Monday, September 18, 2017

धान में बाली आई है !

किसानी करते हुए हम साल में तीन फ़सल को बनते -बिगड़ते देखते हैं। कभी तेज़ बारिश तो कभी आँधी हमें निराश करता है तो वहीं एक वक़्त ऐसा भी आता है, जब सबकुछ सुंदर लगता है। यह वही समय होता है जब खेत मुझे कैनवास लगता है, जिसके पेंटर हम किसान होते हैं लेकिन  फ़्रेम में ढालने का काम प्रकृति करता है। 
किसानी एक ऐसा पेशा है जिसकी कमान मौसम के हाथ है। यदि आप खेती को कंपनी की नज़र से देखेंगे तो आपको यह कहना होगा कि किसानी पेशे का सीईओ 'मौसम' ही है। आप खेत में लाख मेहनत कर लें, परिणाम मौसम के अनुसार ही होगा। 

आज सुबह सुबह चनका के खेत में धान की नई बालियों को देखकर मन झूमने लगा। अब इन बालियों का अन्न से भरने का इंतज़ार है। खेत अब हरे रंग में रंग चुका है, पीले रंग का असर अब दिखेगा तो तोते के झुंड खेत में चहलक़दमी करते दिखेंगे। तोता  एक चिड़ियाँ है, जिसे धान बहुत पसंद है। खेतों में तोता जब झुंड में पहुँचती है तो हरे रंग का ज़बरदस्त कमाल देखने को मिलता है। खेती-किसानी करते हुए हम प्रकृति  के संग जीने लगते हैं। 

धान की ये नई बालियाँ मुझे उस आँगन की तरह दिखती है, जहाँ बेटियों की किलकारी सुनने को मिलती है। हमारे यहां तो धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है. धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है. बौद्ध  साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध के पिता का नाम था- शुद्धोदन यानी शुद्ध चावल. वट वृक्ष के नीचे तप में लीन गौतम बुद्ध ने एक वन-कन्या सुजाता के हाथ से खीर खाने के बाद बोध प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए. इस कहानी को पढ़कर लगता है शायद इसी वजह से 70 के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाक़ों में एक पुरानी नस्ल की धान का नाम 'सुज़ाता' होगा. इस धान का चावल बहुत ही सुगन्धित हुआ करता था.

पहले धान की देसी क़िस्मों से खेत गुलज़ार रहता थाउस वक़्त हाईब्रीड नस्ल ने जाल नहीं फैलाया था। बाबूजी की पुरानी डायरी पलटते वक़्त पता चलता है कि पहले धान का नाम बहुत ही प्यारा हुआ करता था, मसलन 'पंकज' 'मनसुरी' , 'जया', 'चंदन', 'नाज़िर', 'पंझारी', 'बल्लम', 'रामदुलारी', 'पाखर', 'बिरनफूल' , 'सुज़ाता', 'कनकजीर' , 'कलमदान' , 'श्याम-जीर', 'विष्णुभोग' आदि. लेकिन नब्बे के दशक से अचानक ये नाम गुम हो गए और इनकी जगह बना हायब्रिड नस्ल के धान के बीज का बाज़ार जिसे अंकों में पहचाना जाने लगा, जैसे 1121 बासमती, 729, 1010 आदि


आज अपने खेत में इन धान की बालियों को देखकर मन के भीतर का खेत भी हरा हो गया। ज़रूरत है अब धान के उन नस्लों को फिर से खेत में उगाने का, जिसकी वजह से पहले हम किसान पहचाने जाते थे। 

Friday, August 25, 2017

बाढ़ से बचाव के लिए नदी से मिलना होगा- 3

हर साल सीमांचल के कुछ इलाके बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित होते हैं। मसलन पूर्णिया का अमौर और बायसी से जुड़ा इलाका। हर साल यहां बाढ़ आती है, राहत शिविर में लोगों को जाना पड़ता है। इस इलाके में बाढ़ की विनाशलीला के कारण को समझने के लिए हमें परमान नदी के रास्ते को समझना होगा।

बुकानन ने परमान नदी को पंगरोयान कहा है। कहीं कहीं इस नदी को बालकुंवर भी कहा जाता है। परमान की कहानी नेपाल से शुरु होती है। हिमालय से निकलकर यह बूढ़ी नाम की नदी के रुप में भारत – नेपाल सीमा पर स्थित जोगबनी से पश्चिम मीरगंज गांव में प्रवेश करती है। इस बार बाढ़ ने इस इलाके को बुरी तरह से तबाह किया है।

