों होना चाहते हैं? यही वजह है कि मुझे जय किसान के नारे से चिढ़ है। मुझे तो महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी योजना से भी चिढ़ है। खेत के बदले हम सड़क पर मिट्टी बिछाने लगे हैं। जिसके पास किसानी की समझ है वह भी मज़दूर बनता जा रहा है।

ऋण में डूबने के बजाए हम किसानों को आत्मनिर्भर बनने दीजिए। हमें और मेहनत करने दीजिए।  किसानी में हो रहे नए शोध कार्य से परिचित करवाइए। यदि हम नया कर रहे हैं तो हमारी तारीफ़ करिए, ग़लती करें तो आलोचना करिए लेकिन ऋण में डूबने की सलाह मत दीजिए। नहीं तो वह भी वक़्त आएगा जब आप गाँव में सरकारी ख़र्च से शौचालय तो बनवा देंगे लेकिन उसके उपयोग के लिए आपको हमें अनुदान देना होगा।

इंटरनेट की देहाती दुनिया!

बीच दोपहर में फेसबुक मैसेज बॉक्स में एक संदेश गिरता है, " मैं संतोष, पहचाना क्या? " मैंने बिना लाग-लपेट के ‘नहीं’ लिख दिया लेकिन मुझसे रहा न गया और तत्काल संतोष  नाम के इस फ़ेसबुकिया मेहमान के एकांउट को खँगालने लगा। फिर पता चलता है कि यह तो संतोष विश्वास है अपने गांव का। संतोष लुधियाना के समीप एक गाँव में किसी बड़े किसान के यहाँ काम करता है। वह दस साल की उम्र में ही गाँव से निकल गया था। उसने स्कूली पढ़ाई नहीं की है। ऐसे में जब देवनागरी में उसका संदेश पढ़ने  को मिला तो मैं सोचने लगा कि मोबाईल  कितना कुछ नया कर रहा है। इस वेब संसार  ने स्मार्टफ़ोन के ज़रिए दूरियों को पाटने की ख़ूब कोशिश की है।

सच कहूं तो मुझे इंटरनेट की बहुयामी दुनिया का सबसे रोचक अध्याय मोबाइल लगता है। दरअसल अब गाँव-घर में भी बड़ी संख्या में लोग मोबाइल के जरिए इंटरनेट की दुनिया में रमे हुए हैं। कम मूल्य के स्मार्टफ़ोन  ने सारी दूरियाँ पाट दी है।

यदि आप गाँव के समीप के बाज़ारों से गुज़रेंगे तो मोबाईल सेवा देने वाली कम्पनियों  के बड़े बड़े होर्डिंग देखेंगे। ये होर्डिंग सारी कहानी बता देती है। मोबाईल रिचार्ज के दुकान पर इंटरनेट प्लान का पोस्टर चस्पा मिलता है। युवा वर्ग 2 जी, 3 जी की माला जपते दिख जाएँगे।

ग्रामीण इलाक़ों को इंटरनेट-मोबाइलमय बनता देख  मन ख़ुश होता है लेकिन इन सबके साथ इंटरनेट के जाल को भी समझने की जरुरत है। मेरे संतोष की कहानी ‘मोबाइल-इंटरनेट संगम’ से ही शुरु होती है। वह मोबाइल पर प्रयोग किए जाने वाले ब्राउजरों से वाकिफ है। उसे पता है कि गूगल क्रोम के अपग्रेडेड वर्जन से मोबाइल पर काफी तेजी से ब्राउज किया जा सकता है। पंजाब में रहते हुए इसी अंदाज में वह धान के उन्नत बीजों के बारे में भी मुझे बताने लगता है। उसे व्हाटसअप की महिमा के बारे में भी पता है।

इस निरक्षर युवक को ‘मोबाइल-इंटरनेट संगम’ ने दौड़ती-भागती आगे बढ़ती दुनिया से दो हाथ करना सीखाया है। अक्षर ज्ञान उसे मोबाईल  ने ही सिखाया। इसका मतलब यह हुआ कि मोबाईल ही उसका गुरू है।

पिछले महीने पूर्णिया से 30 किलोमीटर दूर एक गांव जाना हुआ, भगैत सुनने। भगैत के मूलगैन (मूलगायक) अवधबिहारी जी की आवाज के जादू ने मन को मोह लिया, अफसोस मैं रिकार्ड नहीं कर सका। जाते वक्त मैंने अवधबिहारी जी से कहा कि क्या आपकी कोई तस्वीर मिल सकती है? उनका जवाब मुझे काफी रोचक लगा।

