Thursday, March 23, 2017

बाबूजी का गाम

बाबूजी का गाम
-गिरीन्द्र नाथ झा
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बाबूजी का गाम दूर था
उस गाँव से
जहाँ वे रहते थे
बाबूजी का गाम
उनका 'देस' था
कोसी के उस पार।
कोसी के इस पार तो
वे किसान थे
लेकिन
उस पार थे
'धान-पटुआ वाले' !
बाबूजी के भीतर बसता था
दो गाँव
दो बस्ती
दो समाज।
वे अक्सर निकल पड़ते थे
अपने देस
धान,पटुआ, मूँग, गेहूँ उपजाकर।
अब जब वे निकल गए हैं
बहुत दूर
अपने 'लोक-देस' में
तब मैं भी घूम आता हूं
कभी-कभी
उनका देस।
हम प्रवासी
अपने भीतर
छुपाए रखते हैं
न जाने कितने गाम-घर!
कोसी के इस पार
घर के आगे क़दम-बाड़ी
सामने पोखर
नीलकंठ चिड़ियाँ
और उस पार
आम-लीची-पोखर-माछ ।
मुल्क की बदलती राजनीति
प्रेम के चौक़ीदार
'रंग' वाली 'गंध' वाली राजनीति
यह सब जीते-भोगते
आज अचानक
लोहे वाली काली आलमारी में
बाबूजी की एक चिट्ठी मिल गई
बाबूजी ने अपने बाबूजी को
भेजी थी वह चिट्ठी
५१ साल पुरानी चिट्ठी
जिसमें बाप-बेटे
खेत-खलिहान
और
देस की बात करते हैं
चिट्ठी में नहीं है ज़िक्र
राजनीति की
ज़िक्र है तो बस
नहर का
अच्छी फ़सल और
पटसन के दाम का
किसानी के नए अंदाज़ का
ट्रेक्टर ख़रीदने की योजना का
धान बेचकर
बंधक पड़ी ज़मीन छुड़ाने का।
चिट्ठी हाथ में थामते ही
हथेली से पुराने काग़ज़ की
गंध आती है
बार-बार सूंघता हूं और
काग़ज़ में खोजता हूं
बाबूजी को,
बाबूजी के बाबूजी को,
यह सब सोचते हुए
घर के आगे
पोखर के किनारे
जहाँ अब बाबूजी हैं
वहाँ पहुँच जाता हूं,
वहाँ उग आई हैं
ढेर सारी श्याम तुलसी
काग़ज़ का गंध
और तुलसी की महक
अब एक जैसी लगती है,
ठीक वैसे ही जैसे
बाबूजी को लगता था
उनका अपना देस!

(चनका, २३ मार्च, २०१७)

Tuesday, March 21, 2017

चनका के किसान की डायरी

आलू, सरसों उपजाने के बाद किसानी करने वाले अभी हरियाली में डूबे पड़े हैं। खेतों में मक्का लहलहा रहा है। खेत की हरियाली इन दिनों देखते बनती है। मक्का की हरियाली में खेत डूबा हुआ है। वहीं जलजमाव वाले खेतों में फिर से धनरोपनी हुई है। धनरोपनी के हफ़्ते बाद खेत की सुंदरता देखने लायक होती है। ऐसा लगता है मानो खेत में हरे रंग की चादर बिछा दी गई हो। इन दिनों किसानी करने वाले खुश दिख रहे हैं। लगातार दो महीने मेहनत करने के बाद अभी कुछ दिन किसानों के लिए राहत का है। बस आँधी और ओलावृष्टि न हो !

किसानी की दुनिया को दूर से देखने वाले लोगबाग का कहना है कि लगातार मेहनत से मन ‘हार’ जाता है लेकिन मक्का की हरियाली ‘मन से हार’ को मिटाकर ‘मन को हरा’ कर देती। होली के बाद हवा ने भी रुख बदला है, धूल ने हवा का साथ दिया और गर्मी ने इन दोनों के बीच अपने लिए जगह बनाकर दस्तक देने की कोशिश की है, हालाँकि ठंड अभी भी है। वहीं दूसरी ओर कुछ दिन पहले हुई बारिश 
ने किसानों को पटवन से राहत तो दी है लेकिन हवा और उमड़ते-घुमड़ते बादल से आँधी का भय हमें सता रहा है। 

