मेरा सोचना है कि सूफी दोहे में डूबने के बाद आपके पास शब्द कम पड़ जाते हैं क्योंकि आप शब्दों से काफी दूर निकल जाते हैं। ऐसे वक्त में आपकी अनुभूति का ग्राफ बढ़ जाता है। मुझे लगता है कि हमें शब्दों से परे कुछ सोचने की कला सूफी दोहे सीखाती है। अमीर खुसरो के दोहे तो यही कहते हैं। पढ़िए और खुसरोमय हो जाइए..।
रैनी चढ़ी रसूल की सो रंग मौला के हाथ।
जिसके कपरे रंग दिए सो धन धन वाके भाग।।
खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूँ पी के संग।
जीत गयी तो पिया मोरे हारी पी के संग।।
चकवा चकवी दो जने इन मत मारो कोय।
ये मारे करतार के रैन बिछोया होय।।
खुसरो ऐसी पीत कर जैसे हिन्दू जोय।
पूत पराए कारने जल जल कोयला होय।।
Feb 5, 2010
Jan 22, 2010
विनीत और रवीश के बहाने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट और सवाल-जवाब
लगभग तीन साल से सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से यारी कर रहा हूं। ऑरकुट, फेसबुक और ट्विटर के जरिए इस दुनिया में कदम रखा। उससे पहले ब्लॉगसोर्स और ब्लॉगस्पॉट से जबरदस्त यारी थी। ब्लॉगसोर्स तो चला गया पर गूगल का ब्लॉगस्पॉट जिंदगी का एक हिस्सा बन गया। इसी बीच फेसबुक ने जिंदगी में दस्तक दी। ब्लॉग पर जहां अपनी बात रखकर हम चुप बैठ जाते हैं वहीं फेसबुक पर सवाल जवाब का दौर शुरु कर देते हैं।
आज जब फेसबुक पर रवीश पूछते हैं कि आपको एनडीटीवी इंडिया कब बोर करता है तो विनीत कुमार फेसबुक पर जवाब मारकर गाहे-बगाहे पर आ जाते हैं। रवीश और अजीत अंजुम जैसे मीडियाकर्मी जहां इस मंच का इस्तेमाल अपने सवाल के जवाब के लिए कर रहे हैं वहीं विनीत जैसे लोग इसे मीडिया विमर्श की नजर से देख रहे हैं। जब विनीत से पूछा तो उन्होंने कहा- सोशल मीडिया मार्केटिंग की चीज है। ये बिना लागत के ब्रांड फीड लेने का काम है। एक बात और कि ये मीडिया के अंदर के ही लोग कर रहे हैं। बॉस होने की स्थिति में उनके जूनियर दबाकर कमेंट कर रहे हैं। ऐसे में मैं एक लाइन कहना चाहता हूं- फेसबुक है या तेल-मालिश लगाने का खटिया।विनीत के इस जवाब से सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट का दूसर पक्ष भी सामने आता है, लेकिन इसपर हम जैसे कई लोग शायद पूरी तरह से सहमत नहीं हो। दरअसल इन सवाल-जवाबों में कई सार्थक बातें उभर कर सामने भी आती है।
फेसबुक पर अजीत अंजुम तमाम तरह के सवाल पूछते हैं जो हर किसी के दिमाग में चलता-फिरता रहता है लेकिन उसे कोई सार्वजनिक मंच पर उड़ेलना नहीं चाहता है। अजीत उसे उड़ेल रहे हैं। पत्रकारिता जीवन से जुड़े तमाम बातों को प्रश्नवाचक तरीके से वे परोस रहे हैं, जहां हर तरह के लोग अपनी बात कह रहे हैं। एक बात और समझ में आती है कि इन जैसे लोगों की बातों में टिप्पणियों का पहाड़ खड़ा हो जाता है। सैकडों टिप्पणियों के इस मुद्दे पर इन दिनों कुछ साइटों पर चर्चा भी हो रही है। ऐसी चर्चाएं होनी भी चाहिए।
चाहे जो भी हो फेसबुक के जरिए रवीश और अजीत अंजुम जैसे लोग इस बात की जरूर गारंटी दे रहे हैं कि वे आमदर्शक की बात सुनना चाहते हैं। कमाल का लिखे, वाह क्या बात है सर....जैसी प्रतिक्रियाओं से हटकर गभीर टिप्पणियों को पढ़ना इसी बात को साबित करता है। जहां तक मेरा सोचना है तो रवीश और अजीत अंजुम जैसे तमाम मीडियाकर्मी गंभीर टिप्पणियों के लिए ही इस मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं ताकि दर्शकों की बातों को वे समझ सके। जैसा कि रवीश खुद वीनित के ब्लॉग पर टिप्पणी दागते हुए कहते हैं-इसका फायदा होता है। इन्हीं फीडबैक के आधार पर हमने बहुत चीज़ें बदली हैं।हां यह सच है कि वह जो पूछ रहे हैं उसके जवाब में आई प्रतिक्रिया को वे किस प्रकार अमल करेंगे, इसमें संदेह है, लेकिन वे यदि पूछ रहे हैं कि उनमें क्या गलती है या वे कैसे सुधार करें तो इसे टिप्पणीकारों को सकारात्मक रूप में लेना चाहिए।
Jan 17, 2010
ज्योति बाबू की बोलती आंखें ...
