Friday, February 05, 2016

नारियल के सौ साल पुराने गाछ के बहाने

मुझे गाम में दोपहर के वक़्त ख़ाली समय में हवा में लंबे गाछ- वृक्ष को निहारना सबसे अच्छा लगता है। ख़ासकर तब जब अकेले हों आप।

अकेलेपन में हवा से भी हम कुछ बातें कर लेते हैं। इन दिनों गाम की दोपहर हमें काफ़ी कुछ सीखा रही है। नारियल के पुराने गाछ को जब भी हवा में झूमते देखता हूं तो बचपन याद आ जाता है।

स्मृति यही है, हरी -हरी दूब की तरह। स्मृति के ज़रिए ही हम जीना भी सीखते हैं। इस वक़्त अपने हाते में टहलते हुए नारियल के फल से लदा पेड़ मुझे खींच रहा अपनी तरह। मानो सातवीं क्लास के कामेश्वर मास्टर साब कह रहे हों कि ' फल विनम्र बनाता है, फल से लदे गाछ को देखो, और फिर सोचो। भार सहना सीखना चाहिए....'

नारियल का यह गाछ मेरे हाते का सबसे पुराना  सदस्य है। लगभग सौ साल पुराना। बूढ़ा हो चला है लेकिन अब भी मुस्कुराता रहता है। इस उम्र में भी १५-२० फल तो दे ही देता है और साथ ही जाने कितनी चिड़ियाँ इसके आसपास घूमती रहती है। कुछ ने तो अपना बसेरा इसके सिर पर बना रखा है लेकिन उस भार को भी यह विनम्रतापूर्वक स्वीकार करता है।

इस दूपहरिया में बाबूजी की याद आ रही है। नारियल के पेड़ से उन्हें अजीब तरह का लगाव था। उन्होंने सौ से अधिक नारियल के पेड़ लगाए थे।

बाबूजी कहते थे कि नारियल के गाछ से चिड़ियों को सबसे अधिक स्नेह होता है, ख़ासकर तोता और बगड़ा पक्षी का। इस प्रजाति की चिड़ियाँ इस पेड़ पर सुरक्षित महसूस करती है।

आज जब छत पर धूप सेकते हुए चुपचाप देहाती दुनिया की इन बातों को टाइप कर रहा हूं तो लगता है कि यहीं बग़ल में काठ की कुर्सी पर सफ़ेद धोती और कोठारी के मटमेले बांह वाली गंजी में बाबूजी बैठे हैं और अंचल की कहानी मुझे नारियल के इस पुराने पेड़ के बहाने सुना रहे हैं।

हवा में झूलते इस बूढ़े नारियल गाछ से स्नेह दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा है। साल २०१५ की अप्रैल में जब आँधी में दर्जनों पेड़ गिर पड़े थे तब भी यह यूँ ही झूम रहा था। संघर्ष करने की सीख हम सभी को यह देता रहा है। किसानी करते हुए लड़ने की आदत हम पेड़-पौधों से सीखते हैं। बे-मौसम बरखा हो या फिर आँधी- तूफ़ान, हमें अन्न उपजाने के लिए लड़ाई लड़नी ही होती है, तो फिर डर कैसा!

Wednesday, February 03, 2016

पछिया हवा की बातें

पछिया हवा का ज़ोर आज ख़ूब दिख रहा है। तेज़ हवा के संग धूल जब देह से टकराता है न तो गुदगुदी का अहसास होता है।

बसंत की झलक आज दिखने लगी है। मानों झिनी झिनी चदरिया से कोई हमें देख रहा हो। गाम में आज गाछ -वृक्ष की पत्तियाँ उड़ान भर रही है। सरसों के खेत से एक अलग तरह की महक आ रही है।

सरसों के पीले फूल की पंखुड़ी इन हवाओं में और भी सुंदर दिख रही है। लीची की बाड़ी में इस बार मधुमक्खियों ने अपना घर बनाया है। पछिया हवा की वजह से मधुमक्खियाँ भी झुंड में इधर उधर उड़ रही है।

