Thursday, November 21, 2019

खेत संवारने का मौसम

खेत को संवारने का मौसम आया है। फसल चक्र में खेत की दुनिया को महसूस करने का हक किसान को ही मिलता है। खेत की दुनिया और मां का आँचल सब एक सा लगने लगता है। 

धान की कटाई और तैयारी के बाद सूने पड़े खेत को जब अगली फसल के लिए हम तैयार करते हैं, जब माटी को हम ट्रेक्टर के लोहे के हल से तोड़ कर मिट्टी का रंग बदलते देखते हैं तो ऐसा लगता है मानो मां अपने संतान के सिर को सहलाने लगी है, बाल को संवारकर संतान को और भी सुंदर बनाकर लोरी सुनाने लगी है। 

महंगाई के दौर में मक्का का बीज भले ही चिढ़ा रहा हो लेकिन इसके बावजूद किसान अपने किसानी कर्म से हाथ नहीं छुड़ाता है, यही किसान का धर्म है। खेत की तैयारी का समाजशास्त्र दरसअल किसान के दुआर और आँगन का अर्थशास्त्र होता है। किसान का संतोष ही किसान का बल है और शायद यही हमारी कमजोरी भी है।

ट्रेक्टर की फटफट आवाज और ट्रेक्टर चालक की आंख, ये दोनों ही खेत को संवारने में अहम भूमिका अदा करती है और यह सब जब हम खेत के आल पे खड़े होकर निहारते हैं तो सबसे अधिक बाबूजी की याद आती है। वे खुद ट्रेक्टर चलाते थे, बांह वाली कोठारी की गंजी पहने बाबूजी की छवि मन के फ्रेम में टंगी है। वे यात्रा पे चले गए, अब तो पांच बरस होने को चला लेकिन अब भी वे खेत-दुआर में चलते-फिरते दिख जाते हैं। 

बाबूजी की स्मृति अपने लिए वह ताकत है , जिसके बल पर यह किसान खेत की यात्रा करता है, दुनिया जहान से संवाद करता है। खेत को संवारने का उनका तरीका उनकी डायरी में पढ़ता हूँ तो उनके करीब पहुंच जाता हूं। वे खेत को फसल के नक्शे पे डाल देते थे और फिर सबकुछ प्रकृति के आंचल में बांधकर किताबों और लोक की दुनिया में डूब जाते थे। 

आज जब समय मशीन के बल पर बदलने को आतुर है, तब उनकी स्मृति पोखर के शांत जल की तरह लग रही है, जिसमें प्रवाह तो नहीं है लेकिन उसके भीतर जीवन है। शाम से पहले चिड़िया चुनमुन चचचह करते जब पानी के लिए पोखर तक पहुंचती है तो लगता है बाबूजी हैं यहीं , मेरे करीब।

Sunday, November 17, 2019

पूर्णिया में बापू


 “अगर हिंदुस्‍तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्‍वीर की सच्‍चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी।”

गांधी जी की इस बात को जब भी पढ़ता हूं, भीतर साहस का संचार होता है। गांधी जी की बात जब भी कहीं सुनता हूं तो लगता है कि गांधी हैं, यहीं कहीं आसपास।

हाल ही में भितिहरवा आश्रम गया था, वहां पहुंचकर लगा कि गांधी किस तरह चंपारण को अपने मन में बसा लिए। फिर लौटकर अपने शहर पूर्णिया आता हूं। इतिहास के पन्नों में दर्ज बापू की पूर्णिया यात्रा को कई बार पढा था। 2014 के आम चुनाव के दौरान पूर्णिया जिला के टिकापट्टी इलाके की य़ात्रा की थी। य़ात्रा के सूत्रधार सुशांत झा थे। सुशांत भाई ने रामचंद्र गुहा की किताबों का अनुवाद किया है। गांधी जी के शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफ़र पर गुहा ने 'गांधी भारत से पहले' किताब लिखी है और उनकी दूसरी किताब जो मुझे गांधी जी के क़रीब पहुँचाने का काम किया वह है- 'भारत गांधी के बाद'। सुशांत भाई हमें टिकापट्टी ले जाते हैं, वे मुझे गांधी सदन दिखाते हैं, याद करता हूं तो सिहर जाता हूं। जहां 1934 में गांधी आए थे, वहां की स्थिति देखकर मन टूट जाता है लेकिन भरोसा नहीं टूटता है।

