Thursday, October 15, 2020

किसी का गुजर जाना

कभी कभी लगता है कि जीवन और मौत के बीच हम सब कितनी जल्दी में सबकुछ हासिल करने की जुगत में लगे रहते हैं। हर दिन हम सब अगले दिन के लिए मेहनत करते हैं और एक दिन ऐसा भी आता है जब हम उस अगले दिन के लिए बचे नहीं रहते हैं। हमारा किरदार अपना काम कर किसी दूसरी यात्रा पर चला जाता है। 

एक अधूरापन, कुछ बाकी काम, ढेर सारे सपने, अपने लोगों की आशाएं - उम्मीद...कुछ पाने की इच्छा, किसी के प्रति स्नेह, मोह, गुस्सा, कुछ खरीदने की, कुछ नया बनाने की...यह सब बीच में ही छोड़कर हम चले जाते हैं। एक सांस की डोर टूटती है और हमारी दूसरी यात्रा की टिकट कन्फर्म हो जाती है।
लेकिन इन सबके बीच गुजर गए शख्स की स्मृति हमारे पास रह जाती है। ऐसी ही एक अधूरी सी कहानी पार्थ की है। कानपुर का यह लड़का रेडियो, प्रिंट, डिजिटल सब जगह खुद को बिखेरे हुए था। हाल ही में द बेटर इंडिया के डिजिटल स्पेस पर हम टकराए थे।

सौम्य था, व्यवहारिक था, शब्द से संजीदा तरीके से खेलता था। हम दोनों लेखन में एक दूसरे की गलतियों पर बात करते थे। मेरी कॉपी में कहां कुछ गलतियां रह जाती है, उसे पता था। बिंदु, चंद्र बिंदु हो या फिर कहानियों में मात्राओं का खेल, वह बेहतर तरीके से उसमें रच बस जाना चाहता था।

अचानक एक दोपहर जब गांव में था, मानबी कटोच  जी का मैसेज आता है - पार्थ इज नो मोर..." कुछ पल के लिए ठहर जाता हूं कि यह क्या! अभी तो पार्थ की कहानी शुरू ही हुई थी, उसे तो अभी बहुत कुछ करना था। लेकिन सच तो सच होता है।

हर दिन सुबह हमारी बातचीत होती थी, एक वेबसाइट को कंटेंट के तौर पर किस तरह समृद्ध बनाया जाए, गलतियां कम हो, हेडिंग आकर्षक हो, इन्हीं सब के आसपास हमारी बात होती थी। हम एक बेहतर स्टाईल शीट पर गुफ्तगू किया करते थे। मानबी जी ने आजादी दी है कि काम अच्छा हो, इसके लिए हम खूब बात करें।

कुछ दिन पहले पार्थ ने पूछा था, अनायास ही कि पूर्णिया से दार्जिलिंग की दूरी कितनी है?   दरअसल उसे पहाड़ से लगाव था। शायद ऊंचाई से वह बहुत कुछ देखना चाहता था। फिर इस बातचीत के दो दिन तक हमारी बात नहीं हुई, शायद काम में ज्यादा व्यस्त हो गया था, वह वीडियो आदि भी बनाया करता था। वह मेरे मन में बस गए शहर कानपुर का था। मैं उससे अक्सर कानपुर के मोहल्लों के बारे पूछता रहता था। ग्रीन पार्क, सिविल लाइंस हो या फिर तिवारीपुर बगिया, इन सबकी खबर उससे लिया करता था।

मुझे दक्षिण भारत के एक शहर के कॉलोनी के नाम की वर्तनी को लेकर कनफ्यूजन था, बात करने के लिए फोन किया तो मोबाईल नेटवर्क एरिया से बाहर बताने लगा, सोचा कल बात करेंगे।

लेकिन कल की कहानी ही बदल गई। पता नहीं उस लड़के को किस चीज की हड़बड़ी थी! ऐसी भी क्या जल्दी थी कि वह दूर ही निकल गया।

मैं उसके निजी जीवन से ज्यादा नजदीक नहीं था लेकिन उसकी बातचीत से इस बात को जरूर महसूस करता था कि वह बेफिक्र है। बस इतना ही....

