Monday, April 06, 2020

पूछो सवाल खुद से

पटाखे की आवाज़
जब भी सुनाई देगी
दौड़ कर आइने के पास
चला जाऊंगा
पूछूंगा खुद से
जब दुनिया
एक जैसी बीमारी से
लड़ रही था,
जब लोग मर रहे थे,
पड़ोस में कोई बीमार था
तब तुम्हारे भीतर किस रंग में
प्रवेश करता है
एक उत्सव
और तुम नाचते गाते
फोड़ने लगते हो पटाखे।
क्या पटाखे फोड़ कर
नींद आई थी तुम्हें?

Sunday, March 29, 2020

वे डरते नहीं हैं...

सड़क पार करते लोग मौत से नहीं डरते हैं। वे थकते नहीं हैं। हमने खेत में जुटे लोगों को कभी थकते नहीं देखा है, धनरोपनी , कटनी , फसल की तैयारी, ये सब करते हुए इनके चेहरे की चमक और बढ़ जाती है। वे कभी भी थके नहीं हैं। 

हमने कुदाल लिए लोगों को हारते नहीं देखा है। हाथ में कचिया लिए औरतों को गेंहू काटकर , थकान में रोते नहीं देखा है। वे बस - ट्रक - ट्रेन के बगैर लंबी दूरी तय कर जाते हैं, वे विपत्ति में और उत्साहित दिखते हैं। वे मौसम से लड़ने वाले जीव हैं, विपत्ति उन्हें और मजबूत करती है, मजबूर नहीं।

उनकी तस्वीरों से हमने कल फेसबुक - ट्विटर , अख़बार - चैनल सब रंग दिया।  उस रंग में उनका असली दुख मानो पानी हो गया, यहां - वहां सब जगह बिखर गया। निज़ाम ने उनके दुख को पहले समझा नहीं और जब समझा तब तक बात कमरे से दूर सड़क तक पहुंच गई थी, सैलाब की तरह। 

इन लोगों में हम सब भी हैं। हम सबका घर - आंगन - दुआर इन्हीं सब से है। वे अपनी बेहतरी के लिए गांव से दूर निकल गए थे। दरअसल हर के हिस्से में एक गांव होता है, किसी को एकड़ तो किसी को डिसमल में जमीन होता है।  वहीं हर के हिस्से के अपना घर होता है। 

शहर की दुनिया को ईंट सीमेंट से वे जोड़ते हैं और जहां उनका गाम होता है, जहां उनकी अपनी माटी होती है, वहां वे  इंदिरा आवास के किश्तों में अपना आशियाना बनाते हैं। वहीं उनके अपने लोग रहते हैं, वहीं वे अब लौटना चाहते हैं। 

एक महामारी के भय ने , उसके संभावित संक्रमण ने उन्हें जब रोजगार से  दूर कर दिया तो अब उनके पास अपनी माटी ही बची। ऐसे में वे निकल तो गए लेकिन किस हालात में वे पहुंचेंगे, इसका कोई जवाब नहीं दे सकता। उनके झोले में इस बार कुछ नहीं होगा। भीतर का दुख अपने तक पहुंच कर बस सुख में बदल जाए, यही उम्मीद करते हैं।

 

Tuesday, March 24, 2020

हम सबके लिए जो जोखिम उठा रहे हैं उन्हें सलाम !

हम सब अपने - अपने घर में हैं, लॉक डाउन हैं , सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। अपने लिए, अपने परिजन के लिए लॉक डाउन हैं ताकि कोई बीमार न हो जाए। 
उधर, इन सब ' व्यक्तिगत चिंताओं ' से  दूर जिला प्रशासन हम सबके लिए अनवरत मेहनत कर रहा है। वे हमारे लिए सड़क पर हैं, वे हमारे लिए अस्पताल में हैं, हमारे पास जरूरी वस्तु पहुंचते रहे, इसके लिए वे चिंतित हैं।

आज यह तस्वीर इसलिए साझा कर रहा हूं ताकि हम यह जान लें कि कोरोना से हम सबकी सुरक्षा के लिए किस तरह से प्रशासन मेहनत कर रहा है। इस तस्वीर को देखिए और  पूर्णिया जिला प्रशासन को सलाम करिए। तस्वीर में आप पूर्णिया के जिलाधिकारी Rahul Kumar राहुल कुमार को देख सकते हैं। वे लगातार हम सबके लिए काम कर रहे हैं , चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। 

