Saturday, January 24, 2015

एक खत बसंत के नाम

सरसों के खेत में पंखुरी

ठंड जाती है तो तुम आ जाती हो, हां तुम ठीक समझ रही हो मैं तुम्हारी ही बात कर रहा हूं। तुम्हारी ही। हां, तुम्हारी ही। तुम बसंत हो। पीले रंग से मोहब्बत कराने की आदत तुम्हारी ही संगत से आई है। एक मौसम हजार अफसाने लिए जब तुम आती हो तो मैं पत्ते को छूकर कह देता हूं कि तुम आ गई हो। 

तुम सखी हो न, इसलिए आने की आवाज सुन लेता हूं। हल्की ओस के बूंद से पत्ते की चमक देखकर, तुम्हारी रंगत का पता चल जाता है। खेत में सरसों के पीले फूल के चारों ओर उड़ती तितलियां वाजिब ही कहती है कि तेरे रंग में ही नशा है, जिसमें डूबकर ही कोई तुझे पा सकता है।

तुम्हें याद है न बसंत, जब तुम्हें पहली बार मैं जान सका था। कुछ याद आ रहा है कि नहीं ?, अरे खेत के मंडेर पर चलते वक्त जब पहली बार सरसों के पौधे से हाथ मिले थे, एक सफेदी हाथ में लगी थी, पीले फूल स्याह काली कमीज
 से चिपक गए थे। मैं जानता हूं तुम मुझे देख रही थी। मेरी उमर कम थी लेकिन मन के उस कोने में तुमने दस्तक दे थी।

 मैं जानता हूं, तुम्हारे प्यार करने का अंदाज ऐसा ही होता है। हर साल तुम कम दिनों के लिए आती हो लेकिन जैसे ही आती हो रंग में मुझे सरोबार कर लेती हो। जानती हो तुम्हारे आने की आहट से ही मैंने मेंहदी हसन को जाना। तुम्हारी वजह से मैंने उनकी गजलों को समझा।

 अपने भीतर तुम्हारे होने के अहसास के बाद मैंने यह गजल सुनी-     “मुझे  तुम नजर से गिरा तो रहे हो , मुझे तुम कभी भी भुला न सकोगे,  न जाने मुझे  क्यूँ ये यकीन हो चला है,  मेरे प्यार को तुम मिटा न सकोगे..।” तुम अपने संग एक हवा लाती हो, जिसमें अजीब सा नशा होता है। कई बार पूछना चाहा कि क्या तुम भी नशा करती हो?

 रामचंदर को जानती हो न, जिसके साथ मैं बरसों पहले सरसों के खेत देखने गया था और उस पीले रंग के सफेदी के बहाने तुमसे मुलाकात हुई थी। उसीने बताया था कि तेरे साथ जो हवा आती है न उसमें गांजा से भी ताकतवर नशा है। एक ही कश में कोई भी बौरा सकता है?  मैं उसी नशे की बात कर रहा हूं।

 एक बात और जानती हो। गाम के ठाकुर स्थान का मंहत सरजनवा कहता है कि कबीर को जानने के लिए तुम्हें समझना जरुरी है। वैसे तो मैं सरजना की बातों में अक्सर उलझ जाता हूं लेकिन आज उसने तुम्हारे लिए जब यह कहा- “ न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,  उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?”  तो मैं सोच में पड़ गया। इस सवाल का भी इस बार तुम जवाब देना। 

Thursday, January 01, 2015

नए साल में ईमान जरुर बचाकर रखें :)

देखिए फिर एक नया साल आ गया है और हम-आप इसके साथ कदम ताल करने लगे हैं। शायद यही है जिंदगी, जहां हम उम्मीद वाली धूप में चहकने की ख्वाहिश पाले रखते हैं। उधर, उम्मीदों के धूप-छांव के बीच आपका किसान सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर उम्मीद के लिए लिखे जाने वाले शब्दों को देखने में जुटा है, दोस्तों के फेसबुक स्टेटस को पढ़ रहा है और टि्विट पीपुल्स की 140 शब्दों की कथाओं के तार पकड़ रहा है।

