Thursday, April 11, 2019

सवाल करे किसान

सब चुनाव में लगे हैं। इसी बीच बारिश और आंधी आती है , मक्का की खड़ी फसल गिर जाती है, किसानी कर रहे लोगों को नुकसान होता है।

सत्ता -विपक्ष के बड़े बड़े नेता वादों की पोटली लिए उड़कर आते हैं और फिर उड़कर निकल जाते हैं। लेकिन किसान के नुकसान पर सबकी चुप्पी एकसमान होती है।

हम किसान भी सवाल नहीं करते हैं, उड़ते हेलीकॉप्टर को बस टुकुर-टुकुर देखते रह जाते हैं और फिर भीड़ बनकर रैलियों का हिस्सा बन जाते हैं।

हर नेता की रैली का बड़ा हिस्सा किसानी कर रहे लोग होते हैं। ट्रेक्टर-टेलर-टैम्पो में भरकर हम नेताजी की रैली में जय जय करने पहुंच जाते हैं। हालांकि इसका भी अपना अनोखा अर्थशास्त्र होता है लेकिन खेत में फसल के नुकसान पर हम कुछ नहीं बोलते।

मक्का सीमांचल की तकदीर बदलने वाली फसल है लेकिन इसकी कीमत पर कोई कुछ नहीं बोलता। धान की सरकारी खरीद में जो खेल होता है , उस पर भी हम किसानी कर रहे लोग नेताजी सबसे सवाल नहीं पूछते।

इन दिनों ग्रामीण इलाकों में लगातार घूमते हुए अहसास हो रहा है कि हम किसानी कर रहे लोग बंटे हुए हैं और सवाल पूछने से डरते हैं। किसान भी जाति के जाल में मछली बनकर नेताजी की बातों में फंसता जा रहा है। चुनाव के बाद सरकार भी बन जाएगी और हम किसानी कर रहे लोग बस अपने भाग्य का रोना रोते रह जाएंगे।

पता है यह बात भी ललित निबंध की कैटेगरी में चली जायेगी लेकिन याद रखिये हम किसानी कर रहे लोग यदि ऊंची आवाज में अपनी बात नहीं रखेंगे, विरोध नहीं करेंगे तो फिर वही होगा जो होता आ रहा है।

गुफ़्तगू रेणु से..

“मैं तो तुम्हारे जन्म से छह साल पहले ही उस ‘लोक’ चला गया था, फिर तुम्हें बार-बार मेरी याद क्यों आती है ? ख़ैर, एक बात बताओ , क्या सचमुच सुराज आ गया है वहां..? विदापत नाच का ठिठर मंडल के घर चुल्हा जलता है कि नहीं..? “

“और एक सवाल तुमसे पूछने का मन है , कब तक रेणु की बात लिखते रहोगे? कितना कुछ बदलाव दिखता है मेरे मैला आँचल में, क्या तुम आज की परती परिकथा बाँच नहीं सकते? कुछ नया तलाश करो अपने अंचल में, जिसकी बोली-बानी सबकुछ अपनी माटी की हो..’

‘तुम जानते हो, कोसी प्रोजेक्ट के नहरों की कथा अधूरी ही रह गई मुझसे। ठीक वैसे ही जयप्रकाश की भी कथा बाँच न सका। वो अररिया ज़िले की बसैठी की कहानी, रानी इंद्रावती की कहानी..कितना कुछ बांकी है और तुम मेरे मुहावरे में फँसे हो...निकलो , बाहर निकलो। सांप को केंचुल उतारते देखो हो? एक चिड़ियाँ होती है नीलकंठ, वह बहुत बारीकी से सांप पर नज़र रखती है।”

“तुम तो औराही ख़ूब जाते हो। सुनता हूँ कि मेरे नाम से कोई बड़ा सा भवन खड़ा कर दिया गया है। ख़ैर, ये सब तो माया है असल है ज़मीनी काम। जानते हो, मैं  आजतक सुरपति राय और डॉक्टर प्रशांत का मुरीद हूँ, जानते हो क्यूँ? दरअसल  दोनों ही ज़मीन पर काम करते थे। फ़ील्ड वर्क का कोई तोड़ नहीं होता। महान विचार से जमीनी बात जरा भी कम नहीं होती। आज तुम जहाँ हो, वहाँ तुम अपने होने को सिद्ध करो। नया कुछ शब्द के ज़रिए दिखाओ, जो तुम्हारे आसपास ही घट रहा है। अच्छा-बुरा जो भी...”

