Tuesday, May 05, 2015

जिला पुरैणिया की कहानी-कुछ किंवदंतिया, कुछ इतिहास

मूलत: मधुबनी से ताल्लुक रखनेवाले सुशांत झा युवा पत्रकार, अनुवादक और राजनीतिक विश्लेषक हैं। उन्होंने रामचंद्र गुहा की पुस्तकों ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ और ‘गांधी बिफोर इंडिया’ का पेग्विन के लिए अनुवाद किया है। साथ ही उन्होंने पेट्रिक फ्रेंच की किताब ‘इंडिया ए पोर्ट्रेट’ का भी अनुवाद किया है। दूरदर्शन और इंडिया न्यूज में कार्य, एसपी सिंह युवा पत्रकारिता सम्मान-2014 से सम्मानित और सोशल मीडिया में सक्रिय सुशांत ने आईआईएमसी, नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढाई है। पूर्णियां पर उनका यह आलेख पढ़ा जाए। 
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आधुनिक पूर्णिया जिला भारत के सबसे पुराने जिलों में से एक है और इसकी स्थापना 14 फरवरी 1770 को हुई थी। ये वो जमाना था जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने पलासी(1757) और बक्सर(1764) की लड़ाई में बंगाल के नवाब, मुगल बादशाह और अवध के नवाब को पराजित कर दिया था और  मुगल सम्राट से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अपने नाम करा ली थी।

पुराने पूर्णिया जिले में आज के पूर्णिया, अररिया, कटिहार और किशनगंज जिले तो थे ही, साथ ही बंगाल में दार्जिलिंग तक का इलाका था। पूर्णिया जिले की स्थापना कब और किस प्रक्रिया से हुई इसे खोजने का श्रेय पूर्णिया के ही प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ(प्रो) रामेश्वर प्रसाद को जाता है जिन्होंने कई सालो के अथक मेहनत के बाद उसकी सही तारीख और उस जमाने की इमारतों के स्थल तक खोज निकाले। यह लेख मुख्यत: डॉ प्रसाद से हुई बातचीत के पर ही आधारित है।

पूर्णिया का नाम पूर्णिया कैसे पड़ा इसके पीछे कई तरह की किंवदंतियां हैं लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण किसी का उपलब्ध नहीं है। मुगल बादशाह अकबर के समय भारत में जो पहला आधुनिक सर्वे टोडरमल के द्वारा हुआ था(संभवत: 1601) उसमें पुरैनिया शब्द का जिक्र है। यानी पुरैनिया का नामकरण आज से करीब 400 साल पहले  हो चुका था।

 कुछ लोग इसे पूरण देवी मंदिर से जोड़कर देखते हैं जिसके पीछे संत हठीनाथ और संत नखीनाथ की कहानी है। लेकिन संत हठीनाथ का काल बहुत पुराना नहीं है। वो समय आज से करीब 250 साल पहले का है-लेकिन टोडरमल का सर्वे 400 साल पुराना है-जिसमें पूर्णिया का जिक्र आ चुका है। लेकिन जनमानस में पूरण देवी मंदिर की जो श्रद्धा है उसे देखते हुए कई लोग ऐसी बात जरूर करते हैं।

एक मान्यता यह भी है कि पूर्णिया के इलाके में कभी घनघोर जंगल था, जिस वजह से लोग इसे पूर्ण अरण्य कहते थे। ऐसा संभव है क्योंकि पूर्णिया की अधिकांश बसावट नयी है और आबादी बहुत पुरानी नही है। यहां के जलवायु की वजह से यहां की आबादी ज्यादा नहीं थी और स्वभाविक है कि यहां घना जंगल था। पूर्ण अरण्य यानी पूरा जंगल होने की वजह से लोग इसे पूर्णिया कहने लगें हो तो कोई आश्चर्य नहीं। लेकिन इस बात का भी कोई लिखित दस्तावेज नहीं है।

एक तर्क यह है कि यह इलाका पहले काफी दलदली था और यहां नालों, धारों और जलाशयों में काफी ‘पुरनी’ के पत्ते होते थे। पुरनी का पत्ता तालाब या नदी में खिलनेवाले कमल के पत्ते होते हैं-जिसका इस्तेमाल पारंपरिक भोजों में खाने के लिए किया जाता था। भारी तादाद में पूरनी के पत्ता के उत्पादन होने की वजह से हो सकता है कि लोग इस इलाके को पुरैनिया कहने लगें हो-जो बाद में अपभ्रंश होकर पूर्णिया बन गया।

जहां तक पूरण देवी के मंदिर का सवाल है सन् 1809 में पूर्णिया के बारे में हेमिल्टन बुकानन ने एक रिपोर्ट लिखी थी- एन अकांउट ऑफ द डिस्ट्रिक्ट ऑफ पूर्णिया। इसमें इलाके का काफी बारीक विवरण है। लेकिन उस रिपोर्ट में पूरण देवी मंदिर का जिक्र नहीं है, हां उस रिपोर्ट में हरदा के कामाख्या मंदिर का जिक्र जरूर है! यानी ऐसा संभव है कि पूरण देवी मंदिर का निर्माण उस समय तक न हुआ हो!

खैर, उस जमाने के पुरैनिया(जो बाद में पूर्णिया बना-अंग्रेजी में तो कई-कई बार स्पेलिंग बदल गया!) पहला अंग्रेज सुपरवाइजर-कलक्टर बहाल हुआ 14 फरवरी 1770 को और उसी दिन को आधुनिक पूर्णिया जिले का स्थापना दिवस माना जाता है। उस कलक्टर का नाम था-गेरार्ड डुकेरेल। डुकेरल साहब जब कलक्टर बनकर यहां आए तो इलाके में घने जंगल थे, आबादी कम थी और बसने लायक इलाका नहीं था। इतने बड़े इलाके में(आज के तीनों जिले और बंगाल का इलाका मिलाकर) बहुत कम आबादी थी-महज 4 लाख के करीब।

उसी समय बंगाल में भयानक अकाल पड़ा था जिसमें बंगाल की एक तिहाई आबादी काल के गाल में समा गई थी। यह बात इतिहास में दर्ज है। पूर्णिया की आबादी के 4 लाख में से 2 लाख लोग मर गए। लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए अपनी जमीन, अपने जानवर यहां तक की अपने बाल-बच्चों-औरतों तक को बेच डाला था। उस समय डुकरैल को यहां का कलक्टर बनाया गया था। स्थिति वाकई गंभीर थी। नए कलक्टर को आबादी बसानी थी, व्यवस्था कायम करनी थी और हजारों-लाखों लाशों की आखिरी व्यवस्था करनी थी। डुकरैल ने वो सब काम पूरी मुस्तैदी से किया और प्रशासनिक ढ़ाचा खड़ा किया।

