Monday, April 24, 2017

'रवीश को गरियाओ राष्ट्रीय योजना आयोग'

यह मुल्क का 'गरियाओ काल' है। जो बिना मतलब के गरियाएगा वही सही कहलाएगा। स्कूल,सड़क, बिजली, अस्पताल आदि के हाल पर न बोलकर, उन मुद्दों की बात करने वाला ही महान कहलाता है जो सोशल मीडिया की अटरिया पे गरियाने में एक्सपर्ट है।

लोगों को गुट में बाँटकर वाट्सएप ग्रुप में तरह-तरह का ज्ञान ठेलने वालों के आकाओं ने एनडीटीवी पत्रकार रवीश कुमार के ख़िलाफ़ एक आयोग ही बना लिया है शायद। एक पत्रकार के ख़िलाफ़ किस तरह से राष्ट्रीय योजना काम कर रही है इस पर किसी शोधार्थी को शोध करना चाहिए।

रवीश की चुप्पी, रवीश की बोली, रवीश का लिखा, रवीश का कहीं जाना आदि मुद्दों पर सीधे गरिया देना ही इस राष्ट्रीय योजना का मुख्य उद्देश्य है।

हाल ही में रवीश पूर्णिया आए थे। पूर्णिया क्यों आए , इस पर भी गरियाने का काम हो गया। रवीश से जो मिला उसके लिए भी रवीश को गरिया दिया गया। फणीश्वर नाथ रेणु के परिवार ने उन्हें सम्मानित किया तो रवीश को गरियाओ राष्ट्रीय योजना आयोग को मसाला मिल गया। गरियाने वाला भूल गया कि फणीश्वर नाथ रेणु भी पत्रकारिता पेशे में थे। वे दिनमान पत्रिका में रिपोतार्ज लिखते थे। हालाँकि यह सच है कि गरियाने वाला तर्क पर विश्वास नहीं करता , वह केवल रायता फैलाने पर भरोसा करता है।

राजनीतिक दल के वाट्सएप ग्रुप पर रवीश की तस्वीर डालकर गाली-गलोच का राष्ट्रीय विमर्श किया जा रहा है। जो विमर्श में हिस्सा ले रहा है उसके मोहल्ले में कचड़े का ढ़ेर है लेकिन इस पर सब चुप्पी साधकर स्वच्छ भारत की परिकल्पना की जा रही है।

विपक्ष के अभाव में पक्ष ही अब हो-हल्ला कर पक्ष को सज़ा-सँवार रहा है। सोशल मीडिया सैलून बन गया है, जहाँ लोगबाग़ अब लठैत बनकर संवर रहे है।

रवीश को गरियाने वाला अब कोकाकोला बन गया है लेकिन अफ़सोस गरियाने वाला मुद्दे की बातों पर ज़बरदस्त चुप्पी साध लेता है। ऐसे में यदि किसी को पता हो कि 'रवीश को गरियाओ राष्ट्रीय योजना आयोग' का कार्यालय कहाँ है तो बताने का कष्ट करिएगा, भले ही मुझे भी गरिया दीजिएगा।

आपका
गिरीन्द्र

Monday, April 10, 2017

चम्पारण सत्याग्रह के सौ साल की ख़बरों के बीच...

पूर्णिया में एक मोहल्ला है -श्रीनगर हाता। कलक्टर साहेब और अन्य आला अधिकारियों का आवास इसी मोहल्ले में है, इसलिए इलाक़ा सबसे साफ़ है। आज सुबह सुबह यहाँ दो ट्रक दिखे, जिसमें गांधी जी की बड़ी-बड़ी तस्वीर लगी थी। ट्रक को रथ का लुक दिया गया है। गांधी जी के चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष के अवसर पर बिहार सरकार ने उनके संदेश, विचारों एवं जीवन पर बने फ़िल्म को आम लोगों के बीच पहुँचाने की योजना बनाई है। रथनुमा ट्रक के पास ही एक युवक से मुलाक़ात होती है। बातचीत के दौरान उसने बताया ' सब गांधी-गांधी हो गया है भैया। बिहार सेलिब्रेशन के मूड में है। अपना बिहार अब इवेंट स्टेट बन गया है।"

बिहार से बाहर पढ़ाई कर रहे इस युवा की बात मैं सुनता रहा। घर लौटकर जब अख़बार देखा तो गांधी जी से सम्बंधित लेख से समाचार पत्र भरे थे। यह सब पढ़ते हुए जिस दूसरी ख़बर पर नज़र टिकी वह थी- 'श्रीनगर में ख़ूनी मतदान फ़ायरिंग में छह की मौत '। 

चम्पारण सत्याग्रह के सौ साल की ख़बरों , समारोह की सूचनाओं के बीच हम सब किस मोड़ पर खड़े हैं, इस पर विचार किया जाना चाहिए। गांधी जी को याद हम सब साल में दो बार तो ज़रूर ही करते हैं लेकिन उनके बताए रास्ते पर क्या हम चल रहे हैं ? 


