Monday, January 20, 2020

शहरनामाः पूर्णिया जो पहले 'पूरैनिया' था ! -1

कभी आपने सोचा है कि कोई एक वृक्ष जो आपके घर के आसपास है, उसका आपके परिवार से क्या रिश्ता है? जरा सोचिएगा. जिस पेड़ को आपके दादाजी-दादीजी, नानाजी-नानी या उनके भी मां-पिता ने लगाया होगा, उस वृक्ष ने आपके परिवार के न जाने कितने पड़ाव को देखा होगा, उस पेड़ से क्या आपने कभी गुफ्तगू की है? अब जब हम अंधाधुंध पेड़ कटाई के पैरवीकार हो चुके हैं, ऐसे वक्त में उन बुजुर्ग पेड़ के बारे में सोचिएगा. उन पोखर, कुएं के बारे में भी सोचने की आवश्यकता है जो हमारे गाम-घर, शहर के चौक-चौराहों का पता हुआ करती थी. 

यह सब अब हमारे स्मृति का हिस्सा है लेकिन अभी भी जहां कहीं वृक्ष-तालाब हैं, उसे संभालने का वक्त आ गया है. 

हम जिस शहर से ताल्लुक रखते हैं उसका नाम पूर्णिया है. कहते हैं कभी यहां जंगल हुआ करता था मतलब पूर्ण-अरण्य. दूर दूर तक केवल पेड़ ही पेड़. शहर के मध्य सौरा नदी बहा करती थी, वहीं शहर के सीमांत से कारी कोसी. धीरे-धीरे नदी सिमटती चली गई और वृक्ष को हमने गायब कर दिया. 

1809-1810 में फ्रांसिस बुकानन ने खूब मेहनत कर एन एकाउंट ऑफ द डिस्ट्रिक्ट ऑफ पूर्णिया लिखा, इसे पढ़ते हुए लगता है कि यह इलाका सचमुच में पूर्ण अरण्य था. यहां लोगबाग खूब वृक्षारोपण किया करते थे. 

बुकानन लिखते हैं, “पूर्णिया के लोगबाग वृक्षारोपण को धार्मिक कार्य समझते हैं. वे अपने घर के आसपास पेड़ को जगह देते हैं." बुकानन और फिर एक और अंग्रेज ऑफिसर ओ मैली का लिखा पूर्णिया रिपोर्ट बताता है कि यह इलाका पानी और जंगल से भरा था. अब जब वक्त बदल चुका है, विकास ने कई रास्ते खोल दिए हैं, ऐसे में वृक्ष और पानी से मोहब्बत करना हम सबने छोड़ दिया है. लेकिन अब चेत जाने का समय आ गया है. आप अपने आने वाली पीढ़ी के लिए क्या 

कभी आपने सोचा है कि कोई एक वृक्ष जो आपके घर के आसपास है, उसका आपके परिवार से क्या रिश्ता है? जरा सोचिएगा. जिस पेड़ को आपके दादाजी-दादीजी, नानाजी-नानी या उनके भी मां-पिता ने लगाया होगा, उस वृक्ष ने आपके परिवार के न जाने कितने पड़ाव को देखा होगा, उस पेड़ से क्या आपने कभी गुफ्तगू की है? अब जब हम अंधाधुंध पेड़ कटाई के पैरवीकार हो चुके हैं, ऐसे वक्त में उन बुजुर्ग पेड़ के बारे में सोचिएगा. उन पोखर, कुएं के बारे में भी सोचने की आवश्यकता है जो हमारे गाम-घर, शहर के चौक-चौराहों का पता हुआ करती थी. 

यह सब अब हमारे स्मृति का हिस्सा है लेकिन अभी भी जहां कहीं वृक्ष-तालाब हैं, उसे संभालने का वक्त आ गया है. 

हम जिस शहर से ताल्लुक रखते हैं उसका नाम पूर्णिया है. कहते हैं कभी यहां जंगल हुआ करता था मतलब पूर्ण-अरण्य. दूर दूर तक केवल पेड़ ही पेड़. शहर के मध्य सौरा नदी बहा करती थी, वहीं शहर के सीमांत से कारी कोसी. धीरे-धीरे नदी सिमटती चली गई और वृक्ष को हमने गायब कर दिया. 

1809-1810 में फ्रांसिस बुकानन ने खूब मेहनत कर एन एकाउंट ऑफ द डिस्ट्रिक्ट ऑफ पूर्णिया लिखा, इसे पढ़ते हुए लगता है कि यह इलाका सचमुच में पूर्ण अरण्य था. यहां लोगबाग खूब वृक्षारोपण किया करते थे. 

बुकानन लिखते हैं, “पूर्णिया के लोगबाग वृक्षारोपण को धार्मिक कार्य समझते हैं. वे अपने घर के आसपास पेड़ को जगह देते हैं." बुकानन और फिर एक और अंग्रेज ऑफिसर ओ मैली का लिखा पूर्णिया रिपोर्ट बताता है कि यह इलाका पानी और जंगल से भरा था. अब जब वक्त बदल चुका है, विकास ने कई रास्ते खोल दिए हैं, ऐसे में वृक्ष और पानी से मोहब्बत करना हम सबने छोड़ दिया है. लेकिन अब चेत जाने का समय आ गया है. आप अपने आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं, इस पर बहस होनी चाहिए.

