Friday, March 08, 2013

परती-परिकथा- कथा अनंता


अंचल में रच-बस जाने के बाद आपका कथावाचक ग्राम्य- कथाओं के तार सुलझाने में लग गया है। कथा भी ऐसी, जो कभी खत्म ही न हो- परती-परिकथा-कथा अनंता….!

तो चलिए आज हम आपको अंचल की कथा में डुबकी लगवाते हैं। गाम के सबसे दक्षिण में मुसहर टोला है, जिसे सब मुसहरी कहते हैं। गाम में जो भी सबसे मेहनत वाला काम होता है न, वो इसी टोले के लोगों के हिस्से आता है।

खैर, सामाजिक ताने-बाने से कोसों दूर आज कथावाचक आपको इस
टोले के संगीत से रूबरू करना चाहेगा। आज पलटन ऋषिदेव के बेटी की शादी है। शादी-ब्याह का कार्यक्रम सांझ में है और भोर से दुपहरिया तक भगैत का कार्यक्रम। अंचल में भगैत की उपस्थति ठीक वैसे ही जैसे जीवन में प्रेम।

भगैत के दौरान मूलगैन (मुख्य-गायक) का आलाप कथावाचक को सबसे अधिक खींचता है। इस दौरान मुसहरी के नौजवानों की आंखों को पढ़ना भी जरुरी लगा। लोकप्रिय संगीत-गीत के दौर में भगैत की उपस्थिति से आप टोले के मन को समझ सकते हैं । इन नौजवानों के मन में अभी भी भगैत का स्थान सर्वोपरि है। इन लोगों की आंखों को देखकर कथावाचक को कबीर की वाणी याद आ गई-
अनुभव गावै सो गीता

भगैत के ठीक बाद नाच का कार्यक्रम है। शायद एक-आध घंटे के लिए। कोसी में कभी विदापत नाच हुआ करता था, जिसमें ढोलक की थाप और विकटा का पात्र इसी टोले का गबरु जवान हुआ करता था लेकिन वक्त के संग बहुत सारी चीजें बदलती है और इसी बदलाव की कड़ी में अंचल की सांस्कृतिक अध्याय में भी बदलाव दिखने लगा। लेकिन मुसहरी में विदापत नाच का कुछ अंश अभी भी जीवित है।

विद्यापति के राधा-कृष्ण के श्रृंगारिक गीतों को प्रस्तुत किया जाने वाला यह विदापत नाच कोसी की पौराणिक परंपरा की मिशाल है। 1960 में आकाशवाणी पटना द्वारा इसकी रिकार्डिग के लिये एक मंडली की स्थापना की गई थी, जिसके लिए कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु ने पहल की थी।

अब देखिए न, य़े सब लिखते हुए कथावाचक को ठिठर मंडल की याद आने लगी है।
 लोगबाग कहते हैं कि कोसी के इलाकों में विदापत नाच में हमेशा से कृष्णा की भूमिका निभाने वाले ठिठर का जलवा मंच पर देखते ही बनता था। 75 वर्ष की उम्र में भी मंच पर कृष्ण की भूमिका में उतरकर वे बांसुरी बजाते थे। अफसोस साल 2010 के फरवरी में ठिठर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

खैर, पलटन ऋषि के यहां विद्यापत नाच आधे घंटे ही चला लेकिन  इस दौरान ढोल-मृदंग-झाल की आवाजें कथावाचक को अपनी ओर खींचने लगी थी। अंचल की माया उसे अपने में लपेट चुकी थी। एक ओर विदापत नाच का संगीत उसे खींच रहा था वहीं दूसरी ओर कभी दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज में स्पीक मैके के सौजन्य से आयोजित एक कार्यक्रम में बनारस के पंडित छन्नू लाल मिश्रा की आवाज आज उसके कान में गूंज रही थी- माया महाठगिनी हम जानी ..निरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी.....

