Tuesday, May 03, 2016

रेणु के गाँव में मूंगफली

खेती -बाड़ी करते हुए अक्सर अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु के गाँव आना - जाना लगा रहता है। वहाँ जाना मेरे लिए हमेशा से सुखद रहा है। हर बार वहाँ से लौटकर कुछ नया 'मन' में लाता आया हूं। पिछले शनिवार की बात है, राजकमल प्रकाशन समूह के सम्पादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम चनका आए थे, दिन भर के लिए।  उन्हीं के संग रेणु के 'गाम-घर' जाना हुआ।

किताबों और लेखकों के दुनिया में रमे रहने वाले निरूपम भाई से जब गाँव में मुलाक़ात हुई तो उनका एक अलग ही मन पढ़ने को मिला। उनके भीतर किसान का मन भी है, यह मुझे अबतक पता नहीं था। रेणु का लिखा पढ़ता हूं तो पता चलता है कि वे अक्सर किताबों की दुनिया में रमे रहने वालों को अपने खेतों में घुमाते थे। उन्होंने एक संस्मरण  लिखा है- "कई बार चाहा कि, त्रिलोचन से पूछूँ- आप कभी पूर्णिया जिला की ओर किसी भी हैसियत से, किसी कबिराहा-मठ पर गये हैं? किन्तु पूछकर इस भरम को दूर नहीं करना चाहता हूं। इसलिए, जब त्रिलोचन से मिलता हूं, हाथ जोड़कर, मन ही मन कहता हूं- "सा-हे-ब ! बं-द-गी !!"

सच कहिए तो इस किसान की भी इच्छा रहती है कि कोई गाम आए तो उसे पहले खेतों में घुमाया जाए। उस व्यक्ति से कुछ सीखा जाए। कबीर की वाणी है-'अनुभव गावे सो गीता'।

ख़ैर, प्रचंड गरमी में निरूपम भाई चनका के मक्का के खेतों में टहलते हुए थके नहीं बल्कि मुझे समझाने लगे कि मक्का के अलावा और क्या क्या हो सकता है। कोसी का इलाक़ा जिसे मक्का  का 'हब' कहा जाता है वहाँ का किसानी समाज अब फ़सल चक्र को छोड़ने लगा है, मतलब दाल आदि की अब खेती नहीं के बराबर होती है, ऐसे में एक ही फ़सल पर सब आश्रित हो चुके हैं। हालाँकि मक्का से नक़द आता है लेकिन माटी ख़राब होती जा रही है। इस बात को लेकर निरूपम भाई चिंतित नज़र आए।

तय कार्यक्रम के मुताबिक़ मैं और चिन्मयानन्द उन्हें लेकर रेणु के गाँव औराही हिंगना निकल पड़े। रास्ते भर सड़क के दोनों किनारे खेतों में केवल मक्का ही दिखा। रेणु के घर के समीप एक खेत दिखा, जिसे देखकर लगा मानो किसी ने हरी चादर बिछा दी हो खेत में। मेरे मन में रेणु बजने लगे- ' आवरन देवे पटुआ , पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैया रहे चदरवा तान' ! मेरे मन में रेणु बज ही रहे थे कि निरूपम भाई ने कहा ' यह जो आप देख रहे हैं न , मैं खेती की इसी शैली की बात करना चाहता हूं'।  अब तक परेशान दिख रहे निरूपम भाई के चेहरे की रौनक़ लौट आई। दरअसल खेत में मूँगफली की फ़सल थी, एकदम हरे चादर के माफ़िक़। साठ के दशक में रेणु की लिखी एक बात याद आ गयी जिसमें वे धान के अलावा गेहूँ की खेती कहानी के अन्दाज़  सुनाते हैं। बाबूजी कहते थे कि रेणु गेहूँ के खेत को पेंटिंग की तरह शब्दों में ढ़ालकर हम सभी के मन में बस गए।