आभासी दुनिया में लोगों के स्टेटस पढते हुए लगता है कि जीवन में कितना कुछ सीखना अभी बांकी है। लोगबाग अपने अनुभवों को यहां उड़ेल रहे हैं तो कोई तस्वीरों और शुभकामना संदेशों के जरिए लोगों से जुड़ रहा है। 2015 के पहले दिन मुझे 2102 की एक जनवरी याद आ रही है, जब कुछ लोग एक से बढ़कर एक फेसबुक स्टेटस डाल रहे थे।

 उन्हीं में से एक स्टेटस अपने प्रिय सदन झा का था, उन्होंने  तब लिखा था- “ मुझे खाली डिब्बा  हमेशा से मोहित करता रहा है..।“ आपके किसान  को यह वाक्य तिलिस्म की तरह लगा, डीडी पर एक जमाने में दिखाए जाने वाले चंद्रकांता की याद आई, जहां अक्सर क्रूर सिंह यक्कू कहते हुए हथेली के जरिए एक डिब्बा बना देता था।

दरअसल हम उम्मीद कहीं भी देख लेते हैं, खाली कमरों में भी और मानुष से भरे कमरे में भी, जहां विचारों का अविरल प्रवाह हो रहा हो या फिर गाम की नहर, जिसमें बलूहाई पानी बह रही हो।2012 की पहली जनवरी को सदन झा ने अपने फेसबुक वाल आगे लिखा था कि खाली डिब्बा अच्छा लगने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें भरा हुआ डिब्बा अच्छा नहीं लगता है। वे कहते हैं- “ लेकिन खाली बर्तन में आप तमाम सपनों और हसरतों को संजो सकते हैं। नये साल की शुभकामनायें कुछ इसी तरह की हैं। फोन पर एक साथ भेजे गये संदेश,  ईमेल और फेसबुक पर अन्य  हजारों के साथ आये विशेज में अपनेपन की गर्माहट,  तकनीकि के खेल और नये साल की कर्मकांड के बीच यह साल खाली केनवास सा सामने है… सपनों के रंग के इंतजार में, आपकी हसरतों का राह तकते. ।”

इस पूरी विचार प्रक्रिया को पढ़ते हुए यही खयाल आता है कि खाली डिब्बे में भर जाने की हिम्मत होती है। डिब्बे के ऊपर रंग भर दें तो और भी सुंदर। खालीपन से भारीपन की यात्रा, आहिस्ता आहिस्ता जारी रहती है, बस साल बदलता जाता है। जब सदन झा खाली केनवास की बात करते हैं तब जवाहर लाल यूनीवर्सिटी के लाल दीवारों की याद आती है, जहां हाथों से लिखी बातें मन के कमरे में पहुंच जाती थी। मुझे फेसबुक के स्टेटस उम्मीद वाली धूप ही लगती है और जिस चीज से मैं इस धूप का आनंद उठाता है वह सचमुच में एक खाली डिब्बा ही हैं, जिसे  जाने कब से भरता आ रहा हूं।

 2012 की पहली जनवरी को अपने जे सुशील यानि सुशील झा का स्टेटस पढ़ने को मिलता है। वे लिखते हैं- “ साल बदले तो बदले, ईमान न बदले।“  सच कहिए तो इसे पढ़कर मैं आज भी एक पल के लिए ठहर जाता हूं।

 मुझे आज सन 2015 की पहली जनवरी को सुशील झा के स्टेटस के बहाने सदन झा के खाली डिब्बे में बदलते साल की अनवरत कथा के बीच ‘ईमान’ नाम का एक पात्र दिखने लगा है।

मैं फिलहाल अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु के पात्र भिम्मल मामा को याद करने लगा हूं। वही भिम्मल मामा जिन्हें बार-बार दौरा पड़ता है लेकिन इसके बावजूद उनका ईमान नहीं डोलता है..। वहीं बावनदास भी याद आ रहे हैं, जिन्होंने केवल दो डग में इंसानियत को नाप लिया था।

 जे सुशील भाई का 2012 का स्टेटस इन्हीं बातों को याद दिलाता रहता है। सच पूछिए तो भरम से परे दुनिया को देखने की ख्वाहिशों को पालने की इच्छा बढ़ने लगी है। खैर, 2015 में आप उम्मीदों के धूप सेकते रहिए, खाली डिब्बे को भरते रहिए साथ ही ईमान को बचाए रखिए। आलू और मक्कका की खेती करते हुए मैं मुखौटा उतारना अब जान गया हूं। सच पूछिए  तो  अब शहरी मुखौटा  उतार चुका हूं । मैं अब रेणु की ही वाणी में चिल्ला कर कह सकता हूं - नए साल में 'मुखौटा' उतारकर ताजा हवा फेफड़ों में भरें ...। और हां, ईमान जरुर बचाए रखें :) 

नबका साल जिंदाबाद !