इन दिनों उसकी छवि मन में बस गई है, किसी फोटो फ्रेम की तरह। सचमुच, भाग्य चिड़िया बड़ी निठुर होती है....

हर सुबह लैपटॉप ऑन कर मेल चेक करते हुए लगता है, काश ! मेल बॉक्स में यह लिखा मिल जाए - please join Google meet with Parth ! 



Friday, October 02, 2020

बापू

साल 1925, महीना अक्टूबर ही था। गांधी जी पूर्णिया के दौरे पर थे। बापू मोटर कार से अररिया जा थे, इसी य़ात्रा के दौरान वह कुछ देर के लिए रानीपतरा में ठहरे थे। बापू की स्मृति में रानीपतरा स्थित सर्वोदय आश्रम में उनकी प्रतिमा स्थापित है। आज बापू की 151 वीं जयंती के अवसर पर हम सब उसी रानीपतरा में इकट्ठा हुए।
पूर्णिया जिला प्रशासन ने आज 2 अक्टूबर को बापू की जंयती पर मतदाता जागरूकता दौड़ का आयोजन किया था। पूर्णिया पूर्व प्रखंड से रानीपतरा की दूरी सात किलोमीटर है। इस दौड़ में 400 से अधिक युवा शामिल हुए। पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार दौड़ में शामिल थे और उन्होंने सात किलोमीटर की दौड़ पूरी की। कार्यक्रम की शुरूआत और अंत दोनों में उन्होंने कहा कि बापू के बिना कुछ भी संभव नहीं है।
गांधी जयंती पर आयोजित इस दौड़ के कई मायने निकाले जा सकते हैं। आगामी चुनाव को लेकर मतदाता जागरूकता अभियान को आप इससे जोड़ कर देख सकते हैं। लेकिन मेरे लिए यह दौड़ गांधी के सादगी का प्रतीक है, दौड़ते हुए हम सब एक दिख रहे थे। इस लोकतांत्रिक देश में जब सवाल पूछने पर हर कोई चुप्पी साधने लगा है, जब सत्ता, नशे की तरह व्यवहार करने लगी है, ऐसे में वक्त में बिना तामझाम के सड़क पर दौड़ते अधिकारी और लोगबाग एक ऐसी दुनिया की तस्वीर दिखा रही थी, जिसे आप मेरा भरम भी कह सकते हैं, मेरे मन का सच भी कह सकते हैं। 
निजी तौर पर बापू की सादगी मुझे खींचती है। कोई आदमी इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रख सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी। उनकी सादगी किसी इवेंट मैनेजर का रिमोट कंट्रोल नहीं था, यह बापू का जीवन था, जिसे आज ब्रांड के तौर पर कोई पेश कर रहा है।

आज की सुबह इसलिए भी खास रही कि हम उस माटी को स्पर्श करने पहुंचे, जहां कभी बापू आए थे। ऐसे वक्त में जब बात करने का लहजा लगभग बदल चुका है, गुस्सा हम सब पर हावी है, ऐसे वक्त में एक सुबह बापू की तस्वीर और प्रतिमा के साथ सेल्फी लेते पूर्णिया जैसे शहर के युवाओं को देखकर एक उम्मीद तो जगी ही।

पूर्णिया में बापू तीन दफे आए थे। 1925, 1927 और 1934 में गांधी जी यहां आए थे। यहां एक घटना का जिक्र जरूरी है। 13 अक्टूबर 1925 को बापू ने जिला के बिष्णुपुर इलाके का दौरा किया था। बापू को सुनने बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे। शाम को गांधी जी ने स्थानीय ग्रामीण श्री चौधरी लालचंद की दिवंगत पत्नी की स्मृति में बने एक पुस्तकालय मातृ मंदिर का उद्घाटन किया था। बापू ने अपने नोट्स में लिखा है कि बिष्णुपुर जैसे दुर्गम जगह में एक पुस्तकालय का होना यह संकेत देता है कि यह स्थान कितना महत्वपूर्ण है। 