“तुम सोच रहे होगे कि आज यह बूढ़ा भाषण देने के मूड में है लेकिन क्या करूँ, मुझे अपने अंचल की सही तस्वीर देखनी है। तुमने ‘ऋणजल धनजल’ पढ़ा है ? मैं ‘ऋणजल धनजल’ में अलग हूं। मुझे वही चाहिए। “

“ये बताओ ज़रा, अपने अंचल में कौन है जो जनता के बीच जाकर जीवन की त्रासदी और राजकाज की विफलता को, प्रकृति के क्रोध को दुनिया के सामने लाने का प्रयास कर रहा है? “

“एक बात जानते हो, कभी वेणु से पूछना कि नियति क्या होती है। मुझे वेणु बहुत खिंचता है। बहुत कम उम्र में ही मैंने उसके कंधे पर सब भार सौंप दिया था। लेकिन उसने उस भार को स्वीकार किया। आज जब कभी वेणु को तुम्हारे मार्फ़त सुनता हूँ तो लगता है कि मेरा बड़ा बेटा तो कमाल का किस्सागो है! “

“ख़ैर, ये जान लो और मन में बाँध लो कि नियति ने तुम्हें उस जगह घेर दिया है जहाँ सम्पन्नता,विपन्नता,आपदा, उल्लास सब कुछ अथाह है, बस उसे अपनी आँख से देखने का प्रयास करो..”

मैं टकटकी लगाए ‘रेणु’ को देख-सुन रहा था। मैं अपने शबद-योगी को देख रहा था। जिस तरह मैला आंचल में डॉक्टर प्रशांत ममता की ओर देखता है न, ठीक वही हाल मेरा था..यह जागती आँखों का एक सपना था।

{ 11 अप्रैल 1977, रात साढ़े नौ बजे, रेणु उस ‘लोक’ चले गए, जहाँ से आज भी वे सबकुछ देख रहे हैं शायद..}

Friday, March 22, 2019

'किसानों को आत्मनिर्भर बनने दीजिये'

चुनाव के वक्त अचानक किसान-किसानी की बात जोर पकड़ने लगती है। हर दल के लोग किसान की बात करने लगते हैं। राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय दल के नेता के जुबान पर 'किसान कल्याण' की बात चढ़ जाती है। अब जब चुनावी घोषणा पत्र की बाढ़ आएगी तब हम देखेंगे कि बोल्ड अक्षरों में 'किसान कल्याण' की बात हर कोई करेगा। अंग्रेजी में किसानों की बात और आंकड़ों का हिन्दी में अनुवाद होगा।

लेकिन क्या आपने चुनाव के वक्त बड़ी बड़ी रैलियों में कभी यह सुना है कि किसानों के लिए यह कहा गया हो कि “आप शानदार फ़सल उपजाएँ, सरकार हाथों-हाथ ख़रीद लेगी? “

नहीं सुना होगा आपने। आपने सुना होगा- “ बोरिंग के लिए अनुदान मिलेगा, डीज़ल अनुदान, किसान क्रेडिट कार्ड, मनरेगा के तहत मिट्टी ढोते रहिए, रोज़गार मिलता रहेगा... आदि-आदि। “

जबकि सच यह है कि ऐसे वादे सुनकर हम किसानी कर रहे लोग और आलसी होते जा रहे हैं।

ज़रा सोचिए, बीड़ी-तम्बाकू आदि के लिए तो हमारे पास पैसा है लेकिन पाँच से दस रूपए के कदंब के पौधे के लिए हम सरकार पर निर्भर हैं! आख़िर क्यों? बाग़वानी के लिए भी हमको ऋण चाहिए, हम इतना ऋणी क्यों होना चाहते हैं? यही वजह है कि व्यक्तिगत तौर पर मुझे 'जय किसान के नारे से चिढ़ है।

मुझे तो महात्मा गांधी रोज़गार गारंटी योजना से भी चिढ़ है। खेत के बदले हम सड़क पर मिट्टी बिछाने लगे हैं। जिसके पास किसानी की समझ है वह भी मज़दूर बनता जा रहा है। ऐसे ढेर सारे किसान हैं जो मजदूर बन गए हैं जबकि यदि उन्हें फसल की कीमत समय पर मिल जाये तो वे ट्रेक्टर खरीद सकते हैं।

