नज़ीर अकबराबादी - बचपन
क्या दिन थे यारो
वह भी थे जबकि भोले भाले ।
निकले थी दाईं लेकर फिरते कभी ददा ले ।।
चोटी कोई रखा ले बद्धी कोई पिन्हा ले ।
हँसली गले में डाले मिन्नत कोई बढ़ा ले ।।
मोटें हों या कि दुबले, गोरे हों या कि काले ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।1।।
दिल में किसी के हरगिज़ ने शर्म ने हया है ।
आगा भी खुल रहा है, पीछा भी खुल रहा है ।।
पहनें फिरे तो क्या है, नंगे फिरे तो क्या है ।
यां यूं भी वाह वा है और वूं भी वाह वा है ।।
कुछ खाले इस तरह से कुछ उस तरह से खाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।2।।
मर जावे कोई तो भी कुछ उनका ग़म न करना ।
ने जाने कुछ बिगड़ना, ने जाने कुछ संवरना ।।
उनकी बला से घर में हो क़ैद या कि घिरना ।
जिस बात पर यह मचले फिर वो ही कर गुज़रना।।
माँ ओढ़नी को, बाबा पगड़ी को बेच डाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।3।।
कोई चीज़ देवे नित हाथ ओटते हैं ।
गुड़, बेर, मूली, गाजर, ले मुंह में घोटते हैं ।।
बाबा की मूंछ माँ की चोटी खसोटते हैं ।
गर्दों में अट रहे हैं, ख़ाकों में लोटते हैं ।।
कुछ मिल गया सो पी लें, कुछ बन गया सो खालें ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।4।।
जो उनको दो सो खालें, फीका हो या सलोना ।
हैं बादशाह से बेहतर जब मिल गया खिलौना ।।
जिस जा पे नींद आई फिर वां ही उनको सोना ।
परवा न कुछ पलंग की ने चाहिए बिछौना ।।
भोंपू कोई बजा ले, फिरकी कोई फिरा ले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।5।।
ये बालेपन का यारो, आलम अजब बना है ।
यह उम्र वो है इसमें जो है सो बादशाह है।।
और सच अगर ये पूछो तो बादशाह भी क्या है।
अब तो ‘‘नज़ीर’’ मेरी सबको यही दुआ है ।
जीते रहें सभी के आसो-मुराद वाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।6।
मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Tuesday, January 30, 2007
अलविदा इस दुनिया से कमलेश्वर का



आप इस दिल में हमेशा से हैं और रहेंगे..मेरे-कमलेश्वर.......................................................................................................................
पत्रकार, पटकथा लेखक, समीक्षक, कथाकार...
न जाने कितनी ही भूमिकाएँ और सभी में एक ख़ास पहचान,
एक मज़बूत पकड़ और ज़मीनी समझ.
कमलेश्वर के लेखन का परिचय कुछ ऐसा ही है.
Sunday, January 28, 2007
"संथाली टोला"..

दुनिया की "दुनियादारी" से कोसों दुर है यह "संथाली टोला" ! संथाली टोला मतलब आदिवासी बस्ती. पुरनिया जिला के श्रीनगर प्रखंड से मात्र ५ कि.मी. की दुरी पर है यह बस्ती. टेलिफोन बुथो के अध्ययन के दौरान जब मैं यहाँ पहुंचा तो पता चला कि यहाँ से कुछ ही दुरी पर एक संथाली टोला है... फिर क्या, चल पङा मै देखने "संथाली टोला"..
समय चाहे कितना भी आगे बढ गया हो,पर इस टोले की जीवन-शैली आज भी वही पुरानी है.......... जंगली जानवरों का शिकार करना, जंगली कुत्तों से रखवाली करवाना.., देशी शराब का जम कर भोग करना...! यहां जिन्दगी बस एक हीं गति मे चलती है.
पारम्परिक हथियार -"तीर्-धनुष्" यहाँ आज भी आपको अपना करतब करते दिखाई देगें.आंगनों से गीतो की मधुर आवाजें(संथाली लोकगीत्) आपको बरबरस अपनी ओर खिंच लेंगे. यहाँ के लोगों का पहनावा भी कुछ खास नहीं बदला है...मर्द लुंगी पहनते और लपेटते हैं तो औरतें लाल्-हरी बार्डर वाली सफेद साङी लपेटे रहती है..काले-काले चेहरों में चमचमाते दाँत गजब की लगती है..............
घनी आबादी वाले इस टोले का हर घर कला का नायाब नमुना है..मिट्टी के बने घर और उसमे फूल्-पत्तियों की कारीगरी आपको बस यहीं मिलेगी..जी हां सबकुछ मिट्टी के...मै ये सब देख हीं रहा था कि युवकों की एक टोली एक जानवर को दो बाँसों के बीच लट्काए आ गए उन्हीं मे से एक से मैने पुछा "क्या है ये"? तो तीतर मांझी ने कहा-"ई हट्टा (जानवर्)है,बेंत के जंगल मे छुपा रहता है,इसको तीर से मारे हैं..बडा है,शाम में इसी का खाना होगा और साथ में होगा एकदम मस्त देशी शराब...!"ये लोग तो अपनी धुन में मस्त थे,मैं थोङा आगे बढा, टोले के प्रमुख (मरङ)हरदेव मांझी से मिलने.उम्र ७० साल पर अभी भी एकदम मस्त्....पर वह मुझ से खुलकर कुछ नहीं बोले..पता नहीं क्यों...................इस टोले की एक अलग हीं दुनिया है..बदलाव का एकमात्र निशान -शंकुल मांझी का मोटर साईकल्! बगल के गाँव के एक बडे किसान के बङे भुखंड पर ये लोग खेती करते हैं...सब मिलकर !कुछ पल में जैसे खो गया,कि शंकुल मांझी गाँज़ा फुंकते मेरे आगे आ गया..मुस्कुराता चेहरा मानो कह रहा हो-----------------
"हर फिक्र को धुऐं में उङाता चला गया
ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया...."
Saturday, January 27, 2007
अंदर की बात (मीडिया) है..

मेरे कमरे मे उनका आना-जाना लगा रहता है, मुझे वे प्रभावित करते हैं. जैसे अंदर के वैसे बाहर के,सपाट ढंग से बातो को कहने मे माहिर हैं. मीडिया से जुडे हैं तो बातो को रखने की कला मे भी महारत हासिल है..जो भी वो मुझे भाते हैं...बस..!
कल शाम मे घुमते-फिरते डेरा पे आये...कहे कि थोडा उधर से आया हूं..दर असल उनके ढेर सारे ताल्लुकात है.साहित्य हो या फिर उनके अपने वैचारिक साथी हर जगह उनका आना- जाना लगा रहता है. वो आये तो गप्प के पिटारे भी साथ लाये. दर असल उनके पास गप्पो का लंबा कारंवा भी साथ साथ चलता है.
अब उनकी बातो पर मैं सिधे आता हूं.. ओह नाम तो बताना भूल ही गया...नाम अखबारी दुनिया मे कुछ और है..मैं उन्हे पुकारता हूं- बाबा भैया. अपने भोजपुरिया बेल्ट से ताल्लुक रखते हैं. वे जिस अखबार मे काम करते है वहा कई लड्किया काम करती है.. उसी मे दो की रिर्पोट उन्ही की खल्ल्लास---जुबानी पेश कर रहा हूं (बाबा भैया की अनुमति अभी नही मिली है....देखा जायेगा..डांट खा ली जाएगी..)
