Tuesday, September 08, 2015

खेती-किसानी, बारिश-बाबूजी

पिता ऐसे पेड़ होते हैं, जिसकी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत होती है कि हम उससे लिपटते चले जाते हैं और अंतत: उसमें खो जाते हैं। इस खो जाने का अपना आनंद है। पता नहीं, हर कोई इसमें खोना चाहता होगा कि नहीं लकिन मैं तो ऐसा जरुर चाहता हूं। खेती-किसानी करते हुए इस बारिश के मौसम में जब बाबूजी मुझसे बहुत दूर चले गए हैं तब उनकी जड़ों में लिपटने की चाह और बढ़ गयी है।

आज शहर से अपने गाँव जाते वक्त मेरी नजर एक बूढ़े शख्स पर टिक गयी जो लाठी के सहारे कदम बढ़ा रहा था. उम्र उसकी 80 के करीब होगी। लेकिन इसके बावजूद वो सात -आठ साल के एक लड़के को थामे था। वह बूढ़ा उस लड़के को सहारा दे रहा था कि वह लड़का उस बुजुर्ग को थामे था, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन यह अहसास जरूर हुआ कि हम सब जड़ों में लिपटने की जुगत में रहते हैं। यही जुगत शायद जीने की आश को बचाए रखती है।


नहर के एक छोर पर उन दोनों को देखकर मुझे बाबूजी की याद सताने लगी। दरअसल हम सब स्मृति में जीवन तलाशते हैं। स्मृति की दूब हमेशा हरी बनी रहे, हम सब ऐसा सोचते हैं। कोई हमारे बीच से गुजरकर भी मन में एक पगडंडी बनाकर निकल जाता है, जिसकी लकीर पर हम जीवन भर चलते रहने की मंशा पाल बैठते हैं।  

लेकिन नियति जो चाहती, होता तो वही है। कबीर की वाणी ऐसे में मुझे याद आने लगती है। गाम का कबीराहा मठ मुझे खींचने लगता है। मैं खुद ही बुदबुदाने लगता हूं- कबीरा कुआं एक है..और पानी भरे अनेक..।

फिर जीवन में फकीर की खोज में लग जाता हूं तो कबीर का यह लिखा सामने आ जाता है-  "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे. सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली बला..।"  

आज गाम-घर करते हुए यही सब सोचता रहा। इस बीच धूप की दुनिया बादलों में कब बदल गयी पता भी नहीं चला। अचानक खूब बारिश होने लगी। बारिश की कई यादें हैं मन के भीतर, कई कहानियां हैं, कई नायक-नायिकाएं हैं..लेकिन फिलहाल धान के खेत का कैनवास ही मन में घर बनाए हुए है।  

बारिश से धान के खेतों की हरियाली और भी मायावी दिखने लगती है। बाबूजी का अंतिम संस्कार मैंने उन्हीं धान के खेतों के मुंडेर पर किया, जहां वे फसलों से अपनी और हम सबकी दुनिया रचते थे। हमारी साल भर की रोजी-रोटी के लिए जी-तोड़ मेहनत करते थे। ट्रैक्टर से घंटों खेतों को समतल करते थे।

देखिए न उन खेतों में अब धान के संग कदम्ब अपनी कविता-कहानी हमें सुनाने की जिद कर रहा है। इस अहसास के साथ कि बाबूजी भी ये सब सुन रहे होंगे, मैं आंखें बंद कर उन्हें याद कर लेता हूं। यह जानकर कि मेरा यह भरम भी टूट जाएगा एक दिन...  

हर रोज शहर से गांव करते हुए इन दिनों एक साथ ऐसी ही कई चीजें मन में चलती है। तबियत ठीक नहीं रहने की वजह से लिखना कम हो गया है। ड्राइविंग और लेखन से थोड़ी दूरी बनाने को डाक्टर ने कहा है, दोनों ही अति-प्रिय चीज...जा रे जमाना..हर कुछ पर पाबंदी। डाक्टर भी न ..लेकिन करना तो वही होगा..। 

कम बारिश की वजह से खेती-बाड़ी इस बार मन माफिक नहीं होगी, ये पता है लेकिन इसके बावजूद हार मानने वाले हम हैं नहीं। बाबूजी अक्सर कहते थे- ‘ किसानी करते हुए निराशा के बादल खूब मंडारते हैं, उन बादलों को बस बरस जाने दो...।’ 

आज खेती-किसानी और बारिश के बहाने बस इतना ही।

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