Saturday, July 23, 2016

धनरोपनी महोत्सव का ख़्याल !

पिछले तीन सालों से सक्रिय रूप से किसानी कर रहा हूं। इस दौरान कई बार ख्याल आया कि क्यों न धनरोपनी महोत्सव मनाया जाए। ऐसे लोगों को खेत में उतारा जाए जो हैं तो माटी से दूर लेकिन जिनका मन माटी से जुड़ा है।

दरअसल खेत की तरह ही मुझे इंटरनेट कि दुनिया से लगाव है। ख़ासकर वेब की दुनिया के उन अड्डों को खंगालना मुझे अच्छा लगता है जिसे वे लोग चला रहे हैं जो अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच अपने शौक़ को बचाये रखने के लिए कुछ रचनात्मक काम कर रहे हैं। धनरोपनी महोत्सव में ऐसे ही लोगों को शामिल करने का मन है। खेती बाड़ी के संग क़लम-स्याही करते हुए ऐसे कई लोगों के सम्पर्क में आया जिन्हें गाम-घर की दुनिया से ख़ूब लगाव है। ऐसे लोग सही अर्थों में गाँव से जुड़े हैं, आप कह सकते हैं कि ऐसे लोगों के मन के तार हर वक़्त गाँव की आवो-हवा से जुड़ी रहती है।

पूर्णिया में पिछले तीन साल से खेती बाड़ी में सक्रिय रहने की वजह से अलग अलग क्षेत्र के कई लोगों से मुलाक़ात होती रही है। एक किसान के तौर पर मैं उन लोगों को खोजता हूं जिनका मन गाम-घर की दुनिया में रमता है। इसी कड़ी में मेरी मुलाक़ात एक युवा आईपीएस अधिकारी निशांत कुमार तिवारी से होती है।

निशांत कुमार तिवारी को फ़ोटोग्राफ़ी का शौक़ है, वे लेखक हैं, जिनकी किताबें ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित हो चुकी है, वे ब्लॉग भी लिखते हैं लेकिन जिस चीज़ की वजह से मैं उनकी तरफ़ खींचा चला गया, वह है उनका 'गाँव कनेक्शन'। रविवार को छुट्टी के दिन उनका गाँव के समीप दौरा था। दोपहर में  काम के बाद उनका फ़ोन आता है कि वे गाँव घूमना चाहते हैं। एक आईपीएस अधिकारी अपने तमाम व्यस्त कार्यक्रम के बीच समय निकालकर गाँव पहुँचता है और घंटों प्रकृति के संग गुफ़्तगू करता है अपने कैमरे की सहायता से। एक किसान के तौर मैं उन्हें देखता हूं और उनके प्रकृति प्रेम में डूब जाता हूं।

मुझे अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु याद आने लगते हैं। उनके पात्र सुरपति राय और भवेशनाथ याद आने लगते हैं। परती परिकथा में रेणु लिखते हैं कि भवेशनाथ परती के विभिन्न रूपों का अध्ययन करने आए हैं। कैमरे का व्यू फ़ाइंडर उनकी अपनी आँख है। भवेश मन ही मन सोचते हैं, तीस साल ! बस , तीस साल और ! इसके बाद तो सारी धरती इंद्रधनुषी हो जाएगी। तब तक रंगीन फ़ोटोग्राफ़ी का भी विकास हो जाएगा। झक-झका-झक-झका!

निशांत तिवारी जब अपने कैमरे से खेत-खलिहान, प्रवासी पक्षियों के झुंड और पुराने पेड़ में पक्षियों के घोंसलों को क़ैद कर रहे थे, उस वक़्त मेरे मन में रेणु की लिखी बातें चल रही थी, जैसे ही वर्तमान में दाख़िल होता हूं तो लगता है - हाँ, रेणु ने ठीक ही कहा था, गाँव से जुड़े लोग समय निकालकर ज़रूर आएँगे।

इस तरह के लोगों से लम्बी बातें करते हुए हम अंचल के और क़रीब आ जाते हैं। बाबूजी के फ़ोटो एलबम पलटते वक़्त एक तस्वीर हाथ आई थी, वह तस्वीर एक खेत की है जिसमें बाबा नागार्जुन हैं, फणीश्वर नाथ रेणु हैं और फ़ारबिसगंज के बिरजू बाबू हैं। सबसे मज़ेदार बात ये है कि सभी धनरोपनी कर रहे हैं। सभी के पैर कीचड़ से सने हैं। यह तस्वीर देखकर इस किसान का मन एक बार फिर से खेत में एक उत्सव मनाने के लिए तड़प उठता है।