ख़ैर, अब सबकुछ मौसम के हवाले है। प्रकृति जो चाहेगी वही होगा। किसान ने खेत में मेहनत कर दिखा दिया है। खेत में अपना काम पूरा कर किसानी समाज इन दिनों अपनी दुनिया  में मगन है। सच कहें तो होली के बाद भी गाम –घर में अभी उत्सव जैसा माहौल बना ही हुआ है। किसी न किसी के घर में भगैत या कीर्तन हो रहा है। वहीं कुतुबु्द्दीन चाचा जलसा करवा रहे हैं। धर्म की दीवार लोगों के बीच नहीं है, यह देखकर और इसे अनुभव कर अच्छा लगता है।यहाँ फ़सल की तरह हर रंग में लोग डूबे हैं। 

उधर, आम, लीची, कटहल और नींबू के पेड़ फलों के लिए तैयार हो रहे हैं। आम के मंजर मन के भीतर टिकोले और पके आम के बारे में सोचने को विवश कर रहे हैं। मन लालची हुआ जा रहा है। उन मंजरों में किड़ों ने अपना घर बना लिया है, मधुमक्खियां इधर-उधर घूम रहे हैं। रेलवे की लाइन की तरह आम बाड़ी में पंक्तिबद्ध मालदह, कलकतिया, गुलाबखास, बम्बई, जर्दालू, आम्रपाली गाछों में मंज़र देखकर मन चहकने लगा है। लीची में भी मंज़र हैं लेकिन आम ने इस बार बाजी मारी है।

लीची बाड़ी में छोटी मधुमक्खियाँ आईं हुई हैं। मंज़रों में मधुमक्खियाँ लिपटी रहती हैं। वहीं कटहल अपनी उपस्थिति दर्ज करने लगा है। नींबू तो काटों  के बीच मोती माला की तरह दिखने लगा है। 

बांस के झुरमुटों में कुछ नए मेहमान आए हैं। बांस का परिवार इसी महीने बढ़ता है। अभी से लेकर बरसात तक बांस की सुंदरता देखने लायक होती है। वहीं उसके बगल में बेंत का जंगल और भी हरा हो गया है। लगता है गर्मी की दस्तक ने उसे रंगीला बना दिया है। कुछ खरगोश दोपहर बाद इधर से उधर भागते फिरते मिल जाते हैं, वहीं गर्मी के कारण सांप भी अपने घरों से बाहर निकलने लगा है। जीव-जंतुओं का ग्राम्य संस्कृति में बड़ा दखल होता है, ऐसा मेरा मानना है।

ग्राम्य जीवन के इस महीने की व्याख्या शब्दों में करना संभव नहीं है।  यहां जीवन हर पल बदलता है। अपना अनुभव कहता है कि किसान के भीतर मां होती है, जो 12 महीने फसल के रुप में बच्चों को पालती-पोसती है और फिर फसल को तैयार कर जब मंडी पहुंचाया जाता है तो बेटी की विदाई जैसा माहौल किसान के मन में तैयार हो जाता है। शायद ऐसी जिंदगी आप किसी पेशे में नहीं जीते हैं। किसानी में ही ऐसा संभव है।

दरअसल किसानी को पेशा माना जाना चाहिए। हालाँकि अभी भी तथाकथित विकसित समाज इसे पेशा मानने को तैयार नहीं है। कई लोग ऐसे मिले जो किसानी को मजबूरी कहते हैं। 

वहीं किसानी में समय का अपना महत्व है या कहिए महामात्य है। हर कुछ समय पर होता है और मेहनत का फल भी समय पर मिल जाता है। गाम के कबीराहा मठ की ओर शाम में जब जाना होता है तो अंदर से साधो-साधो की आवाज गूंजने लगती है। मन ही मन बूदबूदाता हूं- “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।  माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय”

जीवन की आपाधापी के बीच यार-दोस्त गाम में किसानी कर रहे अपने इस दोस्त के यहां आ जा रहे हैं। जब भी दूर नगर-महानगर से कोई दोस्त –यार आता है तो मन के भीतर हरियाली और भी बढ़ जाती है। मैं कबीर में खो जाता हूं और बस यही कहता हूं- 

“दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय  
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ “

(21 मार्च 2017 को प्रभात खबर के कुछ अलग स्तंभ में प्रकाशित)