यदि हम किसानी कर रहे लोग एकजुट होकर चुनाव के वक्त और चुनाव के बाद सांसद- विधायक और सरकार से ऊंची आवाज में कहें कि हमें ऋण में डूबने के बजाए हम किसानों को आत्मनिर्भर बनने दीजिए तो बाजी पलट सकती है। किसान की बात करते हुए हम भावुक हो जाते हैं जबकि खेत में किसान पसीना बहाता है अच्छी फसल और फसल के उचित मूल्य के लिए। ऐसे में सरकार बहादुर बस हमारी फसल उचित मूल्य पर खरीद ले तो हम कुछ भी कर सकते हैं।

हम किसानों को मेहनत करने दीजिए। किसानी में हो रहे नए शोध कार्य से परिचित करवाइए। डीडी किसान जैसे चैनल पर जितना खर्च होता है उससे किसी गाँव की तकदीर बदल सकती है।

यदि हम नया कर रहे हैं तो हमारी तारीफ़ करिए, ग़लती करें तो आलोचना करिए लेकिन ऋण में डूबने की सलाह मत दीजिए। नहीं तो वह भी वक़्त आएगा जब आप गाँव में सरकारी ख़र्च से शौचालय तो बनवा देंगे लेकिन उसके उपयोग के लिए आपको हमें अनुदान देना होगा।

चुनावी बतकही-3
#Election2019

Tuesday, March 19, 2019

चुनावी बतकही 2019 - 2

चुनाव के वक़्त चाय दुकान में केतली में केवल गरम चाय ही नहीं उबलती है बल्कि
उसके संग बेबाक़ राजनीतिक टिप्पणियाँ भी उबाल मारती रहती है।

ग्रामीण इलाक़ों में सड़क-बिजली की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है, ऐसे में सड़क किनारे नए-नए दुकान दिख जाते हैं।

पूर्णिया से चम्पानगर जाने के रास्ते में कोसी की धारा कारी कोसी को हम पार करते हैं। आगे केनगर चौक पर सियाराम जी की चाय दूकान पर कुछ लोग जमा थे। सभी चुनाव पर ही बात नहीं कर रहे थे बल्कि कुछ खेती बाड़ी और दुकानदारी पर भी बतिया रहे रहे थे।

हमने सियाराम भाई से पूछा कि दिन भर एक तरह की ही बात सुनकर बोर हो जाते होंगे? इस पर उन्होंने कहा - “काहे होंगे, यहां हम सब मोदी से लेकर पूर्णिया के सांसद तक का बही खाता रखते हैं। काश सांसद चाह दुकान की बैठकी में आते तो गाँव की सड़कों का आमने-सामने हिसाब लेते। “

चुनाव में ग्राउंड के मुद्दे गायब होने की बात जब हर कोई कर रहा है तब दूरदराज के इलाकों में लोगबाग विकास की बात कर रहे हैं, यह लोकतंत्र की निशानी है। ‘हैशटैग चौकीदार’ की बात चाहे आप जितना करिये लेकिन जमीनी स्तर पर लोगबाग स्तरीय बात कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बावजूद जाति पर सबसे अधिक बात हो रही है।

चम्पानगर बाज़ार में एक किसान सरफ़राज बताते हैं कि जाति एक सच्चाई है। उन्होंने बताया - “ गाम-घर के समाज में पिछड़ी जातियां हैं और अगड़ी जातियां हैं। मैं यह नहीं मानता की जाति ही सब कुछ है। विकास ज्यादा बड़ा मुद्दा है। बिहार में जिस पार्टी ने जो काम किया है उसके आधार पर वोटिंग होगी। हालाँकि इस बार भी नारे और नेता सबके विडियो के चक्कर में किसान की मूल समस्या सामने नहीं आ सकेगी। “

रामपुर में लकड़ी के व्यापारी रमेश बताते हैं कि “यह तय होना बाकी है कि जिताऊ मुद्दा क्या है, लेकिन इतना जरूर तय है कि जो भी होगा, जातिवाद के  सहारे ही हो पाएगा  या फिर भारत-पाकिस्तान का ही सहारा नेताजी लेंगे। “

जनता दल युनाइटेड और भाजपा के बीच टिकट बँटवारे के बाद लोगबाग की प्रतिक्रिया पर भी ग़ौर करना चाहिए। सबकुछ सोशल इंजीनियरिंग यानी जाति के आधार पर ही हो रहा है और खुलेआम हो रहा है। सबका एक ही फॉर्मूला है, उसी जाति के उम्मीदवार को टिकट, जिसके वोट की गारंटी हो। जाति की काट में जाति।

