Friday, October 10, 2014

स्मृति की पोथी और चाय की प्याली

आज की सुबह चाय पर लिखने का मन कर रहा है। चाय पर लंबी बकैती करने का जी कर रहा है। वही चाय,  जो मेरी सखी है और जिसने मुझे दार्जिलिंग से प्यार करना सीखाया। जी हां, मैं लप्चू चाय की बात कर रहा हूं। मेरी स्मृति की पोथी इस चाह के बिना अधूरी है।


आज यह पोस्ट तैयार करते हुए 'चाह' (चाय) के बहाने जाने कितनी यादें मन के अहाते में दाखिल हो रही है, मैं खुद अचंभित हूं। वो पूर्णिया से सटे कसबा नामक छोटा सा इलाका, जहां के एक अनुशासित होस्टल में मैंने ए बी सी के संग क ख ग सीखा था,वो भी कतार में शामिल दिखा। वहां सुबह सुबह सात बजे चाह पीने मिलता था, संग में दो ब्रेड। यह हमारे लिए भोरका नाश्ता होता था। 

चाय के साथ पहली यारी की दास्तां कसबा के
 राणी सती विद्यापीठ के मैस से शुरु होती है
, जहां हमने एकदम शुरुआती तालीम ली। मसलन शब्द से परिचय, गणित से परिचय, सबकुछ समय से करना..आदि-आदि। लेकिन आज याद केवल उस स्टील के ग्लास की आ रही है, जिसमें हमें राणी सती विद्यापीठ के मैस में चाय मिला करता था, लप्चू चाह। बांकि सारी यादें फुर्र हो चली है।
चाह धीऱे-धीरे जिंदगी की किताब के हर पन्ने में शामिल होती चली गई। चाय की कभी तलाश नहीं हुई, चाय हमेशा से अपनी तलाश मुझमें करती रही, मानो मैं उसका प्रथम पाठक हूं, जो कवि की हर रचना पढ़ता है, कथाकार की हर कथा को बांचता है।

खैर
, दार्जिलिंग की चाय हमारी चाहत की चाह रही है, इसके अलावा गोल दाने वाली चाय को जैसे हमने हमेशा दूसरी नजर से देखा। आप कह सकते हैं दार्जिलिंग की पत्ते वाली चाह या फिर वहां की कोई भी डस्ट, मेरी सखी हो और गोलदाने वाली चाय, ऐसी पड़ोसी, जिसके प्रति कभी आसक्ति का भाव नहीं उपजा। 

चाय के साथ ऐसी ही यादें आज सुबह बिस्तर पर लेटे लेटे कुलाचें मार रही थी। पूर्णिया का विकास बाजार और भट्टा बाजार मेरी याद में हमेशा से चांद की माफिक रहा है। बाजार को हमने बाजार की नजर से वहीं देखा था और समझा भी था। चुपके से साइकिल से आवारगी का क-ख-ग हमने अपने शहर के इन्हीं दो बाजारों में सीखा है। साइकिल के पॉयडल पर जोर कम और दिल पर अधिक भी हमने वहीं सीखा।
 

पूर्णिया के विकास बाजार में देबू का एक दुकान है -आनंद जनरल स्टोर
, जहां लप्चू पक्का मिल जाता है। वहीं भट्टा बाजार में कुछ दुकान हैं, जहां के शोकेस में लप्चू के रंग-बिरंग के चाह डिब्बे सजे रहते हैं। उजला, हरा, गुलाबी..मटमैला ..ये सभी रंग के डिब्बे में अपनी लप्चू आराम फरमाती है। 

दिल्ली विश्वविद्यालय
 में आवारगी के दौरान भी दार्जिलिंग की चाह संग बनी रही। घर से महीने के खर्च के लिए आने वाले ड्राफ्ट के साथ कुरियर में लप्चू चाह भी होता था। हम कह उठते थे- आहा! जिंदगी। और जब दिल्ली-कानपुर में नौकरी के प्रपंच में मंच सजा रहे थे तब भी लोप्चू सखी बनी रही , ऐसी सखी जो हर दौर में साथ निभाने के लिए कटिबद्ध है। चाय सूफी संगीत के माफिक खींचती रही है, कबीर वाणी की तरह सुबह से लेकर रात तलक दृष्टि देती रही है।