Tuesday, March 07, 2017

पूंजी के लिए परेशान किसान

गाँव का हरीश कमाई को लेकर हमेशा परेशान रहता है। इस बार आलू की पैदावार अच्छी हुई लेकिन क़ीमत नहीं मिलने के कारण हरीश फिर से परेशान है। यह किसान बार -बार पंजाब का ज़िक्र करता है। हरीश को बताता हूं कि पंजाब में किसानी कर रहे लोग भी परेशान हैं, लेकिन वह इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है। दरअसल आप देश के किसी भी हिस्से के ग्रामीण इलाक़ों का दौरा कर आइए, हर जगह पंजाब की खेती की तारीफ़ सुनने को मिलेगी। हालाँकि वहाँ  के किसान भी अब परेशान हैं लेकिन तो भी देश के अन्य हिस्सों की तुलना में पंजाब के किसान ख़ुशहाल हैं। किसी भी राज्य के किसान की ख़ुशहाली की वजह क्या हो सकती है? इसका एक ही जवाब है- पैसा। जिस तरह किसी भी व्यवसाय में पैसे से पैसा बनता है, ठीक वैसे ही खेती  में यदि किसान  के पास पूँजी हो तो वह ऊँची उड़ान भर सकता है।

हाल में एनएसएसओ (नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन) के एक सर्वे पर नज़र गई। सर्वे के अनुसार देश में पंजाब राज्य का किसान हर महीने सबसे ज्यादा 18059 रुपए की कमाई करता है,जबकि बिहार का किसान देश में सबसे कम मात्र 3558 रुपए प्रति महीना कमाता है। हालाँकि यह सर्वे रिपोर्ट तीन साल पुरानी है लेकिन गाँव में खेती-बाड़ी करते हुए मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।  किसान आज भी परेशान हैं।

हाल ही में इंदौर के एक किसान ने आलू की खेती में हुए घाटे का जब ज़िक्र किया तो नेशनल मीडिया ने इस ख़बर को प्रमुखता दी। दरअसल किसी ने आलू खेती में इंदौर के इस किसान के घाटे की बात को ट्वीट के ज़रिए प्रधानमंत्री तक पहुँचा दिया। इस बार इंदौर के किसान राजा चौधरी के लिए आलू की खेती करना बेहद घाटे का सौदा साबित हुआ। राजा चौधरी ने इंदौर के चोयथराम मंडी में 20 क्विंटल आलू बेचा था, जिसके दाम मिले 1075 रुपए। वहीं किसान को आलू मंडी में पहुंचाने में खर्च हो गए 1074 रुपए। यानी किसान को महज एक रुपए का फायदा हुआ। इस किसान का दावा है कि इस बार तो उसे एक रुपए का मुनाफा भी हुआ है, लेकिन पिछली बार उसने 1620 रुपए के आलू बेचे थे, जबकि खर्च हुए थे 2393 रुपए। यानी 773 रुपए का उसे नुकसान हुआ है।  अपनी बात को साबित करने के लिए किसान राजा चौधरी ने खर्च और आमदनी का बिल अपने पास संभालकर रखा है।

बिहार के हरीश और मध्य प्रदेश के राजा चौधरी का ज़िक्र हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि किसान को वाजिब क़ीमत नहीं मिल रही है जबकि बाज़ार में उसकी बढ़ियाँ क़ीमत तय है लेकिन खेत में नहीं। तो क्या किसान के पास बड़ा गोदाम होना चाहिए, जहाँ वह फ़सल का स्टॉक करे? यह बेहद ही परेशान करने वाला सवाल है। हम किसानी कर रहे लोग हर साल इस तरह की दिक़्क़तों का सामना करते हैं। बाज़ार भाव क्या होता है, यह हम समझ ही नहीं पाते हैं।