पिछले साल एक अमेरिकी दम्पति डेविड और लिंडसे फ़्रेनसेन गाँव आए थे। उस वक्त खेत में मक्का था। धनरोपनी के बारे में हमने जब उन्हें बताया तो वे भी इसे लेकर उत्सुक दिखे। ग्राम्य जीवन ऐसी ही छोटी छोटी चीज़ों में सुख तलाशता आया है। निशांत तिवारी जैसे लोगों से मिलकर और गाँव के प्रति लगाव को देखकर एक उम्मीद बँधतीहै कि ग्राम्य जीवन को एक नया रूप ज़रूर मिलेगा, ऐसे में एक अलग अन्दाज़ में धनरोपनी महोत्सव तो बनता ही है। इस आद्रा नक्षत्र के बाद खेत के कादो में हम ज़रूर करेंगे धनरोपनी महोत्सव , आप आ रहे हैं न ! 

Monday, July 18, 2016

बाबूजी

एक साल गुज़र गया। वक़्त किसके लिए और कब ठहरा है ? किसी के लिए तो नहीं। पिछले साल 18 जुलाई को ही बाबूजी अनंत यात्रा पर चले गए। आज सुबह से मन टूटा हुआ है, यह तारीख़ न आए...स्मृति में बाबूजी के चले जाने की तारीख़ न आए, ऐसा मैं साल भर सोचता रहा लेकिन ऐसा किसके लिए हुआ है ? लेकिन मैं यह भरम पाले बैठा था, ख़ुद को भरम में रखने के लिए...

जबसे होश संभाला, बस यही जाना कि बाबूजी चनका से पूर्णिया गए हैं या फिर दरभंगा-मधुबनी या फिर कोर्ट -कचहरी के चक्कर में पटना आदि जगह ...लेकिन वे सबकुछ छोड़कर अनंत यात्रा पर चले गए, यह आज भी मैं यक़ीन नहीं कर पा रहा हूं। वे हैं, यहीं आसपास। मैं हमेशा उस पलंग को देखता हूं, जहाँ वे लेटे रहते थे...

उनकी बीमारी ने मुझे उनके और क़रीब ला दिया था। याद करता हूं तो रोयें खड़े हो जाते हैं। हमेशा लड़ने वाला, जीवन में संघर्ष कर सबकुछ हासिल करने वाला इतनी जल्दी हार जाएगा, किसी ने सोचा नहीं था। उनके मित्र कहते हैं कि वे हारने वालों में नहीं थे, वे लड़ने वाले थे लेकिन बीमारी ने उनके मन को तोड़ दिया।

लगातार दो साल वे बिछावन पर लेटे रहे। छह महीने उन्होंने 'बेड सोर' से लड़ाई की। पूरे शरीर में घाव।लेकिन इस दौरान भी उनके चेहरे का भाव किसी संत का आभास कराता था। वो भी तब जब घाव पर बेटाडिन दवा लगाई जाती थी। मैं सिहर जाता था, यह जानते हुए कि ये दवा घाव के फंगस को हटाने का काम करती है लेकिन दर्द भी तेज करती है कुछ देर के लिए ...लेकिन वे इस दौरान भी कभी विचलित नहीं हुए।

आज यह सब लिखते हुए मैं ख़ुद से लड़ रहा हूं। डर रहा हूं, एक भय भीतर में समा गया है। मैं उस भय को अब बहुरुपिया मानने लगा हूं। याद करता हूं उस दौरान भी उनकी दवाई के लिए जूझता रहता था। एक तरफ़ खेत तो दूसरी तरफ़ बिछावन पर बाबूजी।

बाबूजी, आज आप सामने नहीं हैं लेकिन चनका को लेकर जो कुछ आप सोचते थे, वह सब हो रहा, धीरे-धीरे। हालाँकि मुझे पता है आप ही सबकुछ मुझसे करवा रहे हैं।

खेती-बाड़ी-क़लम-स्याही करते वक़्त ईमानदार बने रहने की पूरी कोशिश करता हूं। अफ़सोस है कि आपको बहुत कुछ नहीं दिखा सका। आपका चनका जब भी ख़बरों में आता है तो लगता है यह सब आप ही कर रहे हैं।