जैसे ही यह नदी मीरगंज में प्रवेश करती है, इसे परमान नाम से पुकारा जाने लगता है। परमान यही से ढ़ेर सारी धार-और सहायक नदियों को अपने में समेटना आरंभ करती है। रजई-सोता जैसी सहायक नदियां इसके संग हो जाती है। अररिया शहर आज जहां है, पहले यहीं से यह गुजरती थी। बाद में यह शहर से सटे पूरब-दक्षिण का रास्ता बनाकर बहने लगी। इस बार अररिया के आसपास बाढ़ से कुछ हुआ, इसके पीछे नदी का पुराना रास्ता ही कारण रहा है।

इस बार बाढ़ प्रभावित इलाके सुरजापुर, बेलवा, मझैली, चैनपुर जैसे गांव परमान की गोद में बसे हैं। इसी रास्ते से निकलकर परमान अररिया-पूर्णिया सीमा स्थित शादीपुर गांव पहुंचती है और यहीं से अमौर और बायसी इलाका परमान को बड़े फैलाव का रास्ता दिखा देती है। यहीं आकर परमान नदी भारी मात्रा में जल लेकर बकरा नदी में मिल जाती है।

पहले यह सभी नदी का रास्ता था या फिर खेत, इसलिए बाढ़ से केवल फसल का नुकसान होता था लेकिन अब जब बस्ती, गांव और बाजार बस गया है तब हम नदी पर सवाल उठाने लगे हैं। इसलिए हमें अब नदी को समझना होगा।

पूर्णिया गजेटियर में ओ मैली कहते हैं कि चांप-चौर का इलाका (जहां पानी जमा रहता है) होने की वजह से जुलाई से सितंबर तक इस इलाके में वन्य जीवों और पक्षियों को अड्डा होता था। ठंड के मौसम में साइबेरियन पक्षी यहां आती थी। पूर्णिया के बसावट को नदी के अनुसार हमें समझना होगा।

पूर्णिया जिला में पहले बड़ी संख्या में अंग्रेज  किसान रहते थे, जिन्हें जेंटलमेन फार्मर कहा जाता था। ऐसे ही एक किसान थे जॉय विक्टर। सौरा नदी के पूर्वी तट पर उनका घर था, यानि आज के पूर्णिया का रामबाग इलाका। वे अपनी एक डायरी में लिखते हैं कि पूर्णिया के आसपास नदियों का जो नेटवर्क है, उसी के अनुसार इलाके में बसावट और खेती होती रहनी चाहिए।

इस तरह की बातों को पढ़ने के बाद ऐसा लगता है कि पुराने पूर्णिया जिला को नदियों के सहारे एक बार फिर समझने –बुझने की जरुरत है और इस जानकारी को हर व्यक्ति तक पहुंचाने की आवश्यकता है। ताकि जब कोई जमीन खरीदकर घर बनाने की सोचे तो एक बार यह जरुर पता कर ले कि 100-150 साल पहले यहां से कौन सी नदी बहती थी क्योंंकि एकदिन जब उसी रास्ते नदी फिर से बहना आरम्भ कर देगी उस वक़्त क्या होगा, जैसा इस बार हमने देखा।

(जारी है...)
#BiharFlood

Wednesday, August 23, 2017

बाढ़ से बचाव के लिए नदी से मिलना होगा- 2

अररिया -फ़ारबिसगंज-पूर्णिया-कटिहार, इन सभी इलाक़ों में इस बार बाढ़ ने तबाही मचाई है। लेकिन जब भी हम बाढ़ की बात करते हैं तो बस कोसी-महानंदा-गंगा में सिमट जाते हैं, जबकि हम इन नदियों की सहायक नदी-धार  की बात नहीं करते, जिसने इस बार सीधे तरीक़े से लोगों को प्रभावित किया है। 

12 अगस्त की रात जब पूर्णिया-किशनगंज सीमा को बाढ़ ने अपनी चपेट में लिया था उस वक़्त भी हम अपनी पुरानी नदी-धार  से अनजान थे और आज भी अनजान ही बने हैं। महानंदा बेसिन की नदियों के नाम भी हमें याद रखना चाहिए। हम केवल परमान की बात करते हैं जबकि उसके संग कनकई, बलासन, डोंग, बकरा, नागर, रतवा, नूना, रीगा, लोहंदरा, मलुआ, दास और सुघानों भी महानंदा की सहायक नदियाँ हैं। इन सभी नदियों की प्रकृति कटाव वाली है। 