किसकी आंखें नहीं बोलती है, सबकी बोलती है बस अंतर होता है नजरों में। आप इस तस्वीर में देखिए ज्योति बाबू को। उनकी आंखें कुछ अलग अंदाज में बोला करती थी। एक नजर में बेहद कड़े मिजाज के लगते थे ज्योति बाबू, लेकिन असल में उतने ही सरल और सौम्य। सफेद धोती-कुर्ते की तरह सरल और सौम्य। उनके चुनाव एजेंट रह चुके गोकुल बैरागी का कहते हैं कि बसु को क्रोध काफी कम आता था और वह विपरित स्थिति को संभालना जानते थे। यही थी ज्योति बाबू की सबसे बड़ी ताकत। ट्विटर पर प्रमुख उद्योगपति और महिंद्रा समूह के प्रमुख आनंद महिंद्रा ने ज्योति बाबू के बारे में टिप्पणी की, "मैं ज्योति बसु से केवल एक बार ही मिल सका। वह सत्ता से परे थे। मेरी उनके प्रति धारणा ऐसे व्यक्ति की है जिसने सत्ता का अभाव कभी महसूस नहीं किया।"
फिल्म निर्माण के क्षेत्र में दिग्गज माने जाने वाले प्रीतिश नंदी ने कहा, "मैं ज्योति बसु को काफी पंसद करता था। वह एक बंगाली भद्रलोक थे। उन्हें व्हिस्की और मार्क्सवाद से प्यार था।" राजदीप सरदेसाई भी उनकी व्हिस्की और मार्क्सवाद के बारे में कुछ ऐसा ही कहते हैं।
जब मैंने अपने फेसबुक एकाउंट पर लिखा कि ज्योति बाबू जाते-जाते भी मानवता को एक संदेश देते गए..नेत्रदान का। ...तो दोस्त पंकज नारायण ने लिखा-उन्होंने रहते-रहते भी कई आंखें दी हैं और रोशनी भी... उनका जाना एक अंधेरे में किसी रौशनी के गुम होने जैसा है फिर भी उनके होने का उजाला हमारे भीतर रहेगा...
लाल सलाम..ज्योति बाबू।
Jan 4, 2010
एक पैसा प्रति सेकेंड और लिफाफा
हम 2010 में हैं, दोस्तों से फोन, ई-मेल, एसएमएस और तमाम सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट के जरिए नए साल की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान किया, लेकिन इस बीच ग्रिटिंग्स कार्ड को समेटे लिफाफे कहीं खो गए। याद कीजिए पुराने दिनों को जब नए साल में हम डाकिए का इंतजार किया करते थे। लाल-पीले-गुलाबी लिफाफों में डाक टिकट चिपकाए जब वह आता तो दूर बैठे लोगों की याद ताजा हो जाती थी।
हम स्कूल दिनों में हॉस्टल से घर भेजा करते थे ग्रिटिंग्स कार्ड। उसकी अपनी भाषा हुआ करती थी। हैप्पी न्यू ईयर कहने का अंदाज हुआ करता था। अब कागज के पन्नों में अपनी भावनाओं को रंगों में समेट कर दोस्तों-परिजनों को भेजा करते थे। मैं गत 8 -9 सालों से ऐसा नहीं कर रहा हूं, या कहूं आप भी नहीं कर रहे होंगे। इस बार तो एक पैसा प्रति सेकेंड ने तो उम्मीद की आशा को और भी कम कर दिया। मोबाइल सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां एक से बढकर एक ऑफर दे रही है जिससे डाक सेवा टक्कर नहीं ले सकेगी।