लेकिन डुकरैल का नाम इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया। डुकरैल को उसके अच्छे कामों के लिए बहुत याद नहीं किया गया-जिसका वो हकदार था। दरअसल, डुकरैल से जुड़ी हुई एक कहानी है जो बहुत कम लोगों को पता है। डुकरैल जब पूर्णिया का कलक्टर बनकर आया तो उसे पता चला कि किसी नजदीक के गांव में एक स्त्री विधवा हो गई है और लोग उसे सती बनाने जा रहे हैं।

 इतना सुनते ही डुकरैल सिपाहियों के साथ घोड़े पर सवार हुआ और उसने उस विधवा की जान बचाई। इतना ही नहीं, डुकरैल ने उस विधवा से विवाह कर लिया और सेवानिवृत्ति के बाद उसे अपने साथ लंदन ले गया। उस महिला से डुकरैल के कई बाल-बच्चे हुए। कई सालों के बाद अबू तालिब नामका एक यात्री जब लंदन गया तो उसने बुजुर्ग हो चुके डुकरैल और उसकी पत्नी के बारे में विस्तार से अपने वृत्तांत में लिखा।

 ये घटना उस समय की है जब भारत में सती प्रथा पर रोक लगाने संबंधी कानून नहीं बना था। वो कानून उसके बहुत बाद सन् 1830 में में राजा राम मोहन राय और लॉर्ड विलियम बेंटिक के जमाने में बना-जबकि डुकरैल की कहानी 1770 की है। यानी सती प्रथा कानून से करीब 60 साल पहले की। लेकिन डुकरैल को कोई किसी ने सती प्रथा के समय याद नहीं किया, न ही उसे बाद में वो जगह मिली जिसे पाने का वो सही में हकदार था।

 *डॉ रामेश्वर प्रसाद ने बिहार सरकार और पूर्णिया के कलक्टर से ये आग्रह भी किया कि कम से कम पूर्णिया में एक सड़क का नाम या पुराने कलक्ट्रिएट से लेकर मौजूदा कलेक्ट्रिएट तक की सड़क का नाम ही डुकरैल के नाम पर रख दिया जाए-लेकिन अपने अतीत से कटी हुई, अनभिज्ञ और बेपरवाह सरकार ने इस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया।

कल्पना कीजिए, अगर किसी दूसरे मुल्क में ऐसा कोई सुधारक हुआ होता तो वहां के लोगों ने क्या किया होता! लेकिन ये भारत है जिसे अपने अतीत पर कोई गौरव नहीं, न ही उसे सहेजने की उसे चिंता है।
डुकरैल के नाम पर अररिया(तत्कालीन पूर्णिया जिला) में आज भी एक गांव है! इसे लोग स्थानीय भाषा में डकरैल भी कहते हैं जो मूल नाम का अपभ्रंश है।

पूर्णिया के भूगोल पर कोसी का भी असर रहा है। एक जमाना था जब कोसी इस इलाके से बहती थी, कभी बहुत सुदूर अतीत में कोसी के ब्रह्मपुत्र में भी मिलती थी। लेकिन ये आज पश्चिम की तरफ खिसककर सुपौल से होकर बहती है और बाद में नीचे गंगा में मिल जाती है। पूर्णिया के इलाके से कोसी कोई डेढ सौ साल पहले बहती थी और जगह-जगह इसके अवशेष नदी की छारन के रूप में अभी भी दिख जाएंगे-जब आप पूर्णिया से पश्चिम की तरफ बढ़ेंगे। लेकिन कोसी एक दिन में खिसककर यहां से सुपौल की तरफ नहीं गई। उसमें सैकड़ों साल लगे और लोगों ने अपने आपको उसकी धारा के हिसाब से ढ़ाल लिया। लोग नदियों के साथ जीना जानते थे, इसीलिए कोसी को लेकर किसी के मन में कभी दुर्भाव नहीं पनपा। कोसी हमेशा उनके लिए मैया ही बनी रही-जो लोकगीतों, आख्यानों और किंवदंतियों में दर्ज है।

पूर्णिया की आबादी अभी भी कम है . पहले और भी कम थी। लेकिन इतनी कम आबादी होने की आखिर क्या वजह थी?  इसका जवाब पूर्णिया के जलवायू और कुछ प्राकृतिक परिवर्तनों में छुपा है।

हम पहले  ही लिख चुके हैं कि पूर्णिया में घने जंगल थे और इसकी वजह आबादी का लगभग न होना था। मिथिला और बिहार के अन्य इलाकों में पूर्णिया को कालापानी कहा जाता था-यानी मौत का घर। कुछ लोकोक्तियां इस बात का सबूत है जो हजारों सालों में आमलोगों ने अपने अनुभवों के आधार पर गढे हैं। एक लोकोक्ति है-‘जहर खो, ने माहुर खो, मरै के हौ त पुरैनिया जो’। यानी अगर मरना है तो जहर-माहुर नहीं खाओ...पूर्णिया चले जाओ!

आज से करीब 100 साल पहले तक पूर्णिया का पानी पीने लायक नहीं था और उससे तरह-तरह की बीमारियां हो जाती थी। पूरा इलाका जंगली और दलदली था। ऐसे में आबादी कैसे रहती? लेकिन सन् 1899 और 1934 के बड़े भूकंप ने कुछ ऐसी भूगर्भीय हलचलें की कि यहां के पानी में बदलाव आया और इलाका थोड़ा रहने लायक हो गया। उस समय तक आसपास के जिलों में आबादी का बोझ बढ़ने लगा था और जमीन पर दबाव भी बढ़ गया था। लोग नए इलाके की खोज में पूर्णिया आने लगे। यहीं वो समय था जब बड़े पैमाने पर केंद्रीय मिथिला, बंगाल और मगध के इलाके के लोगों ने यहां प्रवेश किया और ब़ड़ी-बड़ी जमींदारियां कायम की। इसलिए कहा जा सकता है कि पूर्णिया की बसावट अपेक्षाकृत नयी है और यहां का हरेक आदमी कुछ पीढ़ियों में आया हुआ प्रवासी है। पूर्णिया में आज अपेक्षाकृत कम आबादी, खुला-खुला इलाका और हरियाली जो दिखती है उसका कारण यहीं है।  