बाबा भैया आफिस मे बैठे थे कि दिमाग मे खुलबली मची (वैसे मचती ही रह्ती है..एक्टीव पर्सन की यही खासयित होती है.) तो सामने संपादन का कार्य कर रही लड्की को बोले-"मैंने राममनोहर लोहिया की इंटरव्यू ली है..! तो उसे देख लेना.. (उ तेरी कामाल का रिर्पोटर है..मरे हुए आदमी का इंटरव्यू भी ले आता है..(मेरा विचार)) अभी तक उस लड्की के दिमाग का बल्ब नही जला..है. उसने प्रिंट मागा तो अपने बाबा भैया तो है ही नं वन , उन्होने किसी अन्य समाजवादी शख्स का इंटरव्यू लड्की के हाथ मे थमा दिया..उसके मुख्य सिरे में लिखा था- लोहिया के चेले..आदि..आदि.
अरे अब तक लड्की यही समझ रही थी कि स्व. लोहिया का ही इंटरव्यू है. धत तेरे कि पढा नही क्या ? शायद नही..(देखे पत्रकारिता की नयी दुनिया). अब बाबा भैया की नजर दूसरी लड्की पर है. उसके संग उनका संवाद देखें- अरे तुम तो कल कनाट प्लेस की ओर जा रही हो..लड्की ने सकारात्मक उत्तर दिया. बाबा ने कहा ऐसा करना मैने लोहिया जी का इंटरव्यू लिया तो तुम उनके घर जाकर उनका फोटो खिंच आना. यह लड्की भी कमाल की निकली ..बोली ठीक है..अच्छा उनका घर कहां है? बाबा भैया ने कुछ बता दिया.
आफिस में कुछ लोग हंस भी रहे थे,लेकिन इन दोनो महारथियो को कोई खास प्रभाव नही पडा ,पड्ता भी कैसे वो दोनो तो खुद को ठीक समझ रही थी.. हाय रे लोग क्या समझ कर इस पत्रकारिता जगत मे आत हैं..!
खैर ये दोनो लडकिया खुश थी कि चलो मैं एडिट कर लूंगी और दूसरी खूश थी कि कल लोहिया जी की फोटो खिंच आउंगी.
बाबा भैया की बात यही थी...लेकिन अंदाजा लगाऐ मीडिया के इस चेहरे का,, भले बाद मैं संपादक महोदय ने जब पुरे घट्नाक्रम को समझा तो बात कुछ जरुर हुई होगी ऐसा मेरा अंदाजा है.. लेकिन ..क्या कहूं...
Thursday, January 25, 2007
कोसी की गुंडागर्दी भी बदली भैया...

कोसी की गुंडागर्दी भी बदली भैया...
कोसी का इलाका बाढ और बालू से यदि अभिशप्त है तो यकिन मानिए यहा की गुडागर्दी भी क्लासिकल कैटोगरी मे बंटी है , इसमे लगातार बदलाव भी आ रहा है. यह वही इलाका है जिसके बारे मे कहा जाता था- "जहर न खाउ ,माहुर न खाउ, मरबाक हो तो पुर्णिया आउ." यहां अभी भी सैकडो एकड जमीन के मालिक बडे संख्या मे है.ये लोग खास जमीन्दारी स्टाइल मे जिंदगी गुजार रहे हैं.जिसकी जितनी जमीन वह उतना ही बलवान्...मतलब बाहुबली. ओमकारा के ओमी भैया तो यहां टोले-टोले मे मिल जायेगे आपको. दर असल यहा जमीन न केवल अन्न उपजाने का जरिया है अपितु जमीन की बहुलता से ही यहा के लोगो की सियासी तकदीर बनती और बिगड्ती है. हर गांव मे किसी खास बाबू के हाथो मे जमीन का बडा भाग है. चले अब आपको गुंडागर्दी के लाइन पर ले चलें- ७०-८० के दशक मे जहां संभ्रात बनकर गुंडागर्दी चला करती थी, वही ९० के बाद संभ्रांत तबका भी बाहुबली स्टाइल मे अपनी चाल चलने लगा है.यदि आपने बिहार के इस भाग के किसी भी इलाके का दौरा किया है तो तस्वीर समझ मे आ जायेगी. यहा व्यक्ति के नाम से गांव जाना जाता है, परेशान मत होइए न ! चूंकि गर गांव मे किसी एक परिवार के हाथो मे सैकडो एकड जमीन होती है, और वही होता है गांव का बाहुबली. उपज होती है-धान,पटसन. दलहन तो सुरक्षा के लिए अपनी सेना. जहां पहले ट्रेक्टर्..जीप ..राजदूत मोटरसाइकाल और पारंपरिक दो-नलिया बंदुक बाहुबलि परिवार का द्वेतक हुआ करता था, अब होता है-सूमो..बोलेरो..स्क्रपियो और ...हथियार की तो बत ही नहीं.पढते वक्त आपको यह वर्णन भले ही नकारात्मक लगता हो लेकिन यकिअन मानिए सच्चाइ से आंख छिपाना बेईमानी होगी...मेरे लिए.धमदाहा, रुपोली,भवानीपुर कुछ ऐसे जगह है जो आपको चंबल से कम न लगेंगे. जमीन की बदौलत यहां की राजनीति काफी नमकीन होती है जनाब.. विधायक जी यदि अपने इलाके के विधायक है तो गांव मे कोई और ही विधायक होता है. द्ण्डवत प्रणाम की प्रथा तो यहां शुरु से ही है. ६०-७० के दशक मे नक्षत्र मालाकार नाम का डाकु यहा का सबसे बडा डकैत हुआ करता था...लेकिन बडे भुपतियो के साथ उसका रिश्ता मधुर हुआ करता था. संबध के अच्छे होने का कारण कुछ तो होगा हीं...ऐसी मेरी छोटी बुद्धी मानती है खैर ! उस समय ड्कैती गुंडागर्दी की सर्वोच्य शिखर होती थी..पर समय के बदलने के साथ ही यह अब निकृष्टतम समझने जाने लगी है. ड्राइंग रुम डील का चलन अब सबसे ज्यादा है. शायद इसी कारण जमीन्दारो की एक बडी जमात अब जिला मुख्यालय मे अपने आउट हाउस मे डेरा डाले रहती है.बदलाव का यह नया रुप आपको कई परतो के अंदर ले जायेगा.जमीन्दारो को अब अपने ही खास लोगो से डर सताने लगा है,ये वही लोग है जिसे इनलोगो ने अपने काम के लिए यूज किया था ..अब वे तो ओमी भैया बन गये है. बडे भूपति अब साप्ताहिक छुट्टी मे गांव आते हैं.....आखिर यही तो है नये बाहुबलियो का रौब ! पुर्णिया, सहरसा, मधेपुरा, किशनगंज आदि जिलो मे ये काम बखुबी चल रहे है,नेपाल,बंगलादेश नजदीक होने कारण वहां से भी लोग यहां आ रहे है...शायद यही है कोसी का नया रुप...खास मार्डन-लुक.अगर विशाल भारद्वाज इस इलाके को घुमे तो उनके लिए एक नयी स्क्रीप्ट तैयार मिलेगी.