विभूतिभूषण वंध्योपाध्याय का एक उपन्यास है- ‘आरण्यक’. इसे पढ़ते हुए हम पूर्णिया को पूरैनिया के रुप में देखने लगते हैं. 

वृक्ष के बहाने पूर्णिया की कथा इसलिए भी हमें सुनानी चाहिए क्योंकि देश के पुराने जिले में एक पूर्णिया भी है. फरवरी, 2020 में पूर्णिया को जिला बने 250 साल हो जाएगा, ऐसे में पुराने पूर्णिया की दास्तानगोई बहुत ही जरूरी है. 

देश के अन्य हिस्से के लोग इस इलाके के बारे में जानें जिसके बारे में फणीश्वर नाथ रेणु कहते थे- “आवरण देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैया रहे चदरवा तान...." उस पूर्णिया को हम जानें जहां वृक्ष की पूजा आज भी हर गांव में होती है, उस पूर्णिया को लोग महसूस करें जहां की माटी ने यूरोपियन लोगों को भी किसान बना दिया.

बंगाल की नजदीकी ने इसे सांस्कृतिक तौर पर समृद्ध किया, आज भी यह शहर अपने बांग्ला भाषी मोहल्ला दुर्गाबाड़ी पर गर्व करता है. हम हर दुर्गा पूजा वहां कोलकाता को महसूस करते हैं, रबिन्द्र संगीत सुनते हैं ‘आन्दोलोके मंगलालोके…’ सुनते हैं. इसी मोहल्ले में बांग्ला के साहित्य के बड़े नाम सतीनाथ भादुड़ी का घर है, हालांकि उनका घर बिक चुका है लेकिन मोहल्ले की सड़क भादुड़ी जी के नाम से है.  

इस शहर को, इस अंचल को नए सिरे से नहीं बल्कि इसके पुराने तार के सहारे समझने बूझने की जरुरत है. 

हम इस उम्मीद में हैं कि 2020 में पर्यावरण के मुद्दे पर हम जागरुक होंगे और वृक्ष से मोहब्बत करना सीखेंगे. यहां की उस संस्कृति को समझने की जरुरत है जहां घर-घर में पेड़-पौधे को लेकर कहावतें हुआ करती थी- घर के आगू मैना पात, पाछू केला गाछ ( घर के आगे मैना पौधा और पीछे केला का पौधा रहना चाहिए.) 

कोई जिला 250 साल का होने जा रहा है तो इसका एक अर्थ यह भी है कि पूर्णिया के पास ढेर सारे अनुभव होंगे ठीक घर के उस बुजुर्ग की तरह जिसने सबकुछ आंखों के सामने बदलते देखा है. ऐसे में पूर्णिया को अपनी कहानी सुनानी होगी, अपने उस दर्द को बयां करना होगा जब 1934 में आए भूकंप में सबकुछ तबाह हो गया था लेकिन पूर्णिया फिर से उठ खड़ा हुआ.

पूर्णिया को अपने गांधी सर्किट की कथा बांचनी होगी. महात्मा गांधी 1925, 1927 और 1934 में पूर्णिया आते हैं. यहां 13 अक्टूबर 1925 में बापू की पूर्णिया के एक गांव की यात्रा का जिक्र जरूरी है. बापू पूर्णिया शहर से 25 मील दूर एक गांव विष्णुपुर पहुंचते हैं, एक पुस्तकालय का उद्घाटन करने. वहां उन्हें सुनने के लिए हजारों लोग जमा थे. गांधी ने वहां लोगों को संबोधित किया. शाम में वे एक पुस्तकालय पहुंचते हैं, जिसका नाम मातृ मंदिर था. गांधी जी ने इस पुस्तकालय का उद्घाटन किया. चौधरी लालचंद जी ने अपनी पत्नी की स्मृति में इस पुस्तकालय की स्थापना की थी. 

गांधी जी ने पुस्तकालय के बाहर महिलाओं के एक समूह को संबोधित किया था. शहर से दूर देहात में पुस्तकालय और बापू का पहुंचना ही पूर्णिया परिचय है.



Wednesday, January 08, 2020

बात रूपसपुर खगहा की

गाँव की दुनिया में गांधी को देखना इस दौर में  एक स्वप्न ही है। बड़ी तेज रफ्तार में सबकुछ बदल रहा है। गांधी का ग्राम स्वराज उस रफ्तार में कहां है, इस पर बात होनी चाहिए। तमाम तरह की नकारात्मक घटनाओं के बीच जब गांव में कुछ बदलाव दिखता है, ऐसे में महसूस होता है कि उम्मीद हमें करनी ही चाहिए एक बेहतर कल के लिए। 