दरअसल खेती को लेकर निरूपम भाई की चिंता को सार्वजनिक करने की ज़रूरत है क्योंकि यदि अलग ढंग से खेती करनी है तो हम किसानी समुदाय के लोगों को सामान्य किसानी से हट कर बहुफसली, नकदी और स्थायी फसलों के चक्र को अपनाना होगा। सच कहिए तो निरूपम भाई के आने की वजह से रेणु के गाँव में मूँगफली की खेती देखकर मन मज़बूत हुआ कुछ अलग करने के लिए।

ग़ौरतलब है कि तिलहन फसलों में मूँगफली का मुख्य स्थान है । इसे जहाँ तिलहन फसलों का राजा कहा जाता है वहीं इसे गरीबों के बादाम की संज्ञा भी दी गई है। इसके दाने में लगभग 45-55 प्रतिशत तेल(वसा) पाया जाता है जिसका उपयोग खाद्य पदार्थो के रूप में किया जाता है। इसके तेल में लगभग 82 प्रतिशत तरल, चिकनाई वाले ओलिक तथा लिनोलिइक अम्ल पाये जाते हैं। तेल का उपयोग मुख्य रूप से वानस्पतिक घी व साबुन बनाने में किया जाता है। इसके अलावा मूँगफली के तेल का उपयोग क्रीम आदि के निर्माण में किया जाता है।

पहले कभी इस इलाक़े में रेत वाली मिट्टी में मूँगफली उगाया जाता था। फिर सूरजमुखी की तरफ़ किसान मुड़े लेकिन फिर अचानक नब्बे के दशक में किसानों ने पटसन और इन सभी फ़सलों को एक तरफ़ रखकर मक्का को गले लगा लिया लेकिन अब चेत जाने का वक़्त आ गया है। बहुफ़सलों की तरफ़ हमें मुड़ना  होगा। पारम्परिक खेती के साथ साथ हम किसानी कर रहे लोगों को अब रिस्क उठाना होगा। खेतों के लिए नया गढ़ना होगा। कुल मिलाकर देश भर में हर किसान की एक ही तकलीफ है, वह नक़द के लिए भाग रहा है। घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा है। सरकारें किसानों के लिए कई ऐलान करने में जुटी हैं, लेकिन साफ है, जमीन पर बड़े बदलाव नहीं हो रहे हैं। आइये हम सब मिलकर बदलाव करते हैं, कुछ अलग किसानी की दुनिया में भी करते हैं।

( प्रभात ख़बर के कुछ अलग स्तंभ में प्रकाशित- 3 मई 2016)

Tuesday, April 26, 2016

पछिया हवा और पुराना पोखर

पिछले एक हफ़्ते से गाँव में पछिया हवा का ज़ोर है। लोगबाग सहमे हैं क्योंकि आगज़नी की घटना सबसे अधिक इसी हवा के ज़ोर में होती है। उधर, पछिया हवा का प्रभाव गाँव के पुराने पोखर में भी देखने को मिल रहा है। एक तरफ़ सूरज का प्रचंड ताप तो दूसरी ओर तेज़ हवा।   ऐसे मौसम में जल स्तर नीचे गिर जाता है   और पोखर सूख जाता है।

पछिया हवा की वजह से पानी के बाद अब पोखर का कीचड़ भी सूखने के कगार पर है। कीचड़ों पर दूब उग आए हैं। प्यासी -भूखी वनमुर्गी  झुंड बनाकर दूब के आसपास मँडराती रहती है। प्रचंड धूप में भी इन चिड़ियों को देखकर लगता है कि हम कितने आलसी हो गए हैं। हम सब धूप से डरने लगे हैं और धूप में निकलते भी हैं तो 'सनस्क्रीन क्रीम' लगाकर, जबकि यह तो प्रकृति के व्याकरण का हिस्सा है, इसे स्वीकार करना चाहिए, संघर्ष करना चाहिए।

ख़ैर, दूसरी ओर पोखर के पूरब के खेत में पटवन के बाद जमा पानी में कीड़ों को ढूँढने के लिए बगूले आए हुए हैं। दो दिनों से लगातार मक्का के खेतों में पटवन हो रहा है। दरअसल नहर में पानी आता नहीं है तो ऐसे में किसानी समाज पम्पसेट पर निर्भर हो चुका है।