इस बार धान को लेकर भी बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में आलू की तरह ही परेशानी हुई। हम किसान सरकारी दर पर यदि धान बेचना चाहें तो तीन महीने तक हमें धान का स्टॉक रखना पड़ता है, फिर उसे प्राथमिक कृषि साख समिति (पैक्स) और बैंक का चक्कर अलग से लगाना पड़ता है। अब आप ही बताएँ कि यदि हम पहले फ़सल न बेंचें तो खेत में नए फ़सल को कैसे लगाएँगे। बात हर मोड़ पर पूँजी में आकर अटक जाती है और यहीं से आरम्भ होता है किसानों का पलायन। बिहार का किसान देश के अन्य हिस्सों में मज़दूर बन जाता है। अन्नदाता के मजदूर बनने की पीड़ा को शब्दों में ढाला नहीं जा सकता है। यह एक किसान की पीड़ा है। खेत और पूँजी के बीच एक रास्ता तो तैयार करना ही होगा, वह भले ही समूह बनाकर खेती ही क्यों न  हो। किसानों को मिल बैठकर इस पर विचार करना होगा। वैसे बात यह भी है कि हम किसानी समाज के लोग अपनी लड़ाई लड़ने के लिए ख़ुद ही तैयार नहीं है। हम ख़ुद के लिए सड़क पर उतरने के लिए तैयार नहीं है। तर्क गढ़ते हैं बस। आलू की क़ीमत कम मिलती है तो भी हम शांत हैं, अपने भाग्य का रोना रोते हैं और अगली फ़सल में जुट जाते हैं, जबकि वक़्त लड़ने का है। लेकिन अब किसान को ललित निबंध से नाता तोड़कर संगठित होकर खेती करना होगा। 

Wednesday, March 01, 2017

आलू को लेकर बात क्यों नहीं?


देश विरोध के मूड में है। राजधानी से लेकर ज़िला तक में 'रंग बिरंग' का विरोध हो रहा। आभासी दुनिया से लेकर कॉलेज कैंपस तक। हर रंग का विरोध। भक्त का विरोध , भक्त विरोधियों का विरोध। गाली-गलौच, धक्का-मुक्की सब।

इस विरोध-प्रतिरोध काल में ख़्याल आ रहा है क्यों न गोबर का गोईठा बनाया जाए। दरअसल जब विरोध का बड़ा मैदान सज ही रहा तो क्यों न गोईठा का धुआँ छोड़ा जाए। धुआँ से याद आया, आप बाज़ार में आलू दस रुपए किलो ख़रीदते हैं और किसान दो- तीन रुपए बेचता है। लेकिन इस मुद्दे पर तो विरोध का स्वर सुनाई ही नहीं देता है!

दरअसल जब इतना धक्का-मुक्की, ट्वीट-फ़ेसबुक स्टेटस हो रहा है तब किसान को लेकर भी हो-हल्ला हो, ऐसा मन करता है। लेकिन तभी गाँव के रामवचन बाबू और उस्मान चाचा आते हैं और कहते हैं -" भक्त हो या अ-भक्त, वाम हों या दक्षिण इन्हें खेत-पथाड़ से गंध लगता है। किसान का आंदोलन, विरोध - प्रदर्शन, आलू-धान का कम मूल्य जैसे विषय पर टीवी-अख़बार में थोड़े बहस होगा ! "

इन दोनों की बात सुनते हुए लगा कि सचमुच किसानी का समाज अपनी लड़ाई लड़ने के लिए ख़ुद ही तैयार नहीं है। हम ख़ुद के लिए सड़क पर उतरने के लिए तैयार नहीं है। तर्क गढ़ते हैं बस। आलू की क़ीमत कम मिलती है तो भी हम शांत हैं, अपने भाग्य का रोना रोते हैं और अगली फ़सल में जुट जाते हैं, जबकि वक़्त लड़ने का है। अब किसान को संगठित होना होगा। इस विरोध-प्रतिरोध काल में रियल से लेकर वर्चुअल वर्ल्ड तक किसान की समस्याओं को उठाना होगा। बेमतलब के विरोध  के स्वर  के बीच हमें ऊँची आवाज़ में अपनी बात रखनी होगी।

सोचिए जब गधा को लेकर बात हो सकती है तब क्यों नहीं आलू की बात हो?  गाली-गलौच, धक्का-मुक्की के इस काल में ज़रा फ़सल की वाजिब क़ीमत और उपज के बारे में सोचिएगा। आपके डाइनिंग टेबल को जो सजाता-सँवारता है, ज़रा उसके साथ भी सड़क पर उतारिए न! और हाँ, आप सब जब किसान के हक़ के लिए लड़ेंगे न तो भी आप टीवी पर दिखाई देंगे, पैनल में , प्राइम टाइम में, सब में। आशा है तब भी आप बहस करिएगा। लेकिन इन सब बातों के बीच प्लीज़ , किसानों को चैरीटी शो की तरह मत देखिए। हमें भी अब विरोध करने दीजिए।

