Sunday, June 19, 2016

बाबूजी



गाम में अपने अहाते में बैठा हूं। खेत में ट्रेक्टर का हल फट-फट की आवाज़ देकर माटी को ऊपर-नीचे कर रहा है। हल्की धूप है लेकिन हवा में ठंडापन है। कहीं आस-पड़ोस में बारिश हुई है। शायद उत्तर की तरफ़। ये सब महसूस करते हुए बाबूजी की बहुत याद आ रही है। अक्सर जब गाँव में अकेले  होता हूं, लगता है बाबूजी के सामने खड़ा हूं, वे काठ वाली कुर्सी पर बैठे हैं और माटी  और फ़सल की बातें मुझे समझा रहे हैं। ऐसे वक़्त में आँखें मूंद लेता हूं और पलकों को ख़ूब भींगने देता हूं।

साल भर पहले बाबूजी बिछावन पर थे, लगभग दो साल तक वे ख़ुद से जूझते रहे।  उस संघर्ष को केवल वे ही समझ पा रहे थे, मैं केवल उन्हें देख रहा था। डॉक्टर- दवा के संग उन्होंने दोस्ती कर लंबी चुप्पी साध ली थी। उनके डॉक्टर मित्र केके घोष हर दो दिन पर उनका हाल-चाल लेते थे। कभी फ़ोनपर तो कभी डेरा पहुँचकर।

सोडियम गिरता था तो वे अचेत हो जाते। दीदी सब सहम जाती। काकाजी उनके सिरहाने बैठे रहते थे। वे उन्हें बार-बार टोकते थे। इन सबके बीच बाबूजी अपने भाई को एकटक देखते रहते थे।

हम भाई-बहनों को उनका दुःख जीवन के व्याकरण की तरह लगने लगा था, कभी हम उलझ जाते थे तो कभी उनके संग रोने लगते। उन्हीं दिनों हम उनकी नज़रों से सबकुछ देखने लगे थे। बाबूजी की चुप्पी को समझने लगे थे। माँ तो उनकी ख़ामोशी की भाषा को समझ चुकी थी शायद बहुत पहले।

बाबूजी बिछावन पर लेटे शांत मुद्रा में दुःख को मानो पी रहे थे। बिजली के बिछावन पर वे साधु की तरह मुझे लगते थे, सफ़ेद धोती में। हमें उनका हमेशा साथ चाहिए था। माँ , हर वक़्त उनकी सेवा में लगी रहती थीं। माँ भीतर-भीतर रोती रहती थी, मैं बस चुपचाप मन ही दुःख सह लेता था।

बाबूजी, जब तक खड़े थे उनसे आँख मिलाकर बात नहीं कर पाया। मेरी आँखें हमेशा झुकी रही। लेकिन जब उन्होंने बिछावन पकड़ा तो रोज यह कहना पड़ता है कि बाबूजी आँखें खोलिए, दवा खाइये...तो मैं घंटों तक अंदर से डरा महसूस करता था। उनसे आँख मिलाने की हिम्मत तब भी नहीं कर पा रहा था।

बाबूजी को जब रोज बिछावन से उठाता था और फिर वहीं लेटाता तो उनके शरीर को छूने भर से अजीब की शक्ति मिलती थी, आज भी उनका स्पर्श महसूस करता हूं तो शक्ति मिलती है, सच तो यह है कि बाबूजी के स्पर्श करने से जो शक्ति मिली  उसे मैंने खुद को खुद से लड़ने के लिए बचाकर रखा है।

मुझे आज याद आ रहा है दसवीं पास करने के बाद जब बाबूजी ने टाइटन की कलाई  घड़ी दी थी तो कहा था - "वक्त बड़ा बलवान होता है। वक्त हर दर्द की दवा भी अगले वक्त में देता है। "

एक बार सातवीं में गणित में कम अंक आने पर बाबूजी गुस्सा गए थे। उन्होंने डपटते हुए कहा था - "जीवन गणित है और तुम उसी में पिछड़ गए..." फिर उन्होंने 12वीं में कॉमर्स विषय लेने को कहा और चेतावनी दी थी कि इसमें पिछड़ना नहीं है। पढ़ाई को लेकर उनका अनुशासन अलग था, इसमें उन्होंने समझौता नहीं किया और  इसी अनुशासन ने नए लोगों से मिलने और हमेशा पढ़ते रहने की आदत लगा दी।