पूर्णिया में गांधी जी के नाम पर दो मुख्य आश्रम हैं, एक टिकापट्टी में और दूसरा रानीपतरा में। दोनों ही आश्रम अब बस नाम के हैं। सबकुछ टूट चुका है । पता नहीं सत्याग्रह के सौ साल के नाम पर इन आश्रमों की साफ़-सफ़ाई हुई या नहीं। हमारे प्रिय मित्र सुशांत झा एक बार पूर्णिया आये थे तो उनके संग टिकापट्टी गया था लेकिन वहाँ गांधी जी के बारे में  बताने वाला कोई नहीं मिला। सुशांत भाई ने रामचंद्र गुहा की किताबों का अनुवाद किया है. गांधी जी के शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफ़र पर गुहा ने 'गांधी भारत से पहले' किताब लिखी है और उनकी दूसरी किताब जिसने मुझे गांधी जी के क़रीब पहुंचाने का काम किया वह है - 'भारत गांधी के बाद.'

गांधी जी की बातें अभी हम सभी कर रहे हैं लेकिन इसकी भी वेलेडीटी पीरियड होगी, कार्यक्रम ख़त्म तो बातें भी ख़त्म। लेकिन क्या यह उचित है? याद करिए प्रकाश उत्सव  के बाद भी क्या पटना उतना ही चमक रहा है, जैसा इवेंट के दौरान जगमग कर रहा था? इस पर बहस होनी चाहिए। 

हमारे ज़िले में बुनियादी विद्यालयों की स्थिति पर कोई नहीं बात कर रहा है। मेरी बुआ 1960 से 1962 तक पूर्णिया ज़िला के श्रीनगर इलाक़े में स्थित एक बुनियादी विद्यालय में पढ़ती थीं। उनकी उम्र अभी 70 साल है। उन्होंने बताया कि उस वक़्त विद्यालय आश्रम की तरह था। सूत काटना उन्होंने वहीं सीखा। बुआ को जब उनके विद्यालय ले गया तो वह फफक फफक कर रोने लगी। बिखर गया था उनका स्कूल। बुनयादी विद्यालय के समीप ही एक विशाल भवन बनकर तैयार था, जिसे मॉडल स्कूल कहा जा रहा है, करोड़ों की लागत वाला। लेकिन गांधी विचार वाला विद्यालय कहीं खो गया है। कहते हैं कि बिहार  के मुख्यमंत्री की प्रमुख योजनाओं में एक यह विशाल-भव्य कंकरीट वाला स्कूल भी है। 

सत्याग्रह सौ साल के नाम पर गांधी जी की बातें हम सभी अलग अलग ढंग से कर रहे हैं। हमें उनकी सादगी पर भी बात करनी चाहिए। इवेंट्स मैनेजमेंट के इस दौर में सरकार को उनकी सादगी का नक़ल ही सही लेकिन करना चाहिए। गांधीजी की सादगी हमें खींचती है। कोई आदमी इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रख सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। अब तो एक छोटे से कार्यक्रम के लिए भी हम मोटा बजट बनाने बैठ जाते हैं । वहीं महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी. यह उनकी आत्मा से उपजी थी, जब उन्होंने देखा था कि ब्रिटिश हुकूमत में भारत का आम आदमी भूखा और नंगा बना दिया गया है. उन्होंने अपना कपड़ा खुद बुना और खुद धोया और जब वे वायसराय लॉर्ड इरविन से मिले तब भी अपनी चिर-परिचत वेशभूषा में थे जिसे देखकर चर्चिल ने घृणा से उन्हें 'अधनंगा फकीर' कहा था। 

