Thursday, June 14, 2018

बाबूजी

हर दोपहर, जब आसपास 
कोई नहीं होता,
पहुँच जाता हूं 
उस माटी के पास,
जहाँ हर बारिश में 
उग आती है
श्याम तुलसी।
यहीं करता हूं आत्मालाप!
आज साहस से
याद करता हूं
बाबूजी के शव को।
अंतिम संस्कार की विधि को,
अग्नि में समाहित बाबूजी को।
मुझे याद है,
उस दिन
बाबूजी के दोनों पाँव
सबसे पहले
जलते हुए झूल गए थे..
लम्बे थे पिता
मानो थक कर कह रहे हों
हो गया अब!
अब नहीं चला जाता..
मानो वह कह रहे हों
कि अब तुम अकेले चलो..
भीड़ में एकदम अकेले..
उस दिन लपटों के बीच
लाल अंगार में
बाबूजी और भी लाल दिख रहे थे
ठीक वैसे ही जैसे
अस्त होता सूरज दिखता है
हर रोज...


Tuesday, March 27, 2018

पूर्णिया के कथावाचक थे डॉ. रामेश्वर प्रसाद

वे मुझे पूर्णिया की कथा सुनाते थे, जिसे भी पूर्णिया की कहानियों से रुचि होती, वह ज़रूर एक दफे उनके घर जाता था। पूर्णिया से उन्हें ख़ास लगाव था। वे ऑक्सफोर्ड में पढ़ा चुके थे। वे हमारे इतिहासकार थे, लेकिन मेरे लिए तो कथाकार थे। वे डॉ रामेश्वर प्रसाद थे। आज उस इतिहासकार-कथाकार ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

आज दोपहर जब बासुमित्र भाई ने डॉ रामेश्वर प्रसाद के निधन की ख़बर दी तो मन के पन्ने पर ढेर सारे बिंब उभर कर सामने आ गए।

उनसे पहली मुलाक़ात बाबूजी ने करवाई थी। पहली भेंट में उन्होंने पूछा था कि यात्रा करते हो? पूर्णिया की यात्रा की है? नदी को निहारे हो?

इन सवालों के बाद वे यात्रा की अहमियत पर बोले थे, फिर एक ही झटके में वे हमें ऐसे नाटककार की तरह नजर आने लगे जो हर लाइन में कथा को विस्तार देता हो। मेरे लिए वे कथावाचक थे, जिनकी पोटली में अरण्य से पूर्णिया बनने की ढेर सारी कहानी थी।

इन दिनों अपने शहर, अपने गांव में वक्त गुजारने के अनुभव में यात्रा और इतिहास दोनों से अपनापा बढ़ता जा रहा है तो ऐसे में  डॉ रामेश्वर प्रसाद की बातें मन में दौड़ लगाती दिखने लगती है।

आज उनके गुज़रने की बात लिखते हुए भीतर की नदी का जलस्तर बढ़ चला है। मानो कोसी के ग्रामीण इलाकों में कोसी प्रोजेक्ट के सूखे नहर में प्रोजेक्ट इंजीनियर ने अचानक पानी छोड़ दिया हो। मन के भीतर ऐसे ही भाव पनपने लगे हैं।

सामाजिक संबधों के पुल पर आवाजाही बढ़ती दिख रही है। रात के अंधेरे में झिंगुर की घनन-घनन आवाज सीधे अंचल की ओर ले जा रही है। एक साथ कई चीजें मन के अंचल में दौड़ लगा रही है। इस दौड़-भाग में तेज हवा के झोंके में मानो कुछ पेड़ गिर गए हैं।

रास्ते पर गिरे पेड़ की डालियों को हटाता हूं कि तभी फिल्म ‘दिल्ली 6’ का वह फ़कीर याद आता है, जिसके हाथ में हर वक्त एक आईना होता है..अपना चेहरा देखने के लिए, लोगों को चेहरा दिखाने के लिए..। हमने आज वैसा ही एक आईना खो दिया है।

डॉ रामेश्वर प्रसाद ने भरपूर जीवन जिया। उम्र के इस पड़ाव पर एक दिन मौत ही सत्य दिखती है। लेकिन उनका जाना पूर्णिया को ख़ाली कर देने जैसा है।

यह सब लिखते हुए कबीर की छवि मन के भीतर उभर आती है तो मन बोलने लगता है- “न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या?”

