Friday, July 03, 2015

प्रधानमंत्री के नाम किसान की चिट्ठी

माननीय प्रधानमंत्री जी,
नमस्कार।
आपको तो पता ही होगा कि यह समय किसानी कर रहे लोगों के लिए धनरोपनी का है। आप सोच रहे होंगे कि यह किसान इतनी सी छोटी बात के लिए मुल्क के प्रधान सेवक को क्यों तंग कर रहा है। लेकिन क्या करूं, हमने आपको प्रचंड बहुमत देकर केंद्र तक पहुंचाया है। ऐसे में आपको अपना मानकर यह पाती लिख रहा हूँ।

प्रधानमंत्री जी, इस वक्त हर जगह किसान धान की बात कर रहा है। इस वक्त हमें अपने खेतों में पानी की जरूरत होती है ताकि धनरोपनी कराई जा सके। मेघ वैसे ही हमलोगों से रूठा है। ऐसे में डीजल फूंक कर हम खेत में कादो कर रहे हैं ।

माननीय प्रधानमंत्री जी, आप कादो समझते हैं न ? आप जरूर समझते होंगे क्योंकि आप सबकुछ जानते हैं। चुनाव के वक्त आपके भाषणों के हम दीवाने हुआ करते थे क्योंकि तब आप हमलोगों की मन की बात सीधे तरीके से किया करते थे। भाषण कला में आपसे कौन हाथ मिलाये। हम सब तब आप की हाँ में हाँ और ना में ना मिलाया करते थे। उस वक्त अक्सर आप किसानी की बात करते थे।

याद हैं न आपको, जब आप चुनाव प्रचार के सिलसिले में पूर्णिया आये थे तब यहां के रंगभूमि मैदान में कोसी के किसानों के लिए आपने कितना कुछ कहा था। आपको हम सब भावी प्रधानमंत्री की नजर से देख रहे थे। जो सच भी साबित हुआ।

पूर्णिया के अपने लंबे भाषण में आपने मछली, मखाना , मक्का, पटसन आदि का जिक्र किया था। ऐसे में कादो का अर्थ आपसे पूछना बेईमानी होगी। हम समझते हैं कि आप सब समझते ही होंगे। इस देश में किसान की बात करना सबसे आसान काम है लेकिन उसका दर्द समझना सबसे कठिन काम। हमें आप पर भरोसा है ..आप हमारा दर्द समझते होंगे या समझने की कोशिश कर रहे होंगे।

तो प्रधानमंत्री जी,  मैं कह रहा था कि डीजल महंगा है और हम किसान कितना पैसा फूंके? कोसी प्रोजेक्ट का नहर है लेकिन वो भी सूखा। उसमें समय पर पानी नहीं छोड़ा जाता। अब कहिये ऐसे में रोपा कैसे होगा ?

प्रधानमंत्री जी, इस मुल्क में हर किसी के लिए किसान ही सबसे साफ्ट टारगेट है। हर कोई हमारी बात करता है। आप डिजिटल भारत की बात करते हैं, उसमें भी गाँव की बातें हैं । गाँव गाँव तक फाइवर केबल नेटवर्क का जाल बिछाने की आप बात कर रहे हैं लेकिन किसान की प्राथमिक़ता खेती बाड़ी है
अच्छी खेती के बाद ही हम कुछ सोच पाएंगे। खेती के वक्त डिजीटल इंडिया वीक जैसी बातें सुनकर लगता है कि कोई हमारा मजाक उड़ा रहा है। वैसे यह कोई नया काम नहीं है। हमारा मजाक उड़ता रहा है लेकिन हमें आशा है कि आपकी सरकार ऐसा नहीं करेगी। 

आप किसान के मन को मत तोड़िये आप तो रेडियो पर मन की बात करते हैं न !

प्रधामन्त्री जी, धान नहीं होगा तो चावल की मार होने लगेगी। गेहूं नहीं होगा तो रोटी-नान की मार होने लगेगी, दाल नहीं होगा तो भोजन की थाली सुनी हो जाएगी। आप सबके डाइनिंग टेबल के लिए भी हम सब ही मेहनत कर रहे हैं। 

ऐसे में हम सबका ख्याल यदि नहीं रखा जाएगा तो देश की अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी। आप तो चाय बेचे हैं, आपने तो निचले पायदान से यात्रा आरम्भ कर इतनी ऊंचाई प्राप्त की है.. आप किसान की पीड़ा जरूर महसूस कर रहे होंगे।

आप मुल्क के प्रधान हैं, आप मन की बात करते हैं, आप विदेश जाते हैं..। विदेश यात्राओं की तरह एक बार गाँव-गाँव भी घूमिये न ! इसी बहाने उन गाँव की सड़क पक्की हो जायेगी, जहां अबतक सड़क नहीं पहुंची है। बिजली भी पहुंच जायेगी। अधिकारियों का दो -तीन दौरा हो जाएगा। पंचायतों का कायाकल्प हो जाएगा। आप भी खेत खलिहान को नजदीक से देख पाएंगे। प्रधानमंत्री जी इस पर एक दफे जरूर सोचियेगा।

हम सब तो यही समझते हैं कि आप सबकुछ जान ही रहे हैं। किसान को सुविधा दीजिये प्रधानमंत्री जी ..यकीन मानिए किसान आपको और इस देश को निराश नहीं करेगा। हम खूब मेहनत करेंगे। देश का अन्न भण्डार बढ़ा देंगे। लेकिन इसके लिए हमें समय पर खाद चाहिए, पानी चाहिए..। आपकी सिंचाई सम्बन्धी योजना को लेकर हम सब पलक बिछाए हुए हैं।

आप दिल्ली के विज्ञान भवन में किसानों की बात करते हैं, हमारे लिए किसान चैनल लांच करते हैं। लेकिन फसल शानदार नहीं होगी तो हम टेलीविजन कैसे खरीदेंगे? हम समय के साथ आगे कैसे बढ़ेंगे? जरा सोचियेगा। 

एक बात और, क्या आप जानते हैं कि किसानों को फसल क्षति का मुआवजा मिलना कितना बड़ा कठिन काम है? इसका उदाहरण मैं खुद हूँ। मार्च में गेहूं की फसल लूट गयी थी बेमौसम बारिश की वजह से लेकिन अबतक खाते में पैसा क्रेडिट नहीं हुआ है। ये तो बानगी भर है, कहानी तो लंबी है।

अब आप ही कहिये प्रधानमंत्री जी कि एक किसान के तौर पर इस वक्त मैं धान की बात करूं , सिंचाई व मुआवजे की बात करूं या फिर आपके साथ डिजीटल इण्डिया वीक मनाऊँ।
आपका
गिरीन्द्र नाथ झा
ग्राम-चनका
जिला-पूर्णिया
राज्य-बिहार
3 जुलाई, 2015

Monday, June 29, 2015

शहर से गाम , गाम से शहर

हर रोज शहर में डॉक्टर-दवा करते दोपहर में जब यहां आता हूँ तो आगे दूर दूर तक खेतों में में लगे धान के छोटे छोटे पौधों को देखकर मन के भीतर का सारा दुःख छूमंतर हो जाता है।