हमने शुरुआत में जिस रथनुमा ट्रक की बात कही है उसके बारे में अख़बार से पता चला कि इसे ग्रामीण क्षेत्रों के पंचायतों में भी घुमाया जाएगा। गांधी जी ने कहा था – “अगर हिंदुस्‍तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्‍वीर की सच्‍चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी.” इस बारे में उनके विचार बहुत स्‍पष्‍ट थे. उनका मानना था कि जब पंचायती राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती। लेकिन पंचायत व्यवस्था की हक़ीक़त क्या है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है।  ज़मीन पर गांधी जी का ग्राम स्वराज भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है. दुःख होता है, जब उनके ही नाम से शुरू हुई एक योजना में सबसे अधिक लूट हो रही है, जिसका नाम 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना' है. इस योजना में ग़रीबों के नाम पर जो लूटपाट होती है, उसे देखकर मुझे गांधी जी की मौत पर जॉर्ज बर्नाड शॉ की आई टिप्पणी को ज़ोर-ज़ोर से पढ़ने का मन करता है. शॉ ने कहा था- "गांधी की हत्या बताती है कि अच्छा होना कितना ख़तरनाक होता है..."

Tuesday, April 04, 2017

गाँव इन दिनों

गाँव में इधर बहुत कुछ हो गया, कुछ बुरा तो कुछ अच्छा। मौसम में जब बदलाव आता है तब गाँव में भी बड़े स्तर पर बदलाव दिखते हैं। अंचल में लगातार यात्रा करते हुए कभी कभी लगता है कि जीवन का बही खाता मोटा ही होता जा रहा है लेकिन इन सबके बीच डायरी के पन्नों में फ़ील्ड-नोट्स जुड़ते जा रहे हैं।

अनुभव की थाली में खट्टे-मीठे अचार सजते जा रहे हैं। हमारे इधर ईमली और चीनी को मिलाकर एक अचार बनता है-'खट-मिट्ठी'। मुँह में जाते जाते हुए ही एक अजीब अहसास होता है। एक साथ , एक ही झटके में खट्टा भी और दूसरे ही पल मिठास।

जीवन में जब भी उलझनों से घिरता हूं तब इस अचार के बनने की प्रक्रिया याद कर ख़ुद को समझा लेता हूं।


हाल ही में गाम के दक्षिण टोले में आग लगी थी। इस महीने जब हवा का ज़ोर होता तब अगलगी की घटना बढ़ जाती है। आग की वजह से बिंदेसर का घर जल कर माटी में मिल गया। मटमेले मिट्टी का रंग काला हो गया। मिट्टी का भंडार , जिसे हम यहाँ 'कोठी' कहते हैं, उसमें एक मन चावल था, सब जलकर राख! सुबह तक बिंदेसर का चेहरा आने वाली विपत्तियों के बारे में सोचकर काला हो चुका था। आँगन में मातम फैला था, लेकिन दोपहर तक टोल के सबलोग एकजुट हुए और बिंदेसर की परेशानियों को बाँट लिया।  बिंदेसर के जले घर की काली माटी पर पानी छिड़का गया था, धुआँ अब भी था लेकिन माटी की गंध ने शायद धुआँ को अपने वश कर लिया था। किसी ने बाँस दिया तो किसी ने घास, बिंदेसर का घर बनने लगा। आँगन में बिंदेसर का चार साल का पोता दौड़ लगा रहा था। मानो कुछ हुआ ही न हो।

शाम में टोले के 'पीपल थान' से ढोलक और झाल की आवाज़ें आने लगी थी। रामलखन की आवाज़ में चैता सुनने को मिल रहा था- ""आई गइले चैत के महिनमा हो राम, पिया नहीं आयल।आम मंजरी गेल,लगले टिकोलवा, कोइली कुहुक मारे तनमा हो रामा, पिया नाही आयो।"

बिंदेसर का दुःख इन गीतों और ढोलक-झाल की आवाज़ों में खो गया और ख़ुद बिंदेसर ही मूलगैन बनकर गाने लगा- "जनम लिये रघुरैया हो रामा, चईत महिनवां" । गाँव  में रहते हुए जाना कि जीवन में दुख को हरने की कला पीपल थान जाकर ही समझा जा सकता है। गीत की ताक़त यही है, समूह गान का जादू यही है,  बाबा नागार्जुन की दुःखहरण टिकिया की तरह।