बाबूजी ने हमेशा लोगों को सहारा दिया लेकिन इलोकट्रेट इम्बैलेंस की वजह से वे टूट गए थे। हमेशा अपने कन्धे पर भार उठाने वाले शख्स को इस कदर लाचार देखकर मेरा मन टूट जाता था। मैं उस वक़्त सबसे अधिक टूट गया जब उनके लिए व्हील चेयर खरीदकर लाया था। रास्ते में रूककर खूब रोया था। दरअसल मैंने कभी भी बाबूज़ी को सहारा लेकर चलते नहीं देखा था ...सहारा देते हुए ही देखा।

आज जब चनका में रेसीडेंसी बनाने की तैयारी में जुटा हूं तब बाबूजी की लाइब्रेरी की याद आने लगी है। फ़ूस का एक सुंदर सा घर था, १२ काठ की आलमारी थी।बाबूजी ने दादाजी के नाम से वह लाइब्रेरी तैयार की थी। मुझे कुछ कुछ याद है। लेकिन उन्होंने लाइब्रेरी की सैंकडों किताबें बांट दी।

दिल्ली में तब पढ़ाई करता था, छुट्टी में पूर्णिया आया था मैंने तब बाबूजी से पूछा कि किताबें जो लोग ले जाते हैं वो तो लौटा नहीं रहे हैं? आपने कहा था- “किताब और कलम बांटनी चाहिए। लोगों में पढ़ने की आदत बनी रहे, यह जरुरी है। देना सीखो, सुख मिलेगा। “

आप चले गए लेकिन मुझे पता है आप यहीं हैं, इसलिए हर दोपहर चनका में रहता हूं। खेत जाता हूं, जहाँ आप माटी में मिल गए, उसे स्पर्श करता हूं।

कटहल, आम, जामुन के गाछ फल से लदे हैं। दोपहर में गाम के बच्चे उसमें लिपटे रहते हैं , चमगादरों की तरह ...मैं बस उन्हें हँसते खिलखिलाते देखता रहता हूँ। आप सबके लिए कुछ न कुछ लगाकर चले गए बाबूजी...

Saturday, June 11, 2016

फ़ोर्ब्स साहेब की कोठी


फणीश्वर नाथ रेणु की वजह से मुझे फ़ारबिसगंज से लगाव है। दो दिन पहले की बात है, न्यूयार्क यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर रुचिरा गुप्ता के संग फ़ारबिसगंज घूम रहा था। रूचिरा जी फ़ारबिसगंज की ही हैं। दोपहर में उन्होंने कहा , चलिए आज आपको  फ़ोर्ब्स साब की कोठी दिखाते हैं।

दरअसल अररिया ज़िला का फारबिसगंज कभी सुलतानपुर इस्टेट  के नाम से जाना जाता था. 1859 में सुलतानपुर के मीर साहब की ज़मींदारी को एक अंग्रेज़ ‘सर अलेक्जेंडर फोर्ब्स’ ने ख़रीद लिया.

1890 में अलेक्ज़ेन्डर फोर्ब्स और उनकी पत्नी डायना की मृत्यु मलेरिया से हो गयी. तब आर्थर हेनरी फ़ोर्ब्स ने पिता की मृत्यु के बाद शासन संभाला और इसका नाम सुलतानपुर से बदलकर ‘फोर्बेस गंज’ रख दिया. लेकिन समय बदला और फ़ोर्ब्स परिवार ने सुलतानपुर इस्टेट को देश के मशहूर व्यवसायिक घराना जेके सिंघानिया के हाथों बेच दिया क्योंकि उस वक़्त यहाँ जूट की खेती बहुत होती थी।

पहले अंग्रेज़ यहाँ के ज़मींदार थे। कहते हैं कि फ़ोर्ब्स को किसानी का शौक़ था। इसी शौक़ की वजह से उसने सुलतानपुर को चुना और जमकर खेती की। एक सुंदर सा घर बनाया। घर के आगे एक बड़ा सा तालाब, घर के पूरब और पश्चिम में दो तोप, जिसका चबूतरा अभी भी है। इसके अलावा बड़ा सा गराज। कुल मिलाकर एक सुंदर सी कोठी.