उधर, पछिया हवा के कारण बाँस बाड़ी मुझे सबसे शानदार दिख रहा है- एकदम रॉकस्टार! दरअसल इन हवा के झोंकों में बाँस मुझे रॉकस्टार की तरह लग रहा है। बाँस की फूंगी और बाँस का बीच का हिस्सा जिस तरह डोल रहा है , उसे देखकर लगता है कि बॉलीवुड का कोई नायक मदमस्त होकर नाच रहा है।

इन हवाओं के संग रंगबिरंगी तितलियाँ भी आई है। मक्का के खेत में इन तितलियों ने डेरा जमाया है। मक्का के गुलाबी फूलों से इन तितलियों को मानो इश्क़ हो गया है :)

पीले रंग की तितली जब मक्का के नए फल के लिए गुलाबी बालों में उलझती है तो लगता है कि प्रकृति में कितना कुछ नयापन है! इन्हीं गुलाबी बालों में मक्का का भुट्टा छुपा है।

पछिया हवा के इन झोंकों से खेत पथार भी देह की माफ़िक़ इठलाने लगा है। फ़सलों के बीच से गुज़रते हुए आज यही सब अनुभव कर रहा हूं। पटवन का काम हो चुका है इसलिए मोबाइल पर देहाती दुनिया टाइप करता रहता हूं।

गाम घर का जीवन मौसम की मार के गणित में यदि फँसता है तो यक़ीन मानिए इन्हीं मौसम की वजह से अन्न देने वाली माटी सोना भी बनती है। वहीं गाछ-वृक्ष-फूल-तितली-जानवर आदि इन्हीं मौसमों में अपनी ख़ुशबू से हमें रूबरू भी कराते हैं...यही वजह है कि किसानी करते हुए अब हम भी कहने लगे हैं - पतझड़-सावन - बसंत- बहार ....

Wednesday, January 27, 2016

खेत खलिहान और बंगाल

कई बार हम अकेले पड़ जाते हैं लेकिन हमारी यात्रा जारी रहती है । यात्राएं अक्सर हमें एक मोड़ पर छोड़ देती है जहाँ से हमें यह तय करना होता है कि अब कहाँ ? इन दिनों यात्राओं का संयोग बना है, ऐसे में ढेर सारे नए लोग मिल रहे हैं जिनसे काफी कुछ नया सीख रहा हूं। 

हर बार बिहार से बंगाल की सीमा में दाख़िल होते ही चाय के बग़ानों से सामना होता है। बाग़डोगरा, सिलीगुड़ी जाते वक़्त खेतों के नए रंग मुझे भाने लगे हैं । चाय के बग़ान के बीच कभी लकड़ी के पेड़ दिखते थे अब तेजपत्ता के पेड़ नज़र आ रहे हैं। इस्लामपुर से आगे निकलते ही इस तरह का नज़ारा दिख जाता है और में ठहर जाता हूं। खेती में नए प्रयोग मुझे भाते हैं। 

वहीं अनानास और अरिकंचन की खेती तो मुझे और भाने लगी है। एक ही खेत में कितना कुछ दिख जाता है, एक तरफ़ कँटीला अनानास तो दूसरी तरफ़ हरी पत्तियों वाला अरिकंचन। आप सोचिए खेत के बारे में। क़ुहासे की लिफ़ाफ में लिपटी उस सुबह जब इन खेतों के बीच से निकल रहा था तो लगा मानो किसी पेंटर की पेंटिंग को छू रहा हूं।

इन सबके बीच बंगाल चुनाव के मूड में आ चुका है। ममता बनर्जी के पोस्टर से बंगाल का यह इलाका पटा पड़ा है। चुनाव की महिमा निराली होती है, इस महिमा की माया अपरमपार है :) लेकिन तभी बंगाल की मिठाई दुकान दिख जाती है। रसगुल्ला, संदेस, छैना पायस, खजूर के रस में डूबा रसगुल्ला :) 

ख़ैर , खेत खलिहान की कथा के बीच राजनीति की बात करते हुए लूटियंस की दिल्ली की याद आ जाती है। सड़क वहाँ महान महान लोगों के नाम से मार्ग बना हुआ है । अकबर रोड से आगे निकलते हुए जब दूतावासों की तरफ़ हम जाते हैं तो दिल्ली कितनी हरी दिखती है। हरापन दिल्ली में भी है लेकिन फ़िलहाल हम बंगाल की हरियाली में खो चुके हैं। चाय बग़ान और अरिकंचन की हरियाली ही अभी मन में है बाद बांकि जो है सो तो हइए है।

Thursday, December 31, 2015

चलते-चलते किसानी की बात

सुबह -सुबह गाँव आता हूँ और खेत में पटवन चालू कर देता हूँ। पिछले ढाई साल से पम्प सेट की आवाज संगीत की तरह लगने लगी है। 2015 अलविदा करने के मूड में आ गया है और हम हैं कि उसे कह रहे हैं -"अभी न जाओ छोड़ के कि दिल अभी भरा नहीं ..."

