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Monday, April 10, 2017

चम्पारण सत्याग्रह के सौ साल की ख़बरों के बीच...

पूर्णिया में एक मोहल्ला है -श्रीनगर हाता। कलक्टर साहेब और अन्य आला अधिकारियों का आवास इसी मोहल्ले में है, इसलिए इलाक़ा सबसे साफ़ है। आज सुबह सुबह यहाँ दो ट्रक दिखे, जिसमें गांधी जी की बड़ी-बड़ी तस्वीर लगी थी। ट्रक को रथ का लुक दिया गया है। गांधी जी के चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी वर्ष के अवसर पर बिहार सरकार ने उनके संदेश, विचारों एवं जीवन पर बने फ़िल्म को आम लोगों के बीच पहुँचाने की योजना बनाई है। रथनुमा ट्रक के पास ही एक युवक से मुलाक़ात होती है। बातचीत के दौरान उसने बताया ' सब गांधी-गांधी हो गया है भैया। बिहार सेलिब्रेशन के मूड में है। अपना बिहार अब इवेंट स्टेट बन गया है।"

बिहार से बाहर पढ़ाई कर रहे इस युवा की बात मैं सुनता रहा। घर लौटकर जब अख़बार देखा तो गांधी जी से सम्बंधित लेख से समाचार पत्र भरे थे। यह सब पढ़ते हुए जिस दूसरी ख़बर पर नज़र टिकी वह थी- 'श्रीनगर में ख़ूनी मतदान फ़ायरिंग में छह की मौत '। 

चम्पारण सत्याग्रह के सौ साल की ख़बरों , समारोह की सूचनाओं के बीच हम सब किस मोड़ पर खड़े हैं, इस पर विचार किया जाना चाहिए। गांधी जी को याद हम सब साल में दो बार तो ज़रूर ही करते हैं लेकिन उनके बताए रास्ते पर क्या हम चल रहे हैं ? 


पूर्णिया में गांधी जी के नाम पर दो मुख्य आश्रम हैं, एक टिकापट्टी में और दूसरा रानीपतरा में। दोनों ही आश्रम अब बस नाम के हैं। सबकुछ टूट चुका है । पता नहीं सत्याग्रह के सौ साल के नाम पर इन आश्रमों की साफ़-सफ़ाई हुई या नहीं। हमारे प्रिय मित्र सुशांत झा एक बार पूर्णिया आये थे तो उनके संग टिकापट्टी गया था लेकिन वहाँ गांधी जी के बारे में  बताने वाला कोई नहीं मिला। सुशांत भाई ने रामचंद्र गुहा की किताबों का अनुवाद किया है. गांधी जी के शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफ़र पर गुहा ने 'गांधी भारत से पहले' किताब लिखी है और उनकी दूसरी किताब जिसने मुझे गांधी जी के क़रीब पहुंचाने का काम किया वह है - 'भारत गांधी के बाद.'

गांधी जी की बातें अभी हम सभी कर रहे हैं लेकिन इसकी भी वेलेडीटी पीरियड होगी, कार्यक्रम ख़त्म तो बातें भी ख़त्म। लेकिन क्या यह उचित है? याद करिए प्रकाश उत्सव  के बाद भी क्या पटना उतना ही चमक रहा है, जैसा इवेंट के दौरान जगमग कर रहा था? इस पर बहस होनी चाहिए। 

हमारे ज़िले में बुनियादी विद्यालयों की स्थिति पर कोई नहीं बात कर रहा है। मेरी बुआ 1960 से 1962 तक पूर्णिया ज़िला के श्रीनगर इलाक़े में स्थित एक बुनियादी विद्यालय में पढ़ती थीं। उनकी उम्र अभी 70 साल है। उन्होंने बताया कि उस वक़्त विद्यालय आश्रम की तरह था। सूत काटना उन्होंने वहीं सीखा। बुआ को जब उनके विद्यालय ले गया तो वह फफक फफक कर रोने लगी। बिखर गया था उनका स्कूल। बुनयादी विद्यालय के समीप ही एक विशाल भवन बनकर तैयार था, जिसे मॉडल स्कूल कहा जा रहा है, करोड़ों की लागत वाला। लेकिन गांधी विचार वाला विद्यालय कहीं खो गया है। कहते हैं कि बिहार  के मुख्यमंत्री की प्रमुख योजनाओं में एक यह विशाल-भव्य कंकरीट वाला स्कूल भी है। 

सत्याग्रह सौ साल के नाम पर गांधी जी की बातें हम सभी अलग अलग ढंग से कर रहे हैं। हमें उनकी सादगी पर भी बात करनी चाहिए। इवेंट्स मैनेजमेंट के इस दौर में सरकार को उनकी सादगी का नक़ल ही सही लेकिन करना चाहिए। गांधीजी की सादगी हमें खींचती है। कोई आदमी इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रख सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। अब तो एक छोटे से कार्यक्रम के लिए भी हम मोटा बजट बनाने बैठ जाते हैं । वहीं महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी. यह उनकी आत्मा से उपजी थी, जब उन्होंने देखा था कि ब्रिटिश हुकूमत में भारत का आम आदमी भूखा और नंगा बना दिया गया है. उन्होंने अपना कपड़ा खुद बुना और खुद धोया और जब वे वायसराय लॉर्ड इरविन से मिले तब भी अपनी चिर-परिचत वेशभूषा में थे जिसे देखकर चर्चिल ने घृणा से उन्हें 'अधनंगा फकीर' कहा था। 

हमने शुरुआत में जिस रथनुमा ट्रक की बात कही है उसके बारे में अख़बार से पता चला कि इसे ग्रामीण क्षेत्रों के पंचायतों में भी घुमाया जाएगा। गांधी जी ने कहा था – “अगर हिंदुस्‍तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्‍वीर की सच्‍चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी.” इस बारे में उनके विचार बहुत स्‍पष्‍ट थे. उनका मानना था कि जब पंचायती राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती। लेकिन पंचायत व्यवस्था की हक़ीक़त क्या है, यह बताने की ज़रूरत नहीं है।  ज़मीन पर गांधी जी का ग्राम स्वराज भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है. दुःख होता है, जब उनके ही नाम से शुरू हुई एक योजना में सबसे अधिक लूट हो रही है, जिसका नाम 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना' है. इस योजना में ग़रीबों के नाम पर जो लूटपाट होती है, उसे देखकर मुझे गांधी जी की मौत पर जॉर्ज बर्नाड शॉ की आई टिप्पणी को ज़ोर-ज़ोर से पढ़ने का मन करता है. शॉ ने कहा था- "गांधी की हत्या बताती है कि अच्छा होना कितना ख़तरनाक होता है..."

Wednesday, November 25, 2015

पुरानी कहानी, नया पाठ


चनका गांव के एक तालाब की तस्वीर।
बोली-बानी सब बदल जाती है, बस रह जाती है तो केवल यादें। गांव को नदी बांट देती है, गांव को नहरें बांट देती है. इन सब में जो सबसे कॉमन है वह है पानी। हमारी यादों को दो छोर पे रखने में इस पानी का सबसे अहम रोल है। कोसी के कछार में आकर हम बसते हैं, एक बस्ती बनाते हैं।

उस बस्ती से दूर जहां हमारे अपने लोग बसे हैं
, जहां संस्कार नामक एक बरगद का पेड़ खड़ा है और जहां बसे वहां बांस का झुरमुट हमारे लिए आशियाना तैयार करने में जुटा था। मधुबनी से पूर्णिया की यात्रा में दो छोर हमारे लिए पानी ही है। उस पार से इस पार। कालापानी। कुछ लोग इसे पश्चिम भी कहते हैं। बूढ़े-बुजुर्ग कहते हैं- जहर ने खाउ माहुर ने खाउ, मरबाक होए तो पूर्णिया आऊ (न जहर खाइए, न माहुर खाइए, मरना है तो पूर्णिया आइए)। और हम मरने के लिए नहीं बल्कि जीने के लिए इस पार आ गए।

विशाल परती जमीन
, जिसे हॉलीवुड फिल्मों में नो मेन्स लैंड कहा जा सकता है, हमारे हिस्से आ गई। शहर मधुबनी से शहर-ए-सदर पूर्णिया अड्डा बन गया। मधुबनी जिले के तत्सम मैथिली से पूर्णिया के अप्रभंश मैथिली की दुनिया में हम कदम रखते हैं। हमारी बोली-बानी पे दूसरे शहर का छाप साफ दिखने लगा। सूप, कुदाल खुड़पी सबके अर्थ, उच्चारण, हमारे लिए बदल गए, लेकिन हम नहीं बदले, जुड़ाव बढ़ता ही चला गया, संबंध प्रगाढ़ होते चले गए।

कोसी एक कारक बन गई, पूर्णिया और मधुबनी के बीच। दो शहर कैसे अलग हैं, इसकी बानगी बाटा चौक और भट्टा बाजार है। एक भाषा यदि मधुबनी को जोड़ती है तो वहीं विषयांतर बोलियां पूर्णिया को काटती है, लेकिन एक जगह आकर दोनों शहर एक हो जाता है, वह है सदर पूर्णिया का मधुबनी मोहल्ला। कहा जाता है कि उस पार से आए लोगों ने इस मोह्ल्ले को बसाया। यहीं मैथिल टोल भी बस गया। मधुबनी मोहल्ला घुमने पर आपको बड़ी संख्या में ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनका ऑरिजन मधुबनी जिला है।

धीरे-धीरे यहां प्रवासी अहसास भी मैथिल भाषियों को होने लगा, बंगाल से सटे रहने की वजह से बांग्ला महक फैलती ही चली गई। आप उस पार के हैं, यह पूर्णिया में भी मधुबनी से आए लोगों को सुनने को मिलता है। उस पार से आए किसान यहां जमींदार बन गए, निजाम बन गए तो कुछ, कई की आंख की किरकरी (चोखेर बाली) बन गए।

शहर पूर्णिया और शहर मधुबनी में जो अंतर सपाट तरीके से दिखता है वह लोगबाग। कामकाजी समाज आपको मधुबनी मिलेगा लेकिन पूर्णिया में यह अनुभव कुछ ही मोहल्लों में मिलेगा। यह शहर शुरुआत में बड़े किसानों का आउट हाउस था। वे यहां कचहरी के काम से आते थे और कुछ वक्त गुजारा करते थे। उस पढ़ाई के लिए लोग मधुबनी-दरभंगा के कॉलेजों पर ही आश्रित थे। शिक्षा के मामले में मधुबनी-दरभंगा बेल्ट ही मजबूत था बनिस्पत पूर्णिया अंचल।

अब हम धीरे-धीरे शहर से गांव की ओर मुड़ते हैं। इशाहपुर (मधुबनी जिला का गांव) से खिसकते हुए एक अति पिछड़े गांव चनका (पूर्णिया जिला का गांव) पहुंच जाते हैं। धोती से लुंगी में आ जाते हैं। पोखर से धार (कोसी से फुटकर कई नदियां पूर्णिया जिले के गावों में बहती है, जिसमें जूट की खेती होती है) बन जाते हैं। माछ से सिल्ली (पानी में रहने वाली चिडियां, जिसे कोसी के इलाके में लोग बड़े चाव से खाते हैं) के भक्षक बन जाते हैं। मैथिली गोसाइन गीत से भगैत बांचने लगते हैं। धर्म-संस्कार का असर कम होने लगता है तो कुछ लोग डर से इसके (धर्म) और गुलाम बनते चले जाते हैं। 