इस दौर में बिहार के पूर्णिया जिला के एक गांव की एक खबर साझा करने जा रहा हूँ जहां गांधी जी का सपना साकार होता दिख रहा है। पूर्णिया जिला के धमदाहा प्रखंड के रूपसपुर खगहा गाँव बापू के ग्राम स्वराज का मॉडल बनता दिख रहा है। 
गांधीजी का सपना था कि “प्रत्येक गांव को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए, अपने गांव कि जरूरत की चीजें गांव में ही पैदा करनी चाहिए। विशेष परिस्थिति में ही आवश्यक चीजें बाहर से मंगाई जाये। हर गांव अपने पैसे से पाठशाला, सभा-भवन या धर्मशालाएँ बनाए। संभव हो तो कारीगर उसी गांव के हों। गांव के प्रत्येक व्यक्ति को स्वच्छ अनाज, स्वच्छ पानी और स्वच्छ मकान मिले इसका ध्यान रखना होगा। नयी तालीम की योजना के अनुसार बुनियादी शिक्षा प्रत्येक बालक के लिए अनिवार्य होनी चाहिए। प्रत्येक प्रवृति सहकारी ढंग से चलाने चाहिए गांव के लोग सार्वजनिक काम को हाथ में लें और वही गांव कि कार्यपालिका और विधायिका का काम करे।”

'सम्पूर्ण गांधी वाङ्गमय' में इस बात को पढ़ते हुए हमें गर्व होता है कि देश के पुराने जिले में एक पूर्णिया में हमने गांधी के सपने को साकार होते देखा है। यहां एक ही परिसर में पंचायत सरकार भवन, स्कूल, आंगनबाड़ी, अस्पताल, पशु चिकित्सालय, पुस्तकालय, पैक्स और जलाशय मौजूद हैं। पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार ने 'गांधी के गाँव' का सपना साकार कर दिखा दिया।

रूपसपुर खगहा के पंचायत परिसर को हमने बदलते देखा है, आंखों के सामने। एक सुंदर-स्वच्छ जलाशय के चारों तरफ सरकारी भवन को देखकर मन के भीतर कबीर की वाणी गूंज उठती है- ' कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर..'

सूबे के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 7 जनवरी 2020 को इस परिसर में अपने जल जीवन हरियाली यात्रा के दौरान पहुंचे थे। उन्हें भी हम इस परिसर को निहारते देखे, यह पूर्णिया के लिए बड़ी बात है। पूर्णिया के जिलाधिकारी की मेहनत रंग दिखाने लगी है। सूबे के मुखिया संग उनकी तस्वीर देखकर लगा कि गांधी का सपना एक जगह तो साकार हो गया है।

साल 2020 पूर्णिया के लिए कई मायने में महत्वपूर्ण है। इस साल यह जिला 250 साल का हो जाएगा, ऐसे में साल की शुरुआत में गांधी के ग्राम स्वराज का रूप रूपसपुर खगहा पंचायत परिसर में देखना, एक सपने का हकीकत होना ही है। छह जनवरी की सर्द रात इस परिसर में टहलते हुए बापू की यह बात याद आ रही थी - " अगर हिंदुस्‍तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्‍वीर की सच्‍चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी।”

गाँधी जी मानते थे कि जब पंचायत राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती।

रूपसपुर खगहा पंचायत परिसर को बार बार देखना चाहिए ताकि हम बेहतर कल की उम्मीद करते रहें। पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार जब पूछते हैं कि गांधी जी का सपना साकार हुआ न ? तो सचमुच अपने 250 साल पुराने 'पूरैनिया' पर गर्व होने लगता है। राहुल कुमार की मेहनत देखकर अकबर इलाहाबादी की पंक्ति याद आ जाती है-

"कहीँ नाउम्मीदी ने बिजली गिराई
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है.."

दरसअल बापू कहते हैं कि “हमारी सभ्यता का सार तत्व यही है कि हम अपने सार्वजनिक या निजी, सभी कामों में नैतिकता को सर्वोपरि माने। वे कहते थे कि “यदि भारत को विनाश से बचाना है तो सीढ़ी के सबसे निचले भाग से काम शुरू करना होगा। यदि निचला भाग सड़ा हुआ है तो ऊपर और बीच के हिस्सों पर किया गया काम अंत में गिर पड़ेगा।”  गांधी एक समर्थ-स्वावलंबी गाँव की कल्पना करते हैं। इसी स्वावलंबी गांवों के जरिये हिंदुस्तान की गरीबी-बेकारी और विषमता जैसे सवाल हल हो सकते हैं। गांधी की ग्राम दृष्टि की उपेक्षा का परिणाम देश भुगत रहा है। ऐसी परिस्थिति में गांधी की ग्राम-दृष्टि पर सतत चिंतन-मंथन की आवश्यकता है। 

रूपसपुर खगहा को बहुत कुछ मिला है, अब उसके सामने चुनौती है कि वह गांधी के ग्राम स्वराज के इस आदर्श परिसर की हरियाली- स्वच्छता को बचाकर रखे ताकि हम पूर्णिया के लोग इस परिसर पर गर्व करते रहें।

और चलते-चलते इसी पंचायत परिसर के  लक्ष्मीनारायण सुधांशु पुस्तकालय की बात। इस पुस्तकालय को बहुत ही सुंदर ढंग से सजाया सँवारा गया है, उसे इस रूप में बचाकर रखने की भी आवश्यकता है, जो गांव के लोग ही करेंगे। पुस्तकालय की दीवार पर उदय प्रकाश की यह पंक्ति उकेरी गई है-

" आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता।
आदमी
मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता।
कुछ नहीं सोचने
और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी
मर जाता है।"

Saturday, January 04, 2020

उम्मीद 2020

साल का पहला दिन हर कोई हंसते-खेलते बिताने की हर संभव कोशिश करता है। चनका रेसीडेंसी की भी साल की शुरुआत उम्दा रही। पहली जनवरी को रेसीडेंसी परिसर में चहल-पहल का माहौल दिन भर रहा। दरअसल पूर्णिया स्थित भोला पासवान शास्त्री कृषि महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं का एक समूह चनका रेसीडेंसी पहुंचा था। 

ये सभी दिन भर ग्रामीण परिवेश में वक्त गुजारने आए थे, ये सभी गाछ-वृक्ष और फूल -पत्तियों को जानने-समझने आए थे। हम सब जो खेती-किसानी जुड़े हैं, उनके लिए खेत-खलिहान जीने का एक माध्यम है, वहीं जो कृषि विज्ञान की पढाई करते हैं वे खेत-खलिहान में उग आए जीवन का बॉयोलोजिकल नाम ढूंढने में जुट जाते हैं, गाछ को एक डॉक्टर की नजर से देखते हैं। बीमारी को खोजते हैं, उसका उपचार बताते हैं।

महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं से मिलकर हमारे भीतर भी उत्साह का संचार हुआ। वे सभी डबल क्रॉप सिस्टम को समझने में लगे थे। कदंब के जंगल के बीच मक्का की खेती का गणित समझने में लगे थे। किसानी में आ रही समस्या पर वे बातचीत कर रहे थे, मछली पालन की बारिकियों पर वे बात रहे थे। इन छात्र-छात्राओं के साथ कॉलेज के तीन शिक्षक भी आए थे – डॉ रवि केशरी, डॉ सुदय प्रसाद और मणिभूषण जी। 

बात पर्यावरण पर होने लगी और यहीं से हम सभी के चेहरे पर गंभीर भाव उभर कर सामने आने लगे। जल संकट से लेकर वृक्षों की अंधाधुंध कटाई और वृक्षारोपण को लेकर जागरुकता का अभाव। दरअसल किसानी में आ रही समस्याओं की जड़ में यही सब है।
छात्र-छात्राओं के समूह में बिहार से बाहर के भी लोग थे। केरल, तेलंगाना, बंगाल के छात्र-छात्राओं से जब बात हो रही थी तो पता चला कि भू-जल संकट अब हर राज्य में किसानों के सामने है। जब इन लोगों से बातें हो रही थी तो हमने डॉक्टर फ्रांसिस बुकानन का जिक्र किया। बुकानन ने 1809-1810 में पूर्णिया का व्यापक और विस्तृत सर्वेक्षण किया था। उस वक्त पूर्णिया का विस्तार दार्जिलिंग, नेपाल, भागलपुर और कोसी की सीमाओं तक था। बुकानन ने संपूर्ण क्षेत्र का भ्रमण टमटम, इक्का, पालकी, हाथी और पैदल तय किया था। उसने यहां की भू-संपदा, सामाजिक जीवन, व्यापार, कृषि, वन्य जीव जंतु एवं कई अन्य क्षेत्रों से संबंधित आंकड़े एकत्रित किए। इंडिया ऑफिस लंदन में ये सभी आंक़डे उपलब्ध है। बुकानन पेशे से चिकित्सक थे। मेरे मन में बुकानन इसलिए आए क्योंकि पिछले 200 साल में पूर्णिया अंचल कितना बदल चुका है, इस पर बुकानन के माध्यम से ही बात कर सकते हैं और कृषि विज्ञान की पढ़ाई कर रहे बच्चों को उनके बारे में बताना चाहिए।

बुकानन की पूर्णिया रिपोर्ट का यहां उल्लेख इसलिए भी जरुरी है क्योंकि पूर्णिया जो पहले पूर्ण अरण्य था वहां अब जंगल न के बराबर हैं और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों जल जीवन हरियाली की बात कर रहे हैं, वे लोगों को पोखर बचाने, पौधा रोपण जैसे मुद्दों पर जागरुक कर रहे हैं। वे इन दिनों हरियाली यात्रा पर भी निकले हैं और आगामी 7 जनवरी को पूर्णिया आ रहे हैं, ऐसे बुकानन की पूर्णिया रिपोर्ट के एक पन्ने का जिक्र यहां कर रहा हूं, जिसमें 1800 और उससे पहले के पूर्णिया जिले के लोगबाग का जिक्र है। बुकानन लिखते हैं- पूर्णिया के बासिंदे वृक्षारोपण को धार्मिक कार्य समझते हैं। वे खेत में भी पौधा रोपण करते हैं और घर के आसपास भी....