खैर, इस वक्त फसल को पानी की जरूरत है , ऐसे में किसानी समाज खेतों की प्यास मिटाने में लगा है। 2015 के अंतिम दिन हम फसल के संग उम्मीद लिए खेतों में घूम रहे हैं। फट-फट करता पम्प सेट आज मुझे खींच रहा है। जिन खेतों में मक्का है वह आज खुश है और उसकी ख़ुशी से ही मेरे जैसा किसान अपने घर-आँगन-दुआर को खुश करेगा।

वैसे 2015 किसानी कर रहे मेरे जैसे लोगों के लिए ख़ास नहीं रहा। कम बारिश और आंधी तूफ़ान ने हमें तोड़ कर रख दिया लेकिन हम मन से कम ही टूटते हैं। क्योंकि टूट जाने पर हमारे पास बचता कुछ नहीं है। वैसे भी 12 महीने हमारे लिए कहानी ही है, जिसे हर किसान अपने अंदाज से बयां करता है या कहिये किसानी के जरिये लिख देता है।

आलू की कहानी, मक्का-धान-गेहूं की कहानी या फिर सरसों-दाल-गेहूं की कथा। हम सब तो बस खेत में बीज देकर चुप हो जाते हैं और सबकुछ कथा के नायक प्रकृति के भरोसे छोड़ देते हैं । इन सबके बीच धरती मैय्या हमें भरोसा देती रहती है कि 'सब अच्छा ही होगा' । इसी आशा के संग हर किसान 12 महीने गुजार देता है। सब अपने गुल्लक में आशा की किरण को बनाये रखने की कोशिश तो जरूर ही करता है।

यही वजह है कि आने वाले 2016 को लेकर हम सब आशावान है। देखिये न अभी एक महीने पहले की ही बात है, धान उपजाकर कोई भगैत-विदापत में डूबा है तो कोई बेटी की विदागरी में लगा है। हालांकि धान ने इस बार हमें निराश किया कम बरखा की वजह से लेकिन इसके बावजूद सब रमे हैं अपनी दुनिया में। गाम-घर की दुनिया यही है, यहां तनख्वाह तो नहीं है लेकिन उत्सव जरूर है। पल में ख़ुशी और पल में सन्तुष्ट हो जाना किसान की आदत है। पूर्णिया जिला में किसानी कर रहे लोग अक्सर कहते हैं - "खेती नै करब त खायब कि और खेती स निराश भ जायब त जियब केना..."

बाबूजी अब नहीं है, यह वाक्य जब भी लिखता हूँ तो लगता है कि कुछ गलत टाइप हो गया। मन का सम्पादक डांटने लगता है लेकिन सत्य तो सत्य है। इसी साल वो मुझे अपने खेतों में अकेला छोड़ कर अनन्त यात्रा पर निकल गए। वे होते तो खेत सिंचाई पर और भी बातें बताते मुझे । और मैं और भी कुछ नया लिख पाता लेकिन ....अब उनकी याद में कुछ नया करना है।

बाबूजी हमेशा कहते थे "जब फसल तुम्हें निराश कर दे तब उससे बात करो। खेत में टहलने लग जाओ। आशा बलवती होती है, इसे दुहराने लगो।"

बाबूजी की कही बातों को याद करते हुए आज डायरी लिखने जब बैठा हूँ तो लगता है सब सुंदर ही होगा। 2016 कल आ रहा है, नये साल में नए फसलों के संग हम खूब बातें करेंगे। नवान्न की पूजा करेंगे। मक्के के दानों को सहेजेंगे, धान की बालियों से प्रेम करेंगे , गेहूं की भूरे रंग की ब्रश की माफिक बाली को माटी से स्पर्श करते देखेंगे।

आशा है मुल्क के अलग अलग हिस्सों में मेहनतकश किसानी कर रहे लोग निराश नहीं होंगे। उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम हर कोने के किसान खेत से इश्क करेंगे...माटी से सोना उपजाने की कोशिश करेंगे... हिम्मत नहीं हारेंगे।

Friday, December 25, 2015

एक पाकिस्तान यहां भी है मोदी जी !