(जारी है, मधुबनी से पूर्णिया, इशाहपुर से चनका का सफर)

Monday, November 02, 2015

मोदी के बहाने चुनावी बकैती

वायुसेना के तीन हेलिकॉप्टर आज जब पूर्णिया के आसमान में नमूदार हुआ, तो भीड़ मोदी-मोदी करने लगी, जिसे देखकर भाजपा के नेताओं के चेहरे खिल उठे, कमल की तरह। नरेंद्र मोदी की पूर्णिया-रैली से भाजपा नेताओं की बांछें खिली हुई हैं। मोदी की बड़ी-बड़ी बातें वोटरों का दिल जीतने में कितना कारगर साबित हो पाती हैं, इसका जवाब तो आने वाले दिनों में ही मिल सकेगा लेकिन इतना तो तय है कि सीमांचल में प्रधानमंत्री की यह रैली सफल रही।
कल तक कहा जा रहा था कि प्रधानमंत्री यहां अपने भाषण में कोई ‘कार्ड’ खेलेंगे लेकिन ऐसा उन्होंने कुछ नहीं किया। हालांकि सिख दंगे की बात उन्होंने की। वैसे इसका असर बिहार चुनाव पर पड़ने वाला नहीं है।

पूर्णिया में एक मैदान है - रंगभूमि। इसका नाम ही रंगीन है। ऐसे में रंगीन लोगों की भीड़ लाजमी है। इस बड़े मैदान को भाजपा के रंग में रंग दिया गया था। कहीं कहीं से जय श्री राम का नारा भी कान तक पहुंचा. प्रधानमंत्री के पहुंचने से पहले अनंत कुमार और यहां के पूर्व सासंद उदय सिंह मंच से भीड़ को निहारते दिखे। भीड़ निहारने लायक भी थी।

रंगभूमि मैदान की क्षमता ज्यादा से ज्यादा 1.5 लाख होगी। बीजेपी वाले आज दो लाख का दावा कर रहे थे। लेकिन लाख लोगों की भीड़ तो जरुर पहुंची थी।

कल तक यह खबर थी कि मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने के लिए भाजपा यहां कोई ‘कार्ड’ खेलेगी। लेकिन मोदी का भाषण सयंमित रहा। उन्होंने विकास आदि की बातें की। पूर्णिया में उद्योग धंधे, एयरपोर्ट आदि की बातें की।

मोदी ने कांग्रेस को नीतीश-लालू के बहाने घेरा। उन्होंने कहा, 'एक बात के लिए मुझे लालू और नीतीश जी का धन्यवाद करना है, क्योंकि उन्होंने इस चुनाव में हमें 40 सीटें बिना चुनौती के हमें दे दी। उनका इशारा महागठबंधन की ओर से कांग्रेस को दी गई 40 सीटों की तरफ था।

गौरतलब है कि पूर्णिया में भाजपा की सीधी टक्कर कांग्रेस से है। भाजपा ने विजय खेमका को टिकट दिय़ा है जबकि कांग्रेस की प्रत्याशी इंदू सिन्हा हैं। मोदी बार-बार नीतीश कुमार को नीतीश बाबू संबोधित कर रहे थे।

मोदी की रैली शुरु होने से पहले आसमान में एक हेलीकाप्टर दिखा, पता चला कि पास में ही नीतीश कुमार की रैली है और वे जा रहे हैं। आज पूर्णिया के अमौर में राहुल गांधी की भी रैली थी। भवानीपुर से आए सुमन ने बताया कि हेलीकाप्टर से नीतीश कुमार भीड़ जरुर देखे होंगे। भीड़ देखकर उनके पांव जरुर फूले होंगे। वैसे रैली में लोगों की प्रतिक्रियाएं बड़ी मजेदार होती है।

चुनाव के वक्त रैलियों को देखकर लगता है कि पैसे का कितना बड़ा खेल होता है। लोकसभा चुनाव के वक्त भी यहां मोदी की बड़ी रैली हुई थी। उस रैली में पूरा प्रदेश भाजपा अपने नेता के स्वागत में उपस्थित था। पटना से भी बीजेपी के नेता सब आए थे।

इस बार पत्रकारों की भी अच्छी खासी भीड़ थी। डीपीआरओ ने 90 स्थानीय पत्रकारों को पास दिया था। इसके अलावा बाहर से पत्रकार आए थे। मतलब 200 के करीब पत्रकारों का जमावड़ा था।

पूर्णिया के जितने होटल हैं, वे लगभग सबके सब बुक हैं। रैली खत्म होने के बाद हमने भीड़ को चैनलों के औवी वैन के पास देखा। लोगबाग वहां फोटो ले रहे थे। मीडिया के प्रति लोगों का अनुराग देखने लायक होता है। कसबा से आए शशांक ने बताया कि चैनलों ने हमें मीडिया फ्रैंडली बना दिया है।

रैली में आदिवासी महिलाओं – पुरुषों की काफी तादाद दिखी। पूर्णिया में उनकी संख्या ठीक-ठाक है। सुनीता हेब्रम ने कहा कि वो मोदी को देखने आई है। मोदी को सुनना उसे अच्छा लगता है।

वैसे मोदी ने जब अपना भाषण शुरु किया था तब उनका माइक खराब हो गया था, हालांकि तीन मिनट के बाद सब सामान्य हो गया। मोदी थके भी दिखे। वैसे हवा में उड़ते-उड़ते लोग थक भी जाते हैं। बाद बांकी जो है सो तो हइए है।

Friday, October 30, 2015

नीतीश की सभा के बहाने चुनावी बकैती

आज हम सुबह जब पूर्णिया से निकले तो यह सोच रखे थे कि सीमांचल के उन इलाकों की यात्रा करेंगे जहां पहले जूट और गन्ना की खेती बड़े स्तर पर होती थी लेकिन अब वहां आलू,मक्का और अन्य फसलों की खेती होने लगी है इसके बावजूद किसान परेशान हैं।

यही सोचकर हम धमदाहा,  बनमनखी, मधुबन, मुरलीगंज, मधेपुरा और सिंहेश्वर की ओर निकल पड़े। दरअसल आलू की खेती की तैयारी के बाद आपका किसान इन दिनों चुनावी बकैती कर रहा है। नेताओं की बात कम , लोगों की बातें अधिक सुनता हूँ।

आज सिंहेश्वर में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सभा भी थी। सुनता आया हूँ कि  उनकी रैली नहीं होती है , नीतीश कुमार दरअसल अपनी चुनावी कार्यक्रमों को सभा कहते हैं। हालांकि सभा में पीले रंग की टी शर्ट पहने युवाओं की टोली दिखी। ऐसी ही टोली लोकसभा चुनाव के वक्त नरेंद्र मोदी की रैली में दिखती थी। राजनीति में बहुत कुछ नया होता रहता है, एक ब्रांडिंग की तरह।

नीतीश कुमार को लेकर जयकारा कुछ ज्यादा सुनने को मिला। करीब 10 लोग मंच पर माइक में मुंह लगाकर नीतीश कुमार की जय जय करने में लगे थे। लगा कि नीतीश भी बोर हो रहे थे। हालांकि उनके चेहरे पर मुस्कान बरकरार थी। नेताओं को बहुत कुछ बनाकर रखना पड़ता है :)

नीतीश कुमार सहज और संयम तरीके से बोलते दिखे। नीतीश बोले कि वे दरबार में हाजिरी लगाने आये हैं। विकास की बातें की। साइकिल चलाती लड़कियों का उन्होंने जिक्र किया। यह काम तो उन्होंने अच्छा किया है।

उधर, धमदाहा में अरविन्द से बात होती है। वे खेती करते हैं। मक्का के इस किसान ने बताया कि  धमदाहा विधानसभा क्षेत्र से 25 उम्मीदवार मैदान में हैं लेकिन कोई भी किसानों की समस्या को गंभीरता से नहीं उठा रहा है। उन्होंने बताया कि वे नकारात्मक नहीं हैं , इसलिए वे चाहेंगे कि किसानों को एकजुट होना होगा।

बनमनखी में किसानों का गुस्सा मुखर दिखा
यह गन्ना का इलाका था। पहले यहां गन्ने की खेती खूब होती थी। यहां चीनी मिल हुआ करता था लेकिन अब सबकुछ उजड़ चूका है। परमानन्द साह ने कहा कि उन्हें भाजपा और नीतीश कुमार दोनों ने ठगा है। सुमन देवी ने कहा कि गाँव खाली हो गया है, रोजगार नहीं है ऐसे में परिवार के लोग सब बाहर चले जाते हैं कमाने के लिए।

मुरलीगंज में एक युवक से मुलाक़ात होती है। उसका नाम रोहन था। उसकी बोलने की शैली कमाल की थी। आत्मविश्वास से लैस इस युवक में मुझे नेता दिख गया :)

खेतों में धान की फसल दिखी। आलू भी दिख गया। मधेपुरा में  सत्तू की दूकान पर रमेश यादव मिले। उन्होंने कहा कि पप्पू यादव से उन्हें गुस्सा है। रमेश जी ने पप्पू यादव को नरेंद्र मोदी से जोड़कर एक नया फार्मूला हमें समझाने लगे।

किशनगंज में जिस तरह ओवैसी फेक्टर पर लोग अब बात करते नहीँ मिले ठीक उसी तरह यहां पप्पू यादव की भी लोग उस स्तर पर बात नहीं कर रहे हैं। लहर वाली बात नहीं दिखी। लोकतंत्र का असली आनन्द तो यही है। जनता आपको अच्छा -बुरा सबका पाठ पढ़ाती है। बाद बांकी जो है सो तो हइये है। 

Thursday, October 29, 2015

राहुल और ओवैसी के बहाने किशनगंज यात्रा

आज किशनगंज राहुल गांधी के बहाने आना हुआ। यहां एक मैदान है -रूईधासा मैदान। वहीं उनकी सभा है। रैली से पहले माहौल गीत-नाद का बना हुआ है। नीतीश कुमार की तारीफ़ से सजे गीत कान तक पहुंच रहे हैं। मैदान हाथ छाप से सजा है और आसपास महागठबंधन की साइकिल घूमती दिखी।

चाऊमीन, चाट-समोसा और नारियल की बिक्री बढ़ी है। मेला की तरह गाँव घर से लोग पहुंचे हैं। मुस्लिम बहुल इस इलाके में लोगबाग बड़ी संख्या में दिख रहे हैं। असफाक भाई के हाथ में ढोल है और वे थाप ठोक रहे हैं। वे ठाकुरगंज से पहुंचे हैं। उधर, लाउड स्पीकर से मेरा रंग दे बसंती चोला बज रहा है।

यहां तस्लीम भाई मिलते हैं और कहते हैं कि ओवैसी फेक्टर यहां नहीं है, हम बाहरी को जगह नहीं देंगे। ओवैसी को लेकर कुछ लोग गुस्से में दिखे। कोई उन्हें वोट कटवा कह रहा है तो कोई बाहरी। इन सबके बावजूद लोगबाग उनकी चर्चा कर रहे हैं । हैदराबाद से सीमांचल की कहानी शुरू में रोमांचक लग रही थी लेकिन अब हैप्पी एंडिंग संभव नहीं लग रहा है। शायद यही राजनीति है।

