Thursday, February 14, 2019

भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ

डाक से एक किताब आई, किताब का कवर काले रंग का है और उस पे लाल रंग से किताब का नाम लिखा है- 'भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ '

समीक्षक नहीं हूं, पाठक हूं, जो किताबों में अपनी दुनिया तलाशता रहता है। यह पाठक हर किताब में दुनिया खोजता रहता है। यह किताब बिहार के एक छोटे से कस्बे की लड़की पूजा प्रकाश की है जो अपने सपनों को लेकर दिल्ली चली आती है। यह किताब पूजा के ही आसपास घूमती है और हां, इस लड़की के आसपास ही रहती है मेघना, सैम और देबजानी। अलग अलग माटी- पानी की ये लड़कियां जब संग हो जाती हैं तो ही यह किताब तैयार होती है।

अनु सिंह चौधरी की यह नई किताब पढ़ते हुए मन बार -बार विचलित हुआ। इस किताब पर बात शुरू करने से पहले यह स्पष्ट कर दूं कि हालांकि यह किताब लड़कियों की कथा है लेकिन हर पुरुष को यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। यह किताब सचमुच में मन को बदल देने वाली है। किताब पढ़कर जब घर से बाहर निकला तो लगा मानो किसी ने नहला दुहला कर , बढियां से कंघी कर तैयार कर दिया है, 'लड़के की नजर' को निर्मल कर दिया है।

दरअसल यह किताब बताती है कि हम सब अच्छा होना चाहते हैं, राह दिखाती यह किताब शायद लड़कों के लिए लिखी गई हो लेकिन जो भी हो यह किताब मेरे जैसे के लिए तो साबुन की वह टिकिया है जिसने मन के कोने में पलथी मारकर बैठे मैल को साफ कर दिया है।

यह किताब उस दादी की है जो अपने बहू को नौकरी करते हुए सबल देखना चाहती है। यह किताब उस दादी की है जो उम्र के इस पड़ाव में भी सब भार अपने कंधे पे लेकर पोती को खूब पढाना चाहती है। यह किताब उस अठारह साल की लड़की की है जो अठाहरवीं गिरह को समझती है और जिसे पता है कि उसकी जड़ें कहाँ है। तीन महीने की पोती को अकेले पालती है दादी, क्योंकि बहू की पोस्टिंग कहीं और है और बेटे की कहीं और। पोती मिरांडा हाउस पहुंचती है, होस्टल नहीं पीजी में रहती है। यहीं उसके संग हो जाती है वो तीन लड़कियां-मेघना, सैम और देबजानी।

अठारह की उम्र की लड़की और दिल्ली। इस वाक्य को लेकर हम चाहें जो भी अच्छी-अच्छी बातें कह दें, लिख दें लेकिन इस समाज में लड़कियों को लेकर जो नजर है, वह किसी से छुपी नहीं है। चारों लड़कियों की कहानी साथ चलती है। पीजी चलाने वाली अरोड़ा आंटी की अपनी कहानी है तो वहीं पूजा को झकझोर कर मन और तन से तोड़ देने वाले संदीप की अपनी कहानी है। इस किताब को पढ़ने के बाद लिखने की बार-बार कोशिश की लेकिन हर बार संदीप जैसे सोच ने मन को तार-तार कर दिया। वहीं पूजा प्रकाश और सैम के बारे में जब लिखने की कोशिश की तो मन के भीतर से आवाज आने लगी- 'मन निर्मल करो' !

इस किताब को पढ़ते हुए लगा कि हम जिसे आजादी मानते हैं दरअसल वो सबसे बड़ा दिलफ़रेब भरम है और लेखिका ने ठीक ही कहा है कि सबसे बड़ा फरेब और कुछ नहीं बल्कि प्रेम ही है । किताब जब अपने अंतिम पन्नों में सिमटने जा रही होती है, उस वक्त पूजा का अपनी अम्मा (दादी) से जो संवाद होता है, उसे पढ़ना जरूरी है।