सीमांचल के इलाक़े में मुसलिमों और यादवों का बड़ा प्रभाव है। इस इलाक़े में भाजपा ने सिर्फ़ एक सीट - अररिया पर अपना उम्मीदवार दिया है, जबकि 2014 में उसने सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। मोदी की लहर के उस दौर में भी पूर्णिया-अररिया, किशनगंज, कटिहार में उम्मीदवार पराजित हो गए थे।

गाँव और शहर के मतदाताओं की बातचीत में अंतर साफ़ दिखने लगा है। पूर्णिया शहर में फल दुकानदार राजीव ने बताया कि अस्पताल जैसे मुद्दे को कोई नहीं उठा रहा है। हमें बेहतर स्वास्थ्य सेवा चाहिए और इस पर कोई नहीं बोल रहा है। राजीव ने कहा कि अब नेता हमें अलग अलग मुद्दों पर गुमराह कर रहे हैं लेकिन असली मुद्दा विकास ही है और यही रहेगा।

सीमांचल के इन इलाक़ों में पलायन बड़ी समस्या है। स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिलता है ऐसे में बड़ी संख्या में लोग बाहर चले जाते हैं। यह समस्या कोई आज की नहीं है बल्कि बहुत पुरानी है। हर पाँच साल में यह समस्या बढ़ती ही है।

बुज़ुर्ग रामनरेश जी कहते हैं- “ इंदिरा से मोदी तक का राज देख लिए लेकिन इस इलाक़े में उद्योग का विस्तार नहीं देख सके। उद्योग जब आएगा तब ही पलायन रुक पाएगा। वैसे यह भी सच है कि चुनाव स्थानीय मुद्दों पर कहाँ लड़ा जाता है ! “

चुनावी बतकही-2
#Election2019

Sunday, March 17, 2019

चुनावी बतकही 2019 -1

लोकसभा चुनाव को लेकर बतकही शुरू है। हर कोई इलेक्शन-एक्सपर्ट की तरह बात कर रहा है। जदयू और भाजपा के उम्मीदवारों को लेकर रंग-बिरंग की बातें सुनने को मिल रही है। दरसअल सीट बंटवारे में जो झोल दिख रहा है, उस पर गाम-घर में चर्चा का बाजार गरम है।

फिलहाल मक्का में पटवन का वक्त है , ऐसे में खेत में भी चुनावी लीला पर ही बातचीत जारी है। गाम के गोरख का सवाल है कि नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी एक्के पार्टी का है क्या? फिर वो बताता है कि नीतीश ने एक बार गाम के लोगों को रेडियो दिया था। उसने बताया- " बहुत लोगों ने रेडियो मिलते ही उसे बेच दिया , चायपत्ती-चीनी के लिए और जिनके पास है , वे रेडियो पर मोदी जी की मन की बात वाला भाषण सुनते हैं।"

गोरख जैसे लोगों की बातों को सुनकर लगा कि राजनीति को आप कई कोणों से देख सकते हैं। सरकारी तंत्र का जाल किस तरह से बुना जाता है यह भी एक कहानी है।

पूर्णिया-अररिया सीमा पर एक महादलित टोले में नरेंद्र-नितीश के साथ-साथ राहुल गांधी की भी चर्चा हुई। लोगबाग को अबतक यह पता नहीं चल पा रहा है कि उसके संसदीय क्षेत्र से सांसद का चुनाव कौन लड़ेगा, ऐसे में लोगबाग बस मोदी-राहुल गांधी और पाकिस्तान की ही बात कर रहे हैं। यह अजीब लग रहा है कि स्थानीय मुद्दे, जरूरत, विकास आदि की बात कोई नहीं कर रहा है। हां, जाति पर खूब बात हो रही है।

महादलित टोले में एक बुजुर्ग महिला से बात हुई। वह अचानक इंदिरा गांधी की बात करने लगी और इसी बीच पूछ बैठी -  "नरेंदर मोदी क देखने छी अहाँ? सुनैत छिये कि बड़ जोर से गरज गरज क बजैत छै!  लालू क त हम देखने छिये एक बैर रानीगंज में, लेकिन ऊ खाली हंसबे छै। नितीश कुमार बढियां बाजैत छै।"

चुनावी बतकही करते हुए उन लोगों की भी बातचीत सुनता हूँ जो चुनावी ड्यूटी पर जाएंगे।  मतदान ड्यूटी पर जाने वालों की जिला मुख्यालय में ट्रेनिंग शुरू हो चुकी है।