सुशांत भाई हमें गांधी जी के पूर्णिया यात्रा की कहानी सुनाते हैं, गांधी सदन के बरामदे पे बैठकर हम सुशांत भाई को सुनते रहे लेकिन मन के भीतर इस परिसर की स्थिति को देखकर कई बातें चल रही थी। घंटा भर वहां रहे फिर पूर्णिया लौट आए। वह चुनाव का साल था, शहर में गहमागहमी थी। हर दल के बड़े नेता रैली में भीड़ को संबोधित करते थे हालांकि किसी के मुंह से गांधी और पूर्णिया की बात सुनने को नहीं मिली। वक्त गुजरता है, गाहे-बगाहे टिकापट्टी जाता रहता हूं इस उम्मीद के साथ कि चंपारण की तरह पूर्णिया में भी बापू के पदचिन्हों पर कुछ बनता दिख जाएगा एक दिन...

अब 2014 से आगे हम 2019 की बात करते हैं। सितंबर के महीने में पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार से मुलाकात होती है, बातचीत में टिकापट्टी का जिक्र होता है। फिर दो अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर पूर्णिया समाहरणालय परिसर में एक संगोष्ठी के आयोजन में उनको सुनता हूं। इसके बाद भी बातचीत में गांधी जी के पूर्णिया यात्रा पर बात होती रहती है। 30 अक्टूबर 2019 को जिलाधिकारी राहुल कुमार टिकापट्टी जाते हैं और फिर उसी दिन से गांधी सदन को लेकर बात आगे बढ़ने लगती है, एक उम्मीद जग जाती  है कि शायद अब टिकापट्टी की सूरत बदल जाएगी। फिर एक दिन खबर आती है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार टिकापट्टी स्थित गांधी सदन आएंगे, हालांकि जिला प्रशासन पहले से गांधी सदन को एक रुप देने की तैयारी में जुट गया था और मुख्यमंत्री के आगमन की सूचना के बाद तो टिकापट्टी की तस्वीर ही बदलने लगी।

15 नवंबर 2019 को नीतीश कुमार टिकापट्टी स्थित गांधी सदन पहुंचते हैं। परिसर में हम गांधी के प्रिय भजन वैष्णव जन.. की धुन सुनते हैं। परिसर गांधीमय था। भीतिहरवा आश्रम की झलक वहां दिख रही थी। मुख्यमंत्री परिसर को देखते हैं, वे गांधी सदन के कमरे में लगी फोटो प्रदर्शनी देखते हैं। इन सबके बीच मैं चुपचाप पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार के चेहरे को देखता हूं, गांधी और उनके चरखे के बारे में सोचता हूं। एक उजड़े- बिखरे परिसर में गांधी की स्मृति को जीवंत करने वाले अपने नायक को मैं चुपचाप देखता रह जाता हूं। रेणु के इस अंचल में साहित्य-कला अनुरागी अपने जिलाधिकारी को बापू की स्मृति को जीवंत करते देखता हूं। मैला आंचल में एक जगह रेणु लिखते हैं- सतगुरु हो! जै गांधीजी! …बाबा …जै ... भीतर रेणु का बावनदास मानो बता रहा हो कि दुनिया जैसी भी हो गांधी रहेंगे....