" निर्भीक लड़की क्या करती है, अम्मा? कैसी होती है निर्भीक लड़की?"
" तुम मुझसे एतना जिरह काहे कर रही हो? कोई बात है पूजा?"
"बताओ न अम्मा! निर्भीक लड़की क्या करती है?"
"अपने साथ होने वाले किसी भी गलत काम, किसी भी अन्याय का विरोध करती है। जो गलत लगता है, उसके खिलाफ लड़ती है।"
" अम्मा जो लड़ती है वो बदनाम भी तो होती है।"
"निर्भीक लड़की बदनामी से नहीं डरती है। जो उसको सही लगता है, वही करती है। "

लेखिका ने जब इन संवादों को लिखा होगा तो वो किस संत्रास से गुजरी होगी, इसे पाठक को समझना होगा। यह किताब हम सभी को पढ़नी चाहिए और हर किसी को अपने ढंग से कहानी को समझना होगा।

किताब के तीसरे पन्ने में गुलज़ार की कुछ पंक्तियां है-
" जिसका भी चेहरा छीला, अंदर से और     निकला
मासूम-सा-कबूतर, नाचा तो मोर निकला
कभी हम कमीने निकले, कभी दूसरे कमीने।"

- गुलज़ार ( फ़िल्म कमीने)
_______________________________
{किताब- भली लड़कियाँ, बुरी लड़कियाँ (उपन्यास)
लेखिका-अनु सिंह चौधरी
प्रकाशक- एका-हिन्द युग्म
मूल्य-₹175 }

Friday, January 11, 2019

कदंब के नाम पाती

अब जब
तुम सब हो गए हो बड़े
अब जब
तुम्हारी बस गई है
अपनी बस्ती
तो अब खुलकर
बातें करो आसमां से,
बातों ही बातों में कभी
तुम सब छू लेना बादलों को
और
पूछना सूरज से कि
ऊंचाई से हरी पत्तियां
कैसी लगती है?
किसी पूर्णिमा की रात
करना चाँद से गुफ्तगू
बारिश के मौसम में
बादल के कोमल हाथों से
पहले स्नान का सुख
हमें बताना साथी...
यूँ ही सिर ऊंचा किए
हमसे भी कभी
गुफ्तगू करना साथी
और बताना
पतझड़-सावन-बसंत-बहार
की कहानी

#ChankaResidency

Wednesday, January 09, 2019

सदन झा की किताब 'हॉफ सेट चाय और कुछ यूँ ही

हम सभी की पीठ पर स्मृतियों की एक गठरी बंधी होती है। हम जहां होते हैं, जिस परिवेश में जीते हैं, वहां स्मृतियों से भरी यह गठरी चुपचाप हमें निहारती रहती है। कई दफे इन स्मृतियों के सहारे हम लंबी यात्रा पर निकल जाते हैं। पेशे से इतिहासकार सदन झा की नई किताब 'हॉफ सेट चाय और कुछ यूं ही' को पढ़ते हुए स्मृति की गठरी और भी समृद्ध हुई है।

'हॉफ सेट चाय और कुछ यूं ही' को पढ़ते हुए अहसास हो रहा है कि यात्रा की जमा पूंजी का ब्याज स्मृति ही है और जिसके पास स्मृति को शब्द देने की कला हो और यदि वह इतिहासकार भी हो तो फिर घाट-बाट सबकी कथा पेंटर के कैनवास की तरह दिखने लगती है, और मन में किसी फिल्म का यह गाना बजने लगता है -
"तू धूप है, छम से बिखर
तू है नदी, ओ बेख़बर
बह चल कहीं, उड़ चल कहीं
दिल खुश जहाँ..
तेरी तो मंज़िल है वहीं .."

सदन झा की इस किताब को पढ़ते हुए दरअसल आप प्रेम के संग देश- परदेश की यात्रा करते हैं। यात्राओं में स्मृति परछाई की तरह दिखती है। किताब की शुरुआती कहानी 'राजधानी' की नायिका निशा के बारे में लेखक कहते हैं- " टेंट में आई पैड पर बहुत हल्के वॉल्यूम में अमजद अली का सरोद बजता रहा। निशा की यह अजीब सी आदत जो ठहरी, जहां जाती उसके ठीक उलट संगीत ले जाती..."
दरअसल स्मृति यही है। लेखक ने शब्दों की सुंदर माला तैयार की है। इस किताब में लंदन से लेकर मिथिला तक की खुशबू है। वर्तमान के संग गुजरे दिनों की वार्ता है।