इन दिनों जीवन के प्रपंचों के बीच इस तरह की घटनाओं को जब देखता हूं तब विश्वास बढ़ जाता है, समूहिकता पर भरोसा जग जाता है। रात भर चाँद और टिमटिमाते तारों के बीच बिजली की रोशनी की आवश्यकता नाटक के उस पात्र की तरह जान पड़ती है जिसे मजबूरी में मंच पर खड़ा किया गया हो। कभी कभी महसूस होता है कि प्रकृति से प्रीत और माटी से इश्क़ चाँद की दूधिया रोशनी और बढ़ा देती है ।

इन दिनों हर शाम खेतों की ओर घूमते टहलते हुये जंगली खरगोशों से मुलाक़ात होती है। भूरे रंग का ख़रगोश बाँस बाड़ी और मक्का के खेतों से दौड़कर निकलता है और फिर किसी दूसरे खेत में छुप जाता है। ख़रगोश की तेज़ी देखकर लगता है वह हर बार बाज़ी जीतकर अपना मोहरा हासिल कर लेता है। ख़रगोश की दौड़ देखकर गाम की पगडंडियाँ कनाट प्लेस के सर्किल को तोड़ती दिखने लगती है, आज़ादी का यह भाव अक्सर गाम से दिल्ली के तार को जोड़ देती है। अनायास ही दिल्ली की सड़कें आँखों के सामने आ जाती है। 

इन दिनों ख़ुद को टेलिविज़न और ख़बरों के अन्य माध्यमों से दूर रखने की कोशिश करता हूं। यात्राओं और गाम घर के पुराने लोगों से गुफ़्तगू ज़्यादा करता हूं, इस आशा के साथ कि उनके अनुभवों से कुछ सीख पाऊँ क्योंकि प्रपंच का जाल इतने महीन तरीक़े से समाज में बुना जा चुका है कि हम सब उसमें आसानी से फँसते जा रहे हैं और फँसाने वाला अपनी बाज़ीगिरी से अपनी हाँ में हाँ कहलाने में सफल होता जा रहा है। ऐसे में गाम के बूढ़े लोगों से बातकर अंचल की कथा समझने की कोशिश में जुटा हूं।

इन दिनों गाम के कबीराहा मठ की ओर जाना कम हो गया है।  लेकिन पिछले हफ़्ते अनायास ही मोटरसाइकिल उधर मुड़ गयी। मठ का मकान अब पक्का का हो गया है। मठ की ज़मीन पर मक्का लहलहा रहा है , मठ का विस्तार हो रहा है...लेकिन कबीर तो कहते थे -"राम हमारा नाम जपे रे, हम पायो विश्राम..." यहाँ तो कुछ और ही जपा जा रहा है..ख़ैर अब यह कहना कि - "कबीरा मन निर्मल भया जैसे गंगा नीर.." वाजिब थोड़े माना जाएगा।

इन दिनों यही सब हो रहा है। हाल ही में आँधी-बारिश हुई थी। नुक़सान हुआ लेकिन बिंदेसर को देखकर अपना नुक़सान तो शून्य लगा। हाँ, किशोरवय बाँस जब इस आँधी में टूटकर बिखर गए तब ज़रूर मन टूटा लेकिन जो अपने हाथ में नहीं है उसपर क्या रोना ! मन टूटता है तो जुड़ भी जाता है न ! 

Thursday, March 30, 2017

स्मार्ट सिटी के दौर में स्मार्ट किसान की बात



लीची बगान में नरेश से मुलाकात होती है। नरेश ने कम्पयूटर साइंस की पढ़ाई
की है और अब वह किसानी करेगा। लेकिन नरेश का एक सवाल है। उसने पूछा कि कि क्या स्मार्ट सिटी की तरह स्मार्ट किसान बनाने की भी कोई सरकारी योजना है? दरअसल हम सब स्मार्ट शब्द की माया के फेर में फंस चुके हैं। कुछ लोग तो अब यह भी कह रहे हैं कि यह देश का स्मार्ट काल है। लेकिन इन सबके
बावजूद हमें  नरेश के सवाल पर बात करनी चाहिए। दरअसल किसानी को लेकर हम ढेर सारी बातें करते हैं, बहस करते हैं लेकिन खेत और खलिहान के बीच जूझते किसान को एक अलग रूप में पेश करने के लिए हम अबतक तैयार नहीं हुए हैं।

किसानों का कोई ब्रांड एम्बेसडर है या नहीं ये मुझे पता नहीं लेकिन इतना
तो पता है कि देश में ऐसे कई किसान होंगे जो अपने बल पर बहुत कुछ अलग कर
रहे हैं।