ठीक उसी पल मन के रास्ते पंडित कुमार गंधर्व की भी आवाज कानों में गूंज रही थी-
भक्तन के भक्ति व्है बैठी, ब्रह्मा के बह्मानी…..कहै कबीर सुनो भाई साधो, वह सब अकथ कहानी

खैर इन सबके संग कथा भी चलती रहेगी, ठीक जीवन की तरह। कभी कभी लगता है क्या कोई कथा सचमुच में संपूर्ण हो पाती है? यह सवाल मायावी है, ज्ञानी-विद्वत जन इस पर राय देंगे। फिलहाल गाम से इतना ही, यह कहते हुए कि चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस...

Monday, March 04, 2013

खेती-बाड़ी, कलम-स्याही और रेणु


फणीश्वर नाथ रेणु ...मेरे लिए यह नाम ही कथा है। ऐसी कथा, जिसमें न जाने कितनी कहानियां एक संग चलती है और मेरा मैं उन कहानियों में अंचल की उपजाउ जमीन खोजने लगता है।

पूर्णिया और अब अररिया जिले के औराही हिंगना गांव में आज के ही दिन यानि 4 मार्च 1921 में रेणु का जन्म हुआ था। । मेरे लिए रेणु तन्मयता से किसानी करने वाले लेखक हैं, क्योंकि वे साहित्य में खेती-बाड़ी, फसल, किसानी, गांव-देहात की बातें करते हैं।

फारबिसगंज में उनके एक व्यवसायी मित्र हुआ करते थे- बिरजू बाबू। बिरजू बाबू को लिखे एक पत्र में रेणु कहते हैं-
गांव-घर, खेत खलिहान अभी बेपानी हो रहा है। मड़ुआ का आंव एक रुपया सात आना किलो, तीस रुपये मन पाट ..खेत में पानी नहीं..नहरी इलाका होने के बावजूद हम सभी इंद्र महाराज के आसरे बैठे हैं। पता नहीं क्या होगा ? “

रेणु की यह चिट्ठी पढ़कर लगता है कि वे कथा की तरह किसानी किया करते होंगे। एक किसान जो शिल्पी भी हो..मिस्त्री भी हो ..शायद ऐसे ही थे रेणु। एक चिट्ठी में रेणु लिखते हैं- मैं उन्हें नहीं समझा सकूंगा कि शिल्पी और मिस्त्री में क्या फर्क होता है। हर शिल्पी की तरह मेरी भी जिज्ञासाएं हैं।   “

रेणु को पढ़ते हुए ही मेरे भीतर किसानी-जीवन की ललक पैदा हुई। उन्हें पढ़ते हुए कभी कभी लगता है कि वे खेत देखकर लिखा करते थे।
डायरी के दो पृष्ठ का ही यह पारा देखिए- पिछले पंद्रह – बीस वर्षों से हमारे इलाके उत्तर बिहार के कोसी कवलित अंचल में एक नई जिंदगी आ रही है। हरियाली फैल रही है..फैलती जा रही है बालूचरों पर। बंजर धूसर पर रोज रोज हरे पीले और धानी रंग मोटे ब्रश से पोते जा रहे हैं।

अभी –अभी आलू की खेती करने के बाद और अब खेत में मक्का के लहराते फसल उगाने के बाद जब मैं रेणु का लिखा  
डायरी के दो पृष्ठपढ़ता हूं तो लगता है कि वे धान के बीज की तरह शब्द का इस्तेमाल करते थे। नहीं तो भला कौन धान, गेंहू और मक्के की खेती के लिए यह लिख पाएगा- बंजर धूसर पर रोज रोज हरे पीले और धानी रंग मोटे ब्रश से पोते जा रहे हैं।


रेणु की एक कविता है- मेरा मीत सनीचर
! मुझे यह काफी पसंद है। इसमें एक जगह वे कहते हैं- गांव छोड़कर चले गए हो शहर, मगर अब भी तुम सचमुच गंवई हो..शहरी तो नहीं हुए हो... गाम को लेकर रेणु का यही अनुराग हमें गंवई बना देता है।

रेणु का लिखा खूब पढ़ते हुए हम गांव को, खेत-खलिहान को ...लोक-गीतों को ..चिड़ियां-पंछी को, गाछ-वृक्ष को जीवन के सबसे सुंदर क्षण की तरह महसूस करने लगते हैं। ऐसा लगता है कि इन सभी में कथा है। परती-परिकथा-कथा-अनंता।