किताब में ढेर सारी कथा और टिप्पणियां एक शांत नदी की तरह बहती मिलेगी और इसे पढ़ते हुए कभी-कभी आपको लगेगा कि यह एक स्तर पर व्यक्तिगत विवरण है लेकिन जैसे ही आप आगे बढ़ते जाएंगे तो लगेगा कि यह तो हम सभी के लिए है, ठीक नदी की तरह जो हमें सबकुछ देती है, माछ, पानी, पत्थर, माटी सबकुछ।

इस किताब की खासियत छोटी-छोटी टिप्पणियां हैं। छोटी सी टिप्पणी में लेखक बहुत कुछ कह जाते हैं। ' पिता की सार्थकता' में सदन झा पिता और संतान की बातें बड़े ही रोचक अंदाज में करते दिखते हैं। पिता के मन की बात को वे पिता के मन में ही चलने देते हैं और उधर संतान को अपनी राह खुद बनाते देखने लगते हैं। एक पाठक के तौर पर लेखक की यह टिप्पणी मुझे सबसे अधिक खिंचती है।

सदन झा किताब में अपनी कश्मीर यात्रा का जिक्र करते हैं। कश्मीर को उन्होंने शब्द दिया। इसी के आगे वे अमृतसर यात्रा का भी जिक्र करते हैं। इस यात्रा के बारे में वे लिखते हैं- " हम कितना कम रूबरू हुए हैं अपने ही सगों से। गुरुद्वारा, मस्जिद और गिरजे तो मैं कई बार जा चुका लेकिन आजतक नमाज़ कभी अदा नहीं की। क्यों नहीं की, कोई जवाब नहीं। सेक्युलर विरासत के तहत हमने स्कूल के डेस्क शेयर किए। क्लासरूम के बाहर सेवैयाँ खायीं। दूर से दर्द महसूसे लेकिन कहाँ कभी जिंदगी जी एक दूसरे से फेरबदल कर। तुम मैं बन जाते , मैं तुम हो जाते।" सदन झा की इस टिप्पणी में देश बसता है।

दरसअल विस्थापन पर सदन झा का शोध कार्य है। उसे पढ़ते हुए लगा कि हमारी पीढ़ी के लोग जो उदारीकरण के दौर के बाद अपनी समझ को विकसित करने में जुटे हैं उन्हें विभाजन के संत्रास को समझना होगा।

किताब में मुकुल मांगलिक वाला संस्मरण तो बहुत ही मार्मिक है। लन्दन की गलियों से होते हुए कश्मीर की यात्राओं से जब हम आगे निकलते हैं तो दरभंगा बड़े ठाठ से सामने खड़ा मिलता है। दरभंगा के मोहल्ले में सदन झा कथावाचक की दिखते हैं, ठीक वैसे ही जैसे रेणु ने त्रिलोचन को बांचते हुए कबीराहा मठ के महंत जी की तरह साधो-साधो बुदबुदाते हैं।

'डोसा और दरभंगा' नामक संस्मरण में वे कमाल के किस्सागो दिखते हैं। मोहल्ले में ठेले पर डोसा बनाने वाले को उसने जिस तरह शब्द में ढाला है, पढ़ते हुए मन लालची हो जाता है। सचमुच स्मृति लजीज भी होती है और नमकीन भी।

सदन झा ने पुस्तक में अपने गाँव सरिसब के वाचनालय की एक समृद्ध छवि पेश की है। रिपोतार्ज शैली में वे एक सुंदर तस्वीर उकेर देते हैं। वहीं 'स्कूल से वापसी के रास्ते' नामक संस्मरण में दरभंगा के एक किताबघर में होने वाली बौद्धिक बहस की बात करते हैं। आज के माहौल में जब बौद्धिकता और बहसों पर हमले हो रहे हैं , ऐसे में सदन झा के इस संस्मरण को पढ़ा जाना चाहिए।

किताब का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय मुझे 'चौखट से बाहर की भाषा' लगा। यहां एक जगह लेखक कहते हैं- ' भाषा कब धर्म का रूप ले लेती है पता ही नहीं चलता? कब इस धर्म को राज्य और राजनीति स्वरूपित करने लगती है, अहसास ही नहीं होता। कब धर्म और राजनीति की चादर ओढ़े भाषा प्रेम साम्प्रदायिक हो जाता है, भनक ही नहीं लगती..."