स्मार्ट किसान की जब भी बात होती है तब मुझे मक्का की खेती में जुटे किसान की याद आने लगती है। खासकर बिहार के सीमांचल इलाके में जिस तरह से खेतों में मक्का दिख रहा है और इस फसल से किसानों की तकदीर जिस रफ्तार
में बदल रही है, इस पर खूब बातें होनी चाहिए। वैसे तो विकास के कई पैमानों पर बिहार का पूर्णिया, किशनगंज और सीमांचल का अन्य इलाका देश के
दूसरे कई हिस्सों से पीछे हैं लेकिन मक्के के उत्पादन में इन इलाकों केकिसानों का प्रदर्शन ज़बरदस्त है। अक्टूबर में बोई जाने वाली मक्के की रबी फ़सल का औसतन उत्पादन बिहार में तीन टन प्रति हेक्टेयर है, हालांकि यह तमिलनाडु और आंध्रप्रदेश के प्रति हेक्टेयर औसत उत्पादन से कम है।

मक्के की खेती से जमीन को होने वाले नुकसान पर भी बातें हो रही है लेकिन
इस फसल ने जिस तरह से किसानों की जिंदगी में बड़ा बदलाव लाया है, वह
काबिले तारीफ है। कहा जाता है कि मक्का से किसानों ने पक्का मकान का सफर तय किया है। वहीं अब कई किसान सफ़ेद मक्के की खेती करने लगे हैं जो
स्वादिष्ट होता है लेकिन पीले मक्के की तरह पोषक तत्वों से भरपूर नहीं
होता, क्योंकि इसमें बीटा कैरोटीन और विटामिन ए नहीं होता है। लेकिन इन
सबके बावजूद सफेद मक्के की पैदावार दोगुना होती है। स्मार्ट किसान बनने
की ट्रेनिंग शायद हम किसानों को मक्का दे रहा है। गौरतलब है कि मक्का से
पहले बिहार के इन इलाकों में जूट की खूब खेती होती थी। मक्का की तरह जूट
भी नकदी फसल होती है।

मक्का की खेती ने किसानों को वैज्ञानिक खेती के तौर – तरीके के करीब ला
दिया है। दरअसल मक्का की खेती में बीज बोने के सही तरीकों और दूरी का
ख़्याल रखना होता है। वहीं दूसरी ओर बिहार के किसान मक्के को बेचने के
लिए सरकार पर निर्भर नहीं हैं, स्टार्च और पोल्ट्री उद्योग की ओर से पहले
से ही मक्के की मांग होती रही है। मक्के की रबी फसल बाज़ार में उस वक्त
पहुंचती है जब बाज़ार में आपूर्ति कम होती है।जीडीपी की बढ़ोत्तरी में
मक्के जैसी फ़सल का काफी योगदान है क्योंकि बदलते हुए हालात में आय बढ़ने
के साथ बदलते खान-पान के साथ मक्का फिट बैठता है। सरकार फूड प्रोसेसिंग
कंपनियों को सीधे किसानों से मक्का खरीदने की इजाज़त देकर मक्के की खेती
को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन कई राज्य सरकारें ऐसा नहीं करती हैं।

अब वक्त आ गया है कि हम किसानी को एक पेशे की तरह पेश करें। दरअसल किसानको हमें केवल मजबूत ही नहीं बल्कि स्मार्ट भी बनाना होगा। वैसे यह भी सच है कि स्मार्ट सिटी की बहसों के बीच स्मार्ट किसान हमें खुद ही बनना होगा।