फ़ोर्ब्स साब की कोठी में जो लोग अब रहते हैं, हमने उनसे भी बात की। पता चला कुछ साल पहले तक फ़ोर्ब्स के पोते और नाती यहाँ आते थे, अपने दादा-नाना के घर देखने, जिसमें एक का नाम एंड्रिल फ़ोर्ब्स था।  वह लंदन में कहीं शिक्षक थे।

आज फ़ोर्ब्स साब भले न हो लेकिन उनकी कोठी फ़ारबिसगंज में ख़ुशहाल है और सबसे महत्वपूर्ण कोठी के सामने का तालाब ज़िंदा है, पानी है वह भी साफ़। इस तालाब को 'सुलतान पोखर' कहा जाता है। आज यह पोखर 'फ़ोर्ब्स साब की कोठी ' की तरह ही फ़ारबिसगंज की पहचान है।

देश के छोटे शहरों और क़स्बों को यदि आप खंगालेंगे तो ढ़ेर सारी कहानी मिलेगी। यह लिखते हुए मुझे रवीश कुमार के ब्लॉग क़स्बा का टैगलाइन याद आ जाता है- 'शौक़े दीदार अगर है तो नज़र पैदा कर'

Tuesday, June 07, 2016

गाँव घर की ओर लौटना

"कम से कम एक ही गाँव के कुछ प्राणियों  के मुरझाए ओठों पर मुस्कुराहट ला सकूं, उनके ह्रदय में आशा और विश्वास को प्रतिष्ठित कर सकूं। "

फणीश्वर नाथ रेणु की अमर कृति 'मैला आँचल' की यह पंक्ति जब पढ़ता रहा होता हूं कि तभी मन में फ़िल्म 'गुलाल' का यह गीत गूँज उठता है -

"जाते कहीं हैं मगर जानते न कि आना वहीं होता है। "

दरअसल आज रेणु की लिखी बातें और इस गीत का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि हाल ही में बिहार में हुए पंचायत चुनाव में कुछ ऐसे लोगों को जनता ने गाँव सँवारने का मौक़ा दिया है, जो अबतक महानगरों में थे लेकिन इस बार अपने गाँव- घर लौट आए, इस ख़्वाब के संग कि माटी के लिए कुछ करना है, बदलाव लाना है।

इस कड़ी में एक नाम अमृत आनंद का भी है। तीस साल के आनंद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से पढ़ाई कर गाँव बदलने आए हैं। वे इसबार कैमूर ज़िले के पासैन पंचायत से मुखिया चुने गये हैं।

जर्मन साहित्य के छात्र आनंद अब एक नई पारी खेलने जा रहे हैं, जिसमें उन्हें बहुत कुछ करना है। वैसे भी नई पीढ़ी के लिए गाँव-घर लौटना चुनौती है और ऐसे में आनंद का यह क़दम कई मायनों में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

चुनाव प्रचार के दौरान विपक्षी उन्हें 'दिल्ली का बाबू' कहते थे। कोई कहता कि चुनाव लड़कर लौट जाएँगे आनंद बाबू, लेकिन इन सबके बावजूद माटी से मोहब्बत करने वाले इस युवा का मन नहीं टूटा और वे शानदार बहुमत से विजयी हुए।

आनंद अब सबसे पहले गाँव को स्वच्छ बनाना चाहते है। इसके लिए वे सामुदायिक शौचालय बनवाए जाने की योजना बना रहे हैं।

अब ज़रा कैमूर से दरभंगा ज़िले के एक गाँव मनियारी चलते हैं। यहाँ हम आपकी मुलाक़ात शकुंतला काज़मी से कराने जा रहे हैं। उन्होंने भी दिल्ली की ज़िंदगी को एक झटके में छोड़ मुखिया चुनाव में हिस्सा लिया और शानदार बहुमत से जीत भी हासिल की।

दरभंगा ज़िले के बहादुरपुर प्रखंड के मनियारी पंचायत की नवनिर्वाचित मुखिया शकुंतला काज़मी ने राजनीति की  अपनी पहली ही चुनावी पारी में जीत हासिल की है।

शकुंतला काज़मी मूल रूप से हरियाणा की हैं। उनका जन्म हरियाणा के महेंद्रगढ़ ज़िले में हुआ। हालाँकि उनकी पढाईं दिल्ली में हुई। उनके पिता दिल्ली में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी थे। इन सबके बावजूद शकुंतला ने पढ़ाई के लिए संघर्ष किया साथ ही महिलाओं के हक़ के लिए काम भी करती रही।

दिल्ली में उनकी मुलाक़ात नदीम अहमद काज़मी से होती है। बाद में दोनों की शादी होती है। ये जोड़ी अक्सर दिल्ली के अपने व्यस्त कार्यक्रम के बीच दरभंगा स्थित अपने गाँव आते -जाते रहते हैं। इस बार जब बिहार में पंचायत चुनाव का बिगुल फूँका गया तो आख़िर शकुंतला काज़मी ने गाँव में विकास की लौ जलाने की अपनी योजना को अमली जामा पहनाने के लिए मुखिया पद के लिए नामांकन दाख़िल कर ही दिया।