एक लेखक जिसकी रुचि इतिहास में है, उसे पढ़ते हुए बार- बार अहसास होता है कि स्मृति की पोटली को खोलने की जरूरत है। अपनी स्मृतियों में हम गाम-शहर-विलायत सबको खंगाले और खुद से गुफ्तगू करने की कोशिश करें। यह किताब उस चिड़ियां की तरह लगती है जो ठंड के मौसम में खाली पड़े खेत की आल पर बार- बार पीछे मुड़कर देखती है, जहां पिछले महीने धान की बालियां सजी थी।

(किताब:  हॉफ सेट चाय और कुछ यूँ ही
लेखक- सदन झा
प्रकाशक- वाणी प्रकाशन
मूल्य- ₹250 )

Sunday, December 30, 2018

शब्द और तस्वीर की दुनिया

‘शब्द और तस्वीर’ की दुनिया में गोता लगाना मुझे सबसे अधिक पसंद है। इन दिनों बाबूजी की डायरी पढ़ रहा हूं। वे एक शानदार किसान थे। उनकी डायरी दरअसल एक किसान की डायरी है, जिसमें ढेर सारे फ़ील्ड नोट्स हैं। वे सर्वोदय डायरी का इस्तेमाल करते थे। उनकी सर्वोदय डायरी के पन्नों में 1960 से 90 के दशक के किसान लेखा-जोखा मिल जाता है।

डायरी से ही पता चला कि 1969 में उस किसान को फ़ोटोग्राफ़ी का शौक़ जगा। किसान ने ‘याशिका ए कैमरा’ ख़रीदा और जमके फ़ोटोग्राफ़ी की। दैनिक डायरी की शब्द यात्रा के संग उन्होंने तस्वीरों के संग भी ‘श्वेत-श्याम ‘यात्रा शुरू की।

ब्लैक एंड व्हाइट में गाम-घर-खेत-पथार सब कुछ कितना रंगीन दिखता है, उन तस्वीरों को देखकर -छूकर महसूस करता हूं।

उनकी फ़ोटोग्राफ़ी को देखकर लगता है कि वे फ़सल और गाम घर की तस्वीरें इकट्ठा करने में जुट गए थे। आज जब 1970 की डायरी पलट रहा था तो ये दो तस्वीरें एक पन्ने में रखी मिली। चनका की तब की तस्वीरें देखकर हम तो खो गए।

तस्वीर में कौन हैं ये तो पता नहीं लेकिन एक तस्वीर में फ़सल और दूसरी में दुआर देखकर मन ख़ुश हो गया। बैलगाड़ी का पहिया और क़दम बढ़ाते व्यक्ति की तस्वीर से एक ख़ुश्बू आती है। वहीं खेत में फ़सल को निहारते दो युवक की तस्वीर में सुख का अहसास है।

उस वक़्त में जब साल 2018 जाने की ज़िद कर रहा है ऐसे में हम 48 साल पुरानी इन दो तस्वीरों में खो गए हैं। अपने गाम की इन पुरानी तस्वीरों में लैंस के पीछे क्लिक करते बाबूजी दिखने लगे हैं।

2018 की किसानी और सत्तर के दशक की किसानी में अंतर खोजने लगा हूं। धान और पटसन तब सबकुछ था। हर साल धान के समय बाबूजी अपनी डायरी में रेणु की यह पंक्ति अंकित करते थे- “आवरन देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान.. “

उनकी क्लिक की गई तस्वीरें और डायरी के पन्नों में तब का किसान समाज दिखने लगता है। साल दर साल उनके शब्द और तस्वीरों में कई तरह के बदलाव दिखते हैं, कबीर की इस पंक्ति की तरह- “ अनुभव गावै सो गीता” की तरह वे आँखों देखी सब कुछ लिखते गए अपनी मैथिली भाषा में। तब किसान को खाद के लिए परमीट की ज़रूरत होती थी, वक़्त तो बदला है और अब यह साल भी गुज़रने को है। फ़िलहाल इन तस्वीरों के ज़रिए गुज़रे वक़्त को देख रहा हूं, जिसे असल में देखा तो नहीं लेकिन बाबूजी की लिखावट और खिंची तस्वीर से महसूस कर रहा हूं।