टिकापट्टी को बदलते देखना दरअसल मेरे लिए एक कहानी की ही तरह है। हम टिकापट्टी के गांधी सदन को महसूस करते हैं, वहां की धूल से ऊर्जा हासिल करते हैं। खादी की धोती पहने और गोल फ़्रेम का चश्मा लगाए सपाट वक्ता गांधी और उनकी लाठी को हम यहां महसूस करते हैं।

बापू की सादगी भी हमें खिंचती है। कोई आदमी इतनी ऊँचाई पर पहुँचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रखा होगा, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी। नए रुप में गांधी सदन को देखता हूं तो वही सादगी दिखती है और वही सादगी इस परिसर को जीवंत करने वाले राहुल कुमार में हम देखते हैं।  टिकापट्टी के गांधी सदन को जीवंत करने वाले राहुल कुमार की मेहनत बताती है -

" सुन रे मानुष भाई,
सवार ऊपर मानुष सत्य
ताहार ऊपर किछु नाईं "

Monday, October 21, 2019

क्या आप स्वच्छाग्रही हैं?

स्वच्छता को लेकर खूब लिखता -पढ़ता रहा हूँ लेकिन इन दिनों लिखने -पढ़ने के साथ ग्राउंड जीरो में समय बिता रहा हूँ। खासकर उस इलाके में जहां 'शौचालय नहीं है, सफाई नहीं है, स्कूल दूर है' जैसी बातें मुहावरे की तरह लोगबाग की जुबान पर चढ़ा हुआ है। 

थोड़ा पीछे चलते हैं। अप्रैल 2018 की बात है। 'चलो चंपारण- स्वच्छाग्रह से सत्याग्रह' नामक एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन हुआ था। शौचालय निर्माण आदि को लेकर खूब काम हुआ था। प्रधानमंत्री जी का एक बड़ा कार्यक्रम मोतिहारी में आयोजित हुआ था। प्रधानमंत्री जी के कार्यक्रम से पहले और उनके कार्यक्रम तक यूनिसेफ की तरफ से मुझे लोहिया स्वच्छ बिहार मिशन के  साथ मिलकर बिहार के सभी जिले की दैनिक रिपोर्ट भेजनी होती थी। 

मैं पटना में 'एसी कमरे' में बैठकर हर जिले के कॉर्डिनेटर के साथ सम्पर्क में था और स्वच्छता को लेकर जो भी काम हो रहा था, उसकी रपट फाइल करता था, वह अद्भुत अनुभव रहा लेकिन वह फील्ड वर्क नहीं था।

अब आइये 19 अक्टूबर 2019 की बात करते हैं। पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार शौचालय निर्माण में तेजी के लिए एक स्पेशल ड्राइव आरम्भ करते हैं- 100 घण्टे का स्पेशल ड्राइव ताकि हर घर में बन जाये शौचालय। 

हमने सोचा कि इस बार जमीन का अनुभव हासिल करते हैं, चुपचाप ही सही स्वच्छाग्रही बनते हैं, पटना के एसी कमरे में बैठकर स्वच्छाग्रही की रपट तैयार करने में जो कुछ अपने भीतर चल रहा था, उसको ग्राउंड में अनुभव करते हैं। यही वजह है कि राहुल सर के इस ड्राइव को दिन -रात ग्राउंड जीरो में जाकर देखने लगा हूँ। 

मेरा गाम घर जो पूर्णिया जिला के चनका पंचायत में है, वहां और आसपास के गाँव में सुबह-दोपहर-शाम में लोगों को शौचालय निर्माण के प्रति हाथ बढाते देखने लगा। प्रखण्ड और जिला स्तर के अधिकारियों को सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों से रूबरू होते देख रहा हूँ, जो कि सुखद अनुभव है, मेरी स्मृति में सबकुछ दर्ज होता जा रहा है, जिसे आगे भी लिखना है।

हम लिखते - पढ़ते वक्त चाहे कुछ भी कह दें लेकिन लोगबाग को सरकारी सुविधाओं से जोड़ना चुनौती भरा काम है। शौचालय के लिए जमीन और ईंट-बालू -सीमेंट की ही केवल आवश्यकता नहीं होती है बल्कि जिसे बनाना है, उसके मन के भीतर भी एक निर्माण कार्य सम्बंधित अधिकारी , कर्मचारी या पंचायत स्तर के जनप्रतिनिधि को करना होता है। इन दिनों हर दिन यही देख रहा हूँ।