खेत में पटवन के कारण आए बगूले पोखर में भी ताका-झाँकी कर लेते हैं। पोखर के आसपास जंगली बतकों के बच्चे 'पैक-पैक' करती हुई चक्कर मार रही है। सिल्ली चिड़ियाँ तो पोखर में जहाँ कुछ पानी बचा है उसमें डुबकी लगा रही है। जब पूरे देश में पानी को लेकर बातचीत हो रही है, बहस हो रही है , उस वक़्त किसानी कर रहे लोग खेतों में संघर्ष कर फ़सल की रक्षा कर रहे  हैं साथ ही जीव-जंतुओं को पानी भी मुहैया करा रहे हैं। कभी इस पर भी बात होनी चाहिए।

उधर, पोखर के कीचर में कोका के फूल आए हैं। गरमी में इस फूल की सुंदरता देखने वाली होती है। नीले और उजले रंग में डूबे इस फूल को देखकर मन में ठंडी बयार चलने लगती है। देखिए न  इस तपती गरमी में पोखर को देखकर मुझे कोसी की उपधारा 'कारी-कोसी' की याद आ रही है। बचपन में गाम की सलेमपुरवाली काकी कारी कोसी के बारे कहानी सुनाती थी। कहती थी कि डायन -जोगिन के लिए लोग सब कारी कोसी के पास जाते हैं। लेकिन हमें तो चाँदनी रात में कारी कोसी की निर्मल धारा में अंचल की ढेर सारी कहानियाँ दिखती थी।

बंगाली मल्लाहों के गीत सुनने के लिए कारी कोसी पर बने लोहे के पुल पर खड़ा हो जाता था। बंगाल से हर साल मल्लाह यहाँ डेरा बसाते थे और भाँति-भाँति की मछलियाँ फँसाकर बाज़ार ले जाते थे। इस पुल से ढेर सारी यादें जुड़ी हैं। यहाँ से दूर दूर तक परती ज़मीन दिखती है, बीच-बीच में गरमा धान के खेत भी हैं।

क़रीब दस साल पहले तक बंगाली मल्लाह कारी-कोसी के तट को हर साल बसाते थे, धार की जमीन में धान की खेती करते हुए सबको हरा कर देते थे। ये सभी मेहनत से नदी-नालों-पोखरों में जान फूँक देते थे। यह समुदाय ख़ुद में सफलता की कहानी है, जिसने मेहनत कर कोसी के कछार को सोना उपजाने वाली माटी बनाया और फिर हमें सौंपकर निकल गए, मुसाफ़िर की तरह। मल्लाह समुदाय के लोगों ने इलाक़े को अलग तरह की खेती और मछली पालन के अलावा बांग्ला गीतों का भी दीवाना बनाया। सुबह और शाम में कारी कोसी के किनारे बसी बस्तियों के क़रीब से गुज़रते हुए आज भी बांग्ला गीतों की आवाज सुनने को मिल जाती है।

गाँव का बिशनदेव उन बंगाली मछुआरों की बस्ती में ख़ूब जाया करता था और जब लौटकर आता तो  उसके हाथ में चार-पाँच देशी काली मछली और कुछ सफ़ेद मछलियाँ होती थी। यह सब अंगना में बने चूल्हे के पास रखकर वह कहता- 'सब भालो, दुनिया भालो, आमि-तुमि सब भालो, दिव्य भोजन माछेर झोल.....'