#ChankaResidency

Thursday, December 27, 2018

स्मृति और सच्चाई

झिंगुर की 'झीं-झीं'  और गिरगिट की 'ठीक-ठीक' आवाज़ को भीतर में छुपाए यह गाम की रात है। दिसंबर गुज़रने को बेताब है। कोहरा कम है लेकिन ठंड बढ़ गयी है।

आसपास की चुप्पी के बीच मन के अंधेरे में झाँकता हूं तो सुनता हूं एक आवाज़ -  "पापी कौन बड़ो जग मौसे, सब पतितन में नामी..." । सच यही है कि भीतर की यह आवाज़ मन को धो देती है।

गाम का बूढ़ा मोती हर मुलाक़ात में पूछता था सूरदास को पढ़ें हैं ? उसका सवाल विचलित कर देता था। रात की बातें करते हुए देखिए न सूरदास आ गए मन में। मोती के ज़रिए सूरदास दाख़िल हो गये। याद नहीं लेकिन किसी ने सुनाया था- “साधुता वहां बसती है , जहां जूता गांठते हैं रैदास और चादर बुनते हैं कबीर ।”

मकान के चारों ओर खेत में मक्का के नन्हें पौधे हैं। सफ़ेद लिफ़ाफ़े की तरह  कोहरे ने मक्का के नवजात पौधों को अपने भीतर छुपा लिया है।

रात के अंधेरे में खेत किसी नर्तकी की तरह दिखने लगती है। बचपन में सलेमपुर वाली दादी इन्हीं खेतों की कहानी सुनाती थी। कथा की शुरुआत में कोई रानी आती थी पायल में और खेत में ख़ूब नाचती थी। मेरी यादों की पोटली से अक्सर सलेमपुर वाली निकल आती है। उस बूढ़िया ने बाबूजी को गोदी में ख़ूब खिलाया था और बाद में मुझे भी। गाम की रात में वह बहुत याद आती है। जीवन के प्रपंचों  के बीच जो कथा चलती है उसमें ऐसे चरित्रों को सहेज कर रखता हूं। काश ! बैंक में ऐसी स्मृतियों के लिए भी लॉकर होता !

किसी पूर्णिमा की रात मैं निकल पड़ता हूं पश्चिम के खेत। वहाँ एक पुराना पेड़ है पलाश का। साल के उन दिनों जब वह फूल से लदा होता है, उसे निहारता हूं। उस फूल में आग की लपट दिखती है, शायद सुंदरता में 'जलना' इसी को कहते हैं। बग़ल में एक बड़ा  सा पोखर है। उसमें चाँद की परछाई निहारता हूं। रंग में सफ़ेद और आसमानी ही पसंद है। सब कहते हैं कि उमर से पहले बूढ़े हो चले हो !! लेकिन कैसे बताऊँ सफ़ेद रंग ही मेरे लिए बाबूजी हैं। बाबूजी की सफ़ेद धोती और कुर्ता मेरे मन के लॉकर में सुरक्षित है। मैं इस रंग में उन्हें ढूँढता हूं। जब पहली बार लिखकर पैसा कमाया था तो उनके लिए सफ़ेद रंग  का एक गमछा और शॉल लाया था। बाबूजी ने उस शॉल को संभाल कर रखा, उनकी आलमारी में आज भी है।

आज की रात ऐसी ही कई यादें बारिश की बौछार की तरह भिंगा रही है। घास-फूस का एक बड़ा सा घर था इस अहाते में, मैंने बाबूजी को वहीं पाया था। माँ का भंसा घर और मिट्टी का एक चूल्हिया और दो चूल्हिया ! सब याद आ रहा है। दीदी सबका कमरा, जहाँ लकड़ी की आलमारी थी और माटी  का रेख। हर चार साल पर उस फूस  के घर का घास (खर) बदला जाता था।

हम यादों में क्या क्या खोजने लगते हैं ! अभी वह लकड़ी का बड़ा सा हैंगर याद  आ रहा है, जिसमें पित्तल का सुनहरा हूक लगा था, बाबूजी का कुर्ता वहाँ टाँगा जाता था।