आज रानीपतरा के सर्वोदय आश्रम में जमा भीड़ इस बात की गवाही दे रही थी कि बापू आज भी हमारे मानस में हैं, उनके बिना कोई काम संभव नहीं है। वह हमारे नायक हैं, हमारे मनमीत हैं, जिनसे हम अपने जीवन में प्रयोग करना सीखते हैं और सीखते रहेंगे। 

पूर्णिया जिला के जिलाधिकारी राहुल कुमार ने पिछले एक साल में उन जगहों को जोड़ने का काम किया है, जहां गांधी जी के चरण पड़े थे। टीकापट्टी का रूप बदल चुका है, जहां 10 अप्रैल 1934 को बापू आए थे। वहां उन्होंने एक बड़ी जनसभा को संबोधित किया था। 

इस बदलते दौर में पूर्णिया को यह नहीं भूलना चाहिए कि यहां कभी बापू आए थे। उनका यह कथन हमें याद रखना होगा- “हमारी सभ्यता का सार तत्व यही है कि हम अपने सार्वजनिक या निजी, सभी कामों में नैतिकता को सर्वोपरि मानें।”

Tuesday, September 29, 2020

चुनावी चुप्पी



गाम घर में इस बार चुनाव को लेकर बातचीत अभी शुरू नहीं हुई है। लोग बाग में अजीब तरह की चुप्पी दिख रही है। एक तो मौसम की मार है, मानसून अपने विदाई के वक़्त बिहार में अलग ही माहौल बनाए हुए है। 

आज हफ़्ते भर बाद धूप दिखी है। शहर में जल जमाव तो गाम में हाइब्रीड धान की बरबादी दिख रही है।

देश के अन्य हिस्सों की तरह बिहार के किसानों के मन में किसान बिल को लेकर गुस्सा दिख नहीं रहा है। चुनाव की सरगर्मी अभी जमीन पर नहीं बल्कि पार्टी में दिख रही है। 

टिकट को लेकर गरम नरम का भाव अभी दिख रहा है। पूर्णिया जिला के अलग अलग विधानसभा क्षेत्र में उम्मीदवारी को लेकर हर एक नेता कोरोना पोजिटिव की तरह  बर्ताव कर रहा है। हर कोई मानो खुद को आइसोलेशन वार्ड में महसूस कर रहा है। दल की सीमा हर दूसरा नेता तोड़ने को बेताब है।

गाम के हाट बाजार में लोकल नेता सब दिख जाते हैं। मास्क पहने लोग हर किसी को शंका की निगाह से देख रहा है।

सुबह अब कुहासा दिखने लगा है, ऐसा लग रहा है कि चुनाव की तारीख से पहले नेताजी सबको सर्दी वाला कपड़ा पहना पड़ेगा। 

पार्टी सब का सर्वे का काम लगभग पूरा हो चुका है। मोबाइल इस बार वोटर तक पहुंचने का बड़ा जरिया बन सकता है। गाम के अरुण वासुदेव को इस बार सोशल मीडिया वाला चुनाव समझ में आने लगा है। उसका लड़का स्मार्ट फोन पर नेता सबका भाषण सुना रहा है। अरुण ने एक नया शब्द सीखा है - टीटर ! ( ट्विटर) , अरुण ने कहा -" मेरा लड़का हमको दिखाया कि तीर, कमल , लालटेन सब टीटर पर बात करता है!"

एक चीज जो शुरूआत में दिख रहा है, वह है मोदी की बात। ऐसे में अभी कहानी कई रंग में सामने आएगी, देखते हैं चुनाव का शोभा सुंदर ' हेलीकॉप्टर, रैली..' किस अंदाज में होता है, कौन सब क्या क्या बोलता है ।

#चुनावीबतकही - 2
#BiharElections2020

Tuesday, September 01, 2020

उम्मीद : पूर्णिया

दो अक्टूबर,2019 को पूर्णिया समाहरणालय में शायद पहली बार बापू की जयंती मनाई गई थी। सुनकर आपको ताज्जुब लगेगा लेकिन यह सच है। गाँधी की तस्वीर हर जगह दिख जाती है लेकिन उन पर बातचीत बहुत कम लोग करते हैं।