प्रोफ़ेसर साहेब को अंतिम बार न देख सका। जीवन की इस आपाधापी में पूर्णिया से दूर रहने के कारण रामेश्वर प्रसाद का अंतिम दर्शन न हो सका। उनके बारे में लिखना ही उनसे मिलने जैसा लग रहा है।

कवि कुंवर नारायण की यह कविता अपने इतिहासकार -कथाकर को फिर से सुनाने का मन करता है-

“अबकी बार लौटा तो
हताहत नहीं
सबके हिताहित को सोचता
पूर्णतर लौटूंगा...”

Tuesday, February 27, 2018

आगरा मतलब ‘आगरा घराना’ भी होता है !

एक गर्म दोपहर दिल्ली में अपने कमरे में बैठा था। अपना दोस्तदादाआता है और कहता है आगरा चलोगे ? फिर फटाफट कार्यक्रम बनता है। वह अपनी कार निकालता है और हम निकल पड़ते हैं। वहाँ ताजमहल देखते हैं, शहर को समझते हैं। हम आगरा का मशहूर पैठा ख़रीदते हैं कि तभी मेरा वह बंगाल का दोस्त देवप्रियो सवाल पूछ बैठता है - ‘उस्ताद फ़ैयाज़ खान को जानते हो ? ‘हम बोले- ‘नहीं दादा, आगरा में केवल ताजमहल को जानता हूं।देवप्रियो झुंझला कर कहता है- ‘ अरे आफ़ताब--मौसीकी खान साब को तुम नहीं जानता है और ख़ाली शास्त्रीय संगीत का बात करता है ! आगरा गया और आगरा घराना के बारे में कुछ नहीं पढ़ा...’

दादादरअसल शास्त्रीय संगीत का जानकार आदमी था और हम ठहरे सुगम संगीत वाले। ख़ैर, उस यात्रा में पहली बार आगरा शब्द का मतलबआगरा घरानाभी होता है, जाना। घराना शब्द से अनुराग उसी दादा ने करवाया फिर जब चिन्मय से मित्रता हुई तो उसने ढेर सारी कहानियाँ सुनाई। लेकिन मुझे अक्सर लगता है कि घराना अपने शहर में सबसे अधिक उपेक्षित रहता है। यह अक्सर घरानों के साथ हुआ है कि उन्हें अपने शहर में ही इज्जत नहीं मिली। आगरा वाले हों, दरभंगा वाले हों, कैराना वाले हों, अतरौली हो, भिंडीबाजार हो, या इटावा हो। सब इधर-उधर भागे, शहर में जैसे उन्हें कोई नहीं पूछता। 

मुझे याद है मार्च २०१० में जब समाचार एजेंसी इंडो एशियन न्यूज़ सर्विस में काम करता था तो उस वक़्त उस्ताद अकील अहमद खान पर एक रिपोर्ट तैयार की थी। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के आगरा घराने से ताल्लुक रखने वाले उस्ताद अकील अहमद खान उस वक़्त बहुत बीमार थे। सरकार की उपेक्षा से बेजार इस संगीत दिग्गज का उस वक़्त बयान आया था - “यहां सिर्फ मरने के बाद ही सम्मान किया जाता है।खान साहेब आगरा घराने के संस्थापक आफताब मुश्तकी उस्ताद फैय्याज अहमद खां के पौत्र थे। उन्होंने बताया था कि तंगी की हालत से जूझते हुए उन्होंने सोने के 5 मेडल बेच दिए।

अब देखिए जिस आगरा से मेरे दोस्तदादाने परिचय करवाया था उसी आगरा घराना के उस्ताद वसीम अहमद खान से निकटता अंकुर की गायिकी की वजह से होती है। शास्त्रीय संगीत की बारीकी का इल्म नहीं है लेकिन गूगल से जो जानकारी मिलती है उसके अनुसार आगरा घराने खानदान से अगर आखिरी टिमटिमाता सितारा बचा है, या शायद आगे ले जाएँ तो वो हैं वसीम अहमद खान। 


पिछले साल पटना पुस्तक मेला में उस्ताद साहेब को सुना तो सुनता रह गया। एक दफे पूर्णिया में भी उनसे मुलाक़ात हुई थी। बेहद मिलनसार, उतने ही मधुर युवा उस्ताद वसीम अहमद खान से अभी हम लोगों को बहुत कुछ सुनना है। 

Tuesday, February 20, 2018

नीतीश-धान-जापान

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जापान यात्रा से मन में ख़्याल आया कि सीएम की जब जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे से मुलाक़ात हुई होगी तब क्या धान पर बातचीत हुई होगी ?