साल के पहले दिन कॉलेज के इस युवा समूह के साथ इन सब मुद्दों पर बातचीत करते हुए महसूस हुआ कि संवाद बहुत ही जरुरी चीज है। यह दौर संवाद स्थापित करने का है। दरअसल संवाद के माध्यम से हम एक दूसरे को समझने लगते हैं। इन छात्र-छात्राओं ने पर्यावरण को लेकर लोगों को जागरुक करने के उदेश्य से स्लोगन भी लिखने का काम किया। कृषि विज्ञान की पढ़ाई में जुटे इन बच्चों से मिलकर अच्छा लगा, एक उम्मीद जगी कि यदि इस तरह के लोगबाग की गांव में आवाजाही होती है तो किसानी समाज को बबहुत कुछ नया सीखने को मिलेगा क्योंकि ऐसे लोगों के लिए खेत एक प्रयोगशाला है।

Friday, December 27, 2019

यादें...

झिंगुर की 'झीं-झीं' और गिरगिट की 'ठीक-ठीक' आवाज़ को भीतर में छुपाए यह गाम की रात है। दिसंबर गुज़रने को बेताब है कोहरा कम है लेकिन ठंड बढ़ गयी है। 

आसपास की चुप्पी के बीच मन के अंधेरे में झाँकता हूं तो सुनता हूं एक आवाज़ -  "पापी कौन बड़ो जग मौसे, सब पतितन में नामी..." । सच यही है कि भीतर की यह आवाज़ मन को धो देती है। 

गाम का बूढ़ा मोती हर मुलाक़ात में पूछता था, "सूरदास को पढ़ें हैं ?"  उसका सवाल विचलित कर देता था। रात की बातें करते हुए देखिए न सूरदास आ गए मन में। मोती के ज़रिए सूरदास दाख़िल हो गये। याद नहीं लेकिन किसी ने सुनाया था- “साधुता वहां बसती है , जहां जूता गांठते हैं रैदास और चादर बुनते हैं कबीर ।”

मकान के चारों ओर खेत में मक्का के नन्हें पौधे हैं। सफ़ेद लिफ़ाफ़े की तरह  कोहरे ने मक्का के नवजात पौधों को अपने भीतर छुपा लिया है। 

रात के अंधेरे में खेत किसी नर्तकी की तरह दिखने लगती है। बचपन में सलेमपुर वाली दादी इन्हीं खेतों की कहानी सुनाती थी। कथा की शुरुआत में कोई रानी आती थी पायल में और खेत में ख़ूब नाचती थी। मेरी यादों की पोटली से अक्सर सलेमपुर वाली निकल आती है। उस बूढ़िया ने बाबूजी को गोदी में ख़ूब खिलाया था और बाद में मुझे भी। गाम की रात में वह बहुत याद आती है। जीवन के प्रपंचों  के बीच जो कथा चलती है उसमें ऐसे चरित्रों को सहेज कर रखता हूं। काश ! बैंक में ऐसी स्मृतियों के लिए भी लॉकर होता ! 

किसी पूर्णिमा की रात मैं निकल पड़ता हूं पश्चिम के खेत। वहाँ एक पुराना पेड़ है पलाश का। साल के उन दिनों जब वह फूल से लदा होता है, उसे निहारता हूं। उस फूल में आग की लपट दिखती है, शायद सुंदरता में 'जलना' इसी को कहते हैं। बग़ल में एक बड़ा  सा पोखर है। उसमें चाँद की परछाई निहारता हूं। 

रंग में सफ़ेद और आसमानी ही पसंद है। सब कहते हैं कि उमर से पहले बूढ़े हो चले हो !! लेकिन कैसे बताऊँ सफ़ेद रंग ही मेरे लिए बाबूजी हैं। बाबूजी की सफ़ेद धोती और कुर्ता मेरे मन के लॉकर में सुरक्षित है। मैं इस रंग में उन्हें ढूँढता हूं। जब पहली बार लिखकर पैसा कमाया था तो उनके लिए सफ़ेद रंग  का एक गमछा और शॉल लाया था। बाबूजी ने उस शॉल को संभाल कर रखा, उनकी आलमारी में आज भी है। 

आज की रात ऐसी ही कई यादें बारिश की बौछार की तरह भिंगा रही है। घास-फूस का एक बड़ा सा घर था इस अहाते में, मैंने बाबूजी को वहीं पाया था। माँ का भंसा घर और मिट्टी का एक चूल्हिया और दो चूल्हिया ! सब याद आ रहा है। दीदी सबका कमरा, जहाँ लकड़ी की आलमारी थी और माटी  का रेख। हर चार साल पर उस फूस  के घर का घास (खर) बदला जाता था। 

हम यादों में क्या-क्या खोजने लगते हैं ! अभी वह लकड़ी का बड़ा सा हैंगर याद  आ रहा है, जिसमें पित्तल का सुनहरा हूक लगा था, बाबूजी का कुर्ता वहाँ टाँगा जाता था। 
 
साँझ से रात की तैयारी और दोपहर से साँझ की तैयारी होती थी। चूल्हे की राख से लालटेन और लैम्प का शीशा चमकाया जाता था। यह सबकुछ खोज रहा हूं तो मन के भीतर अचानक रौशनी दिख जाती है। नहर से राजदूत की आवाज़ आने लगती है। बाबूजी आ रहे हैं, दुआर पर लोग हैं, जिन्हें बात करनी है। 