साँझ से रात की तैयारी और दोपहर से साँझ की तैयारी होती थी। चूल्हे की राख से लालटेन और लैम्प का शीशा चमकाया जाता था। यह सबकुछ खोज रहा हूं तो मन के भीतर अचानक रौशनी दिख जाती है। नहर से राजदूत की आवाज़ आने लगती है। बाबूजी आ रहे हैं, दुआर पर लोग हैं, जिन्हें बात करनी है।

अचानक बाहर देखता हूं तो कोई नहीं ! कोई आवाज़ नहीं। आँखें मूँदकर बैठ जाता हूं। समय के साथ बिजली के प्रकाश से अहाते में भले रौशनी फैल गई हो लेकिन इस वक्त आँख मूँदकर अँधेरा में डूब जाता हूं। भीतर मानो एक दीप जल रहा है, दीये की टेम की तरह बाबूजी दिखने लगते हैं।

Tuesday, December 25, 2018

रेणु गाम में दिन-भर

सुबह आसमान साफ था। हम सोचे थे कि कुहासा अपना तांडव दिखाएगा लेकिन सबकुछ साफ था। ऐसे में नियत समय पर हमारी यात्रा आरम्भ होती है, हम निकल पड़ते हैं फणीश्वर नाथ रेणु के गाम-औराही हिंगना।

चनका से पूर्णिया और फिर पूर्णिया से एनएच-57 होते है रेणु गाम। वहीं दिल्ली और फिर फुलपरास पहुंचे राज झा की यात्रा सुबह साढ़े छह बजे शुरू होती है रेणु गाम के लिए औऱ सुबह साढ़े आठ बजे हम सब रेणु गांव के करीब एनएच 57 स्थित माणिकपुर में मिलते हैं। चिन्मय श्रीनगर से गीतवास होते हुए रेणु ग्राम की यात्रा कर रहे होते हैं।

माणिकपुर से गाम की सड़क शुरू हो जाती है, बैलगाड़ियों की आवाजाही दिखने लगती है। सड़क के दोनों तरफ खेत में आलू दिखता है, मन और आँख दोनों को सुकून मिलता है। प्रिया-पंखुड़ी-पंक्ति भी रेणु गाम जा रही हैं। पंखुड़ी के पास ढेर सारे सवाल हैं। वह बार-बार एक ही सवाल करती है- "रेणु इतने बड़े बाल क्यों रखते थे? " पंखुड़ी का सवाल हमें गुदगुदी लगा रहा था। रॉबिन शॉ पुष्प ने एक दफे रेणु के केश विन्यास को शूट किया था। रेणु बाल्टी में पानी लेकर आंगन में बाल धो रहे हैं, फिर उसके बाद घण्टे भर बाल को सजाना...। पंखुड़ी ध्यान से सुनने लगती है। अचानक रेणु की वाणी याद आ जाती है-" इस्स! कथा सुनने का बड़ा शौक है आपको? "

माणिकपुर से रेणु गांव का रास्ता बहुत ही घुमावदार है, ठीक 'तीसरी कसम' के नन्दनपुर जैसी। जहां भी लगे कि अब कहाँ मुड़ना है तो किसी से भी पूछ लीजिये कि रेणु के घर जाना है तो वह एक ही बात कहेगा : 'रेणु के घर नहीं, आपको रेणु गाम जाना है !' यही रेणु की ताकत है।

हम सब रेणु के दुआर पहुंचते हैं। वहां रेणु के छोटे बेटे दक्षिणेश्वर राय मिलते हैं। दुआर पर पुआल का ढेर रेणु के और करीब लेकर चला जाता है। घर-दुआर-आंगन सब अपना ही तो है।

उधर, राज झा एकटक रेणु अंचल को निहारते दिखते हैं, तभी रेणु के बड़े बेटे पद्म पराग राय वेणु आते हैं और फिर राज झा इन सभी लोगों से बातचीत करने बैठ जाते हैं। रेणु के घर- दुआर से निकलकर बातचीत साहित्य-सिनेमा-समाज-राजनीति सब पर होती है।

राज झा सर के साथ आई टीम इस यात्रा को शूट करने में लगी थी। लगा कोई सुरपति राय रेणु के गाम आया हो...वही सुरपति राय जिसे रेणु ने परती परिकथा में घाट-बाट की कथा इकट्ठा करने के लिए मंच पर बिठाया था। जितेंद्रनाथ ऊर्फ जित्तू के आउटहाउस में रहकर सुरपति रायलोककथाओं को इकट्ठा करते थे। कैमरे से माटी की तस्वीरें खींचते थे, एक शोधार्थी की तरह उन्हें स्थान से प्रेम था।

