Wednesday, April 09, 2014

बच्चन की चुनावी बातें !

लाहाबाद से अमिताभ बच्चन के चुनाव लड़ने से ब्राह्मणों और कायस्थों का मनमुटाव खुलकर सामने आ गया था। ब्राह्मणों में यह बात फैल गई थी कि यदि अमिताभ जीत गए तो वह मंगल प्रसाद हो जाएंगे। मंगल प्रासद कांग्रेस के ऐसे कायस्थ नेता थे, जिनके जीवनकाल में किसी दूसरे को टिकट मिलने का सवाल ही नहीं उठता था। अमिताभ की जीत में ब्राह्मण अपने भविष्य को अंधाकरमय देखने लगे और मजे की बात यह है कि यह विचार उन ब्राह्मणों का भी था जो कांग्रेस में थे।

अमिताभ बातचीत में बहुत सर्तक रहते थे। उनके चुनावी कार्यक्रमों का संयोजन उनके मामा जगदीश रंजन कर रहे थे, जो संघ लोक सेवा आयोग और विश्वविद्यालय कार्यकारिणी के सदस्य थे। उधर, जया बच्चन भी प्रचार में लगी थीं। वो घूम-घूमकर महिलाओं के साथ बैठक कर रही थीं और इलाहाबाद की बहू होने के नाते मुंहदिखाईमें वोट मांग रही थीं। जया बच्चन औरतों के बीच हाथ के निशानवाली बिंदीभी बांट रही थीं।

चुनाव प्रचारों में अमिताभ दस मिनट का नपा-तुला भाषण देते थे। वे फिल्मी शैली में अपनी बात रख रहे थे। अमिताभ जब चुनाव प्रचार के लिए संगम नगरी आए तो उनके पहनावे का अंदाज भी जुदा था. अमिताभ आमतौर पर क्रीम रंग का कुर्ता और सफेद पायजामा पहनते थे और साथ में शाल भी रखते थे. अमिताभ प्रशंसकों की भीड़ देखते ही कार से बाहर आ जाते और हाथ हिलाकर उनका अभिवादन करते थे. अमिताभ का ये पहनावा और शाल का अंदाज इस कदर लोकप्रिय हुआ कि इलाहाबाद की बाजार से सफेद शाल ही गायब हो गई .


इलाहाबाद में चुनाव प्रचार के दौरान इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रही लड़कियों को पता चला कि अमिताभ लल्लाचुंगी से गुजरने वाले हैं. अमिताभ की एक झलक पाने के लिए विश्वविद्यालय  की लड़कियां महिला छात्रावास के सामने लल्ला चुंगी पहुंच गईं. अमिताभ को आना था 2 बजे लेकिन वो वहां 4 बजे पहुंच सके. अमिताभ आए तो लड़कियों का सैलाब उमड़ पड़ा. लड़कियों ने अमिताभ के इस्तकबाल में सड़क पर अपने दुपट्टे बिछा दिए.

चुनाव प्रचार के दौरान एक बार अमिताभ का काफिला कलेक्ट्रेट के सामने से गुजर रहा था. सड़क के दोनों ओर भारी भीड़ के बीच अचानक लक्ष्मी टाकीज के पास अमिताभ बच्चन कार से उतरे और नाई जुम्मन के पास जा पहुंचे. अमिताभ ने जुम्मन के हाथों बाल कटवाने की इच्छा जताई तो जुम्मन मियां मारे खुशी के रो पड़े।

चुनाव में अमिताभ बच्चन को अखबारों में भरपूर जगह मिली थी । वैसे इलाहाबाद के अखबार उनके बारे में उतना नहीं छाप रहे थे, जितने राज्य के दूसरे स्थानों या बाहर से प्रकाशित अखबार।

( गौरतलब है कि 84 के आमचुनाव में अमिताभ बच्चन को कांग्रेस ने इलाहाबाद से टिकट थमाया था। उनके खिलाफ कद्दावर हेमवती नंदन बहुगुणा थे। हालांकि 84 की लहर में बहुगुणा चुनाव हार गए। यह कतरन रविवार (16-22 दिसंबर 1984) पत्रिका के एक लेख पर आधारित है) 