आपसे ही विपरीत से विपरीत परिस्थिति में लड़ना सीखा है बाबूजी। याद करता हूं जब भी पैथोलॉजिकल जांच में आपका सोडियम गिरा हुआ और सूगर लेवल हाई देखता था तो मैं खुद चक्कर खा जाता था। इलोकट्रेट इम्बैलेंस आपके लिए नई बात नहीं थी लेकिन मैं डर जाता था क्योंकि हमेशा अपने कन्धे पर भार उठाने वाले शख्स को इस कदर लाचार मैंने नहीं देखा था लेकिन तभी आपकी एक चिट्ठी की याद आ जाती है जो आपने मुझे 2003 में भेजी थी दिल्ली के गांधी विहार पते पर। रजिस्ट्रड लिफाफे में महीने के खर्चे का ड्राफ्ट था और पीले रंग के पन्ने पर इंक कलम से लिखी आपकी पाती थी।

बाबूजी, आपने लिखा था कि “बिना लड़े जीवन जिया ही नहीं जा सकता। लड़ो ताकि जीवन के हर पड़ाव पर खुद से हार जाने की नौबत न आए।“ आपकी इन बातों को जब याद करता हूँ तो ताक़त मिलती है।

बाबूजी, आपके चनका में बाहर से लोगों की आवाजाही ख़ूब बढ़ गयी है। पढ़ने-लिखने में रमे रहने वाले लोग आते हैं तो लगता है मानो आप अपने बैठकखाने से सबकुछ देख-सुन रहे हैं। यक़ीन मानिए, आपने जो सोच रखा था, वो ज़रूर पूरा होगा। बस, बाबूजी ...आप मेरे कंधे पे यूँ ही हाथ रखते रहिए, आपके स्पर्श से शक्ति मिलती है।

Monday, July 04, 2016

बारिश में 'आत्मालाप'

बारिश का मौसम है। अक्सर समय पर बारिश होती नहीं है और हम जैसे किसानी कर रहे लोग डीज़ल फूँककर खेत को धनरोपनी के लायक बनाते हैं, ख़ूब कादो -कीचड़ करते हैं और फिर नन्हें-नन्हें धान के पौधों को पंक्ति में लगाकर धरती मैया का शृंगार कर डालते हैं। दरअसल धान को हम बेटी मानते हैं, धान की बालियाँ हमारे घर -दुआर को रौशन करती है, वो हमें प्यार देती है, बिना किसी आशा के ...

आज पूर्णिया से चनका आते वक़्त धान के खेतों के बारे में ही सोच रहा था। सड़क के दोनों तरफ़ धनरोपनी हो रही थी। हम भी अपने धार वाले इलाक़े में धनरोपनी करा रहे हैं। मौसम साथ दे रहा है, इन दिनों जमकर बारिश हो रही। बरखा इस बार धरती मैया की प्यास बुझा देगी, एक किसान के तौर पर हम तो यही आशा करते हैं, हर साल।

बाबूजी की पहली बरसी आ रही है। पिछले साल ईद के दिन वे हम सबको अकेले छोड़ चले गए, अनंत यात्रा पर। वक़्त बड़ी तेज़ी से गुज़र जाता है, पता भी नहीं चलता है। उनकी पहली बरसी हम सब भाई-बहन गाँव में कर रहे हैं। उन्होंने चौदह साल की उम्र से किसानी शुरू की, खेतों को वे प्रयोगशाला मानते थे। फिर एक दिन वे थक गए और बिछावन पर लेट गए। शायद कर्म करते हुए एक दिन हर कोई ऐसा ही करता है। थक जाना भी तो सत्य ही है न!  दर्शन में 'निज़ाम से नैना मिलाने की बात' कही गयी है। बाबूजी को बिछावन पर लेटे देखकर मुझे अक्सर यही लगता था। उनकी आँखों को देखते हुए लगता था, मानो मुझे वे कह रहे हों- " मैं तो निज़ाम से नैना लगा बैठी रे..."

मुझे याद है, कॉलेज के दिनों में निज़ामुद्दीन के दरगाह के पास एक फ़क़ीर मिले थे। उन्होंने कहा था कि दुख की निंदा मत करिए, उसे स्वीकार करिए। बाबूजी को जब भी देखता, लगता कि वही फ़क़ीर मुझे सबकुछ दिखा रहे हैं। इस बारिश में फ़क़ीर बाबा की एक वाणी याद आ रही है- " एक सूरतिया के दो है मूरतिया.."