Monday, December 22, 2014

यह साल भी बीत कर विगत हो जाएगा

किसानी करते हुए, साल के जिस माह से मुझे सबसे अधिक लगाव होता है, वह दिसंबर ही है. इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है. लेकिन तभी अहसास होता है कि यह साल भी बीत कर विगत हो जाएगा- ठीक उसी तरह जैसे धरती मैया के आंचल मेँ न जाने कितनी सदियां ..कितने बरस दुबक कर छुपे बैठे हैँ।

फिर सोचता हूं तो लगता है कि हर किसी के जीवन के बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे, इन्हीं महीने के पल-पल को जोड़कर हम-आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं। किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान हर चार महीने में एक जीवन जीता है। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा।

 चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन्हीं चार महीने के सुख-दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते हैं। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीवन जीता है। इसके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल बोने के बाद किसान इस बात कि परवाह नहीं करता है कि फल अच्छा होगा या बुरा..वह सबकुछ मौसम के हवाले कर जीवन की अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है।

किसानी करते हुए जो अहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हूं। इस आशा के साथ कि किसानी को कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अभी-अभी विभूतिभूषण बंद्योपाद्याय की कृति ‘आरण्यक’ को एक बार फिर से पूरा किया है। बंगाल के एक बड़े जमींदार की हजारो एकड़ जमीन को रैयतो में बांटने के लिए एक मैनेजर पूर्णियां जिले के एक जंगली इलाके में दाखिल होता है। जिस कथा शिल्प का विभूति बाबू ने ‘आरण्यक’ में इस्तेमाल किया है, वह अभी भी मुझे मौजू दिख रहा है। पू्र्णिया जिला की किसानी अभी भी देश के अन्य इलाकों से साफ अलग है। इस अलग शब्द की व्याख्या शब्दों में बयां करना संभव नहीं है। इसे बस भोग कर समझा जा सकता है।

खैर, 2014 के अंतिम महीने में मेरे जैसा किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबा पड़ा है। इस आशा के साथ कि आने वाले नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया जाएगा लेकिन जीवन का गणित कई बार सोचकर भी अच्छा परिणाम नहीं देता है। बाबूजी बिस्तर पर सिमट गए हैं। बस यही सोचकर मेरी किसानी कथा ठहर सी जाती है। 

वैसे विगत छह -सात महीने में संबंधों के गणित को समझ चुका हूं इसलिए जीवन को लेकर नजरिया बदल चुका हूं। यह जान लेने का भरम पाल बैठा हूं कि पहाड़ियों के बीच बहती नदी पहाड़ी के लिए होती है, आम के पेड़ों में लगी मंजरियां आम के लिए होते हैं और गुलाब के पौधे पर उगे तीखे कांटे गुलाब के लिए होते हैं। यह लिखते हुए मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के आवारगी का एक साल याद आता है और मुखर्जीनगर इलाके का एक रेस्तरां, जहां एक शाम एक दोस्त से मुलाकात हुई थी, जिसने बड़े दार्शनिक अंदाज में कहा था- “जानते हो, लगातार गिरती और उठती पलकें आंखों के लिए होती है न कि दुनिया देखने के लिए....’” 

समय के गुजरने के साथ-साथ और किसानी करते हुए उस दोस्त का दर्शन थोड़ा बहुत समझने लगा हूं। किसानी करते हुए ही यह अहसास हुआ है कि हम लोग जिंदगी को लेकर इतने दार्शनिक अंदाज में बातें इसलिए करते हैं क्योंकि हम यह भरम पाल बैठते हैं कि हम जो जीवन जी रहे हैं वह आसान नहीं है। जबकि सत्य कुछ और है। दरअसल जीवन को जटिल हम खुद बनाते हैं, मकड़ी का जाल हम-आप ही उलझा रहे हैं। दिनकर की वह कविता याद आने लगी है, जिसमें वे कहते हैं- “आदमी भी क्या अनोखा जीव है, उलझने अपनी ही बनाकर, आप ही फंसता और बैचेन हो न जगता न सोता है .....”