पूर्णिया जिला के सुदूरतम इलाकों में एक है टिकापट्टी। यहाँ बापू आए थे, जगह चिन्हित है लेकिन वहाँ चारों तरफ गंदगी का अंबार लगा रहता था, 30 अक्टूबर 2019 को पूर्णिया के जिलाधिकारी उस जगह की यात्रा करते हैं, फिर 15 नवंबर 2019 को उसी जगह सूबे के मुख्यमंत्री का कार्यक्रम होता है, वह परिसर गाँधी मय हो जाता है।

जिला स्वच्छता के आंकड़ों में पिछड़ा नजर आ रहा था, ग्रामीण इलाकों में शौचालय निर्माण को लेकर अबतक जोश दिख नहीं रहा था, अचानक एक दिन किसी गाँव में कुदाल लेकर शौचालय निर्माण के लिए गड्ढ़ा करते जिलाधिकारी दिख जाते हैं, यह सब पहली बार हो रहा था।

पुस्तकालय को लेकर अभियान की शुरूआत होती है- किताबदान। वहीं जिला का एक पंचायत भवन देश भर की सुर्खियां बटोरता है- रूपसपुर खगहा। मुख्यमंत्री खुद आते हैं उस पंचायत सरकार भवन परिसर को देखने। हां एक ही परिसर में पंचायत सरकार भवनस्कूलआंगनबाड़ीअस्पतालपशु चिकित्सालयपुस्तकालयपैक्स और जलाशय मौजूद हैं। 

फरवरी,2020 में यह जिला 250 साल पूरा करता है, देश के पुराने जिलों में एक पूर्णिया उस दिन को खास बनाना चाहता है, और फरवरी 2020 में पूर्णिया एक यादगार कार्यक्रम का गवाह बनता है, देश भर में जिला की बात होती है।


फिर अचानक पूरी दुनिया कोरोना की चपेट में आ जाती है, सबकुछ थम जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले अपनी माटी की तरफ लौटते हैं, उनके लिए पूर्णिया में कल्सटर में रोजगार का सृजन होता है। शहर के सदर अस्पताल में डेडिकेटेड कोविड हेल्थ केयर सेंटर बनाया जाता है। कठिन  से कठिन वक्त में सकारात्मक कार्यों के लिए एक स्पेस बनता दिख रहा है।

 

यह सब एक साल का लेखा -जोखा है, पूर्णिया जिला का। बहुत कुछ और भी होगा लेकिन स्मृति में यह सब सबसे आगे है। पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार पिछले साल एक सितंबर को जिला का कार्यभार संभाले थे। हमने उनके बारे में बहुत कुछ पढ़ा था। 


मेरी स्मृति में 15 नवंबर 2019 एक अलग ही रंग में दर्ज है। उस दिन नीतीश कुमार टिकापट्टी स्थित गांधी सदन पहुंचते हैं। परिसर में हम गांधी के प्रिय भजन वैष्णव जन.. की धुन सुनते हैं। परिसर गांधीमय था। भीतिहरवा आश्रम की झलक वहां दिख रही थी। मुख्यमंत्री परिसर को देखते हैंवे गांधी सदन के कमरे में लगी फोटो प्रदर्शनी देखते हैं। इन सबके बीच मैं चुपचाप पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार के चेहरे को देखता हूंगांधी और उनके चरखे के बारे में सोचता हूं। एक उजड़े- बिखरे परिसर में गांधी की स्मृति को जीवंत करने वाले अपने नायक को मैं चुपचाप देखता रह जाता हूं। रेणु के इस अंचल में साहित्य-कला अनुरागी अपने जिलाधिकारी को बापू की स्मृति को जीवंत करते देखता हूं। मैला आंचल में एक जगह रेणु लिखते हैं- सतगुरु हो! जै गांधीजी! …बाबा …जै ... भीतर रेणु का बावनदास मानो बता रहा हो कि दुनिया जैसी भी हो गांधी रहेंगे....