याद आता है जब प्रधानमंत्री जी के 'चलो चंपारण-स्वच्छाग्रह से सत्याग्रह' के लिए रपट तैयार कर रहा था तब केवल एक्ससेल सीट और अखबारों के कतरन , मीडिया के वीडियो फुटेज को ही देखता-पढ़ता था और कई बार जिला स्तर पर यूनिसेफ- लोहिया स्वच्छ बिहार मिशन के सहयोगियों से बात करते हुए लगता था कि यह काम कितना आसान है !आराम से कंप्यूटर स्क्रीन पर रपट को देखना लेकिन अब समझ रहा हूँ कि ग्राउंड जीरो में कितना कुछ करना पड़ता है। 

लोगों के बीच जाकर जब आप जागरूकता का मोर्चा  थामते हैं तब बहुत धैर्य से बहुत कुछ सुनना पड़ता है।

हम पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार जी के शुक्रगुज़ार हैं जो जिला को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) कराने के लिए स्पेशल ड्राइव चला रहे हैं, जिसे गाम घर में उत्सव की तरह देखा जा रहा है।  हर दूसरा आदमी स्वच्छाग्रही दिख रहा है जो शौचालय को लेकर बहस भी कर रहा है, आलोचना भी कर रहा है और फिर कुदाल थाम कर अपने परिवार को एक अस्वच्छ आदत से मुक्त करने के लिए निर्माण काम में जुट जाता है।

Sunday, October 06, 2019

कुमारी भोजन

दुर्गा पूजा के दौरान छोटी बच्चियों को देवी मानकर भोजन कराने की परंपरा है। अष्टमी और नवमी को तो खास तौर पर।

पूजा के दौरान पंखुड़ी को जब कुमारी भोजन के लिए एक जगह ले गया और फिर वापस उसके संग घर लौटा तो बेटी पूछ बैठी कि आज सब मुझे प्रणाम क्यूं कर रहे हैं? पंखुड़ी के सवाल ने सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि हम सब कितने बहुरुपिये हैं, कितने तरह के मुखौटे लगाए जीवन जी रहे हैं।

एक तरफ जहां बेटे को लेकर तमाम तरह की धारणाएं बनी हैं कि बेटा ही कुल बढ़ाएगा आदि-आदि। या बेटी बचाओ जैसी बातें, वहीं जब दुर्गा पूजा में कुमारी भोजन के लिए बेटी की खोज करते लोगों को देखता हूं और फिर कुमारी भोजन के बाद दो-तीन मिनट बेटी की पूजा करते लोगों को देखता हूं तो लगता है कि हम कितने तरह का नाटक रचते हैं।

कुमारी भोजन की यह परंपरा हर जगह दिखती है। वहीं पूजा के मेले में छेड़छाड़ की घटनाएं भी आम है। एक तरफ कुमारी पूजा भोजन वहीं दूसरी तरफ लड़कियों के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं..

हम मुखौटे में जीने लगे हैं। धर्म के नाम पर बेटी की पूजा वहीं बेटे के लिए मन्नत मांगते लोग भी हैं और सबसे खतरनाक बेटियों के साथ छेड़छाड़ और हिंसा।

ऐसे में कुमारी भोजन को लेकर पंखुड़ी के सवाल ने तो एक पल के लिए सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि क्या जवाब दिया जाए लेकिन लगा कि मुझे भी मुखौटा उतार कर बेटी से बात करनी चाहिए। 

Saturday, October 05, 2019

किताबों के संग बाबूजी

आज बाबूजी का जन्मदिन है। वे होते तो आज 68 साल के रहते। ज़िंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव के बीच उन्हें आज भी रहना चाहिए था, ताकि वे देखते हम सबको...हालांकि यही एक चीज है, जिसके बारे में हम कुछ नहीं कह सकते...