अपने गाम के कबिराहा मठ पर जब भी जाना होता है तब मुझे केवल और केवल रेणु ही याद आते हैं। उनका एक स्केच
अपने-अपने त्रिलोचन आंखों के सामने नाचने लगता है, जिसमें वे एक जगह कहते हैं- कई बार चाहा कि त्रिलोचन से पूछूं – आप कभी पूर्णिया जिला की ओर किसी भी हैसियत से किसी कबिराहा मठ पर गए हैं ?  किंतु पूछकर इस भरम को दूर करना नहीं चाहता। इसे पाले रहना चाहता हूं..।

आज रेणु के गाम-घर..खेती-बाड़ी पर लिखते हुए मैं भी भरम को दूर करना नहीं चाहूंगा, मैं भी खेत-खलिहान में रेणु को ..उनके पात्रों को ..उनके शब्दों को खुद में समेटे रखना चाहूंगा। मक्का के खेत में पहाड़ी चिड़ियों के प्रवेश पर रोक लगाने के लिए हंडी को काले रंग से पोतकर हमने जब खेत में खड़ा किया तो सबसे पहले रेणु ही याद आए। मैं इस भरम को दूर करना नहीं चाहूंगा कि रेणु खेत-खलिहान में व्याप्त हैं।

अंखफोड़वा कीड़े की तरह
भन-भन करता हुआ मक्का के खेत में उड़ना चाहूंगा  और खेत को संगीत की दुनिया  दिखाना चाहूंगा। देखिए न इस कीड़े पर रेणु ने कितना कुछ लिख दिया है। वे कहते हैं- एक कीड़ा होता है- अंखफोड़वा, जो केवल उड़ते वक्त बोलता है-भन-भन-भन। क्या कारण है कि वह बैठकर नहीं बोल पाता? सूक्ष्म पर्यवेक्षण से ज्ञात होगा कि यह आवाज उड़ने में चलते हुए उसके पंखों की है। सूक्ष्मता से देखना और पहचानना साहित्यकार का कर्तव्य है। परिवेश से ऐसे ही सूक्ष्म लगाव का संबंध साहित्य से अपेक्षित है

दरअसल वे कम शब्दों  अपनी पूरी जीवन स्थिति..मन की बात ..छटपटाहट, तनाव आदि कुशलता से रख देते हैं। यही कला उन्हें महान कथा शिल्पी बना देता है। रेणु का गाम-घर आज भी उनकी किसानी को जी रहा है, मुस्कुराते हुए।

अब चलते-चलते रेणु के जन्मदिन पर उनकी एक कविता- पार्कर
51 को पढ़िए। दरअसल उनके पास पार्कर 51 कलम थी, जिससे उन्होंने अपनी अधिकांश रचनाएं लिखी। 1946 में उन्होंने इस कलम पर एक कवित्त की रचना की थी-

गोल्ड क्लिप गोल्ड कैप सुंदर-सुघड़ शेष
कवियों की कल्पना में जिसकी रसाई है।
रुप है अनूप, शोभा का ही है स्वरुप यह,
देव जिसे पा न सके, सबके मन भायी है।
मानो तुम, जानो तुम इसकी गुणावली,
वेद पुरातन ने बहुबार गायी है।
भूषण भनत शिवराज वीर तेरे पास,
फिफ्टी वन पहले पहल अब आयी है।

 मूलत: जानकीपुल में प्रकाशित

Saturday, March 02, 2013

संवेदनाओं का पुल- - सरिता शर्मा

मोहन राणा  विदेश में बसे उन हिन्दी लेखकों में हैं, जो प्रचलित वादों और विवादों से दूर रहकर चुपचाप अपने लेखन में जुटे हुए हैंउनकी सोच सर्वथा मौलिक है और अपनी जीवनदृष्टि को व्यक्त करने के लिए नए बिम्बों के इस्तेमाल से अपने अलग मुहावरे गढ़ते है.
अब तक उनके सात कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उन्हों
ने ‘सबद’ ब्लॉग में आत्मकथ्य में अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बहुत ईमानदारी से लिखा है, लेखक कविता और शब्द संरचना के बीच कार्बन पेपर की तरह है, जो हम छपा देखते-पढ़ते हैं वह दरअसल एक अनुभव का अनुवाद है जिसमें एक सच्चाई को उकेरा गया है.
 