इसी रूईधासा मैदान में दो -तीन महीने पहले ओवैसी की बड़ी रैली हुई थी और आज उन्हीं के खिलाफ यहां बोल रहे हैं। राजनीति का व्याकरण भी अजीब होता है।

खैर, हम रैली -राहुल के बहाने किशनगंज को भी देखने निकले और पहुँच गए ईरानी बस्ती। 2012 में गया था वहां। उस वक्त बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए एक रपट तैयार की थी बस्ती की। तीन साल बाद भी हालात नहीं बदली वहां की। पता नहीं गलती किसकी है। शिकायतों की झड़ी लगा दी लोगों ने बस्ती में। चुनाव के वक्त भी उनकी कोई बात नहीं कर रहा है।

उधर शहर और आसपास पुलिस प्रशासन चुस्त है यहां, आखिर राहुल जो आ रहे हैं। मोहन दास दा बस स्टेण्ड पर मिले। उनका मानना है कि मोदी की लहर इस बार नहीं है, चुनाव इस दफे टाइट है। यह शब्द मुझे कई जगह बिहार में सुनने को मिला।

लालू की बात यहां कोई नहीं कर रहा है। अख्तर इमाम कहते हैं कि वे तो चाहेंगे नितीश अपने बल पर सरकार बनाये और साथ में कांग्रेस रहे। उन्होंने कहा कि किशनगंज का चेहरा हर कोई खराब करना चाहता है लेकिन अब ऐसा नहीं होने वाला है।

पूर्णिया से आते वक्त रास्ते में पता चला कि किस तरह मुस्लिम को भी यहां कई पॉकेट में बाँट दिया गया है, मसलन सुरजापुरी, शेरशाहबादी, कुल्हैया आदि। इन बातों को सुनकर लगा कि राजनीति किस तरह हमें तोड़ती जा रही है और हम आसानी से टूटते जा रहे हैं। पांचवे चरण में सीमांचल एक केक बन गया है, जिसे काटकर सरकार बनाने की जुगत में हर पार्टी है। केक कौन काटता है यह तो वक्त ही बताएगा , बाद बांकी जो है सो तो हइये है।

Saturday, October 24, 2015

वोटर हार जाता है, उम्मीदवार जीत जाता है !

पूर्णिया में आज सुबह से ही एक हेलीकाप्टर हवा में चक्कर काट रहा था। किसी ने कहा कि सीमांचल के कोई नेताजी आसमान से जमीन देख रहे हैं, जिसे चुनाव और बाढ़-सुखाड़ के वक्त 'हवाई दौरा' कहते हैं। वैसे सच्चाई ये है कि बिहार विधानसभा चुनाव नामक मैच अब अंतिम ओवर में है और सभी दल असली मुद्दे को साइड में रखकर जाति और जानवर के जरिये चुनावी बैतरणी पार करने की जुगत में हैं।

बिहार की गद्दी जो दल हासिल करे, यकीन मानिए हारेंगे तो हम बिहारी ही। हम बिहारी बोलते नहीं हैं इसलिए जीतने वाले हमें हारा हुआ समझकर अपनी दुनिया सजाते-संवारते रहे हैं। यह आज की नहीं बल्कि जगरनाथ-लालू काल से होता आया है। शायद उससे पहले भी हम हारते ही होंगे।

आप सोच रहे होंगे कि विधानसभा चुनाव के दौरान नकारात्मक बातें ही क्यों ? दरअसल मुद्दा विहीन इस चुनाव के पीछे हमारा भी हाथ है। हम बोल नहीं रहे हैं , लिखने वाले लिख नहीं रहे हैं। बोलते वही हैं जो सुनने में अच्छा लगता है। लिखते वैसा ही है जैसा बाजार चाहता है।

समस्तीपुर में पिछले महीने एक बुजुर्ग मिले थे, अभी उनका नाम भूल रहा हूँ। उन्होंने कहा था "मीडिया मैनेजर सब इस बार चुनाव लड़वा रहा है, नेता सब तो खाली हवा पानी देता है। खेल तो कोई और खेल रहा है। हालाँकि पतंग की डोर नेताजी के हाथ में होती है न कि मैनेजर साब के पास। लेकिन मैनेजर सब खूब कमा रहा है। "

हम सब खाने की प्लेट के लिए दाल की बात करते हैं लेकिन क्या हम किसान से यह नहीं पूछ सकते कि वह दाल की खेती क्यों छोड़ रहा है। ऐसे कई सवाल हैं जो चुनाव के दौरान गुम हो जाते हैं। हम खुद ही मुद्दों का अचार बनाकर नेताओं को दे देते हैं कि लीजिये और चटकारा लगाकर भर चुनाव खाते रहिये। नेताजी ने हाथ जोड़ दिया, पीठ पर हाथ फेर दिया हम हो गए भावुक। इस फेर से मतदाताओं को निकलना होगा खासकर ग्रामीण इलाके के लोगों को। नहीं तो हम ठगाते ही रह जाएंगे।

सड़क-बिजली-पानी -शिक्षा -शासन या किसानी को छोड़कर विभिन्न दल गाय-सूअर की बातें कर रहे हैं और एक हम हैं कि भीड़ बनकर उनकी बातें रैली-सभाओं में जाते हैं और उनकी बकैती सुनते हैं। वो बोलते हैं और हम ताली पिटते हैं। लाखों रुपया का जिमी कैमरा घुमता है हमारी तरफ और हम कुछ पल के लिए ऐसे भाव में आ जाते हैं मानो सबकुछ जीवन में  मिल गया।

ऐसे में हारेंगे तो हम ही न। मीडिया ने भी अपना काम बखूबी किया है। जाति का प्लेट मीडिया सजा रहा है और  हम उसकी टीआरपी बढ़ाते जा रहे हैं।

लगातार घूमते हुए और लोगबाग से बतकही करते हुए लगता है कि हम सभी ने जाति के फ़्रेम वाला चश्मा पहन लिया है और उसका पॉवर इतना बढ़ा दिया है कि इसके बिना हमारा कोई काम ही नहीं होगा। करोड़ो रुपये खर्च कर राजनीतिक दल व्यक्तिगत हमले वाले कंटेंट करन्ट लगाकर अखबारों में छपवाते हैं । मुखर होना होगा लोगों को नहीं तो गाते रहिये- "कौन ठगवा नगरिया लूटल हो....."

Monday, October 12, 2015

एक किसान की चुनावी डायरी- 15

स्मृति ईरानी से मिले हैं आप ?  त्रिवेणीगंज में जब हम रुके थे तो फल की दुकान पर एक महिला ने यह सवाल किया था। हमने कहा कि आप स्मृति ईरानी को कैसे जानती हैं। उन्होंने बताया कि वह स्मृति ईरानी को टीवी सीरियल के कारण पहचानती हैं। अब तो वह चुनाव प्रचार भी करती हैं। उमा नाम की उस महिला ने हमें बताया कि पहले वह स्मृति ईरानी का सीरियल देखती थी अब तो वह केंद्र में मंत्री भी हैं।

बिहार में चुनाव प्रचार के दौरान स्मृति ईरानी अक्सर कहती हैं कि किसी के घर लक्ष्मी मां 'कमल' पर ही बैठकर आती हैं न कि 'तीर' और 'लालटेन' पर बैठकर आती हैं। उनकी बातों पर लोगबाग चर्चा करते मिले।

जदिया में जहां पटसन की खेती अधिक होती है वहां लोगबाग नीतीश कुमार की तारीफ करते दिखे। वजह भी है, यहां सड़क अब बहुत अच्छी है। कभी इस इलाके से गुजरने में भय लगता था लेकिन अब आप देर रात भी गुजर सकते हैं। यहीं एक किसान अजय मंडल मिलते हैं। उन्होंने कहा कि इस बार पटुआ अच्छा हुआ है अब
देखते हैं कि चुनाव कैसा होता है। वैसे सरकार जिसकी बने बिहार में काम होता रहेगा। देखिए न ट्रक सब कितना गुजरता है रास्ता से, सब में गिट्टी –बालू भरा रहता है।

एक बात जो साफ नजर आती है कि लोगबाग विकास की बात कर रहे हैं लेकिन नेता सब विकास के इतर बदजुबानी पर उतर आए हैं। जदिया बाजार में भी लोगों से बातचीत कर हमें यही मिला। वहीं सिमराही बाजार में एक युवक से हमारी मुलाकात होती है। बातचीत से पता चल कि वह संघ से प्रभावित हैं। नाम न
छापने की शर्त पर उस युवक ने बताया कि इस बार इस इलाके में आरएसएस सक्रिय है। उन्होंने बताया कि सभी जिले में संघ के वरिष्ठ लोग तैनात हैं। खासकर उऩ इलाकों में जहां लोकसभा चुनाव में भाजपा पिछड़ गई थी।

इस संबंध में जब हमने अपने पत्रकार साथी से बात की तो उन्होंने भी इसकी पुष्टि की। उन्होंने बाताया कि बिहार चुनावों से पहले जुलाई और सितंबर के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 35 फीसदी आरएसएस के कार्यकर्ताओं में बढ़ोत्तरी हुई है। यही नहीं लगातार नये लोगों का संघ से जुड़ने का सिलसिला जारी है।

संघ के अधिकारी जो बिहार में तैनात हैं उनका कहना है कि मोदी की बिहार में रैलियों का असर युवाओं पर देखने को मिल रहा है। लोगों से बातचीत के दौरान इस तरह की बातें भी सामने आने लगी है।

सरकारी कामकाज को लेकर लोगबाग अभी भी सचेत नहीं हुए हैं। मसलन वह यह नहीं समझ पा रहे हैं कि मुखिया का काम क्या है विधायक का काम क्या है। त्रिवेणीगंज प्रखंड स्थित जदिया इलाके में किसान अजीम रहमानी ने कहा कि उन्हें अबतक वृक्षारोपण के लिए पंचायत से पौधा नहीं मिला है इसलिए वह वोट
नहीं डालेंगे। जब हमने कहा कि यह तो मुखिया का काम है, इस पर अजीम रहमानी ने कहा कि उन्हें इससे कोई मतलब नहीं है।

रहमानी ने बताया कि आप अभी सड़क किनारे हैं तो सबकुछ चकमक लग रहा है, हमारे साथ थोड़ा अंदर चलिए। ऐसे कई गांव हैं जो विकास से दूर हैं। जहां बिजली नहीं है, सड़क नहीं है, पुल नहीं है। बांस से बने चचरी पुल से वे गांव तक पहुंचते हैं। लोगों से लगातार बात करते हुए बिहार के कई चेहरे दिखने लगे हैं। हर किसी की बात सुनकर ही विकास का राग अलापा जाना चाहिए।


उधर, विभिन्न दलों के नेताओं की बयानबाजी सोशल नेटवर्क पर भी जारी है। लालू यादव ने गया के बेलांगज में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा था कि फांसी पर चढ़ जाउंगा लेकिन आरक्षण खत्म नहीं होने दूंगा. लालू के इस बयान पर कभी  उनके ‘हनुमान’ कहे जाने वाले रामकृपाल यादव ने ट्वीट किया है कि
राबड़ी भाभी लालू जी को समझाइए न, काहे जान देने पर तूले हुए हैं. रामकृपाल ने कहा आगे लिखा है कि अतिपछड़ा प्रधानमंत्री है आरक्षण कभी खत्म होने नहीं होगा.