उनका जीवन खेत-पथार के संग किताबों के संग रमता था। वे पढ़ते थे, खूब पढ़ते थे। उनकी एक समृद्ध लाइब्रेरी हुआ करती थी, वे किताब बाँटते थे। उनकी कई आदतों में एक था- किताब बांटना। 17 साल की उम्र में उन्होंने एक निजी पुस्तकालय बनाया, जिसे वे समृद्ध करते रहे। धान, पटुआ, मूंग, गेंहूँ के संग वे दुआर को किताब से भी सजाते रहे।

हमने कभी उन्हें अपना जन्मदिन मनाते नहीं देखा लेकिन जब घर में कई पुरानी किताबों को देखता हूँ तो उस पर किताब खरीदने की तारीख पढ़ता हूँ तो वह 5 अक्टूबर होता है, मतलब जन्मदिन पर वे किताब खरीदते थे।

यह सब लिखते हुए अपने भीतर खुद को टटोलने लगता हूं। आज जब पूर्णिया में किताब की दुकान पर जाना हुआ तो लगा कि बाबूजी ने ही आज यहां भेजा है।

हिंदी की नई नई किताबें बाबूजी पूर्णिया में जिस दुकान से खरीदते थे, वहीं चला गया। लालमुनि काका की दुकान से किताबें खरीदकर और फिर मोटरसाइकिल के कैरियर में बांध कर बाबूजी चनका लौटते थे।

आज लालमुनि काका की दुकान में उनकी प्रिय किताब  'रागदरबारी' दिख गई। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का 41 वां संस्करण आया है।

हमने सातवीं बार फिर से श्रीलाल शुक्ल जी इस किताब की खरीदारी की। दरअसल छह लोग बारी -बारी से पढ़ने ले गए और फिर लौटकर 'रागदरबारी' घर न आ सका।

बाबूजी, दोपहर में पढ़ते थे। वे जब किताबों में रम जाते तो कुछ नहीं करते। पढ़ते हुए जहां वे रुक जाते, उन पन्नों के बीच धान की बालियां सूखा कर रखते थे, स्मृति के लिए।

बाबूजी का जन्मदिन और किताबों की चर्चा करना इसलिए भी रास आता है क्योंकि वे कहते थे कि आने वाली पीढ़ी को घर में कुछ किताबें भी मिलनी चाहिए। पुस्तकालय से उन्हें लगाव था, संस्थागत हो या फिर निजी, वे पुस्तकालय को पूरा स्नेह देते थे।

अपने जीवन के सबसे कठिन दौर में , जब बीमारी की वजह से वे कम बोलते थे और उठ नहीं सकते थे तब उन्होंने मुझसे कहा था कि लाइब्रेरी की सभी किताबें एक सामुदायिक पुस्तकालय को दे दिया जाए। उन्होंने अपनी खरीदी अधिकांश किताबें मधुबनी जिला स्थित यदुनाथ सार्वजनिक पुस्तकालय को दे दी। उस वक्त मैंने कहा था कि कुछ किताबें घर में रहने दीजिए, मुझे उनका किताब घर चाहिए था। लेकिन उन्होंने साफ मना कर दिया और जो उन्होंने कहा, वह मुझे हमेशा याद रहेगा; उन्होंने कहा था- " किताब खरीदने की आदत डालो, किताब के लिए पैसे खर्च करो, अन्य खर्च पर नियंत्रण कर किताब की दुकान में समय बिताओ..."

आज बाबूजी नहीं हैं लेकिन किताब की दुनिया उनकी जगमग कर रही है। हम सबकी आदत में किताब पढ़ना शामिल है। किताबें हमें भीतर से समृद्ध करती है, किताबें हमें विपरित से विपरित परिस्थितियों में राह दिखाती है।

Friday, October 04, 2019

क्या है अपने लिए सोशल नेटवर्क

इंटरनेट ने जिस तेजी से हमारी ज़िंदगी में पैठ बनाई है, उससे आभास होता है कि हम अभी और इसके भीतर भटकेंगे। वैसे भी जीवन में यदि भटके नहीं तो फिर जीवन ही क्या ! हम सभी बोलचाल की भाषा में तकनीकी शब्दों का बख़ूबी इस्तेमाल करने लगे हैं और यही वजह है कि इंटरनेट की बनाई आभासी दुनिया में हम आराम से घुल-मिल चुके हैं। गाँव-घर   का चौपाल हो या फिर शहर के चौक-चौराहे, अब ये सब भी वर्चुअल होने लगे हैं। मानो 'वर्चुअल वर्ल्ड' ने असल ज़िंदगी पर वर्चस्व क़ायम कर लिया हो। 