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी,
प्रणाम।
अभी-अभी आप पाकिस्तान से हो आए हैं। ऐसे में आपको यह बताना चाह रहा था कि एक पाकिस्तान मेरे  गाँव के नजदीक भी है। 'पाकिस्तान टोला' । हर चुनाव के वक्त हर दल के लोग यहां आते हैं फिर चुनाव के बाद भूल जाते हैं। प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के लिए तो यह चुनाव के वक्त तीर्थ बन जाता है। पता नहीं आपके गिरिराज सिंह जी को इस जगह के बारे में पता है कि नहीं ☺

जिला पूर्णिया, सूबा बिहार में यह पाकिस्तान है। नजदीकी हवाई अड्डा बागडोगरा है और सैन्य हवाई अड्डा तो पूर्णिया में ही है- चूनापुर। जहां बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त आप खूब आते जाते रहे।

हालांकि इस पाकिस्तान में आपको हेलीकाप्टर से पहुंचना होगा। आपलोगों की चमचमाती काले रंग की लंबी बुलेटप्रूफ कार यहां पहुंच नहीं पाएगी।

इन सब बाधाओं के बावजूद निवेदन है कि कभी समय निकालकर यहां आइयेगा। यहां कोई वजीर-ए-आज़म नहीं है। जो हैं वो आप ही हैं। हालांकि अबतक पक्की सड़क से यह पाकिस्तान जुड़ा नहीं है। नीतीश कुमार भी इस पाकिस्तान की बात चुनाव के वक्त करते रहे हैं।  बाद बांकी जो है सो तो हइये है।

आपका किसान
गिरीन्द्र

Friday, December 18, 2015

यह साल भी जाने वाला है !

किसानी करते हुए, साल के जिस माह से मुझे सबसे अधिक लगाव होता है, वह दिसंबर ही है. दिसम्बर में आलू और मक्का के खेतों से गुजरते हुए कोमल धूप तन और मन दोनों को मोह लेती है।

धूप और छाँव के संग जिंदगी की कहानी चलती रहती है । यही सत्य है । देखिये न इस साल हमने कितने मोड़ देखे जीवन में। लेकिन तभी यह भी अहसास होता है कि गिनती के कुछ दिनों बाद ही यह साल भी बीत कर विगत हो जाएगा- ठीक उसी तरह जैसे धरती मैया के आंचल मेँ न जाने कितनी सदियां ..कितने बरस दुबक कर छुपे बैठे हैँ।

फिर सोचता हूं तो लगता है कि हर किसी के जीवन के बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे, इन्हीं महीने के पल-पल को जोड़कर हम-आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं। किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान हर चार महीने में एक जीवन जीता है। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा।

चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन्हीं चार महीने के सुख-दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते हैं। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीवन जीता है। इसके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल बोने के बाद किसान इस बात कि परवाह नहीं करता है कि फल अच्छा होगा या बुरा..वह सबकुछ मौसम के हवाले कर जीवन की अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है।


किसानी करते हुए जो अहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हूं। इस आशा के साथ कि किसानी को कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अभी-अभी विभूतिभूषण बंद्योपाद्याय की कृति ‘आरण्यक’ को एक बार फिर से पूरा किया है। बंगाल के एक बड़े जमींदार की हजारो एकड़ जमीन को रैयतो में बांटने के लिए एक मैनेजर पूर्णियां जिले के एक जंगली इलाके में दाखिल होता है। जिस कथा शिल्प का विभूति बाबू ने ‘आरण्यक’ में इस्तेमाल किया है, वह अभी भी मुझे मौजू दिख रहा है। पू्र्णिया जिला की किसानी अभी भी देश के अन्य इलाकों से साफ अलग है। इस अलग शब्द की व्याख्या शब्दों में बयां करना संभव नहीं है। इसे बस भोग कर समझा जा सकता है।