राहुल कुमार सदर अस्पताल परिसर पहुंचते हैं, जहां 50 बेड का आइसोलेशन वार्ड तैयार कर लिया गया है। यह सब कुछ पूर्णिया के लिए हो रहा है, ऐसे में पूर्णिया के लोगों को सही अर्थ में लॉक डाउन का पालन करना चाहिए, प्रशासन का सहयोग करना चाहिए, क्योंकि प्रशासन हम सबका सहयोग कर रहा है।

आइए, हम सब चुनौती से भरे इस कठिन दौर में लॉक डाउन को गंभीरता से लेते हैं ताकि हमें आइसोलेशन वार्ड जाने की जरूरत ही न पड़े।

Monday, March 23, 2020

'डराने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल मत करिए '

जब कोई बीमारी की चपेट में आता है, उस वक़्त हम उसकी सहायता सकारात्मक बातों के जरिए करते हैं। उस वक्त हम उसे सिस्टम की बुराई सुनाकर डराते नहीं हैं। आलोचना जरूरी है लेकिन उस वक्त जब हमें बीमार लोगों को ढाढस देना चाहिए, उस वक़्त हम उन्हें डराने लगते हैं। 

यह वक्त एकजुट होने का है, मोदी के खिलाफ, मोदी के पक्ष में, सत्ता के पक्ष में , विपक्ष में हम लंबी बात करते रहे हैं और यकीन मानिए, ऐसी बातें हम भविष्य में भी करेंगे क्योंकि हम आप से ही लोकतन्त्र है।  लेकिन यह समय एक ऐसी बीमारी से लड़ने का है जिसका सम्बन्ध न सत्ताधारी से है न ही विपक्ष के नेताओं से है और न ही लोकतंत्र या तानाशाही से है। 

आंकड़ों पर हम बात बाद में भी करते रहेंगे, लेकिन अभी समय है लोगों को यह बताने का कि वे घर में ही रहें। मेरे जैसा आदमी जो हमेशा खुद को विपक्ष ही समझता है, वह भी आज यही सोच रहा है कि हम सभी के परिजन स्वस्थ रहें। जो गलत है, वो है लेकिन अभी जो है उसे स्वीकार करना होगा। 

मंदिर - मस्जिद - गिरिजा घर - गुरुद्वारा की बात करते हुए हम कोरोना को कहीं और छोड़ देते हैं। धार्मिक न्यास आदि की बातें हम आगे भी करेंगे लेकिन अाज कम से कम लोगों को यह बताएं कि सोशल डिस्टेंस बनाना आज की जरूरत है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म का उपयोग हम सकारात्मक ऊर्जा के प्रसार के लिए करें, बाद बांकी मोदी जी, राहुल जी, नीतीश जी, ममता जी की बातें हम आगे भी करते रहेंगे। लेकिन यह समय एक बीमारी से देश को बीमार हो जाने से बचाने का है।

Sunday, March 15, 2020

'माटी के अभिनेता, माटी के मानुष ' नरेंद्र झा

यह गांव का सम्मान है, यह सम्मान चनका का है। यह सम्मान उस व्यक्ति के नाम पर है, जो महानगर की चकाचौंध में रहकर भी गाम - घर का बना रहा। उनके नाम पर ' सम्पूर्ण ग्रामीण विकास ' के लिए सम्मानित होना, गर्व की बात है लेकिन वहीं दूसरी ओर एक चुनौती भी है, जिसके संग गाम - घर का संपूर्ण विकास जुड़ा है।

नरेंद्र झा हमारे माटी के अभिनेता थे। वे जब तक रहे, हंसते रहे, हम सब से जुड़े रहे। जड़ से जुड़ा रहना क्या होता है, हम उनके जीवन से सीख सकते हैं।
मधुबनी शहर में १४ मार्च को नरेंद्र झा की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में लोगों की आंखें बता रही थी कि वे सबके मन के करीब रहे। उनका गाम कोइलख उनके साथ हमेशा रहा। मैथिली में उक्ति है -   "यश-अपयश हो, लाभ-हानि हो सुख हो अथवा शोक, सभ सँ' पहिने मोन पडैत अछि, अपने भूमिक लोक। “  नरेंद्र झा की स्मृति में पंकजा ठाकुर जी ने १४ मार्च को जो कुछ भी किया, उसमें नरेंद्र भाईजी साकार होकर  इसी मैथिली उक्ति की तरह हमारे सामने आए। 