अब देखिए न, आज जब लोप्चू का नया पैकेट खुला तो यादें मुझे कहां-कहां ले जाने लगी। सचमुच यादें कमीनी होती है, जिंदगी के पहले होस्टल की यादों में मुझे चाय की सुध रही, बांकि को जैसे मैंने उड़ा दिया हो, जबकि यादें तो यादें होती है, वो कैसे उड़ेगी...।

वैसे लप्चू के बहाने मेरी स्मृति की डयोढ़ी कभी खाली नहीं होगी क्योंकि चाय की चाह हमेशा बनी रहेगी। और जिस दिन ऐसा नहीं होगा उस दिन तो हम यही कहेंगे-  

 
बाबुल मोरा, नैहर छूटो ही जाए, चार कहार मिल  मोरी डोलिया सजावें, मोरा अपना बेगाना छुटो जाए, आँगना तो पर्बत भयो और देहरी भयी बिदेश, जे बाबुल घर आपना मैं पीया के देश... 

Wednesday, August 20, 2014

अंचल- प्रपंच और जमीन

अंचल में आने के बाद जिस शब्द से मैं अक्सर परेशान रहता हूं उसमें एक है जमीन। जिसे मैं कल तक धरती -भूमि या माटी कहता था उसे यहां आकर जमीन कहने लगा हूंशाम की शुरुआत में यह पोस्ट लिखते वक्त मुझे कॉलेज के दिनों में पढ़े एक बांग्ला उपन्यास भूमि पुत्र की याद आ रही है।

उपन्यास का नायक हमेशा भूमि के नशे में रहता था, आप सोच रहे होंगे कि ये कैसा नशा है? तो साहेबान भूमि का नशा किसी भी नशे से बढ़कर है। उपन्यास का नायक भूमि में ही रमा रहता था। अंचल में आने के बाद ही भूमिपुत्र की कथा वस्तु को समझ पाया हूं।


अंचल में कोसी प्रोजेक्ट के नहर पर ऊंचाई से खेतों में पसरे हरे-हरे धान को निहारते हुए कभी कभी मैं भी जमीन के मालिकाना हक की एबीसीडी पढ़ने की कोशिश करता हूं तो लगता है कि माया का फेर यही है और शायद जीवन जीने की ललक भी यही है।

सच कहूं तो मुझे जमीन की 
कथाएं भी नहर की भांति लगती है। कभी पानी तो कभी सूखा लेकिन जीने की आशा उसी पर टिकी रहती है। जमीन और नहर उस वक्त मेरे लिए एक समान लगने लगता है। मैं दोनों के हाव-भाव पढ़ने लगता हूं। मेरे जीवन में एक ऐसा भी वक्त था जब ऐसे रंगों से परहेज करता था लेकिन अब मैं उसी डफली में जीवन का राग आलापने लगा हूं

बाउंड्री
, अमीन, जमीन जैसे शब्द मुझे रंगरेज की तरह खींचने लगे हैं। सर्वे-सेटलमेंट-डिग्री.सिलिंग आदि शब्दों से ममत्व बढ़ गया है। दोस्त-यार कहते हैं कि अब मैं मायावी हो गया हूं। लेकिन सच कहूं तो इन सबके बीच भी मेरा मानुष बुदबुदाते रहता है- “ हर करम के कपड़े मैले हैं..... क्योंकि मन तो साफ नहीं रहा। जमीन कुछ सीखाए या सीखाए, प्रपंच तो जरुर सीखाता है। ऐसा मेरा मानना है।

मैं इस प्रपंच पर लंबी कथा बांच सकता हूं। ऐसी कथाएं अंचल में चलती रहती है। कबीराहा मठों पर भी इन कथाओं के नायक मुझे दिख जाते हैं।


पिछली बरसात कटिहार जिले के एक कबिराहा मठ पर बैठा था तो एक ने कहा कि जीवन के प्रपंच में कपड़े सफेद रह जाएं यह संभव नहीं है बरसात की उस दोपहर में भूमि पुत्र का नायक मेरे दिमाग में फिर चहलकदमी करने लगा था। हमने जान लिया कि अंचल के जीवन में प्रपंच ही मन रुपी कपड़े को मैला करताइन सबके फेर में मेरे लिए फायदे की बात यह रही है कि बचपन में गणित से डरने वाला छात्र जीवन में अब अर्थशास्त्र के संग डुबकी लगाने लगा है। J