आज जब ख़ूब बारिश हो रही है और हम खेत से रोपनी कराने के बाद दुआर लौटे हैं तो पता नहीं इतना कुछ क्यों याद आ रहा है। कभी लगता है बाबूजी ऊपर से मुझे बता रहे हैं मन को भिंगने दो, खेत की तरह ताकि मन के भीतर जो कुछ है वह विचार के रूप में अंकुरित हो जाए। ठीक वैसे ही जैसे बीज फ़सल बनकर हमारे बख़ारी को गुलज़ार करता है।

यह सब सोचते हुए बरामदे की खिड़की से बाहर देखता हूं। सामने सागवान के बड़े बड़े पत्ते पानी में नहाकर और भी हरे दिखने लगे हैं। सभी गाछ-वृक्ष इस बारिश में चहकते दिख रहे हैं। अहाते में जहाँ पानी लगा है वहाँ कचबचिया चिड़ियाँ डुबकी लगा रही है। पीछे के खेत में बनमुर्गी खेल रही है। आम के पेड़ पर एक नीलकंठ पंख फैलाये बैठी है।

आज इस बारिश में मन के सारे तार खुलते जा रहे हैं। बारिश अभी थमी है, हवा चल रही है, पत्ते भिंगकर और भी सुंदर लगने लगे हैं। सेमल के पेड़ को देखकर मैं बाबूजी के और क़रीब चला जाता हूं। जीवन के आख़िरी दिनों में वे मुझे रुई से भी हल्के लगने लगे थे, मानो हवा में उड़कर वे हम सब के भीतर बैठ गए हों। उदय प्रकाश की इन पंक्तियों की तरह-

"मैं सेमल का पेड़ हूं
मुझे ज़ोर-ज़ोर से झकझोरो और
मेरी रुई को हवा की तमाम परतों में
बादलों के छोटे-छोटे टुकड़ों की तरह
उड़ जाने दो...."

Sunday, June 19, 2016

बाबूजी



गाम में अपने अहाते में बैठा हूं। खेत में ट्रेक्टर का हल फट-फट की आवाज़ देकर माटी को ऊपर-नीचे कर रहा है। हल्की धूप है लेकिन हवा में ठंडापन है। कहीं आस-पड़ोस में बारिश हुई है। शायद उत्तर की तरफ़। ये सब महसूस करते हुए बाबूजी की बहुत याद आ रही है। अक्सर जब गाँव में अकेले  होता हूं, लगता है बाबूजी के सामने खड़ा हूं, वे काठ वाली कुर्सी पर बैठे हैं और माटी  और फ़सल की बातें मुझे समझा रहे हैं। ऐसे वक़्त में आँखें मूंद लेता हूं और पलकों को ख़ूब भींगने देता हूं।

साल भर पहले बाबूजी बिछावन पर थे, लगभग दो साल तक वे ख़ुद से जूझते रहे।  उस संघर्ष को केवल वे ही समझ पा रहे थे, मैं केवल उन्हें देख रहा था। डॉक्टर- दवा के संग उन्होंने दोस्ती कर लंबी चुप्पी साध ली थी। उनके डॉक्टर मित्र केके घोष हर दो दिन पर उनका हाल-चाल लेते थे। कभी फ़ोनपर तो कभी डेरा पहुँचकर।

सोडियम गिरता था तो वे अचेत हो जाते। दीदी सब सहम जाती। काकाजी उनके सिरहाने बैठे रहते थे। वे उन्हें बार-बार टोकते थे। इन सबके बीच बाबूजी अपने भाई को एकटक देखते रहते थे।

हम भाई-बहनों को उनका दुःख जीवन के व्याकरण की तरह लगने लगा था, कभी हम उलझ जाते थे तो कभी उनके संग रोने लगते। उन्हीं दिनों हम उनकी नज़रों से सबकुछ देखने लगे थे। बाबूजी की चुप्पी को समझने लगे थे। माँ तो उनकी ख़ामोशी की भाषा को समझ चुकी थी शायद बहुत पहले।

बाबूजी बिछावन पर लेटे शांत मुद्रा में दुःख को मानो पी रहे थे। बिजली के बिछावन पर वे साधु की तरह मुझे लगते थे, सफ़ेद धोती में। हमें उनका हमेशा साथ चाहिए था। माँ , हर वक़्त उनकी सेवा में लगी रहती थीं। माँ भीतर-भीतर रोती रहती थी, मैं बस चुपचाप मन ही दुःख सह लेता था।