Sunday, April 06, 2014

चुनावी समय में देहाती बातें

तस्वीर साभार फोटो डॉट नेट 
यह मुल्क का चुनावी काल है। हर जगह चुनावी बकैती चल रही है, ऐसे में मुझे देहाती बातें करना का मन कर रहा है। आप कहेंगे सठिया गया है, लेकिन क्या करिएगा बात करने का मन है तो बात करेंगे ही। देहाती शब्दों पर, बोली-बानी पर लंबी बातचीत करने की इच्छा है।

बैलगाड़ी, संपनी, पटुआ-संठी, टप्पर, कचिया-खुरपी, बखारी या फिर भैंसवार के मुख से भोरे-भोर (सुबह) गाने वाली प्रातकी को लेकर लिखते रहने का मन कर रहा है। दरअसल अंचल की डाइरेक्टरी में ऐसे शब्दों का बड़ा महत्व है। किसानी करते हुए ऐसे शब्दों से अपनापा बढ़ गया है। वैसे बैलगाड़ी हो या फिर बखारी, अब अंचल से ये सब गायब होने के कगार पर है, तो भी अंचल की आंचलिकता इसके बिना अधूरी ही मानी जाएगी। 

गांव के बारे में जब भी लिखने बैठता हूं तो पहली याद बैलगाड़ी की आती है, वो भी टप्पर वाली। मेरे जान-पहचान में ऐसे कई लोग हैं जो बैलगाड़ी को लिखते और पढ़ते हैं लेकिन इसे कभी देखा नहीं है। एक ने मुझसे सवाल पूछा कि क्या तुमने बैलगाड़ी देखी  है (पर्दे पर नहीं सच्ची में)...? मैंने कहा कि सवारी भी की है और वो  भी टप्पर लगे बैलगाड़ी पे। 

अब आप भी पूछेंगे कि टप्पर क्या होता है? दरअसल टप्पर बैलगाड़ी की सवारी करने वालों को धूप-पानी से बचाने के लिए होता है। आप इसे बड़ी सी छतरी के रूप में जान सकते हैं। आपकी बैलगाड़ी की टप्पर कैसी है, इससे आपकी स्थिती का पता लगाया जाता है। (मसन आप अपने इलाके के कितने बड़े किसान हैं.)

मुझे याद आता है रंगीन टप्पर। उसे बांस से बानाया जाता था और उसे खूबसूरत रंगों से रंगा जाता था। उसमें पेंटिंग से कलाकृतियां उकेरी जाती थी। आपको एक ही नजर में बैलगाड़ी का टप्पर रोमांचित कर सकता है।

हाल ही में फणीश्वर नाथ रेणु के घर जाना हुआ था। हम उनके बैठक-खाने में गपिया रहे थे। हमारी नजर अचानक बैठक-खाने के सीलिंग पर गई। वह फूस का बना हुआ था लेकिन बांस की बत्तियों को रंग-रौनक कर जिस तरह सजाया गया था, मुझे टप्पर की याद आने लगी थी। बाद में जब रेणु जी के छोटे बेटे से पूछा तो उन्होंने बताया कि टप्पर की रुपरेखा को ध्यान में रखकर ही बैठकखाने को तैयार किया गया है। 

कोसी क्षेत्र में 80  के दशक तक इन टप्परों का बोलबाला था। बड़े भूपति आदिवासी कारीगरों से टप्पर बनवाया करते थे। बाद में ये टप्पर ट्रेक्टरों के ट्रेलर पर भी लगाया जाने लगा। खराब सड़कों पर कार के स्थान पर बड़े भूपतियों के घर की महिलाएं ट्रेलर से शहर जाती थीं, उनके लिए टप्पर लगाया जाता था।

टप्पर के पीछे पर्दे भी लगाए जाते थे। ये पर्दे सुंदर साड़ियों से बनाई जाती थी। मेला आदि में लोगबाग सपरिवार इन्हीं गाड़ियों से आया-जाया करते थे।  मुझे बैलगाड़ी से पीछे की एक और सवारी संपनी गाड़ी की याद आ रही । संपनी गाड़ी को एक भैंसा के कंधे के सहारे चलाया जाता था। संपनी सखुआ की लकड़ी से बनता था।

यदि आप दार्जलिंग गए हुए हैं तो वहां आपने लकड़ियों से बने कुछ घर भी देखे होंगे, बस उसी स्टाइल का होता था संपनी गाड़ी। इसमें बैठने और आराम से लेटने की व्यवस्था के साथ-साथ छोटा टेबल भी रखा होता था, ताकि उसमें सवार लोग कुछ लिखाई-पढ़ाई कर सकें। 