इन सबके बीच ठंड का असर बढ़ता जा रहा है। सुबह देर तक कुहासे का असर दिखने लगा है। सबकुछ मेघ-मेघ–बादल-बादल सा लगने लगा है। बाबूजी यदि ठीक रहते तो कहते कि इस मौसम में आलू की किसानी करते वक्त सावधानी बरतनी चाहिए, फसल नष्ट होने की संभावना अधिक रहती है। किसानी करते हुए मुझे मेघ और मौसम से अजीब तरह का लगाव हो गया है। बादलों को समझने – बुझने लगा हूं। ब्रेन हैमरेज के बाद से बाबूजी को बिस्तर पर ही देख रहा हूं, शायद वो भी आंखें मूंदे खेत-खलिहान को ही देख रहे होंगे, ऐसा भरम मैं पाले बैठा हूं। इस आशा के साथ कि मेरा भरम टूटे नहीं....

Friday, October 10, 2014

स्मृति की पोथी और चाय की प्याली

आज की सुबह चाय पर लिखने का मन कर रहा है। चाय पर लंबी बकैती करने का जी कर रहा है। वही चाय,  जो मेरी सखी है और जिसने मुझे दार्जिलिंग से प्यार करना सीखाया। जी हां, मैं लप्चू चाय की बात कर रहा हूं। मेरी स्मृति की पोथी इस चाह के बिना अधूरी है।


आज यह पोस्ट तैयार करते हुए 'चाह' (चाय) के बहाने जाने कितनी यादें मन के अहाते में दाखिल हो रही है, मैं खुद अचंभित हूं। वो पूर्णिया से सटे कसबा नामक छोटा सा इलाका, जहां के एक अनुशासित होस्टल में मैंने ए बी सी के संग क ख ग सीखा था,वो भी कतार में शामिल दिखा। वहां सुबह सुबह सात बजे चाह पीने मिलता था, संग में दो ब्रेड। यह हमारे लिए भोरका नाश्ता होता था। 

चाय के साथ पहली यारी की दास्तां कसबा के
 राणी सती विद्यापीठ के मैस से शुरु होती है
, जहां हमने एकदम शुरुआती तालीम ली। मसलन शब्द से परिचय, गणित से परिचय, सबकुछ समय से करना..आदि-आदि। लेकिन आज याद केवल उस स्टील के ग्लास की आ रही है, जिसमें हमें राणी सती विद्यापीठ के मैस में चाय मिला करता था, लप्चू चाह। बांकि सारी यादें फुर्र हो चली है।
चाह धीऱे-धीरे जिंदगी की किताब के हर पन्ने में शामिल होती चली गई। चाय की कभी तलाश नहीं हुई, चाय हमेशा से अपनी तलाश मुझमें करती रही, मानो मैं उसका प्रथम पाठक हूं, जो कवि की हर रचना पढ़ता है, कथाकार की हर कथा को बांचता है।

खैर
, दार्जिलिंग की चाय हमारी चाहत की चाह रही है, इसके अलावा गोल दाने वाली चाय को जैसे हमने हमेशा दूसरी नजर से देखा। आप कह सकते हैं दार्जिलिंग की पत्ते वाली चाह या फिर वहां की कोई भी डस्ट, मेरी सखी हो और गोलदाने वाली चाय, ऐसी पड़ोसी, जिसके प्रति कभी आसक्ति का भाव नहीं उपजा। 

चाय के साथ ऐसी ही यादें आज सुबह बिस्तर पर लेटे लेटे कुलाचें मार रही थी। पूर्णिया का विकास बाजार और भट्टा बाजार मेरी याद में हमेशा से चांद की माफिक रहा है। बाजार को हमने बाजार की नजर से वहीं देखा था और समझा भी था। चुपके से साइकिल से आवारगी का क-ख-ग हमने अपने शहर के इन्हीं दो बाजारों में सीखा है। साइकिल के पॉयडल पर जोर कम और दिल पर अधिक भी हमने वहीं सीखा।
 