Tuesday, February 21, 2017

करवट लेता खेती का पेशा



किसानी करते हुए खेत के अलावा उन गाँव तक पहुँचने की इच्छा हमेशा रही है जहाँ बहुत कुछ अलग हो रहा है। इसी अलग देखने की ख़्वाहिश लिए हाल ही में बिहार के पूर्वी चम्पारण के कुछ ग्रामीण इलाक़ों में जाना हुआ। पूर्वी चम्पारण के पकड़ीदयाल अनुमंडल का एक गाँव है चैता। यह गाँव मेरे लिए अलग कई वजह से है, जिसमें एक लीची का बग़ान भी है।  दूर-दूर तक लीची के सुंदर पेड़, गेहूँ के नवातुर पौधों को खेत में समेटे किसान और सबसे बड़ी बात साक्षर और जागरूक किसानों की बड़ी टोली।

जब भी देश  के किसी हिस्से में किसानी कर रहे लोग आर्थिक रूप से सबल दिखते हैं तो मन बाग़-बाग़ हो जाता है। यह सब क़रीब  से देखना और महसूस करना मेरे लिए हमेशा से सुकून देने वाला रहा है। इसकी एक वजह यह भी  है कि हमने ख़ुद खटारा खेती और महान किसान की बात को हमेशा  से ठुकराया है।

पूर्णिया से लगभग चार सौ किलोमीटर की दूरी तय कर हम चैता नाम  के एक ख़ुशहाल गाँव पहुँचे थे। गाँव में दाख़िल होते ही जिस चीज पर नज़र टिकी वह थी 'मोटर साइकिल चलाती एक लड़की'।  गाँव-घर में साइकिल चलाती लड़की दिख जाती है लेकिन बाइक चलाती आत्मविश्वासी लड़की पहली बार देखने को मिला। वह लड़की बेझिझक मोटर साइकिल चला रही थी। सचमुच गाँव बदल रहा है।

वैसे चैता नाम के इस गाँव से मेरा जुड़ाव शाश्वत गौतम की वजह से हुआ।  शाश्वत गौतम मेरी पीढ़ी के ऐसे युवा हैं जो किसानी की नई परिभाषा गढ़ने जा रहे हैं। अमेरिका के जार्ज वाशिंगटन विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर चुके शाश्वत के भीतर गाँव है। एक ऐसा गाँव जो किसानों के लिए बहुत कुछ करने के लिए उतारू है, जिसके भीतर किसान के अनेक रूप हैं, जो किसानी को मुनाफ़े का पेशा समझता है। शाश्वत मेरे मनमीत इस लिए भी हैं क्योंकि वे कृषि आधारित उद्योग की बात करते हैं,  वे लीची की मार्केटिंग, ब्रांडिंग की बात करते हैं। वे लीची या किसी अन्य फल को व्यापारी  के हाथों बेचने की बात नहीं करते हैं बल्कि उसका उद्योग स्थापित करने  वकालत करते हैं ।

अमेरिका  में पढ़ाई और फिर वहीं नौकरी करते हुए भी उनके भीतर किसान जिस तेवर में ज़िंदा है, उससे हम जैसे बनते किसानों को सीख लेनी चाहिए।  वे अब देश लौटकर किसानी की नई दुनिया गढ़ने की तैयारी में लग गए हैं।

विदेश की चकाचौंध वाली ज़िंदगी के बीच चम्पारण के चैता गाँव के अपने गेहूँ के खेत में जब शाश्वत घुमा रहे थे और मुझसे किसानी की बात कर रहे थे तो लगा मानो किसी ऐसे 'किसान नेता' से गुफ़्तगू कर रहा हूं, जिसकी जड़ें गाँव के खेत-खलिहान में नीचे तक जमी हुई है।  बिहार को सचमुच ऐसे ही किसान की ज़रूरत है, जिसके पास ज्ञान का भंडार हो, जो बड़ी संख्या में किसानों को साथ लेकर चल सकता हो और सबसे बड़ी बात खटारा बन चुकी किसानी की दुनिया में जो कृषि आधारित उद्योग की बात करता हो।