देखिए न ऐसी यादें अब केवल जुबानी ही रह गई है, हमारी कोशिश है कि इसे वैसे लोगों तक पहुंचाया जाए, जो इससे अनजान हैं लेकिन उनके घर के बुजुर्गों का इसे नाता रहा है। देहात की बातों में रसों का भंडार है, बस उसे समझने की जरुरत है।

Monday, March 31, 2014

रेणु की 'चुनावी-लीला'

फणीश्वर नाथ रेणु का बैठकखाना (औराही-हिंगना)
चुनाव के इस मौसम में साहित्यिक-चुनावी बातचीत करने का मन कर रहा है। आप सोचिएगा कहां राजनीति और कहां साहित्य। दरअसल हम इन दोनों विधाओं में सामान हस्तक्षेप रखने वाले कथाशिल्पी फणीश्वर नाथ रेणु की बात कर रहे हैं। रेणु ने 1972 के बिहार विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ा था। उनका चुनाव चिन्ह नाव था , हालांकि चुनावी वैतरणी में रेणु की चुनावी नाव डूब गयी थी लेकिन चुनाव के जरिए उन्होंने राजनीति को समझने-बूझने वालों को काफी कुछ दिया। मसलन चुनाव प्रचार का तरीका या फिर चुनावी नारे।

रेणु ने फारबिसगंज विधानसभा क्षेत्र को चुना था क्योंकि वह उनका ग्रामीण क्षेत्र भी था। आज इस विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधत्व उनके पुत्र पद्मपराग वेणु कर रहे हैं। रेणु ने किसी पार्टी का टिकट स्वीकार नहीं किया था। 31 जनवरी 1972 को रेणु ने पटना में प्रेस कांफ्रेस में कहा कि वे निर्दलीय प्रत्याशी के रुप में चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने कहा था कि पार्टी बुरी नहीं होती है लेकिन पार्टी के भीतर पार्टी बुरी चीज है। उनका मानना था कि बुद्धिजीवी आदमी को पार्टीबाजी में नहीं पड़ना चाहिए। 

रेणु का चुनावी भाषण अद्भूत था।  उन्होंने खुद लिखा है-

 " मैंने मतदाताओं से अपील की है कि वे मुझे पाव भर चावल और एक वोट दें। मैं अपने चुनावी भाषण में रामचरित मानस की चौपाइयां
,दोहों का उद्धरण दूंगा। कबीर को उद्धरित करुंगांअमीर खुसरो की भाषा में बोलूंगागालिब और मीर को गांव की बोली में प्रस्तुत करुंगा और लोगों को समझाउंगा। यों अभी कई जनसभाओं में मैंने दिनकर, शमशेर, अज्ञेय, पनंत और रघुवीर सहाय तक को उद्धृत किया है-

दूध, दूध  ओ वत्स, तुम्हारा दूध खोजने हम जाते हैं- दिनकर
यह दीप अकेला स्नेह भरा-अज्ञेय
बात बोलेगी, मैं नहीं- शमशेर
भारत माता ग्रामवासिनी-पन्त
न टूटे सत्ता का तिलिस्म, न टूटे- रघुवीर सहाय

72 के चुनाव के जरिए रेणु अपने उपन्यासों के पात्रों को भी सामने ला रहे थे। उन्होंने कहा था-  मुझे उम्मीद है कि इस चुनाव अभियान के दौरान कहीं न कहीं मरे हुए बावनदास से भी मेरी मुलाकात हो जाएगी, अर्थात वह विचारधारा जो बावनदास पालता था, अभी भी सूखी नहीं है।

चुनाव में धन-बल के जोर पर रेणु की बातों पर ध्यान देना जरुरी है। उन्होंने कहा था- लाठी-पैसे और जाति के ताकत के बिना भी चुनाव जीते जा सकते हैं। मैं इन तीनों के बगैर चुनाव लड़कर देखना चाहता हूं। समाज और तंत्र में आई इन विकृतियों से लड़ना चाहिए।

रेणु का चुनाव चिन्ह नाव था। अपने चुनाव चिन्ह के लिए उन्होंने नारा भी खुद गढ़ा..उनका नारा था-

" कह दो गांव-गांव में
अब के इस चुनाव में/ वोट देंगे नाव मेंनाव मेनाव में।।
कह दो बस्ती-बस्ती में मोहर देंगे किस्ती में।।
मोहर दीजै नाव परचावल दीजै पाव भर....