Monday, January 22, 2007
छोटे शहरो की शन्ति कभी उबाउ नही होती है,
छोटे शहरो की शन्ति कभी उबाउ नही होती है, खासकर् बडे शहरो की सरगर्मी और दफ्तरी वादविवादो की गहमागहमी से! किन्तु छॉटे शहरो की सौम्य खामौशी भी अब मुखर होने लगी है. जो कुछ बडे शहरो मे तेजी से हो रहा है, वही कुछ छॉटे शहरो मे कुछ धिरे से हो रहा है, लेकिन हर जगह इन दिनो चीजे इतनी तेजी से और लगातार बदल रही है कि धीरे-धीरे "बदलाव" शब्द का मतलब भी बदलने लगा है.
छॉटे शहरो मे भी विभिन्न स्तरो पर बदलाव आया है. चौक- चौराहौ पर शाम ढ्लते ही लगने वाली भीड जो पहले गाव की चौपालो की तरह लगती थी , अब वह शहरी मानसिकता को ओढे लगती है. परिवार मे ऐसे फासले आये है कि नजदिकी रिश्ते भी अपना वजुद खोने लगे है. आत्मालाप का चलन ज्यादा हो गया है, तो दुसरी और सन्वादहीनता की छविया परिवार मे ज्यादा छाने लगी है.
आखिर ऐसा क्यो हो रहा है? एक बात जो उभर कर मेरे सामने आ रही है- वह है-छॉटे शहरो के तकरीबन प्रत्येक परिवार से युवा आज बडे शहरो मे जा रहे है... चाहे वे दिल्ली विश्वविद्याल्य मे पढ्ने आए हो या फिर गुरगाव या नोयाडा के काल सेन्टरो मे काम करने, ये "व्याइट्-कालर माईग्रेन्ट्" खुद तो यहा आकर बदल ही जाते है और जब भी (कभी कभार) अपने शहर जाते है तो वहा भी वही कुछ देखना चाहते है- बदलाव.
ये युवा अपने शहरो को धडक-धडक धुआ उडाते आधुनिक महानगरो के आमन्त्र्ण पर पिछे छोड आए आज के "बन्टी और बबली" है! यकिन मानिए एसा करने से अपना शहर पिछे छुट जाएगा. मैलाआचल का प्रशान्त हो या परतीपरीकथा का जीतु इन की तरह हमे आगे बढ्ना होगा.
छॉटे शहरो मे भी विभिन्न स्तरो पर बदलाव आया है. चौक- चौराहौ पर शाम ढ्लते ही लगने वाली भीड जो पहले गाव की चौपालो की तरह लगती थी , अब वह शहरी मानसिकता को ओढे लगती है. परिवार मे ऐसे फासले आये है कि नजदिकी रिश्ते भी अपना वजुद खोने लगे है. आत्मालाप का चलन ज्यादा हो गया है, तो दुसरी और सन्वादहीनता की छविया परिवार मे ज्यादा छाने लगी है.
आखिर ऐसा क्यो हो रहा है? एक बात जो उभर कर मेरे सामने आ रही है- वह है-छॉटे शहरो के तकरीबन प्रत्येक परिवार से युवा आज बडे शहरो मे जा रहे है... चाहे वे दिल्ली विश्वविद्याल्य मे पढ्ने आए हो या फिर गुरगाव या नोयाडा के काल सेन्टरो मे काम करने, ये "व्याइट्-कालर माईग्रेन्ट्" खुद तो यहा आकर बदल ही जाते है और जब भी (कभी कभार) अपने शहर जाते है तो वहा भी वही कुछ देखना चाहते है- बदलाव.
ये युवा अपने शहरो को धडक-धडक धुआ उडाते आधुनिक महानगरो के आमन्त्र्ण पर पिछे छोड आए आज के "बन्टी और बबली" है! यकिन मानिए एसा करने से अपना शहर पिछे छुट जाएगा. मैलाआचल का प्रशान्त हो या परतीपरीकथा का जीतु इन की तरह हमे आगे बढ्ना होगा.
Sunday, January 21, 2007
निठारी का सच्..

निठारी का सच्..
पापा मुझे निठारी जाना है, मुझे न वो घर देखना है जहां के बारे मे टीवी पर दिखाय जाता है...ये कुछ बाते है जो इन दिनो अक्सर कानो मे सुनाई दे जाते है,कुछ दिन पहले निठारी जाना हुआ. उस घर को देखने जहां मानवता की उन सारी व्याख्या को तार-तार किया गया जिसके बारे मे शब्द मेरे पास नही है. कलंक..कलंक और कलंक..मनसिक बिमारी और क्या.
खैर्, अब तो वह कु-कोठी पर्यटको का स्पाट बन गया है. फोटो के लिए तो फ्लेश चमकते रहते है. वही भेंट हुई अगंद सिन्ह से, उम्र तकरीबन पांच साल, अब भला वह क्यो आया था यहां, यह सवाल है न ! लेकिन खुद अगंद से सुनिए-" मैं न वह घर देखने आया हुं जहां पर बच्चो को मारा गया है....हड्डिया कहा है? वो नाला कित्थे है? जहां खुन दिखता था...वह बोलता जा रहा था. जो मारा है न उसे गोली मार दी जानी चाहिए.." अंगद के पिता चरण सिन्ह बताते है कि "अरे भाई इसने तो तंग कर दिया था कि वह घर देखना है .....मैं भी देखना चाहता था, सो पूरी फैमेलि यहा आ गयी.हर कोई आखें फाड फाड कर देख रहा था. दर असल चैनलो के कारण इस कोठी के बारे मे हर कोई जान ही चुका है लेकिन प्रत्यक्ष देखने की लालसा हर किसी मे है.
अंगद के ही परिवार को लें, बसंत कुंज से यहां आये हैं, लेकिन क्या बस देखने से सब कुछ हो जायेगा? ये सवाल था सेक्टर ३१ मे पान-सिगरेट बेचने वाले हरिशंकर का. बकौल हरिशंकर्- कुछ नही होने वाला बडे लोगो का, पैसा है, कैस को लट्काये रखेंगे ......साल पर साल गुजर जायेगा ...सरकार नयी आए तो भी नही ..अखिर बडे लोग है न !
बहुत सारी बाते सुनने और देखने को मिली इस कु-कोठी के पास ..!
अगर बातो को नजर अंदाज न किया जाए तो सरकारी तंत्र की कमजोरियो को हरि भाई बयां कर रहे है.
क्या यही है निठारी का सच्.....!
Saturday, January 20, 2007
आखिर क्यो न हो जब शादी ही इतनी खास है...



अब तो शादी होने वाली है, वाह-वाह रामजी जोडी क्या बनाई?सुनने मे आया है कि बच्चन ब्रिगेड का बाजार मूल्य अब ७०० करोड का हो जायेगा.सलाम बच्चन ब्रिगेड्. बच्चन फेमिली के एक करीबी पत्रकार मित्र तो इन दिनो मुंबई नगरिया मे ही डेरा डाले हुए हैं. दर असल वो बीग बी के खास है और इस विवाह को मीडिया मे भी खास बनाना चाहते है.आखिर क्यो न हो जब शादी ही इतनी खास है...
Friday, January 19, 2007
कन्हैयालाल नंदन की ग़ज़लें- दिल से गहरा न कोई समंदर मिला
कन्हैया लाल नंदन साहित्य के जाने पहचाने नाम है, उनकी गजलो को बीबीसी मे पढ्ने को मिला. उसी को यहां प्र्स्तुत कर रहा हुं.