बाबूजी, जब तक खड़े थे उनसे आँख मिलाकर बात नहीं कर पाया। मेरी आँखें हमेशा झुकी रही। लेकिन जब उन्होंने बिछावन पकड़ा तो रोज यह कहना पड़ता है कि बाबूजी आँखें खोलिए, दवा खाइये...तो मैं घंटों तक अंदर से डरा महसूस करता था। उनसे आँख मिलाने की हिम्मत तब भी नहीं कर पा रहा था।

बाबूजी को जब रोज बिछावन से उठाता था और फिर वहीं लेटाता तो उनके शरीर को छूने भर से अजीब की शक्ति मिलती थी, आज भी उनका स्पर्श महसूस करता हूं तो शक्ति मिलती है, सच तो यह है कि बाबूजी के स्पर्श करने से जो शक्ति मिली  उसे मैंने खुद को खुद से लड़ने के लिए बचाकर रखा है।

मुझे आज याद आ रहा है दसवीं पास करने के बाद जब बाबूजी ने टाइटन की कलाई  घड़ी दी थी तो कहा था - "वक्त बड़ा बलवान होता है। वक्त हर दर्द की दवा भी अगले वक्त में देता है। "

एक बार सातवीं में गणित में कम अंक आने पर बाबूजी गुस्सा गए थे। उन्होंने डपटते हुए कहा था - "जीवन गणित है और तुम उसी में पिछड़ गए..." फिर उन्होंने 12वीं में कॉमर्स विषय लेने को कहा और चेतावनी दी थी कि इसमें पिछड़ना नहीं है। पढ़ाई को लेकर उनका अनुशासन अलग था, इसमें उन्होंने समझौता नहीं किया और  इसी अनुशासन ने नए लोगों से मिलने और हमेशा पढ़ते रहने की आदत लगा दी।

बाबूजी ने हमेशा लोगों को सहारा दिया लेकिन इलोकट्रेट इम्बैलेंस की वजह से वे टूट गए थे। हमेशा अपने कन्धे पर भार उठाने वाले शख्स को इस कदर लाचार देखकर मेरा मन टूट जाता था। मैं उस वक़्त सबसे अधिक टूट गया जब उनके लिए व्हील चेयर खरीदकर लाया था। रास्ते में रूककर खूब रोया था। दरअसल मैंने कभी भी बाबूज़ी को सहारा लेकर चलते नहीं देखा था ...सहारा देते हुए ही देखा।

आज जब चनका में रेसीडेंसी बनाने की तैयारी में जुटा हूं तब बाबूजी की लाइब्रेरी की याद आने लगी है। फ़ूस का एक सुंदर सा घर था, १२ काठ की आलमारी थी।बाबूजी ने दादाजी के नाम से वह लाइब्रेरी तैयार की थी। मुझे कुछ कुछ याद है। लेकिन उन्होंने लाइब्रेरी की सैंकडों किताबें बांट दी।

दिल्ली में तब पढ़ाई करता था, छुट्टी में पूर्णिया आया था मैंने तब बाबूजी से पूछा कि किताबें जो लोग ले जाते हैं वो तो लौटा नहीं रहे हैं? आपने कहा था- “किताब और कलम बांटनी चाहिए। लोगों में पढ़ने की आदत बनी रहे, यह जरुरी है। देना सीखो, सुख मिलेगा। “

आप चले गए लेकिन मुझे पता है आप यहीं हैं, इसलिए हर दोपहर चनका में रहता हूं। खेत जाता हूं, जहाँ आप माटी में मिल गए, उसे स्पर्श करता हूं।

कटहल, आम, जामुन के गाछ फल से लदे हैं। दोपहर में गाम के बच्चे उसमें लिपटे रहते हैं , चमगादरों की तरह ...मैं बस उन्हें हँसते खिलखिलाते देखता रहता हूँ। आप सबके लिए कुछ न कुछ लगाकर चले गए बाबूजी...

Saturday, June 11, 2016

फ़ोर्ब्स साहेब की कोठी


फणीश्वर नाथ रेणु की वजह से मुझे फ़ारबिसगंज से लगाव है। दो दिन पहले की बात है, न्यूयार्क यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर रुचिरा गुप्ता के संग फ़ारबिसगंज घूम रहा था। रूचिरा जी फ़ारबिसगंज की ही हैं। दोपहर में उन्होंने कहा , चलिए आज आपको  फ़ोर्ब्स साब की कोठी दिखाते हैं।

दरअसल अररिया ज़िला का फारबिसगंज कभी सुलतानपुर इस्टेट  के नाम से जाना जाता था. 1859 में सुलतानपुर के मीर साहब की ज़मींदारी को एक अंग्रेज़ ‘सर अलेक्जेंडर फोर्ब्स’ ने ख़रीद लिया.