अचानक बाहर देखता हूं तो कोई नहीं ! कोई आवाज़ नहीं। आँखें मूँदकर बैठ जाता हूं। समय के साथ बिजली के प्रकाश से अहाते में भले रौशनी फैल गई हो लेकिन इस वक्त आँख मूँदकर अँधेरा में डूब जाता हूं। भीतर मानो एक दीप जल रहा है, दीये की टेम की तरह बाबूजी दिखने लगते हैं।

Wednesday, December 25, 2019

गाम-घर और सोशल मीडिया : एक किसान की जुबानी

सोशल मीडिया के इस दौर में जब सबकुछ डिजिटल होता जा रहा है, ऐसे समय में जब उत्पाद से लेकर व्यक्ति तक सोशल मीडिया के विभिन्न प्लैटफ़ॉर्म पर हर पल अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है, ऐसे वक्त में सतरंगी आभासी दुनिया में गाँव अपनी उपस्थिति किस अंदाज में दर्ज कर रहा है, इस पर भी बात होनी चाहिए। वैसे यह कटु सत्य है कि जिस तेज़ी से अन्य चीज़ें सोशल मीडिया में मज़बूती से खड़ी है, गाँव उन सबकी तुलना में बहुत कमज़ोर है।

सोशल मीडिया एक उपयोगी औजार के रुप में सामने आ रहा है। इसके जरिए भी पर्यटन स्थल विकसित किए जा सकते हैं। इसका एक उदाहरण चनका नाम का एक गांव है।  बिहार के पूर्णिया जिले के श्रीनगर प्रखंड में यह गांव आता है। पिछले पाँच साल से फेसबुक, ट्विटर और सोशल मीडिया कर अलग अलग प्लेटफार्म पर इस गांव की तस्वीरों के साथ किसानों की बातें भी खूब हो रही हैं और लोग इन पोस्टों को पसंद भी कर रहे हैं। यह गांव सोशल मीडिया पर अपना स्थान बना चुका है और इस गांव में अमेरिका, आस्ट्रेलिया के अलावा देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसे लोग आ चुके हैं, जिनकी रुचि ग्राम्य जीवन में है। 

दरअसल जब आप सोशल मीडिया खंगालेंगे तो पाएंगे कि इस स्पेस में गाँव अभी भी ललित निबंध है। यहां ग्रामीण जीवन से जुड़ी कविता-कहानियों का बोलबाला है लेकिन इसके इतर सोशल मीडिया में गाँव किस अन्दाज़ में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रहा है, इसे समझने की ज़रूरत है। 

सोशल मीडिया के जरिये गांव तक हम लोग पहुंचा सकते हैं, फ़िल्म महोत्सव कर सकते हैं, बच्चों के लिए पाठशाला खोल सकते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बिना किसी राजनीतिक रंग में रंगे गाँव की आवाज सत्ता के गलियारे तक पहुंचा सकते हैं।

सोशल मीडिया के जरिये गाँव में आप क्या कर सकते हैं, उसका एक उदाहरण  केंद्र सरकार की एक योजना है ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन’ से सम्बंधित है। केंद्र की ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन’ के तहत चनका को चुना गया है। सोचता हूँ तो याद आता है पिछले पाँच साल में मैंने सोशल मीडिया के किस मंच पर चनका की बात नहीं की? किस-किस से क्या नहीं माँगा चनका के लिए? चनका रेसीडेंसी के लिए यह ख़ास पल है। हम उन लोगों के भी आभारी हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी चनका पहुँचे। इस योजना के तहत यदि सब कुछ होता है तो चनका सचमुच में चमक जाएगा। ग्रामीण स्तर पर सही अर्थों में विकास कार्य होने से बहुत कुछ बदलाव देखने को मिलेगा। यह सबकुछ सोशल मीडिया के कारण हुआ। गाँव की बात हर ऐसी जगह पहुंच गई, जहां से गाँव को उम्मीद थी। 

दरअसल खेती बाड़ी करते हुए  सोशल मीडिया में सक्रिय रहने की वजह से है गांव की बात सहज तरीक़े से रखने की कोशिश हम अनवरत करते हैं। मेरा मानना है कि जब सब कुछ वायरल होकर सुर्ख़ियाँ में आता है तो हम गाँव की बातें वायरल क्यों नहीं करें। गाँव में विकास की किरणें पहुँचने में भले ही देर हो, लेकिन तब तक इस सोशल मीडिया के सहारे गाँव को लोकप्रिय तो बनाया ही जा सकता है। इसके लिए ज़रूरी है कि गाँव से जुड़ा शख़्स गाँव की बातें पारंपरिक चौपाल के अलावा डिजिटल चौपाल में भी करें।

आभासी या ज़मीनी स्तर पर गाँव की जब भी बातें करता हूँ तो आंकड़े और रेफ़रेंस से दूर रहकर अपनी बात अनुभव के आधार पर रखता हूँ। बिहार के चनका नाम के जिस गाँव में पिछले पाँच साल से खेती-बाड़ी, क़लम-स्याही कर रहा हूँ, उस गाँव में अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ कि गाँव की बातें यदि लगातार आप सोशल मीडिया में कॉन्टेंट या तस्वीरों के ज़रिए लगातार करते हैं तो उसका लाभ गाँव को ज़रूर मिलेगा।