चुनाव ड्यूटी में लगने वाले हमारे एक मित्र बताते हैं कि ट्रेक्टर और टार्च के बिना कोई भी चुनाव कर्मी का 'चुनावी जीवन' अधूरा लगता है। वहीं दियारा के इलाके में 'नाव और घोड़े' के बिना पुलिस कर्मी का काम अधूरा होता है।

न्यूज़ चैनल और पार्टी दफ्तरों से दूर गाम-घर की बस्तियों की चुनावी चर्चा कुछ अलग होती है , हालांकि स्मार्ट फोन और टेलीविजन की वजह से उनतक सारी बातें पहुँचने लगी है। वैसे यह अलग बात है कि उन तक कौन सी बात पहुंचे यह तय  राजनीतिक दल ही कर रहे हैं,  डिजिटल और टेलीविजन की दुनिया के माध्यम से।

चुनावी बतकही-1
#Election2019

Thursday, March 14, 2019

चुनाव के वक्त मरुआ की बात

जब हर कोई चुनाव की बात कर रहा है, ऐसे वक्त में मरुआ पर बातचीत करने का मन कर रहा है। वही मरुआ, जिसके काले रंग के आंटा के बारे में पहले लोग सुनना भी नहीं चाहते थे।

इस अनाज को 10-15 साल पहले तक लोगबाग पूछते भी नहीं थे लेकिन इसने गजब तरीके से घर वापसी की है। इस वापसी के मायने को समझने की जरूरत है।

कभी मरुआ की खेती के बारे में भी लोग सोच नहीं सकते थे क्योकि इसका कोई मूल्य ही नहीं होता था। ऐसे में अचानक ऐसा क्या हुआ कि किसानी कर रहे लोग खेती के लिए मरुआ का बीज खोजने लगे हैं।

बिहार में तो मरुआ को लेकर अभी भी नजरिया पुराना ही है लेकिन उत्तराखंड में तो मरुआ का बहुत महत्व है। दरअसल मरुआ पोषक तत्वों का गढ़ है। आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि उत्तराखण्ड से मरुआ जापान जाता है और वहां इससे बेबी फ़ूड तैयार होता है। ऐसे में बिहार झारखंड और अन्य राज्यों के किसानों को मरुआ को लेकर नए सिरे से सोचने की जरूरत है।

ये तो हुई विदेश के बाजार की बात। अब जानिये रोग के लिए मरुआ का महामात्य । दरसअल जिस तेजी से हम सब मधुमेह के जाल में फंस रहे हैं ऐसे में मरुआ के महत्व को समझना होगा।

मरुआ का सेवन मधुमेह रोग में रामबाण साबित होता है। डाक्टर इसका सेवन करने के लिए कहते हैं। इसका बिस्कुट बनने लगा है। तो ऐसे में बिहार के किसान इस अनाज में हाथ क्यों नहीं आजमा रहे हैं, सुनकर अचरज होता है।

यदि आप पोखर बना रहे हैं तो उसके मेड़ पर आप मरुआ उपजा सकते हैं। मरुआ जमीन को समतल भी करता है खासकर बलुआही जमीन को। यह कम दिन का फसल है लेकिन समस्या बीज की उपलब्धता को लेकर है। बीज नहीं मिलने के कारण उन किसानों को दिक्कत हो रही है जो इसकी खेती के लिए मन बना चुके हैं।

जिस फसल को हम सब  अबतक पूछ नहीं रहे थे उसक कितना बड़ा बाजार बन गया है।

दरअसल जीवन की तरह ही फसलों का अपना चक्र होता है। फसल भी अपने जीवन में उतार चढ़ाव देखता है। जिस अनाज को आप काला या दबा कुचला मानकर पूछते नहीं थे उसपर आज आपको सोचना पड़ रहा है। यह जीवन के उस चक्र की तरह है जिसमें कहा जाता है कि सब दिन होत न एक समाना .... मतलब हर का दिन आता है।

Saturday, March 09, 2019

बेगम अख़्तर की बातें

गीत-संगीत की दुनिया से पहले दूर ही था लेकिन समाचार एजेंसी में नौकरी करते हुए जब गीत-संगीत से सम्बंधित ख़बरें सामने आने लगी तो इस दुनिया से थोड़ी बहुत आशिक़ी शुरू हुई। फिर एक दिन उस्ताद बिस्मिल्ला खान का एक साक्षात्कार देख रहा था, जिसमें खान साहेब आँखें मूँदकर गा रहे थे -