हमारे-आपके घर में आज भी ऐसी कई ग्रिटिंग्स होगी, जिसे हमने नववर्ष पर प्राप्त किया था। यदि कोई कार्ड आपके पास आज भी सुरक्षित है तो आप याद कीजिए उन पुरानी यादों को, उन अनुभवों को ...शायद आगे चल ये बातें फोटो एलबम की तरह हो जाएगी। उस वक्त आप कहेंगे कि फ़लां वर्ष में मेरे एक दोस्त ने मुझे यह कार्ड भेजा था...।
यह सच है कि इलेक्ट्रॉनिक युग में ईमेल- मोबाइल- ब्लैकबेरी एक सुविधाजनक साधन बनकर सामने आई है.. लेकिन इस बीच कागज के पन्नों पर उकेरे शुभकामना संदेशों को भी भूलना ठीक नहीं है। इस बार जब पहली जनवरी की सुबह आपने किसी को शुभकामना संदश भेजा था तो वह पलक झपकते ही आपके मित्र तक पहुँच गई होगी ..लेकिन डाक से कार्ड भेजने के लिए आप कम से कम पाँच दिन पहले उस मित्र- भाई-बहन-या अन्य रिश्तेदारों को याद करते थे..।
जरा सोचिएगा और जगजीत सिंह की इस गजल को भी सुनिएगा- चिट्ठी न कोई संदेश..जाने कौन सा देश जहां तुम चले गए...। या फिर पंकज उधास की गजल- चिट्ठी आई है...वतन से चिट्ठी आई है...।
Jan 3, 2010
चेतन भगत कह रहे हैं 'पढ़ो तब बोलो..'
हाल ही में प्रदर्शित फिल्म '3 इडियट्स' की कहानी को लेकर विवाद खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। लेखक चेतन भगत का कहना है कि यह फिल्म उनकी किताब 'फाइव प्वाइंट समवन' की कॉपी है, जबकि फिल्मकार विधु विनोद चोपड़ा इससे पूरी तरह सहमत नहीं है। भगत ने अपने ब्लॉग पर पूरे मामले पर विस्तार से लिखा है।
भगत ने अपने ब्लॉग 'चेतन भगत डॉट कॉम' पर लिखा है कि बिना किताब पढ़े किसी को भी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा, "मेरी किताब को दुनिया भर में लाखों लोगों ने पढ़ा है। अगर आप इसकी कहानी को कॉपी करके कोई फिल्म बनाएंगे और उसे मौलिक कहेंगे तो लोग पकड़ ही लेंगे।"गौरतलब है कि शुक्रवार शाम नोएडा में एक संवाददता सम्मेलन में जब एक पत्रकार ने चोपड़ा से पूछा कि क्या उनकी फिल्म भगत की किताब पर आधारित है तो वह चिढ़ गए और उन्होंने पत्रकार को अपना 'मुंह बंद' रखने के लिए कहा था। चोपड़ा उस वक्त आपे से बाहर हो गए थे जब उनसे पूछा गया कि उनकी फिल्म का 70 प्रतिशत हिस्सा भगत की किताब पर आधारित है।
भगत का दावा है कि पहले चार दिनों में 100 करोड़ रुपये का कारोबार कर चुकी फिल्म '3 इडियट्स' का ज्यादातर हिस्सा उनकी किताब से लिया गया है। इस संबंध में सवाल पूछे जाने पर बौखलाए चोपड़ा ने एक पत्रकार से कहा, "क्या आपने फिल्म देखी है या किताब पढ़ी है?"