खैर, अंचल में जिद की कथा ऐसे ही चलती है। मन जिद्दी होने चला है लेकिन मन पर लगाम कसने के लिए अभ्यास की जरुरत है। मेरा ध्यान गीता में छपे उस श्लोक पर टिक जाता है, जिसमें कृष्ण कहते हैं- मन चंचल बहुत है,पर मन को वैराग्य और अभ्यास से वश में किया जा सकता है।“ लेकिन सच कहूं तो मैं इन अभ्यासों से अभी दूर रहना चाहता हूं।

दरअसल
अंचल में पांव फैलाने के बाद मेरे हिस्से में जिद्दी मन भी आ टपका है मैं जिद को जीवन के अवयव की तरह देखना चाहता हूं। देखिए न यह लिखते वक्त उसके भीतर फिल्म गुलाल का यह गीत भी बज चला है-


 
चल तो तू पड़ा है,
  फासला बड़ा है, 
जान ले अंधेरे के सर पे खून चढा है
मुकाम खोज ले तू
मकान खोज ले तू

(जारी....  
पुनश्च:-  यह एक बनते किसान की डायरी है, हम इस डायरी को जारी रखेंगे और अनुभव साझा करते रहेंगे। )


Monday, July 14, 2014

फेसबुक के नाम...

पिछले एक महीने से खेत-पथार से लगभग दूर हूं। बाबूजी की तबियत खराब होने की वजह से अस्पताल और डाक्टर के संग जीवन को देख रहा हूं। ऐसे में दोपहर के खाली वक्त में फेसबुक से यारी और बढ़ गई है। कभी कभी लगता है कि फेसबुक ने मेरे मैं का विस्तार किया है। जैसे कबीर कहते हैं न-बिन धरती एक मंडल दीसे/बिन सरोवर जूँ पानी रे/गगन मंडलू में होए उजियाला/बोल गुरु-मुख बानी हो जी ठीक वही बात इंटरनेट के विभिन्न सोशल नेटवर्किंग चैनल मेरे लिए रहे हैं।

फेसबुक और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट्स मेरे लिए कबीर रच रहे हैं
, गुलजार बो रहे हैं और तो और, कुछ रेणु के बीज भी बो रहे हैं। ऐसे में मुझे यह दुनिया भी किसानी लगती है, मैं काश्तकार बन जाता हूं, जो मेरा मूल है।  


हमने कभी भी फेसबुक को आभासी नहीं माना, और न ही ख्वाब। दरअसल हम इसमें भी एक शहर बसाते हैं, एक मोहल्ला तैयार करते हैं। ऐसे लोगों से और करीब आते हैं, जिससे मन की बातें थोक के भाव में कर सकें, जिन्हें ड्राइंगरुम में बुलाकर अच्छी चाय पिला सकें.... सब अपने हैं यहां, कोई नहीं है पराया....।

जिले के पड़ोसी और संबंधी यहां और भी करीबी बन गए। कोई जब यह पूछता है कि आपने क्या कमाया तो मैं झटके से कह देता हूं- दोस्त कमाए हैं। आगे वाला सोचता है कि फेंक रहा है लेकिन एन वक्त पर अंदर का दोस्त साधो-साधो कह रहा होता है।
 
 
इन दिनों रूहानी अहसास होने लगा
 है, आत्मालाप की श्रेणी में यह पोस्ट लिखते वक्त मैं इस अहसास को लिख नहीं कर पा रहा हूं क्योंकि ऐसे वक्त पे मन बावरा हो जाता है। आप आवारा भी कह सकते हैं।

अक्सर फेसबुक पर कई लोग टकराते हैं। ऐसे अवसरों पर लगता है
, मानो यह कोई स्टेज हो, जहां हर दिन हर कोई सज-धज के आते हैं और अपने रोल को निभाकर निकल जाते हैं, अपने घर की ओर। और मैं, इन सबमें अपना रुप खोजने जुट जाता हूं। तभी पर्दे के पीछे से रवींद्र नाथ टैगोर के शब्द गूंजने लगते हैं-  विश्वरुपेर खेलाघरे/ कतई गेलेम खेले/ आपरूप के देखे गेलेम/दुटि नयन मेले../जाबार दिने.....( In the theater of this world, I played many games and assumed many roles, while doing so, "I" "saw" "me", with my own eyes...) 