पति नदीम अहमद काजमी ने शकुंतला के इस फ़ैसले का समर्थन किया और फिर दोनों को गाँव वालों का आपार समर्थन मिला। शकुंतला ने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को 538 मतों के अंतर से पराजित किया। अब शकुंतला को अपने गाँव के लिए वह सबकुछ करना है, जिसके लिए वह सोच रही थी, जनता ने अब उन्हें मौक़ा दे दिया है।

ऐसे दौर में जब हर कोई गाँव से भाग रहा है, तब इस तरह की कहानियाँ सुनाने की ज़रूरत है ताकि गाँव से पलायन रुके साथ ही महानगरों से भी लोग अपनी जड़ की तरफ़ लौटें।

जीवन के हर क्षेत्र में हार- जीत तो लगा ही रहता है। ऐसे में मिट्टी से जुड़ना बहुत बड़ा काम है। 'मैला आँचल' में रेणु ने अपनी पात्र ममता के हवाले कहा है -"कोई रिसर्च कभी असफल नहीं होता है डॉक्टर! तुमने कम से कम मिट्टी को तो पहचाना है। मिट्टी और मनुष्य से मुहब्बत, छोटी बात नहीं। " तो आइये, इस भागमभाग जीवनशैली में आपसब भी अपने गाँव-घर के लिए कुछ वक़्त निकालिए, अपनी माटी के लिए कुछ अलग करिए।

Tuesday, May 24, 2016

पोखर के बहाने कड़े सवाल

हाल ही में मिथिला के कुछ ग्रामीण इलाक़ों में जाना हुआ। मेरे लिए कोसी के इस पार यानि सीमांचल के तरफ़ से उधर जाना हमेशा से सुखद रहा है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि पानी संकट को लेकर इन दिनों हर जगह चर्चा हो रही है।

एक किसान के तौर पर मैं ख़ुद इस संकट से जूझ रहा हूं। ऐसे में जब आँखों के सामने एक से बढ़कर एक पोखर दिख जाए तो आप किसानी मन का अंदाज़ा लगा सकते हैं। पोखर में स्थिर पानी और उसके महार पर खेलते बच्चों को देखकर किसान का मन हरा हो गया। मनिगाछी के समीप एक गाँव ब्रह्मपुरा जाना हुआ था।

मैंने गाँव घुमते हुए एक पोखर की तस्वीर उतार ली और उसे जब फ़ेसबुक और ट्विटर पर डाला तो प्रतिक्रिया में जो टिप्पणियाँ आई तो अंदाज़ा लगा कि गाम-घर को लेकर महानगरों में बसे लोगों के मन में कितना प्रेम है। वैसे कुछ लोगों ने सवाल भी उठा दिया कि क्या सचमुच में पोखर में पानी है या फिर गूगल देवता की तस्वीर है!

ख़ैर, गाँव अभी भी कई चीज़ों को संजोकर रखे हुए है। गाँव ही है जिसके बदौलत डाइनिंग टेबल आबाद है। ऐसे में गाँव की बातें ख़ूब होनी चाहिए। गाँव की उन सभी चीज़ों पर ध्यान रखने की ज़रूरत है, जो हम सभी की ज़रूरतें पूरा कर रही है। साथ ही किसानी समाज कहाँ ग़लती कर रहा है, इस पर भी सवाल उठाए जाने चाहिए।

ऐसे में पग-पग पोखर की बात करने वाले मिथिला जैसे क्षेत्र को नज़दीक से जानने -समझने की आवश्यकता है। केवल माछ-मखान और पान के अलावा जल संरक्षण के लिए भी वहाँ लोग काम कर रहे हैं। यह काम एक से नहीं हो सकता, यह समूहिकता को दर्शाने वाला काम है। मछली और मखान तो व्यावसायिक खेती है। किसानी भाषा में हम इसे नक़दी फ़सल कहते हैं लेकिन जब जल संरक्षण की बात आती है तो हम चुप्पी साध लेते हैं।

पोखर निजी संपत्ति बनकर रह जाती है। लेकिन यक़ीन मानिए यदि हम पानी को लेकर गम्भीर नहीं हुए तो एक अजीब स्थिति इधर भी पैदा हो जाएगी। किसी भी इलाक़े को मराठवाड़ा बनने में देर नहीं लगती है।