Thursday, March 23, 2017

बाबूजी का गाम

बाबूजी का गाम
-गिरीन्द्र नाथ झा
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बाबूजी का गाम दूर था
उस गाँव से
जहाँ वे रहते थे
बाबूजी का गाम
उनका 'देस' था
कोसी के उस पार।
कोसी के इस पार तो
वे किसान थे
लेकिन
उस पार थे
'धान-पटुआ वाले' !
बाबूजी के भीतर बसता था
दो गाँव
दो बस्ती
दो समाज।
वे अक्सर निकल पड़ते थे
अपने देस
धान,पटुआ, मूँग, गेहूँ उपजाकर।
अब जब वे निकल गए हैं
बहुत दूर
अपने 'लोक-देस' में
तब मैं भी घूम आता हूं
कभी-कभी
उनका देस।
हम प्रवासी
अपने भीतर
छुपाए रखते हैं
न जाने कितने गाम-घर!
कोसी के इस पार
घर के आगे क़दम-बाड़ी
सामने पोखर
नीलकंठ चिड़ियाँ
और उस पार
आम-लीची-पोखर-माछ ।
मुल्क की बदलती राजनीति
प्रेम के चौक़ीदार
'रंग' वाली 'गंध' वाली राजनीति
यह सब जीते-भोगते
आज अचानक
लोहे वाली काली आलमारी में
बाबूजी की एक चिट्ठी मिल गई
बाबूजी ने अपने बाबूजी को
भेजी थी वह चिट्ठी
५१ साल पुरानी चिट्ठी
जिसमें बाप-बेटे
खेत-खलिहान
और
देस की बात करते हैं
चिट्ठी में नहीं है ज़िक्र
राजनीति की
ज़िक्र है तो बस
नहर का
अच्छी फ़सल और
पटसन के दाम का
किसानी के नए अंदाज़ का
ट्रेक्टर ख़रीदने की योजना का
धान बेचकर
बंधक पड़ी ज़मीन छुड़ाने का।
चिट्ठी हाथ में थामते ही
हथेली से पुराने काग़ज़ की
गंध आती है
बार-बार सूंघता हूं और
काग़ज़ में खोजता हूं
बाबूजी को,
बाबूजी के बाबूजी को,
यह सब सोचते हुए
घर के आगे
पोखर के किनारे
जहाँ अब बाबूजी हैं
वहाँ पहुँच जाता हूं,
वहाँ उग आई हैं
ढेर सारी श्याम तुलसी
काग़ज़ का गंध
और तुलसी की महक
अब एक जैसी लगती है,
ठीक वैसे ही जैसे
बाबूजी को लगता था
उनका अपना देस!

(चनका, २३ मार्च, २०१७)

Tuesday, March 21, 2017

चनका के किसान की डायरी

आलू, सरसों उपजाने के बाद किसानी करने वाले अभी हरियाली में डूबे पड़े हैं। खेतों में मक्का लहलहा रहा है। खेत की हरियाली इन दिनों देखते बनती है। मक्का की हरियाली में खेत डूबा हुआ है। वहीं जलजमाव वाले खेतों में फिर से धनरोपनी हुई है। धनरोपनी के हफ़्ते बाद खेत की सुंदरता देखने लायक होती है। ऐसा लगता है मानो खेत में हरे रंग की चादर बिछा दी गई हो। इन दिनों किसानी करने वाले खुश दिख रहे हैं। लगातार दो महीने मेहनत करने के बाद अभी कुछ दिन किसानों के लिए राहत का है। बस आँधी और ओलावृष्टि न हो !

किसानी की दुनिया को दूर से देखने वाले लोगबाग का कहना है कि लगातार मेहनत से मन ‘हार’ जाता है लेकिन मक्का की हरियाली ‘मन से हार’ को मिटाकर ‘मन को हरा’ कर देती। होली के बाद हवा ने भी रुख बदला है, धूल ने हवा का साथ दिया और गर्मी ने इन दोनों के बीच अपने लिए जगह बनाकर दस्तक देने की कोशिश की है, हालाँकि ठंड अभी भी है। वहीं दूसरी ओर कुछ दिन पहले हुई बारिश 
ने किसानों को पटवन से राहत तो दी है लेकिन हवा और उमड़ते-घुमड़ते बादल से आँधी का भय हमें सता रहा है। 

ख़ैर, अब सबकुछ मौसम के हवाले है। प्रकृति जो चाहेगी वही होगा। किसान ने खेत में मेहनत कर दिखा दिया है। खेत में अपना काम पूरा कर किसानी समाज इन दिनों अपनी दुनिया  में मगन है। सच कहें तो होली के बाद भी गाम –घर में अभी उत्सव जैसा माहौल बना ही हुआ है। किसी न किसी के घर में भगैत या कीर्तन हो रहा है। वहीं कुतुबु्द्दीन चाचा जलसा करवा रहे हैं। धर्म की दीवार लोगों के बीच नहीं है, यह देखकर और इसे अनुभव कर अच्छा लगता है।यहाँ फ़सल की तरह हर रंग में लोग डूबे हैं। 