अवधबिहारी जी की उम्र 60 के आसपास होगी। गठीला बदन, स्वस्थ और तेजर्रार। उन्हें देखकर मुझे अपने बढ़े वजन और निकले पेट पर शर्म आ रही थी। उन्होंने मैथिली में कहा- "अहां क मोबाइल में व्हाटसअप अछि कि? हमर मोबाइल से अहां क मोबाइल में फोटू पहुंच जाएत। हमर पोता क अबै छै इ सब। " (आपके मोबाईल में व्हाटसअप है? मेरे मोबाईल से आपके मोबाईल में फ़ोटो चला जाएगा। मेरे पोते को यह सब करने आता है। )

मुझे अभी भी अवधबिहार जी का कहने का अंदाज याद है। मोबाईल और इंटरनेट ने लोगों के भीतर विश्वास भी पैदा किया है। फ़िलहाल यह सब लिखते हुए मुझे
मैला आंचल में रेडियो का प्रसंग याद आ रहा है। रेडियो का प्रसंग उस मेरीगंज की कहानी है जहां विज्ञान,संचार और तकनीक में भी किंवदंतियां और लोककथाएं जगह पा लेती है। विज्ञान आधारित वस्तुएं यहीं आकर अभिशाप के बजाय समाज का एक जीता-जागता चरित्र बनने लग जाता है और हमारा उससे खास किस्म का लगाव भी। देखिए न मोबाईल को इंटरनेट से जोड़कर जब भी कुछ लिखता हूं तो मन करता है कि यदि रेणु होते तो उनसे विनती करता, " बाबा, मोबाइल युग का मैला आंचल लिखिए न !"

Monday, August 15, 2016

धन्यवाद रेल मंत्री जी

अबतक मैं रेल मंत्री  (@sureshpprabhu )के ट्विटर पर सक्रिय होने की बात सुनता आया था। ख़बरों में पढ़ता था। इससे पहले एक ट्रेन के लगातार देर से चलने के सम्बंध में दो बार मैंने भी शिकायत भी की थी ट्विटर के ज़रिए लेकिन कोई जवाब नहीं आया था और मैं निराश हो गया।

लेकिन 14 अगस्त को रेल मंत्रालय के आधिकारिक ट्विटर हेंडल ने जिस तरह से मेरी शिकायत पर तत्काल कार्यवाही की उससे मेरा उनके ट्विटर हेंडल पर भरोसा बढ़ा है।

बात यह हुई कि मैं गाड़ी संख्या 12506 नॉर्थ ईस्ट एक्सप्रेस से आनंद विहार दिल्ली से कटिहार लौट रहा था। हम एसी थ्री के बी-3 कोच में यात्रा कर रहे थे। रात  दस बजे के क़रीब मुग़लसराय जंक्शन से पहले मैंने देखा कि हमारे कोच का अटेंडेंट कुछ लोगों के साथ शराब पी रहा है। इसके बाद नशे में वह कोच में घूम घूमकर यात्रियों को तंग करने लगा। मना करने पर भी वह सुन नहीं रहा था।

मैंने अन्य यात्रियों से कहा कि हम सब मिलकर शिकायत करते हैं लेकिन कई यात्रियों ने कहा कि नार्थ ईस्ट ट्रेन में यह आम बात है। यहाँ सभी शराब पीते हैं।

इसके बाद मैंने तुरंत रेल मंत्री सुरेश प्रभु के ट्विटर हेंडल को मेंशन कर अपनी बात रखी। मैंने लिखा कि जब अटेंडेंट ही शराब पी रहा तो क्या हम सुरक्षित यात्रा कर रहे हैं?'

पाँच मिनट के भीतर ही ट्विटर के ज़रिए मुझसे संपर्क किया गया और पीएनआर के आधार पर शिकायत नंबर तैयार किया गया और उसके बाद तुरंत रेलवे सुरक्षा बल के एक अधिकारी दो जवान के साथ मेरे पास आए और तुरंत अटेंडेंट को बुलाया और पूछताछ शुरू कर दी। तब रात के साढ़े दस बज रहे थे।

इसके बाद अन्य सभी कोच में भी रेलवे के सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया। मेरा मानना है कि यदि इस प्रकार रेल मंत्रालय सक्रिय रहता है तो यह अच्छी ख़बर है। मैं रेल में यात्रा करने वालों से कहना चाहूँगा कि वे सफ़ाई और अन्य असुविधा के सम्बंध में लगातार शिकायत करें।

शुक्रिया रेल मंत्रालय।