बिशनदेव की इस तरह की बातों को सुनकर गाम में सबने उसका नामकरण 'पगला बंगाली' कर दिया था। काली मछलियों को लेकर वह ढ़ेर सारी कहानियाँ सुनाता था। हम सब उसकी बातों में डूबकर पूर्णिया से पश्चिम बंगाल के मालदा ज़िला पहुँच जाते थे।

अब बिशनदेव नहीं है लेकिन आज पछिया हवा के बीच पुराने पोखर के नज़दीक से गुज़रते हुए कारी-कोसी की यादें ताजा हो गयी।

Monday, April 25, 2016

आम फलों का राजा है, लड़ना उसको आता है

पंखुड़ी को जब पढ़ाने बैठता हूं तो वह ढ़ेर सारे सवाल पूछती है। मुझे उसके सवालों से काफ़ी कुछ सीखने को मिलता है। सुबह की बात है, आम को लेकर बात चली तो मैंने कहा- "फ़लों का राजा आम है"। पंखुड़ी ने तुरंत सवाल दागा "पपीता क्यों नहीं? अनार क्यों नहीं?....

पंखुड़ी को जैसे -तैसे समझाकर संतुष्ट कर दिया कि तमाम फलों में आम ही स्वादिष्ट है इसलिए वह राजा है। लेकिन बाद में आम के बारे में सोचने लगा। आख़िर आम राजा क्यों कहलाता है? किसानी करते हुए आम को मैं कितना समझ सका हूँ, इसके बारे में सोचने लगा।

दोपहर में चनका में बग़ीचे में आम के नये फलों को तेज़ धूप और पछिया हवा के झोंकों में अपने ही डंटल से टकराते देखा तो अहसास हुआ कि 'राजा' होना आसान काम नहीं है। पेड़ में मंज़र आते ही उसे पहले तेज़ हवा और बारिश से जूझना पड़ता है, हर साल।

बीस दिन पहले की ही तो बात है, छोटे-छोटे नवातुर आम के फलों को ओलों से लड़ना पड़ा था। सैंकड़ों छोटे-छोटे आम ज़मीन में मिल गये , जो लड़ सके आज पेड़ में हैं। अब भी धूप में वे लड़ रहे हैं।

आम की लड़ाई अभी ख़त्म नहीं हुई है। अभी तो आँधी-तूफ़ान का एक दौर बाँकि है, इसमें जो बच जाएँगे वे ही टिक पाएँगे हमारे- आपके लिए।

प्रचंड गरमी की ताप को सहने की शक्ति कोई आम से सीखे। देखने में हरा है, तपती दोपहरी में हमारी आँखों को ठंडक मिलती है इसे देखकर, लेकिन अपने भीतर यह अंगारे को छुपाए हुए है।

आम के पेड़ की पत्तियों में चिटियाँ घर बना लेती है तो कभी मधुमक्खी। गिलहरी तो इसके क़रीब चिपकी रहती है। आम में सहन शक्ति है। इसमें सामूहिकता की कला है। प्रकृति ने इसे सबको संग लेकर चलना सीखाया है।

मैं इस मौसम में जब भी आम को देखता हूं , लगता है कि हम लड़ने से कितना डरते हैं। जबकि आम चार-पाँच महीने लगातार लड़ता रहता है , हमारे -आपके लिए। ऐसे में सबसे बड़े 'लड़ेय्या' तो आम ही है। राजा कोई यूँ ही नहीं कहलाता है, इसके लिए लड़ना पड़ता है। 

Friday, April 15, 2016

गाम-घर और रामनवमी

हमारी स्मृति में रामनवमी गांव की कहानियों से भरी हुई है। कल देर रात किशनगंज से लौटकर सुबह-सुबह गाँव पहुँचा तो हर टोले में पताका लहराते लोग मिले। सलीम चाचा ने अपनी बांसबाड़ी से महादलित  टोले के लिए बारह बाँस दिए हैं ताकि  वे सब भी अपने देवस्थान पर नया पताका लहरा सकें। यही सब देखकर लगता  है कि गाँव अभी भी 'धर्म की ड्रामेबाज़ राजनीति और बयानबाज़ी व अफ़वाहों के बाज़ार' से दूर है।

बचपन की यादों वाली पोटली खोलता हूं तो  याद आता है गांव में रामनवमी से पहले बाजार का सारा हिसाब किताब चुकता किया जाता था। दुकानदार वो चाहे हिंदू हो य मुस्लिम, वे बही खाते का रजिस्टर नया तैयार करते थे और पुराने का सारा हिसाब- किताब बराबर करने की कोशिश करते थे। बाबूजी की भी कॉपी बदल जाती थी। लाल और हरे इंक से नई कॉपी  में बही -खाते की शुरूआत होती थी।