जाते-जाते गुलजार को पढ़ लीजिए-
 
अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते/ जब कोइ तागा टूट गया या खत्म हुआ/फिर से बांध के/ और सिरा कोई जोड़ के उसमे/आगे बुनने लगते हो…..

Tuesday, July 08, 2014

बजट से पहले 'किसानी-गप्प'

यह वक्त नई सरकार के बजट का है तो दूसरी ओर मानसून के वक्त खेतों में डटे किसान के लिए यह वक्त धनरोपनी का है। एक किसान के लिए यह स्वर्णिम काल होता है।  समाचार चैनलों और अखबारों में किसानी के अलावा ढेर सारे मुद्दों पर चर्चा होती रहती है। ऐसे में मेरे जैसा किसान बजट से पहले किसानी की बात करना चाह रहा है।


मैं अपनी बात धनरोपनी के वक्त कादो से सने रोपनी करते लोगों के पैर से शुरु करना चाहता हूं। कादो से सने पांव ही किसान की ताकत है। धरती की महक और जल का मिश्रण किसान के मन को मजबूत करता है। धनरोपनी के वक्त खेत में खेती के संग गीत-नाद का भी माहौल बना रहता है। मेरे लिए यही अंचल की सांस्कृतिक विरासत है। 

खेती – बाड़ी का गप्प करें और मन में रेणु न आएं, ऐसा भला कभी हुआ है। तो दोस्तों अपनी कथाओं के जरिए जन-मानस को गांव से करीब लाने वाले लेखक फणीश्वर नाथ रेणु अक्सर कहते थे कि खेती करना कविता करना है, कहानी लिखना है..।

रेणु ने एक दफे कहा था, “एक एकड़ धरती में धान उपजाना, उपन्यास लिखने जैसा है...,लेखन का ही आनंद मिलेगा खेती करने में..”। साथ ही वे खेती को एक अलग नजरिए से लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- "आबरन देवे पटुआ,पेट भरन देवे धान। पूर्णिया के बसइया, रहै चदरवा तान।" 

ऐसे में ‘लिखने वाला’ यह सवाल पूछ रहा है कि क्या आप किसान हैं?  चलिए आपसे न पूछकर, सवाल करने वाला खुद से यह सवाल करता है, दरअसल किसानी पृष्ठभूमि में जिसका मानस तैयार हुआ है, वह भी ऐसे सवाल पर लंबी चुप्पी साध लेता है। हालांकि अभी भी किसानी की दुनिया में खुश्बू बरकरार है, बस हिंदुस्तानी समाज का नजरिया बदल गया है। 

रेणु, कोसी के जिस इलाके में पटुआ (जूट) की खेती से खुशहाल रहने वाले किसानी युग की चर्चा करते थे, अब वह युग बदल गया है। पटुआ के जगह पर पहले सूरजमुखी ने किसानों को खुशहाल बनाया, फिर मकई ने और अब वह जगह लकड़ी ले रहा है। इन सब उदाहरणों के संग खेती छोड़ने वाले लोगों का भी जिक्र जरुरी है।

आखिर ऐसी क्या वजह सामने आ गई बिहार के कोसी इलाके के तथाकथित बड़े किसानों का खेती से मोह भंग हो गया? यह एक बड़ा सवाल है और इसी के आसपास ‘क्या आप किसान हैं’ जैसा सवाल उठ खड़ा हुआ है।  


क्या आप किसान हैं?  के सकारात्मक जवाब के लिए किसानी के अंदाज को पेशेवर ढंग से पेश करने की भी जरुरत है। ऐसी बात नहीं है कि धान, गेंहू या अन्य किसी नकदी फसल के बदौलत एक परिवार का भरन पोसन नहीं हो सकता है। बस किसानी का अंदाज बदलना होगा।

दरअसल, इस सवाल के बीच में दो तरह के लोग ‘अतृप्त’ हुए खड़े हैं। एक ऐसे किसान, जिनके पास जमीन है और जो पहले खुट्टा गाड़कर गांव में जमे रहते थे और उसी के संग लोग काम करते थे और दूसरे ऐसे  लोग जो बड़े किसानों के यहां खेती स जुड़े काम करते आए हैं। 