बात इसकी नहीं है कि हम किस पर दोष मढ़े । दोष सब पर मढ़े जा चुके हैं । अब हम आपस में एक दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं लेकिन यह भी सत्य है कि खेत को खेत हम किसान ही हैं जो नहीं बने रहने दे रहे हैं। खेत का दोहन हम करते आए हैं। साल में चार फ़सलें तक हम उपजा लेते हैं, धरती मैया को आराम नहीं मिलता है। बोरिंग से अनवरत पानी निकाला जा रहा है। ऐसे में जल स्तर गिरना तो तय है। यह भी सच है कि हम किसान ही हैं जो पोखर को सूखा रहने के लिए विवश कर दिए हैं। हम पानी निकाल तो रहे हैं लेकिन जल-संरक्षण नहीं कर रहे हैं।

हमें अपनी ग़लती स्वीकार कर सामूहिक स्तर पर पानी के लिए पोखर को ज़िन्दा करना होगा। जान लीजिए , जिस दिन हम प्रकृति के अनुसार किसानी करने लगेंगे , दिक़्क़तें कम होनी शुरू हो जाएगी। हाँ, यह अलग बात है कि मौसम की मार के सामने हम विवश हो जाते हैं लेकिन हर बार ऐसा ही होगा यह तो ज़रूरी नहीं है। किसानी करते हुए लड़ना पड़ता है, इसे सहज भाव में स्वीकार कर हमें आगे बढ़ना होगा।

ब्रह्मपुरा गाँव के उस पोखर ने तो मेरे जैसे किसान को यही कहानी सुनाई है। और हाँ, यदि हम सब पोखर को बचाने की ठान लें तो दिक़्क़तें भी देर-सवेर छू-मंतर हो जाएगी। सुंदर गाँव, सुंदर पोखर, पेड़-पौधे किसकी आँखों को पसंद नहीं है। इसे हम ग्राम्य पर्यटन के नज़रिए से भी देख सकते हैं। हमारे गाम में बाहर से लोग आएँगे, ठहरेंगे। इसे भी एक रूप दिया जा सकता है। साफ़ सफ़ाई रखने की ज़रूरत है। हरकुछ के लिए हम सरकार को तो दोषी नहीं ठहरा सकते हैं, हमें भी कुछ करना होगा, बस कुछ अलग करना होगा हम सभी को अपनी माटी के लिए।


(प्रभात ख़बर के कुछ अलग स्तम्भ में प्रकाशित :24 मई2016)

Tuesday, May 10, 2016

शाम अब सुहानी होती है



बिहार में इन दिनों पंचायत चुनाव हो रहे हैं। महात्मा गांधी ने गाँव में स्वराज की बात कही थी, इन चुनावों में लोगों के जोश को देखकर अब यक़ीन होने लगा है कि गाँव-घर अब और मज़बूत होगा। ग़ौर करने की बात यह भी है कि बिहार इस साल चम्पारण सत्याग्रह का शताब्दी वर्ष भी मना रहा है और इसी बीच सूबे के मुख्यमंत्री ने संपूर्ण शराबबंदी का एलान कर दिया है। यह सब बता रहा है कि बिहार अब कई स्तरों पर ख़ुद को बदल रहा है और एक ब्राण्ड के तौर भी उभर रहा है। 

हाल ही में गाँव के दक्षिण टोले में शाम को  जाना हुआ। वहाँ बच्चे पढ़ रहे थे। एक नौजवान सभी को पढ़ा रहा था। कुछलोग मचान पर गाँव की राजनीति पर चर्चा कर रहे थे। तभी एक महिला बाहर आती है और मुझे बताती है 'नीतीश कुमार की वजह से आप यह सब देख पा रहे हैं नहीं तो ये सभी न बच्चे को पढ़ने देते न इतनी शांति से मचान पर बैठे मिलते। सब शाम ढलते ही अपनी दुनिया में रम जाते थे।' 

नीतीश कुमार के फ़ैसले  का असर सबसे निचले पायदान पर दिखने लगा है लेकिन अभी बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। हाल ही में दरभंगा में एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने कहा था कि ‘कुछ अंग्रेजी बोलने वाले लोग’ जो कि खाने-पीने को किसी भी नागरिक का मौलिक अधिकार बताकर इसकी आलोचना कर रहे हैं, हम ऐसे अंग्रेजी बोलने वालों को स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि शराब मौलिक अधिकार का हिस्सा नहीं है। बिहार की नीतीश कुमार सरकार ने पिछले पांच अप्रैल से प्रदेश में पूर्ण शराबबंदी लागू की है। 