रेणु का गाम आज भी गाम है। शहर की महक अभी यहां नहीं पहुंची है। साइकिल पे डुगडुगी बजाकर सामान बेचने वाला दुआर पर आता है। विज्ञापन की दुनिया में रमे रहने वाले राज झा उससे बात करने लगते हैं। ग्रामीण क्षेत्र के लिए विज्ञापन बनाने में राज झा सर को महारत हासिल हैं। वे देश के 70 हजार से अधिक गाँव की यात्रा कर चुके हैं। ऐसे में डुगडुगी वाले से उनकी बातचीत स्वभाविक लगी।  मैं दूर से यह सब देख रहा हूँ तो मन में रेणु की तीसरी कसम चलने लगती है। तीसरी कसम में हीराबाई एक जगह हीरामन को गुरुजी कहती है, यह सुनकर हीरामन लजा जाता है और कहता है-  " आप "मुझे गुरुजी मत कहिये।'' इस पर हीराबाई कहती है- " तुम मेरे उस्ताद हो। हमारे शासतर में लिखा हुआ है , एक अच्छर सिखाने वाला भी गुरु और एक राग सिखाने वाला भी उस्ताद !"

हम रेणु के समाधि स्थल पर जाते हैं। वहां तक सरकार ने पक्की सड़क बना दी है। रेणु की बहन के दुआर पर समाधिस्थल है और उसके आसपास रेणु का प्रिय साग 'लाफ़' लगा है। लाल और हरी पत्ती वाला यह साग रेणु को बहुत प्रिय था।

यहां से हम रेणु की स्मृति में तैयार एक सरकारी भवन देखने जाते हैं, जहां काम अभी चल रहा है। हम सब वहां से रेणु आंगन आ जाते हैं और रेणु के पात्र और उन जगहों को लेकर बातचीत शुरू करते हैं, जिसे हमने रेणु के लेखन में पढ़ा है। रेणु के बड़े बेटे हमारे सभी सवालों का जवाब देते हैं। मुझे ' पल्टूबाबू रोड' के पात्र के बारे में जानना था। रेणु के बड़े बेटे वेणु जी कहते हैं कि पाठक भले ही जाने कि यह कहानी कटिहार जिले की है लेकिन रेणु जी ने तो अररिया कोर्ट के एक परिवार की कहानी लिखी थी। एक पाठक के तौर पर परती परिकथा और पल्टूबाबू रोड दोनों ही मुझे पसंद है।

आंगन में राज झा सर रेणु लेखन पर बड़े रोचक अंदाज में बात शुरू करते हैं। वे तीसरी कसम की स्क्रिप्ट पर बोलते हैं, वे रेणु उस शैली पर बात करते हैं, जहां रेणु बस एक लाइन में ही सबकुछ कह देते हैं। वे कहते हैं- "रेणु तो मेरे लिए फुल पैकेज हैं, जिसमें सबकुछ है..." उन्होंने कहा कि यह रेणु की ही ताकत थी कि उन्होने तीसरी कसम फ़िल्म में संवाद में एक जगह मैथिली को शामिल कर दिया।

हम सब रेणु में डूबते जा रहे थे कि तभी भोजन का समय हो गया। आंगन के चूल्हे पर पका स्वादिष्ट भोजन का आंनद कुछ और ही होता है। फिर हम गाँव के कुछ पुराने लोगों से बात करने निकल पड़े। अब शाम होने वाली थी, हम सभी को लौटना था, रेणु गांव से दूर अपने अपने घर जाना था, हम फिर निकल पड़े। जाते वक्त पूरा रेणु परिवार हमें छोड़ने बाहर आ गया, ऐसा पल हमें भावुक कर देता है....