पूराने पुर्णिया में करीब 28 बड़ी जमींदारियां थीं जिसमें सबसे बड़ी जमींदारी गढबनैली(बनैली राज) का था जिसके बाद में करीब पांच टुकड़े हुए और जिसका बिहार और बंगाल में शिक्षा, कला आदि क्षेत्रों में काफी योगदान रहा। एक जमींदारी रवींद्रनाथ टैगोर की भी थी, जिसे टैगोर इस्टेट कहा जाता था।  अररिया का ठाकुरगंज इलाका उन्हीं  जमींदारी थी, जो उन्हीं के परिवार के नाम पर पड़ी थी। फनीश्वरनाथ रेणु की पुस्तकों में जिन जमींदारियों का जिक्र है, वे सब अपने मूल रूप में उस जमाने में थीं।
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यह आलेख हमारा पूर्णिया साप्ताहिक और इंडिया अनलिमिटेड पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है।

*(डॉ(प्रो) रामेश्वर प्रसाद ने ऑक्सफोर्ड, भागलपुर और बीन एन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा में अध्यापन किया है। पूर्णिया पर शोध को लेकर देश विदेश में चर्चित। बिहार के स्वतंत्रता सेनानियों के ऊपर डिक्शनरी ऑफ नेशनल बायोग्राफी का लेखन। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल मैन ऑफ द ईयर पुरस्कार से सम्मानित। संप्रति पूर्णिया में ही रहते हैं)

Saturday, May 02, 2015

इंटरनेट की दुनिया में बस्ती-बसाती गांव की कहानी

इंटरनेट अब हमारी जिंदगी का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों तक इंटरनेट का जाल बड़ी तेजी से बिछता चला जा रहा है। ऐसे में गांव-देहात भी कहां पीछे रहने वाला है।

इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली विभिन्न कंपनियों का नेटवर्क अब गांव में भी पहुंच चुका है। ऐसे में हम आपको बिहार के एक ऐसे गांव की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसकी अपनी खुद की एक वेबसाइट है। आइए, हम आप बिहार के उस ऐतिहासिक गांव की यात्रा करें, जो देश-विदेश के लोगों को वेबसाइट के जरिए जोड़ने का काम कर रही है। 

वैसे तो सूचना संचार के इस डिजीटल युग मे वेबसाइट बनाना कोई बड़ा काम नहीं है और न ही कोई नई बात लेकिन गांव के लिए इस तरह की बातें करना सचमुच में एक क्रांतिकारी कदम है। वो भी एक ऐसे गांव के लिए जो हर साल कोसी की विभीषिका को झेलता है, जिसके लिए बाढ़ शब्द एक बुरे सपने की तरह है। उस गांव का नाम है- महिषी। 

बिहार के सहरसा जिला स्थित महिषी गांव की अपनी वेबसाइट है। वैसे तो मंडन मिश्र की जन्मस्थली होने के कारण महिषी किसी पहचान का मोहताज नहीं है। गौरतलब है कि मध्यकाल के आध्यात्मिक चिंतन के पुरोधा माने जाने वाले मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ के लिए करीब बारह सौ वर्ष पूर्व जगतगुरु शंकराचार्य यहाँ पहुंचे थे।

अतीत में और पीछे जाएँ तो पाते हैं कि मुनि वसिष्ठ ने हिमालय की तराई तिब्बत में उग्रतारा विद्या की महासिद्धी के बाद धेमुड़ा (धर्ममूला) नदी के किनारे स्थित महिष्मति (वर्तमान महिषी) में माँ उग्रतारा की मूर्ति स्थापित की थी।
इतिहास की पन्नों से जब हम बाहर निकलते हैं तो गांव घर की बातों को इंटरनेट के जाल पर खोजने बैठ जाते हैं तभी हमारी मुलाकात महिषी गांव  के दो युवा अमित कुमार चौधरी और अमित आनंद से होती है। इन दोनों ने मिलकर महिषी की वेबसाइट http://mahishi.org/ बनाई है। साइबर संसार में गांव-देहात का दखल मेरे लिए एक रोचक कहानी की तरह है।

महिषी की एतिहासिक बातों की जानकारी दुनिया के दूर दराज के लोगो तक पहुंचे इसके लिए इंटरनेट के जरिये महिषी पर आधारित वेबसाइट का निर्माण वर्ष 2011 मे किया गया था। महिषी डॉट ओर्ग के होम पेज की खुलते ही माँ उग्रतारा की लोगो को दर्शन होतें हैं जो कहीं न कहीं महिषी की झलक प्रदान करता है। महिषी का इतिहास
, कैसे महिषी देश के विभिन्न शहरों से आयें कहाँ ठहरे उसकी विस्तृत जानकारी वेबसाइट विजिटर के लिए है।

अमित कुमार चौधरी बताते हैं की वेबसाइट को देख कर राज्य के बाहर से लोग उनसे ईमेल के जरिए संपर्क कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के एक सज्जन ने महिषी की देवी माँ उग्रतारा के नाम प्रसाद चढाने की इच्छा जाहिर की।
वहीं दूसरी ओर वेबसाइट के कॉडिर्नेटर अमित आनंद की इच्छा है कि इस वेबसाइट को लोगबाग एक सन्दर्भ वेबसाइट के रूप में लें। उन्होंने बताया कि वे चाहते हैं कि गांव की प्राचीन जानाकरियां लोग हासिल करें और इस पर शोध हो। वे गांव को अंतराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर लाना चाहते हैं।

गौरतलब है कि आज से चार-पांच साल पूर्व तक जब भी बिहार के महिषी इलाके की चर्चा आती थी तो लोगों के जेहन में जल-प्रलय की भयावह तस्वीर उभर आती है
, जिसका सामना पूर्वोत्तर बिहार के कुछ जिले करते आए हैं। 2008 के प्रलयंकारी बाढ़ की तस्वीरें आज भी हमें डरा देती है। लेकिन यह क्षेत्र अपने इतिहास में न जाने कितने गौरव समेटे है पर इसे पुनर्स्थापित करने की सुध किसी को नहीं है।

महिषी का एक स्वर्णिम पक्ष मध्यकाल के एक ऐसे विद्वान मंडन मिश्र की जन्मभूमि होना भी है, जिनके विचारों पर आज भी शोध हो रहे हैं। महिषी गांव के के नाम पर विधानसभा क्षेत्र का नाम भी है
, लेकिन परिसीमन करने वालों ने महिषी विधानसभा में महिषी गांव को शामिल नहीं किया।

महिषी में उग्रतारा मंदिर में देवी की मूर्ति के ऊपर महात्मा बुद्ध की मूर्ति है। शायद बुद्ध की मूर्ति यह दर्शाता है कि एक समय में मिथिला में भी बौद्ध धर्म का खासा प्रभाव हो गया था। साथ ही बहुत सारी प्राचीन मूर्तियां हैं, जिसकी सुरक्षा भगवान भरोसे है।