वैसे मेरा मानना है कि हमलोगों को  इंटरनेट के प्रयोग करने की आदत जब से पड़ी है, तब से ही मन की दीवारें छोटी पड़ने लगी है और लगता है कि कभी भी यह दीवार टूट सकती है। यह सोचकर अच्छा भी लगता है कि हम सभी विस्तार के लिए पुरानी सीमाओं को तोड़ रहे हैं। 

इस दुनिया में गोता लगाते हुए ऐसा लगता है मानो मैं यहां सदियों से भटक रहा हूं, सारे के सारे चेहरे परिचित नजर आते हैं। जब गाँव से दूर था तब इसीके ज़रिए अपनी अंचल की यादों की पोटली खोला करता था। तब भी मुझे यहाँ अपनी जमीं दिखती थी। सच पूछिए तो शुरुआत  से ही रेडिफ, याहू, हॉट मेल और फिर अब जीमेल-फ़ेसबुक-ट्विटर से यारी कभी महंगी नहीं पड़ी। सब एक दूसरे से जुड़ते चले गए और मेरे 'मैं' का विस्तार होता चला गया। साथ ही साथ घर की बाउंड्री का भी विस्तार होने लगा। 

पहले ऑरकुट और फिर फेसबुक व ट्विटर की मेरे मानस में उपस्थिति भी कुछ-कुछ ऐसी ही है। मेरा मानना है कि इन सबने हम सभी के ' मैं 'का विस्तार किया है। कबीर कहते हैं न- "बिन धरती एक मंडल दीसे/बिन सरोवर जूँ पानी रे/गगन मंडलू में होए उजियाला/बोल गुरु-मुख बानी हो जी…"

इंटरनेट के विभिन्न सोशल नेटवर्किंग चैनल मेरे लिए यही कर रहे हैं। ये सब मेरे लिए कबीर रच रहे हैं, गुलजार बो रहे हैं और तो और, कुछ रेणु के बीज भी बो रहे हैं। ऐसे में मुझे यह दुनिया भी किसानी लगती है और आभासी दुनिया में भी मैं काश्तकार बन जाता हूं, जो मेरा मूल है।  

ऑरकुट के दोस्त फेसबुक के प्लेटफ़ार्म पर कॉमन हो गए तो जिले के पड़ोसी और संबंधी यहां और भी करीबी बन गए। व्हाटसअप की दुनिया हमें चिट्ठी पतरी वाले दिनों  में लेकर चली जाती है। 

इस दुनिया में दोस्तों की आवाजाही लगातार बनी रहती है। यहाँ बेबाक़ होकर हम सब एक दूसरे की आलोचना करते हैं, प्रेम करते हैं, मानो बनारस के किसी घाट पर पंडित छन्नू लाल मिश्रा कह रहे हों- नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी/ पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी….। 

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दोस्तों को एकजुट करने में उम्र कभी बाधा नहीं बनी। 70 साल के राधेश्याम वर्मा भी दोस्तों की लिस्ट में शामिल हैं तो 14 साल का नीतिन भी। राधेश्याम जी किताबों पर चर्चा करते हैं तो नीतिन फिल्मों पर बात करता है। हरी बत्ती जलते देख (चैट) सब एक हो जाते हैं। बातचीत औपचारिक से कब आत्मीय हो जाती है पता ही नहीं चलता। 

अक्सर फेसबुक के चौराहे पर कई लोग टकराते हैं। ऐसे अवसरों पर लगता है, मानो यह कोई स्टेज हो, जहां सब हर दिन सज-धज के आते हैं और अपने किरदार को निभाकर निकल जाते हैं, अपने घर की ओर। और मैं, इन सबमें अपना चेहरा खोजने जुट जाता हूं। तभी पर्दे के पीछे से रवींद्र नाथ टैगोर के शब्द गूंजने लगते हैं-  विश्वरुपेर खेलाघरे/ कतई गेलेम खेले/ आपरूप के देखे गेलेम/दुटि नयन मेले../जाबार दिने...