 (कृप्या इन अतृप्त जमात के बीच हम-आप भूमि-वितरण को न खड़ा करें क्योंकि राजनीति करने वाले इसका हल कभी नहीं निकालेंगे क्योंकि वे पिछले कई दशकों से इसी की बदौलत अपनी दुकान चला रहे हैं। हमें खुद इसका हल निकालना होगा, सकारात्मक तरीके से।)

अब सवाल उठता है कि फिर ऐसी तस्वीर कैसे उभर गई कि दोनों जमात गांव से दूर हो गए। ऐसे में यह भी सवाल लाजमी है कि क्या उन इलाकों में अब खेती ही नहीं हो रही है? क्योंकि जमीन वाले, काम करने वाले हैं ही नहीं।

 दरअसल इन सबके संग एक दूसरी तस्वीर भी तैयार हुई, वह पलायन के भीतर पलायन का है। गांव से पलायन का रुख शहर का रास्ता तय करता है लेकिन यह भी जानने की जरुरत है कि एक पलायन का रास्ता गांव से गांव का भी है। ये ऐसे लोग होते हैं, जो नकदी फसल के लिए एक ही जिले के दूसरे गांव का रुख करते हैं।

कोसी के अधिकांश इलाकों में पलायन का यह रुप सबसे अधिक देखा जा रहा है। मेहनतकश लोगों की बड़ी जमात पहले पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि जगहों से मेहनत कर आते हैं, कुछ पूंजी जमा करते हैं और फिर उन किसानों के संपर्क में आते हैं, जो अब शहर का रास्ता अपना चुके हैं।

 यहीं आकर खेती एक कांट्रेक्ट का रुप अख्तियार करती है। ये मेहनतकश प्रवासी किसान अधिक भूमि वाले किसानों के खेतों को ठेके पर लेते हैं और शुरु होती है नकदी फसल की एक नई फिल्म, जिसमें फसल के लिए नकद का प्रावधान है। इस फिल्म का नायक एक प्रवासी किसान होता है,जिसमें परिस्थितियों के संग कदम मिलाने की ताकत होती है।

किसानी की नई परिभाषा गढ़ते इन लोगों को करीब से समझने की जरुरत है। इसमें प्रवासियों की मनोस्थिति को भी जानना होगा। समाजशास्त्र के अध्येताओं को इस पर नजर डालने की जरुरत है।

 मीडिया को इस ओर देखना होगा,ताकि एक बड़े तबके का किसानी व्यवस्था से मोह भंग न हो और जब यह सवाल कोई पूछे कि “क्या आप किसान हैं? ” तो जवाब सकारात्मक ही आए, इसकी गारंटी मिले।

Monday, June 30, 2014

कहे किसको तू मेरा, मुसाफ़िर ! जाएगा कहाँ ?

जीवन एक कहानी है। कहानी में सुख भी है और दुख भी। सुख को भी जीना है और दुख को भी समेटना है। मेरी कहानी अभी दुख का पाठ पढ़ा रही है। जीवन में यह भी देखना होगा, हमने कभी सोचा नहीं था। बाबूजी की तबियत अचानक खराब होती है और हम एक ही झटके में टूट जाते हैं। डाक्टर ने कहा कि बाबूजी को ब्रेन हेमरेज हुआ है और हमारी जिंदगी अस्पताल के आईसीयू में सिमट जाती है। जीवन में अक्सर अचानक ही सबकुछ होता है।

जीवन के इस पड़ाव पर मुझे बहुत कुछ नया अनुभव हो रहा है। यह अनुभव मुझे कबीर की उस वाणी की ओर खींच रही है, जिसमें वे कहते हैं- अनुभव गावै सो गीता। लोगबाग को समझ रहा हूं, उस मुहावरे को समझ रहा हूं, जिसमें कहा गया है कि लोग उगते सूरज को ही सलाम करते हैं.....। भंवर में साथ बहुत कम लोग साथ देते हैं। मैं उस भंवर में भी जमीन तलाश रहा हूं। धूमिल की वह पंक्ति बार-बार दोहराता हूं, जिसमें वो कहते हैं-  हम अपने सम्बन्धों में इस तरह पिट चुके हैं , जैसे एक ग़लत मात्रा ने शब्दों को पीट दिया है ।