 

Saturday, August 15, 2020

पापा की बेटी #GunjanSaxenaTheKargilGirl

मेरा घर बिहार के पूर्णिया जिला में है, जहां से दार्जिलिंग नजदीक है। वहां की चायपत्ती बहुत मशहूर है। जो चाय के शौकीन होते हैं, वहां की लंबी पत्ती वाली चाय जरूर लाते हैं। इस चाय को जितना धीरे धीरे आप पीएंगे, स्वाद उतना ही बढ़ता जाएगा। आज गुंजन सक्सेना : द कारगिल गर्ल देखते वक्त दार्जलिंग की उसी चाय का  अहसास हुआ। 

यह फिल्म पंकज त्रिपाठी और जाह्नवी कपूर के नाम है। इन दोनों की आंखें बोलती है। इस फिल्म में, दृश्य - संवाद सबकुछ मन के करीब, कोई ताम - झाम नहीं, बस आहिस्ता आहिस्ता चलती फिल्म..

कबीर की एक पाती है -
"सहज सहज सब कोई कहै,
सहज न चीन्हैं कोय |
जिन सहजै विषया तजै,
सहज कहावै सोय || "

इस फिल्म में पंकज त्रिपाठी जी का किरदार कबीर के इसी ' सहज ' शब्द का सटीक उदाहरण है। यह फिल्म एक पिता और बेटी के ख़ास रिश्ते को परदे पर दिखाने में कामयाब रही है। अभिनेता पंकज त्रिपाठी ने अपने सहज अभिनय से गुंजन के पिता के रोल को यादगार बना दिया।

पिता की सहजता क्या होती है, उसे पंकज त्रिपाठी ने पेंटिंग की तरह पर्दे पर उतारा है, एकदम आहिस्ता - आहिस्ता! फिल्म का एक दृश्य है,  जहां गुंजन को एयरफोर्स का एग्जाम पास करने के लिए वजन घटाना होता है। ऐसे में पंकज त्रिपाठी यानी गुंजन के पिता अभिनेत्री रेखा को उसकी प्रेरणा बनाते हैं। वो अद्भुत दृश्य है।

वहीं जब गुंजन हताश होकर घर आती है तो लेक्चर देने की बजाय उसके पिता  उसे रसोई में ले जाकर ज़िन्दगी के आटे दाल का भाव बताते हैं। 

बेटी को मन की करने की आजादी देने का एक दृश्य है, उसका यह संवाद मन में बैठ गया है - मां पूछती है,  "अच्छा हुआ गुंजू मान गई... मान गई न?” तो पापा यानी पंकज त्रिपाठी  कहते हैं – “नहीं, मैं मान गया..”

इस फिल्म में गुंजन की दोस्त मन्नू  का छोटा किरदार भी बड़ा लगता है। वह ताजी हवा की तरह स्क्रीन पर आती है, नेगेटिव तो एकदम नहीं, जीवन में केवल और केवल पोजटिव। एक दृश्य में वह कहती है : "माधुरी बन न सकी तो क्या, माधुरी दिख तो रही हूं!”

आप इस फिल्म को ध्यान से देखेंगे तो एक छोटे से दृश्य में देशभक्ति की व्याख्या मिलेगी। एक रात गुंजन अपने पिता को जगाती है और पूछती है 
 – “पापा, एयरफोर्स में ऐसे कैडेट्स होने चाहिए जिनमें देशभक्ति हो। मुझे तो बस   प्लेन उड़ाना है। ये ख़्वाब पूरा करने के चक्कर में, मैं देश के साथ गद्दारी तो नहीं कर रही हूं?”

इस सवाल पर पिता का जवाब हम सभी को सुनना चाहिए और याद भी रखना चाहिए। पंकज त्रिपाठी पहले बेटी से पूछते हैं – “गद्दारी का विपरीत क्या होता है?”

गुंजन कहती है – “ईमानदारी”.
फिर वो उसे कहते हैं – “तो अगर तुम अपने काम में ईमानदार हो, तो देश के संग गद्दारी कर ही नहीं सकती। तुम्हें क्या लगता है एयरफोर्स को ‘भारत माता की जय चिल्लाने वाले चाहिए ? उन्हें बेटा वैसे कैडेट्स चाहिए, जिनका कोई लक्ष्य हो, जोश हो, जो मेहनत और ईमानदारी से अपनी ट्रेनिंग पूरी करें, क्योंकि वही कैडेट्स आगे चलकर बेहतर ऑफिसर बनते हैं और देश को अपना बेस्ट देते हैं। तुम सिनसिएरिटी से, हार्ड वर्क से, ईमानदारी से एक बेहतर पायलट बन जाओ, देश भक्ति अपने आप हो जाएगी...”