पूर्णिया के विकास बाजार में देबू का एक दुकान है -आनंद जनरल स्टोर
, जहां लप्चू पक्का मिल जाता है। वहीं भट्टा बाजार में कुछ दुकान हैं, जहां के शोकेस में लप्चू के रंग-बिरंग के चाह डिब्बे सजे रहते हैं। उजला, हरा, गुलाबी..मटमैला ..ये सभी रंग के डिब्बे में अपनी लप्चू आराम फरमाती है। 

दिल्ली विश्वविद्यालय
 में आवारगी के दौरान भी दार्जिलिंग की चाह संग बनी रही। घर से महीने के खर्च के लिए आने वाले ड्राफ्ट के साथ कुरियर में लप्चू चाह भी होता था। हम कह उठते थे- आहा! जिंदगी। और जब दिल्ली-कानपुर में नौकरी के प्रपंच में मंच सजा रहे थे तब भी लोप्चू सखी बनी रही , ऐसी सखी जो हर दौर में साथ निभाने के लिए कटिबद्ध है। चाय सूफी संगीत के माफिक खींचती रही है, कबीर वाणी की तरह सुबह से लेकर रात तलक दृष्टि देती रही है।

अब देखिए न, आज जब लोप्चू का नया पैकेट खुला तो यादें मुझे कहां-कहां ले जाने लगी। सचमुच यादें कमीनी होती है, जिंदगी के पहले होस्टल की यादों में मुझे चाय की सुध रही, बांकि को जैसे मैंने उड़ा दिया हो, जबकि यादें तो यादें होती है, वो कैसे उड़ेगी...।

वैसे लप्चू के बहाने मेरी स्मृति की डयोढ़ी कभी खाली नहीं होगी क्योंकि चाय की चाह हमेशा बनी रहेगी। और जिस दिन ऐसा नहीं होगा उस दिन तो हम यही कहेंगे-  

 
बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए, चार कहार मिल  मोरी डोलिया सजावें, मोरा अपना बेगाना छुटो जाए, आँगना तो पर्बत भयो और देहरी भयी बिदेश, जे बाबुल घर आपना मैं पीया के देश... 

Wednesday, August 20, 2014

अंचल- प्रपंच और जमीन

अंचल में आने के बाद जिस शब्द से मैं अक्सर परेशान रहता हूं उसमें एक है जमीन। जिसे मैं कल तक धरती -भूमि या माटी कहता था उसे यहां आकर जमीन कहने लगा हूंशाम की शुरुआत में यह पोस्ट लिखते वक्त मुझे कॉलेज के दिनों में पढ़े एक बांग्ला उपन्यास भूमि पुत्र की याद आ रही है।

उपन्यास का नायक हमेशा भूमि के नशे में रहता था, आप सोच रहे होंगे कि ये कैसा नशा है? तो साहेबान भूमि का नशा किसी भी नशे से बढ़कर है। उपन्यास का नायक भूमि में ही रमा रहता था। अंचल में आने के बाद ही भूमिपुत्र की कथा वस्तु को समझ पाया हूं।


अंचल में कोसी प्रोजेक्ट के नहर पर ऊंचाई से खेतों में पसरे हरे-हरे धान को निहारते हुए कभी कभी मैं भी जमीन के मालिकाना हक की एबीसीडी पढ़ने की कोशिश करता हूं तो लगता है कि माया का फेर यही है और शायद जीवन जीने की ललक भी यही है।

सच कहूं तो मुझे जमीन की 
कथाएं भी नहर की भांति लगती है। कभी पानी तो कभी सूखा लेकिन जीने की आशा उसी पर टिकी रहती है। जमीन और नहर उस वक्त मेरे लिए एक समान लगने लगता है। मैं दोनों के हाव-भाव पढ़ने लगता हूं। मेरे जीवन में एक ऐसा भी वक्त था जब ऐसे रंगों से परहेज करता था लेकिन अब मैं उसी डफली में जीवन का राग आलापने लगा हूं