(24 दिसम्बर, 2018)

Wednesday, December 19, 2018

सहज -सरल -अनुपम

अनुपम मिश्र कब ज़िंदगी में आए, यह बता नहीं सकता। अपनी किताब ‘ आज भी खरे हैं तालाब’ की तरह वह हमेशा संग हैं। उनसे मुलाक़ात कम होती थी लेकिन जब भी मिलता तो लगता हमेशा इनसे मुलाक़ात होती है। अनुपम मिश्र सबके थे और इसके हिस्से नहीं किये जा सकते।

उनसे पहली मुलाक़ात दिल्ली के आईटीओ के क़रीब हुई थी। पायजमा-कुर्ता और चश्मा , संग में झोला। देखकर लगा मानो सत्य को महसूस कर रहा हूं। वे मुझे गाम के तालाब की तरह लगते थे, जिसमें झाँककर हम अपना चेहरा पहचान  सकते थे, एकदम निर्मल। बातचीत में वे पर्यावरण और भाषा के बारे में बताते थे। अनुपम मिश्र कहते थे कि "भाषा मन और माथा दोनों है। "

आधी बाज़ू का कुर्ता पहनने वाला वह शख़्स ‘पूरा और अनुपम आदमी’ था। उनकी भाषा हमारे लिए जीवन  का व्याकरण है। वे  ऐसे बोलते थे कि कठिन से कठिन भी आसान लगने लगता था। गंभीर से गंभीर विषय को भी वे सहज-सुगम बना देते थे। आज जो मुखौटे हम देखते हैं, ऐसा कोई मुखौटा उनके भीतर नहीं था।

कहीं जब बोलना होता है तो मैं अनुपम मिश्र के बारे में ज़रूर बोलता हूं। वे इस दुनिया में एक लिबास की तरह थे, जिसमें गांधी का भाव था। उनके बारे में बोलकर-लिखकर लगता है जैसे मन का पर्यावरण थोड़ा साफ़ हो गया हो। यही ताक़त है उस आदमी की। ‘हमारा पर्यावरण’ हमें पढ़ना चाहिए। अनुपम मिश्र की  इस किताब में देश है।

खेती बाड़ी और गाम घर करते हुए मैं अनुपम मिश्र को अनुभव करता हूं। वे परंपरागत वर्षा के जल के सरंक्षण की पुरज़ोर वकालत करते थे। वे पानी के पहरेदार थे। अनुपम जी के साथ मुलाकातें हमें पानी का संस्‍कार दे जाती थी।

दो दिन पहले दिनेश मिश्र पूर्णिया आये थे। एक शोध संस्थान के कार्यक्रम में उनको सुनने को मौका मिला। वे नदियों पर बोल रहे थे, उन्हें सुनते हुए महसूस हुआ कि अनुपम मिश्र भी आसपास हैं। वही सहजता। कबीर की वाणी याद आ गई-

"सहज सहज सब ही कहैं
  सहज न जानै कोइ
  जब सहजै विषया तजै
   सहज कही नै सोई"

अनुपम मिश्र सहज स्वभाव  के आदमी थे और सहजता ही उनकी प्रकृति थी। जीवन के इस दौर में हम अनुपम मिश्र को हर पल याद रखें , यह ज़रूरी है। इन दिनों जब तालाब, कुंआ जैसे पानी के स्रोत भी गाँव घर में घोटाले के दंश झेल रहे हैं, इन स्रोतों के नाम पर कागज पर पैसे की उगाही हो रही है, ऐसे वक्त में अनुपम मिश्र हमें सबसे अधिक याद आते हैं। जब विकास के नाम पर सिर्फ विनाश की मूर्खतापूर्ण होड़ लगी है, अनुपम मिश्र का न होना, एक घुप्प अंधेरे की तरह। आज उनकी बरसी है, उनकी कही यह बात आप सब भी पढ़िए-

"इस दुनिया में हम कितने भी बड़े उद्देश्य को लेकर दीया जलाते हैं,तेज़ हवा उसे टिकने  नहीं देती। शायद हमारे जीवन के दीये में पानी ही ज़्यादा होता है, तेल नहीं। स्नेह की कमी होगी इसलिए जीवन बाती चिड़चिड़ तिड़तिड़ ज़्यादा करती है, एक सी संयत होकर जल नहीं पाती। न हम अपना अँधेरा दूर कर पाते हैं , न दूसरों का। हम थोड़ा अपने भीतर झांकें तो हममें से ज़्यादातर का जीवन एक तरह से कोल्हू के बैल जैसा बना दिया गया है। हम गोल गोल घूमते रहते हैं आँखों पर पट्टी बांधे| "