यह फिल्म केवल लड़कियों को ही नहीं बल्कि उनके भाइयों और माता-पिता को भी देखनी चाहिए। यह फिल्म घर के सभी सदस्य को एक संग बैठकर देखनी चाहिए। यह फिल्म आपको भीतर से बेहतर बनाएगी, निर्मल कर देगी। 

और चलते - चलते पंकज त्रिपाठी के लिए रामदरश मिश्र  जी की पंक्ति है -

पहाड़ों की कोई चुनौती नहीं थी,
उठाता गया यूँ ही सर धीरे-धीरे।
ज़मीं खेत की साथ लेकर चला था,
उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे।

Monday, August 03, 2020

राखी का उपहार

"दीदी, अब
अपने दूसरे घर की
नींव की ईंट हो तुम तो
तुम्हारी नई दुनिया में भी
होंगी कहीं हमारी खोयी हुई गेंदें
होंगे कहीं हमारे पतंग और खिलौने..."

यह पंक्ति कवि उदय प्रकाश की कविता 'नींव की ईंट हो तुम दीदी' की है। इस कविता को पढ़ते हुए लगता है कि यह हम सभी के घर की कहानी है। 

दिल्ली में नौकरी के दिनों में लाडो सराय में जहां मेरा कमरा था , उसकी बालकनी के ठीक सामने एक  पुराना नीम का पेड़ था। इस पेड़ पर खूब चिड़िया आती थी। आज यह सब लिखते हुए मन पूर्णिया से दिल्ली की तरफ भाग गया है। राखी के दिन मन वहां भाग ही जाता है, दीदी सब उसी बड़े शहर में अब बस गई हैं। राखी के दिन हम पहुंच जाते दीदी के घर , बड़ा अच्छा रूटीन होता था राखी के दिन। अब तो राखी के दिन दिल्ली दूर लगती है। लेकिन आज राखी के दिन मन यात्रा कर रहा है। 

वहीं इन सबके बीच मेरे जिला में आज राखी के दिन गाम - घर में शौचालय निर्माण को लेकर एक सुंदर शुरुआत हुई है, बहन को उपहार में शौचालय दिया जा रहा है। पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार की इस पहल की आज हर कोई चर्चा कर रहा है, वे अक्सर प्रयोग करते रहते हैं।
राहुल कुमार की पहल पर जिला के सभी 246 पंचायतों में दस-दस शौचालयों का निर्माण किया गया। इस पहल की शुरुआत 29 जुलाई को हुई थी और उस दिन जिला के हर पंचायत में शौचालय के लिए आवेदन देने वाले दस महिला लाभुकों को चिह्नित किया गया था। आज राखी के दिन उन्हीं महिला लाभुकों उपहार में शौचालय दिया जा रहा है।

पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल  कुमार ने आज रूपौली प्रखंड में राखी बंधवाया और शौचालय उपहार में देकर अपना वादा निभाया। यह पहल कई मायने में महत्वपूर्ण है। इस कठिन दौर में इस तरह के कदम से हम सभी को ऊर्जा मिलती है कि हमें अपने स्तर पर कुछ न कुछ सकारात्मक करते रहना चाहिए।
वैसे यह कटु सत्य है कि ग्रामीण समाज शौचालय को लेकर गंभीर नहीं है। सरकारी आंकड़ों पर लंबी बहस हो सकती है, लेकिन ग्राउंड जीरो कुछ और कहता है। गांव-देहात में मोबाइल और महंगी बाइक आपको हर जगह मिल जाएंगी, लेकिन क्या शौचालय दिखते हैं? यह बड़ा सवाल है। 