हमने कभी भी इस दुनिया को आभासी नहीं माना, और न ही ख्वाब। हम इसमें भी एक शहर बसाते हैं, एक चौक तैयार करते हैं। ऐसे लोगों से और करीब आते हैं, जिससे मन की बातें थोक के भाव में कर सकें, जिन्हें ड्राइंगरुम में बुलाकर अच्छी चाय पिला सकें.... सब अपने हैं यहां, कोई नहीं है पराया....। आइए, आप भी मेरे गाँव के खेतों की दुनिया की तरह फेसबुक आंगन में दाखिल हो जाइए, कुछ बात करते हैं, कुछ कहानियां गढ़ते हैं, कुछ गीत गाते हैं। बस यह ध्यान रहे, आभासी दुनिया हमारे असल दुनिया पर हावी न हो जाए। 


Wednesday, October 02, 2019

'पूर्णिया में गांधी'

पिछले कुछ दिनों से लगातार बारिश हो रही थी। सबकुछ पानी-पानी था। फिर अचानक दो अक्टूबर को धूप उग आती है। सबकुछ सामान्य सा लगने लगता है। जीवन यही है। हम यहां धूप-छांव का ही खेल देखते हैं और इसी खेल में हम न जाने कितने रंगों में अपने भीतर भरम पाल लेते हैं। ऐसे ही वक्त हमें गांधी के मूल्यों की प्रासंगिकता का ख्याल आता है कि यह सुहाना भऱम एक दिन सबका टूट जाएगा और बस रह जाएगा आपका सच। आपका सच ही आपकी छवि तैयार करता है।

घर में बाबूजी की ढेर सारी डायरी है, वे रोज अपनी डायरी लिखते थे, जिसे हाथ लगाने का मौका तब मिला जब वे हमें छोड़कर अनंत यात्रा पर निकल गए। बाबूजी की सभी डायरी के ऊपर गांधी जी की छवि अंकित है, दरअसल ये डायरी ‘बिहार खादी ग्रामोद्योग संघ’ की है, जिसका नाम ही है- ‘सर्वोदय डायरी’। हम इन्हीं डायरी के जरिए गांधी के करीब पहुंचे। बचपन में बापू किताबों के जरिए आते हैं और फिर उम्र बढ़ने के साथ हम उनके और करीब होते चले जाते हैं।
एक अक्टूबर की बात है, पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार जी से बात होती है और दो अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर एक संवाद गोष्ठी के आयोजन की रुपरेखा तैयार होती है।

गांधी शब्द से अपनापा है, ऐसे में शहर के कुछ लोगों का साथ मिलता है और जिला समाहरणालय परिसर में गांधी के मूल्यों की प्रासंगिकता पर बातचीत शुरु होती है। गांधी को समझने की कोशिश करते हुए हमने यह जाना कि महात्मा को सत्य और संवाद में भरोसा था। उनके बहिष्कार में भी एक संवाद था। आज पूर्णिया में गांधीजी की 150 वीं जयंती पर आयोजित इस कार्यक्रम में हमने उसी संवाद को महसूस किया। हमने जिलाधिकारी की सहजता में गांधी का संवाद पर जो भरोसा था, उसे महसूस किया।

कार्यक्रम में तीन वक्ता थे, डॉक्टर निरुपमा राय, विषेख चौहान और चंद्रकांत जी। इन तीनों ने अपने विचार रखे। सुनकर बहुत कुछ सीखने को मिला। लेकिन जिस चीज ने मुझे आकर्षित किया, वह था अधिकारियों के साथ लोगों का सीधा संवाद। पुस्तकालय की बात हुई, किताब पढ़ने की आदत को लेकर बातें हुई, स्वच्छता की बात हुई, यह सभी बातें एक दूसरे के साथ सीधा संवाद के तरीके से हुई, ऐसा नहीं हुआ कि कोई एक बोलता जा रहा है और बांकी लोग बस सुन रहे हैं।