सब बातों को जानकर भी मन का तार टूटता जा रहा है। दरअसल अज्ञात को नहीं देख पाने की वजह से हमारा मन विचलित होने लगता है। सच कहूं तो इस वक्त ज्ञान की भाषा मुझे कड़वी लग रही है। अज्ञानी बने रहने की कला सिखना चाहता हूं। वैसे यह जान रहा हूं कि ऐसे वक्त में खुद का सहारा ही हमें मजबूत रखता है। बचपन में हम रोते थे लेकिन जैसे जैसे हम बड़े होते जाते हैं रोने की आदत भी जाने लगती है। आंख के जरिए मन को साफ करने की वह कला भी हम भूल जाते हैं। कई बार लगता है कि यदि हम रो देते हैं तो मन हल्का हो जाता है लेकिन मन को कौन समझाए ...मन की सीमा रेखा भी अब टूटने से रही।

देखिए न ये सब लिखते हुए ऐसा लग रहा है जैसे मन को मैं समझा रहा हूं, उसे भरम में रखने की कोशिश कर रहा हूं लेकिन सच से भला कौन मुंह मोड़ सका है। जीवन का गणित जटिल होकर भी सरल होता है। जोड़-तोड़, गुणा भाग से नाता बनता जाता है और हम समझने लगते हैं कि अब हम ज्ञानी हो गए हैं। कॉलेज के दिनों में गीतों से अद्भूत लगाव हुआ था। जीवन के हर मोड़ को गीतों के जरिए समझने की कोशिश करता था, वह दौर अलग था। आज देखिए न, फिर से फिल्म गाइड का वह गीत सुनने को जी कर रहा है, जिसमें भरम की व्याख्या की गई है- कहते हैं ज्ञानीदुनिया है फ़ानीपानी पे लिखी लिखाईहै सबकी देखी, है सबकी जानी/ हाथ किसी के ना आई………

इन सबके बीच मेघ में बादल मंडरा रहे हैं, बारिश की उम्मीद है। किसानी करते हुए बादलों से अजीब तरह का लगाव हो गया है। बादलों को समझने बुझने लगा हूं। धान रोपनी के वक्त खेत से दूर हूं, बाबूजी को  देख रहा हूं, जिसने जीवन भर खेत से इश्क किया, खेत को जीवन समझा और जीवन को खुशहाल भी खेत से ही बनाया लेकिन आज वो बिस्तर पर लेटे हैं खेत से दूर। शायद यही जीवन है और सत्य भी। मैं फिर गीत के बोल मे खोने लगा हूं और इस पल चुप-चाप टाइप करने लगा हूं-

“…दर्द से तेरे कोई न तड़पा
आँख किसी की न रोई...
कहे किसको तू मेरा, मुसाफ़िर ! 
जाएगा कहाँ ?......” 

Sunday, June 22, 2014

बाबूजी की आंखें

अब लिखा नहीं जाता है,
दिन और रात बस अब
खोना अच्छा लगता है
जबसे बाबूजी को अस्पताल से घर लाया हूं
लगता है
लिखना और जीना दोनों ही
बहुत अलग चीज है
जो लिख देते हैं
वो सच में
बड़ी खूबसूरत दुनिया देखते हैं
और जो लिख नहीं पाते
वो देखते हैं...भोगते हैं
जीवन के उतार-चढाव को
आज जाने कितने दिनों बाद
जब कुछ लिखने का मन किया तो
मुक्तिबोध याद आए
रविवार की इस तपती दुपहरी में
उनकी कविता याद आई
बिस्तर पर लेटे
टूक-टूक देख रहे बाबूजी
और बाबूजी की दो आंखें
आंखों में आंसू .....
पिछले साल ही उनकी आंखों में
लगी थी दो लैंस..
दिल्ली की किसी अस्पताल में
आशा के साथ कि
अब आंखों में आंसू नहीं आएंगे
पर किसको पता था कि
आंखों में आंसू आना तो
नियम है जीवन का
दुख और सुख का व्याकरण
सचमुच में बड़ा जटील है
अब जान गया कि जीवन एक
लंबी कविता है
जिसमें कहानी भी है
उपन्यास भी...
मेरे लिए फिलहाल
जीवन की कहानी अमीर खुसरो की वह लाईन है
जिसमें वे कहते हैं- बहुत कठिन है डगर पनघट की.....