गिरीन्द्र
कन्हैयालाल नंदन की ग़ज़लें
एक
अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझे
मैं तुम्हारा हूँ, तुम तो संभालो मुझे.
ज़िंदगी! सब तुम्हारे भरम जी लिए
हो सके तो भरम से निकालो मुझे.
मोतियों के सिवा कुछ नहीं पाओगे
जितना जी चाहे उतना खँगालो मुझे.
मैं तो एहसास की एक कंदील हूँ
जब भी चाहो बुझा लो, जला लो मुझे.
जिस्म तो ख़्वाब है,
कल को मिट जाएगा
रूह कहने लगी है, बचा लो मुझे.
फूल बन कर खिलूँगा,
बिखर जाऊँगा
ख़ुशबुओं की तरह से बसा लो मुझे.
दिल से गहरा न कोई समंदर मिला
देखना हो तो अपना बना लो मुझे
****
दो
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए
मैं परिंदा हूँ उड़ने को पर चाहिए.
मैंने माँगी दुआएँ, दुआएँ मिली
उन दुआओं का मुझ पे असर चाहिए.
जिसमें रहकर सुकूँ से गुज़ारा करूँ
मुझको एहसास का ऐसा घर चाहिए.
ज़िंदगी चाहिए मुझको
मानी भरी चाहे कितनी भी हो मुख़्तसर चाहिए.
लाख उसको अमल में न लाऊँ
कभी शानो-शौकत का सामाँ मगर चाहिए.
जब मुसीबत पड़े और भारी पड़ेतो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए.
(ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में डायलिसिस कराते हुए)
*****
तीन
जो कुछ तेरे नाम लिखा है,
लिक्खा दाने-दाने में वह तो तुझे मिलेगा,
चाहे रक्खा हो तहखाने में.
तूने इक फ़रियाद लगाई उसने हफ्ता भर माँगा
कितने हफ्ते और लगेंगे उस हफ्ते के आने में.
एक दिए की ज़िद है आँधी में भी जलते रहने की
हमदर्दी हो तो फिर हिस्सेदारी करो बचाने में.
आँसू आए देख टूटता छप्पर दीवारो-दर को
आख़िर घर था, बरसों लग जाते हैं उसे बनाने में.
कुछ तो सोचो रोज़ वहीं क्यों जाकर मरना होता है
शाम की कुछ तो साज़िश होगी सूरज तुम्हें दबाने में.
जाकर तूफ़ानों से कह दो जितना चाहें तेज़ चलें
कश्ती को अभ्यास हो गया लहरों से लड़ जाने में.
कौन मुहब्बत के चक्कर में पड़े बुरी शै है यारो!
मेरे दोस्त पड़े थे, सदियों मारे फिर ज़माने में.
**************************************
गिरीन्द्र
कन्हैयालाल नंदन की ग़ज़लें
एक
अपनी महफ़िल से ऐसे न टालो मुझे
मैं तुम्हारा हूँ, तुम तो संभालो मुझे.
ज़िंदगी! सब तुम्हारे भरम जी लिए
हो सके तो भरम से निकालो मुझे.
मोतियों के सिवा कुछ नहीं पाओगे
जितना जी चाहे उतना खँगालो मुझे.
मैं तो एहसास की एक कंदील हूँ
जब भी चाहो बुझा लो, जला लो मुझे.
जिस्म तो ख़्वाब है,
कल को मिट जाएगा
रूह कहने लगी है, बचा लो मुझे.
फूल बन कर खिलूँगा,
बिखर जाऊँगा
ख़ुशबुओं की तरह से बसा लो मुझे.
दिल से गहरा न कोई समंदर मिला
देखना हो तो अपना बना लो मुझे
****
दो
हर सुबह को कोई दोपहर चाहिए
मैं परिंदा हूँ उड़ने को पर चाहिए.
मैंने माँगी दुआएँ, दुआएँ मिली
उन दुआओं का मुझ पे असर चाहिए.
जिसमें रहकर सुकूँ से गुज़ारा करूँ
मुझको एहसास का ऐसा घर चाहिए.
ज़िंदगी चाहिए मुझको
मानी भरी चाहे कितनी भी हो मुख़्तसर चाहिए.
लाख उसको अमल में न लाऊँ
कभी शानो-शौकत का सामाँ मगर चाहिए.
जब मुसीबत पड़े और भारी पड़ेतो कहीं एक तो चश्मेतर चाहिए.
(ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में डायलिसिस कराते हुए)
*****
तीन
जो कुछ तेरे नाम लिखा है,
लिक्खा दाने-दाने में वह तो तुझे मिलेगा,
चाहे रक्खा हो तहखाने में.
तूने इक फ़रियाद लगाई उसने हफ्ता भर माँगा
कितने हफ्ते और लगेंगे उस हफ्ते के आने में.
एक दिए की ज़िद है आँधी में भी जलते रहने की
हमदर्दी हो तो फिर हिस्सेदारी करो बचाने में.
आँसू आए देख टूटता छप्पर दीवारो-दर को
आख़िर घर था, बरसों लग जाते हैं उसे बनाने में.
कुछ तो सोचो रोज़ वहीं क्यों जाकर मरना होता है
शाम की कुछ तो साज़िश होगी सूरज तुम्हें दबाने में.
जाकर तूफ़ानों से कह दो जितना चाहें तेज़ चलें
कश्ती को अभ्यास हो गया लहरों से लड़ जाने में.
कौन मुहब्बत के चक्कर में पड़े बुरी शै है यारो!
मेरे दोस्त पड़े थे, सदियों मारे फिर ज़माने में.
**************************************
एक प्ले जिसे देखने का मौका मिला- फ्रेम्
दिल्ली विश्वविद्धालय की एक खासियत है कि यहां पर पढाई के साथ आप बहुत सारे काम कर सकते है जो खास तौर पर आपको पसंद है, मसलन ड्रामा, म्युजिक और न जाने कितने शौक और आपके अरमान.
इससे अगर रुबरु आपको होना है तो घुमे यहां के कालेजो में.. कालेज के अलावे भी अलग्-अलग जगहो पर स्टुडेन्ट्स अपने कला को दिखाते आए है.
कुछ ऐसा ही देखने को मिला आक्सफोर्ड बुक स्टोर में. लेडी इरवीन कालेज के स्टुडेन्ट्स ने एक खुबशूरत प्ले का मंचन किया तो कालेज के पुराने दिन याद आ गये. फ्रेम नाम के इस प्ले में दुनिया के लोगो के देखने के नजरिये को सपाट ढंग से प्रस्तुत किया गया.
कालेज की लड्कियो ने अलग अंदाज मे अपनी कलाकारी दिखायी.. आप किस नजर से दुनिया को देखते हैं ? यही थीम है इस प्ले का. हमारे ..आपके और न जाने कितने लोगो के अंदाज है , जो साफ अलग है.. क्योंकि हम सभी का नजरिया साफ अलग है इस दुनिया को देखने का.
तकरीबन पचास की संख्या मे देखने के लिए लोग आए थे. सभी को फ्रेम अच्छा लगा..आखिर क्यो न लगे....उन्ही का तो फ्रेम था.
जरा बता दूं आक्सफोर्ड बुक स्टोर के बारे में, यहां किताबो के अलवे भी एक दुनिया है जिसे डायलोग क्लब कहते हैं.