कविता दो बार किसी भाषा में अनुवादित होती है. पहली बार जब उसे शब्दाकार दिया जाता है दूसरी बार जब उसे पढ़ा और सुना जाता है. कविता अकथनीय सच का अंर्तबोध है और प्रेम का दिशा सूचक, भय मुक्त जीवन को जीने का रास्ता है. हर शब्द इस रास्ते पर एक कदम है. और हर कदम एक रास्ता है.’


 कवि-आलोचक नंदकिशोर आचार्य के अनुसार मोहन राणा की कविता अपने उल्लेखनीय वैशिष्टय के कारण अलग से पहचानी जाती रही है क्योंकि उसे किसी खाते में खतियाना संभव नहीं लगता. यह कविता यदि किसी विचारात्मक खाँचे में नहीं अँटती तो इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि मोहन राणा की कविता विचार से परहेज करती है बल्कि वह यह जानती है कि कविता में विचार करने और कविता के विचार करने में क्या फर्क है. मोहन राणा के लिए काव्य रचना की प्रक्रिया अपने आपमें एक स्वायत्त विचार प्रक्रिया भी है.’
  
    रेत का पुल मोहन राणा का सातवाँ कविता संग्रह है जिसमें 80 कविताएँ हैं. कवितायेँ -रेत का पुल और तीसरा पहर इन दो खण्डों में विभाजित हैं .ये कविताएं अपने समय का प्रतिनिधित्व करती हैं . मोहन राणा सार्वभौमिक कवि हैं   जो यूरोप के भिन्न देशों में भ्रमण करते हुए हर जगह अपने अतीत को तलाश करते है.

 इन कविताओं में स्वयं को
पहचानने और समझने की लगातार कोशिश दिखाई देती है और ये विस्थापन से जन्मे अकेलेपन को दर्शाती हैं. कवि का खुद से संवाद चलता रहता है. इनमें जीवन के सूक्ष्म अनुभव महसूस किये जा सकते हैं. बाज़ार संस्कृति की शक्तियों के विरुद्ध उनकी सोच कविता में उभरकर आती है.


 पीछे रह गयी मातृभूमि रह- रह कर पुकारती है- उत्प्रवासी' कविता में- महाद्वीप एक से दूसरे तक ले जाते अपनी भाषा/ दुनिया और किसी अज्ञात के बीच एक घर साथ/ ले जाते आम और पीपल का गीत/ ले जाते कोई ग्रीष्म कोई दोपहर'. स्वाभाविक चुप्पी और आसपास के माहौल से सम्प्रेषण न कर पाने की व्यथा को प्रकट किया गया है.
अनबीता अतीत हमेशा साथ रहता है
. उनकी कविताओं में स्मृतियों की भी एक अहम भूमिका है. परसों का नाश्ता आज कविता में स्ट्रीम ऑफ कॉन्शियसनेस दिखाई देती है असावधान वर्तमान में हमेशा अतीत ही उपस्थित. रात कविता में स्मृतियाँ इस तरह आती हैं- 'फुसफुसाती वन देवी, पलकें बंद कर लो और जागो/ एक अँधेरे में जिसमें गुम हैं स्मृतियाँ/ कि उसे जीते हुए याद नहीं रहता कुछ देखकर भी वहां'.देवी,साती रेक्ष्य में देखते हैं.
      