अब आप सोचिए कि इन्हीं नदियों के पेट में यानि राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 31 के साथ कितने नए इलाक़े बस गए। 1910 में आईसीएस ऑफ़िसर ओ मैली लिखते हैं कि 'महानंदा बेसिन की नदियां शिफ़्टिंग नेचर की है, मतलब एकतरफ़ काटकर दूसरी तरफ़ मिट्टी जमाकर बसा देना। ' इस अंग्रेज़ अधिकारी ने पुराने पूर्णिया जिला को कोसी समूह और परमान-कनकई -महानंदा समूह बाँटकर अध्ययन किया था। इस  बार बाढ़ ने किशनगंज शहर तक तबाही मचाई है इसलिए ज़रूरत है कि शहर के मध्य से गुज़रने वाली नदी को समझा जाए। 

वहीं जब हम अररिया -पूर्णिया सीमा की बात करते हैं तो मैं आपतक रानीगंज के रास्ते पूर्णिया सीमा में नदियों के प्रवेश की जानकारी पहुँचाना चाहूँगा। रानीगंज से आगे कारी कोसी के पेट में एक गाँव है -इंदरपुर, जो इंद्रपुर का अप्रभंश है। यहीं से हमने नदी का रास्ता मोड़ने का काम किया। जबकि पूर्णिया गजेटियर के अनुसार महाराज इंद्रनारायण राय ने कारी कोसी के तट पर गाँव बसाया था। यहाँ अब स्टेट हाईवे है। अब हमें इस सड़क के किनारे बड़हरा, काला बलुआ, लालपुर बस्ती मिलती है जबकि 1891 ये सभी इलाक़े नदी के तट थे। मतलब 126 साल में हमने नदी का रास्ता बदल दिया, अपने बसावट के लिए। ऐसे में नदी कुपित तो होगी। 

वहीं इसी मार्ग में एक ऐसा भी इलाक़ा है, जिसके साथ छेड़छाड़ नहीं हुई तो वहाँ आज भी कारी कोसी शांति से बहती है, वह है सिंघिया जंगल का इलाक़ा।  इस इलाक़े को आप 'पाकिस्तान टोला' की वजह से जानते ही होंगे।

हम अभी आपको कारी कोसी और सौरा के मिलन की जानकारी देंगे क्योंकि हमें यह जानना चाहिए कि इस बार के बाढ़ में छोटी नदियों ने किस प्रकार एक बड़ा नेट्वर्क तैयार किया है, अपने मूल रास्ते में। चम्पानगर के पूरब कारी कोसी बनभाग पहुँचती है। यहाँ यह नदी पहले पूर्णियाँ -सहरसा रेल मार्ग को पहले पार करती है फिर सड़क मार्ग पारकर दक्षिण की ओर निकल जाती है जो आगे चलकर सौरा में मिल जाती है।  

इन दिनों जब बाढ़ और उसके बाद की स्थिति पर हम सब लगातार चर्चा कर रहे हैं, उस वक़्त हमें इन बातों को भी लोगों तक पहुँचाना होगा। बुकानन, ओ मैली जैसे अंग्रेज़ विद्वानों ने इस इलाक़े के बारे में बहुत कुछ लिखा है। बुकानन ने An Account of the District of Purnea (1809-10) और ओ मैली ने District Gazetteer of Purnea लिखा था। अब इसे लोगों तक सरल भाषा में पहुँचाने का वक़्त है ताकि हम जान सकें कि जहाँ हम पिछले 50-100 साल से बसे हुए हैं, वहाँ कौन सी नदी बहती थी ? एकदिन जब उसी रास्ते नदी फिर से बहना आरम्भ कर देगी उस वक़्त क्या होगा, जैसा इस बार हमने देखा।

#BiharFlood

Tuesday, August 22, 2017

बाढ़ से बचाव के लिए नदी से मिलना होगा -1

बिहार के सीमांचल इलाके में बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है। अररिया और
फारबिसगंज इलाका सबसे अधिक प्रभावित हुआ है। पूर्णिया के आसपास के इलाकों में भी बाढ़ का पानी प्रवेश कर चुका था। अब जब बाढ़ का पानी उतर चुका तब स्थिति और भी भयानक दिखने लगी है। लेकिन इन सबके बीच में हम नदियों को लेकर बातें कम करने लगे हैं। नदियों को हमने नाला समझ लिया था, नदियों के पेट में हमने मकान खड़े कर दिए। 1911 में आईसीएस ऑफिसर एल एस एस मैली ने पूर्णिया जिला का पहला गजेटियर प्रकाशित किया था। तब पूर्णिया जिला की सीमा विशाल थी, दूर दूर तक। हमने इस किताब के आधार पर पूर्णिया-अररिया की नदी-धार को समझने की कोशिश की है। 

अररिया अब जिला बन चुका है। इस बार बाढ़ में अररिया को भारी क्षति पहुंची है। यहां नदियों के बारे में लोगों ने बातें करना छोड़ दिया था। लेकिन वे भूल गए थे कि जिसे नाला समझा जा रहा है वो तो नदी है।