आज हम भले ही कंप्यूटर बिलिंग के दौर में जी रहे हैं लेकिन गांव घरों में आज भी छोटे और बड़े दुकानदार लाल रंग का बही खाता रखते हैं और रामनवमी के दिन पुराने रजिस्टर को एक तरफ रखकर नए रजिस्टर में हिसाब किताब शुरु कर देते हैं।झूठ क्यों कहूँ,  मैंने  भी आज रजिस्टर के बदले फ़ोन के 'नोट्स' में हिसाब-किताब लिखकर उसे 'सेव' कर दिया लेकिन रामनवमी   से  पहले बाबूजी  का गुलाबबाग़ से थोकभाव  में रजिस्टर मंगवाना अब भी मन में है। उनकी लिखी डायरी पढ़ता हूं तो रोमांचित हो जाता हूं।

ख़ैर, बचपन की यादों में डुबकी लगाने पर मेरे सामने कुतुबुद्दीन चाचा का चेहरा दौड़ने लगता है। गांव में उनकी छोटी से एक परचुन दुकान थी, जिसमें जरुरत के सभी सामान मिलते थे। साल भर गांव  वाले उनसे सामान लेते थे। कोई नकद तो कोई उधार। उधार लेने वालों का नाम एक लाल रंग के रजिस्टर में कुतुबुद्दीन चाचा दर्ज कर लेते थे। मुझे याद है कि वे रामनवमी से पहले उधार लेने वाले घरों में पहुंचने लगते थे और विनम्रता से कहते थे कि रामनवमी से पहले कर्ज चुकता कर दें ताकि नए रजिस्टर में उनका नाम दर्ज न हो।

कुतुबुद्दीन चाचा की बातों को याद करते हुए लगता है कि रामनवमी के बारे में हम कितना कुछ लोगों को सुना सकते हैं। खासकर उन लोगों को जो धर्म को चश्मे की नजर से हमें दिखलाने की कोशिश करते हैं। धार्मिक सौहार्द का इससे बढ़कर और क्या उदाहरण हो सकता है। जहां तक मुझे याद है कि व्यापारी वर्ग लाल रंग का एक कार्ड भी घरों तक पहुंचाया करते थे, जिसमें जहां रामनवमी की शुभकामना से संबंधित बातें लिखी होती थी वहीं बही-खाते के निपटारे की बात उसी शालिनता से लिखी रहती थी। यह कार्ड मुस्लिम दुकानदार भी छपवाते थे।

गांव-घर की स्मृति सबसे हरी होती है। दूब की तरह, जिस पर हर सुबह ओस की बूंद अपनी जगह बनाए रखती है। रामनवमी की स्मृति दूब की तरह ही निर्मल है। वहीं रामवनवी की शोभा यात्रा का आनंद भी मन में कुलांचे मार रहा है। गांव से शहर की दूरी हम जल्दी से पाटना चाहते थे ताकि शहर की शोभायात्रा का आनंद उठा सकें। मेला घूम सकें...ग़ुब्बारे  ले सकें....

Saturday, April 09, 2016

शास्त्रीय संगीत और सुर मिलाते बच्चे

बहुत दिनों बाद शहर में किसी कार्यक्रम में जाना हुआ। संयोग से कार्यक्रम शास्त्रीय संगीत से जुड़ा था। छोटे शहर में शास्त्रीय संगीत के प्रति युवाओं और छोटे बच्चों की दीवानगी मेरे प्रिय विषयों में एक है। ठीक वैसे ही जैसे अंचल और पलायन को मैं गंभीरता से देखता हूं।