हिंदी-मैथिली के प्रसिद्ध साहित्यकार राजकमल चौधरी का जन्म महिषी में ही हुआ था। इसके अलावा नई पीढ़ी में भी इस गांव का साहित्य और समाज के अन्य क्षेत्रों में दखल है। महिषी कहानी कहते हुए मुझे देश के गांवों को पत्रकारिता के केंद्र में लाने के लिए मशहूर पत्रकार पी. साइनाथ की भी याद आ रही है। दरअसल उन्होंने इस साल की शुरुआत में एक पहल की है। साईंनाथ ने ग्रामीण पत्रकारिता के अपने वर्षों के अनुभव के बाद एक वेबसाइट शुरू की। वेबसाइट का नाम रखा है- परी (पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया) यानी ग्रामीण भारत का जन संग्रहालय। ऐसे में महिषी गांव का इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय रहना डिजीटल युग के लिए सुखद खबर है और मैं इसे साईंनाथ की परी से जोड़कर देखने लगा हूं।

Thursday, April 30, 2015

एक किसान की कहानी, रवीश कुमार की जुबानी


किसान गिरीन्द्र का पूरा ब्लॉग पढ़ें

मैं गिरीन्द्र। दो साल पहले तक दिल्ली और कानपुर में खबरों की दुनिया में रमा रहने वाला एक शख्स, जिसके लिए खबर की दुनिया ही रोजी रोटी थी, लेकिन उसके भीतर अपना एक गांव था, जिसमें रेणु की एक बस्ती थी...उनका मैला आंचल था...परती परिकथा थी।


उसी गांव ने मुझे महानगरीय जीवन से कोसों दूर अपनी परती जमीन की ओर ले जाने का काम किया और पेशे से पत्रकार गिरीन्द्र पहुंच गया सूबा बिहार के पूर्णिया जिला। अपने गाम-घर। खेती बारी करने। वही पूर्णिया जिला, जो इन दिनों तूफान की तबाही के कारण आप लोगों के जेहन में है। जहां के बारे में फणीश्वर नाथ रेणु कहते थे- आवरन देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान.. । यह सब एक झटके में नहीं हुआ था, इसके पीछे मन से हमने पांच साल तक लड़ाई लड़ी। तब जाकर मन राजी हुआ, गांव लौटने के लिए।

अब तो किसानी करते हुए दो साल हो गए हैं, मतलब कुल जमा 730 दिन। गिनती के इन दिनों में हमने ढेर सारे उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन साल 2015 मेरे जैसे किसानी कर रहे लोगों की परीक्षा ले रहा है। मार्च के अंत में हमने बिन मौसम बारिश का तांडव देखा। गेंहू और सरसों की फसलों को आंखों के सामने तबाह होते देखा, लेकिन पिछले मंगलवार को यानी 21 अप्रैल को प्रकृति की मार ने हमारी रही सही कमर भी तोड़ दी।

तूफान की चपेट में हमने सब कुछ गंवा दिया। मक्का की फसल चौपट हो गई। कहते हैं कि पूर्णिया जिले में घासफूस के घर में रहने वाले किसान मक्का की फसल से पक्का मकान का सफर तय करते हैं। खूब आमदनी होती है इसकी खेती से, लेकिन वक्त के आगे किसी की नहीं चलती है।

मंगल की रात आधे घंटे का तूफान ने हमारी जिंदगी को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है, जिसके आगे घुप्प अंधेरा है।  पिछले चार दिनों से बिजली हमसे दूर है। बिजली जो रोशनी देती है, वह भी हमसे दूर हो गई है। पता नहीं किसानी की किस्मत का गणित जोड़ घटाव करते हुए कैसे सब कुछ बांट देता है। गणित के उस सवाल की तरह जिसमें भाग करते हुए हमारे हिस्से में केवल शून्य ही नसीब होता है। शायद यही जीवन है। किसानी करते हुए हमने जीवन का इतना उलझा गणित नहीं देखा था।

कल तक जिस खेत में मक्के का जवान पौधा अपनी जवानी पर इठला रहा था, उसे हमने अपनी नजरों के आगे धरती मैया के गोद में रोते बिलखते देखा। खेती करते हुए हमने जाना कि हर फसल हमारे लिए संतान है। धान मेरे लिए बेटी की तरह है तो मक्का मेरा बेटा है, जो मुझे साल भर का राशन पानी देता है। उस मक्के को जब मैंने खेत में लुढके देखा तो मन के सारे तार एक साथ टूट गए।

जब मैं वातानुकूलित कैबिन वाले ऑफिस में पत्रकारिता किया करता था तो लंच टाइम में हम गांव देहात की बातें करते थे। आह ग्राम्य जीवन!  जैसे जुमले से गांव घर की बातें करते थे। हमारे लिए गांव उस वक्त एक ऐसी दंतकथा की तरह था, जिसमें केवल सुख ही सुख होता है। हम अंचल की सांस्कृतिक स्मृति में हरी दूब की तलाश किया करते थे, लेकिन जब किसानी करने धरती पर उतरे तो जान गया कि इस धरती पर किसानी ही एक ऐसा पेशा है जहां हम सौ फीसदी प्रकृति पर निर्भर होते हैं और यहां सुख की तलाश में दुख से रोज मिलनाजुलना होता है।

प्रकृति की बदौलत दौलत बनाते हैं और उसी की बदौलत दौलत को पानी में बहते भी देखते हैं। गाम की सुलेखा काकी का आंगन मंगल की रात तबाह हो गया। आंगन के चूल्हे में रात में रोटी पकी थी, दूध उबला था। खाने के बाद सब जब सोने गए तभी हवा का जोर बारिश के संग तबाही की पटकथा लिखकर आ चुका था और आंगन-घर सब कुछ उड़ाते हुए निकल गया और छोड़ दिया सुलेखा काकी को बस रोने के लिए।

सूबे के मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से ऊपर से देखकर निकल लिए। मुआवजा की मौखिक बारिश करते हुए वे शांत-चित्त मुद्रा में अखबारों –चैनलों पर अवतरित हुए लेकिन सुलेखा काकी जैसे लोगों का दुख बांटने जमीन पर कोई नहीं आना चाहता। गाम के अलाउद्दीन चच्चा कहते हैं-“ तुम तो खेती किसानी करते हुए लिखते पढ़ते भी हो न! तब तो तुम्हें पता होना चाहिए कि सूबे में चुनाव होने वाले हैं। अब तो तूफान भी सियासी करने वालों के लिए वक्त पर आने लगा है...। “ इतना कहने के बाद चच्चा की आंखें भर आईं और वे मुझे अपनी बंसबट्टी दिखाने लगे जहां बांस उखड़े पड़े हैं..।