दरअसल पुराने पूर्णिया जिला के विभिन्न नदियों की कहानी बड़ी रोचक है।पहले हमें इन नदियों की कहानियां सुनाई जाती थी लेकिन विगत दो-तीन दशकों
में कोई किसी को नदी की कहानी नहीं सुना रहा है। ऐसे में हम नदी को
पहचाना भूल गए।

एक नदी है देवनी। यह महानंदा-कनकई नदी की एक उपधारा है। एक जमाने में यह ताकतवर नदी हुआ करती थी। फ्रांसिस बुकानन ने लिखा है कि इस नदी का स्रोत नेपाल में था जो अररिया होते हुए पूर्णिया की सीमा में दाखिल होती है और फिर किशनगंज की तरफ मुड़ते हुए महानंदा और कनकई में मिलती है। 

आज जब पूर्णिया के डगरुआ इलाके को आप देखेंगे तो लगेगा कि हमने किस तरह देवनी नदी को नजरंदाज कर दिया और इस बार यही नदी रुठकर हमें बाढ़ के जरिए रुलाने लगी।

बाढ़ के दौरान इसी तरह जब हम पूर्णिया से कसबा की तरइ निकले तो कई
रियाहशी इलाके जलमग्न दिखे। कसबा के पूरब होते हुए पूर्णिया सिटी से
दक्षिण एक नाले से पानी गुजरती थी लेकिन इस बार वह नदी दिख रही थी।
पूर्णिया गजेटियर  में यह इच्छामती नदी है।

वैसे सच यह है कि इस बार हमने जिस नदी को समझने में सबसे अधिक भूल की, वह है सौरा। एक अंग्रेज विद्वान फ्रांसिस बुकानन हुए। उन्होंने  1810 के आसपास पूर्णिया का व्यापक अध्ययन किया। हालांकि वे पेशे से चिकित्सक थे लेकिन वे प्रसिद्ध हुए सर्वेक्षक के तौर पर। उन्होंने पूर्णिया का विस्तृत और व्यापक सर्वेक्षण
किया था। बुकानन ने सौरा नदी को समीरा लिखा है। 

सौरा का उद्गम फणीश्वर नाथ रेणु के गांव औराही हिंगना से पूरब है। यहां अहमदपुर चौर है, जिसकाu क्षेत्रफल करीब 1500 एकड़ है। यहीं से सौरा का जन्म होता है। आगे निकलते ही बूढ़ी कोसी, कारी कोसी, दुलारदेई, पेमा, सीतावगजान, सरसुनी, कजला, कमला, कमताहा जैसी धाराएं सौरा की सहायक बन जाती है और इस बार इन्हीं धाराओं ने तांडव मचाकर रख दिया। जिसके बारे हम बात भी नहीं कर रहे थे। 

अहमदपुर से चौर से निकलने के बाद सौराअररिया-रानीगंज स्टेट हाइवे पर रजखोर से पश्चिम सड़क को पार करती है। इसी के समानांतर गीतवास के गांव के पास दुलारदेई नामक नदी है। 

सौरा और दुलारदेई के बीच तकरीबन एक दर्जन पुरानी धाराएं हैं। इन्हीं धाराओं से
होकर ही कभी कोसी की प्रमुख धारा प्रवाहित होती थी, जिसका नाम कजरा है। अब आप समझ गए होंगे कि इस बार बाढ़ से हुई तबाही की वजह क्या थी। यही सारी धाराएं इस बार आक्रमक हो गईं।

 बाढ़ के दौरान अररिया में कई इलाक़ों का सम्पर्क जिला मुख्यालय से टूट गया। इसके लिए हमें बूढ़ी कोसी नदी को समझना होगा। दरअसल बूढ़ी कोसी पूरब की ओर से बहते हुए अररिया जीरो माइल से पूरब जोकीहाट स्टेटहाइवे को पार करती है तथा बेलवा दियारी मजगामा, बागनगर , जलालगढ़,गढ़बनैली से आगे बहते हुए कसबा के निकट पश्चिम दिशा में मुड़कर फोरलेन सड़क को पार करती है। कसबा से दक्षिण पश्चिम में इसका मिलन सौरा से हो जाता है। हमने सड़क का जाल बिछाते वक़्त नदियों को नज़रअन्दाज़ किया और जब इस बार नदियों ने पानी से सब सीमाओं को जोड़ दिया तब हमें दिक़्क़त होने लगी। इसलिए  अब हमें नदियों से मिलना होगा, उसे समझना होगा। 

(जारी है..)