दिल्ली वालो के लिए यह क्लब एक प्लेट्फार्म मुहैया कराता है...ताकि हम अपने विचार रख सके,,सभी के सामने.अब आप भी, यदि दिल्ली मे है तो जरुर चक्कर लगाये यहां का. अ ..रे.. काफी नजदीक है. स्टेट्मैन हाउस मे ही है यह बुक स्टोर.. तो जाये और लुत्फ उठाये किताबो का और गाहे-बगाहे प्ले और अन्य डायलोग से मुखातिब होवें.
इससे अगर रुबरु आपको होना है तो घुमे यहां के कालेजो में.. कालेज के अलावे भी अलग्-अलग जगहो पर स्टुडेन्ट्स अपने कला को दिखाते आए है.
कुछ ऐसा ही देखने को मिला आक्सफोर्ड बुक स्टोर में. लेडी इरवीन कालेज के स्टुडेन्ट्स ने एक खुबशूरत प्ले का मंचन किया तो कालेज के पुराने दिन याद आ गये. फ्रेम नाम के इस प्ले में दुनिया के लोगो के देखने के नजरिये को सपाट ढंग से प्रस्तुत किया गया.
कालेज की लड्कियो ने अलग अंदाज मे अपनी कलाकारी दिखायी.. आप किस नजर से दुनिया को देखते हैं ? यही थीम है इस प्ले का. हमारे ..आपके और न जाने कितने लोगो के अंदाज है , जो साफ अलग है.. क्योंकि हम सभी का नजरिया साफ अलग है इस दुनिया को देखने का.
तकरीबन पचास की संख्या मे देखने के लिए लोग आए थे. सभी को फ्रेम अच्छा लगा..आखिर क्यो न लगे....उन्ही का तो फ्रेम था.
जरा बता दूं आक्सफोर्ड बुक स्टोर के बारे में, यहां किताबो के अलवे भी एक दुनिया है जिसे डायलोग क्लब कहते हैं.
दिल्ली वालो के लिए यह क्लब एक प्लेट्फार्म मुहैया कराता है...ताकि हम अपने विचार रख सके,,सभी के सामने.अब आप भी, यदि दिल्ली मे है तो जरुर चक्कर लगाये यहां का. अ ..रे.. काफी नजदीक है. स्टेट्मैन हाउस मे ही है यह बुक स्टोर.. तो जाये और लुत्फ उठाये किताबो का और गाहे-बगाहे प्ले और अन्य डायलोग से मुखातिब होवें.
Wednesday, January 17, 2007
कोसी का इलाका......रेणु की कथा भूमि
फणीश्वर नाथ रेणु और उनकी कथाभूमी
पुणिया शहर से २२ कि.मी. की दुरी पर स्थित है चम्पानगर. व्यस्थित बाज़ार वाला इलाका, नजदीक के गांवों का एकमात्र बडा बाजार. सड्कें तंदरुस्त है और बिजली भी यहाँ पहुंच चुकी है. मेरा पहुंचना यहाँ यूं ही नही हुआ. दरअसल मैं कोसी के कुछ पुराने बाजारों देखना चाहता था...सो यहां आना हुआ. साथ हीं पता चला कि इस इलाके में एक एनजीओ महिलाओ के विकास के लिए जोर शोर से काम कर रहा है. मैं मन ही मन खुश हुआ कि लगे हाथ दो काम हो जाऐगें....
यह इलाका काफी पुराना है..और समृद्ध भी. बिहार के एक बडे ज़मीन्दार परिवार "बनैली राज" का यहाँ अधिपत्य हुआ करता था. इसी परिवार की ५२ साल की एक महिला यहाँ "निखार" के नाम से एक एनजीओ चला रही है. इस महिला ने लडकियों को सबल बनाने का बीडा उठाया हुआ है. की लडकियां जुट के कालीन बनाती है और वह दिल्ली, कोलकाता और मुंबई के बाज़ारों में खुब बिकती है. एनजीओ परिक्रमा के बाद मैं अपने मुख्य उदेश्य बाजार देख्नने निकल पडा. यहाँ के बाजार आपको मेले की याद ताज़ा कर देगी. रेणु ने "मैला आँचल" में इस बाजार(चम्पानगर मेला) का ज़िक्र किया है.यहां का बाजार आज आधुनिकता के चादर में खुद को लपेट रहा है.. सिनेमा हाल जैसी नयी दुनिया इस इलाके में आ गयी है. बाजार में आपको हर कुछ मिल जाएगा. यहां कपडों का बडा बाजार लगता है. खाद व्यवसायी हरी साह् (उम्र ६२ साल् बताते हैं" २० साल पहले भी यह बाज़ार पुरे इलाके का मुख्य बाज़ार था..आज तो यह पुरनिया से थोडा ही कम है..." इस बाजार से जब आगे बढा तो एक बोर्ड पर मेरी नज़र ठहर गयी.. लिखा था...."राजेन्द्र मेहता,खाद के अधिकृत विक्रेता.चम्पानगर..आवास-प्राणपट्टी."प्राणपट्टी पढते ही मैं चौंक पडा ! अरे ये तो रेणु के "परती परिकथा" का प्राणपट्टी है... जितू का इलाका.... उपन्यास का संपूर्ण पात्र मेरे जहन मे शोर मचाने लगा. अब मै प्राणपट्टी की ओर जाने का बना लिया.. (इस बात से अनजान कि क्या रेणु की प्राणपट्टी यही है..!) बाजार से वहां पहुचने में मुझे आधे घंटे लगे. तब तक दोपहर ढल चुकी थी. यह एक सघन आबादी वाला टोला है, बांसों की सुन्दर कारीगीरी यहाँ देखने को मिली. शहर के "बाउन्ड्ररीवाल" के बद्ले यहाँ बांस को फाडकर कैपंस को घेरा जाता है... इसका अंदाज बेहद बिंदास होता है.. किन्तु मन की छटपटाहट कुछ और जानने को थी. मुझे प्राणपट्टी को जानना था...इसके लिए मेरी नज़र ऐसे व्यक्ति को खोज रही थी जो छ्;-सात दशक के घट्नाक्र्म को बयां कर सके.. युवक जो राह चलते मिल रहे थे वे मुझे एक अजीब नजर से देख रहे थे मानो "ये कौन आ गया?" कि मेरी नज़र एक व्यक्ति पर ठहर गयी.. चेहरे पे झुर्री..सफेद बाल, दांत गायब्,, इन्हें देखकर मेरे जहन में इस बात की पुष्टी हो गयी कि हो सकता है कि जनाब कुछ बताएं.. मैं उनके पास पहुंचा, बात के जाल को आगे बढाने की अस्त्र चलाया, दर असल कोसी के इलाके में बात को बढाने के लिए काफी मसक्त करनी पड्ती है. वहां लोग अपनी ही बात ज्याद करते है, गांव की बातें, बदलते समय की दास्तां...और हां गुंडागर्दी तो बात की मुख्य आर्कषण होती है. लेकिन मेरी छटपटाहट तो कुछ और जानने को थी. सो ,मुझसे रहा न गया और मैं पूछ बैठा- आपने फणिश्वर नाथ रेणु को सुना है..? हलदर मेहता नामक ये वृद्ध कुछ देर आंखे मूंदे रहे , फिर बोले- काहे न पहचानेगें हो..अरे बहुत बडे लिखने वाले थे.. खुब लिखे, अपने इलाके बारे में तो इतना लिखनकिन हैं कि और बचले क्या है लिखने के लिए. .चम्पानगर साइड खूब आते थे. राजा साहब के ड्योढी पर आना होता था. सब टोला घुमते थे. खुब बतियाते थे लोगन से. उनकी यही खुबी थी. बात बनाने में तो रेणु माहिर थे. कहानी के लोग तो ऐसे ही गांव के टोला से उ ले जाते थे. मैं चुपचाप मेहता जी की बातें सुनता जा रह था. रंग बिरंगी बातों का सिलसिला जारी था. मैं ने कुछ देर थम कर पूछा- "परती परिकथा में जो प्राणपुर पट्टी का ज़्रिक है क्या यह वही प्राणपुर है? " मेहता साब सोचते हुए बोले- बबुआ जी रेणु इस मामले में कुछ अलग थे, कहां कौन सा इलाका छाप देते ,हम कुछ बता नही पायेगें. मेरे सवाल धडा का धडा ही रह गया.. शाम हो चुकी थी और मुझे फिर पुर्णिया जाना था, सो मेहता जी को सलाम करता वहां से निकल पडा. लेकिन खुद-बुदाहट दिल मे जारी था. खैर ! देर रात पुर्णिया पहुंचा. सुबह शहर के कुछ बुद्धिजीवियों का जमघट हुआ तो कल के अनुभव बताने लगा, बातो ही बातो मे पता चला की कटिहार जिला मे भी एक प्राणपुर है, और वहां भी रेणु अक्सर जाया करते थे. वैसे रेणु ने खुद लिखा है कि उनका कथादेश तो पुरा कोसी का इलाका ही है, सो यह सोचकर की शायद चम्पानगर वाला ही प्राणपुर हो.... मेरे जितु की परती भूमि या आज के कोसी की जुबान में जितु का इलाका..
