20 May, 2008

सम्राट अशोक से अपनी तुलना कर बैठे प्रचंड


हाल ही में हुए संविधान सभा के चुनावों में सबसे बड़े दल के रूप में उभरे नेपाली माओवादियों के नेता पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड ने महान भारतीय सम्राट अशोक से अपनी तुलना की है। अशोक बाद में बौद्ध धर्म के उपासक बन गए थे।


भगवान बुद्ध के 2,552 जन्मदिवस पर उनकी जन्म स्थली लुंबनी में हुई एक शांति बैठक में प्रचंड ने कहा कि यहां पहली बार आकर उन्हें महान सम्राट अशोक जैसा महसूस हो रहा है, जो कभी युद्धप्रिय थे लेकिन एक युद्ध के दौरान हुई मौतों ने उन्हें इसकी व्यर्थता का अहसास करा दिया था।


उन्होंने कहा कि शांति के दूत गौतमबुद्ध के जन्म स्थान पर आकर वह भी अशोक जैसा महसूस कर रहे हैं।प्रचंड ने कहा, "मुझे लगता है हथियारों की कोई आवश्यकता नहीं है।"उन्होंने कहा, "हमारी पार्टी बहुत ही शांतिप्रिय पार्टी है। लगभग 2,500 साल पहले बुद्ध ने शांति का संदेश फैलाया था। अब 2,500 साल बाद नेपाल में एक बार फिर शांति का संदेश फैलाया जाएगा।"


गौरतलब है कि नेपाल में 10 अप्रैल को हुए संविधानसभा के चुनावों में प्रचंड के नेतृत्व वाली पार्टी बहुमत में आई है। प्रचंड किसी धर्म को नहीं मानते, लेकिन सभी धर्मो में उनकी आस्था है।

18 May, 2008

पूर्णिया में छात्रा बनीं स्वीपर, छात्र बने गेटकीपर

बिहार के पूर्णिया जिला की एक यह भी है तस्वीर -

(मेरे एक मित्र ने पूर्णिया से यह पाती भेजी है )


सरकार एक ओर बालिकाओं में शिक्षा की अलख जलाने के लिये साइकिल वितरण व पोशाक वितरण योजना की शुरूआत कर रही है। पूर्णिया में ऐसे भी स्कूल है जहां छात्राओं के हाथों में झाड़ू थमा देते है।

किसी के आने पर छात्र ही कक्षा छोड़ कर गेट का ताला खोलने जाते है। जिलाधिकारी ने कहा मामले का करते है पता, जबकि डीएसई ने कहा कि प्रधानाचार्य से पूछेगे क्या है वास्तविकता।
शहर के हृदयस्थली भट्ठा बाजार स्थित प्राथमिक विद्यालय के प्रधानाचार्य छात्राओं से ही स्कूल परिसर में झाड़ू दिलाने का काम लेते है। किसी के आने पर छात्र ही स्कूल का गेट खोलते है। बच्चों के अभिभावक बेटियों को शिक्षा ग्रहण के लिये भेजते है, और स्कूली प्रबंधन उन्हे स्वीपर बना देते है।

विद्यालय के प्रधानाचार्य सह बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघ के उपाध्यक्ष कृष्णानंद सिंह कहते है कि स्कूल में आदेशपाल है ही नहीं। ऐसे में छात्र अगर झाड़ू लगाने का काम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। विभाग की ओर से आदेशपाल स्कूल को नहीं दिये गये है। सफाई का ध्यान तो रखना ही है।

उन्होंने यह भी कहा कि सफाई पढ़ाई का ही एक विषय समान है। एक विषय समझ कर छात्रों से स्कूल परिसर में सरेआम झाड़ू दिलाने का काम लिया जाना शायद स्कूल प्रबंधन की मजबूरी बनी हुयी है। मध्य विद्यालय में आदेशपाल नहीं होने के कारण उनके पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं है।

कक्षा के बीच में ही अगर कोई स्कूल में आता है तो छात्र को ही चाभी लेकर गेट खोलने को भेजा जाता है। प्रधानाचार्य की अगर मानें तो शायद यह भी छात्रों के विषय का एक हिस्सा होगा।

15 May, 2008

मानवता का एक और चेहरा


जयपुर- एक स्वयंसेवी संगठन से जुड़ी ब्रितानी नवयुवती ईस्थर शायलर इन दिनों जयपुर में बम धमाकों से पीड़ित लोगों की सेवा करने में जी जान से जुटी हुई है।


शायलर सितंबर में आपदाओं से निबटने और ग्रामीण विकास के लिए काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन 'आरईडीआर' (रजिस्टर आफ इंजिनियर्स फार डिसास्टर रिलीफ) के साथ काम करने के लिए भारत आई थी।जयपुर में मंगलवार की शाम हुए धमाकों की खबर मिलते ही वह सवाई मानसिंह अस्पताल पहुंची और घायलों की मदद में जुट गई।