स्मृति इरानी, त्रिवेणीगंज, जदिया, आरएसएस और फिर रामकृपाल यादव के ट्विट की कहानी बिहार के चुनावी सफर की बानगी भर है। पहले चरण के लिए मैदान तैयार है अब सबकुछ वोटर के हाथ में है। बाद बांकी जो है सो तो हइए है।

एक किसान की चुनावी डायरी-14

बेगूसराय में चुनावी रैली में नीतीश कुमार ने कहा, 'बिहारी अपने दम पर विकास करेंगे. ये बाहरी यहां क्‍या करेंगे? मैं आपलोगों से एक सवाल पूछना चाहता हूं, बिहार को आगे कौन ले जाएगा, 'बिहारी' या फिर 'बाहरी'? यदि कोई बिहारी बिहार को आगे ले जाना चाहता है तो सच्‍चा बिहारी आपके सामने खड़ा है. हमें किसी अहारी-बाहरी की जरूरत नहीं है. ऐसे में इन बा‍हरियों को गुडबाय करने का वक्‍त आ गया है.' मैं अपने गांव में नीतीश कुमार की यह बात यूट्यूब के जरिए जोगो काका को सुना ही रहा था, इसी बीच में फेसबुक पर एक मित्र के स्टेटस पर नजर चली गई- शरद यादव बिहारी हैं कि बाहरी हैं। दरअसल लोगाबग के संग सोशल मीडिया की बतकही भी मजेदार होती जा रही है।

गांव के स्वास्थ्य उपकेंद्र के कर्मचारियों से बातचीत हो रही थी। हमने पूछा कि स्वास्थ्य सेवा के अलावा चुनाव पर कुछ बातचीत करिएगा। वैसे एक बात तो जरुर है, नीतीश कुमार ने कुछ काम ऐसे किए हैं जिससे बिहार का कायाकल्प हुआ है। जैसे मेरे गांव में सरकारी अस्पताल का बनना। बिहार में तो ऐसे हजारों गांव होंगे, जो नीतीश को दुआ देते होंगे।

नीतीश-मोदी की लड़ाई के बीच स्वास्थ्य उपकेंद्र की नर्स ने बताया कि हमें तो लगता  है कि हर जगह तो सीटों का झगड़ा है। रोज न अखबार में पढ़ रहे हैं कि कभी इ रूठ गया तो कभी उ रूठ गया। चुनाव में रुठने का मनाने का बड़ा चलन हो गया है।

दवा के लिए पहुंची लाजवंती काकी से हमने पूछा कि दवा सब मिल जाता है? उन्होंने कहा- आब कोनो दिक्कत नै छै, सब मिल जाएत छै। हमने पूछा कि ये बताइए कि आपको क्या लगता है, वोट किसे मिलना चाहिए। इस सवाल पर लाजवंती काकी एकदम गंभीर हो गई। फिर बोली, देखिए, वोट तो उसे ही मिलना चाहिए जो यह समझे कि जनता का मूड क्या है। जो नेता जनता का मूड नहीं बूझ सके उ नेता तो हारबे न करेगा। मुखिया चुनाव से लेकर सांसद चुनाव तक यही होता है न।

टोला में घुमते हमारी मुलाकात मुन्ना भाई से होती है। मुन्ना भाई को राजनेताओं से दिक्कत है। उन्होंने कहा- सब पोलिटिशिएन एक ही जैसे हैं। वैसे एक चीज बिहार में अच्छा हुआ है,यहां  अब सांझ में महिलाओं का घर से निकलने में कोई खतरा नहीं है। यहीं एक 12 वीं की छात्रा सुनीता मिलती है।उसने बताया कि सांझ में क्या, अब तो रात में भी डर नहीं लगता है। 
इन बातों के साथ जब मैं अपने घर लौटा और जोगो काका को सारी बात बताई तोउन्होंने बड़े मस्ताना अंदाज में कहा कि वोट एक ही बात पर थोड़े पड़ता है बाबू। वोट के लिए माहौल बनाया जाता है। पहला फेज होने दीजिए तब देखिएगा माहौल। अभी तो खाली बकैती हो रहा है।

उधर, एक खबर ने सभी को चौंका दिया। भाजपा जिसे बिहार का भीष्म पितामहकहती है., उनकी बहू ने नीतीश कुमार की पार्टी का दामन थाम लिया है। दरअसल चुनाव में टिकट कटने से नाराज ब्रह्मपुर की विधायक दिलमाणो देवी ने जदयू का दामन थाम लिया है. शुक्रवार की देरशाम उन्होंने सीएम नीतीश कुमार की मौजूदगी में जदयू की सदस्यता हासिल की. भाजपा के दिग्गज नेता स्व.कैलाशपति मिश्रा की बहू को विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी ने टिकट नहीं दिया था. इसके बाद से दिलमाणो पार्टी से नाराज चल रही थीं.

कयास लगाए जा रहे थे कि वो अपनी सीट से बतौर निर्दलीय प्रत्याशी ही मैदान में उतरेंगी, लेकिन दिलमाणो कुंवर की जगह बीजेपी ने राज्यसभा सांसद डा.सीपी ठाकुर के पुत्र विवेक ठाकुर को टिकट दिया था.

दिलमाणो के जदयू में शामिल होने के बाद इलाके का सियासी समीकरण एक बार फिर से बदलता दिख रहा है. इस सीट को दिलमाणो ने राजद के कब्जे से निकाल कर पार्टी को जीत के रूप में दिया था. 2010 के चुनाव में वो यहां से बीजेपी की टिकट पर जीत हासिल कर विधानसभा पहुंची थीं.

मालूम हो कि यह सीट सवर्ण बाहुल्य इलाके के तहत आता है. दिलमाणो और विवेक ठाकुर दोनों सवर्ण बिरादरी से आते हैं. राजनीति में बहुत कुछ होता रहता है। देखिए न हम अपने गांव से सीधे दिलमाणो देवी के क्षेत्र पहुंच जाते हैं और लोगबाग की बात बीच छोड़कर पार्टी बदलने की बात करने लगते हैं। यही
है असली पालिटिक्स, बाद बांकी जो है सो तो हइए है।

Saturday, October 10, 2015

एक किसान की चुनावी डायरी- 13

दरभंगा से आगे निकलते हुए हम समस्तीपुर की ओर बढ़ते हैं। सुबह का वक्त था, सड़क के किनारे लोगबाग घुमते हुए बतकही कर रहे थे। यहां हमारी पहली बातचीत एक छात्र से होती है जो ट्यूशन पढ़ने जा रहा होता है। हमने पूछा चुनाव का क्या हाल है?  12वीं के उस छात्र ने हमें बताया कि कल्याणपुर जाइए न वहां मामला बड़ा मजेदार मिलेगा आपको, एकदम गणित के सवाल जैसा। यह कहते हुए उसने साइकिल आगे बढ़ा ली।

चुनाव की बातें करते वक्त हम अक्सर नेताओं की बात करते हैं लेकिन असली बात तो मतदाताओं की होती है। मतदाताओं के मन को समझने के लिए उनसे बतकही करने की जरुरत होती है। एक समाचार एजेंसी में काम करने वाले हमारे पत्रकार मित्र इन दिनों बिहार के दौरे पर हैं। उन्होंने बाताया कि लोगबाग इस बार प्रतिक्रिया बेहद नाप-तौल कर दे रहे हैं।

समस्तीपुर में एक कालेज में पढ़ने वाले छात्र रमेश आर्य ने बाताया कि उन्हें राजनीति शास्त्र में दिलचस्पी है। उन्होंने बताया कि आप भले चौक चौराहों पर लोगों की बात सुन रहे हैं लेकिन क्या आपको समस्तीपुर का
इतिहास पता है? रमेश ने बताया कि यह कर्पूरी ठाकुर का विधानसभा क्षेत्र रह चुका है, जिनके नाम पर राजनीतिक दल के लोग फसल लूट रहे हैं।

गौरतलब है कि समस्तीपुर विधानसभा सीट से कर्पूरी ठाकुर 1980 में विधायक रहे थे। इस सीट पर मौजूदा समय में आरजेडी के अख्तरुल इस्लाम सहीन विधायक हैं, जिन्होंने 10 सालों तक विधासक रहे रामनाथ ठाकुर को 2010 में नजदीकी मुकाबले में 1,827 मतों से हराया था। समस्तीपुर में बागी, शाहपुर बघौनी,
आधारपुर जैसे इलाके आते हैं। यहां 2000 से 2010 के बीच रामनाथ ठाकुर जीतते रहे।

समस्तीपुर जाने के क्रम में हमें साइकिल सवार छात्र ने कल्याणपुर जाने की नसीहत दी थी। इसलिए हमने समस्तीपुर बाजार में एक चाय दुकान पर लोगों से कल्याणपुर के बारे में पूछा। बुजुर्ग रामावतार शर्मा ने बताया कि बौआ, कल्याणपुर में मुकाबला चाचा-भतीजा के बीच है।

दरअसल कल्याणपुर में एक तरफ जहां राम विलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान के बेटे प्रिंस राज लोजपा के टिकट पर ताल ठोक रहे हैं, तो दूसरी ओर रिश्ते में उनके चाचा जनता दल (युनाइटेड) के उम्मीदवार व पूर्व सांसद महेश्वर हजारी चुनौती दे रहे हैं। समस्तीपुर के सांसद रामचंद्र पासवान सांसद हैं।

रामावतार शर्मा बताते हैं कि किस तरह राजनीति में रिश्तों को भी भुनाया जाता है। उन्होंने बताया कि लोकसभा चुनाव जैसी स्थिति अभी नहीं है। उनका इशारा मोदी लहर की तरफ था। शर्मा जी ने बताया कि लोगबाग वैसे तो मोदी की बातें कर रहे हैं लेकिन मन में नीतीश कुमार हैं। चाय की चुस्की लेते हुए
वहीं बैठे योगानंद ठाकुर ने कहा कि नीतीश सब मामले में ठीक हैं लेकिन लालू से उन्होंने जो गठबंधन कर लिया न, हमलोगों का मन टूट गया। बाद बांकी उन्होंने काम तो जबरदस्त किया है। सड़क, बिजली सब कुछ बदल चुका है बिहारमें।

इन तमाम राजनीतिक गणित की पहेलियों के बीच सर्वे भी हो रहे हैं कि कौननेता कितना लोकप्रिय है। लोकप्रियता के ग्राफ में नीतीश कुमार अभी भी आगे हैं। विभिन्न मीडिया ग्रुपों के सर्वेक्षण में नीतीश बढ़त बनाए हुए हैं। लेकिन जब रैली की बात होती है और भीड़ की तो जमीन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बाजी मार लेते हैं।

