Nov 12, 2009

गांव की बात करे मीडिया : मार्क टली

 दक्षिण एशिया और खासकर भारतीय मामलों के प्रमुख पत्रकार व लेखक मार्क टली का कहना है कि मीडियाकर्मियों को ग्रामीण क्षेत्रों की विशेष रूप से बात करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय मीडिया ग्रामीणों इलाकों की खबरों को अक्सर नजरअंदाज कर देता है। प्रभाष जोशी को याद करते हुए मार्क ने कहा,  "प्रभाष जोशी लड़ने वाले पत्रकार थे। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर लिखते थे। हमें दुख है कि अब देश में लड़ने वाला एक प्रमुख पत्रकार नहीं रहा। "

मार्क ने कहा कि मीडिया को शहरों की जगमगाती रोशनी से दूर ग्रामीण भारत की भी तस्वीर पेश करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मीडिया के कंधे पर कई जिम्मेदारियां होती हैं, उसमें लोगों को सही राह दिखाना भी एक है। वर्षो तक नई दिल्ली में बीबीसी के ब्यूरो प्रमुख रहे मार्क का मानना है कि कानून और व्यवस्था बनाने में भी मीडिया की अहम भूमिका होती है।

 मार्क ने कहा कि मीडिया को ग्रामीण क्षेत्रों की खबरों को प्रमुखता देनी चाहिए और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। उन्होंने दिवंगत पत्रकार प्रभाष जोशी को याद करते हुए कहा, "प्रभाष जोशी लड़ने वाले पत्रकार थे। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ जमकर लिखते थे। हमें दुख है कि अब देश में लड़ने वाला एक प्रमुख पत्रकार नहीं रहा। "

इंटरनेट का प्रसार और समाचार पत्रों की स्थिति पर मार्क ने कहा, "अखबार कभी नहीं मर सकता है। भले ही इंटरनेट का जाल काफी दूर तक पहुंच चुका है लेकिन अखबार का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है। यह सच है कि टेलीविजन के आने से रेडियो की स्थिति खराब हुई लेकिन अखबार के साथ ऐसा कभी नहीं होगा।"


मार्क ने ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सामुदायिक रेडियो की वकालत करते हुए कहा, "सरकार को अधिक से अधिक संख्या में सामुदायिक रेडियो के लिए लाइसेंस जारी करना चाहिए। लोगों को भी सामुदायिक रेडियो शुरू करने के लिए कदम उठाना चाहिए। बड़े शहरों से लोगों को छोटे शहरों और गांवों में जाकर सामुदायिक रेडियो की शुरुआत में हाथ बंटाना चाहिए।"


उल्लेखनीय है कि मार्क को पद्मश्री और पद्मभूषण सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है। इसके अलावा ब्रिटेन उन्हें 'सर' की उपाधि से सम्मानित कर चुका है।

Nov 7, 2009

हमें बुलाती है दुनिया हमीं नहीं जाते

आज मुन्नवर राना को पढ़ने का बहुत मन किया तो नेट को खंगाला। कविता कोष पर वह मिले। उन्हें पढ़ते वक्त पाठक एक अंश में खुद को भी पढ़ता है, ऐसा मेरा मानना है। बतौर पाठक, आप भी पढिए.

शुक्रिया
गिरीन्द्र
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1

कहीं भी छोड़ के अपनी ज़मीं नहीं जाते

हमें बुलाती है दुनिया हमीं नहीं जाते ।

मुहाजरीन से अच्छे तो ये परिन्दे हैं

शिकार होते हैं लेकिन कहीं नहीं जाते ।।



2

उम्र एक तल्ख़ हक़ीकत है मुनव्वर फिर भी

जितना तुम बदले हो उतना नहीं बदला जाता ।

सबके कहने से इरादा नहीं बदला जाता,

हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता ।।


3

मियाँ ! मैं शेर हूँ, शेरों की गुर्राहट नहीं जाती,

मैं लहज़ा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती ।

किसी दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था,

मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़वाहट नहीं जाती ।।


4

हमारी ज़िन्दगी का इस तरह हर साल कटता है

कभी गाड़ी पलटती है, कभी तिरपाल कटता है ।

दिखाते हैं पड़ौसी मुल्क़ आँखें, तो दिखाने दो

कभी बच्चों के बोसे से भी माँ का गाल कटता है ।।

Nov 6, 2009

तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे.... प्रभाष जी आपने क्रीज़ क्यों छोड़ दी?