चोपड़ा ने शुक्रवार को संवाददाता सम्मेलन में भगत पर आरोप लगाया था कि उन्होंने उनसे संपर्क नहीं किया था। इस संबंध में भगत ने लिखा, "मैं ऐसे निराधार बयानों पर कुछ भी कहना नहीं चाहता हूं। वैसे मैं इस संबंध में दो बिंदुओं पर बात करना चाहूंगा। मैंने उनसे एसएमएस के जरिए संपर्क किया था, वह भी फिल्म के प्रीमियर से पहले। लेकिन मुझे कोई जवाब नहीं मिला। इसके बाद मैंने उन्हें दो ई-मेल भी भेजे थे। "
अपने प्रशंसकों का शुक्रिया अदा करते हुए भगत ने कहा, "मुझे समर्थन देने के लिए आप सभी का शुक्रिया। तथाकथित शक्तिशाली लोगों के बावजूद आप मेरे साथ खड़े हैं, इसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूं। मैं तो बस यही कहूंगा कि बिना किताब को पढ़े कोई इस प्रकरण पर टिप्पणी नहीं करे।"
उधर, इस मसले पर अभिनेता आमिर खान ने अपने ब्लॉग पर कुछ भी नहीं लिखा है लेकिन उनके पुराने लेख पर ही लोगों ने सैंकड़ों टिप्पणी की है, जिसमें उनसे फिल्म की मौलिकता को लेकर स्पष्टीकरण मांग गया है। फिरोज नाम के एक व्यक्ति ने टिप्पणी की है, "आमिर आपको सच से भागना नहीं चाहिए। लोगों ने भगत की किताब पढ़ी है और फिल्म भी देखी है।"
अभिषेक की टिप्पणी है, "आमिर आपके ब्लॉग पर मेरी यह अंतिम टिप्पणी है। शुक्रवार को नोएडा के संवाददता सम्मेलन में आपने झूठ बोला। मैंने किताब पढ़ी है और मेरा मानना है कि '3 इडियट्स' भगत की किताब पर आधारित है। वैसे मुझे पता है कि आप इस पर विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि मैं आपको करोड़ों रुपये नहीं दे रहा हूं न!"
ब्लॉग जगत में इन दिनों 3 इडियट्स के विवाद पर जमकर पोस्टबाजी हो रही है। आप इस संबंध में विस्तार से मेरी रपट जागरण , हिंदुस्तान लाइव और समय लाइव पर पढ़ सकते हैं।
Dec 31, 2009
नए साल के जश्न से पहले बीबीसी के विनोद वर्मा की भी बात सुनें..
• मुंबई मेट्रोपोलिटन रिजनल डवलपमेंट अथॉरिटी के आयुक्त रत्नाकर गायकवाड का कहना है कि मुंबई में 54 प्रतिशत आबादी झुग्गियों में रहती है. लेकिन वे यातायात को सबसे बड़ी चुनौती मानते हैं.
• भारत के गृहमंत्री ने कहा है कि नक्सली अब देश के 20 राज्यों के 223 ज़िलों में फैल गए हैं.
• झारखंड में मुख्यमंत्री रहे मधु कोड़ा के ठिकानों पर छापों के बाद चार हज़ार करोड़ रुपयों से अधिक की संपत्ति का पता लगा.
• आंध्र प्रदेश के राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी को एक सेक्स वीडियो के विवाद के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा है. हालांकि वे अपने आपको निर्दोष बता रहे हैं.
• एक अवयस्क बालिका रुचिका के साथ छेड़छाड़ और आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले पुलिस अधिकारी को 19 साल बाद सिर्फ़ छह महीने की सज़ा सुनाई गई है.
• पुराने रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव रेलवे की रिकॉर्ड कमाई की वजह से मैनेजमेंट गुरु बन गए थे. नई रेलमंत्री ममता बैनर्जी कह रही हैं कि लालू प्रसाद यादव ग़लत आंकड़े दे रहे थे.
• साल भर में औसतन एक हज़ार फ़िल्म बनाने वाले भारतीय बाज़ार में अच्छी कही जाने लायक फ़िल्मों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुँच पाई है.
• साल भर पहले 40 रुपए किलो बिकने वाली तुअर की दाल इन दिनों 110 रुपए किलो बिक रही है.
ये सब वर्ष 2009 की सुर्खियों में से कुछ हैं.
आप कह सकते हैं कि मैं गिलास को आधा भरा देख नहीं पा रहा हूँ, आधा खाली देख रहा हूँ. लेकिन जब नए साल में जाना हो तो अपने आपको यह याद दिलाना अच्छा रहता है कि बीते साल क्या कुछ था जिसे हम ठीक नहीं कर सके.
नए साल में हर कोई नए संकल्प लेगा. इनमें से अधिकांश संकल्प मौसम बदलने से पहले टूट चुके होंगे.
जब देश के राजनेता सिर्फ़ सकल घरेलू आय यानी जीडीपी में वृद्धि को देश की तरक्की का पैमाना मान बैठे हैं, तब यह चिंता करनी ही चाहिए कि ये सुर्खियाँ कब हमारी नज़रों से ओझल होंगीं. बहरहाल, चलिए नए साल का जश्न मनाएँ.
साभार बीबीसी ब्लॉग
Dec 27, 2009
कितने बदल गए हम..