 फसल के चक्र की तरह जीवन का चक्र भी यहां आकर सुलझता दिख जाता है। जीवन का व्याकरण खेत खलिहानों में एकदम सहज हो जाता है। उस खेत को देखकर मन मजबूत हो जाता है जो 12 महीने में मौसम की मार झेलकर भी किसानी कर रहे लोगों का घर-दुआर भर देती है।

फिर लगता है कि हम क्यों जीवन से शिकायत करने बैठ जाते हैं। दरअसल हम देना कम और लेना अधिक चाहते हैं और ऐसे में मन हमारा कमजोर होता चला जाता है। कम्फर्ट जोन में रहने की हमारी आदत हमें डरपोक बनाती जा रही है ।

 इन सब चीजों को देखते भोगते हुए मुझे किसानी का जीवन सबसे सरल दिखने लगता है। कबीर की माया महाठगनी का जटिल फार्मूला उस वक्त अचानक सुलझ जाता है जब मेरी नजर खेत के फसल पर टिक जाती है जो हर रोज बढ़ती है और जब पूरा बढ़ जाती है तब हम उसे काटकर घर ले आते हैं। खेत से हम देने की प्रवृति सीख सकते हैं। धरती मैय्या की यह लीला मेरे मन को मजबूत कर देती है।

खेत खलिहानों को जी कर और उसे महसूस कर जब हर शाम शहर के अहाते में दाखिल होता हूँ तो मन के सारे उलझे तार सुलझते दिखने लगते हैं। मैं मन ही मन मुस्कुराता हूँ।

बिछावन पर लेटे बाबूजी को भर आँख देखता हूँ तो लगता है कि खेत भी तो मुझे यही सब सीखा रही है न जो बाबूजी ने हमें बिछावन पर लेटने से पहले सिखाया था। दरअसल हम सब अपने हिस्से का काम पूरा कर लेट जाते हैं और फिर नए की तैयारी में लग जाते है। संग ही आगे की पंक्ति में बैठे लोगों को देखते हैं कि आखिर वे क्या कर रहे हैं ? वे उन अधूरे कामों को किस अंदाज में आगे बढ़ाने में जुटे हैं ... बाबूजी की शांत आँखें मुझे यही सब शायद दिखा रही है ...खेत-खलिहानों की तरह।

Thursday, May 21, 2015

मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता..

बाबूजी, जब तक आप खड़े थे आपसे आँख मिलाकर बात नहीं कर पाया। मेरी आँखें आपके सामने हमेशा झुकी रही। अब जब रोज यह कहना पड़ता है कि बाबूजी आँखें खोलिए, दवा खाइये...तो मैं घंटों तक अंदर से डरा महसूस करता हूँ। आपसे आँख मिलाने की हिम्मत मैं अब भी नहीं कर पा रहा हूँ।

अब जब रोज आपको बिछावन से उठाता हूँ और फिर वहीं लेटाता हूँ तो आपके शरीर को छूने भर से अजीब की शक्ति मिलती है। इस शक्ति को खुद को खुद से लड़ने के लिए बचाकर रख रहा हूँ।

आपके शरीर में जबसे घाव ने अपनी जगह बना ली तो मैं अंदर से टूट गया। मैंने कभी आपके शरीर को इस तरह लाचार नहीं देखा था। धोती-कुर्ते में आपको सलीके से देखता आया। माँ हमेशा आपके घाव को साफ़ करने में लगी रहती है, वही सबकुछ करती हैं। नहीं मालूम कि आप ये सब समझ रहे हैं या नहीं लेकिन हर बार जब आपके घाव पर बेटाडिन दवा लगाई जाती है तो मैं सिहर जाता हूँ।

मैं जानता हूं कि ये दवा घाव के फंगस को हटाने का काम करती है लेकिन दर्द भी तेज करती है कुछ देर के लिए ...इन सब प्रक्रिया में भी आप के चेहरे पर भाव नहीं देखकर आपका दर्द खुद पी लेता हूँ। आपको उठाकर कुर्सी पर नहीं बैठा सकता, क्योंकि बैठते ही आपका बीपी हाई हो जाता है और फिर घंटों मूर्छित पड़े रहते हैं।

आपको स्नान भी नहीं सकता, घाव के डर से। लेकिन इन सबके बावजूद अपना भरम बनाये रखने के लिए आपको घाव सूखने की सबसे ताकतवर दवा बायोसेफ सीवी- 500  देता हूँ कि आप ठीक हो जाएंगे और बेड सोर को हरा देंगे। मैं जानता हूं कि यह सब वक्त का फेर है, जो आपको तंग कर रहा है।

याद है आपको, दसवीं पास करने के बाद जब आपने टाइटन की कलाई  घड़ी दी थी तो क्या कहा था? मुझे याद है, आपने कहा था वक्त बड़ा बलवान होता है। वक्त हर दर्द की दवा भी अगले वक्त में देता है। गणित में कम अंक आने पर आप गुस्सा गए थे। आपने कहा था जीवन गणित है और तुम उसी में पिछड़ गए...फिर आपने 12वीं में कॉमर्स विषय लेने को कहा और चेतावनी दी थी कि इसमें पिछड़ना नहीं है। याद है न आपको  बाबूजी! मैंने आपके भरोसे को बनाये रखा था तो आपने गिफ्ट में हीरो साइकिल दी थी। फिर दिल्ली भेज दिया, कॉलेज की जिंदगी जीने।

जब भी पैथोलॉजिकल जांच में आपका सोडियम गिरा हुआ और सूगर लेवल हाई देखता हूँ तो मैं खुद चक्कर खा जाता हूँ। इलोकट्रेट इम्बैलेंस आपके लिए अब नई बात नहीं रही लेकिन मैं डर जाता हूं। हमेशा अपने कन्धे पर भार उठाने वाले शख्स को इस कदर लाचार देखकर मेरा मन टूट जाता है। लेकिन तभी आपकी एक चिट्ठी की याद आ जाती है जो आपने मुझे 2003 में भेजी थी दिल्ली के गांधी विहार पते पर। रजिस्ट्रड लिफाफे में महीने के खर्चे का ड्राफ्ट था और पीले रंग के पन्ने पर इंक कलम से लिखी आपकी पाती थी।

आपने लिखा था कि “बिना लड़े जीवन जिया ही नहीं जा सकता। लड़ो ताकि जीवन के हर पड़ाव पर खुद से हार जाने की नौबत न आए।“ आपकी इन बातों को जब याद करता हूँ तो सोचता हूँ कि आप क्यों नहीं अपने घाव से लड़ रहे हैं। आप क्यों हार रहे हैं।

मैं आपको फिर से खड़ा देखना चाहता हूँ। बाबूजी, मुझे आप लेटे हुए अच्छे नहीं लगते। मुझे आपसे कार ड्राइव करना सीखना है। दीदी ने जब कार दी तो पहली बार स्टेयरिंग पर हाथ रखा तो आपकी वो बात याद आई – “जब कार लाओगे तो मैं क्लच- ऐक्सिलेटर-गियर का खेल तुम्हें सिखाऊंगा ....” लेकिन वो भी नहीं हो सका और यही वजह है कि मैं आज भी कार चलाने से झिझकता हूँ। मैं हर बात सबको कह नहीं पाता, बहुत कुछ मन में ही रख लेता हूं। जानता हूं ये ठीक नहीं है लेकिन आदत से मजबूर हूं।