किसानी करते हुए हम सुनहरे भविष्य का सपना देखते रहते हैं। फसल बेचकर जीवन की गाड़ी को और आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं। देखिए न, इस बार उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी तो बाबूजी को एक बार फिर दिल्ली ले जाएंगे। वहां किसी अनुभवी न्यूरो सर्जन से दिखाएंगे। इस आशा के साथ कि वे फिर खड़े हो जाएं और मुझे समझाएं कि फलां खेत में आलू लगाना तो पूरब के खेत में गरमा धान। बाबूजी की तबीयत को लेकर मैं खुद को एक भरम में रखता आया हूं इस आशा के साथ कि वह ठीक हो जाएंगे। पिछले दो साल से मक्का की फसल मेरे उस भरम को मजबूत करता रहा है, लेकिन इस बार वो भरम भी टूट गया।


ये अनुभव केवल मेरा नहीं बल्कि मेरे जैसे सैंकड़ों किसानों का होगा, जिसने इस बार तूफान की तबाही को भोगा है। कल रात रेडियो पर सुना कि लोकसभा में शून्यकाल के दौरान संसद में तूफान से हुई तबाही का मुद्दा छाया रहा। मेरे जैसे किसान की गुजारिश बस इतनी है कि किसानी-मुद्दे को राजनीति की किताब का कवर पेज न बनाया जाए। पूर्णिया और प्रभावित जिले के किसानों तक सहायता पहुंचे।

उस किसान के बारे में दिल्ली में बैठे लोग सोचने की कोशिश करें, जिनके घर में मातम फैला है, उन घरों के बारे में सोचें जहां कि छत हवा में उड़कर कहीं दूर चली गई और बिलखते बच्चे धूप में रो रहे हैं। यह सब आंखों से देख रहा हूं। कैमरे का लैंस तस्वीरें लेने से मना कर रहा है।

मन के भीतर बैठा खुद का संपादक दुख की मार्केटिंग करने से मना कर रहा है, वह कहता है शब्दों के जरिये लोगों तक अपनी बातें पहुंचाओ। शब्द की ताकत ऐसी होती है कि वह दिल को छू लेता है। मन की बात सुनकर मैं सहम जाता हूं और एक नजर फिर अपने खेत की ओर देता हूं और फिर मुड़कर बिछावन पर लेटे बाबूजी को देखने लगता हूं। सोचता हूं कि यदि वे ठीक रहते तो मुझे समझाते- “डरो मत, लड़ो। किसानी करते हुए लड़ना पड़ता है और फिर वे कुछ मुहावरा सुनाते और कहते कि जाओ घुमो और तबाही के मंजर को महसूस करो ताकि तुम्हें अपना दुख कम दिखने लगे क्योंकि तुमसे भी ज्यादा क्षति और लोगों की हुई है।“

किसानी करते हुए खुद का दुख मैं शब्दों के जरिये बयां करता हूं। इस बार की तबाही मुझे सुखर कर रही है। तबाही का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। किसानी के मुद्दों से राजनीति की रोटी सेंकने वाले लोगों से डर भी लग रहा है। मुआवजा का बंदरबांट होना अभी बाकी है। लोगों तक मुआवजे की राशि कब पहुंचेगी या कितनी पहुंचेगी, ये भी एक कहानी होगी। हम सब उस कथा के चरित्र होंगे, जिसे बाद हर कोई हमें भूला देगा। लेकिन याद रखिए, रोटी के लिए गेहूं , चावल के लिए धान और मल्टीप्लेक्स में आपके पॉपकार्न के लिए मक्का हम सब ही उपजाते हैं। यदि एक आंधी हमें बरबाद कर सकती है तो याद रखिए एक अच्छा मानसून हमें बंपर फसल भी देगा। हम हार नहीं मानेंगे। हम जानते हैं कि हमारे हाथ में केवल बीज बोना है। फसल की नियति प्रकृति के हाथों में हैं। आंधी और बारिश की मार से हम हार नहीं मानेंगे। सरकारी मुआवजा हमारे बैंक-खातों में कब पहुंचेगा ये तो हमें पता नहीं, लेकिन इतना तो जरूर पता है कि अगली फसल के लिए हमें खूब मेहनत करनी है। मौसम की मार सहने के बाद हिम्मत जुटाकर फिर से खेतों में लग जाना है। केवल अपने और परिवार के पेट के लिए नहीं बल्कि आप सबों के डाइनिंग टेबल के लिए भी।

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'खेत में सन्नाटा है, ये ख़ामोशी डराती है..'



'मंगल की रात कोसी के किसानों के लिए अमंगल साबित हुई. पूर्णियों में हम जिस फ़सल को चार महीेने से पाल रहे थे, वो आधे घंटे में चौपट हो गई. मेरी किसानी एक झटके में मेरी आँखों के सामने लुढ़क गई.''
ये कहना है गीरिन्द्र झा का जो पेशे से किसान हैं और बिहार के पूर्णियां ज़िले में रहते हैं.
पूर्णियां उन कई ज़िलों में से है जहां मंगल की रात आए भयंकर तूफ़ान में 65 लोगों की मौत हो गई, लगभग 2000 घायल हैं और लाखों का नुक़सान हुआ है.

गिरिन्द्र झा का दर्द उन्हीं की ज़ुबानी

"मार्च के आख़िरी दिनों में हमने गेहूं को बर्बाद होते देखा था और अप्रैल के आखिरी दिनों में हमने तैयार खड़ी मक्के के फसल को काल के मुख में जाते देखा.
अब रोने के सिवा हमारे पास कोई विकल्प नहीं.
'डर खेत की ख़ामोशी से ..'
खेत में सन्नाटा पसरा है. सच कहूँ तो खेत की इस चुप्पी से डर लग रहा है.
फसल से हमें उम्मीदें थीं. फसल ही हमारी रोज़ी रोटी है.
धरती मैया को कुछ और ही मंज़ूर था!
शायद वो इस बार हमारी जीवठता की कठिन परीक्षा लेना चाहती है.
कल से ही हम सब बिन बिजली के हैं. ऐसा लगता है मानो रोशनी भी हम लोगों से जी चुराना चाहती है.
कल आसमान में जब मुख्यमंत्री का हेलीकाप्टर उड़ते गाँववालों ने देखा तो मेरे गांव के श्रवण मुर्मू ने कहा कि सरकार हमें और हमारी खेतों को शायद ऊपर से ही देख रही है!
इतना कहने के बाद वो फफक फफक कर रोने लगा.