खेती-बाड़ी से जुड़े सूबे के मुखिया के नाते नीतीश कुमार के जापान यात्रा पर धान का ख़्याल इसलिए आया क्योंकि जापान की दो प्रमुख कम्पनियां होंडा और टोयोटा का अर्थ धान होता है. होंडा का मतलब मुख्य धान खेत और टोयोटा का मतलब बम्पर फसल वाला धान खेत. जापान में एक हवाई अड्डा है- नरीटा, इसका अर्थ है लहलहाता धान खेत.

दरअसल जापान में धान को प्रधानता दी जाती है. ऐसी बात नहीं है कि वहां अन्य फसलों की खेती नहीं होती है लेकिन यह बड़ी बात है कि वहां खेत का अर्थ धान के खेत से जुड़ा है. वहां धान की आराधना की बड़ी पुरानी परंपरा है.

गूगल किया तो पता चला जापान के ग्रामीण इलाक़ों में धान-देवता इनारी का मंदिर होता ही है. जापान में एक और देवता हैं, जिनका नाम है- जीजो है. जीजो के पांव हमेशा कीचड़ में सने रहते हैं. कहते हैं कि एक बार जीजो का एक भक्त बीमार पड़ गया, भगवान अपने भक्तों का खूब ध्यान रखते थे. उसके खेत में जीजो देवता रात भर काम करते रहे तभी से उनके पांव कीचड़ में सने रहने लगे. इन कहानियों को पढ़कर अहसास होता है बाहर के मुल्कों में फसलों के कितना स्नेह देते हैं.

हम भी धान को कम स्नेह नहीं देते. हमारे यहां तो धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है. धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है. बौद्ध  साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध के पिता का नाम था- शुद्धोदन यानी शुद्ध चावल. वट वृक्ष के नीचे तप में लीन गौतम बुद्ध ने एक वन-कन्या सुजाता के हाथ से खीर खाने के बाद बोध प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए. इस कहानी को पढ़कर लगता है शायद इसी वजह से 70 के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाक़ों में एक पुरानी नस्ल की धान का नाम 'सुज़ाता' होगा. इस धान का चावल बहुत ही सुगन्धित हुआ करता था.

बाज़ार प्रधान देश का यह किसान नीतीश जी के जापान यात्रा पर धान की बात इसलिए कर बैठा  क्योंकि हमें तो निबंध लेखन में यही सीखाया गया है कि 'भारत एक कृषि प्रधान देश है.' वैसे यह अलग बात है कि अब हम कहने के लिए ‘बुलेट ट्रेन प्रधान’ देश हो गए हैं !

Wednesday, February 14, 2018

पूरैनिया से पूर्णिया

बिहार का पूर्णिया जिला आज अपना 248वां स्थापना दिवस मना रहा है। जिला स्तर पर ढेर सारे कार्यक्रम होते हैं। मीडिया में जिला के बारे में ढेर सारी रोचक कहानियाँ छपती है। हर बार पूर्णिया के पहले कलक्टर डुकरैल के बारे में लोग बातचीत करते हैं।अख़बारों में भी उनका नाम छप जाता है।

लेकिन इन सब जानकरियों के अलावा भी डुकरैल के बारे में बहुत कुछ जानने की ज़रूरत है। वे जब पूर्णिया के कलक्टर बनकर आए थे तो उन्हें पता चला कि किसी नजदीक के गांव में एक स्त्री विधवा हो गई है और लोग उसे सती बनाने जा रहे हैं।इतना सुनते ही डुकरैल सिपाहियों के साथ घोड़े पर सवार हुआ और उसने उस विधवा की जान बचाई। इतना ही नहीं, डुकरैल ने उस विधवा से विवाह कर लिया और सेवानिवृत्ति के बाद उसे अपने साथ लंदन ले गए। कई सालों के बाद अबू तालिब नामका एक यात्री जब लंदन गया तो उसने बुजुर्ग हो चुके डुकरैल और उसकी पत्नी के बारे में विस्तार से अपने वृत्तांत में लिखा।ये घटना उस समय की है जब भारत में सती प्रथा पर रोक लगाने संबंधी कानून नहीं बना था। वो कानून उसके बहुत बाद सन् 1830 में में राजा राम मोहन राय और लॉर्ड विलियम बेंटिक के जमाने में बना-जबकि डुकरैल की कहानी 1770 की है। यानी सती प्रथा कानून से करीब 60 साल पहले की। लेकिन डुकरैल को कोई किसी ने सती प्रथा के समय याद नहीं किया, न ही उसे बाद में वो जगह मिली जिसे पाने का वो सही में हकदार था।

पूर्णिया निवासी और ऑक्सफोर्ड में पढ़ा चुके इतिहासकार डॉ रामेश्वर प्रसाद, जिन्होंने पूर्णिया की स्थापना पर शोध किया था, ने बिहार सरकार से आग्रह किया था कि पूर्णिया में डुकरैल के नाम पर कम से कम सड़क का नाम होना चाहिए-लेकिन बिहार सरकार ने इसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया। कम से कम कलक्टर ऑफ़िस की तरफ़ जाने वाली सड़क को ही ‘डुकरैल लेन’ नाम दे दिया जाता !