जब भी चनका जाता हूं तो आपका केसरिया रंग का वो दोनों एस्कार्ट ट्रेक्टर याद आ जाता है, जिसे आप हाफ पेंट , जूता और हेट पहनकर खेत में निकालते थे..आप तो देवघर , दरभंगा सबजगह ट्रेक्टर से पहुंच जाते थे या फिर अपनी काले रंग की राजदूत से। कितनी यात्राएं की आपने। याद है न आपको दिल्ली के बसंतकुंज स्थित फोर्टिस अस्पताल में डाक्टर दीपक ने क्या कहा था – आपने ड्राइव बहुत किया है, लंबी दूरी मोटरसाइकिल से तय की है...इतना नहीं चलाना चाहिए था...। जब भी मैं लंबी दूरी बाइक से तय करता हूं तो आप याद आ जाते हैं।

जानते हैं जब आपके लिए व्हील चेयर खरीदकर लाया था तो रास्ते में रूककर खूब रोया था। मैंने कभी भी आपको सहारा लेकर चलते नहीं देखा था ...सहारा देते हुए ही देखा। बिजली के बिछावन पर लेटे देखकर भी मेरा यही हाल होता है। सच कहूँ तो अब डाक्टरों से डर लगता है। डाक्टरी जांच से भय होता है। मैं खुद साउंड एपिलेप्सी का मरीज बन गया..मेडिकल फोबिया का शिकार हो गया हूँ। अस्पताल जाने के नाम पर पसीने छूट जाते हैं। पहले गूगल कर लेता हूं कि फलां रोग का इलाज क्या है...

आप जानते हैं बाबूजी, मेरी एक किताब आ रही है राजकमल प्रकाशन से। आपने कहा था न कि हिंदी में राजकमल प्रकाशन का स्तर ऊंचा है और जब भी लिखना तो उम्मीद रहेगी कि राजकमल से ही किताब आए... बाबूजी, मेरी किताब उसी प्रकाशन से आ रही है।  आप यह सुनकर क्यों नहीं खुश हो रहे हैं ? आप सुनिए तो...

चनका में आपकी अपनी एक लाइब्रेरी थी न जहां  राजकमल प्रकाशन की किताबें रखने के लिए काठ वाली एक आलमारी थी अलग से! आपने दादाजी के नाम से वह लाइब्रेरी तैयार की थी। मुझे कुछ कुछ याद है। लाइब्रेरी की सैंकडों किताबें आपने बांट दी। आप लोगों को  किताब पढ़ाते थे।

एक बार जब मैंने आपसे पूछा कि किताबें जो लोग ले जाते हैं वो तो लौटा नहीं रहे हैं? आपने कहा था- “किताब और कलम बांटनी चाहिए। लोगों में पढ़ने की आदत बनी रहे, यह जरुरी है। देना सीखो, सुख मिलेगा। “ अब जब मेरी किताब की बातें हो रही है तो आप चुप हैं ..इसलिए मैं सबकुछ करने के बाद भी खुद से खुश नहीं हूँ क्योंकि आप मेरे लिखे में गलती नहीं निकाल रहे हैं।  आप मेरे आलोचक हैं, प्रथम पाठक हैं.. आप समझ क्यों नहीं रहे हैं।

किताब को लेकर जब भी राजकमल प्रकाशन के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम से बात होती है तो मैं अपना दुःख छुपा लेता हूँ। मैं उन्हें कैसे बताऊँ अपने भीतर की पीड़ा...एक एक शब्द लिखते वक्त अंदर का संत्रास झेलता हूँ। यह दुःख मैं शेयर नहीं कर पा रहा हूँ ...किसी से नहीं। जब भी सत्यानन्द निरूपम से किताब आदि को लेकर बात करता हूँ तो बस मुस्कुरा देता हूँ ताकि अंदर की पीड़ा और आंसू बाहर न आ जाए।

सत्यानंद निरुपम सर को  कैसे कहूँ कि बाबूजी के लिए ही लिखता रहा हूँ लेकिन अबकी बार वे कुछ नहीं समझ पा रहे हैं। मैं भीड़ में अकेला हो चला हूँ। फिर सोचता हूँ कि शायद मन के तार सत्यानंद से कभी न कभी जुड़ जाएंगे तो उन्हें सब बातें बताऊंगा।

बाबूजी, आपको तो रवीश की रिपोर्ट बहुत पसंद है न। आपने तो उसीके लिए ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में केबल का तार लगाया था ..याद है न। अयोध्या पर रवीश की एक रपट आई थी तो आपने फोन किया था कि रिपोर्टिंग को इस अंदाज में करना चाहिए। बाबूजी, हाल ही में रवीश ने अपने रिपोर्ट में मेरा लिखा पढकर सुनाया था,  दुःख की ही घड़ी में लेकिन सुनाया था। आपने उसे भी नहीं देखा...क्यों ..? रवीश आपका हालचाल पूछते हैं और आप है कि जवाब भी नहीं देते। कुछ तो कहिये....

बाबूजी, सुशांत झा आपको याद हैं न ! विरंची जी के बेटे, मधुबनी वाले। आप उनकी बात खूब सुनते थे न जब वे पूर्णिया आये थे। वे भी आपका हाल चाल लेते हैं। आपने उनके बारे में कहा था कि इनके संपर्क में रहिये, इनके पास इतिहास - भूगोल की कथाएँ हैं। इनसे बहुत कुछ सीखने की बात आपने कही थी। हां बाबूजी , मैं सुशांत भाई के संपर्क में रहता हूँ, उनसे सीखता रहता हूं। वे तो आपके चनका के बारे में भी बात करते रहते हैं। मेरे सभी दोस्त आपके बारे में पूछते रहते हैं लेकिन आप है जो खामोशी का चादर ओढ़ लिए हैं।

जानते हैं आपकी खामोशी की वजह से है कि मैं परेशान रहता हूँ। जबसे आपने बिछावन पकड़ा है, कहां कुछ कहा मुझसे। अब तो साल होने जा रहे हैं। कुछ तो बोलिए..डांट ही लगाइए..लेकिन कुछ तो कहिए।

एक बात जानते हैं, इस बार आंधी बारिश के तांडव में भी आपके हाथ से लगाये लीची और कटहल गाछ फल से लदे हैं। दोपहर में गाम के बच्चे उसमें लूदके रहते हैं , चमगादरों की तरह ...मैं बस उन्हें हँसते खिलखिलाते देखता रहता हूँ। आप सबके लिए कुछ न कुछ लगाकर लेट गए हैं ..अब उठिए और मुझे भी यह तरकीब सीखा दीजिये न बाबूजी.....आप मेरी बात सुनिए न ...।

Wednesday, May 20, 2015

पंखुरी का पन्ना: कुछ कहानी कुछ पेंटिंग...