चैता में लीची के किसान और बग़ान बड़ी संख्या में हैं। यहाँ सब्ज़ी की भी अच्छी खेती दिखी। किसान समाज यहाँ मुझे तेवर में दिखा। यह तेवर जातीय गुणा-गणित के जाल से काफ़ी ऊपर दिखा। हर जाति के लोग उत्साह में खेती की दुनिया में रमे दिखे।  खेती उपजाऊ, टिकाऊ और सबसे बड़ी बात बिकाऊ हो सके इसके लिए शाश्वत गौतम के पास ढेर सारी योजनाएँ हैं, जिसमें कई पर  वे काम भी कर रहे हैं।  सच कहूँ तो इस गाँव में दो दिन गुज़ारने के बाद जिस शख़्स की मुझे सबसे अधिक याद आ रही थी,  वे हैं बुलंदशहर  के भारत भूषण त्यागी जी। त्यागी जी भी खेती को मुनाफ़े का सौदा बनाने में जुटे हैं, उनकी उम्र अधिक है लेकिन मन उनका भी युवा किसान का ही है। यह सही बात है कि किसानी को मुनाफ़े  का सौदा बनाना आसान नहीं है लेकिन आप इस  बात को भी नहीं काट सकते हैं कि यदि कृषक समाज एकजुट होकर खेती करने लगे तो बड़े  से बड़े उद्योगपति हम किसानों के चौपाल में बैठने लगेंगे।

इस रंग बदलती दुनिया में अब किसानों को अपना अन्दाज़ बदलना होगा। मुनाफ़े की बात करनी होगी, खेती और पैसे की बात करनी होगी। पारम्परिक खेती और वैज्ञानिक खेती  के बीच कृषि आधारित उद्योग की बात ऊँचे स्वर में करनी होगी। इस मुल्क को अब पेशेवर किसान की ज़रूरत है, जो आँकडें की बात कर सके और उपज  से लाभ हासिल कर भी दिखा दे। दुनिया  के अलग अलग मुल्कों में कृषि। आधारित उधोगों को नक़दीक  से देखने वाले शाश्वत गौतम  से मेरे  जैसे किसान को बड़ी उम्मीदें हैं। उम्मीदें इसलिए भी क्योंकि किसानी  का पेशा अब करवटें लेने लगा है।

Wednesday, February 01, 2017

गाम से बजट की बातें

सरस्वती पूजा के कारण गाम में लाउड स्पीकर की आवाज़ बुलंद है। बुनिया की महक चारों तरफ़ है लेकिन इन सबके बीच रेडियो के ज़रिए वित्त मंत्री अरुण जेटली की आवाज़ सुनता रहा।  मंत्री जी की भी आवाज़ बुलंद थी।  लाख-करोड़-अरब की बातें सुनकर मन बसंत हुआ जा रहा था। बीच में जब जेटली जी पोलिटिकल फ़ंडिंग की बात सुना रहे थे तो लगा मानो कोई राग-बसंत का आलाप ले रहा हो ! ख़ैर, मंत्री जी का उच्चारण बढ़ियाँ लग रहा है लेकिन जनता को बजट की रेसिपी कैसी लग रही है, ये तो साँझ तक पता चलेगा।

खेत में आलू के पत्ते अब सूख चुके हैं। गाम का इंदल मंडल पहुँचा है। रेडियो से वित्त मंत्री जी का अंग्रेज़ी बजट भाषण सुनकर इंदल कहता है- " अंग्रेज़ी में भाषण सुन रहे हैं भाईजी । आलू भी सुन रहा है देखिए न पत्ता भी सूखा गया है। वैसे अंग्रेज़ी में ख़ाली पैसे का गप्प हो रहा है न ? ई ज़रा बताइए कि जनधन खाता में कुछ पैसा गिरेगा भी ? "

मन कर रहा है कि वित्त मंत्री जी तक इंदल की बातें पहुँचाऊं लेकिन क्या वे सुनेंगे हमारी बात। वैसे यह सच है कि लूटियंस की चकमक दिल्ली को इस तरह की बात कभी नहीं हज़म हुई है।