 मोहन राणा की इन कविताओं में मानव और प्रकृति के अनंत रहस्यों में से गुजरते हुए हम भटकन,  तकलीफ और संघर्ष से रूबरू होते हैं.  उनकी कविता प्रकृति की रमणीयता में भी हमें आकर्षित करती  हैं- जैसे पनकौआ कविता में छोटा होता जा रहा वसंत हर साल/ छोटा हो रहा है हर साल वसंत में.  
इसी तरह एक और कविता 
पानी का रंग से बानगी है कि ना यह गरमी का मौसम /ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन/ कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ’ और –मुटरी’ कविता में दिसंबर की सुबह जमे पाले में प्रकट हुई/बाहर कुहासे में ठिठुरता हुआ सन्नाटा. 
एमिली ब्रोंटे ने वुदरिंग हाइट्स में खिड़कियों
, दरवाजों और मौसम के बिम्बों का इस्तेमाल पात्रों की मनोस्थिति को उजागर करने के लिए किया है. मोहन राणा की कविताओं में खिड़की लगातार नजर आती है जिससे वे अतीत में और सुदूर झांकते रह्ते हैं- बंद कर दूँगा उसकी खिड़की पर गुलेल मारना.  पाठ कविता में 'कई खिड़कियाँ हैं इस घर में एक बाहर एक भीतर. नक्शानवीस में - समय के अंतराल में/ इन आतंकित गलियों में/ मैं देखता नहीं किसी खिड़की की ओर/ रूकता नहीं किसी दरवाजे के सामने'. 'दरवेश सिफ़त' में खिड़की निरर्थक समय का बोध कराती है.यहाँ कुछ स्थिति ही ऐसी हमारे इस मकान में खिड़कियाँ बहुत/ बाहर सब दिखता लगभग हर दिशा/ पर सवाल अक्सर होता कि कुछ दिखे मतलब का तो. दूर खिडकी पास दिल्ली में-  भाग रहा हूँ पर दूरियाँ बढ़ती चली जाती हैं'. खिड़कियाँ एकांत को और भी अधिक भयावह बनाती हैं-क्या करूँ इस दृश्य का/ हर दिशा में/ मैं ही हूँ मैं’’.
प्रवासी व्यक्ति होता है उसकी लिखी कविता नहीं, अपने निबंध - 'कवि और समय' में मारीना तस्वेतायेवा ने एक जगह लिखा - ' हर कवि अनिवार्य रूप से एक उत्प्रवासी है . मोहन राणा ब्रिटेन में हिंदी उत्प्रवासी कवि हैं. भीतर और बाहर के भूगोल के लगातार भ्रमण से उपजी तकलीफ से व्याप्त  उनकी कवितायेँ ग्लोबल दुनिया में जीवन-मूल्यों की तलाश करती हुई स्वप्नशीलता में ले जाती हैं. इनमें मन के मौसम के साथ- साथ बाहरी दुनिया की गतिविधियों को ध्यान में रखा गया है - बदलती हुई सीमाओँ के भूगोल में/मेरा भय ही मेरे साथ है'.
ग्लोबल होने के बावजूद मोहन राणा अपनी जड़ों से पूर्णतः असम्पृक्त नहीं हुए हैं
. 'अपना एक देस कविता में कवि देशवासियों द्वारा उसे भुला दिए जाने से आहत है. 'लोगों ने वहाँ बस याद किया भूलना ही/ था ना अपना एक देस बुलाया नहीं फिर. भारत में चल रही उथल- पुथल पर उनकी पकड़ बनी हुई है. अन्ना के आन्दोलन को वह विश्व के अन्य भागों में हुई क्रांतियों के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं. 'भरम अनेक कविता में वह कहते हैं -'अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं मिर्च की पिचकारी आँखों में/ और थप्पड़ किसी नेता कोबुरे वक्त की निशानी कहते हैं बुजुर्ग चश्मे को ठीक करते/ इन दांतों में अब दाने नहीं चबते हवा में मुक्के भांजते/ प्रतिरोध की आँखों में मिर्च की पिचकारी मारता जॉन पाइक/ जैसे छिड़कता हो/ गाफिल कोई नाशक दवा खरपतवार पर/ पालथी बैठे छात्रों के धीरज पर. 