खैर, 2015 के अंतिम महीने में मेरे जैसा किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबा पड़ा है। इस आशा के साथ कि आने वाले नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया जाएगा लेकिन जीवन का गणित कई बार सोचकर भी अच्छा परिणाम नहीं देता है। इस साल बाबूजी मुझसे दूर चले गए, अनन्त यात्रा पर। इस साल राजकमल से पहली किताब आई-'इश्क में माटी सोना' । लोकापर्ण से पहले छुपकर रोया, बाबूजी की याद आ रही थी। फिर सोचा , नियति को यही मंजूर होगा शायद।

किसानी करते हुए जीवन को लेकर नजरिया बदल चुका हूं। यह जान लेने का भरम पाल बैठा हूं कि पहाड़ियों के बीच बहती नदी पहाड़ी के लिए होती है, आम के पेड़ों में लगी मंजरियां आम के लिए होते हैं और गुलाब के पौधे पर उगे तीखे कांटे गुलाब के लिए होते हैं। बहुत कुछ मेरे हाथ में नहीं है, ऐसे में जहां तक सम्भव होता है सकारात्मक सोच बरकरार रखने की कोशिश करता हूँ।

यह सब लिखते हुए मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के आवारगी का एक साल याद आता है और मुखर्जीनगर इलाके का एक रेस्तरां, जहां एक शाम एक दोस्त से मुलाकात हुई थी, जिसने बड़े दार्शनिक अंदाज में कहा था- “जानते हो, लगातार गिरती और उठती पलकें आंखों के लिए होती है न कि दुनिया देखने के लिए....’”

किसानी करते हुए इस साल तीन साल पूरा हो जाएगा, मतलब ग्रेजुएट :) ऐसे में दोस्त की बात का अर्थ समझने लगा हूँ। दरअसल समय के गुजरने के साथ-साथ और किसानी करते हुए उस दोस्त का दर्शन थोड़ा बहुत समझने लगा हूं। किसानी करते हुए ही यह अहसास हुआ है कि हम लोग जिंदगी को लेकर इतने दार्शनिक अंदाज में बातें इसलिए करते हैं क्योंकि हम यह भरम पाल बैठते हैं कि हम जो जीवन जी रहे हैं वह आसान नहीं है। जबकि सत्य कुछ और है। दरअसल जीवन को जटिल हम खुद बनाते हैं, मकड़ी का जाल हम-आप ही उलझा रहे हैं। दिनकर की वह कविता याद आने लगी है, जिसमें वे कहते हैं- “आदमी भी क्या अनोखा जीव है, उलझने अपनी ही बनाकर, आप ही फंसता और बैचेन हो न जगता न सोता है .....”

इन सबके बीच ठंड का असर बढ़ता जा रहा है। सुबह देर तक कुहासे का असर दिखने लगा है। पंखुड़ी रोज कहती है- ठंड आइसक्रीम से भी ठंडी है पापा :)

चनका से पूर्णिया लौटते वक्त हर साँझ सबकुछ मेघ-मेघ–बादल-बादल सा लगने लगा है। बाबूजी होते तो कहते 'चनका से सवेरे निकल आओ, कुहासा घेर लेगा तो दिक्कत होगी .....' लेकिन अफ़सोस वो नहीं हैं और मैं हर शाम बाबूजी हैं इस भरम को मन में लिए पूर्णिया लौट आता हूँ ताकि अगली सुबह चनका जा सकूं....

Wednesday, November 25, 2015

पुरानी कहानी, नया पाठ


चनका गांव के एक तालाब की तस्वीर।
बोली-बानी सब बदल जाती है, बस रह जाती है तो केवल यादें। गांव को नदी बांट देती है, गांव को नहरें बांट देती है. इन सब में जो सबसे कॉमन है वह है पानी। हमारी यादों को दो छोर पे रखने में इस पानी का सबसे अहम रोल है। कोसी के कछार में आकर हम बसते हैं, एक बस्ती बनाते हैं।