नरेंद्र झा की उपस्थिति मेरे लिए भूमिपुत्र की भांति रही है। उनका चेहरा, चेहरे पे निश्छल मुस्कान , हम सब के मन में हमेशा बना रहता है। इस  मुस्कान के पीछे उनकी अनवरत मेहनत है, इस मुस्कान के पीछे उनका अपना गाम कोइलख है।

नरेंद्र झा अचानक यात्रा पर निकल गए, यह सोचकर दुख होता है लेकिन यही यात्रा सत्य है, बाद बाकी तो माया है। यह सम्मान यदि उनके हाथ से मिलता तो लगता, हां, सही में गाम - घर के लिए थोड़ा ही सही लेकिन कुछ कर रहा हूं। नरेंद्र भाईजी मिथिला की बोली - बानी - माटी के नायक थे। नरेंद्र झा ने अपने करियर में रंग भरे वो कभी मिटने वाले नहीं है। वे हमेशा बने रहेंगे...



 

Friday, March 13, 2020

चनका के लिए सुंदर ख़बर

चनका के लिए आज शुभ दिन है। केंद्र की ‘श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन’ के तहत 2018 में श्रीनगर प्रखंड के खोखा कलस्टर का चुनाव हुआ था, जिसमें चनका, खोखा उत्तर, खोखा दक्षिण और खुट्टी धुनैली पंचायत शामिल है। 
इस कलस्टर के विकास के लिए केंद्र सरकार ने नौ करोड़ की राशि जारी कर दी गई है। आज जिलाधिकारी राहुल कुमार Rahul Kumar का बयान जब अख़बार में पढ़ने को मिला कि  " श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन के अंतर्गत चयनित पंचायतों का होगा सर्वांगीण विकास " तो बस इस एक वाक्य को पढ़कर यही मन कह उठा - " कोई बीज उम्मीद के बो रहा है ..."

हम लोगों के लिए यह ख़ास पल है। हम उन लोगों के भी आभारी हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी चनका पहुँचे। इस योजना के तहत यदि सबकुछ होता है तो चनका और कलस्टर में शामिल गाम - घर सचमुच में चमक जाएगा। ग्रामीण स्तर पर सही अर्थों में विकास कार्य होने से बहुत कुछ बदलाव देखने को मिलेगा। 

चनका को लेकर लगातार लिखते हुए कभी -कभी लगता था कि कोई सुनेगा भी क्या? हमने ‘योजना’ और ‘कुरुक्षेत्र’ जैसी सरकारी पत्रिकाओं में भी चनका को लेकर लिखा था। तब नहीं लगा कि गाँव की परेशानी को कोई गंभीरता से लेगा लेकिन 30 जनवरी 2018 को इस कलस्टर के चुने जाने की जब ख़बर सुनी थी तो पहली बार में भरोसा ही नहीं हुआ था और आज 13 मार्च 2020 को जब अख़बार में यह ख़बर पढ़ने को मिली कि अब केंद्र की ओर से राशि जारी हो गई है तो उम्मीद को मानो पंख लग गए कि अब अपनी माटी का संपूर्ण विकास निश्चित है, बस हम सब साथ दें।

प्रधानमंत्री कार्यालय, संबंधित एप्प, सरकार की पत्रिका योजना में गांव को लेकर लेखन हो या फिर मुख्यमंत्री को चिट्ठी लगातार लिखना, इन सबकी  वजह से कुछ लोग मज़ाक़ भी उड़ाते थे लेकिन आज सबकुछ अच्छा लग रहा है। 

बहुत बहुत शुक्रिया पूर्णिया जिला प्रशासन। इस योजना में इन ग्रामीण इलाकों को जमीन पर बहुत कुछ नया और सुंदर देखने को मिलेगा।