‘दीवाना बनाना है , तो दीवाना बना दे,
वरना कहीं तक़दीर तमाशा न बना दे।’

और इन पंक्तियों को गाने के बाद वे बेगम अख़्तर को याद करने लगते हैं। वे कहते हैं कि बेगम अख़्तर की आवाज़ में एक ‘शोख़ लचीलापन तो है ही, एक मोहक कर्कशता’ भी है।

फिर एक दिन एक किताब हाथ में आती है - ‘सुर की बारादरी’ जो उस्ताद साहेब की ज़िंदगी पर आधारित है। यह किताब दरअसल उस्ताद से यतीन्द्र मिश्र की हुई बातचीतों और मुलाकातों की किताबी शक्ल है जिसे आप संस्मरण और जीवनी लेखन के आसपास की विधा मान सकते हैं।

आज एक साथ उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ और बेगम अख़्तर दोनों याद आ रहे हैं, जिसकी वजह एक किताब है- ‘ अख़्तरी सोज़ और साज़ का अफ़साना’

यतीन्द्र मिश्र Yatindra Mishra ने इस किताब में बेगम अख्तर से जुड़े कई प्रसंगों को समेटा है। इसके बाद किताब में बेगम अख्तर की दो सबसे करीबी शिष्या शांति हीरानंद और रीता गांगुली से उनकी बातचीत है, जो बेगम अख्तर की शख्सियत को और करीब से समझने का मौका देती है। इसके अलावा, अलग-अलग क्षेत्र के लोगों की बेगम अख्तर के संगीत के बारे में टिप्पणियां भी किताब का हिस्सा हैं।

यतीन्द्र मिश्र को पढ़ते हुए संगीत से क़रीबी बढ़ती है। उनसे कुल जमा एक ही  बार मिला हूं। संगीत में बसने की ललक उनमें दिख जाती है। इस किताब में उन्होंने बेगम अख़्तर को बख़ूबी उकेरा है।

यतीन्द्र मिश्र  इस किताब के सम्पादक हैं, जिसे उन्होंने चार खंडों में बाँटा है। इसे पढ़ते हुए महसूस हुआ कि यह क़िताब सिर्फ़ संगीत-प्रेमियों या बेगम अख़्तर के कद्रदानों के लिए ही उपयोगी नहीं है बल्कि इतिहास और समाज-विज्ञान में रुचि रखने वालों को भी ‘अख़्तरी’ पसन्द आयेगी।

मेरा मानना है कि एक विशेष दौर में हुए किसी विशिष्ट चरित्र को लेकर बुने गये सन्दर्भों के तहत लिखी गयी क़िताबें उस दौर का भी संस्मरण बताती हैं। वे उस इतिहास का दस्तावेज़ होती हैं। यही हाल ‘अख़्तरी’ का भी है। एक गायिका उसी तरह अपने समय को दर्ज़ करते हुए एक बड़े ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में विमर्शमूलक हो सकती है, जिस तरह अपने दौर में सामन्त, नवाब, एक सैनिक या योद्धा, समाज सुधारक, राजनीतिक लोग, आध्यात्मिक सन्त और अभिनेता-अभिनेत्री आदि होते हैं।

इस किताब के ज़रिए बेगम अख़्तर को क़रीब से जानने की चाहत पूरी हुई। वैसे यह दावा नहीं कर सकता लेकिन बहुत कुछ तो ज़रूर जान पाया उस गायिका के बारे में, जिनकी आवाज़ ही उनकी पहचान थी।

वो गायिकी का पाठ थीं। उनकी ज़िंदगी की कहानी में मन रम जाता है। यतीन्द्र मिश्र ने अलग अलग लोगों की टिप्पणियों को इस किताब में शामिल किया है। उन टिप्पणियों में हम अपने पसंदीदा कलाकार के व्यक्तित्व में जीवन और मंच पर अलग अलग उनके मिज़ाज की हर छोटी बड़ी बात और घटना को महसूस करते हैं।

किताब में एक जगह सिगरेट और बेगम अख़्तर की गायिकी  का ज़िक्र कुछ इस तरह है-

‘हर वक़्त एक सिगरेट का पैकेट उनके साथ होता। एक प्रशंसक ने पूछ लिया कि इससे आपके गले पर फ़र्क़ नहीं पड़ता? उन्होंने कहा- “ मैं गले से गाती कहाँ हूं ?’

{ किताब- अख़्तरी सोज़ और साज़ का अफ़साना
सम्पादक- यतीन्द्र मिश्र
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
मूल्य-₹ 395 }