1890 में अलेक्ज़ेन्डर फोर्ब्स और उनकी पत्नी डायना की मृत्यु मलेरिया से हो गयी. तब आर्थर हेनरी फ़ोर्ब्स ने पिता की मृत्यु के बाद शासन संभाला और इसका नाम सुलतानपुर से बदलकर ‘फोर्बेस गंज’ रख दिया. लेकिन समय बदला और फ़ोर्ब्स परिवार ने सुलतानपुर इस्टेट को देश के मशहूर व्यवसायिक घराना जेके सिंघानिया के हाथों बेच दिया क्योंकि उस वक़्त यहाँ जूट की खेती बहुत होती थी।

पहले अंग्रेज़ यहाँ के ज़मींदार थे। कहते हैं कि फ़ोर्ब्स को किसानी का शौक़ था। इसी शौक़ की वजह से उसने सुलतानपुर को चुना और जमकर खेती की। एक सुंदर सा घर बनाया। घर के आगे एक बड़ा सा तालाब, घर के पूरब और पश्चिम में दो तोप, जिसका चबूतरा अभी भी है। इसके अलावा बड़ा सा गराज। कुल मिलाकर एक सुंदर सी कोठी.

फ़ोर्ब्स साब की कोठी में जो लोग अब रहते हैं, हमने उनसे भी बात की। पता चला कुछ साल पहले तक फ़ोर्ब्स के पोते और नाती यहाँ आते थे, अपने दादा-नाना के घर देखने, जिसमें एक का नाम एंड्रिल फ़ोर्ब्स था।  वह लंदन में कहीं शिक्षक थे।

आज फ़ोर्ब्स साब भले न हो लेकिन उनकी कोठी फ़ारबिसगंज में ख़ुशहाल है और सबसे महत्वपूर्ण कोठी के सामने का तालाब ज़िंदा है, पानी है वह भी साफ़। इस तालाब को 'सुलतान पोखर' कहा जाता है। आज यह पोखर 'फ़ोर्ब्स साब की कोठी ' की तरह ही फ़ारबिसगंज की पहचान है।

देश के छोटे शहरों और क़स्बों को यदि आप खंगालेंगे तो ढ़ेर सारी कहानी मिलेगी। यह लिखते हुए मुझे रवीश कुमार के ब्लॉग क़स्बा का टैगलाइन याद आ जाता है- 'शौक़े दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर'

Tuesday, June 07, 2016

गाँव घर की ओर लौटना

"कम से कम एक ही गाँव के कुछ प्राणियों  के मुरझाए ओठों पर मुस्कुराहट ला सकूं, उनके ह्रदय में आशा और विश्वास को प्रतिष्ठित कर सकूं। "

फणीश्वर नाथ रेणु की अमर कृति 'मैला आँचल' की यह पंक्ति जब पढ़ता रहा होता हूं कि तभी मन में फ़िल्म 'गुलाल' का यह गीत गूँज उठता है -

"जाते कहीं हैं मगर जानते न कि आना वहीं होता है। "

दरअसल आज रेणु की लिखी बातें और इस गीत का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि हाल ही में बिहार में हुए पंचायत चुनाव में कुछ ऐसे लोगों को जनता ने गाँव सँवारने का मौक़ा दिया है, जो अबतक महानगरों में थे लेकिन इस बार अपने गाँव- घर लौट आए, इस ख़्वाब के संग कि माटी के लिए कुछ करना है, बदलाव लाना है।

इस कड़ी में एक नाम अमृत आनंद का भी है। तीस साल के आनंद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर गाँव बदलने आए हैं। वे इसबार कैमूर ज़िले के पासैन पंचायत से मुखिया चुने गये हैं।

जर्मन साहित्य के छात्र आनंद अब एक नई पारी खेलने जा रहे हैं, जिसमें उन्हें बहुत कुछ करना है। वैसे भी नई पीढ़ी के लिए गाँव-घर लौटना चुनौती है और ऐसे में आनंद का यह क़दम कई मायनों में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