रुर्बन मिशन देशभर में 5,142.08 करोड़ रुपए की लागत से चलाया जा रहा है। इस योजना के तहत प्रत्येक गांव को शहरों वाली सुविधाएं मुहैया कराई जाती है. साथ ही बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य केंद्र आदि की सुविधा ग्रामीणों को दी जाती है। इसके अलावा चयनित गांव में कौशल विकास की व्यवस्था की जाती है. इस योजना की सबसे प्रमुख बात यह है कि गांवों को क्लस्टर की तर्ज पर विकसित किया जाएगा. एक क्लस्टर की आबादी 25 से 50 हजार तक रखी जाती है. केंद्र सरकार गैप फंडिंग पर कुल खर्च का 30 फीसदी अपने बजट से देय करेगी. इस मिशन के तहत स्मार्ट गांवों का समूह विकसित किया जा रहा है.  मिशन के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल और स्थानीय उद्यमिता तथा आर्थिक गतिविधियों को शुरू किया जाता है.

Thursday, March 05, 2020

रेणु की दुनिया

फणीश्वर नाथ रेणु का जन्मदिन, हर साल हमें चार मार्च का इंतजार रहता है। यह दिन हमारे लिए खूब लिखने और खूब बात करने का होता है। अनौपचारिक ढ़ंग से, जैसा रेणु का जीवन रहा, कुछ - कुछ वैसा ही दिन गुजारने की हमारी तमन्ना रहती है। 

चार मार्च को चनका रेसीडेंसी में हमने रेणु की दुनिया में डुबकी लगाने का प्रयास किया। रेणु के लिखे को पढ़ा गया, बांसुरी की आवाज से हमने रेणु को याद किया, लोकगीत में डूबे रहने वाले, चिड़िया - चुनमुन की आवाजों में जीवन का संगीत खोजने वाले रेणु को हमने बांसुरी और गिटार की आवाज से आवाज दी, इस उम्मीद से कि आम की मंजरियों को देव भाव से देखने वाले रेणु होंगे कहीं आसपास ही...

यह दिन हमने मंच, कुर्सी और रेणु की तस्वीर के बगैर गुजारने की हर संभव कोशिश की। हिंदी जगत में रेणु की महिमा का जो प्रकाश है उससे थोड़ा पीछे हटकर रेणु के जीवन को बांचने की कोशिश की। हमने रेणु को संत भाव से नहीं बल्कि हमारे गाम - घर के रेणु की तरह याद किया। रेणु को उनके लिखे  ' विषयांतर ' की तरह हम सबने याद किया।

यह दिन खास इसलिए भी रहा क्योंकि हमने गिनती के ही सही लेकिन युवाओं के बीच रेणु की बात की। यह दिन इसलिए भी खास रहा क्योंकि जिला पूर्णिया के साहित्य - कला अनुरागी जिलाधिकारी राहुल कुमार हम सबके संग रेणु की दुनिया में  डुबकी लगाते रहे, वे चुपचाप लगभग तीन घंटे पालथी मारकर जमीन पर बैठे रहे, उस मोटे कपड़े की दरी पे, जिसका सीधा संपर्क माटी से होता है , माटी का वही स्पर्श, जिसकी बात रेणु अक्सर करते थे।

बांसुरी, गिटार , रेणु साहित्य का पाठ, यह सब सुनते हुए राहुल कुमार हम लोगों को छात्र की तरह दिखे। उनकी उपस्थिति से हमने यही सीखा कि आप अपने व्यस्त समय के बीच कला - साहित्य - समाज के लिए वक़्त निकालते हैं तो इसका अर्थ यही हुआ कि अपने मन की सुन रहे होते हैं।

बातचीत की शुरुआत चिन्मया नंद सिंह के पाठ से हुई। उन्होंने बहुत ही रोचक अंदाज में रेणु का पाठ किया। रेणु ने अपने जन्म की जो कथा लिखी है, उसका कुछ अंश उन्होंने पढ़ा, संग ही रेणु के मुंबई प्रवास को लेकर खुद रेणु का जो संस्मरण है, उसका पाठ किया गया।

रेणु की हर बात होती रही, उस रेणु की बात हुई जिसके बारे में इस अंचल में ढेर सारी, रंग बिरंगी कहानियां हैं। यहां की बोलचाल में रेणु हैं। ऐसे में रेणु के जीवन के अन्य पक्षों पर भी बात हुई। उस रेणु पर बात हुई जो शायद ' ब्रांड को लेकर सबसे अधिक सचेत ' था। 

राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित रेणु रचनावली का शुक्रिया हमेशा रहेगा क्योंकि पांच खंड में सम्पूर्ण रेणु हमें नसीब हुए। 