'मुआवज़े का दर्द किसान ही जाने'

दरअसल मुआवज़ा जैसे सरकारी जुमले से हम किसान आजिज़ आ चुके हैं. साल 2011 में जो मक्के की फसल बर्बाद हुई थी उसका मुआवजा मुझे 2013 में मिला.
ऐसे में मेरे ग्रामीण श्रवण का दर्द आप समझ सकते हैं.
हम ऋण लेकर किसानी करते हैं. मक्का से हमारी उम्मीद थी. सोचा था फ़सल बेचकर बैंक का बकाया चुकता करेंगे.
बाबूजी के बेहतर इलाज के लिए बाहर जाएंगे, लेकिन उम्मीदें बस उम्मीदें ही रह गईं!
लीची और आम की फ़सल भी इस तूफ़ान में हमसे दूर हो गयी. आम के टिकोलों से लदे गाछ टूट गए, ऐसे जैसे बच्चों के खिलौने टूटते हैं.
बहुत कुछ गवां गए हम सब. किसानी का दर्द शायद दुनिया का सबसे ला-इलाज दर्द होता है. कोई दर्द निवारक दवा काम नहीं करती है.
गाँव की उन बस्तियों को हमने ताश की पत्तियों की तरह उड़ते देखा जहां घर टीन और चदरे से बने थे. घर के सामने फ़सल रखे थे, तैयार करने के लिए....पानी और हवा के तांडव ने उसे भी अपने पेट में रख लिया.

सच होती पुरानी कहावतें

अब हम जाएँ तो कहाँ जाएँ!
पूर्णिया ज़िले के लिये कभी एक कहावत प्रचलित थी - "जहर नै खाऊ, माहुर नै खाऊ, मारबाक होये त पूर्णिया आऊ."
मंगल की रात आये तूफ़ान ने हमें इस कहावत पर सोचने पर मजबूर कर दिया.
गाँव के युवा तबक़े के लोग कह रहे हैं कि वे अब निकल जाएंगे मजदूरी करने दिल्ली-पंजाब.
मज़दूरी के सिवा उनके पास अब कोई चारा नहीं बचा. नियति पर विश्वास करने वाले हम जैसे किसान अब बस यही कह सकते हैं - सबहि नचावत राम गोसाईं.
गाँव के 20-25 साल के लड़कों की बातें सुनने के बाद मैं अपने उजड़े खेत के सामने खड़ा ख़ुद से पूछ रहा हूँ कि कहाँ जाऊं मैं?
मुझे कबीर याद आ रहे हैं, उनकी एक वाणी है - कहाँ से आये हो कहाँ जाओगे?
पहले गेहूं और अब मक्का, आम और लीची गवांने के बाद मैं यही सब सोच रहा हूँ लेकिन इस उम्मीद के साथ कि उजाला तो होगा!
धरती मैया हमारी पुकार तो सुनेगी एक दिन .. उजड़े खेतों में अगली बार मक्का भी लहलहाएगा और गेहूं भी! आम भी होगा और लीची भी!
किसानी करते हुए हमने यही जीवठता सीखी है अपने गाँव से.
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Wednesday, April 29, 2015

बस यूं ही...

जब सबसे अधिक परेशान रहता हूं, चारों ओर से अंधेरा दिखने लगता है तो मैं कुछ लोगों को पढ़ता, सुनता और देखता हूं। घुप्प अंधेरे में ‘मैं’ पीयूष मिश्रा का लिखा सुनता हूं, रवीश की किसी पुरानी रपट यूट्यूब पर देखने लगता हूं, सदन झा का कोई आलेख पढ़ने बैठ जाता हूं..तो राजशेखर के लिखे गीतों को बुदबुदाने लगता हूं। ऐसा करना मेरे लिए योग की तरह साबित होता है, रवींद्र नाथ ठाकुर के योगायोग की तरह। मुझे आराम मिलता है। पता नहीं इसके पीछे कारण क्या होंगे लेकिन जो भी होंगे ..मेरे लिए तो रामबाण ही साबित होते आए हैं।

पीयूष मिश्रा की आवाज मेरे लिए एंटीबायोटिक का काम करती आई है। जब खूब परेशान होता जाता हूं या कुछ सूझते नहीं बनता है तो इक बगल में चाँद होगा, इक बगल में रोटियाँ सुनने लगात हूं। जब वह कहते हैं कि हम चाँद पे, रोटी की चादर डाल के सो जाएँगे..और नींद से कह देंगे लोरी कल सुनाने आएँगे..तो मुझे शांति मिल जाती है। सब आपाधापी छू मंतर :)

ठीक ऐसी ही अनुभूति रवीश कुमार की पुरानी रपटों में मुझे होता है। मैं यूट्यूब पर रवीश की रिपोर्ट खंगालने लगता हूं। मैं अक्सर जब परेशांन होता हूं तो शुक्रवार, 7 जनवरी 2011 को एनडीटीवी इंडिया के कार्यक्रम रवीश की रिपोर्ट देखने लगता हूं। इस रिपोर्ट का नाम था - भूख पर लगी धारा 144...। रवीश के साथ सहबा फारुकी थीं, जो कहानी के भीतर कहानी की रेसे को अलग कर रही थीं। सच कहूं तो इसी रपट से जान सका कि कोई दो रुपये के लिए भी आठ घंटा काम कर सकता है। मुझे अपना दर्द कम लगने लगता है। मैं खुद से बातें करना लगता हूं। रवीश मुझे कभी कभी गाम के कबिराहा मठ के अखड्ड बूढ़े की तरह लगने लगते हैं। जो हर बात बिना लाग लपेट से कह देता है और फिर निकल पड़ता है..आगे..खूब आगे।

इन्हीं सबके बीच सदन सर का लिखा मैं पढ़ने लगता हूं। वे मुझे अंचल की सांस्कृतिक स्मृति के करीब ले जाकर खेत में अकेले छोड़ देते हैं..और मैं खुद से बातें करना लगता हूं। पूर्णिया जिले की नदियां..गांव में लगने वाले हाट – बाजार ..मैं इन सबमें दिल बहलाने लगता हूं..इन सबमें संगीत खोजने लगता हूं। खेती बारी से इतर जीवन को इस नजर से भी देखने जुट जाता हूं। शहर और गांव की आंखें मुझे अपनी ओर खींचने लगती है। परेशानी के वक्त मैं सदन सर के शोधपरक काम डाकवचन पढ़ने लगता हूं। जहां भी गूगल के जरिए उनका लिखा मिलता है, पढ़ने लगता हूं। मन थोड़ा हल्का हो जाता है।

गाम-घर करते हुए अचानक हमारे बीच राजशेखर आ जाते हैं, जिनका लिखा एक गीत मेरे मन में बस चुका है। तनु वेड्स मनु का गीत जब सुना तो लगा कि यह आदमी तो दुख को भी सूफी कर देगा। वो जब भी मिलेंगे तो मैं उनसे एक सवाल जरुर करूंगा कि आपने ये कैसे लिख दिया- “नैहर पीहर का आंगन रंग..नींदे रंग दे..करवट भी रंग....” राजशेखर से मैं जरुर मिलूंगा..बहुत सवाल करुंगा..उन्हें अपने गाम ले जाउंगा और उन्हें बस बोलते हुए सुनता रह जाउंगा...