कह दो बस्ती-बस्ती में मोहर देंगे किस्ती में।।

मोहर दीजै नाव परचावल दीजै पाव भर....
मोहर दीजै नाव परचावल दीजै पाव भर....

राजनीति में किसानों की बात हो, मजदूरों की बात हो, ऐसा रेणु चाहते थे। राजनीति में किसानों की बात हवा-हवाई तरीके से किए जाने पर वे चिन्तित थे। वे कहते थे- धान का पेड़ होता है या पौधा -ये नहीं जानते मगर ये समस्याएं उठाएंगे किसानों की ! समस्या उठाएंगे मजदूरों की ! "

गौरतलब है कि राजनीति में रेणु की सक्रियता काफी पहले से थी। साहित्य में आने से पहले वह समजावादी पार्टी और नेपाल कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे।
(मूलत: प्रभात-खबर के पॉलिटिक्स में प्रकाशित)

Monday, March 24, 2014

अंचल-कथा-मानुष के संग राजदूत मोटरसाइकिल

अपनी तस्वरी राजदूत के संग
स्कूटर और फियट की ओल्ड मॉडल को याद सब करते हैं लेकिन इस बीच में राजदूत मोटरसाइकिलको लोग भूलते जा रहे हैं। हिंदी बेल्ट के सुदूर देहातों में इस फटफटिया मोटरसाइकिल को लेकर एक जमाने में लोग सबसे अधिक क्रेजी हुआ करते थे।

काली रंग की यह मोटरसाइकिल तब शान की सवारी हुआ करती थी। खराब सड़कों पे भी यह सरपट दौड़ती थी। हीरो, होंडा और अन्य ओटोमोबाइल कंपनियों के हाथ-पांव पसारने के बाद राजदूत का स्पेस सिमटने लगा।

वैसे आज भी बिहार के सुदूर देहात इलाकों में घरों के
सामने यह मोटरसाइकिल आपको मिल जाएगी लेकिन बस खड़ी। चलने के लिए हीरो होंडा या बजाज की१२५ सीसी की बाइक को लोग प्राथमिकता दे रहे हैं।


मेरे घर में ६७ मॉडल की राजदूत है। बीआरके ५४८५. अभी भी इसकी जवानी बरकरार है लेकिन यह उदास रहती है क्योंकि इसके बगल में बजाज की मोटरसाइकिल इठलाती है। राजदूत की उदासी भी मुझे कई मायनों में अन्य मोटरसाइकिल की उदासी से रॉयल लगती है। मोटे टायर
, बड़ी टंकी, न कोई ब्रांड प्रदर्शन बस किक मारिए और दौड़ने को तैयार। मुझे राजदूत की बड़ी टंकी और साइलेंसर सबसे अधिक पसंद है। आप इसे एंटिक लव कह सकते हैं लेकिन मेरे लिए यह पहला प्यार है। 



ये भी कोई बात है कि आप चले और जमाने को इसकी परवाह ही न हो। राजदूत इस बात से परवाह रखता है इसलिए इसके सेलेंसर से आवाज आती है
, वो भी धमाकेदार। हां, बुलेट इसमें आगे है लेकिन राजदूत रसिकों को इससे कोई मतलब नहीं कि कौन तेज आवाज में बोलता है। बस अहसास होना चाहिए कि आप सड़क पे शान से चल रहे हैं।


आप यदि नहर की पगडंडी पर बाइक नहीं चलाएं है तो आप काफी कुछ मिस कर रहे हैं। खासकर कोसी के इलाके के नहरों पे। नहर पे एक पगडंडी होती है, लगभग दस ऊंगली की जगह, वो भी उबर खाबड़.  जहां आपको अपने टायर को दौड़ाना होता है। यहां आपके बाइलेंस की परीक्षा होती है न कि आपके ड्राइविंग लाइसेंस की। ऐसे में राजदूत की याद सबसे अधिक आती है। १२५ सीसी की कोई और बाइक तो कांपने लगती है लेकिन राजदूत का भारीपन यहां हमें एक अलग अहसास देती है।


राजदूत को मालिकाना हक की नजर से देखें तो यह इस तथ्य को दरकिनार करती है। यह मालिक के चाभी से इतर भी स्टार्ट होने से लालायित रहती है। बस कांटी का इस्तेमाल करिए और किक मारिए
, दौड़ पड़ेगी आपकी धन्नो। 

अपने ज्ञान में मैंने पूर्णिया के फोर्ड कंपनी चौराहे पर इस्कॉर्ट के शोरूम के बाहर राजदूत के बैनर पे एक किसान का फोटो देखा था
, तो क्या यही इसकी सबसे बड़ी ताकत थी, जरा आप भी सोचिएगा। ऐसी कई यादें और राजदूत मैनिया है मेरे जहन में, जिसे इन दिनों कुरेदने में जुटा हूं। राजदूत भी मेरे लिए अंचल है, एक कथा है, एक मानुष है। 

Wednesday, March 19, 2014

'हरा' है सब, 'हारे' नहीं हैं और गर्मी की दस्तक...