इन शहरी बुद्धिजिवीयो के मुख से कई बाते ऐसी भे निकली जिसे सुनकर मुझे अच्छा न लगा. एक महाशय ने बताया कि "रेणु कुछ ज्यादा ही लिख डाले है पुर्णिया के बारे में, अरे जिसके पास ज़मीन है .ज्यादा है तो बुराई क्या है.दर असल ये वही लोग थे जिनके पास विशाल परती जमीन है और अपने शहर के आउट हाउस से गांव की बागडौर संभाल रहे है.
मैं अबाक था, मेरी बुद्धि को मानो लकवा मार दिया हो.
शायद कोसी की संस्कृति बदली नही है...मैला आंचल से लेकर परती परीकथा की कोसी अभी भी जमीन के मामले मे वैसी ही है जैसी तब थी.
पुणिया शहर से २२ कि.मी. की दुरी पर स्थित है चम्पानगर. व्यस्थित बाज़ार वाला इलाका, नजदीक के गांवों का एकमात्र बडा बाजार. सड्कें तंदरुस्त है और बिजली भी यहाँ पहुंच चुकी है. मेरा पहुंचना यहाँ यूं ही नही हुआ. दरअसल मैं कोसी के कुछ पुराने बाजारों देखना चाहता था...सो यहां आना हुआ. साथ हीं पता चला कि इस इलाके में एक एनजीओ महिलाओ के विकास के लिए जोर शोर से काम कर रहा है. मैं मन ही मन खुश हुआ कि लगे हाथ दो काम हो जाऐगें....
यह इलाका काफी पुराना है..और समृद्ध भी. बिहार के एक बडे ज़मीन्दार परिवार "बनैली राज" का यहाँ अधिपत्य हुआ करता था. इसी परिवार की ५२ साल की एक महिला यहाँ "निखार" के नाम से एक एनजीओ चला रही है. इस महिला ने लडकियों को सबल बनाने का बीडा उठाया हुआ है. की लडकियां जुट के कालीन बनाती है और वह दिल्ली, कोलकाता और मुंबई के बाज़ारों में खुब बिकती है. एनजीओ परिक्रमा के बाद मैं अपने मुख्य उदेश्य बाजार देख्नने निकल पडा. यहाँ के बाजार आपको मेले की याद ताज़ा कर देगी. रेणु ने "मैला आँचल" में इस बाजार(चम्पानगर मेला) का ज़िक्र किया है.यहां का बाजार आज आधुनिकता के चादर में खुद को लपेट रहा है.. सिनेमा हाल जैसी नयी दुनिया इस इलाके में आ गयी है. बाजार में आपको हर कुछ मिल जाएगा. यहां कपडों का बडा बाजार लगता है. खाद व्यवसायी हरी साह् (उम्र ६२ साल् बताते हैं" २० साल पहले भी यह बाज़ार पुरे इलाके का मुख्य बाज़ार था..आज तो यह पुरनिया से थोडा ही कम है..." इस बाजार से जब आगे बढा तो एक बोर्ड पर मेरी नज़र ठहर गयी.. लिखा था...."राजेन्द्र मेहता,खाद के अधिकृत विक्रेता.चम्पानगर..आवास-प्राणपट्टी."प्राणपट्टी पढते ही मैं चौंक पडा ! अरे ये तो रेणु के "परती परिकथा" का प्राणपट्टी है... जितू का इलाका.... उपन्यास का संपूर्ण पात्र मेरे जहन मे शोर मचाने लगा. अब मै प्राणपट्टी की ओर जाने का बना लिया.. (इस बात से अनजान कि क्या रेणु की प्राणपट्टी यही है..!) बाजार से वहां पहुचने में मुझे आधे घंटे लगे. तब तक दोपहर ढल चुकी थी. यह एक सघन आबादी वाला टोला है, बांसों की सुन्दर कारीगीरी यहाँ देखने को मिली. शहर के "बाउन्ड्ररीवाल" के बद्ले यहाँ बांस को फाडकर कैपंस को घेरा जाता है... इसका अंदाज बेहद बिंदास होता है.. किन्तु मन की छटपटाहट कुछ और जानने को थी. मुझे प्राणपट्टी को जानना था...इसके लिए मेरी नज़र ऐसे व्यक्ति को खोज रही थी जो छ्;-सात दशक के घट्नाक्र्म को बयां कर सके.. युवक जो राह चलते मिल रहे थे वे मुझे एक अजीब नजर से देख रहे थे मानो "ये कौन आ गया?" कि मेरी नज़र एक व्यक्ति पर ठहर गयी.. चेहरे पे झुर्री..सफेद बाल, दांत गायब्,, इन्हें देखकर मेरे जहन में इस बात की पुष्टी हो गयी कि हो सकता है कि जनाब कुछ बताएं.. मैं उनके पास पहुंचा, बात के जाल को आगे बढाने की अस्त्र चलाया, दर असल कोसी के इलाके में बात को बढाने के लिए काफी मसक्त करनी पड्ती है. वहां लोग अपनी ही बात ज्याद करते है, गांव की बातें, बदलते समय की दास्तां...और हां गुंडागर्दी तो बात की मुख्य आर्कषण होती है. लेकिन मेरी छटपटाहट तो कुछ और जानने को थी. सो ,मुझसे रहा न गया और मैं पूछ बैठा- आपने फणिश्वर नाथ रेणु को सुना है..? हलदर मेहता नामक ये वृद्ध कुछ देर आंखे मूंदे रहे , फिर बोले- काहे न पहचानेगें हो..अरे बहुत बडे लिखने वाले थे.. खुब लिखे, अपने इलाके बारे में तो इतना लिखनकिन हैं कि और बचले क्या है लिखने के लिए. .चम्पानगर साइड खूब आते थे. राजा साहब के ड्योढी पर आना होता था. सब टोला घुमते थे. खुब बतियाते थे लोगन से. उनकी यही खुबी थी. बात बनाने में तो रेणु माहिर थे. कहानी के लोग तो ऐसे ही गांव के टोला से उ ले जाते थे. मैं चुपचाप मेहता जी की बातें सुनता जा रह था. रंग बिरंगी बातों का सिलसिला जारी था. मैं ने कुछ देर थम कर पूछा- "परती परिकथा में जो प्राणपुर पट्टी का ज़्रिक है क्या यह वही प्राणपुर है? " मेहता साब सोचते हुए बोले- बबुआ जी रेणु इस मामले में कुछ अलग थे, कहां कौन सा इलाका छाप देते ,हम कुछ बता नही पायेगें. मेरे सवाल धडा का धडा ही रह गया.. शाम हो चुकी थी और मुझे फिर पुर्णिया जाना था, सो मेहता जी को सलाम करता वहां से निकल पडा. लेकिन खुद-बुदाहट दिल मे जारी था. खैर ! देर रात पुर्णिया पहुंचा. सुबह शहर के कुछ बुद्धिजीवियों का जमघट हुआ तो कल के अनुभव बताने लगा, बातो ही बातो मे पता चला की कटिहार जिला मे भी एक प्राणपुर है, और वहां भी रेणु अक्सर जाया करते थे. वैसे रेणु ने खुद लिखा है कि उनका कथादेश तो पुरा कोसी का इलाका ही है, सो यह सोचकर की शायद चम्पानगर वाला ही प्राणपुर हो.... मेरे जितु की परती भूमि या आज के कोसी की जुबान में जितु का इलाका..