देखिए न इतना कुछ लिखते लिखते मन मेरा भर आया है। मेरे यार-दोस्त बोलते हैं कि मैं कुछ ज्यादा ही भावुक हूं, अरे, मैं क्या करूं, अक्सर कई चीजें मुझे हैरान कर देती है और मैं बह जाता हूं। अभी बस इतना ही। गुलजार के शब्दों के पास जा रहा हूं और बुदबुदाता हूं कि गिरा दो पर्दा कि दास्तां खाली हो गई है...





Monday, April 20, 2015

कोसी की माटी की खुश्बू है भगैत गायन

कोसी के कई जिले की उपजाउ मिट्टी जिस तरह से साल में तीन बंपर फसलें देती हैं, ठीक उसी तह यहां की फिजा ग्राम्य लोक संस्कृतियों से सालों भर महकती रहती है। यकीन मानिए यहां के गांवों में कई चीजें ऐसी छुपी है कि जिसे देख और सुनकर आप मस्ती के आलम में झूम सकते हैं। तो चलिए, आपको ले चलते हैं कोसी के उन गावों में जहां आपकी मुलाकात ऐसी ग्राम्य गीतों से हम करवाएंगे, जिसमें एक ओर सूफियाना रंग का अहसासा मिलेगा वहीं दूसरी ओर किसानों की आत्मा आपको दिख जाएगी। असल में गांव से कनेक्शन यही है क्योंकि गांव की कुछ चीजें आपको खुद के मोहपाश में बांध लेती है और गांव के ही हो जाते हैं।

भले ही बेमौसम बरसात ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है लेकिन इसके बावजूद जो कुछ फसल घर तक किसान लाए हैं उसी से वे खुश हैं। ग्राम्य गीतों के जरिए वे अपनी मन की बात रखते आए हैं। ऐसे कई गीतों को सुनते समय "देहातीत" सुख का आनंद मिलता है।

"विदापत-नाच" हो या फिर "भगैत", ये दोनों कोसी की माटी की खुश्बू को खुद में समेटी हुई है। हालांकि विदापत नाच अब खत्म हो चुका है लेकिन भगैत के प्रति लोगों का आकर्षण अभी भी बना हुआ है। "भगैत" कोसी के तकरीबन सभी जिलों में खूब गाया और बांचा जाता है।

भगैतक के तीन अंग माने गए हैं। गायन, नाट्य, और दर्शक। गायन में गीत के संग बोलचाल को शामिल किया जाता है। मंडली के सदस्यों को भगैतिया कहा जाता है। दरअसल भगैत एक ऐसा लोकगीत है, जिसमें गीत के संग-संग गायक लोगबाग को कुछ बातें भी बताता रहता है।

आप कह सकते हैं कि गीत के संग डॉयलॉग भी चलता रहता है। कहानी की शैली में गायक अपने दल के साथ भगैत गाता है। इसे सुनने के लिए झुंड के झुंड लोग उस जगह जमा होते हैं जहां भगैत होता है। 10 से 11 लोगों की एक टीम होती है जो भगैत गाते हैं।

भगैत दल के मुखिया को "मूलगैन" कहते हैं। मूलगैन गांव-घर की बोली का शब्द है, इसे आप ‘मूल-गायक’ भी कह सकते हैं। मूलगैन कहानी प्रारंभ करता है और फिर समां बंध जाता है। हारमोनियम और ढ़ोलक वातावरण में रस का संचार करते हैं। दाता धर्मराज, कालीदास, राजा चैयां और गुरू ज्योति, भगैत के मुख्य पात्र होते हैं।
भगैत सांप्रदायिक सौहार्द का शानदार उदाहरण हैं। जहां एक ओर इस गायन शैली में हिंदू पात्र होते हैं वहीं दूसरी ओर उसी सम्मान से मुस्लिम पात्र भी आपको मिल जाएंगे। दाता धर्मराद, गुरु ज्योंति जैसे हिंदू पात्रों की तरह मुस्लिम समुदाय के लिए "मीरा साहेब " प्रमुख पात्र हैं।

मुस्लिम के लिए होने वाले भगैत को "मीरन" कहा जाता है। यहां बोली जाने वाली ठेठ मैथिली में भगैत और मीरन गाया जाता है। गौर करने लायक बात यह है कि इस कथा-गीत में अंधविश्वास सिर-चढ़कर बोलता है। मसलन मूलगैन पर भगवान आ जाते हैं। वह जो कुछ बोल रहा है, वह ईश्वर-वाणी समझी जाती इस कार्यक्रम बलि-प्रथा और मदिरा की खूब मांग होती है।

48 घंटे तक अनवरत चलने वाले इस कार्यक्रम का आयोजन अक्सर गांव के बड़े भू-पति हीं करते हैं। क्योंकि इसके आयोजन में अच्छा-खासा खर्च होता है। अक्सर फसल कटने के बाद हीं ऐसे आयोजन होते हैं। क्योंकि उस वक्त किसान के पास अनाज और पैसे कुछ आ ही जाते हैं।

भगैत के इन सभी पक्षों पर नजर दौड़ाते हुए हमें यह भी समझ में आता है कि गायन की यह शैली म्यूजिक थेरेपी का भी काम करती है। हाल ही में एक भगैत में शामिल होने का मौका मिला तो वहां मैंने देखा कि एक बीमार आदमी को गीत के जरिए स्वस्थ किया जा रहा था।
गीत के विभिन्न रागों और आवाज के उतार-चढ़ाव के जरिए उस बीमार आदमी को हमने सामान्य अवस्था में चलते हुए पाया। दरअसल यह भगैत का एक दूसरा पक्ष है, जिस पर लंबी चर्चा हो सकती है, बहस की गुंजाइश है लेकिन इन ये भी सत्य है कि भगैत एक कला के रूप में अलग हीं दुनिया बसाता है, जिस दुनिया में गांव-घर के लोग आनंद खोजते हैं, सुख की तलाश करते हैं, दुख के बादल छंट जाने की प्रार्थना करते हैं।