अब करना ये होगा कि नीतीश के इस निर्णय को हमसबको सहारा देना होगा। हाल ही में महाराष्ट्र से कुछ लोग आए थे और उनलोगों ने नीतीश कुमार से मुलाक़ात कर उनके फ़ैसले की सराहना की। अब चाहिए यह कि समाज के हर तबके के लोग जिनकी बातों को असर जनमानस पर पड़ सकता है वे शराबबंदी के समर्थन में मुहिम चलावें। बॉलीवुड के लोग सामने आएँ, यह ज़रूरी है। आख़िर शराब क्यों ख़राब है, यह खुलकर बोलें। 

देश भर में कई सामाजिक संगठन हैं, उन्हें बीड़ा उठाना होगा। यह हम सब का सामाजिक दायित्व है। गाम से लेकर शहर तक सामाजिक बदलाव लाने की ज़रूरत है। सोच में बदलाव लाने की ज़रूरत है। स्वच्छता के क्षेत्र में काम करने वाली प्रमुख संस्था सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिंदेश्वर पाठक ने  बिहार में शराबबंदी को लेकर मुख्यमंत्री की पहल की प्रशंसा की है और कहा है कि यह समाज के विकास के लिए साहसिक कदम है। उन्होंने समाज शास्त्रियों से शराबबंदी के प्रभाव का अध्ययन करने की अपील करते हुए कहा कि यह निकट भविष्य में सामाजिक संरचना में सीधे तौर पर बदलाव लाएगा। पाठक की तरह अन्य लोग भी खुले मंच से ऐसी बातें कहें ताकि लोग यह समझे कि शराबबंदी को लेकर राजनीति नहीं होगी, यह समाज के सम्पूर्ण विकास के लिए ज़रूरी है। 

मेरा मानना है कि सुलभ की तरह अन्य संस्थाएँ, प्रभावी सामाजिक कार्यकर्ता, अभिनेता, उद्योगपति नीतीश कुमार के फ़ैसले को समर्थन दें ताकि लोगबाग के मानस से शराब जैसी चीज़ की दाग़ ही ख़त्म हो जाए। सुलभ का अपना बहुत बड़ा नेटवर्क है, वह काफ़ी कुछ कर सकती है। हम आप भी अपने स्तर से कर सकते हैं। बस आगे आना होगा। सुलभ जैसी और भी कई संस्थाएँ हैं, उसे आगे आना होगा, ताकि देश के हर गाँव की वह महिला जो अपने घरवाले की नशे की आदत की वजह से परिवार को टूटते देख रही थी, वह आराम से अपने परिवार के संग शाम में बैठ सके और खुलकर बोले- ' अब शाम सुहानी होती है...'


(प्रभात ख़बर के कुछअलग स्तंभ में १० मई को प्रकाशित)



Saturday, May 07, 2016

हमें हर साल लड़ना पड़ता है...

चनका से लौटकर पूर्णिया डेरा आ चुका हूं। सुबह से लेकर शाम तक लूट चुके खेतों को देखता रहा बस! आँखों के सामने प्रकृति की विनाश लीला देखता रहा, तेज़ हवा के प्रचंड रूप को देखकर डर गया।

कदंब के किशोर पेड़, मोहगनी और एमशोल जैसे लम्बे सुंदर पेड़, जिनकी उम्र छह से आठ साल होगी, सब टुकड़े टुकड़े हो गए।  प्रकृति की मार सबसे ख़तरनाक होती है, किसानी करते हुए यह जान सका। हर साल हमलोग लड़ते हैं, कई लोगों ने  सलाह दी, खेतों में कुछ अलग हो लेकिन जब आँधी आती है न, तब नया करने से डरने लगता हूं।

सुबह चनका पहुँचते ही मौसम की मार खेतों में आँखों के सामने देखने लगा। आम से लदे पेड़ की डालियाँ ज़मीन पर लेटने लगी। सैकड़ों आम जिन्हें पकना था एक महीने बाद, सब टूट कर बिखर गये। लीची बाड़ी में जाने के बाद मन और खट्टा हो गया। कटहल की तो पूछिए मत, पेड़ ही गिर पड़े।

मक्का की वह फ़सल जिसे हमने देर से बोया था, वह तो रूठ गया मुझसे। अभी तो मक्का के दाने  में दूध ही आया था। किसान का दर्द मुआवज़े के गणित से दूर है और हाँ, मैं निजी तौर पर इससे दूर रहना भी चाहता हूं।

बाँस बाड़ी की क्षति शब्द में बयां नहीं कर सकता। जानते है क्यों? दरअसल यह महीना बाँस में नए कोपल आने का है, बाँस का परिवार इसी महीने बढ़ता है और प्रकृति की लीला देखिए, आधे घंटे में बाँस बाड़ी की झुरमुट ज़मीन पर। हमारा नक़दी फ़सल ख़त्म!