चनका में पंखुरी की मस्ती
पंखुरी को रोज नई कहानी चाहिये। जब भी खाली रहता हूँ, उसके लिए कहानी खोजता रहता हूँ। कहानी में उसको बन्दर चाहिए होता है और कुछ शरारती बच्चे और उन बच्चों के लिए एक मैडम।

हर रोज नई कहानी...बन्दर जो उसकी कहानियों का परमानेंट नायक होता है उसको आप रिपिट नहीं कर सकते। मतलब हर रात नया बंदर चाहिए उसको। अपनी कहानी का प्लॉट पंखुरी हर दिन नया चाहती है।

स्कूल से आकर वो जब पेंटिंग करने बैठती है, उसी वक्त वो ऐलान कर देती है कि रात में सोते वक्त उसे नई कहानी चाहिए।

आज उसकी कहानी में हमने बंदर को जीन्स शर्ट में ला खड़ा कर दिया था और याकू और चिहू नाम के उसके दोस्तों को जीप पर घुमाया था जंगल में...वहीं हमने लंच में मैगी का इंतज़ाम रखा था लेकिन पंखुरी ने कहा मैगी नहीं उसे चाहिए ब्रेड जैम।

ब्रेड जैम और मैगी जब कहानी के बीच में घुसा तो इसी बीच पंखुरी पूछ बैठी -"पापा जब आप होस्टल में थे तब आपको कौन कहानी सुनाता था ? "

पंखुरी यह सवाल पूछकर झपकी लेने लगी और फिर सो गयी। लेकिन उसके सवाल ने मेरी नींद गायब कर दी है। मैं सोच रहा हूँ कि कम उम्र के बच्चों को हॉस्टल में डालकर सचमुच में हम बचपन का गला घोंट देते हैं। कम उम्र में घर से बाहर रहने का दर्द मुझे पता है लेकिन पंखुरी का एक सीधा सवाल मुझे बेचैन कर दिया है।
खैर, मुझे कल के लिए नई कहानी खोजनी है ताकि पंखुरी की डांट न लगे। मैं उसके लिए रोज नए नए जंगल बनाता हूँ ..बंदरों का देश बनाता हूँ..लाल रंग का बन्दर ...गुलाबी रंग का ...हरा रंग का...बन्दर ही बन्दर ....

सुबह जब पंखुरी उठती है तो उसे पता चलता है कि आज स्कूल बंद है। वो खुश होती है कि आज दिन भर घर में उसकी चलेगी।। स्कूल बंद था  इसलिए पंखुरी दिन भर अपनी शरारतों से घर का रौनक बढ़ाती रही। लैपटाप के पुराने कीबोर्ड, गुड्डा गुड़िया और बीच बीच में पेंटिंग की उसकी मास्टरी जारी रही। सादे पन्ने पर वह एक लड़की की तस्वीर बनाती है और फिर उसे रंगती रहती है।

और उधर मैं दिन भर जीवन के प्रपंच, किसानी की दुनिया और अखबारों व ब्लॉग के लिए खबरें जुटाता रहा और तय समय पर संबंधित लोगों को इमेल भेजता रहा। लेकिन इन सबके बीच भी मन के एक कोने में पंखुरी के लिए कहानी गढ़ता रहा।  आज मैंने पंखुरी के लिए लाल रंग का बन्दर और सीहू  नाम का एक कैरेक्टर खोज निकाला था। रात में बिछावन पर लेट कर, उसे अपनी बांह पर लेटाकर यही कहानी सुनानी है।

लाल रंग का बन्दर लालपुर का राजा था और उसका दोस्त था सीहू। सीहू एक स्कूल में पढता था और गर्मी की छुट्टी में लालपुर आया था। उसके साथ स्कूल की मैडम भी आई थी। दरअसल पंखुरी की कहानी बिना मैडम के अधूरी होती है। मैडम को लेकर पंखुरी बहुत सजग रहती है।

जिस तरह बंदर के रंग को लेकर पंखुरी सावधान रहती है वैसे ही मैडम के नाम को लेकर भी। पंखुरी ने मैडम का नाम 'रेखा' रखने के लिए कहा है। होता ये है कि यदि नाम के साथ आपने छेड़ छाड़ की तो पंखुरी कहानी का बैंड बजा देती है फिर वह कहानी के हर लाइन में गलती खोजेगी।

लालपुर में भी एक स्कूल रहता है। वहां लाल रंग के छोटे छोटे बंदर पढ़ते हैं। सीहू अपनी रेखा मैडम के साथ स्कूल पहुँचता है तो चहक उठता है। बंदर सब भी खुश होते हैं क्योंकि उससे मिलने शहर से कोई जंगल आया है। सीहू ने बंदरों के लिए अपनी मम्मी के हाथ का बना हलुआ लाया है और ढेर सारे केले। दरअसल पंखुरी को केला बहुत पसंद है।

जब मेरी कहानी केले तक पहुंची तबतक पंखुरी झपकी लेने लगी थी। सोने की पूरी तैयारी वो कर चुकी थी। बोली - "पापा कल मेरे लिए पीला रंग का केला लाना...मैं बनाना सैक पियूंगी..अच्छा ये बताओ लालपुर के राजा की रानी कौन थी..एक बंदर वाला गीत सुनाओ ना..प्लीज " !

पंखुरी फरमाइश करने के बाद सो चुकी थी और मैं पैट्रिक फ्रेंच की किताब "भारत" पलटने लगा। पंखुरी के बाद मैं खुद को भी कहानी सुनाता हूँ ताकि कहानी से लगाव बना रहे।

कभी- कभी पंखुरी बहुत सवाल दागती है। आज रात में वो पूछ बैठी- "पापा, ये बताओ कि बंदर के देश में सबसे अच्छा स्कूल कौन सा है ? क्या बंदर के यहां टाटा स्काई का कनेक्शन होता है? बंदर को पोगो पसंद है या फिर कार्टून नेटवर्क ?"

आज कहानी के नाम पर पंखुरी लंबा क्लास ले रही है। कहानी शुरु करुं इससे पहले उसने ढेर सारे सवाल दाग दिए।

आपको यहां एक चीज बताता चलूं कि पंखुरी के लिए न्यूज चैनल का मतलब ‘मोदी-सरकार’ होता है। कोई भी समाचार चैनल आप लगाएं वह उसे ‘मोदी-सरकार’ ही कहती है। वह तो बंदरोँ के देश में भी ‘मोदी-सरकार’ खोजने लगती है। दरअसल एक साल पहले जब मैं न्यूज चैनल ज्यादा देखता था तो वह गुस्सा हो जाती थी और कहती थी- पापा तुम केवल ‘मोदी-सरकार’ ही देखते हो..पोगो देखा करो..छोटा भीम देखो..मोदी सरकार से अच्छा है अपना छोटा भीम, छुटकी , कालिया, राजू और जग्गू बंदर....