महादलित बस्ती का भोला ऋषि को मोतियाबिंद की शिकायत है। ७० साल का भोला आया हुआ है। वह भी रेडियो के बग़ल में बैठ गया लेकिन उसे पता नहीं है कि मंत्री जी क्या बोल रहे हैं। उसने कहा- " क्या बाबू, मोदी जी मन की बात कर रहे हैं का ! " कि तभी सुनाई दिया जेटली साब बोले हैं - "दलितों के कल्‍याण के लिए 52,393 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है. एससी/एसटी और अल्‍पसंख्‍कों का फंड बढ़ा..." मैंने बस भोला ऋषि का चेहरा देखा, वैसा ही शांत-चित्त चेहरा। भोला  ने कहा कि सड़क सब बनेगा कि हम इस जीवन में पक्का सड़क न देख पाएँगे। मैं उसे कैसे बताता कि बजट के भाषण  में पीएम ग्राम सड़क योजना के लिए 19 हजार करोड़ रुपये का इंतजाम किया गया है। दरअसल इस तरह की घोषणाओं  को गाम तक पहुँचने में वक़्त लगता है।

बजट जब ख़त्म हुआ तब जोगो काका आए। उन्हें बजट आदि की बातें पसंद है लेकिन आज वे बसंत पंचमी की पूजा में ज़्यादा व्यस्त रहे। जाते वक़्त उन्होंने कहा- " सब तो ठीक है लेकिन मोदी सरकार के इस वक़ील मंत्री ने अशौच (किसी व्यक्ति की मौत का दिन) में बजट पेश कर दिया है, ई ठीक नै लगा। "

ग़ौरतलब है कि संसद में बजट पेश होने से पहले लोकसभा अध्‍यक्ष सुमित्रा महाजन ने लोकसभा में पूर्व मंत्री ई अहमद के निधन पर शोक प्रकट किया। सदन ने 2 मिनट का मौन रख उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

बजट का भाषण ख़त्म होते ही हम सरसों की खेत देखने निकल गए। मधुमक्खी और तितलियाँ मँडरा रही है...

#Budget2017

Monday, January 23, 2017

ज़मीन और नीम

एक जिद जमीन की भी होती है, जिसके संग कागज का मोह जुड़ा होता है। कागज भी कमाल का!  जमीन की दिशा-दशा-मालिकाना सब कागज की उस पुड़िया में बंधी रहती है और जिद देखिए हर कोई उसे अपने हिस्से रखने की जुगत में लगा रहता है।

जमीन मायावी है, जमीन तिलस्मी है। लेकिन मैं इस मायावी जमीन पर अब 'नीम' लगाना चाहता हूँ। नीम, जिसे गाँव का दवाखाना कहा जाता है, नीम जिसे सूर्य का प्रतिबिम्ब माना जाता है। खेती को खटारा मानने वालों को खेत की दुनिया में डुबकी लगाना चाहिए और गाँव में वक़्त गुज़ारना चाहिए।

दरअसल मैं जमीन को कागजी दांव-पेंच से आगे एक जीवन की तरह देखता हूं। आप इसे एक किसान की माया कह सकते हैं, भरम मान सकते हैं लेकिन कदंब, बांस आदि के बाद अब नीम के पौधे लगाने की योजना है। ताकि मोह केवल जमीनी कागज का ही ना रहे बल्कि मोह प्रकृति से भी बना रहे, नीम की तरह।

यह सब इसलिए क्योंकि हम सब किसानी कर रहे लोग ज़मीन में उलझकर जीवन से अक्सर परेशान हो जाते हैं। उन कागजों में उलझकर किसानी पेशे का आनंद नहीं उठा पाते हैं। यह परेशान करने वाला सवाल है। लेकिन परेशान होकर जीवन जीने की आख़िर क्या ज़रूरत है, इसपर भी विचार करना चाहिए। सब्सिडी  का लोभ और ऋण की लालसा किसान को कमज़ोर करती है। हो सकता है कि यह बात आपको पसंद  न आए लेकिन ज़मीन की लड़ाई अब इसी  के आसपास घूम रही है। ऐसे में पेड़ से प्रेम करना हम किसानों को सीखना होगा। ज़मीन की काग़ज़ी लड़ाई से कहीं आगे निकलकर माटी से इश्क़ करना होगा। ज़मीन बेचने की लत से छूटकारा तब ही मिलेगा जब हम धरती मैया के गोद में खेलेंगे और पौधे लगाएँगे। खटारा होती खेती में आइये हम सब मिलकर नई जान फूंकते हैं, ठीक उसी तरह जैसे हमारे पुरखे करते थे जंगल से प्रेम, नीम और आँवला जैसे पेड़ से प्रेम।