बाउंड्री
, अमीन, जमीन जैसे शब्द मुझे रंगरेज की तरह खींचने लगे हैं। सर्वे-सेटलमेंट-डिग्री.सिलिंग आदि शब्दों से ममत्व बढ़ गया है। दोस्त-यार कहते हैं कि अब मैं मायावी हो गया हूं। लेकिन सच कहूं तो इन सबके बीच भी मेरा मानुष बुदबुदाते रहता है- “ हर करम के कपड़े मैले हैं..... क्योंकि मन तो साफ नहीं रहा। जमीन कुछ सीखाए या सीखाए, प्रपंच तो जरुर सीखाता है। ऐसा मेरा मानना है।

मैं इस प्रपंच पर लंबी कथा बांच सकता हूं। ऐसी कथाएं अंचल में चलती रहती है। कबीराहा मठों पर भी इन कथाओं के नायक मुझे दिख जाते हैं।


पिछली बरसात कटिहार जिले के एक कबिराहा मठ पर बैठा था तो एक ने कहा कि जीवन के प्रपंच में कपड़े सफेद रह जाएं यह संभव नहीं है बरसात की उस दोपहर में भूमि पुत्र का नायक मेरे दिमाग में फिर चहलकदमी करने लगा था। हमने जान लिया कि अंचल के जीवन में प्रपंच ही मन रुपी कपड़े को मैला करताइन सबके फेर में मेरे लिए फायदे की बात यह रही है कि बचपन में गणित से डरने वाला छात्र जीवन में अब अर्थशास्त्र के संग डुबकी लगाने लगा है। J

खैर, अंचल में जिद की कथा ऐसे ही चलती है। मन जिद्दी होने चला है लेकिन मन पर लगाम कसने के लिए अभ्यास की जरुरत है। मेरा ध्यान गीता में छपे उस श्लोक पर टिक जाता है, जिसमें कृष्ण कहते हैं- मन चंचल बहुत है,पर मन को वैराग्य और अभ्यास से वश में किया जा सकता है।“ लेकिन सच कहूं तो मैं इन अभ्यासों से अभी दूर रहना चाहता हूं।

दरअसल
अंचल में पांव फैलाने के बाद मेरे हिस्से में जिद्दी मन भी आ टपका है मैं जिद को जीवन के अवयव की तरह देखना चाहता हूं। देखिए न यह लिखते वक्त उसके भीतर फिल्म गुलाल का यह गीत भी बज चला है-


 
चल तो तू पड़ा है,
  फासला बड़ा है, 
जान ले अंधेरे के सर पे खून चढा है
मुकाम खोज ले तू
मकान खोज ले तू

(जारी....  
पुनश्च:-  यह एक बनते किसान की डायरी है, हम इस डायरी को जारी रखेंगे और अनुभव साझा करते रहेंगे। )


Monday, July 14, 2014

फेसबुक के नाम...

पिछले एक महीने से खेत-पथार से लगभग दूर हूं। बाबूजी की तबियत खराब होने की वजह से अस्पताल और डाक्टर के संग जीवन को देख रहा हूं। ऐसे में दोपहर के खाली वक्त में फेसबुक से यारी और बढ़ गई है। कभी कभी लगता है कि फेसबुक ने मेरे मैं का विस्तार किया है। जैसे कबीर कहते हैं न-बिन धरती एक मंडल दीसे/बिन सरोवर जूँ पानी रे/गगन मंडलू में होए उजियाला/बोल गुरु-मुख बानी हो जी ठीक वही बात इंटरनेट के विभिन्न सोशल नेटवर्किंग चैनल मेरे लिए रहे हैं।

फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स मेरे लिए कबीर रच रहे हैं
, गुलजार बो रहे हैं और तो और, कुछ रेणु के बीज भी बो रहे हैं। ऐसे में मुझे यह दुनिया भी किसानी लगती है, मैं काश्तकार बन जाता हूं, जो मेरा मूल है।  


हमने कभी भी फेसबुक को आभासी नहीं माना, और न ही ख्वाब। दरअसल हम इसमें भी एक शहर बसाते हैं, एक मोहल्ला तैयार करते हैं। ऐसे लोगों से और करीब आते हैं, जिससे मन की बातें थोक के भाव में कर सकें, जिन्हें ड्राइंगरुम में बुलाकर अच्छी चाय पिला सकें.... सब अपने हैं यहां, कोई नहीं है पराया....।