इन शहरी बुद्धिजिवीयो के मुख से कई बाते ऐसी भे निकली जिसे सुनकर मुझे अच्छा न लगा. एक महाशय ने बताया कि "रेणु कुछ ज्यादा ही लिख डाले है पुर्णिया के बारे में, अरे जिसके पास ज़मीन है .ज्यादा है तो बुराई क्या है.दर असल ये वही लोग थे जिनके पास विशाल परती जमीन है और अपने शहर के आउट हाउस से गांव की बागडौर संभाल रहे है.
मैं अबाक था, मेरी बुद्धि को मानो लकवा मार दिया हो.
शायद कोसी की संस्कृति बदली नही है...मैला आंचल से लेकर परती परीकथा की कोसी अभी भी जमीन के मामले मे वैसी ही है जैसी तब थी.
मैने पढा था,परखना मत परखने से कोई अपना नही रहता.
मैने पढा था,
परखना मत परखने से कोई अपना नही रहता.
उस समय केवल पढा था,
अब समझता हुं.
दर-दर भटक रहा हुं,
तो समझ रहा हुं.
नौकरी छोडे अब महिने हुए..
शायद केवल लिखने आने से कुछ नही होता,
अब तो ज़ुगार और पैरवी से सब कुछ हाथ में आता है..
सोचा था लिख पाता हुं,
शायद बात बन पडेगी.
लेकिन सोचने से क्या होता है?
दफ्तरी वाद्-विवादो को
मेरी बुद्दी कभी समझ नही पायी.
अब मै उसे समझ पा रहा हुं,
जब एक दफतर से दुसरे दफतर का चक्कर लगाता हुं.
लेकिन ए-खुदा
यदि तुम हो तो सुनो,
लिखने का जुनुन अभी भी है,
और अंत तक यह जुनुन जिंदा रहेगा,
कोई हिला नही सकता मुझे,
सुन रहे हो न !
मुझे विश्वास है,
कोई है इस महफिल्-ए-दुनिया में
जो मेरा सुनेगा..
जब तक पहले आफिस मे था
तो तमगा था
लोग सुनते थे,
पुछते थे
.घर पर बाबुजी भी पुछते थे,
खुश थे,
शायद पिता का पद होता ही है ऐसा,
नाक का सवाल होता है-एक बेटा.
वह चाहता है कि नाक की इज्जत बनी रहे बस
मां तो दिल से सोचती है न !
बेटा अच्छ आदमी बने बस.
लेकिन कैसे समझायें कि
खाने के लिए अन्न चाहिए,
रहने के लिए मकां और पहने के लिए मोटे कपडे,,,
तो लोग् इस शहर मे पुछते है..
लेकिन अब तो कोई पुछता भी नही..
मुझे खुद पर विश्वास है कि
इक दिन मेरा भी वक्त आयेगा,
मेरी बात सुनी जाएगी,
भले मै न बोलुं ,
मेरी बात सुनी जायेगी.....
वक्त ऐसा आयेगा...
परखना मत परखने से कोई अपना नही रहता.
उस समय केवल पढा था,
अब समझता हुं.
दर-दर भटक रहा हुं,
तो समझ रहा हुं.
नौकरी छोडे अब महिने हुए..
शायद केवल लिखने आने से कुछ नही होता,
अब तो ज़ुगार और पैरवी से सब कुछ हाथ में आता है..
सोचा था लिख पाता हुं,
शायद बात बन पडेगी.
लेकिन सोचने से क्या होता है?
दफ्तरी वाद्-विवादो को
मेरी बुद्दी कभी समझ नही पायी.
अब मै उसे समझ पा रहा हुं,
जब एक दफतर से दुसरे दफतर का चक्कर लगाता हुं.
लेकिन ए-खुदा
यदि तुम हो तो सुनो,
लिखने का जुनुन अभी भी है,
और अंत तक यह जुनुन जिंदा रहेगा,
कोई हिला नही सकता मुझे,
सुन रहे हो न !
मुझे विश्वास है,
कोई है इस महफिल्-ए-दुनिया में
जो मेरा सुनेगा..
जब तक पहले आफिस मे था
तो तमगा था
लोग सुनते थे,
पुछते थे
.घर पर बाबुजी भी पुछते थे,
खुश थे,
शायद पिता का पद होता ही है ऐसा,
नाक का सवाल होता है-एक बेटा.
वह चाहता है कि नाक की इज्जत बनी रहे बस
मां तो दिल से सोचती है न !
बेटा अच्छ आदमी बने बस.
लेकिन कैसे समझायें कि
खाने के लिए अन्न चाहिए,
रहने के लिए मकां और पहने के लिए मोटे कपडे,,,
तो लोग् इस शहर मे पुछते है..
लेकिन अब तो कोई पुछता भी नही..
मुझे खुद पर विश्वास है कि
इक दिन मेरा भी वक्त आयेगा,
मेरी बात सुनी जाएगी,
भले मै न बोलुं ,
मेरी बात सुनी जायेगी.....
वक्त ऐसा आयेगा...
Sunday, January 14, 2007
तो मैं जिंदा रहुंगा....
मैं जब मर जाउंगा,
तो मेरे अंगो को लेकर राजनीति मत करना.
निठारी के बच्चो की तरह्.
मैं पहले ही बता दू
कि मेरे अंगो के साथ तुम क्या-क्या कर सकते हो-
मेरी आंखे देना उस व्यक्ति को
जिसने कभी भी उगते सुरज को नही देखा हो,
जिसने किसी बच्चे के चेहरे या
किसी औरत की आंखो में झांकर प्यार न खोजा हो.
मेरा दिल उसे देना
जिसने अपने दिल के सिवा
किसी दिल को न पढा हो..