उधर, आम, लीची, कटहल और नींबू के पेड़ फलों के लिए तैयार हो रहे हैं। आम के मंजर मन के भीतर टिकोले और पके आम के बारे में सोचने को विवश कर रहे हैं। मन लालची हुआ जा रहा है। उन मंजरों में किड़ों ने अपना घर बना लिया है, मधुमक्खियां इधर-उधर घूम रहे हैं। रेलवे की लाइन की तरह आम बाड़ी में पंक्तिबद्ध मालदह, कलकतिया, गुलाबखास, बम्बई, जर्दालू, आम्रपाली गाछों में मंज़र देखकर मन चहकने लगा है। लीची में भी मंज़र हैं लेकिन आम ने इस बार बाजी मारी है।

लीची बाड़ी में छोटी मधुमक्खियाँ आईं हुई हैं। मंज़रों में मधुमक्खियाँ लिपटी रहती हैं। वहीं कटहल अपनी उपस्थिति दर्ज करने लगा है। नींबू तो काटों  के बीच मोती माला की तरह दिखने लगा है। 

बांस के झुरमुटों में कुछ नए मेहमान आए हैं। बांस का परिवार इसी महीने बढ़ता है। अभी से लेकर बरसात तक बांस की सुंदरता देखने लायक होती है। वहीं उसके बगल में बेंत का जंगल और भी हरा हो गया है। लगता है गर्मी की दस्तक ने उसे रंगीला बना दिया है। कुछ खरगोश दोपहर बाद इधर से उधर भागते फिरते मिल जाते हैं, वहीं गर्मी के कारण सांप भी अपने घरों से बाहर निकलने लगा है। जीव-जंतुओं का ग्राम्य संस्कृति में बड़ा दखल होता है, ऐसा मेरा मानना है।

ग्राम्य जीवन के इस महीने की व्याख्या शब्दों में करना संभव नहीं है।  यहां जीवन हर पल बदलता है। अपना अनुभव कहता है कि किसान के भीतर मां होती है, जो 12 महीने फसल के रुप में बच्चों को पालती-पोसती है और फिर फसल को तैयार कर जब मंडी पहुंचाया जाता है तो बेटी की विदाई जैसा माहौल किसान के मन में तैयार हो जाता है। शायद ऐसी जिंदगी आप किसी पेशे में नहीं जीते हैं। किसानी में ही ऐसा संभव है।

दरअसल किसानी को पेशा माना जाना चाहिए। हालाँकि अभी भी तथाकथित विकसित समाज इसे पेशा मानने को तैयार नहीं है। कई लोग ऐसे मिले जो किसानी को मजबूरी कहते हैं। 

वहीं किसानी में समय का अपना महत्व है या कहिए महामात्य है। हर कुछ समय पर होता है और मेहनत का फल भी समय पर मिल जाता है। गाम के कबीराहा मठ की ओर शाम में जब जाना होता है तो अंदर से साधो-साधो की आवाज गूंजने लगती है। मन ही मन बूदबूदाता हूं- “धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।  माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय”

जीवन की आपाधापी के बीच यार-दोस्त गाम में किसानी कर रहे अपने इस दोस्त के यहां आ जा रहे हैं। जब भी दूर नगर-महानगर से कोई दोस्त –यार आता है तो मन के भीतर हरियाली और भी बढ़ जाती है। मैं कबीर में खो जाता हूं और बस यही कहता हूं- 

“दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय  
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ “

(21 मार्च 2017 को प्रभात खबर के कुछ अलग स्तंभ में प्रकाशित)

Tuesday, March 07, 2017

पूंजी के लिए परेशान किसान

गाँव का हरीश कमाई को लेकर हमेशा परेशान रहता है। इस बार आलू की पैदावार अच्छी हुई लेकिन क़ीमत नहीं मिलने के कारण हरीश फिर से परेशान है। यह किसान बार -बार पंजाब का ज़िक्र करता है। हरीश को बताता हूं कि पंजाब में किसानी कर रहे लोग भी परेशान हैं, लेकिन वह इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं है। दरअसल आप देश के किसी भी हिस्से के ग्रामीण इलाक़ों का दौरा कर आइए, हर जगह पंजाब की खेती की तारीफ़ सुनने को मिलेगी। हालाँकि वहाँ  के किसान भी अब परेशान हैं लेकिन तो भी देश के अन्य हिस्सों की तुलना में पंजाब के किसान ख़ुशहाल हैं। किसी भी राज्य के किसान की ख़ुशहाली की वजह क्या हो सकती है? इसका एक ही जवाब है- पैसा। जिस तरह किसी भी व्यवसाय में पैसे से पैसा बनता है, ठीक वैसे ही खेती  में यदि किसान  के पास पूँजी हो तो वह ऊँची उड़ान भर सकता है।