समस्तीपुर में लोगों की बातचीत से पता चला कि मामला इस बार आसान नहीं है। राजनीतिक पंडित जो कहें जनता इस बार हर एक कोण पर विचार कर रही है। यहां सब्जी मंडी में एक महिला ने कहा कि लोकसभा चुनाव देखे, अब विधानसभा देख रहे हैं, इसके बाद मुखिया का चुनाव भी होगा। तो मतलब खाली चुनाव। हमलोगोंकी सरकारी सुविधा का खाली खिलौना थमाकर नेता सेब हेलीकाप्टर से उड़ जाते
हैं। हम सब बुड़बक थोड़े हैं। विरोध भी कर सकते हैं हम सब। हालांकि ऐसी बातें हर जगह सुनने को मिलती है और हर चुनाव में ऐसी बातें होती है मतदाताओं की ओर से लेकिन जमीन पर छानबीन करने पर लगता है कि अब हम सब चालाक हो गए हैं । नापतौल कर बोलते हैं और हर किसी को खुश रखने की जुगत में रहते हैं। बाद बांकी जो है सो तो हइए है।

Tuesday, October 06, 2015

एक किसान की चुनावी डायरी- 9

सीमांचल की राजनीति करवटें लेने लगी है। सभी दलों के नेता हवा में उड़ने के लिए अक्सर पूर्णिया स्थित वायुसेना के चुनापुर हवाई अड्डे का इस्तेमाल करने आते हैं और आते-जाते बयान भी देते हैं। चुनाव के वक्त बयानों का अपना अलग ही महामात्य है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का हाल का बयान तो सभी को याद ही होगा।
लालू के विवादास्पद बयान अभी चैनलों की टीआरपी बढ़ा ही रहा था कि तभी मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन (एमआईएम) के तथाकथित  विवादास्पद नेता अकबरुद्दीन ओवैसी ने गुजरात दंगों में कथित रूप से शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 'जालिम' और 'शैतान' कह दिया और इस तरह वे सुर्ख़ियों में आ गए।
अकबरुद्दीन ने किशनगंज में एक सभा में कहा कि मोदी जालिम और शैतान हैं और 2002 के गुजरात दंगों के लिए जिम्मेदार हैं। तेलंगाना के विधायक और एमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के भाई अकबरुद्दीन ओवैसी ने कहा है कि मेरे समेत एक तबका ऐसा है जो मानता है कि 2002 के गुजरात दंगों के लिए कोई और नहीं बल्कि मोदी जिम्मेदार हैं।

गौरतलब है कि एमआईएम बिहार के मुस्लिम बहुल सीमांचल इलाके के किशनगंज, पूर्णिया, अररिया और कटिहार जिलों में चुनाव लड़ रही है। राजनीति में बयान कब दिए गए, इसका महत्व है। बिहार चुनाव में तो इस बार लगता है कि सभी दलों के नेता अपनी वाणी से सभी हदें पार कर ही देंगे।

इस तरह के नेताओं के बयानों को लेकर जब हमने गाँव -देहात में लोगों से बातचीत की तो कई रोचक बातें सामने आई। एक महिला ने कहा कि नेताओं की बातों को सुनकर लगता है जैसे टोला में झगड़ा हो रहा हो, मानो किसी की बकरी को पड़ोसी ने उठा लिया हो ...। इस तरह की टिप्पणियों को सुनकर मुझे श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास रागदरबारी याद आ जाता है।

दरअसल बयानों के चक्कर में नेताओं की बोली इतनी टेढ़ी हो जाती है कि उस पर कुछ कहना भी मुश्किल हो जाता है। इन सबके आलावा चौक चौराहों पर जिस बात की सबसे अधिक चर्चा हो रही है वह लालू के बेटे तेजेस्वी यादव का महज नौवीं पास होना है।

मेरे गाँव के राजेश महलदार की टिप्पणी सुनने लायक है। राजेश ने कहा- " मैं नौवीं पास हूँ और धान काटकर आलू लगा रहा हूँ। वहीं लालू जी के बेटे तेजस्वी मैट्रिक पास भले ना हो, लेकिन करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं। रेडियो में सुने कि तेजस्वी यादव को करोड़ों रूपया है। करोड़ों में कितने जीरो होते हैं हमको ये भी नहीं पता है। "

गौरतलब है कि तेजस्वी ने 2014-15 के सालाना आयकर रिटर्न में 5,08,019 की आमदनी बताई है। उन्होंने राघोपुर सीट से नामांकन भरा है। नामांकन के साथ तेजस्वी ने शपथ पत्र भी दाखिल किया है, जिसमें उन्होंने अपने को खुद को नन मैट्रिक बताया है। आयोग के समक्ष दायर हलफनामे में तेजस्वी ने दिल्ली के मशहूर दिल्ली पब्लिक स्कूल से 9वीं तक की पढ़ाई पूरी करने का जिक्र किया है।

तेजस्वी यादव की बात और नेताओं के विवादास्पद बयानों के इतर गाम-घर की सबसे बड़ी समस्या पलायन पर कोई कुछ नहीं बोल रहा है। पलायन बिहार की सबसे बड़ी समस्या है और इसे रोकना एक बड़ी चुनौती है। लेकिन चुनाव के वक्त पंजाब से आने वाली ट्रेनों में अचानक भीड़ बढ़ जाती है। इस गणित को समझना होगा।
गाँव के सुदेश मंडल कहते हैं कि पैसा देकर बाहर काम कर रहे लोगों को लाया जा रहा है। सुदेश की बात में कितनी सच्चाई है, इसके लिए लोगबाग से लंबी बतकही करने की जरूरत है। ऐसा लोकसभा चुनाव के वक्त भी सुना था जब पंजाब में बिहार के कामगारों को वोट डालने के लिए आकर्षित किया जा रहा था। आम्रपाली एक्सप्रेस के जनरल बागी में भीड़ अचानक बढ़ गयी थी ।एक समाचार एजेंसी में काम कर रहे मेरे एक पत्रकार मित्र ने बताया कि आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पंजाब के अलग-अलग क्षेत्रों में करीब 20 लाख बिहारी काम कर रहे हैं। मतलब एक बड़ा वोट बैंक।

इन वोटरों को चुनाव के वक्त घर तक लाना एक बड़ा काम है। ऐसे में इन सभी को कैसे कोई दल अपनी ओर खिंचेगा यह भी एक पॉलिटिकल कहानी होगी। राजनीति में मतदाताओं को लुभाने के लिए आकर्षण के भी कई रूप होते हैं।

आलू के बीज को खेत में लगाते हुए रामजी शर्मा कहते हैं " पंजाब की खेती बिहार से है।"  शर्माजी की बात सुनकर मैं सोचने लगता हूँ कि बिहार के किसानों के भीतर पंजाब की बातें कब सकारात्मक तरीके से उठेगी। चुनाव में किसानी कब प्रमुख मुद्दा बनेगा। बाद बांकी जो है सो हइये है।

Thursday, October 01, 2015

एक किसान की चुनावी डायरी-4

बिहार में शहर और गांव का फर्क जबरदस्त है तो जातियों के बीच की गोलबंदी भी मजेदार है। किसानी करते हुए हम जिस तरह बीज बोने के बाद सब कुछ प्रकृति पर छोड़ देते हैं ठीक वैसे ही विधायक बनने की लालसा लिए लोग टिकट मिलते ही जाति की गोलबंदी में जुट जाते हैं। विकास से पहले जाति को लेकर लोगबाग चर्चा कर रहे हैं। विकास की बातें पहले पोस्टरों में दिख जाती थी अब शायद प्रचार के दौरान सुनने को मिलती रहेगी।
इस बार विधानसभा चुनाव में कई छोटी पार्टियों के दिग्‍गज शक्ति प्रदर्शन करते नजर आ रहे हैं। पार्टिय़ों से बाहर-अंदर का खेल जारी है। माना जा रहा है कि बसपा, सपा, एनसीपी जैसी पार्टी इस बार खेल करेगी।
लखनऊ में हमारे एक पत्रकार मित्र बता रहे थे कि बसपा की ओर से जहां बहन मायावती तो समाजवादी पार्टी की ओर मुलायम सिंह यादव और यूपी के सीएम अखिलेश यादव के साथ कई मंत्री बिहार आ सकते हैं।

अब चलिए कटिहार की बात करते हैं। यहां लोकसभा चुनाव में एनसीपी के कद्दावर नेता तारिक अनवर ने भाजपा के निखिल चौधरी को हराया था। कटिहार में तारिक अनवर की जमीनी पकड़ है। कहा यह जा रहा है कि चुनाव के दौरान वे शरद पवार को बिहार लाने की तैयारी कर रहे हैं। उनकी पार्टी के लोग तो उन्हें मुख्यमंत्री भी मानने लगे हैं :) राजनीति सही अर्थों में टॉनिक है। कभी कांग्रेस में तारिक अनवर की पूछ थी। वे संजय गांधी का बिहार का चेहरा थे लेकिन बाद में कुछ ऐसा हुआ कि वे किनारा होते चले गए।

कटिहार की तस्वीर इस बार अलग है। भाजपा से बगावत कर पिछला विधानसभा चुनाव जीतनेवाले दुलालचंद गोस्वामी अब जदयू में हैं और सरकार में मंत्री भी। पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ रामप्रकाश महतो राजद छोड़ जदयू में हैं। कटिहार विधानसभा सीट लगातार दो बार से भाजपा के कब्जे में है। 2010 के चुनाव में यहां से भाजपा के तारकिशोर प्रसाद जीते थे। इस बार भी उन्हीं को टिकट मिला है।

कटिहार की अपनी ढेर समस्या है, जिसमें एक ट्रैफिक भी है। इस शहर की बसावट मुझे कभी रास नहीं आई। इसे प्लान बनाकर नहीं बसाया गया शायद ! आपको शहर में प्रवेश करने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। रेलवे मंडल की वजह से यह बड़ा बाजार है लेकिन बाजार को ढंग से रुप नहीं दिया गया है। पूर्णिया –कटिहार सड़क की तो हालत भी और खराब है।

उधर, राजनीति में कितने मोड़ आते हैं इसकी बानगी लालू यादव के साले हैं। खबर आई है कि राजद अध्‍यक्ष के छोटे साले सुभाष यादव ने जन अधिकार पार्टी का दामन थाम लिया है। सांसद पप्‍पू यादव जनअधिकार पार्टी के अध्‍यक्ष हैं।

सुभाष यादव की टिप्पणी तो और भी मजेदार है। पार्टी क सदस्यता लेने के बाद उन्होंने कहा कि पप्पू के नेतृत्व में एक बार फिर बिहार में सामाजिक न्याय की लड़ाई प्रारंभ हुई है। यह राजनीति भी न खुद में एक शोध का विषय है।

चुनावी बतकही चौक चौराहों के बिना अधूर लगता है। कटिहार के मिरचाई-बाड़ी चौक पर हमारी मुलाकात एक कालेज छात्र रमेश से होती है। रमेश ने कहा बिहार को लेकर लोगों की धारणा बदलने की जरुरत है। रमेश कहते हैं कि बिहारी हैं तो हैं लेकिन बिहार भी बदले यह भी जरुरी है। उनकी इच्छा है कि इंटर के बाद बिहार के लोग दिल्ली या अन्य राज्यों में पढ़ाई के लिए न जाएं। रमेश जैसे लोगों की बातों को भी सुनने की जरुरत है। लेकिन जातीय गणित में फंसी राजनीति ऐसी बातों को नतरअंदाज कर देती है।