गांव के विकास को लेकर जो शिकायत हमारी जनप्रतिनिधियों से होती है, उसका काट सोशल मीडिया का प्लेटफॉर्म हो सकता है, हर कुछ के लिए नेतागिरी ही जवाब नहीं है। हम लगातार लिखकर दवाब बना सकते हैं, जिसे अकादमिक भाषा में ‘प्रेशर ग्रुप’ कहते हैं, वह फ़ेसबुक-ट्विटर कर सकता है। हमने तो चनका गाँव के लिए यह प्रेशर ग्रुप बनाने की कोशिश की तो आंशिक सफलता तो मिलती दिखी। 

गाँव में ‘चनका रेसीडेंसी’ बनाने का स्वप्न हमने सोशल मीडिया के ज़रिए ही देखा। चनका रेसीडेंसी में साहित्य, कला, संगीत, विज्ञान और समाज के अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़े ऐसे लोग शामिल होते हैं, जिनकी रुचि ग्रामीण परिवेश में है। 

सोशल मीडिया पर गाँव घर की बातें करते हुए ऐसे ही लोगों ने ख़्याल दिया कि एक स्पेस गाँव में शहर का भी बनना चाहिए, जहाँ आकर गाम को जिया जा सके। फिर एक दिन चनका रेसीडेंसी बनाने का विचार आता है और इस विचार को अमली जामा पहना दिया जाता है। साल में तक़रीबन चार महीने देश के अलग-अलग हिस्से से लोग चनका आते हैं, कुछ नहीं बस गाँव को जीने। ऐसे लोग जिनका संबंध गाँव से ही होता है लेकिन उनकी वह डोर अपने गाँव से अब टूट चुकी है। कुछ देश के बाहर से भी लोग आ जाते हैं। गाँव की कहानी, गाँव का खाना, गाँव का गीत-संगीत चाहिए, तो किसी को चाहिए बस एकांत। किसी को रेणु के अंचल को महसूस करना होता है तो किसी को यहाँ का लोकगीत खींचता है। ऐसे लोगों के आने से से एक उम्मीद तो जग ही जाती है कि गाँव में अभी बहुत-कुछ अलग किया जा सकता है।

खेती–किसानी करते हुए अक्सर यह ख़्याल आता था कि जो मैं कर रहा हूँ उसकी बातें उन लोगों तक भी पहुँचें जो खेती तो नहीं कर रहे हैं लेकिन उनके भीतर भी गाँव घर बनाए हुए है।

मैं किसानी को नौकरी की तरह लेता हूँ, ऐसे में खेत-खलिहान मेरे लिए ऑफ़िस की तरह है। ऐसा इसलिए क्योंकि दिल्ली-कानपुर में नौकरी करते हुए मैंने महसूस किया कि नौकरी हमें अनुशासित बनाता है। मसलन वक़्त की पाबंदी। साल में तीन फ़सलों को खेत से खलिहान तक पहुँचाते हुए जो कुछ भी अनुभव होता है, उसे सोशल मीडिया पर डालता हूँ। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लैटफ़ॉर्म, जैसे ब्लॉग, फ़ेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर फ़सलों की कहानी डालता रहा हूँ। धान के लिए बीज तैयार करने से लेकर धनरोपनी और धनकटनी तक, जो कुछ भी देखता या भोगता हूँ उसे ईमानदारी से सोशल मीडिया पर डालता हूँ। इसके कई फ़ायदे मिले। सबसे अधिक ख़ुशी इस बात से मिली कि एक गाँव सोशल मीडिया पर उभर कर सामने आ गया। आभासी दुनिया में मक्का के नवजात पौधे की तस्वीरों को देखकर दोस्त-यार ख़ुश हो जाते हैं। यह ख़ुशी ठीक वैसी ही जैसे नौकरी करते हुए जब कोई रिपोर्ट फ़ाइल करता था तो अपने सहकर्मी की हौसला अफ़ज़ाई से मिलती थी।

यह सब कुछ शब्द रुप में सोशल मीडिया पर डालते वक़्त कभी कभी लगता है कि एक खेती हम आभासी दुनिया में भी करते हैं। सोशल मीडिया के कारण कई तरह की जानकारियाँ और योजनाएँ भी मन में उभरने लगती हैं, मसलन धनरोपनी महोत्सव का ख़्याल। हम पिछले तीन साल से खेत के छोटे-से टुकड़े में धनरोपनी महोत्सव मनाते हैं। इसमें आस-पड़ोस के ऐसे लोग शामिल होते हैं, जिनका सीधे तौर पर खेती से कोई जुड़ाव नहीं है। इसी तरह गाँव में सोशल मीडिया मीट करने का भी ख़्याल आया तो हम वह भी कर बैठे। यह सबकुछ सोशल मीडिया के यार-दोस्तों की वजह से संभव हो पाता है। यहां लोग समर्थन करते हैं और आप योजनाओं को अमली जामा पहना देते हैं।