यही आजकी कहानी थी। कुछ तस्वीरें हैं। काले मेघ की तस्वीरें हैं, जिसे देखकर मन को ठंडक पहुँचेगी यदि आप गरमी झेल रहे होंगे लेकिन इसी तस्वीर के बाद ही तूफ़ान को हमने झेला।

यक़ीन मानिए हम हारेंगे नहीं, जिनसे हमने अपने खेतों में कुछ नया करने का वादा किया है, ज़रूर करूँगा। हम रिस्क उठाएँगे, हार नहीं मानेंगे, बस किसानों पर आपलोग भरोसा बनाए रखिए, किसानी समाज जो हर साल आपके लिए अन्न उपजाता है, उसे स्नेह दीजिए। सरकार तो है ही , देर सवेर वह सुन ही लेती है। आप सब भी गाँव को देखिए आपदा के समय में। हमसब माँगते नहीं हैं, बस चाहते हैं कि दुख-सुख में दूसरे पेशे के लोग भी खेतों तक पहुँचे। खेत किसी एक का नहीं होता, यह सबका होता है।

किसानी करते हुए, लिखते पढ़ते हुए पिछले तीन साल से यही सब भोग रहा हूं, हँसते हुए खेत-पथार को समझ रहा हूं। महाराष्ट्र में पानी संकट से जूझ रहे किसानों की सुनता हूं तो मन टूट जाता है लेकिन उनके लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है, उन्हें भी नहीं हारना है, और हमें भी नहीं। मराठवाड़ा के किसानी समाज का  दर्द महसूस कर सकता हूं, लेकिन उन्हें भी हारना नहीं है क्योंकि 'सब दिन होत न एक समाना' हमारे दिन भी हँसी ख़ुशी के आएँगे, ख़ुद पर, माटी पर और पानी पर भरोसा रखिए।

हर बुरे वक़्त से कुछ नया सीखता हूं, आज सुबह की आपदा से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। और क्या कहूँ-'सबहि नचावत राम गोसाईं'

आपका

किसान

Tuesday, May 03, 2016

रेणु के गाँव में मूंगफली

खेती -बाड़ी करते हुए अक्सर अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु के गाँव आना - जाना लगा रहता है। वहाँ जाना मेरे लिए हमेशा से सुखद रहा है। हर बार वहाँ से लौटकर कुछ नया 'मन' में लाता आया हूं। पिछले शनिवार की बात है, राजकमल प्रकाशन समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम चनका आए थे, दिन भर के लिए।  उन्हीं के संग रेणु के 'गाम-घर' जाना हुआ।

किताबों और लेखकों के दुनिया में रमे रहने वाले निरूपम भाई से जब गाँव में मुलाक़ात हुई तो उनका एक अलग ही मन पढ़ने को मिला। उनके भीतर किसान का मन भी है, यह मुझे अबतक पता नहीं था। रेणु का लिखा पढ़ता हूं तो पता चलता है कि वे अक्सर किताबों की दुनिया में रमे रहने वालों को अपने खेतों में घुमाते थे। उन्होंने एक संस्मरण  लिखा है- "कई बार चाहा कि, त्रिलोचन से पूछूँ- आप कभी पूर्णिया जिला की ओर किसी भी हैसियत से, किसी कबिराहा-मठ पर गये हैं? किन्तु पूछकर इस भरम को दूर नहीं करना चाहता हूं। इसलिए, जब त्रिलोचन से मिलता हूं, हाथ जोड़कर, मन ही मन कहता हूं- "सा-हे-ब ! बं-द-गी !!"