ख़्याल गायिकी में प्रमुख राजकुमार श्यामानन्द सिंह की पुण्यतिथि पर आयोजित इस कार्यक्रम में छोटे बच्चों ने प्रस्तुति दी। वैसे तो राग-धुनों का व्याकरण मुझे आता नहीं है लेकिन शास्त्रीय संगीत खींचता आया है। पूर्णिया जैसे शहर में शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में सौ लोगों का जमा होना मुझे रास आता है , एक उम्मीद जगती है कि शास्त्रीय संगीत के प्रति नई पीढ़ी की रूचि बढ़ रही है।

यहाँ पूर्णियाँ में मुझे कई शिक्षक मिलते हैं जो शुद्ध रूप से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा के पेशे से जुड़े हैं।  कुछ तो शहर पर बंगाल का प्रभाव है तो कुछ यहाँ की माटी का।

एक चीज़ और, जब बच्चों को कार्यक्रम पेश करते देख रहा था तो कुछ की आँखों में आत्मविश्वास झलक रहा था। हालाँकि गायन में आवाज़ का महत्व है लेकिन मुझे आवाज़ के संग नज़र से नज़र मिलाते कलाकार बहुत पसंद है। ख़ासकर बच्चों में आत्मविश्वास मायने रखता है वो भी तब जब छोटे शहर से पलायन बढ़ रहा है। 

Thursday, April 07, 2016

नीतीश कुमार के नाम एक पाती

माननीय नीतीश कुमार जी
नमस्कार।
आपने बिहार में शराब की बिक्री पर जो पाबंदी लगायी है इसके लिए हम आपके आभारी है।इस फ़ैसले की वजह से  शहर से लेकर गाँव के टोले-टोले में ख़ासकर महिलाएँ आपको आशीष दे रही हैं। आप इस फ़ैसले पर अडिग रहेंगे, हमें उम्मीद है।

शाम ढलते ही शहर के सड़कों पर जो ख़राब माहौल दिखता था, आपके फ़ैसले ने उसे ठीक कर दिया है। अब हम सपरिवार शाम में सड़क पर टहल सकते हैं। कुछ लोग कह रहे हैं कि अब बिहार में शराब के माफ़िया आएँगे, तस्करी होगी लेकिन मुझे उम्मीद है आप ऐसा होने नहीं देंगे।

आज जो नई पीढ़ी शराब के नशे  की चपेट में है अगली पीढ़ी इससे बच जाएगी। ख़ुशी के अवसर पर पार्टी का अर्थ दारू माना जाता था लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। पार्टी का अर्थ आपने बदल दिया नीतीश जी, इसके लिए हम आपके आभारी रहेंगे।

आँकड़ों के अनुसार राज्य में छह हज़ार करोड़ मूल्य की शराब बिकती थी और राजस्व मिलता होगा दो हज़ार करोड़ के आसपास। लेकिन आपने इसे एक झटके में ठुकराकर राज्य की आधी आबादी का प्रेम हासिल कर लिया है। आप फ़ैसले पर डटे रहिए, यकिन मानिए आपको स्नेह मिलता रहेगा। राज्य की जनता अपने 'नीतीश कुमार ' को इस फ़ैसले के लिए मन में बिठाए रखेगी।

तीन साल पहले जब मैं दिल्ली से गाँव लौटकर आया था तब साँझ ढलते ही नशे में गाम को डूबता देखता था। 'सूरज अस्त गाँव मस्त' ऐसी बातें सुनने को मिलती थी। महिलाएँ परेशान रहती थीं लेकिन अब सब सुंदर होगा, ऐसी उम्मीद है। नशा घर तोड़ता है , आपके  इस  फ़ैसले से कई घर टूटने से बच जायेंगे।

अब एक दूसरी बात। माननीय मुख्यमंत्री जी ,सीवान ज़िले की एक कहानी है, आशा है कि आप इससे अवगत होंगे ही तो भी मेरी बात सुनिए। तहलका पत्रिका में निराला भाई ने इस पर विस्तार  से लिखा है, मैं उसी रपट के आधार पर आपसे बात कर रहा हूं।