डुकरैल के जीवन पर एक खूबसूरत कहानी बिहार सरकार में भू राजस्व विभाग में पदाधिकारी सुबोध कुमार सिंह ने 'परती-पलार' नामकी एक पत्रिका में (जनवरी-जून 2013 अंक) में लिखी थी, जिसका शीर्षक है- "यह पत्र मां को एक साल बाद मिलेगा"। यह सब पढ़ने के बाद लगता है कि हम सब कितने अनजान हैं। हम तो विभूति  भूषण मुखोपाध्याय की किताब ‘कोशी प्रांगनेर चिठि’ भी नहीं पढ़ रहे।

पूरैनिया से अपना शहर पूर्णिया हो गया। यक़ीनन बहुत कुछ बदला है लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं है कि हम अपनी कथा, अपने इतिहास को ही भूल जाएँ। हम उन लोगों को भूल जाएँ, जिन्होंने इस माटी से बेपनाह मोहब्बत की। इस माटी के लोगों को फ़्रांसिस बुकानन का भी शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जिन्होंने ख़ूब मेहनत कर
1809-1810 में An Account of the district of Purnea लिखा। ओ मैली का भी जिन्होंने पूर्णिया रिपोर्ट तैयार किया। हम उस घर को भी संभाल नहीं सके जहाँ सर अलेक्जेंडर फोर्ब्स रहते थे।

आइए, इस बार पूर्णिया के 248 वें स्थापना दिवस पर अपने ज़िले की उन कहानियों के नायकों को याद करते हैं जिन्होंने पूर्णिया को बनाया। हम अपने स्तर पर ही लेकिन डुकरैल के लिए ज़रूर कुछ करें। आज भी पूर्णिया के बारे में कुछ भी पुरानी जानकारी यदि हमें चाहिए तो हम बुकानन और ओ मैली को ही पढ़ते हैं, ऐसे में हम उनके लिए कुछ तो करें...

पूर्णिया के पहले कलक्टर डुकरैल के नाम पर ‘चनका रेसीडेंसी’ छोटे स्तर पर ही सही लेकिन 2018 में ज़रूर कुछ करेगी। हमारी ही माटी के इतिहासकार डॉक्टर रत्नेश्वर मिश्र हैं, जिनसे हम बहुत कुछ सुन सकते हैं। रेणु और इस अंचल से स्नेह रखने वाले इतिहासकार और शोधार्थी सदन झा से हम बात कर सकते हैं। और इसी माटी के पुष्यमित्र हैं, जिनसे हम इस पुराने ज़िले पर लंबी बातकर सकते हैं।

तो डुकरैल साहेब, भरोसा रखिए इस वर्ष हम ज़रूर कुछ सार्थक बातचीत और काम करेंगे अपने पूरैनिया के लिए।

Sunday, February 11, 2018

आँखों में पिता

मेरे पास बाबूजी की तस्वीरें 
बहुत कम है
गिनती के तीन
जबकि मेरे पास है 
उनकी ढेर सारी बातें
पान जिस तरह 
मुँह में घुल जाता है
ठीक उसी तरह
बाबूजी घुलें हैं
मेरी आँखों में। 
तस्वीरों से अधिक 
पसंद है मुझे
बाबूजी की लिखावट
ढेर सारी चिट्ठियाँ 
ये चिट्ठियाँ
भारी है किसी भी तस्वीर पर। 
ग़म और ख़ुशी के वक़्त
उनके शब्द
तस्वीरों का काम करती है।
मुझे अक्सर लगता है कि 
पिता 
तस्वीरों में
स्थिर दिखते हैं,
जबकि बाबूजी
स्थिर कभी रहे ही नहीं
मुझे अक्सर लगता है
मानो पिता तस्वीरों में क़ैद हैं,
जबकि बाबूजी 
कभी क़ैद हुए ही नहीं।
मुझे
पिता फ़्रेम में अजीब लगते हैं
बाबूजी तो फ़्रेम तोड़ते थे

खेत के आल की तरह...