रानीपतरा में एक किसान अवधेश यादव ने कहा कि चुनावी मुद्दे में किसानी को शामिल कौन कर रहा है? यह सवाल भी जायज है। उधर, प्रधानमंत्री  विदेश से लौट आए हैं। उनका झारखंड में सरकारी कार्यक्रम है। दो अक्टूबर को वे दुमका में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना का शुभारंभ कर एक लाख लोगों के बीच 200 करोड़ रुपए का ऋण वितरित करेंगे। झारखंड में भाजपा की ही सरकार है, यह जानना जरुरी है और बिहार और झारखंड में ज्यादा दूरी नहीं हैJ

उसी दिन खूंटी में प्रधानमंत्री की सभा होगी, जिसमें कहा जा रहा है कि एक लाख से ज्यादा लोग भाग लेंगे। इसके बाद तो मोदी पूरी तरह बिहार के सियासी समर में कूद जाएंगे। दो अक्‍टूबर को ही प्रधानमंत्री बांका और चार अक्‍टूबर को लखीसराय में चुनावी रैलियों को संबोधित करेंगे। दोनों इलाकों में 12 अक्‍टूबर को पहले चरण का मतदान होना है।
ये तो हुई बड़ी-बड़ी बातें। लेकिन इन सबके बीच आपका किसान पूर्णिया-कटिहार सड़क के हाल पर माथा पीट रहा है। कुछ दिन पहले तक यह सड़क ठीक थी लेकिन घुटने भर के गढ्ढ़े को देखकर अब तो उधर जाना दूभर हो गया है। बाद बांकि जो है सो तो हइए है।

#BiharElections2015

Thursday, September 10, 2015

रेसीडेंसी की योजना

बहुत दिनों से इच्छा थी कि अपनी मन की एक बात यहां सार्वजनिक करूं। बात कहिये या फिर एक किसान की योजना। दरअसल मैं अपने गाँव चनका में एक रेसीडेन्सी प्रोग्राम शुरू करना चाहता हूँ। चनका एक गाँव है जो बिहार के पूर्णिया जिला में स्थित है।
रेसीडेन्सी प्रोग्राम बेहद सामान्य तरीके से आरम्भ करूंगा। जहां कला, साहित्य, पत्रकारिता और अन्य विषयों में रूचि रखने वाले लोग आएं और गाम-घर में वक्त गुजारें। गाँव को समझे-बूझें। खेत पथार, तलाब कुंआ...ग्राम्य गीत..आदि को नजदीक से देखें।

बाबूजी की स्मृति में यह रेसीडेन्सी आरम्भ करने का इरादा है। मेरे पिता वैसे तो एक किसान थे लेकिन  उन्होंने अपना जीवन किसानी के संग रेणु साहित्य और अंचल के लिए समर्पित किया, अब  मैं उनकी यादों के सहारे इस काम को आगे बढ़ाना चाहता हूँ।

इस सम्बन्ध में आपलोगों का सुझाव चाहिए, आखिर कैसे इस काम को आगे बढ़ाया जाए। मैंने 1000 किताबें जमा की है लाइब्रेरी के लिए। दो बेडरूम, एक किचन, डाइनिंग स्पेस , बाथरूम, बरामदा के साथ एक छोटा सा कॉटेज तैयार किया है, जिसे फाइनल टच देना बाँकी है।

पूर्णिया शहर से 25 किलोमीटर की दूरी पर चनका गाँव है। आप सबों से आग्रह है कि सुझाव दें ।
किसानी करते हुए एक नई शुरुआत करना चाहता हूँ। किसानी को इस तरह जीना चाहता हूँ , जिससे आने वाली नई पीढ़ी भी गाँव की तरफ मुड़े। किसानी को भी लोगबाग पेशा समझे। किसानी से लोगों का मोह भंग न हो।

आप सब कुछ सुझाव दें ताकि मैं काम को आगे बढ़ा सकूं।
आपका
गिरीन्द्र

Tuesday, September 08, 2015

खेती-किसानी, बारिश-बाबूजी

पिता ऐसे पेड़ होते हैं, जिसकी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत होती है कि हम उससे लिपटते चले जाते हैं और अंतत: उसमें खो जाते हैं। इस खो जाने का अपना आनंद है। पता नहीं, हर कोई इसमें खोना चाहता होगा कि नहीं लकिन मैं तो ऐसा जरुर चाहता हूं। खेती-किसानी करते हुए इस बारिश के मौसम में जब बाबूजी मुझसे बहुत दूर चले गए हैं तब उनकी जड़ों में लिपटने की चाह और बढ़ गयी है।

आज शहर से अपने गाँव जाते वक्त मेरी नजर एक बूढ़े शख्स पर टिक गयी जो लाठी के सहारे कदम बढ़ा रहा था. उम्र उसकी 80 के करीब होगी। लेकिन इसके बावजूद वो सात -आठ साल के एक लड़के को थामे था। वह बूढ़ा उस लड़के को सहारा दे रहा था कि वह लड़का उस बुजुर्ग को थामे था, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन यह अहसास जरूर हुआ कि हम सब जड़ों में लिपटने की जुगत में रहते हैं। यही जुगत शायद जीने की आश को बचाए रखती है।


नहर के एक छोर पर उन दोनों को देखकर मुझे बाबूजी की याद सताने लगी। दरअसल हम सब स्मृति में जीवन तलाशते हैं। स्मृति की दूब हमेशा हरी बनी रहे, हम सब ऐसा सोचते हैं। कोई हमारे बीच से गुजरकर भी मन में एक पगडंडी बनाकर निकल जाता है, जिसकी लकीर पर हम जीवन भर चलते रहने की मंशा पाल बैठते हैं।  

लेकिन नियति जो चाहती, होता तो वही है। कबीर की वाणी ऐसे में मुझे याद आने लगती है। गाम का कबीराहा मठ मुझे खींचने लगता है। मैं खुद ही बुदबुदाने लगता हूं- कबीरा कुआं एक है..और पानी भरे अनेक..।

फिर जीवन में फकीर की खोज में लग जाता हूं तो कबीर का यह लिखा सामने आ जाता है-  "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे. सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली बला..।"  

आज गाम-घर करते हुए यही सब सोचता रहा। इस बीच धूप की दुनिया बादलों में कब बदल गयी पता भी नहीं चला। अचानक खूब बारिश होने लगी। बारिश की कई यादें हैं मन के भीतर, कई कहानियां हैं, कई नायक-नायिकाएं हैं..लेकिन फिलहाल धान के खेत का कैनवास ही मन में घर बनाए हुए है।  

बारिश से धान के खेतों की हरियाली और भी मायावी दिखने लगती है। बाबूजी का अंतिम संस्कार मैंने उन्हीं धान के खेतों के मुंडेर पर किया, जहां वे फसलों से अपनी और हम सबकी दुनिया रचते थे। हमारी साल भर की रोजी-रोटी के लिए जी-तोड़ मेहनत करते थे। ट्रैक्टर से घंटों खेतों को समतल करते थे।

देखिए न उन खेतों में अब धान के संग कदम्ब अपनी कविता-कहानी हमें सुनाने की जिद कर रहा है। इस अहसास के साथ कि बाबूजी भी ये सब सुन रहे होंगे, मैं आंखें बंद कर उन्हें याद कर लेता हूं। यह जानकर कि मेरा यह भरम भी टूट जाएगा एक दिन...  

हर रोज शहर से गांव करते हुए इन दिनों एक साथ ऐसी ही कई चीजें मन में चलती है। तबियत ठीक नहीं रहने की वजह से लिखना कम हो गया है। ड्राइविंग और लेखन से थोड़ी दूरी बनाने को डाक्टर ने कहा है, दोनों ही अति-प्रिय चीज...जा रे जमाना..हर कुछ पर पाबंदी। डाक्टर भी न ..लेकिन करना तो वही होगा..। 

कम बारिश की वजह से खेती-बाड़ी इस बार मन माफिक नहीं होगी, ये पता है लेकिन इसके बावजूद हार मानने वाले हम हैं नहीं। बाबूजी अक्सर कहते थे- ‘ किसानी करते हुए निराशा के बादल खूब मंडारते हैं, उन बादलों को बस बरस जाने दो...।’ 

आज खेती-किसानी और बारिश के बहाने बस इतना ही।

Friday, August 21, 2015

बारिश, धान और सरोद

सरोद वादन
पूर्णिया में आज सुबह से बारिश हो रही है। उधर, अखबारों के पन्नों में चुनाव और दलीय राजनीति की खबरें फैली हुई है। बिहार को विशेष पैकेज का गणित अखबारों के खबरों को अपने जाल में फंसाए हुए है। हर कोई इसी की बात कर रहा है।

वैसे मेरे लिए अभी खबर बारिश ही है। धान को बारिश की जरुरत थी। ऐसे में मूसलाधार बारिश ने धान के खेतों में कुछ असर दिखाया है हालांकि अब काफी देर हो चुकी है।


हम जैसे कई किसान हार मान चुके थे थे और खेत को छोड़ चुके थे। ऐसे में देर ही सही लेकिन बारिश की बूंदों ने कुछ काम किया है। वैसे हम जान रहे हैं कि फसल इस बार मन को हरा नहीं करेगा। ऐसे में मन का एक कोना निराशा के फेर में फंसा हुआ है।
ऐसे में मन को संगीत की तलब लगी है। संगीत वो भी केवल इन्सट्रूमेंटल। वाद्य यंत्र के माध्यम से निकलने वाली आवाज मन को हमेशा से राहत पहुंचाती आई है। ऐसे माहौल में पूर्णिया शहर में स्पिक मैके के एक कार्यक्रम में जाना हुआ। वो भी सरोद सुनने।

पंडित राजीब चक्रवर्ती के सरोद वादन से पहला परिचय हुआ। वैसे सच कहूं तो सरोद के प्रति अपना अनुराग आठ साल पुराना है। पहली बार दिल्ली के पुराने किले में इस वाद्य यंत्र से इश्क हुआ था। वो दिल्ली की सर्द शाम थी। हम कालेज के दोस्तों के संग वहां पहुंचे थे। शाम कब देर रात में बदल गयी पता भी नहीं चला।

तकरीबन 300 साल पुराना यह वाद्य यंत्र मुझे अपने करीब तब तक ला चुका था। हम अपने दोस्तों के संग उस सर्द रात पैदल ही आईटीओ पहुंच गए थे। सरोद मन में बज रहा था। बाद में आईटीओ पर देर रात एक ओटो मिला और हम कुहासे की उस रात गुनगुनाते अपने कमरे पहुंचे थे।

मुझे आज भी याद है, उस शाम उस्ताद अमजाद अली खां ने गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के लोकप्रिय गीत ‘एकला चलो रे’ की रसपूर्ण प्रस्तुति के बाद राग दरबारी सुनया था। पत्रकारिता करते हुए बाद में  जाना कि यह खां साब का सबसे प्रिय राग है। राग से अनुराग की एबीसीडी वहीं से शुरु हुई थी शायद।

आज जाने कितने दिनों बाद पूर्णिया के विद्या विहार इंस्टिट्युट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में स्पिक मैके के कार्यक्रम में वो सबकुछ गुजरे दिनों की बातें याद आ रही है। पंडित राजीब चक्रवर्ती ने अपने सरोद वादन से मन मोह लिया। भैरव राग में उन्होंने हम सबको बांध लिया। तबले पर पिंटू दास ने भी हमें आकर्षित किया। लेकिन हमें तो सरोद अपनी ओर खींच रहा था।

संगीत कार्यक्रम के बाद पंडित राजीब चक्रवर्ती ने सवाल जवाब का कार्यक्रम रखा था, जो स्पिक मैके के कार्यक्रमों का नियम है। इंजीनियरिंग कॉलेज के बच्चों के साथ उनके सवाल जवाबों में भी हमें संगीत का संगत देखने को मिला।

बाहर खूब बारिश हो रही थी। मौसम में सर्द का थोड़ा अंश मुझे अनुभव हो रहा था। शायद दिल्ली के पुराने किले की याद का असर है यह। हम फिर बारिश में भिंगते घर लौट आए लेकिन मन में सरोद पर सुना राग मल्हार बजर रहा था...संगीत की ताकत यही है शायद।

Thursday, May 21, 2015

मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता..