क्या कभी सोचा है कि हम किस कदर बदल रहे हैं? कई बार सोचता हूं और फिर इस सवाल से खुद ही कन्नी काट लेता हूं। लेकिन सच्चाई से कब तक हम या आप दूर भागेंगे। यह सच है कि हम बदल रहे हैं। वैसे बदलाव कोई गलत बात नहीं है लेकिन गलती उस वक्त हो जाती है जब हम उन अभ्यासों से दूर हो जाते हैं जो कभी खुद का हिस्सा हुआ करती थी।
तेज रफ्तार की जिंदगी हमें कभी-कभी सामाजिक बनाने से रोकने लगती है। मैं बदलाव के जरिए इसी सामाजिकता की बात कर रहा हूं। कामकाजी उठापटक के बीच लोगों से मिलना-जुलना लगभग खत्म होने के कगार पर है। यह शिकायत बेहद आम होते जा रही है। वैसे कुछ लोग तमाम व्यस्तताओं के बीच भी लोगों से मिलते -जुलते रहते हैं लेकिन उनका प्रतिशत बेहद कम है।
दफ्तरी आशा-निराशा का बादल इतना घना हो जाता है कि अपने लोगों से भी लोग दूर होने लगते हैं। इंटरनेट-मोबाइल रूपी आभासी दुनिया भले ही संपर्क का माध्यम बन गई है लेकिन उसमें वैसी संतुष्टि नहीं है जो आमने-समाने में मिलती है औऱ जिसके फलस्वरूप मुख से ठहाका निकलता है।
कोई कहता है कि यह शिकायत महानगरी है लेकिन संकेंड और थर्ड टायर शहरों की भी यही समस्या है। माइग्रेशन की वजह से लोगों की संख्या कम हो रही है। लोग जल्दी-जल्दी ठिकाना बदल रहे हैं ऐसे में खोजे भी लोग नहीं मिल पाते। सोसाइटी की बिल्डिंग में लोगों से हाय-हैल्लो कर हम कुछ देर के लिए लोगों से मिलने की अनुभूति करते हैं लेकिन इसका प्रभाव सेकेंड भर का होता है।
तो हम क्या कर सकते हैं, समय निकालकर हफ्ते में कितने लोगों से मिलें..? यह भी सवाल है ..इसी बीच लोगों से मिलने-जुलने की आदत नहीं छूटे, तो चलिए हम सब मिलते हैं, गपशप करते हैं..कॉफी के बहाने कुछ पल साथ गुजारते हैं.!
तेज रफ्तार की जिंदगी हमें कभी-कभी सामाजिक बनाने से रोकने लगती है। मैं बदलाव के जरिए इसी सामाजिकता की बात कर रहा हूं। कामकाजी उठापटक के बीच लोगों से मिलना-जुलना लगभग खत्म होने के कगार पर है। यह शिकायत बेहद आम होते जा रही है। वैसे कुछ लोग तमाम व्यस्तताओं के बीच भी लोगों से मिलते -जुलते रहते हैं लेकिन उनका प्रतिशत बेहद कम है।
दफ्तरी आशा-निराशा का बादल इतना घना हो जाता है कि अपने लोगों से भी लोग दूर होने लगते हैं। इंटरनेट-मोबाइल रूपी आभासी दुनिया भले ही संपर्क का माध्यम बन गई है लेकिन उसमें वैसी संतुष्टि नहीं है जो आमने-समाने में मिलती है औऱ जिसके फलस्वरूप मुख से ठहाका निकलता है।
कोई कहता है कि यह शिकायत महानगरी है लेकिन संकेंड और थर्ड टायर शहरों की भी यही समस्या है। माइग्रेशन की वजह से लोगों की संख्या कम हो रही है। लोग जल्दी-जल्दी ठिकाना बदल रहे हैं ऐसे में खोजे भी लोग नहीं मिल पाते। सोसाइटी की बिल्डिंग में लोगों से हाय-हैल्लो कर हम कुछ देर के लिए लोगों से मिलने की अनुभूति करते हैं लेकिन इसका प्रभाव सेकेंड भर का होता है।
तो हम क्या कर सकते हैं, समय निकालकर हफ्ते में कितने लोगों से मिलें..? यह भी सवाल है ..इसी बीच लोगों से मिलने-जुलने की आदत नहीं छूटे, तो चलिए हम सब मिलते हैं, गपशप करते हैं..कॉफी के बहाने कुछ पल साथ गुजारते हैं.!
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