सच कहिए तो इस किसान की भी इच्छा रहती है कि कोई गाम आए तो उसे पहले खेतों में घुमाया जाए। उस व्यक्ति से कुछ सीखा जाए। कबीर की वाणी है-'अनुभव गावे सो गीता'।

ख़ैर, प्रचंड गरमी में निरूपम भाई चनका के मक्का के खेतों में टहलते हुए थके नहीं बल्कि मुझे समझाने लगे कि मक्का के अलावा और क्या क्या हो सकता है। कोसी का इलाक़ा जिसे मक्का  का 'हब' कहा जाता है वहाँ का किसानी समाज अब फ़सल चक्र को छोड़ने लगा है, मतलब दाल आदि की अब खेती नहीं के बराबर होती है, ऐसे में एक ही फ़सल पर सब आश्रित हो चुके हैं। हालाँकि मक्का से नक़द आता है लेकिन माटी ख़राब होती जा रही है। इस बात को लेकर निरूपम भाई चिंतित नज़र आए।

तय कार्यक्रम के मुताबिक़ मैं और चिन्मयानन्द उन्हें लेकर रेणु के गाँव औराही हिंगना निकल पड़े। रास्ते भर सड़क के दोनों किनारे खेतों में केवल मक्का ही दिखा। रेणु के घर के समीप एक खेत दिखा, जिसे देखकर लगा मानो किसी ने हरी चादर बिछा दी हो खेत में। मेरे मन में रेणु बजने लगे- ' आवरन देवे पटुआ , पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैया रहे चदरवा तान' ! मेरे मन में रेणु बज ही रहे थे कि निरूपम भाई ने कहा ' यह जो आप देख रहे हैं न , मैं खेती की इसी शैली की बात करना चाहता हूं'।  अब तक परेशान दिख रहे निरूपम भाई के चेहरे की रौनक़ लौट आई। दरअसल खेत में मूँगफली की फ़सल थी, एकदम हरे चादर के माफ़िक़। साठ के दशक में रेणु की लिखी एक बात याद आ गयी जिसमें वे धान के अलावा गेहूँ की खेती कहानी के अन्दाज़  सुनाते हैं। बाबूजी कहते थे कि रेणु गेहूँ के खेत को पेंटिंग की तरह शब्दों में ढ़ालकर हम सभी के मन में बस गए।

दरअसल खेती को लेकर निरूपम भाई की चिंता को सार्वजनिक करने की ज़रूरत है क्योंकि यदि अलग ढंग से खेती करनी है तो हम किसानी समुदाय के लोगों को सामान्य किसानी से हट कर बहुफसली, नकदी और स्थायी फसलों के चक्र को अपनाना होगा। सच कहिए तो निरूपम भाई के आने की वजह से रेणु के गाँव में मूँगफली की खेती देखकर मन मज़बूत हुआ कुछ अलग करने के लिए।

ग़ौरतलब है कि तिलहन फसलों में मूँगफली का मुख्य स्थान है । इसे जहाँ तिलहन फसलों का राजा कहा जाता है वहीं इसे गरीबों के बादाम की संज्ञा भी दी गई है। इसके दाने में लगभग 45-55 प्रतिशत तेल(वसा) पाया जाता है जिसका उपयोग खाद्य पदार्थो के रूप में किया जाता है। इसके तेल में लगभग 82 प्रतिशत तरल, चिकनाई वाले ओलिक तथा लिनोलिइक अम्ल पाये जाते हैं। तेल का उपयोग मुख्य रूप से वानस्पतिक घी व साबुन बनाने में किया जाता है। इसके अलावा मूँगफली के तेल का उपयोग क्रीम आदि के निर्माण में किया जाता है।

पहले कभी इस इलाक़े में रेत वाली मिट्टी में मूँगफली उगाया जाता था। फिर सूरजमुखी की तरफ़ किसान मुड़े लेकिन फिर अचानक नब्बे के दशक में किसानों ने पटसन और इन सभी फ़सलों को एक तरफ़ रखकर मक्का को गले लगा लिया लेकिन अब चेत जाने का वक़्त आ गया है। बहुफ़सलों की तरफ़ हमें मुड़ना  होगा। पारम्परिक खेती के साथ साथ हम किसानी कर रहे लोगों को अब रिस्क उठाना होगा। खेतों के लिए नया गढ़ना होगा। कुल मिलाकर देश भर में हर किसान की एक ही तकलीफ है, वह नक़द के लिए भाग रहा है। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। सरकारें किसानों के लिए कई ऐलान करने में जुटी हैं, लेकिन साफ है, जमीन पर बड़े बदलाव नहीं हो रहे हैं। आइये हम सब मिलकर बदलाव करते हैं, कुछ अलग किसानी की दुनिया में भी करते हैं।

( प्रभात ख़बर के कुछ अलग स्तंभ में प्रकाशित- 3 मई 2016)