बाबूजी, जब तक आप खड़े थे आपसे आँख मिलाकर बात नहीं कर पाया। मेरी आँखें आपके सामने हमेशा झुकी रही। अब जब रोज यह कहना पड़ता है कि बाबूजी आँखें खोलिए, दवा खाइये...तो मैं घंटों तक अंदर से डरा महसूस करता हूँ। आपसे आँख मिलाने की हिम्मत मैं अब भी नहीं कर पा रहा हूँ।

अब जब रोज आपको बिछावन से उठाता हूँ और फिर वहीं लेटाता हूँ तो आपके शरीर को छूने भर से अजीब की शक्ति मिलती है। इस शक्ति को खुद को खुद से लड़ने के लिए बचाकर रख रहा हूँ।

आपके शरीर में जबसे घाव ने अपनी जगह बना ली तो मैं अंदर से टूट गया। मैंने कभी आपके शरीर को इस तरह लाचार नहीं देखा था। धोती-कुर्ते में आपको सलीके से देखता आया। माँ हमेशा आपके घाव को साफ़ करने में लगी रहती है, वही सबकुछ करती हैं। नहीं मालूम कि आप ये सब समझ रहे हैं या नहीं लेकिन हर बार जब आपके घाव पर बेटाडिन दवा लगाई जाती है तो मैं सिहर जाता हूँ।

मैं जानता हूं कि ये दवा घाव के फंगस को हटाने का काम करती है लेकिन दर्द भी तेज करती है कुछ देर के लिए ...इन सब प्रक्रिया में भी आप के चेहरे पर भाव नहीं देखकर आपका दर्द खुद पी लेता हूँ। आपको उठाकर कुर्सी पर नहीं बैठा सकता, क्योंकि बैठते ही आपका बीपी हाई हो जाता है और फिर घंटों मूर्छित पड़े रहते हैं।

आपको स्नान भी नहीं सकता, घाव के डर से। लेकिन इन सबके बावजूद अपना भरम बनाये रखने के लिए आपको घाव सूखने की सबसे ताकतवर दवा बायोसेफ सीवी- 500  देता हूँ कि आप ठीक हो जाएंगे और बेड सोर को हरा देंगे। मैं जानता हूं कि यह सब वक्त का फेर है, जो आपको तंग कर रहा है।

याद है आपको, दसवीं पास करने के बाद जब आपने टाइटन की कलाई  घड़ी दी थी तो क्या कहा था? मुझे याद है, आपने कहा था वक्त बड़ा बलवान होता है। वक्त हर दर्द की दवा भी अगले वक्त में देता है। गणित में कम अंक आने पर आप गुस्सा गए थे। आपने कहा था जीवन गणित है और तुम उसी में पिछड़ गए...फिर आपने 12वीं में कॉमर्स विषय लेने को कहा और चेतावनी दी थी कि इसमें पिछड़ना नहीं है। याद है न आपको  बाबूजी! मैंने आपके भरोसे को बनाये रखा था तो आपने गिफ्ट में हीरो साइकिल दी थी। फिर दिल्ली भेज दिया, कॉलेज की जिंदगी जीने।

जब भी पैथोलॉजिकल जांच में आपका सोडियम गिरा हुआ और सूगर लेवल हाई देखता हूँ तो मैं खुद चक्कर खा जाता हूँ। इलोकट्रेट इम्बैलेंस आपके लिए अब नई बात नहीं रही लेकिन मैं डर जाता हूं। हमेशा अपने कन्धे पर भार उठाने वाले शख्स को इस कदर लाचार देखकर मेरा मन टूट जाता है। लेकिन तभी आपकी एक चिट्ठी की याद आ जाती है जो आपने मुझे 2003 में भेजी थी दिल्ली के गांधी विहार पते पर। रजिस्ट्रड लिफाफे में महीने के खर्चे का ड्राफ्ट था और पीले रंग के पन्ने पर इंक कलम से लिखी आपकी पाती थी।

आपने लिखा था कि “बिना लड़े जीवन जिया ही नहीं जा सकता। लड़ो ताकि जीवन के हर पड़ाव पर खुद से हार जाने की नौबत न आए।“ आपकी इन बातों को जब याद करता हूँ तो सोचता हूँ कि आप क्यों नहीं अपने घाव से लड़ रहे हैं। आप क्यों हार रहे हैं।

मैं आपको फिर से खड़ा देखना चाहता हूँ। बाबूजी, मुझे आप लेटे हुए अच्छे नहीं लगते। मुझे आपसे कार ड्राइव करना सीखना है। दीदी ने जब कार दी तो पहली बार स्टेयरिंग पर हाथ रखा तो आपकी वो बात याद आई – “जब कार लाओगे तो मैं क्लच- ऐक्सिलेटर-गियर का खेल तुम्हें सिखाऊंगा ....” लेकिन वो भी नहीं हो सका और यही वजह है कि मैं आज भी कार चलाने से झिझकता हूँ। मैं हर बात सबको कह नहीं पाता, बहुत कुछ मन में ही रख लेता हूं। जानता हूं ये ठीक नहीं है लेकिन आदत से मजबूर हूं।

जब भी चनका जाता हूं तो आपका केसरिया रंग का वो दोनों एस्कार्ट ट्रेक्टर याद आ जाता है, जिसे आप हाफ पेंट , जूता और हेट पहनकर खेत में निकालते थे..आप तो देवघर , दरभंगा सबजगह ट्रेक्टर से पहुंच जाते थे या फिर अपनी काले रंग की राजदूत से। कितनी यात्राएं की आपने। याद है न आपको दिल्ली के बसंतकुंज स्थित फोर्टिस अस्पताल में डाक्टर दीपक ने क्या कहा था – आपने ड्राइव बहुत किया है, लंबी दूरी मोटरसाइकिल से तय की है...इतना नहीं चलाना चाहिए था...। जब भी मैं लंबी दूरी बाइक से तय करता हूं तो आप याद आ जाते हैं।

जानते हैं जब आपके लिए व्हील चेयर खरीदकर लाया था तो रास्ते में रूककर खूब रोया था। मैंने कभी भी आपको सहारा लेकर चलते नहीं देखा था ...सहारा देते हुए ही देखा। बिजली के बिछावन पर लेटे देखकर भी मेरा यही हाल होता है। सच कहूँ तो अब डाक्टरों से डर लगता है। डाक्टरी जांच से भय होता है। मैं खुद साउंड एपिलेप्सी का मरीज बन गया..मेडिकल फोबिया का शिकार हो गया हूँ। अस्पताल जाने के नाम पर पसीने छूट जाते हैं। पहले गूगल कर लेता हूं कि फलां रोग का इलाज क्या है...

आप जानते हैं बाबूजी, मेरी एक किताब आ रही है राजकमल प्रकाशन से। आपने कहा था न कि हिंदी में राजकमल प्रकाशन का स्तर ऊंचा है और जब भी लिखना तो उम्मीद रहेगी कि राजकमल से ही किताब आए... बाबूजी, मेरी किताब उसी प्रकाशन से आ रही है।  आप यह सुनकर क्यों नहीं खुश हो रहे हैं ? आप सुनिए तो...

चनका में आपकी अपनी एक लाइब्रेरी थी न जहां  राजकमल प्रकाशन की किताबें रखने के लिए काठ वाली एक आलमारी थी अलग से! आपने दादाजी के नाम से वह लाइब्रेरी तैयार की थी। मुझे कुछ कुछ याद है। लाइब्रेरी की सैंकडों किताबें आपने बांट दी। आप लोगों को  किताब पढ़ाते थे।

एक बार जब मैंने आपसे पूछा कि किताबें जो लोग ले जाते हैं वो तो लौटा नहीं रहे हैं? आपने कहा था- “किताब और कलम बांटनी चाहिए। लोगों में पढ़ने की आदत बनी रहे, यह जरुरी है। देना सीखो, सुख मिलेगा। “ अब जब मेरी किताब की बातें हो रही है तो आप चुप हैं ..इसलिए मैं सबकुछ करने के बाद भी खुद से खुश नहीं हूँ क्योंकि आप मेरे लिखे में गलती नहीं निकाल रहे हैं।  आप मेरे आलोचक हैं, प्रथम पाठक हैं.. आप समझ क्यों नहीं रहे हैं।

किताब को लेकर जब भी राजकमल प्रकाशन के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम से बात होती है तो मैं अपना दुःख छुपा लेता हूँ। मैं उन्हें कैसे बताऊँ अपने भीतर की पीड़ा...एक एक शब्द लिखते वक्त अंदर का संत्रास झेलता हूँ। यह दुःख मैं शेयर नहीं कर पा रहा हूँ ...किसी से नहीं। जब भी सत्यानन्द निरूपम से किताब आदि को लेकर बात करता हूँ तो बस मुस्कुरा देता हूँ ताकि अंदर की पीड़ा और आंसू बाहर न आ जाए।

सत्यानंद निरुपम सर को  कैसे कहूँ कि बाबूजी के लिए ही लिखता रहा हूँ लेकिन अबकी बार वे कुछ नहीं समझ पा रहे हैं। मैं भीड़ में अकेला हो चला हूँ। फिर सोचता हूँ कि शायद मन के तार सत्यानंद से कभी न कभी जुड़ जाएंगे तो उन्हें सब बातें बताऊंगा।

बाबूजी, आपको तो रवीश की रिपोर्ट बहुत पसंद है न। आपने तो उसीके लिए ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में केबल का तार लगाया था ..याद है न। अयोध्या पर रवीश की एक रपट आई थी तो आपने फोन किया था कि रिपोर्टिंग को इस अंदाज में करना चाहिए। बाबूजी, हाल ही में रवीश ने अपने रिपोर्ट में मेरा लिखा पढकर सुनाया था,  दुःख की ही घड़ी में लेकिन सुनाया था। आपने उसे भी नहीं देखा...क्यों ..? रवीश आपका हालचाल पूछते हैं और आप है कि जवाब भी नहीं देते। कुछ तो कहिये....