नीतीश जी, फरवरी के पहले सप्ताह में एक खबर आई कि शहाबुद्दीन को बहुचर्चित तेजाब कांड में जमानत मिल गई है. शहाबुद्दीन, सीवान और तेजाब कांड, तीनों का नाम एक साथ सामने आते ही बिहारवासियों के जेहन में कई खौफनाक यादें ताजा हो उठती है। 2004 में 16 अगस्त को अंजाम दिए गए इस दोहरे हत्याकांड में सीवान के एक व्यवसायी चंद्रकेश्वर उर्फ चंदा बाबू के दो बेटों सतीश राज (23) और गिरीश राज (18) को अपहरण के बाद तेजाब से नहला दिया गया था, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी. इस हत्याकांड के चश्मदीद गवाह चंदा बाबू के सबसे बड़े बेटे राजीव रोशन (36) थे. मामले की सुनवाई के दौरान 16 जून, 2014 को राजीव की भी हत्या कर दी गई. इसके ठीक तीन दिन बाद राजीव को इस मामले में गवाही के लिए कोर्ट में हाजिर होना था. चंदा बाबू और उनकी पत्नी कलावती देवी अब अपने एकमात्र जीवित और विकलांग बेटे नीतीश (27) के सहारे अपनी बची हुई जिंदगी काट रहे हैं. पिछले साल दिसंबर में ही सीवान की एक स्थानीय अदालत ने इस हत्याकांड में राजद के पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के अलावा तीन अन्य लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.

नीतीश जी 'बिहार में बहार है' आपका नारा था, आपको हमने प्रचंड बहुमत देकर चुना। शराब पर बैन लगाकर आपने दिल जीत लिया लेकिन अब चंदा बाबू की भी सुनिए।

निराला भाई की रिपोर्ट में चंदा बाबू कहते हैं - "मेरे तीन बेटों की हत्या हुई, बेटों की हत्या का मुआवजा भी नहीं मिला. यह शिकायत है मेरी नीतीश कुमार से. खैर, अब क्या किसी से शिकायत. खुद से ही शिकायत है कि मैं कैसी किस्मत का आदमी हूं, जो शासन, व्यवस्था, कानून, खुद से… सबसे हार गया...."

आशा है आप बिहार की जनता की आवाज़ सुनेंगे। नीतीश जी आप चंदा बाबू को न्याय दिलाने में सहायता करेंगे।

आपका

गिरीन्द्र नाथ झा
ग्राम-चनका
पोस्ट - चनका
ज़िला-पूर्णिया

Sunday, April 03, 2016

इन दिनों...

इधर बहुत कुछ हो गया, कुछ बुरा तो कुछ अच्छा। जीवन का बही खाता मोटा ही होता जा रहा है। इन सबके बीच डायरी के पन्नों में फ़ील्ड-नोट्स जुड़ते जा रहे हैं।

अनुभव की थाली में खट्टे-मीठे अँचार सजते जा रहे हैं। हमारे इधर ईमली और चीनी को मिलाकर एक अँचार बनता है-'खट-मिट्ठी'। मुँह में जाते जाते हुए ही एक अजीब अहसास होता है। एक साथ , एक ही झटके में खट्टा भी और दूसरे ही पल मिठास।

जीवन में जब भी उलझनों से घिरता हूं तब इस अँचार के बनने की प्रक्रिया याद कर ख़ुद को समझा लेता हूं।

हाल ही में गाम के दक्षिण टोले में आग लगी थी। बिंदेसर का घर जल कर माटी में मिल गया। मटमेले मिट्टी का रंग काला हो गया। मिट्टी का भंडार , जिसे हम यहाँ 'कोठी' कहते हैं, उसमें एक मन चावल था, सब जलकर राख! सुबह तक बिंदेसर का चेहरा आने वाली विपत्तियों के बारे में सोचकर काला हो चुका था। अंगना में मातम फैला था। लेकिन दोपहर तक टोल के सबलोग एक हुए और बिंदेसर की परेशानियों को बाँट लिया। शाम में टोले के पीपल थान से ढोलक और झाल की आवाज़ें आने लगी थी।