हमें स्वास्थ्य के प्रति अब जागरूक होना होगा। शौचालय निर्माण को लेकर हम अपने स्तर पर भी यह काम कर सकते हैं।  ऋण लेकर हम खेती कर सकते हैं, मोटर साइकिल, ऑटो-रिक्शा या ट्रेक्टर ख़रीद सकते हैं तो फिर शौचालय को हम प्राथमिकता क्यों नहीं दे रहे हैं, यह हम सभी को अपने आसपास के लोगों से पूछना होगा, इस राखी आईए हम गांव घर में शौचालय निर्माण को लेकर सवाल करते हैं, लोगों से बातचीत करते हैं। एक - एक ईंट जोड़कर शौचालय बनवाते हैं।

Thursday, July 23, 2020

नीतीश जी के नाम

नीतीश जी
नमस्ते।

इन दिनों बिहार जूझ रहा है, एक तरफ महामारी  से तो दूसरी ओर बाढ़ से। राज्य का हर जिला संक्रमण के फेर में है।

' लोग मर रहे हैं '। नीतीश जी यह  वाक्य लिखते हुए लगा कि काश यह वाक्य जुमला होता ! लेकिन यही सच है।

आपसे हमेशा उम्मीद रही है। पार्टी के गुणा - गणित से इतर मैं आपको देखता रहा हूं, एक प्रशासक के तौर पर, एक अभिभावक के तौर पर। 

2015 से आपको देख रहा हूं। कोई कुछ कहे लेकिन यह सच है कि आपने बिहार में बदलाव की हवा चलाई, आपकी वजह से लोग लौटे हैं, अापकी वजह से सड़क बिजली, शहर गाम सब बदला है।

लेकिन आज, यह पाती इसलिए लिख रहा हूं कि आप एक बड़ा फैसला लें और चुनाव को टाल दें। बिहार ने मुल्क को बहुत कुछ दिया है, आप की राजनीति की पाठशाला के नायक जेपी रहे हैं, आप चाहेंगे तो एक बार फिर बिहार मुल्क ही नहीं बल्कि दुनिया के सामने एक छाप छोड़ जाएगा। 

आप ही सोचिए, जब मौत हो रही हो तब चुनाव की बात करना पाप ही लगता है, एक गंध लगती है, जलने की। जानता हूं राजनीति में सब कुछ चलता है लेकिन नीतीश जी, आपसे उम्मीद तो हम कर ही सकते हैं।

इन दिनों आपको जब भी देखता हूं तो जो छवि आंख में बनती है वह एक संयुक्त परिवार के मुखिया की होती है। परिवार का वह आधार स्तम्भ जो विकट से विकट परिस्थिति में किसी परिवार के किसी एक सदस्य को खुश करने के लिए नहीं बल्कि, सबके कल्याण के लिए फैसला लेता है। 

हमें अपने राज्य के मुखिया से यही उम्मीद है नीतीश जी। हर एक बिहारी के पास इस दौर में आपके लिए सवाल है। सवाल पूछने का हक हर किसी को है।

यह सच है कि इस दौर में  बिहार के  महासमर में चुनावी शतरंज खेलने के लिए हर कोई तैयार है, जो आपकी आलोचना कर रहा है वह भी और जो आपकी जय जय कर रहा है वो भी। 

लेकिन बिहार के गाम का खेतिहर, शहर के किसी मोहल्ले का युवा, इस वक्त महामारी से बचना चाहता है नीतीश जी, वह चुनाव नहीं चाहता।

चुनाव की माया से दूर बिहार को इस वक़्त इलाज चाहिए, महामारी की जांच चाहिए,  हर व्यक्ति के भीतर बस गए भय को हरने की युक्ति चाहिए...

मुझे याद है लॉक डाउन के शुरुआत में जब लोग लौट कर आ रहे थे तो आपने कोरोनटाइन सेंटर में ठहरे लोगों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए गुफ्तगू की थी, आपकी बातें याद है, सबका मन आपने जीत लिया था, एक अभिभावक की तरह।

एक बार फिर आपसे उम्मीद तो कर ही सकते हैं नीतीश जी, इस नाउम्मीदी के दौर में...

आपका
गिरीन्द्र नाथ झा