आज पंखुरी की कहानी बंदरों के लाल देश लालपुर से शुरु होती है, जहां के राजा ‘लाल-बंदर’ के घर बड़ा स्क्रीन वाला टेलीविजन  बाजार से आता है। पंखुरी की कहानी का प्लॉट पंखुरी के अनुसार तय होता है इसलिए बंदर के टेलीविजन में टाटा स्काई लगाया जाता है।

पंखुरी बार बार कहती है कि बंदर के राजमहल में बड़ा टीवी रहना चाहिए और हां केबल कनेक्शन नहीं, टाटा स्काई रहना चाहिए जिसे आंधी तूफान या भूकंप से कोई दिक्कत न हो.. “ छोटकू और छोटकी बंदर” लगातार बिना किसी रुकावट के पोगो चैनल सर्फ करते रहे।

अब आप पूछिएगा कि “छोटकू और छोटकी बंदर” कौन है? तो साहेबान, कद्रदान ये दोनों लालपुर के राजकुमार व राजकुमारी है। इन दोनों को छोटा भीम सीरियल बहुत पसंद है। हरदम टीवी से चिपके रहते हैं वहीं इस बात से लालपुर की रानी दुखी रहती है क्योंकि उसे भी टीवी देखने का मन होता है। उसका मन स्टार प्लस के सीरियल पर अटका रहता है लेकिन छोटकू और छोटकी के सामने किसी की नहीं चलती है।

पंखुरी की कहानी लालपुर से अचनाक पिंक सिटी पहुंच जाती है। वो कहती है कि लालपुर में टीवी आ गया न..अब पापा चलो पिंक सिटी, वहां देखते हैं कि जग्गू बंदर क्या कर रहा है। वो स्कूल जाता है कि नहीं..जरा पता लगाओ कि उसके स्कूल में गर्मी की छुट्टी कब शुरु होगी..और हां, होमवर्क वो बनाता है कि नहीं ?

होमवर्क के नाम पर मेरी नजर पंखुरी के लाल बैग पर चली जाती है। ओहो! आज तो पंखुरी ने भी होमवर्क नहीं बनाया है। मैं जबतक यह कहता कि चलो होमवर्क बना लेते हैं तब तक तो बिटिया रानी सो चुकी होती है। अब फिर सुबह में बोर्नविटा के साथ होमवर्क का हो-हल्ला चलेगा :) मैं मन ही मन मुस्कुराता  हूं कि बेटी ने तो आज कहानी के नाम पर मुझे फंसा कर होमवर्क का बैंड बजा दिया।

बेटी की इन्हीं शरारतों से तो अपना घर गुलजार रहता है।  पंखुरी गहरी नींद में है और मैं सोच रहा हूं कि यह तीन साल की लड़की सपने में भी कहानी ही सुन रही होगी न..या फिर कहानी के नाम पर ढेर सारे सवालों का जखीरा तैयार कर रही होगी..अपने पापा-मम्मी के लिए..:)

Tuesday, May 19, 2015

किसानों के अन्न बैंक ‘बखारी’ की कहानी

girindra nath jhaमुझे याद है जब बचपन में धान की तैयारी होती थी तो घर के सामने महिलाएं एक गीत गाती थीं. ‘सब दुख भागल कि आइलअगहनमा, धनमा के लागल कटनिया, भर लो कोठारी, देहरियो, भरल बा, भरल बाटे बाबा बखरिया अबकी बखारी में भरी-भरी धनमा, छूटी जइहें बंधक गहनमा।” इस गीत में बखारी और धान के संबंध के बारे में विस्तार से बताया गया है। बखारी, जो किसानों का अन्न बैंक होता है लेकिन अब यह बैंक गायब होने के कगार पर है और ऐसे में इस तरह के गीत भी सुनने को नहीं मिलते हैं।

अन्नदाताओं की जिन्दगी को जब आप नजदीक से देखेंगे तो पाएंगे कि वे गाँव घर में ही दुनिया की सारी खूबियों को समाकर रखते आए हैं। ये कोई नई कहानी नहीं है बल्कि बरसों पुरानी है। उनका अपना एक अन्न बैंक होता है। गोदाम संस्कृति तो अब आई है लेकिन अन्न रखने की उनकी अपनी शैली है, जिसे कोसी इलाके में बखारी कहते हैं।
bkhari 

गाँव से जुड़ाव रखने वाले यह बात जानते होंगे कि किसानी कर रहे लोग सालभर के लिए अन्न जमाकर रखते हैं। जब गोदाम संस्कृति का आगमन गाँव में नहीं हुआ था तब बड़े-बड़े किसान तो अपने घरों के सामने कई बखारी बनाकर रखते थे, जहां गाँव के छोटे और सीमांत किसान अपना अन्न रखते थे। गाँव के आपसी समन्वय को इस छोटी सी बात से आप समझ सकते हैं।


”धान के पान, मोरो पिया खइहें पान।” इस कहावत का अर्थ यह है कि यदि धान का ही पान है तो, मेरे पिया भी खाएंगे पान। यानी धान कोई महंगी वस्तु नहीं। दुर्लभ भी नहीं। कहावत भी उस समय बनी होगी जब किसान के घरों में पैसा नहीं होता था। कहावत में धान को गरीब का साथी बताया गया है। धान से ही पान मिलेगा तोए मेरा पिया भी पान खाएगा। ऐसे में बखारी ही उस समय किसानों का बैंक हुआ करता था।अन्नदाताओं और उसके भंडारण का महत्व हमारे यहां कि इस कहावत से आप समझ सकते हैं।


बखारी या अन्नागार में अन्न को भंडारित किया जाता है। प्राचीन काल में मिट्टी के बर्तनों में अन्न भंडारित किया जाता था। कुछ किसान कच्ची मिट्टी और भूसे से अन्नागार बनाते थे जिसको ‘डेहरी’ कहा जाता था। इसे ‘अन्न की कोठी’ भी कहते हैं।

बांस और घास-फूस की मदद से बखारी बनाया जाता है। बखारी को मिट्टी से लेपकर उसे खूबसूरत बना देते हैं किसानी करने वाले लोग। कई बखारी में लोक कलाओं को शामिल किया जाता है। बखारी किसानों की लोक कला संस्कृति का बेजोड़ नमूना है। माटी से अन्न का जुड़ाव भंडारण की देसी पद्धति का सबसे नायाब उदाहरण है। उत्तर बिहार के ग्रामीण इलाकों में एक समय में आपको हर घर के सामने बखारी देखने को मिल जाता, लेकिन समय के साथ-साथ बखारी की संख्या कम होती चली गई। इसके पीछे कई कारण हैं। बखारी मतलब अनाज के लिए बना भंडारगृह, जहां धान-गेहूं रखे जाते हैं।


बखारी शब्द का प्रयोग ग्रामीण इलाकों में कई मुहावरों में किया जाता है। मसलन गे गोरी तोहर बखारी में कतै धान। (ओ, गोरी तेरे भंडार में है कितना धान) बखारी बांस और फूस के सहारे बनाया जाता है। यह गोलाकार होता है और इसके ऊपर फूस (घास) का छप्पर लगा रहता है। इसके चारों तरफ मिट्टी का लेप लगाया जाता है। (जैसे झोपड़ी बानई जाती है) बखारी का आधार धरती से लगभग पांच फुट ऊपर रहता है, ताकि चूहे इसमें प्रवेश नहीं कर पाएं।