जिले के पड़ोसी और संबंधी यहां और भी करीबी बन गए। कोई जब यह पूछता है कि आपने क्या कमाया तो मैं झटके से कह देता हूं- दोस्त कमाए हैं। आगे वाला सोचता है कि फेंक रहा है लेकिन एन वक्त पर अंदर का दोस्त साधो-साधो कह रहा होता है।
 
 
इन दिनों रूहानी अहसास होने लगा
 है, आत्मालाप की श्रेणी में यह पोस्ट लिखते वक्त मैं इस अहसास को लिख नहीं कर पा रहा हूं क्योंकि ऐसे वक्त पे मन बावरा हो जाता है। आप आवारा भी कह सकते हैं।

अक्सर फेसबुक पर कई लोग टकराते हैं। ऐसे अवसरों पर लगता है
, मानो यह कोई स्टेज हो, जहां हर दिन हर कोई सज-धज के आते हैं और अपने रोल को निभाकर निकल जाते हैं, अपने घर की ओर। और मैं, इन सबमें अपना रुप खोजने जुट जाता हूं। तभी पर्दे के पीछे से रवींद्र नाथ टैगोर के शब्द गूंजने लगते हैं-  विश्वरुपेर खेलाघरे/ कतई गेलेम खेले/ आपरूप के देखे गेलेम/दुटि नयन मेले../जाबार दिने.....( In the theater of this world, I played many games and assumed many roles, while doing so, "I" "saw" "me", with my own eyes...) 

जाते-जाते गुलजार को पढ़ लीजिए-
 
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते/ जब कोइ तागा टूट गया या खत्म हुआ/फिर से बांध के/ और सिरा कोई जोड़ के उसमे/आगे बुनने लगते हो…..

Tuesday, July 08, 2014

बजट से पहले 'किसानी-गप्प'

यह वक्त नई सरकार के बजट का है तो दूसरी ओर मानसून के वक्त खेतों में डटे किसान के लिए यह वक्त धनरोपनी का है। एक किसान के लिए यह स्वर्णिम काल होता है।  समाचार चैनलों और अखबारों में किसानी के अलावा ढेर सारे मुद्दों पर चर्चा होती रहती है। ऐसे में मेरे जैसा किसान बजट से पहले किसानी की बात करना चाह रहा है।


मैं अपनी बात धनरोपनी के वक्त कादो से सने रोपनी करते लोगों के पैर से शुरु करना चाहता हूं। कादो से सने पांव ही किसान की ताकत है। धरती की महक और जल का मिश्रण किसान के मन को मजबूत करता है। धनरोपनी के वक्त खेत में खेती के संग गीत-नाद का भी माहौल बना रहता है। मेरे लिए यही अंचल की सांस्कृतिक विरासत है। 

खेती – बाड़ी का गप्प करें और मन में रेणु न आएं, ऐसा भला कभी हुआ है। तो दोस्तों अपनी कथाओं के जरिए जन-मानस को गांव से करीब लाने वाले लेखक फणीश्वर नाथ रेणु अक्सर कहते थे कि खेती करना कविता करना है, कहानी लिखना है..।

रेणु ने एक दफे कहा था, “एक एकड़ धरती में धान उपजाना, उपन्यास लिखने जैसा है...,लेखन का ही आनंद मिलेगा खेती करने में..”। साथ ही वे खेती को एक अलग नजरिए से लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- "आबरन देवे पटुआ,पेट भरन देवे धान। पूर्णिया के बसइया, रहै चदरवा तान।" 

ऐसे में ‘लिखने वाला’ यह सवाल पूछ रहा है कि क्या आप किसान हैं?  चलिए आपसे न पूछकर, सवाल करने वाला खुद से यह सवाल करता है, दरअसल किसानी पृष्ठभूमि में जिसका मानस तैयार हुआ है, वह भी ऐसे सवाल पर लंबी चुप्पी साध लेता है। हालांकि अभी भी किसानी की दुनिया में खुश्बू बरकरार है, बस हिंदुस्तानी समाज का नजरिया बदल गया है। 