कोसी के ग्राम्य संस्कृति में भगैत रच-बस गया है। हर साल गांव के लोग फसल कटने के बाद भगैत में डूब जाते हैं। भगैत के गायन शैली में वे सुख-दुख से ऊपर उठकर खो जाते हैं। चलत-चलते हम आपको भगैत गायन की एक पंक्ति सुनाना चाहेंगे, जिसमें गांव में भविष्य में आने वाली विपत्ति के प्रति गांव वालों को सचेत किया गया है। मूलगैन (मूल-गायक) कह रहा है-

" हे हो... घोड़ा हंसराज आवे छै/
गांव में मचते तबाही हो/
कहॅ मिली क गुरू ज्योति क जय..." 
( सुनो सभी, घोड़ा हंसराज आने वाला है, गांव में मचेगी अब तबाही, सब मिलकर कहो गुरू ज्योति की जय )

Sunday, April 19, 2015

रैली के बहाने रविवार को 'किसानी - बात'

राहुल गांधी जैसे राजनीति करने वाले लोग जब किसानों की बात करते हैं न तो मुझे दिल्ली-कानपुर में बिताए अपने सुनहरे दिनों की याद ताजा हो जाती है। वातानुकूलित कमरों में बैठकर हम किसान, समाज, गांव-घर आदि की बातें करते थे और आह! ग्राम्य जीवन जैसे जुमलों का लेखनी और बोली में प्रयोग करते थे। 

अंचल की सांस्कृतिक स्मृति की बदौलत देहात की बातें करते थे। खेती कर रहे लोगों की बातें करते थे। ये सब बस बातें थीं और असल जिंदगी में जब किसानी और किसान के बीच पहुंचे और किसानी पेशा को अपनाया तो जान गया कि महानगरों में अब तक जो हम खेती आदि की बातें कर रहे थे वो असल में बकैती थी और कुछ भी नहीं।

राहुल गांधी ने जब किसान रैली की बातें की, किसानों से मुलाकात की और मुलाकात करने वाले किसानों की जब तस्वीरें सोशल मीडिया के जरिए मेरे जैसे किसान तक पहुंची तो मैं मन ही मन मुस्कुराने लगा। गुलाबी पगड़ी में किसानों को देखकर मुझे बॉलीवुड फिल्मों की याद गई। सच कहिए तो किसान शब्द अब मुझे सबसे अधिक बिकाऊ लगने लगा है। जिसे देखिये वो ही किसान और किसानी पर कथा बांचने लगा है । लेकिन क्या कोई किसानों के लिए सच में कुछ कर रहा है? ये सबसे बड़ा सवाल है।

जान लीजिये किसानी कर रहे लोग अन्नदाता हैं, हर चीज के बदले एक चीज होती है लेकिन अन्न के बदले कुछ भी नहीं है। यदि आपको भूख लगेगी तो अन्न ही चाहिए, कपड़ा, मकान, हथियार, गाड़ी –घोड़ा आपकी भूख नहीं मिटा सकती है।
किसानों की रैली चाहे जो दल आयोजित करे उसमें किसानों की उपस्थिति पर भी गौर करना होगा।

किसानों की रैली में दिल्ली आसपास से आए किसानों के बारे में सोचने की जरुरत है। रैली में जो किसान लाए गए होंगे क्या उनके खेतों के बारे में कभी आपने सोचा है? वे सब खेत के लिए जीते हैं राहुल बाबा! अभी उन्हें खेतों में होना चाहिए। फसल कटाई और सिंचाई का वक्त है और राजनीति की खेती कर रहे आप जैसे लोगबाग उन्हें अपनी खेती में फंसाने में लग जाते हैं। यह जायज नहीं है।

दिल्ली की पंचसितारा राजनीति करते हुए किसानों की बात करने वाले लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि किसानों की इस बार कमर टूट गई है, जिन किसानों ने अगेती गेहूं बोया था, उन्हें नुकसान ज्यादा हुआ है। उनकी पचास फीसदी से भी अधिक फसल बर्बाद हो गई है। हम जानते हैं कि सरकार को सांसद और विधायक चलाते हैं, लेकिन वे सब अन्न खाते हैं। अन्न दाताओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए सांसदों व विधायकों को।

आप सब किसानों के नाम पर सिर्फ राजनीति कर रहे हैं। इंटरनेट के जाल पर आवाजाही करते हुए पता चलता है कि कई नेता अपना पेशा खेती लिखते हैं, लेकिन वह खेत पर जाकर कभी नहीं देखते। चौधरी चरण सिंह किसानों के नेता थे। लालबहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा देकर किसानों का सम्मान बढ़ाया, किंतु अब नेताओं के दिलों में किसानों का दर्द नहीं है। 

किसानों के नाम पर सिर्फ सियासी रोटियां सेकते हैं। किसान यूनियन के नाम पर भी कुछ ऐसा ही किया जा रहा है, इसमें ऐसे लोग शामिल हैं, जो खुद भी खेती नहीं करते, कई के पास तो जमीन हीं नहीं है। दबाव बनाकर अपने उल्टे सीधे काम निकालते हैं। उन्होंने इसे अपना धंधा बना लिया है। सरकार किसानों की सहायता समय से नहीं कर पाती। किसानों तक सरकारी सहायता पहुंचते पहुंचते एक अर्सा गुजर जाता है। बाद में भी जो मुआवजा बंटता है, उसमें ज्यादातर हिस्सा कर्मचारी खा जाते हैं। 

ऐसे में किसानों को लेकर मुल्क की राजधानी और राज्यों की राजधानियों में आने वाले दिनों में खूब सम्मेलन होंगे लेकिन किसानों की बात उसमें क्या होगी ये हम सब जानते हैं। मेरे जैसा किसान जो सोशल मीडिया पर सक्रिय है और अपनी बात लिखता रहता है वह यह भी जानता है कि किसान सबसे साफ्ट टारगेट होता है लेकिन यह सब जानते हुए भी मैं अपना भरम तोड़ना नहीं चाहता और इच्छा यही है कि किसानी के प्रति मेरा मोह बना रहे। साल में कभी कभी जब फसल कमजोर होती थी तब बाबूजी के मुंह से मैं एक कहावत सुनता था- "मरैक सोचि क' खेती नँइ करी आ जीवी त' खाई की?  मतलब मौत के बारे में सोचकर खेती न करुं और जिंदा रहूं तो फिर भोजन क्या करूं...। किसानी कर रहे लोगों की असली तस्वीर यही कहावत बयां करती है लेकिन इस कहावत को नेताजी सब कैसे समझेंगे यही सबसे बड़ा सवाल है।