उत्तर बिहार के ग्रामीण इलाकों में अभी भी बखारी आसानी से देखे जा सकते हैं। हर किसान के घर के सामने बखारी बना होता है। जिस किसान के घर के सामने जितना बखारी, मानो वही है गाँव का सबसे बड़ा किसान। कई के घर के सामने तो 10 से अधिक बखारी भी होते हैं, हालांकि स्टोर परम्परा के आने के बाद पुरानी बखारी परम्परा कमजोर हो गई है।


इन बखारियों से अन्न निकला भी अलग तरीके से जाता है। इसके ऊपर में जो छप्पर होता है, उसे बांस के सहारे उठाया जाता है और फिर सीढ़ी के सहारे लोग उसमें प्रवेश करते हैं और फिर अन्न निकालते हैं। एक बखारी में कितना अनाज है, इसका अंदाजा किसान को होता है।

हर एक का अलग साइज होता है। इसे मन (40 किलोग्राम-एक मन) के हिसाब से बनाया जाता है। बखारी की दुनिया ऐसी ही कई कहानियों से भरी पड़ी है।


कुछ किसान तो अपने आंगन में छोटी बखारी भी बनाकर रखते थे। इन बखारियों को खासकर महिलाओं के लिए बनाया जाता था। इसकी ऊंचाई कम हुआ करती थी, ताकि आसानी से महिलाएं अन्न निकाल सके। धान और गेहूं के लिए जहां इस तरह की बखारी बनाई जाती थी वहीं चावल के लिए कोठी बनाया जाता था।

कोठी पूरी तरह से माटी का होता था। इसे महिलाएं और पुरुष कारीगर खूब मेहनत से बनाते थे। धीरे-धीरे गाँव घर से यह सारी चीजें गायब होती जा रही हैं। ग्राम्य संस्कृति इन चीजों के बिना हमें अधूरी लगती है।

Friday, May 08, 2015

जब शहर हमारा सोता है...

हल्की हल्की हवा चल रही है। आसमान में बादलों के संग तारे टिमटिमा रहे हैं। टेबल पर खालिद हुसैनी की किताब द काइट रनर है लेकिन मन अचानक चनका-पूर्णिया से दिल्ली पहुँच गया है। हवा के झोंके की तरह मन दिल्ली की गलियों में गोता खाने लगा।

मुखर्जी नगर और गांधी विहार से मन के तार अचानक जुड़ गए हैं। बत्रा सिनेमा से कुछ कदम आगे आईसीआईसीआई बैंक का एटीएम और उसके सामने मैंगो-बनाना सैक वाले सरदार जी का स्टॉल याद आ रहा है, पता नहीं ये दोनों अब वहां हैं या नहीं और हैं तो किस रूप में।

रोशनी में डूबे मुखर्जीनगर में हम शाम ढलते ही एक घंटे के लिए आते थे। इधर –उधर कभी कभार घुमते थे। दरअसल हम आते थे गर्मी में सरदार जी के स्टाल पर जूस पीने और उसके सामने चारपाई पर बिछी पत्र पत्रिकाओं में कुछ देर के लिए खोने के लिए।

 20 रुपये में एक ग्लास जूस पीते थे और फिर मुफ्त में हफ्ते की हर पत्रिका पर नजर घुमा लेते। उस वक्त नौकरी नहीं थी, पढ़ने के लिए पैसे मिलते थे। इसलिए खर्च को लेकर बेहद सतर्क रहना पड़ता था। कथादेश पत्रिका से मेरा पहला इनकाउंटर उसी चारपाई वाले बुक स्टॉल पर हुआ था।

आज पता नहीं एक साथ इतना कुछ क्यों याद आ रहा है ? सचमुच मन बड़ा चंचल होता है। मुखर्जीनगर का वो चावला रेस्तरां याद आ  रहा है जहां बिहार के होस्टल वाली जिंदगी से निकलने के बाद पहली दफे चाइनीज व्यंजनों का मजा उठाया था। उस वक्त लगा कि यह रेस्तरां नहीं बल्कि पांच सितारा होटल है। हम पहली बार किसी रेस्तरां में खाए थे।

चावला रेस्तरां के बगल से एक गली आगे निकलती थी। कहते थे कि इस गली में इंडियन सिविल सर्विसेज का कारखाना है, मतलब कोंचिग सेंटर । उस गली में खूब पढ़ने वाले लोगों का आना जाना हमेशा लगा रहता था।  ऐसे लोगों को हम सब 'बाबा' कहते थे उस वक्त। पता नहीं अब क्या कहा जाता है :)

मैं इस वक्त खुद को 2002 यानि की 13 साल पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया है। फेसबुक का वह काल नहीं था..वो तो बस मौखिक काल था..हम आमने सामने बैठकर चैट करते थे तब :)

मैं याद करता हूं तो स्मृति में  मुखर्जी नगर और गांधी विहार के बीच एक पुलिया आ जाती है। बदबूदार पुलिया। लेकिन उस बदबू में भी अपना मन रम जाता था। पूरे दिल्ली में उस वक्त केवल मेरे लिए, एक वही जगह थी जहां पहुंचकर मैं सहज महसूस करता था।

दरअसल उस पुलिया पर मुझे गाम के कोसी प्रोजेक्ट नहर का आभास होता था। भीतर का गाँव वहां एक झटके में बाहर निकल पड़ता और मैं मन ही मन खुश हो जाता था।

इस वक्त मुझे 81 नंबर की बस याद आ रही है, फटफट आवाज करते शेयर वाले ऑटो, रंगीन रिक्शे...ये सब आँखों के सामने तैर रहे हैं इस वक्त। मैं अब इंदिरा विहार की तरफ पहुँच जाता हूँ वहां एक बस स्टॉप था, जिसका नाम था- मुखर्जी नगर मोड़। मैं उस मोड़ पर 912 नंबर की बस का इंतजार करता था, सत्यवती कालेज जाने के लिए।

बसों के नंबर से उस वक्त हम दिल्ली को जीते थे। तब मेट्रो नहीं आया था। धुआं उड़ाती बसों का आशियाना था दिल्ली। मेरा वैसे तो अंक गणित कमजोर रहा है लेकिन बस के अंकों में कभी हम मात नहीं खाए :)

कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मुखर्जी नगर के आसपास का इलाका हमारा गांव हो गया था, जिसके मोहल्ले, गलियां, पार्क .. ये सब मेरे लिए गाम के टोले की तरह हो चले थे। सब जगह अपने इलाके के लोग मिल जाते। इसलिए उस शहर ने कभी भी मेरे भीतर के गांव को दबाने की कोशिश नहीं की क्योंकि हम बाहर-बाहर शहर जीते थे और भीतर-भीतर गांव को बनाए रखने की पूरी कोशिश करते हुए अंचल की सांस्कृतिक स्मृति को मन की पोथी में संजोते हुए शहर को जी रहे थे...