आलू, सरसों उपजाने के बाद किसानी करने वाले अभी हरियाली में डूबे पड़े हैं। खेतों में मक्का लहलहा रहा है। किसानी करने वाले खुश दिख रहे हैं। लगातार मेहनत के बाद अभी कुछ दिन किसानों के लिए राहत का है।

लोगबाग का कहना है कि लगातार मेहनत से मन
हार जाता है लेकिन मक्का की हरियाली मन से हार को मिटाकर मन को हरा कर देती। होली के बाद हवा ने भी रुख बदला है, धूल ने हवा का साथ दिया और गर्मी ने इन दोनों के बीच अपने लिए जगह बनाकर दस्तक देने की कोशिश की है।

गाम घर में अभी उत्सव जैसा माहौल है। किसी न किसी के घर में भगैत या कीर्तन हो रहा है। वहीं कुतुबु्द्दीन चाचा जलसा करवा रहे हैं। धर्म की दीवार लोगों के बीच नहीं है, यह देखकर और इसे अनुभव कर अच्छा लगता है।

आम और लीची के पेड़ फलों के लिए तैयार हो रहे हैं। आम के मंजर मन के भीतर टिकोले और आम के बारे में सोचने को विवश कर रहे हैं। मन लालची हुआ जा रहा है। उन मंजरों में किड़ों ने अपना घर बना लिया है, मधुमक्खियां इधर-उधर घूम रही है।

बांस के झुरमुटों में कुछ नए मेहमान आए हैं। बांस का परिवार इसी महीने बढ़ता है। वहीं उसके बगल में बेंत का जंगल और भी हरा हो गया है। लगता है गर्मी की दस्तक ने उसे रंगीला बना दिया है। कुछ खरगोश दोपहर बाद इधर से उधर भागते फिरते मिल जाते हैं, वहीं गर्मी के कारण सांप भी अपने घरों से बाहर निकलने लगा है। जीव-जंतुओं का ग्राम्य संस्कृति में बड़ा दखल होता है, ऐसा मेरा मानना है।

ग्राम्य जीवन के 12 महीने की व्याख्या शब्दों में करना संभव नहीं है।  यहां जीवन हर पल बदलता है। अपना अनुभव कहता है कि किसान के भीतर मां होती है, जो 12 महीने फसल के रुप में बच्चों को पालती-पोसती है और फिर फसल को तैयार कर जब मंडी पहुंचाया जाता है तो बेटी की विदाई जैसा माहौल किसान के मन में तैयार हो जाता है। शायद ऐसी जिंदगी आप किसी पेशे में नहीं जीते हैं। किसानी में ही ऐसा संभव है।
दरअसल मैं किसानी को पेशा मानता हूं क्योंकि अभी भी तथाकथित विकसित समाज इसे पेशा मानने को तैयार नहीं है। कई लोग ऐसे मिले जो किसानी को मजबूरी कहते हैं।

वहीं किसानी में समय का अपना महत्व है या कहिए महामात्य है। हर कुछ समय पर होता है और मेहनत का फल भी समय पर मिल जाता है। गाम के कबीराहा मठ की ओर शाम में जब जाना होता है तो अंदर से साधो-साधो की आवाज गूंजने लगती है। मन ही मन बूदबूदाता हूं- धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।  माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय

जीवन की आपाधापी के बीच यार-दोस्त गाम में किसानी कर रहे अपने इस पागल दोस्त के यहां आ जा रहे हैं। जब भी दूर नगर-महानगर से कोई दोस्त यार आता है तो मन के भीतर हरियाली और भी बढ़ जाती है। मैं कबीर में खो जाता हूं और बस यही कहता हूं- 

दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय  
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥

Tuesday, March 04, 2014

बस, रेणु के लिए

किसानी करते हुए 365 दिन का आंकड़ा पूरा हुआ। खेत-खलिहानों में अब मन रमने लगा  है। अहसास ठीक वैसे ही जैसे फणीश्वर नाथ रेणु का लिखा पढ़ते हुए और अपने गुलजार का लिखा बुदबुदाते हुए महसूस करता हूं।

देखिए न आज अपने रेणु का जन्मदिन भी है। वही रेणु जिसने गाम की बोली-बानी, कथा-कहानी, गीत, चिडियों की आवाज..धान-गेंहू के खेत..इन सभी को शब्दों में पिरोकर हम सबके सामने रख दिया और हम जैसे पाठक उन शब्दों में अपनी दुनिया खोजते रह गए। रेणु का लिखा जब भी पढ़ता हूं खुद से बातें करने लगता हूं। रेणु के बारे में जबसे कुछ ज्यादा  जानने-समझने की इच्छा प्रबल हुई, ठीक उस समय से पूर्णिया जिले की फिजा में धुले उनके किस्से इकट्ठा करने में लग गया। घाट-बाट में रेणु को ढूढ़ने लगा। 

किसानी करने का जब फैसला लिया, तब भी रेणु ही मन में अंचल का राग सुना रहे थे और मैं उस राग में कब ढ़ल गया, पता भी नहीं चला। गाम में रहते हुए रेणु से लगाव और भी बढ़ गया है। संथाल टोले का बलमा मांझी जब भी कुछ सुनाता है तो लगता है कि जैसे रेणु के रिपोतार्ज पलट रहा हूं। दरअसल रेणुकी जड़े दूर तक गांव की जिंदगी में पैठ बनाई हुई है। ठीक आंगन के चापाकल पर जमी काई (हरे रंग की, जिस पर पैर रखते ही हम फिसल जाते हैं..) की तरह।

रेणु ही थे जिनका मानना था कि ग्राम समुदायों ने तथाकथित अपनी निरीहता के बावजूद विचित्र शक्तियों का उत्सर्जन किया है। वे संथाली गीतों के जरिए कई बातें कहा करते थे। उन्होंने एक संथाली गीत के जरिए कहा था – “ जिदन संकु-संगेन , इमिन रेयो-लं सलय-एला। (सुख के जीवन के लिए, यहां आइए, यहां ढूंढ़ना है और पाना है..)

रेणु की यह पंक्ति मुझे गाम के जाल में उलझाकर रख देती है, मैं इस जाल से बाहर जाना अब नहीं चाहता, आखिर जिस सुख की खोज में हम दरबदर भाग रहे थे, उसका पता तो गाम ही है। मेरे यार-दोस्त इसे मेरा भरम मानते हैं :)    खैर।  

रेणु को पढ़कर ही डायरी और फिल्ड-नोट्स का महत्व समझ पाया। मुझे याद है सराय-सीएसडीएस के स्वतंत्र शोधार्थी के तौर पर जब टेलीफोन बूथों पर काम कर रहा था, तब सदन झा  सर ने फिल्ड-नोट्स तैयार करते रहने की सलाह दी थी, शायद वे रेणु की बात हम तक पहुंचा रहे थे। रेणु छोटे-छोटे ब्योरों से वातावरण गढ़ने की कला जानते थे। अपने ब्योरो, या कहें फिल्ड नोट्स को वे नाटकीय तफसील देते थे। मक्का की खेती और आलू उपाजकर जब मैं की-बोर्ड पर टिपियाना शुरु करता हूं तो तब अहसास होता है कि फिल्ड नोट्स को इकट्ठा करना कितना बड़ा काम होता है।

गाम के मुसहर टोले में पलटनिया ऋषिदेव के घर के सामने से जब भी गुजरता हूं तो लगता है जैसे रेणु की दुनिया आंखों के सामने आ गयी है। दरअसल उनका रचना संसार हमें बेबाक बनाता है, हमें बताता है कि जीवन सरल है, सुगम है..इसमें दिखावे का स्थान नहीं के बराबर है।  रेणु अपने पात्रों और परिवेश को साथ-साथ एकाकर करना जानते थे। वे कहते थे कि उनके दोस्तों ने उन्हें काफी कुछ दिया है। वे खुद लिखते हैं-