प्रभाष जोशी नहीं रहे, एक बार सुनकर विश्नास नहीं हुआ..दुखी हूं। बस आंखों में सफेद धोती-कुर्ता पहने प्रभाष जोशी याद आ रहे हैं। सुबह से ही दोस्तों से बात हो रही है। इसी बीच इंदौर में दैनिक भाष्कर में कार्यरत दोस्त संदीप कुमार पांडेय ने कहा-तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे..। संदीप ने शब्दों के जरिए प्रभाष जोशी को याद किया है, पढिए-

शुक्रिया
गिरीन्द्र
तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे। यह स्तब्ध कर देने वाली खबर आज तड़के एक मित्र से फोन पर मिली। नींद अभी टूटी नहीं थी लेकिन इस खबर से चेतना ऐसी जागी मानो हजारों हजार कांच की बारीक किरचें एक साथ दिमाग में पैबस्त हो गई हों।



प्रभाष जी बड़े पत्रकार थे उन्होंने जनसत्ता जैसा अखबार हमें दिया जिससे पढ़ने के संस्कार मिले। मैं उनकी पेशेवर खूबियों पर नहीं जाना चाहता। मुझे बस उन्हें पढ़ना अच्छा लगता था।
उनकी कलम की ईमानदारी। इस कठिन समय में सच को लेकर जिद और वो सारी बातें जो मुझे किसी और में नहीं दिखती थीं, वे मुझे उनकी ओर खींचती थीं।कुछ एक अंतरालों को छोड़ दिया जाए कमोबेश 20 वर्षों तक कागद कारे पढ़ता रहा उसी ललक के साथ की आज प्रभाष जी ने क्या लिखा होगा।

क्रिकेट और टेनिस पर लिखे उनके आलेख। खासकर सचिन के खेल पर उसी की तरह बेमिसाल कलम का ही जादू था कि सचिन की उम्दा पारियों के बाद हम ये सोचकर सोते थे कि कल प्रभाष जी क्या लिखेंगे! खबरों के मुताबिक कल रात ११.३० के आस पास उनका निधन हुआ जबकि भारत -ऑस्ट्रेलिया मैच करीब ११ बजे ख़त्म हुआ था।लगता है कहीं सचिन की कल रात की बेमिसाल पारी की खुशी और टीम की नाजुक हार का घालमेल तो उनके लिए जानलेवा नहीं बन गया। अगर ऐसा हुआ है तो तमाम रंज के बावजूद मुझे इस बात की खुशी ताउम्र रहेगी कि एक अद्भुत खेलप्रेमी अपने प्रिय खिलाड़ी को सर्वश्रेष्ठ खेलते देखकर गुजरा और एक शानदार खिलाडी ने अपने ऐसे चहेते को अनोखी भेंट दी मरने से पहले।

प्रभाष जी ने सती अथवा ब्राह्मणों को लेकर हाल के समय में जो भी बयान दिए। उन्हें संदर्भ से काट कर उनका पाठ करने वालों ने ब्लाॅग जगत में जिस भाषा में उनका विरोध किया वो बेहद शर्मनाक था। बात केवल विरोध की नहीं विरोध के स्तर की थी। प्रभाष जी का विरोध करते हुए बातचीत का भाषा एक बेहतर स्तर हो सकता था लेकिन ब्लाॅगियों ने तो उन्हें गली के छोकरे की तरह रगेद ही लिया। क्या अब भी उन्हें अपनी गलतियों का कुछ एहसास होगा।


खैर जो भी हो मेरे लिए तो आज से जनसत्ता पढने की एक बड़ी वजह कम हो गयी। मैं उनसे कभी मिला नही, उन्हें कभी देखा नही लेकिन उनका जाना बड़ी गहरी चोट दे गया.

Oct 29, 2009

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ...

कबीर, जिन्हें पढ़ते वक्त खोने का अहसास होता है। आज जब कौन ठगवा नगरिया लूटल हो   पढ़ रहा था, तब मुझे अपने गांव में निरगुण गाने वाले अनहद की याद आ गई। वह इसे जब सस्वर  सुनाता है तो आंखे खुलती नहीं रहती है। वह खासकर कबीर की इस पंक्ति पर जोर देता है-चंदन काठ के बनल खटोला/ता पर दुलहिन सूतल हो।  ...आज आप भी पढिए और मन ही मन गुनगुनाइए भी-

शुक्रिया
गिरीन्द्र


कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।
चंदन काठ के बनल खटोला

ता पर दुलहिन सूतल हो।


उठो सखी री माँग संवारो

दुलहा मो से रूठल हो।


आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा

नैनन अंसुवा टूटल हो
चार जाने मिल खाट उठाइन

चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो


कहत कबीर सुनो भाई साधो

जग से नाता छूटल हो

Oct 27, 2009

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में

इन दिनों कबीर को पढ़ रहा हूं। मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी ..पढ़ते वक्त उनसे नजदीकी बढ़ जाती है। कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और साखी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने कहा था- पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार। वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार। लेकिन अभी पढिए- मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में..