Tuesday, May 05, 2015

जिला पुरैणिया की कहानी-कुछ किंवदंतिया, कुछ इतिहास

मूलत: मधुबनी से ताल्लुक रखनेवाले सुशांत झा युवा पत्रकार, अनुवादक और राजनीतिक विश्लेषक हैं। उन्होंने रामचंद्र गुहा की पुस्तकों ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ और ‘गांधी बिफोर इंडिया’ का पेग्विन के लिए अनुवाद किया है। साथ ही उन्होंने पेट्रिक फ्रेंच की किताब ‘इंडिया ए पोर्ट्रेट’ का भी अनुवाद किया है। दूरदर्शन और इंडिया न्यूज में कार्य, एसपी सिंह युवा पत्रकारिता सम्मान-2014 से सम्मानित और सोशल मीडिया में सक्रिय सुशांत ने आईआईएमसी, नई दिल्ली से पत्रकारिता की पढाई है। पूर्णियां पर उनका यह आलेख पढ़ा जाए। 
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आधुनिक पूर्णिया जिला भारत के सबसे पुराने जिलों में से एक है और इसकी स्थापना 14 फरवरी 1770 को हुई थी। ये वो जमाना था जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने पलासी(1757) और बक्सर(1764) की लड़ाई में बंगाल के नवाब, मुगल बादशाह और अवध के नवाब को पराजित कर दिया था और  मुगल सम्राट से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी अपने नाम करा ली थी।

पुराने पूर्णिया जिले में आज के पूर्णिया, अररिया, कटिहार और किशनगंज जिले तो थे ही, साथ ही बंगाल में दार्जिलिंग तक का इलाका था। पूर्णिया जिले की स्थापना कब और किस प्रक्रिया से हुई इसे खोजने का श्रेय पूर्णिया के ही प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ(प्रो) रामेश्वर प्रसाद को जाता है जिन्होंने कई सालो के अथक मेहनत के बाद उसकी सही तारीख और उस जमाने की इमारतों के स्थल तक खोज निकाले। यह लेख मुख्यत: डॉ प्रसाद से हुई बातचीत के पर ही आधारित है।

पूर्णिया का नाम पूर्णिया कैसे पड़ा इसके पीछे कई तरह की किंवदंतियां हैं लेकिन वैज्ञानिक प्रमाण किसी का उपलब्ध नहीं है। मुगल बादशाह अकबर के समय भारत में जो पहला आधुनिक सर्वे टोडरमल के द्वारा हुआ था(संभवत: 1601) उसमें पुरैनिया शब्द का जिक्र है। यानी पुरैनिया का नामकरण आज से करीब 400 साल पहले  हो चुका था।

 कुछ लोग इसे पूरण देवी मंदिर से जोड़कर देखते हैं जिसके पीछे संत हठीनाथ और संत नखीनाथ की कहानी है। लेकिन संत हठीनाथ का काल बहुत पुराना नहीं है। वो समय आज से करीब 250 साल पहले का है-लेकिन टोडरमल का सर्वे 400 साल पुराना है-जिसमें पूर्णिया का जिक्र आ चुका है। लेकिन जनमानस में पूरण देवी मंदिर की जो श्रद्धा है उसे देखते हुए कई लोग ऐसी बात जरूर करते हैं।

एक मान्यता यह भी है कि पूर्णिया के इलाके में कभी घनघोर जंगल था, जिस वजह से लोग इसे पूर्ण अरण्य कहते थे। ऐसा संभव है क्योंकि पूर्णिया की अधिकांश बसावट नयी है और आबादी बहुत पुरानी नही है। यहां के जलवायु की वजह से यहां की आबादी ज्यादा नहीं थी और स्वभाविक है कि यहां घना जंगल था। पूर्ण अरण्य यानी पूरा जंगल होने की वजह से लोग इसे पूर्णिया कहने लगें हो तो कोई आश्चर्य नहीं। लेकिन इस बात का भी कोई लिखित दस्तावेज नहीं है।

एक तर्क यह है कि यह इलाका पहले काफी दलदली था और यहां नालों, धारों और जलाशयों में काफी ‘पुरनी’ के पत्ते होते थे। पुरनी का पत्ता तालाब या नदी में खिलनेवाले कमल के पत्ते होते हैं-जिसका इस्तेमाल पारंपरिक भोजों में खाने के लिए किया जाता था। भारी तादाद में पूरनी के पत्ता के उत्पादन होने की वजह से हो सकता है कि लोग इस इलाके को पुरैनिया कहने लगें हो-जो बाद में अपभ्रंश होकर पूर्णिया बन गया।

जहां तक पूरण देवी के मंदिर का सवाल है सन् 1809 में पूर्णिया के बारे में हेमिल्टन बुकानन ने एक रिपोर्ट लिखी थी- एन अकांउट ऑफ द डिस्ट्रिक्ट ऑफ पूर्णिया। इसमें इलाके का काफी बारीक विवरण है। लेकिन उस रिपोर्ट में पूरण देवी मंदिर का जिक्र नहीं है, हां उस रिपोर्ट में हरदा के कामाख्या मंदिर का जिक्र जरूर है! यानी ऐसा संभव है कि पूरण देवी मंदिर का निर्माण उस समय तक न हुआ हो!

खैर, उस जमाने के पुरैनिया(जो बाद में पूर्णिया बना-अंग्रेजी में तो कई-कई बार स्पेलिंग बदल गया!) पहला अंग्रेज सुपरवाइजर-कलक्टर बहाल हुआ 14 फरवरी 1770 को और उसी दिन को आधुनिक पूर्णिया जिले का स्थापना दिवस माना जाता है। उस कलक्टर का नाम था-गेरार्ड डुकेरेल। डुकेरल साहब जब कलक्टर बनकर यहां आए तो इलाके में घने जंगल थे, आबादी कम थी और बसने लायक इलाका नहीं था। इतने बड़े इलाके में(आज के तीनों जिले और बंगाल का इलाका मिलाकर) बहुत कम आबादी थी-महज 4 लाख के करीब।

उसी समय बंगाल में भयानक अकाल पड़ा था जिसमें बंगाल की एक तिहाई आबादी काल के गाल में समा गई थी। यह बात इतिहास में दर्ज है। पूर्णिया की आबादी के 4 लाख में से 2 लाख लोग मर गए। लोगों ने अपनी जान बचाने के लिए अपनी जमीन, अपने जानवर यहां तक की अपने बाल-बच्चों-औरतों तक को बेच डाला था। उस समय डुकरैल को यहां का कलक्टर बनाया गया था। स्थिति वाकई गंभीर थी। नए कलक्टर को आबादी बसानी थी, व्यवस्था कायम करनी थी और हजारों-लाखों लाशों की आखिरी व्यवस्था करनी थी। डुकरैल ने वो सब काम पूरी मुस्तैदी से किया और प्रशासनिक ढ़ाचा खड़ा किया।

लेकिन डुकरैल का नाम इतिहास के पन्नों में कहीं खो गया। डुकरैल को उसके अच्छे कामों के लिए बहुत याद नहीं किया गया-जिसका वो हकदार था। दरअसल, डुकरैल से जुड़ी हुई एक कहानी है जो बहुत कम लोगों को पता है। डुकरैल जब पूर्णिया का कलक्टर बनकर आया तो उसे पता चला कि किसी नजदीक के गांव में एक स्त्री विधवा हो गई है और लोग उसे सती बनाने जा रहे हैं।