“इन स्मृति चित्रों को प्रस्तुत करते समय अपने लगभग एक दर्जन करीबी लंगोटिया यारों की बेतरह याद आ रही है। वे किसानी करते हैं, गाड़ीवानी करते हैं, पहलवानी करते हैं, ठेकेदार है, शिक्षक है, एमएलए हैं, भूतपूर्व क्रांतिकारी और वर्तमानकालीन सर्वोदयी हैं, वकील हैं, मुहर्रिर हैं, चोर और डकैत हैं। वे सभी मेरी रचनाओं को खोज-खोज कर पढ़ते हैं-पढवाकर सुनते हैं और उनमें मेरे जीवन की घटनाओं की छायाएं ढूंढ़ते हैं। कभी-कभी मुझे छेड़कर कहते हैं- साले उस कहानी में वह जो लिखा है, सो वहां वाली बात है न ?” (पांडुलेख से)


जरा इस कविता को पढ़कर रेणु के मानस को समझने की कोशिश करिए-
“ कहा सुना सब माफ करोगे, लेकिन याद रखोगे
बचपन के सब मित्र तुम्हारे, सदा याद करते हैं
गांव को छोड़कर चले गये हो शहर, मगर अब भी तुम 
सचमुच गंवई हो, शहरी तो नहीं हुए हो..
इससे बढ़कर और भला क्या हो सकती है बात
अब भी मन में बसा हुआ है इन गांवों का प्यार.......”

रेणु के साहित्य में डूबे रहने की आदत से ही पता चला कि मनुष्य की आकृति, रूप-रंग, बोलचाल, उसके व्यक्तित्व की वास्त्विक कसौटी नहीं है और न हीं बड़ी-बड़ी इमारतों से देश की प्रगति मापी जा सकती है। दरअसल बहुत बार जिन्हें हम भद्दा और कुरूप समझते हैं, उनमें मनुष्यता की ऐसी चिनगारी छिपी रहती है, जो भविष्य को भी जगमग कर सके। जैसा मैला-आंचल में रेणु ने बावनदास जैसे चरित्र को पेश किया। उपन्यास में बावनदास की मौत पर रेणु की मार्मिक टिप्पणी की है-“दो आजाद देशों की, हिंदुस्तान और पाकिस्तान की ईमानदारी को, इंसानियत को बावनदास ने बस दो ही डगों में माप लिया।“ (मैला आंचल पृष्ठ संख्या 320)

 आज रेणु के जन्मदिन पर मैं बस यही सब सोच रहा हूं। उनका लिखा पढ़कर मानस बना है और अब किसानी करते हुए रेणु के पात्रों से रुबरु हो रहा हूं। 


(पूर्णिया और अब अररिया जिले के औराही हिंगना गांव में आज के ही दिन यानि 4 मार्च 1921 में रेणु का जन्म हुआ था। । मेरे लिए रेणु तन्मयता से किसानी करने वाले लेखक हैं, क्योंकि वे साहित्य में खेती-बाड़ी, फसल, किसानी, गांव-देहात की बातें करते हैं।)

Saturday, February 22, 2014

बनते किसान की छोटी सी कहानी

आवरन देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान... फणीश्वर नाथ रेणु ने जब यह लिखा था तब पूर्णिया जिले के किसान इन्हीं दोनों (पटसन और धान) फसलों पर आश्रित थे और खूब खुश भी थे। लेकिन धीरे-धीरे किसानी का प्रारुप बदलने लगा। किसानी के इसी बदलते रंग-ढ़ंग के बीच हमने नौकरीपेशा जीवन को अलविदा कहते हुए किसानी को अपनाने की कोशिश की है। अपनी माटी से जुड़कर माटी के लिए ही  कुछ  करने के लिए हम दिल्ली-कानपुर होते हुए पहुंचे बिहार के पूर्णिया जिला। किसानी करते हुए अभी साल ही पूर हुए हैं लेकिन इतना विश्वास जरुर जगा है खेत-खलिहान का जीवन सबसे अनोखा होता है।  

पूर्णिया
जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित एक गांव है चनका यहां हमने किसानी के पारंपरिक रुप को बदलने की कोशिश की है। जिन खेतों में पहले केवल धान-गेंहू-मक्का आदि उपजाया जाता था वहां हम अब प्लाइवुड के लिए लकड़ी उपजाने लगे हैं। इसके साथ ही मिट्टी की उपजाऊ गुणवत्ता बनी रहे इसके लिए हम पारंपरिक खेती भी जारी रखे हैं।