चुनाव प्रचार के दौरान विपक्षी उन्हें 'दिल्ली का बाबू' कहते थे। कोई कहता कि चुनाव लड़कर लौट जाएँगे आनंद बाबू, लेकिन इन सबके बावजूद माटी से मोहब्बत करने वाले इस युवा का मन नहीं टूटा और वे शानदार बहुमत से विजयी हुए।

आनंद अब सबसे पहले गाँव को स्वच्छ बनाना चाहते है। इसके लिए वे सामुदायिक शौचालय बनवाए जाने की योजना बना रहे हैं।

अब ज़रा कैमूर से दरभंगा ज़िले के एक गाँव मनियारी चलते हैं। यहाँ हम आपकी मुलाक़ात शकुंतला काज़मी से कराने जा रहे हैं। उन्होंने भी दिल्ली की ज़िंदगी को एक झटके में छोड़ मुखिया चुनाव में हिस्सा लिया और शानदार बहुमत से जीत भी हासिल की।

दरभंगा ज़िले के बहादुरपुर प्रखंड के मनियारी पंचायत की नवनिर्वाचित मुखिया शकुंतला काज़मी ने राजनीति की  अपनी पहली ही चुनावी पारी में जीत हासिल की है।

शकुंतला काज़मी मूल रूप से हरियाणा की हैं। उनका जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले में हुआ। हालाँकि उनकी पढाईं दिल्ली में हुई। उनके पिता दिल्ली में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे। इन सबके बावजूद शकुंतला ने पढ़ाई के लिए संघर्ष किया साथ ही महिलाओं के हक़ के लिए काम भी करती रही।

दिल्ली में उनकी मुलाक़ात नदीम अहमद काज़मी से होती है। बाद में दोनों की शादी होती है। ये जोड़ी अक्सर दिल्ली के अपने व्यस्त कार्यक्रम के बीच दरभंगा स्थित अपने गाँव आते -जाते रहते हैं। इस बार जब बिहार में पंचायत चुनाव का बिगुल फूँका गया तो आख़िर शकुंतला काज़मी ने गाँव में विकास की लौ जलाने की अपनी योजना को अमली जामा पहनाने के लिए मुखिया पद के लिए नामांकन दाख़िल कर ही दिया।

पति नदीम अहमद काजमी ने शकुंतला के इस फ़ैसले का समर्थन किया और फिर दोनों को गाँव वालों का आपार समर्थन मिला। शकुंतला ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 538 मतों के अंतर से पराजित किया। अब शकुंतला को अपने गाँव के लिए वह सबकुछ करना है, जिसके लिए वह सोच रही थी, जनता ने अब उन्हें मौक़ा दे दिया है।

ऐसे दौर में जब हर कोई गाँव से भाग रहा है, तब इस तरह की कहानियाँ सुनाने की ज़रूरत है ताकि गाँव से पलायन रुके साथ ही महानगरों से भी लोग अपनी जड़ की तरफ़ लौटें।

जीवन के हर क्षेत्र में हार- जीत तो लगा ही रहता है। ऐसे में मिट्टी से जुड़ना बहुत बड़ा काम है। 'मैला आँचल' में रेणु ने अपनी पात्र ममता के हवाले कहा है -"कोई रिसर्च कभी असफल नहीं होता है डॉक्टर! तुमने कम से कम मिट्टी को तो पहचाना है। मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत, छोटी बात नहीं। " तो आइये, इस भागमभाग जीवनशैली में आपसब भी अपने गाँव-घर के लिए कुछ वक़्त निकालिए, अपनी माटी के लिए कुछ अलग करिए।

Tuesday, May 24, 2016

पोखर के बहाने कड़े सवाल

हाल ही में मिथिला के कुछ ग्रामीण इलाक़ों में जाना हुआ। मेरे लिए कोसी के इस पार यानि सीमांचल के तरफ़ से उधर जाना हमेशा से सुखद रहा है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि पानी संकट को लेकर इन दिनों हर जगह चर्चा हो रही है।

एक किसान के तौर पर मैं ख़ुद इस संकट से जूझ रहा हूं। ऐसे में जब आँखों के सामने एक से बढ़कर एक पोखर दिख जाए तो आप किसानी मन का अंदाज़ा लगा सकते हैं। पोखर में स्थिर पानी और उसके महार पर खेलते बच्चों को देखकर किसान का मन हरा हो गया। मनिगाछी के समीप एक गाँव ब्रह्मपुरा जाना हुआ था।

मैंने गाँव घुमते हुए एक पोखर की तस्वीर उतार ली और उसे जब फ़ेसबुक और ट्विटर पर डाला तो प्रतिक्रिया में जो टिप्पणियाँ आई तो अंदाज़ा लगा कि गाम-घर को लेकर महानगरों में बसे लोगों के मन में कितना प्रेम है। वैसे कुछ लोगों ने सवाल भी उठा दिया कि क्या सचमुच में पोखर में पानी है या फिर गूगल देवता की तस्वीर है!