शायलर ने कहा, "मैंने इजरायल में लंबे समय तक आपातकालीन सेवा में काम किया है। मैं इस तरह की परिस्थितियों का सामना करने की अभ्यस्त हूं। मुझे मानवता के हित में काम करना अच्छा लगता है।"


बर्मिघम की रहने वाली शायलर कहती है मुझे भारत बहुत पसंद है और राजस्थान तो और भी ज्यादा। उसने यहां आने वाले पर्यटकों को सलाह दी कि वो किसी भी परिस्थिति के लिए तैयार होकर आएं। शायलर ने कहा कि यहां आपको अच्छे से अच्छे और बुरे से बुरे अनुभव हो सकते हैं लेकिन ऐसा किसी भी देश में हो सकता है।

12 May, 2008

कैंसर को समर्पित ब्लॉग 'इंद्रधनुष'



हिंदी ब्लॉग की दुनिया में साहित्य, सिनेमा, राजनीति, संगीत आदि पर तो कई ब्लॉग मौजूद हैं और सक्रिय रूप से काम भी कर रहे हैं, लेकिन स्वास्थ्य संबंधी जानकारियों को समेटे ब्लॉग की संख्या काफी कम है। हाल ही में हिंदी ब्लॉग जगत में कैंसर के बारे में जागरूकता फैलाने के उदेश्य से 'इंद्रधनुष' नामक ब्लॉग का प्रवेश हुआ है।

यह ब्लॉग कई मायनों में अन्य ब्लॉगों से अलग है। कैंसर से जुड़ी जानकारियों से लेकर इससे जुड़ी गलत अवधारणाओं के बारे में भी यहां जानकारियां दी जा रही हैं। जहां ब्लॉग का नाम 'इंद्रधनुष' रखा गया है, वहीं इसका परिचय इस प्रकार दिया गया है- "यह ब्लॉग उन सबका है जिनकी जिंदगियों या दिलों के किसी न किसी कोने को कैंसर ने छुआ है।"



ब्लॉग में कैंसर से जुड़े तमाम पक्षों पर विशेष रूप से प्रकाश डाला गया है। मसलन कैंसर के बारे में लोगों में कितनी सारी गलतफहमियां फैली हुई हैं। ब्लॉग के एक पोस्ट में लिखा गया है कि कैंसर का नाम सुनकर आम तौर पर लोगों के मन में तरह-तरह के ख्याल आते हैं। ज्यादातर लोग इसे जान लेने वाली, कष्टदायक, खर्चीले और लंबे इलाज वाली बीमारी के रूप में जानते हैं। ब्लॉग में कहा गया है कि समाज में इस बीमारी के बारे में जानकारी का स्तर काफी कम है।



इस ब्लॉग को शुरू करने वाली आर. अनुराधा कैंसर को लेकर एक पुस्तक भी लिख चुकी हैं। 'इंद्रधनुष के पीछे-पीछे- एक कैंसर विजेता की डॉयरी'। पुस्तक की तरह इस ब्लॉग में भी अनुराधा इस बीमारी से जुड़े तमाम पक्षों पर रोशनी डालने में जुटी हुई हैं। 'कैंसर क्या नहीं है' नामक एक पोस्ट में अनुराधा ने इस बीमारी से जुड़ी गलतफहमियों पर महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं। स्तन कैंसर से जुड़ी गलत अवधारणाओं को लेकर उन्होंने कई बातों पर प्रकाश डाला है।



अनुराधा अपने पहले पोस्ट 'शुरुआत से पहले' में कहती हैं, "उम्मीदों के इस इंद्रधनुष के पीछे चलते जाना होता है, सभी को। इसके हल्के-गहरे, धुंधले-उजले, छुपते खिलते रंगों में कोई अंधियारा रंग किसी वक्त आपको ढक लेता है तो कोई आपके सामने अड़ जाता है बेमानी जिद सा।"

10 May, 2008

मशहूर गायक पंडित फिरोज दस्तूर नहीं रहे






मशहूर गायक और किराना घराने से ताल्लुक रखने वाले मशहूर गायक पंडित फिरोज दस्तूर का लंबी बीमारी के बाद शुक्रवार रात निधन हो गया। वह 89 वर्ष के थे। दस्तूर एक साल से अधिक समय से बीमार थे।




पंडित दस्तूर ने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत और अपनी मधुर आवाज के साथ लगभग छह दशक तक भारत और विदेशी दर्शकों के दिलों पर राज किया। दस्तूर सवाई गंधर्व के वरिष्ठ शिष्यों में से एक थे और घराने के महान अनुयायी थे।