बिंदेसर का दुःख इन आवाज़ों में खो गया और ख़ुद बिंदेसर मूलगैन बनकर गाने लगा। जीवन में दुख को हरने की कला पीपल थान जाकर ही समझ सका। गीत की ताक़त यही है, समूह गान का जादू यही है, दुःखहरण टिकिया की तरह।

बिंदेसर के जले घर की काली माटी पर पानी छिड़का गया था, धुआँ अब भी था लेकिन माटी की गंध ने शायद धुआँ को अपने वश कर लिया था। किसी ने बाँस दिया तो किसी ने घास, बिंदेसर का घर बनने लगा। अंगना में बिंदेसर का चार साल का पोता दौड़ लगा रहा था। मानो कुछ हुआ ही न हो।

इन दिनों जीवन के प्रपंचों के बीच इस तरह की घटनाओं को जब देखता हूं तब विश्वास बढ़ जाता है, समूहिकता पर भरोसा जग जाता है। रात भर चाँद और टिमटिमाते तारों के बीच बिजली की रौशनी की आवश्यकता नाटक के उस पात्र की तरह जान पड़ती है जिसे मजबूरी में मंच पर खड़ा किया गया हो। प्रकृति से प्रीत,  चाँद की दूधिया रौशनी और बढ़ देती है ।

इन दिनों हर शाम खेतों की ओर घूमते टहलते हुये जंगली खरगोशों से मुलाक़ात होती है। भूरे रंग का ख़रगोश बाँस बाड़ी और मक्का के खेतों से दौड़कर निकलता है और फिर किसी दूसरे खेत में छुप जाता है। ख़रगोश की तेज़ी देखकर लगता है वह हर बार बाज़ी जीतकर अपना मोहरा हासिल कर लेता है। ख़रगोश की दौड़ देखकर गाम की पगडंडियाँ कनाट प्लेस के सर्किल को तोड़ती दिखने लगती है, आज़ादी का यह भाव अक्सर गाम से दिल्ली के तार को जोड़ देती है। अनायास ही दिल्ली की सड़कें आँखों के सामने आ जाती है।

इन दिनों ख़ुद को टेलिविज़न और ख़बरों के अन्य माध्यमों से दूर रखने की कोशिश करता हूं। यात्राओं और गाम घर के पुराने लोगों से गुफ़्तगू ज़्यादा करता हूं, इस आशा के साथ कि उनके अनुभवों से कुछ सीख पाऊँ क्योंकि प्रपंच का जाल इतने महीन तरीक़े से समाज में बुना जा चुका है कि हम सब उसमें आसानी से फँसते जा रहे हैं और फँसाने वाला अपनी बाज़ीगिरी से अपनी हाँ में हाँ कहलाने में सफल होता जा रहा है। ऐसे में गाम के बूढ़े लोगों से बातकर अंचल की कथा समझने की कोशिश में जुटा हूं।

इन दिनों गाम के कबीराहा मठ की ओर जाना कम हो गया है।  लेकिन पिछले हफ़्ते अनायास ही मोटरसाइकिल उधर मुड़ गयी। मठ का मकान अब पक्का का हो गया है। मठ की ज़मीन पर मक्का लहलहा रहा है , मठ का विस्तार हो रहा है...लेकिन कबीर तो कहते थे -"राम हमारा नाम जपे रे, हम पायो विश्राम..." यहाँ तो कुछ और ही जपा जा रहा है..ख़ैर अब यह कहना कि - "कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर.." वाजिब थोड़े माना जाएगा।

इन दिनों यही सब हो रहा है। पंचायत चुनाव भी होने वाले हैं। ख़ैर, हाल ही में आँधी-बारिश हुई थी। नुक़सान हुआ लेकिन बिंदेसर को देखकर अपना नुक़सान तो शून्य लगा। हाँ, किशोरवय बाँस जब इस आँधी में टूटकर बिखर गए तब ज़रूर मन टूटा लेकिन जो अपने हाथ में नहीं है उसपर क्या रोना ! मन टूटता है तो जुड़ भी जाता है न !