हमने कार्यक्रम में गांधी जी के प्रिय भजनों को बांसुरी के सुर में सुना। गांधी के साथ संगीत का अपना अलग ही महत्व है। निजी तौर पर गांधी जी के बारे में बहुत कुछ जानने का अवसर हमें लेखक रामचंद्र गुहा देते हैं। रामचंद्र गुहा की लेखनी से परिचय के सूत्रधार बनते हैं - सुशांत झा। सुशांत भाई ने रामचंद्र गुहा की किताबों का अनुवाद किया है। गांधी जी के शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफ़र पर गुहा ने 'गांधी भारत से पहले' किताब लिखी है और उनकी दूसरी किताब जिसने मुझे गांधी जी के क़रीब पहुंचाने का काम किया वह है - 'भारत गांधी के बाद.'

बचपन से सुनता आया हूं कि गांधी जी बिहार दौरे में पूर्णिया प्रवास भी करते थे। यहां उनके नाम पर दो मुख्य आश्रम हैं, एक टिकापट्टी में और दूसरा रानीपतरा में। आज जब जिला समाहरणालय परिसर में गांधीजी के बारे में बात हो रही थी तो लग रहा था कि गांधी यहीं कहीं आसपास हैं और पंचायती राज पर अपनी बात रख रहे हैं। दरअसल गांधी जी की सादगी हम सबको उनके करीब लाती है। कोई आदमी इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रख सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। आज के कार्यक्रम में एक युवा ने जिस सहजता से पुस्तकालय को लेकर सवाल किया और जिलाधिकारी ने जिस सादगी से जवाब दिया, उस पर और लंबी बात होनी चाहिए। जिलाधिकारी ने बड़ी सादगी से कहा कि सबकुछ संघर्ष से हासिल होता है। वे चाहते तो कह सकते थे कि सबकुछ हो जाएगा लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं कहा, यही सहजता, सरलता बताती है कि हमें गांधी के और करीब आना चाहिए। राहुल जी ने ठीक ही कहा कि हमें महात्मा गांधी के भीतर की अच्छाइयों के संग उनके चरित्र का सम्यक व निष्पक्ष मूल्यांकन भी करना चाहिए,  तब जाकर ही हम गांधी को लेकर संवाद कर सकते हैं।

एक श्रोता के तौर पर मैं सभा कक्ष में कुछ देर के लिए यह सोचने लगा कि गांधी कितनी सहजता से आज भी हम सभी के भीतर यात्रा कर रहे हैं, भले हम माने या ना माने। बात यह है कि महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी, यह उनकी आत्मा से उपजी थी, जब उन्होंने देखा था कि ब्रिटिश हुकूमत में भारत का आम आदमी भूखा और नंगा बना दिया गया है तो उन्होंने अपना कपड़ा खुद बुना और खुद धोया। यही सादगी हमें चंपारण से लेकर देश दुनिया की सैर कराती है और यह भरोसा दिलाती है कि गांधी कभी भी अप्रसांगिक नहीं होंगे।

हमें गांधी को और समझने की जरुरत है, इसके लिए हमें बहुत पढना होगा। जिलाधिकारी और अन्य वक्ताओं ने ठीक ही कहा कि हमें गांधी को समझने के लिए उनके लिखे को पढ़ना होगा। निजी तौर पर यह कार्यक्रम मेरे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि मैं संवाद को देखना चाहता था, जहां सवाल ज्यादा हो और भाषण कम। दरअअसल हमें 'गांधी' शब्द को इसलिए भी समझना होगा क्योंकि महात्मा ही वह शख़्स थे, जिन्होंने आज़ादी मिलने के दिन जश्न मनाने के बजाय शोक मनाने का फ़ैसला किया था। आज़ादी का नायक कलकत्ता में शोक मना रहा था तो सरहद पार मशहूर शायर फ़ैज़ कह रहे थे -
"ये दाग- दाग उजाला, ये सबगजीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं..."

दरअसल गांधी भरम में नहीं जीते थे, उन्हें यथार्थ से प्रेम था, इसलिए वे जश्न से कोसों दूर शोक मनाते हुए भी संवाद स्थापित कर रहे थे।