रेणु पाठ के बाद हम सब रेणु को खोजने लगे अपनी बातचीत में। रेणु की ही क्यों, निराला की बात हुई, मोहन राकेश की बात हुई, राजेंद्र यादव की बात हुई और तो और रवींद्र नाथ ठाकुर की बात हुई। इन सब बातचीत के सूत्रधार बने जिलाधिकारी राहुल कुमार। वे जब बात कर रहे थे तो हमने महसूस किया कि वे हमें समालोचना का पाठ पढ़ा रहे हैं।

राहुल कुमार ने छंद से मुक्ति की बात की। साहित्य की बात करते हुए उनकी सहजता कई रंगों में सामने आई। वे आज के दौर के पाठकों की बात करने लगे, किताब - डिजिटल दुनिया, पश्चिम का साहित्य, इन सब मुद्दों पर उन्होंने अपनी राय रखी।

राहुल कुमार को हम सब जब सुन रहे थे मेरे जैसे श्रोता का मन कबिराहा मठ की यात्रा करने लगा था। रेणु या किसी भी साहित्यकार को पढ़ते हुए हम उसकी कृति का अवलोकन किस अंदाज में कर सकते हैं, रेणु की दुनिया में बैठकर राहुल कुमार ने हमें इस पर विस्तार से , सहज तरीके से बताया। उन्हें सुनकर लगा कि 
परंपरा से विद्रोह करते हुए हम  स्वयं अपनी उपलब्धियों से भी विद्रोह करते हैं और जब हम अपनी उपलब्धियों का विद्रोह करते हैं तो हमारी रचना और भी अलग रंग में, अलग रूप में सामने आती है। 

रेणु का जन्मदिन हमें हर साल नया पाठ पढाता आया है। साहित्य के इतर रेणु के बहाने हम खूब बातें करते हैं। किताब पढ़ते रहने की बात हुई, डिजिटल स्पेस में पढ़ते रहने की बात हुई। इस अनौपचारिक रेणु बैठकी में विषेक चौहान ने खूब पढ़ते रहने की बात की। ये सब बातें हमने गाम - घर की दुनिया में की, दरअसल यही रेणु के इस अंचल की ताकत है।

माटी के कप में चाह की चुस्की के संग हमने बेबाक होकर रेणु के जीवन पर बात की, रेणु की प्रसिद्धि का महिमा मंडन नहीं बल्कि रेणु जो थे, उसकी बात हुई। रेणु स्केच, रिपोर्ताज लिखते थे, खूब चिट्ठी लिखते थे, ऐसे रेणु की बात हुई। इस बातचीत में गांधी की बात हुई, गांधी की बात हमें सबल बनाता है। नेहरू का अपने जीवन में लगातार लिखने की आदत पर बात हुई। जेल में बिताए दिनों में नेहरू के लेखन पर बात हुई। बातचीत में इतने सारे रंग भरने का काम राहुल कुमार ने किया। एक जिलाधिकारी का पाठक रूप हम लोगों ने रेणु के बहाने देखा। 

रेणु के पूर्णिया के इस जिलाधिकारी की वह बात आज भी हमारे मन में बैठी है जो उन्होंने पूरैनिया महोत्सव के समापन कार्यक्रम में मंच से कहा था - "  रेणु जी का जो कर्ज था उसे कुछ हद तक चुकाया है। " 

रेणु का ऋणी होना क्या होता है, इसे समझने के लिए हमें रेणु के साहित्य, उनके जीवन के हर एक पहलू को समझना बूझना होगा। दरअसल रेणु सबकुछ देखते-भोगते शहर - गांव करते अंचल की कथा बांचते थे।उनका लोक संपर्क ही उनके लेखन का ' रॉ मैटेरियल ' था। 

दोपहर दो - ढाई से सांझ कब हो गई पता ही नहीं चला, चार मार्च 2020 भी गुज़र गया, रेणु का जन्मदिन गुज़र गया।

चनका गांव से शहर पूर्णिया हम सब  लौट आए, क्या लेकर लौटे यह सब अपने अपने अंदाज में बताएंगे लेकिन रेणु की ही बोली बानी में कहिए तो :  " घाट न सूझे, बाट न सूझे, सूझे न अप्पन हाथ..'