ख़ैर, गाँव अभी भी कई चीज़ों को संजोकर रखे हुए है। गाँव ही है जिसके बदौलत डाइनिंग टेबल आबाद है। ऐसे में गाँव की बातें ख़ूब होनी चाहिए। गाँव की उन सभी चीज़ों पर ध्यान रखने की ज़रूरत है, जो हम सभी की ज़रूरतें पूरा कर रही है। साथ ही किसानी समाज कहाँ ग़लती कर रहा है, इस पर भी सवाल उठाए जाने चाहिए।

ऐसे में पग-पग पोखर की बात करने वाले मिथिला जैसे क्षेत्र को नज़दीक से जानने -समझने की आवश्यकता है। केवल माछ-मखान और पान के अलावा जल संरक्षण के लिए भी वहाँ लोग काम कर रहे हैं। यह काम एक से नहीं हो सकता, यह समूहिकता को दर्शाने वाला काम है। मछली और मखान तो व्यावसायिक खेती है। किसानी भाषा में हम इसे नक़दी फ़सल कहते हैं लेकिन जब जल संरक्षण की बात आती है तो हम चुप्पी साध लेते हैं।

पोखर निजी संपत्ति बनकर रह जाती है। लेकिन यक़ीन मानिए यदि हम पानी को लेकर गम्भीर नहीं हुए तो एक अजीब स्थिति इधर भी पैदा हो जाएगी। किसी भी इलाक़े को मराठवाड़ा बनने में देर नहीं लगती है।

बात इसकी नहीं है कि हम किस पर दोष मढ़े । दोष सब पर मढ़े जा चुके हैं । अब हम आपस में एक दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं लेकिन यह भी सत्य है कि खेत को खेत हम किसान ही हैं जो नहीं बने रहने दे रहे हैं। खेत का दोहन हम करते आए हैं। साल में चार फ़सलें तक हम उपजा लेते हैं, धरती मैया को आराम नहीं मिलता है। बोरिंग से अनवरत पानी निकाला जा रहा है। ऐसे में जल स्तर गिरना तो तय है। यह भी सच है कि हम किसान ही हैं जो पोखर को सूखा रहने के लिए विवश कर दिए हैं। हम पानी निकाल तो रहे हैं लेकिन जल-संरक्षण नहीं कर रहे हैं।

हमें अपनी ग़लती स्वीकार कर सामूहिक स्तर पर पानी के लिए पोखर को ज़िन्दा करना होगा। जान लीजिए , जिस दिन हम प्रकृति के अनुसार किसानी करने लगेंगे , दिक़्क़तें कम होनी शुरू हो जाएगी। हाँ, यह अलग बात है कि मौसम की मार के सामने हम विवश हो जाते हैं लेकिन हर बार ऐसा ही होगा यह तो ज़रूरी नहीं है। किसानी करते हुए लड़ना पड़ता है, इसे सहज भाव में स्वीकार कर हमें आगे बढ़ना होगा।

ब्रह्मपुरा गाँव के उस पोखर ने तो मेरे जैसे किसान को यही कहानी सुनाई है। और हाँ, यदि हम सब पोखर को बचाने की ठान लें तो दिक़्क़तें भी देर-सवेर छू-मंतर हो जाएगी। सुंदर गाँव, सुंदर पोखर, पेड़-पौधे किसकी आँखों को पसंद नहीं है। इसे हम ग्राम्य पर्यटन के नज़रिए से भी देख सकते हैं। हमारे गाम में बाहर से लोग आएँगे, ठहरेंगे। इसे भी एक रूप दिया जा सकता है। साफ़ सफ़ाई रखने की ज़रूरत है। हरकुछ के लिए हम सरकार को तो दोषी नहीं ठहरा सकते हैं, हमें भी कुछ करना होगा, बस कुछ अलग करना होगा हम सभी को अपनी माटी के लिए।


(प्रभात ख़बर के कुछ अलग स्तम्भ में प्रकाशित :24 मई2016)