 इतना सुनते ही डुकरैल सिपाहियों के साथ घोड़े पर सवार हुआ और उसने उस विधवा की जान बचाई। इतना ही नहीं, डुकरैल ने उस विधवा से विवाह कर लिया और सेवानिवृत्ति के बाद उसे अपने साथ लंदन ले गया। उस महिला से डुकरैल के कई बाल-बच्चे हुए। कई सालों के बाद अबू तालिब नामका एक यात्री जब लंदन गया तो उसने बुजुर्ग हो चुके डुकरैल और उसकी पत्नी के बारे में विस्तार से अपने वृत्तांत में लिखा।

 ये घटना उस समय की है जब भारत में सती प्रथा पर रोक लगाने संबंधी कानून नहीं बना था। वो कानून उसके बहुत बाद सन् 1830 में में राजा राम मोहन राय और लॉर्ड विलियम बेंटिक के जमाने में बना-जबकि डुकरैल की कहानी 1770 की है। यानी सती प्रथा कानून से करीब 60 साल पहले की। लेकिन डुकरैल को कोई किसी ने सती प्रथा के समय याद नहीं किया, न ही उसे बाद में वो जगह मिली जिसे पाने का वो सही में हकदार था।

 *डॉ रामेश्वर प्रसाद ने बिहार सरकार और पूर्णिया के कलक्टर से ये आग्रह भी किया कि कम से कम पूर्णिया में एक सड़क का नाम या पुराने कलक्ट्रिएट से लेकर मौजूदा कलेक्ट्रिएट तक की सड़क का नाम ही डुकरैल के नाम पर रख दिया जाए-लेकिन अपने अतीत से कटी हुई, अनभिज्ञ और बेपरवाह सरकार ने इस मांग पर कोई ध्यान नहीं दिया।

कल्पना कीजिए, अगर किसी दूसरे मुल्क में ऐसा कोई सुधारक हुआ होता तो वहां के लोगों ने क्या किया होता! लेकिन ये भारत है जिसे अपने अतीत पर कोई गौरव नहीं, न ही उसे सहेजने की उसे चिंता है।
डुकरैल के नाम पर अररिया(तत्कालीन पूर्णिया जिला) में आज भी एक गांव है! इसे लोग स्थानीय भाषा में डकरैल भी कहते हैं जो मूल नाम का अपभ्रंश है।

पूर्णिया के भूगोल पर कोसी का भी असर रहा है। एक जमाना था जब कोसी इस इलाके से बहती थी, कभी बहुत सुदूर अतीत में कोसी के ब्रह्मपुत्र में भी मिलती थी। लेकिन ये आज पश्चिम की तरफ खिसककर सुपौल से होकर बहती है और बाद में नीचे गंगा में मिल जाती है। पूर्णिया के इलाके से कोसी कोई डेढ सौ साल पहले बहती थी और जगह-जगह इसके अवशेष नदी की छारन के रूप में अभी भी दिख जाएंगे-जब आप पूर्णिया से पश्चिम की तरफ बढ़ेंगे। लेकिन कोसी एक दिन में खिसककर यहां से सुपौल की तरफ नहीं गई। उसमें सैकड़ों साल लगे और लोगों ने अपने आपको उसकी धारा के हिसाब से ढ़ाल लिया। लोग नदियों के साथ जीना जानते थे, इसीलिए कोसी को लेकर किसी के मन में कभी दुर्भाव नहीं पनपा। कोसी हमेशा उनके लिए मैया ही बनी रही-जो लोकगीतों, आख्यानों और किंवदंतियों में दर्ज है।

पूर्णिया की आबादी अभी भी कम है . पहले और भी कम थी। लेकिन इतनी कम आबादी होने की आखिर क्या वजह थी?  इसका जवाब पूर्णिया के जलवायू और कुछ प्राकृतिक परिवर्तनों में छुपा है।

हम पहले  ही लिख चुके हैं कि पूर्णिया में घने जंगल थे और इसकी वजह आबादी का लगभग न होना था। मिथिला और बिहार के अन्य इलाकों में पूर्णिया को कालापानी कहा जाता था-यानी मौत का घर। कुछ लोकोक्तियां इस बात का सबूत है जो हजारों सालों में आमलोगों ने अपने अनुभवों के आधार पर गढे हैं। एक लोकोक्ति है-‘जहर खो, ने माहुर खो, मरै के हौ त पुरैनिया जो’। यानी अगर मरना है तो जहर-माहुर नहीं खाओ...पूर्णिया चले जाओ!

आज से करीब 100 साल पहले तक पूर्णिया का पानी पीने लायक नहीं था और उससे तरह-तरह की बीमारियां हो जाती थी। पूरा इलाका जंगली और दलदली था। ऐसे में आबादी कैसे रहती? लेकिन सन् 1899 और 1934 के बड़े भूकंप ने कुछ ऐसी भूगर्भीय हलचलें की कि यहां के पानी में बदलाव आया और इलाका थोड़ा रहने लायक हो गया। उस समय तक आसपास के जिलों में आबादी का बोझ बढ़ने लगा था और जमीन पर दबाव भी बढ़ गया था। लोग नए इलाके की खोज में पूर्णिया आने लगे। यहीं वो समय था जब बड़े पैमाने पर केंद्रीय मिथिला, बंगाल और मगध के इलाके के लोगों ने यहां प्रवेश किया और ब़ड़ी-बड़ी जमींदारियां कायम की। इसलिए कहा जा सकता है कि पूर्णिया की बसावट अपेक्षाकृत नयी है और यहां का हरेक आदमी कुछ पीढ़ियों में आया हुआ प्रवासी है। पूर्णिया में आज अपेक्षाकृत कम आबादी, खुला-खुला इलाका और हरियाली जो दिखती है उसका कारण यहीं है।  

पूराने पुर्णिया में करीब 28 बड़ी जमींदारियां थीं जिसमें सबसे बड़ी जमींदारी गढबनैली(बनैली राज) का था जिसके बाद में करीब पांच टुकड़े हुए और जिसका बिहार और बंगाल में शिक्षा, कला आदि क्षेत्रों में काफी योगदान रहा। एक जमींदारी रवींद्रनाथ टैगोर की भी थी, जिसे टैगोर इस्टेट कहा जाता था।  अररिया का ठाकुरगंज इलाका उन्हीं  जमींदारी थी, जो उन्हीं के परिवार के नाम पर पड़ी थी। फनीश्वरनाथ रेणु की पुस्तकों में जिन जमींदारियों का जिक्र है, वे सब अपने मूल रूप में उस जमाने में थीं।
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यह आलेख हमारा पूर्णिया साप्ताहिक और इंडिया अनलिमिटेड पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है।

*(डॉ(प्रो) रामेश्वर प्रसाद ने ऑक्सफोर्ड, भागलपुर और बीन एन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा में अध्यापन किया है। पूर्णिया पर शोध को लेकर देश विदेश में चर्चित। बिहार के स्वतंत्रता सेनानियों के ऊपर डिक्शनरी ऑफ नेशनल बायोग्राफी का लेखन। कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल मैन ऑफ द ईयर पुरस्कार से सम्मानित। संप्रति पूर्णिया में ही रहते हैं)