  मोहन राणा  ने कबीर को बदले सन्दर्भों में इन्टरप्रेट किया है. टी. एस. एलियट की तरह उद्धरणों को अपने ढंग से आज के समय से जोड़ दिया गया है जैसे 'कबीरा कुँआ एक पानी भरे अनेक/ सबको नहीं मिलता पानी फिर भी/ मिलता भरम अनेक और 'भाखा महाठगिनी हम जानी. इन कविताओं में प्रेम सघन है मगर अपूर्णता और कसक भी बार- बार मुखरित होती है. – 'कभी लगता शायद दो ही मौसम हों अब से/ दो जैसे अच्छा बुरा/ सुख दुख/ प्रेम और भय/ तुम और मैं. प्रेम जीवन की संजीवनी है- 'जरूरी सामान की पर्चियों के साथ अकेले/ जीने के लिए केवल सांस ही नहीं / प्रेम की आँच मन के सायों में / हाथ जो गिरते हुए थाम लेता.
प्रेम की स्मृतियाँ उसे जिन्दा रखती हैं-
'पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो/ तुम एक खामोश पहचान/ जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश/ तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में/ समय नहीं चाहता था कि मैं तुम्हें पहचान लूँ फिर से/ जैसे देखा था पहली बार खुद को भूल कर. 
 इन कविताओं में जीवनगान मुखर है.
'पनकौआ में कटु हकीकत जानते हुए भी कवि आशावान है -'पेड़ों पर कोंपले आएँगी/ बची हुई चिड़ियाएँ लौटेंगी दूर पास से/ आशा बनी है ऐलान ना होगा खबरों में/ किसी नई लड़ाई का. कवि के मन में कविता के प्रति गहरा विश्वास है –'कुछ दिन पहले कविता में यथार्थ की बात/ सोचते बोलते और कुछ दिन बीते रोवन का पेड़ हो गया दिसंबर और- 'कवितायेँ हवा की बनी पानी में पिघल गयी/ कागज गल के बनेंगे खाद पत्तों के साथ. विचलित कर देने वाले दौर में कवियों की तटस्थता चिंताजनक है. '
इस तेज आंधी में नहीं दीखता नारों की ढलानों पर असभ्य शाहों के विरुद्ध कोई बोलता/
खटकती है आम सहमति कि/ कवियों के सरोकार जनपद में कविता की अनुपस्थिति. 'शोकगीतकविता में भी यही दर्द उभरता है'आतंक के गलियारों में विलुप्त हैं शोकगीत इस बार/ चुप क्यों हैं शोकगीतों के कवि. हिंदी कवियों की माली हालत खबर होने को लेकर भी कवि चिंतित है. 'अपीलकविता में –'विनती है ईश्वर हिंदी का कवि कभी बूढा ना हो अस्वस्थ ना हो/ उसे मांग ना करनी पड़े इलाज के पैसे के लिए/ रहने के लिए एक घर के लिए बच्चों की पढाई के लिए.
 इन कविताओं में एकांत और उत्प्रवास की पीड़ा की मौलिक शिल्प में गहन अभिव्यक्ति है . यहाँ स्थितियों पर तात्कालिक प्रतिक्रिया मात्र नहीं है. पहले कवि उन्हें आत्मसात करता है, फिर तटस्थता से विचार करने बाद उन्हें शब्दों में ढाला जाता है.