हाल में एनएसएसओ (नेशनल सेंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन) के एक सर्वे पर नज़र गई। सर्वे के अनुसार देश में पंजाब राज्य का किसान हर महीने सबसे ज्यादा 18059 रुपए की कमाई करता है,जबकि बिहार का किसान देश में सबसे कम मात्र 3558 रुपए प्रति महीना कमाता है। हालाँकि यह सर्वे रिपोर्ट तीन साल पुरानी है लेकिन गाँव में खेती-बाड़ी करते हुए मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है।  किसान आज भी परेशान हैं।

हाल ही में इंदौर के एक किसान ने आलू की खेती में हुए घाटे का जब ज़िक्र किया तो नेशनल मीडिया ने इस ख़बर को प्रमुखता दी। दरअसल किसी ने आलू खेती में इंदौर के इस किसान के घाटे की बात को ट्वीट के ज़रिए प्रधानमंत्री तक पहुँचा दिया। इस बार इंदौर के किसान राजा चौधरी के लिए आलू की खेती करना बेहद घाटे का सौदा साबित हुआ। राजा चौधरी ने इंदौर के चोयथराम मंडी में 20 क्विंटल आलू बेचा था, जिसके दाम मिले 1075 रुपए। वहीं किसान को आलू मंडी में पहुंचाने में खर्च हो गए 1074 रुपए। यानी किसान को महज एक रुपए का फायदा हुआ। इस किसान का दावा है कि इस बार तो उसे एक रुपए का मुनाफा भी हुआ है, लेकिन पिछली बार उसने 1620 रुपए के आलू बेचे थे, जबकि खर्च हुए थे 2393 रुपए। यानी 773 रुपए का उसे नुकसान हुआ है।  अपनी बात को साबित करने के लिए किसान राजा चौधरी ने खर्च और आमदनी का बिल अपने पास संभालकर रखा है।

बिहार के हरीश और मध्य प्रदेश के राजा चौधरी का ज़िक्र हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि किसान को वाजिब क़ीमत नहीं मिल रही है जबकि बाज़ार में उसकी बढ़ियाँ क़ीमत तय है लेकिन खेत में नहीं। तो क्या किसान के पास बड़ा गोदाम होना चाहिए, जहाँ वह फ़सल का स्टॉक करे? यह बेहद ही परेशान करने वाला सवाल है। हम किसानी कर रहे लोग हर साल इस तरह की दिक़्क़तों का सामना करते हैं। बाज़ार भाव क्या होता है, यह हम समझ ही नहीं पाते हैं।

इस बार धान को लेकर भी बिहार के ग्रामीण इलाक़ों में आलू की तरह ही परेशानी हुई। हम किसान सरकारी दर पर यदि धान बेचना चाहें तो तीन महीने तक हमें धान का स्टॉक रखना पड़ता है, फिर उसे प्राथमिक कृषि साख समिति (पैक्स) और बैंक का चक्कर अलग से लगाना पड़ता है। अब आप ही बताएँ कि यदि हम पहले फ़सल न बेंचें तो खेत में नए फ़सल को कैसे लगाएँगे। बात हर मोड़ पर पूँजी में आकर अटक जाती है और यहीं से आरम्भ होता है किसानों का पलायन। बिहार का किसान देश के अन्य हिस्सों में मज़दूर बन जाता है। अन्नदाता के मजदूर बनने की पीड़ा को शब्दों में ढाला नहीं जा सकता है। यह एक किसान की पीड़ा है। खेत और पूँजी के बीच एक रास्ता तो तैयार करना ही होगा, वह भले ही समूह बनाकर खेती ही क्यों न  हो। किसानों को मिल बैठकर इस पर विचार करना होगा। वैसे बात यह भी है कि हम किसानी समाज के लोग अपनी लड़ाई लड़ने के लिए ख़ुद ही तैयार नहीं है। हम ख़ुद के लिए सड़क पर उतरने के लिए तैयार नहीं है। तर्क गढ़ते हैं बस। आलू की क़ीमत कम मिलती है तो भी हम शांत हैं, अपने भाग्य का रोना रोते हैं और अगली फ़सल में जुट जाते हैं, जबकि वक़्त लड़ने का है। लेकिन अब किसान को ललित निबंध से नाता तोड़कर संगठित होकर खेती करना होगा।