रेणु, कोसी के जिस इलाके में पटुआ (जूट) की खेती से खुशहाल रहने वाले किसानी युग की चर्चा करते थे, अब वह युग बदल गया है। पटुआ के जगह पर पहले सूरजमुखी ने किसानों को खुशहाल बनाया, फिर मकई ने और अब वह जगह लकड़ी ले रहा है। इन सब उदाहरणों के संग खेती छोड़ने वाले लोगों का भी जिक्र जरुरी है।

आखिर ऐसी क्या वजह सामने आ गई बिहार के कोसी इलाके के तथाकथित बड़े किसानों का खेती से मोह भंग हो गया? यह एक बड़ा सवाल है और इसी के आसपास ‘क्या आप किसान हैं’ जैसा सवाल उठ खड़ा हुआ है।  


क्या आप किसान हैं?  के सकारात्मक जवाब के लिए किसानी के अंदाज को पेशेवर ढंग से पेश करने की भी जरुरत है। ऐसी बात नहीं है कि धान, गेंहू या अन्य किसी नकदी फसल के बदौलत एक परिवार का भरन पोसन नहीं हो सकता है। बस किसानी का अंदाज बदलना होगा।

दरअसल, इस सवाल के बीच में दो तरह के लोग ‘अतृप्त’ हुए खड़े हैं। एक ऐसे किसान, जिनके पास जमीन है और जो पहले खुट्टा गाड़कर गांव में जमे रहते थे और उसी के संग लोग काम करते थे और दूसरे ऐसे  लोग जो बड़े किसानों के यहां खेती स जुड़े काम करते आए हैं। 

 (कृप्या इन अतृप्त जमात के बीच हम-आप भूमि-वितरण को न खड़ा करें क्योंकि राजनीति करने वाले इसका हल कभी नहीं निकालेंगे क्योंकि वे पिछले कई दशकों से इसी की बदौलत अपनी दुकान चला रहे हैं। हमें खुद इसका हल निकालना होगा, सकारात्मक तरीके से।)

अब सवाल उठता है कि फिर ऐसी तस्वीर कैसे उभर गई कि दोनों जमात गांव से दूर हो गए। ऐसे में यह भी सवाल लाजमी है कि क्या उन इलाकों में अब खेती ही नहीं हो रही है? क्योंकि जमीन वाले, काम करने वाले हैं ही नहीं।

 दरअसल इन सबके संग एक दूसरी तस्वीर भी तैयार हुई, वह पलायन के भीतर पलायन का है। गांव से पलायन का रुख शहर का रास्ता तय करता है लेकिन यह भी जानने की जरुरत है कि एक पलायन का रास्ता गांव से गांव का भी है। ये ऐसे लोग होते हैं, जो नकदी फसल के लिए एक ही जिले के दूसरे गांव का रुख करते हैं।

कोसी के अधिकांश इलाकों में पलायन का यह रुप सबसे अधिक देखा जा रहा है। मेहनतकश लोगों की बड़ी जमात पहले पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि जगहों से मेहनत कर आते हैं, कुछ पूंजी जमा करते हैं और फिर उन किसानों के संपर्क में आते हैं, जो अब शहर का रास्ता अपना चुके हैं।

 यहीं आकर खेती एक कांट्रेक्ट का रुप अख्तियार करती है। ये मेहनतकश प्रवासी किसान अधिक भूमि वाले किसानों के खेतों को ठेके पर लेते हैं और शुरु होती है नकदी फसल की एक नई फिल्म, जिसमें फसल के लिए नकद का प्रावधान है। इस फिल्म का नायक एक प्रवासी किसान होता है,जिसमें परिस्थितियों के संग कदम मिलाने की ताकत होती है।

किसानी की नई परिभाषा गढ़ते इन लोगों को करीब से समझने की जरुरत है। इसमें प्रवासियों की मनोस्थिति को भी जानना होगा। समाजशास्त्र के अध्येताओं को इस पर नजर डालने की जरुरत है।

 मीडिया को इस ओर देखना होगा,ताकि एक बड़े तबके का किसानी व्यवस्था से मोह भंग न हो और जब यह सवाल कोई पूछे कि “क्या आप किसान हैं? ” तो जवाब सकारात्मक ही आए, इसकी गारंटी मिले।