शुक्रिया

गिरीन्द्र



जो सुख पाऊँ राम भजन में


सो सुख नाहिं अमीरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

भला बुरा सब का सुनलीजै

कर गुजरान गरीबी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

आखिर यह तन छार मिलेगा

कहाँ फिरत मग़रूरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

प्रेम नगर में रहनी हमारी

साहिब मिले सबूरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

कहत कबीर सुनो भयी साधो

साहिब मिले सबूरी में

मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥

Oct 24, 2009

रैंप पर कैटवॉक करती भैंस...

क्या आपने कभी रैंप पर भैंस को कैटवॉक करते देखा है? शायद नहीं, लेकिन बिहार के मधेपुरा जिले में गुरुवार को कई लोगों ने रैंप पर मॉडल बनीं भैंस को कदम से कदम मिलाकर चलते देखा। अभी तक मुझे भी इसकी जानकारी नहीं थी लेकिन हमारे एक सहयोगी ने जब पटना से मेल किया तो जाकर विश्वास हुआ कि भैंस भी कैटवॉक कर सकती हैं।


मधेपुरा जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर साहुगढ़ गांव में गुरुवार को भैंसों के लिए विशेष रूप से एक फैशन शो का आयोजन किया गया था। शो में मॉडल बनी भैंसों ने रैंप पर सजधर कर अपने 'सौंदर्य' की नुमाइश की। कार्यक्रम के अंत में भैंसों को पुरस्कार भी दिया गया।


इस फैशन शो के आयोजनकर्ता प्रभात रंजन ने कहा , "शो में जया, माधुरी, राधा, शिल्पा सहित एक दर्जन भैंसों ने भाग लिया। इन भैंसों को शो में भाग लेने के पहले स्नान करवाया गया था और उन्हें लाल और पीले रंग के आकर्षक कपड़े भी पहनाए गए थे।"


रंजन ने बताया कि कोसी के इलाके में पशुपालकों को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के फैशन शो का आयोजन लगातार किया जाएगा। उन्होंने बताया, "राधा नाम की भैंस के आकर्षक पहनावे और उसकी शालीनता को देखते हुए उसे विजेता घोषित किया गया और प्रथम पुरस्कार के रूप में 501 रुपये का इनाम भी दिया गया। वहीं दूसरे स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 301 रुपये तथा तृतीय स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 101 रुपये का पुरस्कार दिया गया।"


पुरस्कार की राशि प्रतिभागी भैंसों के पालकों को दी गई। इस कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।

उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष कोसी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद इन क्षेत्रों के पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था, जिसके बाद अधिकांश लोगों ने यहां पशुपालन करना ही छोड़ दिया।

(यह जानकारी मिली- आईएएनएस के पटना संवाददाता मनोज पाठक से)

Oct 17, 2009

दीवाली में आई याद

बरसों, कि याद नहीं कब था
दीवाली में अपने घर पे।
शायद 12 साल पहले घर पर
अपने लोगों के साथ दीप जलाया था।
कुछ-कुछ याद है लेकिन तंदरूस्त याद नहीं..
पटाखों की आवाज यहां भी सुनता हूं
लेकिन अपने शहर की मिरचया पटाखे की तरह नहीं।
बमों, फूलझड़ियों से मोहल्ले को गुलजार करते बच्चे
फिर सुबह में बचे पटाखों को सड़कों पर खोजते बच्चे..
कितना अच्छा लगता था, उन बच्चों को देखना
पटाखों की गंध सुबह तक हमारे साथ रहती थी।
वो हुका-हुकी..जो हम खेला करते थे
वो तो बस अब याद का हिस्सा है
संठी की बनी हुका-हुकी और उसे जलाने का आनंद
बस पुराने अनुभवों की तरह ही रह गया है।
दिल्ली की भी दीवाली कोई बुरी नहीं है
यह भी रास आता है पर लगता है
जैसे पैसों से ही यहां दीवाली होती है..
चमचम करते पैक में बंद गिफ्ट..
ये सब कहां होता है अपने शहर में...
इसी बीच अजय ब्रह्मात्मज चैट पर कहते हैं
"दीप पर्व में अक्षर रोशन करें"