दरअसल उत्तर भारत में किसान और किसानी के प्रति लोगों की धारणा अभी भी पुरानी ही है। कोई यह नहीं चाहता है कि उनके बाल-बच्चे किसानी को करियर बनाए जबकि यदि आपके पास पूंजी और जमीन के संग धैर्य है तो किसानी में काफी फायदा है। हमने इसी फायदे का गणित जोड़कर लकड़ी खेती की शुरुआत की। हमने खेतों में कदंब के पौधे बड़े स्तर पर लगाए। दो पौधों के बीच की दूरी हमने बीस फीट रखी है। इस दूरी की वजह से  हम उसी खेत में पारंपरिक खेती भी कर रहे हैं। मसलन धान के मौसम में धान और मक्का गेंहू के मौसम में मक्का-गेंहू भी उपजा रहे हैं।

शुरुआत में हमने केवल कदंब को इसीलिए चुना है क्योंकि कदंब केवल खेती के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण है। जंगलों को फिर से हरा भरा करने, मिट्टी को उपजाऊ बनाने और सड़कों की शोभा बढ़ाने में कदंब महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह तेज़ी से बढ़ता है और से आठ वर्षों में अपने पूरे आकार में जाता है। इसलिए जल्दी ही बहुत-सी जगह को हरा भरा कर देता है। विशालकाय होने के कारण यह ढ़ेर-सी पत्तियाँ झाड़ता है जो ज़मीन के साथ मिलकर उसे उपजाऊ बनाती हैं।

 हमने खेती के आर्थिक महत्व को देखते हुए कदंब को प्रमुखता दी है। यह पौधा 10 से 12 साल के भीतर ही प्लाइवुड फैक्ट्री के लिए तैयार हो जाता है।  कदंब की कहानी ठीक वैसे ही है जैसे पहले पंजाब में बड़े स्तर पर पॉपलर की खेती हुआ करती थी। हालांकि अब वहां भी कदंब की खेती होने लगी है। गांव में इसे वन खेती का नाम दिया गया है। इसका एक फायदा यह भी है कि आपको जलावन समय-समय पर मिलता रहेगा। मसलन जब पेड़ की छटांई होगी किसान को जलावन मिलेगा।

कदंब के साथ-साथ हम सागवान के पौधे भी लगा रहे हैं। दरअसल किसानों में अब सागवान के पौधे लगाने का चलन बढ़ने लगा है। हम यहां किसानों को अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने के लिए जागरूक कर हे  है, जिससे कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों को आर्थिक लाभ भी हो। सागवान का एक पौधा 80 रुपए या 100 रुपए के आसपास पड़ता है और 12-13 वर्ष में यह तैयार हो जाता है। तब प्रति पौधा किसानों को 25 हजार तक की आमदनी हो जाती है। वहीं खेतों के साथ-साथ भी इसे लगाया जा सकता है, क्योंकि इससे मृदा संरक्षण होता है और यह खेत या फसल को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। इसके पत्ते खेतों में गिरने के बाद गल कर जैविक खाद का कार्य करते हैं। इसकी देखरेख में भी खर्चा बहुत कम है।
वन खेती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में ऐसे 1,73,000 गांव हैं, जिनमें वन भूमि उपलब्ध है।

एक किसान के तौर पर मेरा मानना है कि वन खेती को सरकार ब़ढावा दे। यह
आर्थिक कारणों से काफी  लोकप्रिय हो रहा है। सागवान या कदंब का एक पौधा बैंक एफडी से ज्यादा रिर्टन दे रहा है।

इसकी कीमतें पिछले चार सालों में दोगुनी हो गई है। कदंब का एक पेड़ 3000 से 15000 रुपये तक बिकता है। वहीं इसका जलावन 600 रुपये क्विंटल तक बिकता है। यह किसान को सवार्धिक फायदा देने वाला पेड़ है। यदि आप केवल जलावन के लिए ही इसकी खेती करना चाहते हैं तो ज्यादा इंतजार भी नहीं करना होगा, केवल एक साल में जलावन के लिए कदंब तैयार हो जाता है।

इन सबके बीच 12 महीने पहले का चकमक जीवन भी याद आता है। सुबह नौ से शाम छह तक एसी कमरे में अपने सहकर्मियों के संग काटे कुल छह साल याद आते हैं। चाय-कॉफी के संग दुनिया जहान की बातें हम करते थे। लेकिन किसानी करते जो अनुभव हो रहा है वह उन बतकही से कोसों दूर है।