उन्होंने अपने जीवन में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, तानसेन पुरस्कार, दक्षिणी गुजरात विश्वविद्यालय से मानद उपाधि तथा महाराष्ट्र राज्य गौरव जैसे बहुत से पुरस्कार प्राप्त किए। उन्होंने कई फिल्मों में बाल अभिनेता के रूप में भी काम किया लेकिन बाद में वह पूरी तरह शास्त्रीय संगीत से जुड़ गए।

09 May, 2008

मैं असभ्य हूं क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूं

भवानीप्रसाद मिश्र की यह कविता आज पेश है, सचमुच कभी न कभी हर कोई चाहता होगा चोंगा उठा कर फेंकना ......आईये आज भवानीप्रसाद मिश्र के संग सत्य स्वीकारें।


मैं असभ्य हूं क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि चीर कर धरती धान उगाता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूं
आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर
आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर
आप सभ्य हैं क्योंकि धान से भरी आपकी कोठी
आप सभ्य हैं क्योंकि ज़ोर से पढ़ पाते हैं पोथी
आप सभ्य हैं क्योंकि आपके कपड़े स्वयं बने हैं
आप सभ्य हैं क्योंकि जबड़े खून सने हैं
आप बड़े चिंतित हैं मेरे पिछड़ेपन के मारे
आप सोचते हैं कि सीखता यह भी ढंग हमारे
मैं उतारना नहीं चाहता जाहिल अपने बाने
धोती-कुरता बहुत ज़ोर से लिपटाए हूं याने!

06 May, 2008

सो गए महाराज, अब नहीं पड़ेगी तबले पर थाप

ऊं जैसी उपस्थिति से संगीत की महफिल लूट लेने वाले पंडित किशन महाराज विश्व पटल पर तबले को एक शानदार मुकाम और शोहरत दिलाने में अपने योगदान के लिए हमेशा याद किए जाएंगे। सन 1923 में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन बाबा विश्वनाथ की जिस काशी नगरी में किशन महाराज जन्मे थे उसी काशी में 4मार्च,2008 को सोमवती अमावस्या के दिन वे और उनके तबले की थाप हमेशा के लिए खामोश हो गई।


तबले के कुल छ: घरानों में बनारस घराना सबसे युवा घराना है। पिछले सौ सालों के इतिहास में पंडित भैरव सहाय, उस्ताद आबिद हुसैन खान, उस्ताद अजीम खान, अहमद जान थिरकवा, पंडित कंठे महाराज, पंडित अनोखे लाल और पंडित शामता प्रसाद के बाद किशन महाराज संगीत के आकाश के सप्त-ऋषियों के बीच वशिष्ठ के रूप में माने जाते थे।

इन सभी महान तबला वादकों की फेहरिस्त में पंडित किशन महाराज सम्पूर्ण तबला वादक के रूप में उभर कर सामने आए। पिता पंडित हरि महाराज के निधन के बाद उनके धर्मपिता और ताऊ पंडित कंठे महाराज ने उन्हें गोद ले लिया। मात्र ग्यारह वर्ष की आयु से ही उन्होंने तबले पर थाप देना शुरू कर दिया था। बचपन से शुरू हुआ पंडित जी का तबले के साथ शास्त्रीय संगीत का सफर अंत समय तक अनवरत जारी रहा।

जानीमानी शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल कहती हैं,'महाराज जी एक सिद्ध पुरुष थे।' तबला वादक के रूप में पंडित किशन महाराज शास्त्रीय संगीत की दुनिया के बेताज बादशाह तो थे ही साथ ही उनकी रूचि अन्य चीजों में भी उतनी ही थी। घोड़े वाली बग्घी और टमटम की सवारी, निशानेबाजी और मृदंग जैसे शौक भी किशन महाराज के जीवन के अभिन्न अंग रहे। वयोवृद्ध शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी बताती हैं कि पंडित जी तबले के विद्वान तो थे ही साथ ही मूर्ति कला और चित्रकला में भी पारंगत थे।

किशन महाराज ने अपने जीवन काल में कई नामचीन कलाकारों जैसे पंडित रविशंकर, उस्ताद अमजद अली खान, वी।जी जोग, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के साथ न सिर्फ संगत की बल्कि भविष्य के उदीयमान कलाकारों के साथ भी संगत करके उनका उत्साहवर्धन किया। संगीत में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री (1973), पद्म विभूषण (2002) और उस्ताद हाफिज अली खान अवार्ड (1986), संगीत नाटक अकादमी अवार्ड (1984) से नवाजा गया।पंडित जी के साथ संगत करने वाले कलाकार उनके सान्निध्य मात्र से ही अभिभूत रहते थे। उनके सान्निध्य को करीब से महसूस करने वाले प्रख्यात शास्त्रीय गायक राजन- साजन मिश्र कहते हैं कि उनका स्वतंत्र तबला वादक अलग-अलग अनुभूतियां दे जाता था,तो गायिका सोमा घोष का मानना है कि महाराज जी जैसी महारत वाला कोई तबला वादक दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता है।