उस बस्ती से दूर जहां हमारे अपने लोग बसे हैं
, जहां संस्कार नामक एक बरगद का पेड़ खड़ा है और जहां बसे वहां बांस का झुरमुट हमारे लिए आशियाना तैयार करने में जुटा था। मधुबनी से पूर्णिया की यात्रा में दो छोर हमारे लिए पानी ही है। उस पार से इस पार। कालापानी। कुछ लोग इसे पश्चिम भी कहते हैं। बूढ़े-बुजुर्ग कहते हैं- जहर ने खाउ माहुर ने खाउ, मरबाक होए तो पूर्णिया आऊ (न जहर खाइए, न माहुर खाइए, मरना है तो पूर्णिया आइए)। और हम मरने के लिए नहीं बल्कि जीने के लिए इस पार आ गए।

विशाल परती जमीन
, जिसे हॉलीवुड फिल्मों में नो मेन्स लैंड कहा जा सकता है, हमारे हिस्से आ गई। शहर मधुबनी से शहर-ए-सदर पूर्णिया अड्डा बन गया। मधुबनी जिले के तत्सम मैथिली से पूर्णिया के अप्रभंश मैथिली की दुनिया में हम कदम रखते हैं। हमारी बोली-बानी पे दूसरे शहर का छाप साफ दिखने लगा। सूप, कुदाल खुड़पी सबके अर्थ, उच्चारण, हमारे लिए बदल गए, लेकिन हम नहीं बदले, जुड़ाव बढ़ता ही चला गया, संबंध प्रगाढ़ होते चले गए।

कोसी एक कारक बन गई, पूर्णिया और मधुबनी के बीच। दो शहर कैसे अलग हैं, इसकी बानगी बाटा चौक और भट्टा बाजार है। एक भाषा यदि मधुबनी को जोड़ती है तो वहीं विषयांतर बोलियां पूर्णिया को काटती है, लेकिन एक जगह आकर दोनों शहर एक हो जाता है, वह है सदर पूर्णिया का मधुबनी मोहल्ला। कहा जाता है कि उस पार से आए लोगों ने इस मोह्ल्ले को बसाया। यहीं मैथिल टोल भी बस गया। मधुबनी मोहल्ला घुमने पर आपको बड़ी संख्या में ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनका ऑरिजन मधुबनी जिला है।

धीरे-धीरे यहां प्रवासी अहसास भी मैथिल भाषियों को होने लगा, बंगाल से सटे रहने की वजह से बांग्ला महक फैलती ही चली गई। आप उस पार के हैं, यह पूर्णिया में भी मधुबनी से आए लोगों को सुनने को मिलता है। उस पार से आए किसान यहां जमींदार बन गए, निजाम बन गए तो कुछ, कई की आंख की किरकरी (चोखेर बाली) बन गए।

शहर पूर्णिया और शहर मधुबनी में जो अंतर सपाट तरीके से दिखता है वह लोगबाग। कामकाजी समाज आपको मधुबनी मिलेगा लेकिन पूर्णिया में यह अनुभव कुछ ही मोहल्लों में मिलेगा। यह शहर शुरुआत में बड़े किसानों का आउट हाउस था। वे यहां कचहरी के काम से आते थे और कुछ वक्त गुजारा करते थे। उस पढ़ाई के लिए लोग मधुबनी-दरभंगा के कॉलेजों पर ही आश्रित थे। शिक्षा के मामले में मधुबनी-दरभंगा बेल्ट ही मजबूत था बनिस्पत पूर्णिया अंचल।

अब हम धीरे-धीरे शहर से गांव की ओर मुड़ते हैं। इशाहपुर (मधुबनी जिला का गांव) से खिसकते हुए एक अति पिछड़े गांव चनका (पूर्णिया जिला का गांव) पहुंच जाते हैं। धोती से लुंगी में आ जाते हैं। पोखर से धार (कोसी से फुटकर कई नदियां पूर्णिया जिले के गावों में बहती है, जिसमें जूट की खेती होती है) बन जाते हैं। माछ से सिल्ली (पानी में रहने वाली चिडियां, जिसे कोसी के इलाके में लोग बड़े चाव से खाते हैं) के भक्षक बन जाते हैं। मैथिली गोसाइन गीत से भगैत बांचने लगते हैं। धर्म-संस्कार का असर कम होने लगता है तो कुछ लोग डर से इसके (धर्म) और गुलाम बनते चले जाते हैं। 

(जारी है, मधुबनी से पूर्णिया, इशाहपुर से चनका का सफर)