सोशल मीडिया में खेती किसानी की बातें लगातार करते हुए हम अख़बार, पत्रिका, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और वेब मीडिया के भी करीब पहुंच जाते हैं। ऐसे में आप यह कह सकते हैं कि सोशल मीडिया आपके लिए कारोबारी मीडिया में भी स्पेस बना देता है।  दरअसल गाँव की बातों को लोग पढ़ना चाहते हैं, ऐसा सोशल मीडिया पर लोग-बाग की पहुँच से पता चलता है। 

सोशल मीडिया पर गाम घर की बातें करते हुए हम इस बात का हमेशा ख्याल रखते हैं कि गाँव की बातें ललित निबंध न बन जाये। ग्रामीण जीवन में जो खराब है, उस पर भी सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म पर बात होनी चाहिये। सच कहिये तो यह सब करते हुए मन के भीतर ढेर सवाल भी उठते आए हैं। उन सभी सवालों का हल गाँव ही निकलेगा, हमें गाँव को जीना होगा, वहां के लोगबाग की बातों को वर्चुअल दुनिया में जगह देनी होगी, गांव के लोगों को समझाना होगा कि सोशल मीडिया एक ऐसी बागवानी है जिसका उपयोग हम समाज और अपनी बेहतरी के लिए कर सकते हैं।

Tuesday, December 17, 2019

वे चाहते थे...

वे चाहते थे कि सब एक रहे
बची चीजें बस बची रहे
किसानी बची रहे,
भले वे बचे न रहे
उनका चाहना उनके बचे रहने से बड़ा था
बिछावन पकड़ते ही उनका चाहना
न जाने कितने टुकड़ों में बंट गया
विश्वास में मानो दीमक लग गया
धीरे-धीरे दीमक सबको चाट जाता है
ठीक उसी तरह उनकी बची चीजों में भी
दीमक लग गया
वे सब देखते रह गए
देखते - देखते 
बची चीज और टुकड़ों में बंट गई
धीरे - धीरे उन्होंने चुप रहना सीख लिया
लेकिन उनकी चुप्पी भी भव्य थी
बरसों तक जो उनके साथ थे
सुख-दुख सब वेला में
अब उनसे दूर हो गए
लेकिन दूरियां भी उन्हें तोड़ नहीं सकी
मानो वे सब जानते थे
उनकी चुप्पी की भव्यता और बढ़ती गई
और एक दिन वे निकल पड़े 
अपनी ही चुप्पी की लंबी यात्रा पर..

Thursday, November 21, 2019

खेत संवारने का मौसम

खेत को संवारने का मौसम आया है। फसल चक्र में खेत की दुनिया को महसूस करने का हक किसान को ही मिलता है। खेत की दुनिया और मां का आँचल सब एक सा लगने लगता है। 

धान की कटाई और तैयारी के बाद सूने पड़े खेत को जब अगली फसल के लिए हम तैयार करते हैं, जब माटी को हम ट्रेक्टर के लोहे के हल से तोड़ कर मिट्टी का रंग बदलते देखते हैं तो ऐसा लगता है मानो मां अपने संतान के सिर को सहलाने लगी है, बाल को संवारकर संतान को और भी सुंदर बनाकर लोरी सुनाने लगी है। 

महंगाई के दौर में मक्का का बीज भले ही चिढ़ा रहा हो लेकिन इसके बावजूद किसान अपने किसानी कर्म से हाथ नहीं छुड़ाता है, यही किसान का धर्म है। खेत की तैयारी का समाजशास्त्र दरसअल किसान के दुआर और आँगन का अर्थशास्त्र होता है। किसान का संतोष ही किसान का बल है और शायद यही हमारी कमजोरी भी है।

ट्रेक्टर की फटफट आवाज और ट्रेक्टर चालक की आंख, ये दोनों ही खेत को संवारने में अहम भूमिका अदा करती है और यह सब जब हम खेत के आल पे खड़े होकर निहारते हैं तो सबसे अधिक बाबूजी की याद आती है। वे खुद ट्रेक्टर चलाते थे, बांह वाली कोठारी की गंजी पहने बाबूजी की छवि मन के फ्रेम में टंगी है। वे यात्रा पे चले गए, अब तो पांच बरस होने को चला लेकिन अब भी वे खेत-दुआर में चलते-फिरते दिख जाते हैं। 

बाबूजी की स्मृति अपने लिए वह ताकत है , जिसके बल पर यह किसान खेत की यात्रा करता है, दुनिया जहान से संवाद करता है। खेत को संवारने का उनका तरीका उनकी डायरी में पढ़ता हूँ तो उनके करीब पहुंच जाता हूं। वे खेत को फसल के नक्शे पे डाल देते थे और फिर सबकुछ प्रकृति के आंचल में बांधकर किताबों और लोक की दुनिया में डूब जाते थे। 

आज जब समय मशीन के बल पर बदलने को आतुर है, तब उनकी स्मृति पोखर के शांत जल की तरह लग रही है, जिसमें प्रवाह तो नहीं है लेकिन उसके भीतर जीवन है। शाम से पहले चिड़िया चुनमुन चचचह करते जब पानी के लिए पोखर तक पहुंचती है तो लगता है बाबूजी हैं यहीं , मेरे करीब।