बाबूजी, सुशांत झा आपको याद हैं न ! विरंची जी के बेटे, मधुबनी वाले। आप उनकी बात खूब सुनते थे न जब वे पूर्णिया आये थे। वे भी आपका हाल चाल लेते हैं। आपने उनके बारे में कहा था कि इनके संपर्क में रहिये, इनके पास इतिहास - भूगोल की कथाएँ हैं। इनसे बहुत कुछ सीखने की बात आपने कही थी। हां बाबूजी , मैं सुशांत भाई के संपर्क में रहता हूँ, उनसे सीखता रहता हूं। वे तो आपके चनका के बारे में भी बात करते रहते हैं। मेरे सभी दोस्त आपके बारे में पूछते रहते हैं लेकिन आप है जो खामोशी का चादर ओढ़ लिए हैं।

जानते हैं आपकी खामोशी की वजह से है कि मैं परेशान रहता हूँ। जबसे आपने बिछावन पकड़ा है, कहां कुछ कहा मुझसे। अब तो साल होने जा रहे हैं। कुछ तो बोलिए..डांट ही लगाइए..लेकिन कुछ तो कहिए।

एक बात जानते हैं, इस बार आंधी बारिश के तांडव में भी आपके हाथ से लगाये लीची और कटहल गाछ फल से लदे हैं। दोपहर में गाम के बच्चे उसमें लूदके रहते हैं , चमगादरों की तरह ...मैं बस उन्हें हँसते खिलखिलाते देखता रहता हूँ। आप सबके लिए कुछ न कुछ लगाकर लेट गए हैं ..अब उठिए और मुझे भी यह तरकीब सीखा दीजिये न बाबूजी.....आप मेरी बात सुनिए न ...।

Wednesday, May 20, 2015

पंखुरी का पन्ना: कुछ कहानी कुछ पेंटिंग...

चनका में पंखुरी की मस्ती
पंखुरी को रोज नई कहानी चाहिये। जब भी खाली रहता हूँ, उसके लिए कहानी खोजता रहता हूँ। कहानी में उसको बन्दर चाहिए होता है और कुछ शरारती बच्चे और उन बच्चों के लिए एक मैडम।

हर रोज नई कहानी...बन्दर जो उसकी कहानियों का परमानेंट नायक होता है उसको आप रिपिट नहीं कर सकते। मतलब हर रात नया बंदर चाहिए उसको। अपनी कहानी का प्लॉट पंखुरी हर दिन नया चाहती है।

स्कूल से आकर वो जब पेंटिंग करने बैठती है, उसी वक्त वो ऐलान कर देती है कि रात में सोते वक्त उसे नई कहानी चाहिए।

आज उसकी कहानी में हमने बंदर को जीन्स शर्ट में ला खड़ा कर दिया था और याकू और चिहू नाम के उसके दोस्तों को जीप पर घुमाया था जंगल में...वहीं हमने लंच में मैगी का इंतज़ाम रखा था लेकिन पंखुरी ने कहा मैगी नहीं उसे चाहिए ब्रेड जैम।

ब्रेड जैम और मैगी जब कहानी के बीच में घुसा तो इसी बीच पंखुरी पूछ बैठी -"पापा जब आप होस्टल में थे तब आपको कौन कहानी सुनाता था ? "

पंखुरी यह सवाल पूछकर झपकी लेने लगी और फिर सो गयी। लेकिन उसके सवाल ने मेरी नींद गायब कर दी है। मैं सोच रहा हूँ कि कम उम्र के बच्चों को हॉस्टल में डालकर सचमुच में हम बचपन का गला घोंट देते हैं। कम उम्र में घर से बाहर रहने का दर्द मुझे पता है लेकिन पंखुरी का एक सीधा सवाल मुझे बेचैन कर दिया है।
खैर, मुझे कल के लिए नई कहानी खोजनी है ताकि पंखुरी की डांट न लगे। मैं उसके लिए रोज नए नए जंगल बनाता हूँ ..बंदरों का देश बनाता हूँ..लाल रंग का बन्दर ...गुलाबी रंग का ...हरा रंग का...बन्दर ही बन्दर ....

सुबह जब पंखुरी उठती है तो उसे पता चलता है कि आज स्कूल बंद है। वो खुश होती है कि आज दिन भर घर में उसकी चलेगी।। स्कूल बंद था  इसलिए पंखुरी दिन भर अपनी शरारतों से घर का रौनक बढ़ाती रही। लैपटाप के पुराने कीबोर्ड, गुड्डा गुड़िया और बीच बीच में पेंटिंग की उसकी मास्टरी जारी रही। सादे पन्ने पर वह एक लड़की की तस्वीर बनाती है और फिर उसे रंगती रहती है।

और उधर मैं दिन भर जीवन के प्रपंच, किसानी की दुनिया और अखबारों व ब्लॉग के लिए खबरें जुटाता रहा और तय समय पर संबंधित लोगों को इमेल भेजता रहा। लेकिन इन सबके बीच भी मन के एक कोने में पंखुरी के लिए कहानी गढ़ता रहा।  आज मैंने पंखुरी के लिए लाल रंग का बन्दर और सीहू  नाम का एक कैरेक्टर खोज निकाला था। रात में बिछावन पर लेट कर, उसे अपनी बांह पर लेटाकर यही कहानी सुनानी है।

लाल रंग का बन्दर लालपुर का राजा था और उसका दोस्त था सीहू। सीहू एक स्कूल में पढता था और गर्मी की छुट्टी में लालपुर आया था। उसके साथ स्कूल की मैडम भी आई थी। दरअसल पंखुरी की कहानी बिना मैडम के अधूरी होती है। मैडम को लेकर पंखुरी बहुत सजग रहती है।

जिस तरह बंदर के रंग को लेकर पंखुरी सावधान रहती है वैसे ही मैडम के नाम को लेकर भी। पंखुरी ने मैडम का नाम 'रेखा' रखने के लिए कहा है। होता ये है कि यदि नाम के साथ आपने छेड़ छाड़ की तो पंखुरी कहानी का बैंड बजा देती है फिर वह कहानी के हर लाइन में गलती खोजेगी।

लालपुर में भी एक स्कूल रहता है। वहां लाल रंग के छोटे छोटे बंदर पढ़ते हैं। सीहू अपनी रेखा मैडम के साथ स्कूल पहुँचता है तो चहक उठता है। बंदर सब भी खुश होते हैं क्योंकि उससे मिलने शहर से कोई जंगल आया है। सीहू ने बंदरों के लिए अपनी मम्मी के हाथ का बना हलुआ लाया है और ढेर सारे केले। दरअसल पंखुरी को केला बहुत पसंद है।

जब मेरी कहानी केले तक पहुंची तबतक पंखुरी झपकी लेने लगी थी। सोने की पूरी तैयारी वो कर चुकी थी। बोली - "पापा कल मेरे लिए पीला रंग का केला लाना...मैं बनाना सैक पियूंगी..अच्छा ये बताओ लालपुर के राजा की रानी कौन थी..एक बंदर वाला गीत सुनाओ ना..प्लीज " !

पंखुरी फरमाइश करने के बाद सो चुकी थी और मैं पैट्रिक फ्रेंच की किताब "भारत" पलटने लगा। पंखुरी के बाद मैं खुद को भी कहानी सुनाता हूँ ताकि कहानी से लगाव बना रहे।

कभी- कभी पंखुरी बहुत सवाल दागती है। आज रात में वो पूछ बैठी- "पापा, ये बताओ कि बंदर के देश में सबसे अच्छा स्कूल कौन सा है ? क्या बंदर के यहां टाटा स्काई का कनेक्शन होता है? बंदर को पोगो पसंद है या फिर कार्टून नेटवर्क ?"

आज कहानी के नाम पर पंखुरी लंबा क्लास ले रही है। कहानी शुरु करुं इससे पहले उसने ढेर सारे सवाल दाग दिए।

आपको यहां एक चीज बताता चलूं कि पंखुरी के लिए न्यूज चैनल का मतलब ‘मोदी-सरकार’ होता है। कोई भी समाचार चैनल आप लगाएं वह उसे ‘मोदी-सरकार’ ही कहती है। वह तो बंदरोँ के देश में भी ‘मोदी-सरकार’ खोजने लगती है। दरअसल एक साल पहले जब मैं न्यूज चैनल ज्यादा देखता था तो वह गुस्सा हो जाती थी और कहती थी- पापा तुम केवल ‘मोदी-सरकार’ ही देखते हो..पोगो देखा करो..छोटा भीम देखो..मोदी सरकार से अच्छा है अपना छोटा भीम, छुटकी , कालिया, राजू और जग्गू बंदर....

आज पंखुरी की कहानी बंदरों के लाल देश लालपुर से शुरु होती है, जहां के राजा ‘लाल-बंदर’ के घर बड़ा स्क्रीन वाला टेलीविजन  बाजार से आता है। पंखुरी की कहानी का प्लॉट पंखुरी के अनुसार तय होता है इसलिए बंदर के टेलीविजन में टाटा स्काई लगाया जाता है।

पंखुरी बार बार कहती है कि बंदर के राजमहल में बड़ा टीवी रहना चाहिए और हां केबल कनेक्शन नहीं, टाटा स्काई रहना चाहिए जिसे आंधी तूफान या भूकंप से कोई दिक्कत न हो.. “ छोटकू और छोटकी बंदर” लगातार बिना किसी रुकावट के पोगो चैनल सर्फ करते रहे।

अब आप पूछिएगा कि “छोटकू और छोटकी बंदर” कौन है? तो साहेबान, कद्रदान ये दोनों लालपुर के राजकुमार व राजकुमारी है। इन दोनों को छोटा भीम सीरियल बहुत पसंद है। हरदम टीवी से चिपके रहते हैं वहीं इस बात से लालपुर की रानी दुखी रहती है क्योंकि उसे भी टीवी देखने का मन होता है। उसका मन स्टार प्लस के सीरियल पर अटका रहता है लेकिन छोटकू और छोटकी के सामने किसी की नहीं चलती है।

पंखुरी की कहानी लालपुर से अचनाक पिंक सिटी पहुंच जाती है। वो कहती है कि लालपुर में टीवी आ गया न..अब पापा चलो पिंक सिटी, वहां देखते हैं कि जग्गू बंदर क्या कर रहा है। वो स्कूल जाता है कि नहीं..जरा पता लगाओ कि उसके स्कूल में गर्मी की छुट्टी कब शुरु होगी..और हां, होमवर्क वो बनाता है कि नहीं ?

होमवर्क के नाम पर मेरी नजर पंखुरी के लाल बैग पर चली जाती है। ओहो! आज तो पंखुरी ने भी होमवर्क नहीं बनाया है। मैं जबतक यह कहता कि चलो होमवर्क बना लेते हैं तब तक तो बिटिया रानी सो चुकी होती है। अब फिर सुबह में बोर्नविटा के साथ होमवर्क का हो-हल्ला चलेगा :) मैं मन ही मन मुस्कुराता  हूं कि बेटी ने तो आज कहानी के नाम पर मुझे फंसा कर होमवर्क का बैंड बजा दिया।

बेटी की इन्हीं शरारतों से तो अपना घर गुलजार रहता है।  पंखुरी गहरी नींद में है और मैं सोच रहा हूं कि यह तीन साल की लड़की सपने में भी कहानी ही सुन रही होगी न..या फिर कहानी के नाम पर ढेर सारे सवालों का जखीरा तैयार कर रही होगी..अपने पापा-मम्मी के लिए..:)