 ये कवितायें पढ़कर महसूस होता है
 मानो कवि शाश्वत सत्य की तलाश में निरंतर यात्रा पर हो. वास्तव में इस कविता संकलन को एक उत्प्रवासी की संवेदनाओं का पुल कहा जा सकता है जिसके आर- पार कवि स्मृतियों में विचरण करता रहता है.

पुल के एक छोर पर पीछे छूट गया भारत है और दूसरे छोर पर इंग्लैंड का वह शहर है जहाँ वह एकांतवास करता है.
इस संग्रह की कविताओं में कला और कथ्य  में परिपक्वता है. कुछ कवितायेँ अत्यधिक अमूर्त होने से दुरूह लगती हैं और कहीं- कहीं अकेलेपन की स्थिति में एकालाप अभिव्यंजना पर अधिक हावी हो जाता है. मगर समग्रता में यह कविता संकलन आज की कविता में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

Saturday, October 06, 2012

उठो सखी री माँग संवारो...


लंबे अंतराल के बाद कथावाचक ने कुछ लिखने की ठानी है। अक्टूबर के जिस महीने में अंचल की सुबह शीत की बूंदों से शुरु होती थी, वहां अभी भी गरमी जारी है। हालांकि बादल डेरा जमाए हुए है, किसानी करने वाले उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देखकर आशावान हो जाते हैं लेकिन भला आशा से पेट कहां भरने वाला ! उसके लिए तो बखारी में अन्न चाहिए।

खैर, लिखना इधर छूट सा गया है। कुछ दिनों से कथावाचक कागज-कलम- की-बोर्ड के बदले जमीन पर फसल और गाछ-वृक्ष के जरिए कथा बांचने की जुगत में लगा है। वह भी बादलों को निहारता रहता है। वहीं जब वक्त मिलता है तो ईंट-गिट्टी और सिमेंट के जरिए आशियाने को नई ऊंचाई देने लगता है। ऐसे में लिखावट आराम फरमाने लगता है, जो असल में ठीक नहीं है।

लेकिन कथावाचक जीवन के अलग रंगों में से कुछ चटखदार रंगों की तलाश में है। बरसों से जिस भूमि पर हक की  लड़ाई लड़ी जा रही थी, बस वहीं से कथावाचक ने अंचल का आलाप शुरु किया, ऐसे में की-बोर्ड पर खिटिर-पिटिर पर अल्पविराम लगाना उसे लाजमी जान पड़ा।

खैर, अब कथा की शुरुआत करते हैं। अब देखिए न, अंचल में जिस भूमि को कथावाचक जोतने चला है, वही भूमि उससे किताबी हिसाब पूछ रही है।

यह हिसाब जमीन के मालिकाना हक को लेकर है, यह हिसाब जमीन के ढेर सारे टुकड़ों को लेकर है, यह हिसाब उस जमीन को लेकर भी है जिसपर वह पांव जमाने के लिए घर बनाना चाहता है। ऐसे में उसे कबीर वाणी की याद आती है- उठो सखी री मांग संवारो, दुल्हा मो से रुठल हो !

दरअसल अंचल में कभी-कभी जमीन रूठ जाती है, ऐसे में उसे मनाने के लिए जमीन को जोतने वाला गीत गाने लगता है, इस आशा के साथ कि कहीं जमीन हंस दे। तो कोई ग्राम्य देवता की पूजा शुरु कर देता है। इन सबके बीच अंचल का लोकगीत कथावाचक के कान तक पहुंचता रहता है। वह कबीराहा मठ की ओर निकलता है। बस वहीं उसे कबीर वाणी की याद आ रही है जिसमें वे रूठने की बात करते हैं और फिर चहूं दिस धूं-धूं की बात चल पड़ती है।

जमीन को लेकर कथावाचक के अंचल में विवाद बरसों से चलता आया है। जमीनी विवाद भी यहां परिवारिक सौगात में मिलता है, इस सौगात पर हक जताना होता है। कथावाचक के मन में जब कभी इस सौगात का ख्याल आता है तो उसे ठीक उसी पल आनंद चक्रवर्ती का वह आलेख याद आता है, जिसका शीर्षक ही विवाद से शुरु होता है-
“The Unfinished struggle of Santhal Bataidars in Purnea District “

जमीनी विवादों के बीच कथावाचक को कोसी के इस पार से उस पार तक की यात्रा को लेकर भी कथा बांचना है लेकिन कथा इतनी आसान कब हुई है। कथाकार को तो इतिहासकार होना होता है लेकिन कमबख्त कथावाचक के नसीब में यह सुख कहां
!  फिर भी कथावाचक ने कथा बांचने की ठानी है, देखिए क्या हो पाता है..बात कहां तक बन पाती है।

अभी तो कथावाचक अपनी ही कथा में फंसा है और आत्मालाप की रट लगाए हुए है, वक्त बलवान होता है..देखिए वह किस करवट बैठता है। अभी के लिए बस इतना ही।