Saturday, May 31, 2014

इस मोड़ से जाते है, कुछ सुस्त कदम रस्ते...

लंबे अंतराल के बाद आज लिखने बैठा हूं। वक्त इतनी तेज रफ्तार से बढ़ रहा है कि अंतराल का अहसास भी नहीं होता है। व्यस्तता दिन पर दिन बढ़ती चली जा रही है और इन व्यस्तताओं के बीच जाने कितना कुछ नया सीखने को भी मिल रहा है।

मुल्क में हुए आमचुनाव के बाद बहुतों के लिए बहुत कुछ बदल गया है तो बहुतों के लिए सबकुछ वैसा ही है जैसा पहले था। ऐसा लिखते हुए लगता है मानो दर्शन की बातें करना लगा हूं लेकिन सत्य से भला कौन पीछे हटा है और कौन हटने की हिम्मत करेगा।

सत्य को स्वीकारना भी साहस का काम है, ऐसा साहस सबके नसीब में कहां। गाम के मुसहर टोले में शाम ढलते ही लोगबाग के जीवन को देखता हूं तो उस साहस का अहसास होने लगता है। जिसके पास कुछ भी नहीं है, उससे जीवन से आनंद हासिल करने का पाठ पढ़ने को मिले तो लगता है अरे, हम तो नाहक ही परेशान थे अबतक। ये सबकुछ तो माया है।

कबीर का लिखा मन में बजने लगता है- “माया महाठगिनी हम जानी ..निरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी.....” ठीक उसी पल मन के रास्ते पंडित कुमार गंधर्व की भी आवाज भी कानों में गूंज लगती है- “भक्तन के भक्ति व्है बैठी, ब्रह्मा के बह्मानी…..कहै कबीर सुनो भाई साधो, वह सब अकथ कहानी”

कभी कभी लगता है क्या जीवन में कोई कथा संपूर्ण हो पाती है..। इस दौरान मुझे जीवन आंधी के माफिक लगने लगती है, सबकुछ उड़ता नजर आने लगता है। गाम के रामठाकुर स्थान से हारमोनियम की आवाज मध्यम गति से कानों तक पहुंचने लगती है। मैं अपने कमरे में बैठा की-बोर्ड पर खिटिर-पिटिर करने लगता हूं। सबकुछ अनायास ही होने लगता है।

एक अनुभूति होती है, किसी के होने का अहसास होता है। तब पता चलता है कि यह तो अपने होने का अहसास है। प्रसून जोशी का लिखा याद आने लगता है, जिसमें वे कहते हैं- "जब तेरी गली आया, सच तभी नज़र आया, मुझ में ही वो खुशबू थी, जिससे तूने मिलवाया...”

गाम में एक दिन किसी से बात हो रही थी तो उसके भीतर का भय मुझे सामने दिखने लगा। वह भय मौत को लेकर थी। मौत शायद सबसे बड़ी पहेली है, हम-सब उस पहेली के मोहरे हैं। जब गाम का पलटन ऋषि मौत और भय की बातें कर रहा था तो मुझे फ़िल्म 'आनंद' में कैंसर से जूझ रहे राजेश खन्ना और फिल्म में डाक्टर का किरदार निभा रहे अमिताभ बच्चन का संवाद याद आने लगता है, जिसमें राजेश खन्ना कहते हैं, "मौत तो एक पल है. मैं उस एक पल के डर से आने वाले लाखों पल का लुत्फ़ क्यों ना उठाऊं. जब तक ज़िंदा हूं, मरा नहीं. जब मर गया, तो साला मैं ही नहीं."

आज की रात लोक-परलोक की ऐसी कई बातें करने का मन कर रहा है। जीवन की राह पर हर राहगीर से बातें करने का मन कर रहा है। नदीम कासमी की बात याद आ रही है- रात भारी सही कटेगी जरुर, दिन कड़ा था मगर गुजर के रहा...। गुलजार भी याद आने लगे हैं ..उनका लिखा मन में गूंजने लगा है- 
"एक राह अकेली सी, रुकती हैं ना चलती है
ये सोच के बैठी हूँ, एक राह तो वो होगी
तुम तक जो पहुचती है
इस मोड़ से जाते है.. .."