मेरा खुन उसे देना
जिसको जरुरत हो,
ताकि वह देख सके
अपने खेलते बच्चो को.
अरे भाई ले जाओ
मेरी हड्डीयां,
मेरे गुर्दे,
एक-एक भाग मेरे शरीर के.
और दे देना उस अंपग बच्चे को
ताकि वह चल सके अपने पैरों पर्,
अगर हिन्दु हो तो जला देना मुझे ..
मेरे खोखले शरीर को,
गर हो मुसलमान तो दफन कर देना,
दबा देना
मेरे शरीर को,
मेरे दोष को,
मेरी कमजोरीयों को,
मेरे सारे षडयंत्र को
जो मैने पाले थे
खुद अपने दोस्तो के लिए..
इतना कुछ करने के बाद भी
यदि याद करना चाहो मुझे
तो बोलना दो ही मिठे बोल ...
उसे जिसे जरुरत् है तुम्हारी.
यकिन मानो
यदि इतना सब तुम कर लोगे तो मैं जिंदा रहुंगा....
तो मेरे अंगो को लेकर राजनीति मत करना.
निठारी के बच्चो की तरह्.
मैं पहले ही बता दू
कि मेरे अंगो के साथ तुम क्या-क्या कर सकते हो-
मेरी आंखे देना उस व्यक्ति को
जिसने कभी भी उगते सुरज को नही देखा हो,
जिसने किसी बच्चे के चेहरे या
किसी औरत की आंखो में झांकर प्यार न खोजा हो.
मेरा दिल उसे देना
जिसने अपने दिल के सिवा
किसी दिल को न पढा हो..
मेरा खुन उसे देना
जिसको जरुरत हो,
ताकि वह देख सके
अपने खेलते बच्चो को.
अरे भाई ले जाओ
मेरी हड्डीयां,
मेरे गुर्दे,
एक-एक भाग मेरे शरीर के.
और दे देना उस अंपग बच्चे को
ताकि वह चल सके अपने पैरों पर्,
अगर हिन्दु हो तो जला देना मुझे ..
मेरे खोखले शरीर को,
गर हो मुसलमान तो दफन कर देना,
दबा देना
मेरे शरीर को,
मेरे दोष को,
मेरी कमजोरीयों को,
मेरे सारे षडयंत्र को
जो मैने पाले थे
खुद अपने दोस्तो के लिए..
इतना कुछ करने के बाद भी
यदि याद करना चाहो मुझे
तो बोलना दो ही मिठे बोल ...
उसे जिसे जरुरत् है तुम्हारी.
यकिन मानो
यदि इतना सब तुम कर लोगे तो मैं जिंदा रहुंगा....
Saturday, January 13, 2007
वाह गुरु
गुरुकांत देशाई को सिनेमा घर में देखकर मज़ा आ गया, ठीक एक साल पहले रंग दे बसंती देखकर इतना ही मज़ा आया था. सिनेमायी दुनिया फिल्मो को लेकर मैं कुछ ज्यादा ही उत्सुक रहता हुं. दर असल फ्राइडे फेक्टर मुझ पर पहले से ही हावी रहा है.
मणीरत्नम कभी भी लोगो को निराश नही करते है. हर बार उनकी फिल्म कुछ न कुछ खलबली मचाती ही आयी है. गुरु भी कुछ ऐसा ही करेगा, ऐसा फिल्मी-पंडित लोग कह रहे है. फिल्म की कहानी में दम है, संगीत खुबसुरत है....और बोल के क्या कहने, जब गुलज़ार की कलम गीतो को बोल देती है तो गजब ढहता ही है. बेस्वादी रतिया हो या फिर ओ-गुरु सब एक से बढकर एक्. कहानी मोटीवेट करती है. आपको सपने देखने के लिए कहती है. शायद आगे बढने के लिए जो पापड बेलने पड्ते है वह सबकुछ गुरु मे आपको थोक के भाव मिलेगा. आगे बढने के लिए जो तीकड्म आपको बनाने होते है वह भी गुरु आपको सिखाता नजर आता है. सबसे बडी बात -अपने छोटे सरकार अब राह पकड चुके है,बेहतरीन अदाकारी है उनका, मुंह से अनायस ही निकल पड्ता है-वाह गुरु. ऐर्श्वया राय भी काफी जंच रही है. साडी के आउट फिट मे तो वह गजब की लग रही है.फिल्म का फ्लो भी बांधता नजर आ रहा है.
आर्ट और कर्मशियल का जबरदस्त तड्का मणी भाई ने लगाया है.फिल्म को जरुर देखना चाहिए, अमिताभ बच्चन की पुरी परछाई अभिषेक मे आपको देखने को मिलेगी. मिथुन का भी किरदार भाडी भरकम है.
आप गुरु को देखे और आगे बढने का फार्मुला तैयार करे.....
मणीरत्नम कभी भी लोगो को निराश नही करते है. हर बार उनकी फिल्म कुछ न कुछ खलबली मचाती ही आयी है. गुरु भी कुछ ऐसा ही करेगा, ऐसा फिल्मी-पंडित लोग कह रहे है. फिल्म की कहानी में दम है, संगीत खुबसुरत है....और बोल के क्या कहने, जब गुलज़ार की कलम गीतो को बोल देती है तो गजब ढहता ही है. बेस्वादी रतिया हो या फिर ओ-गुरु सब एक से बढकर एक्. कहानी मोटीवेट करती है. आपको सपने देखने के लिए कहती है. शायद आगे बढने के लिए जो पापड बेलने पड्ते है वह सबकुछ गुरु मे आपको थोक के भाव मिलेगा. आगे बढने के लिए जो तीकड्म आपको बनाने होते है वह भी गुरु आपको सिखाता नजर आता है. सबसे बडी बात -अपने छोटे सरकार अब राह पकड चुके है,बेहतरीन अदाकारी है उनका, मुंह से अनायस ही निकल पड्ता है-वाह गुरु. ऐर्श्वया राय भी काफी जंच रही है. साडी के आउट फिट मे तो वह गजब की लग रही है.फिल्म का फ्लो भी बांधता नजर आ रहा है.
आर्ट और कर्मशियल का जबरदस्त तड्का मणी भाई ने लगाया है.फिल्म को जरुर देखना चाहिए, अमिताभ बच्चन की पुरी परछाई अभिषेक मे आपको देखने को मिलेगी. मिथुन का भी किरदार भाडी भरकम है.
आप गुरु को देखे और आगे बढने का फार्मुला तैयार करे.....
Wednesday, January 10, 2007
अयोध्या गाथा.......
दिल्ली की शाम के बारे में क्या कहा जाए खासकर ऐसे मुख से जिसने तंग सड्को पर धुल को उड्ते देखा है,जिसने सुरज के अस्त होते ही लालटेन की रोशनी से रात को निहारा है.उसके लिए तो दिल्ली की शाम सचमुच मर मिट्नेवाली होती है.
लेकिन यहा की शाम मे भी वह कभी_कभार अपने शहर की परछाई को देखता है, यह अलग बात है कि वह यह सबकुछ पर्दे पर देखता है. कुछ ऐसा ही देखने मिला इंडिया हैबिटेट के गुलमोहर हाल में.
युवा डाक्युमेंट्री फिल्ममेकर वाणी की फिल्म अयोध्या गाथा में अयोध्या की गलियों को काफी सहजता से पेश किया गया.
आप या हम जिस अयोध्या कि खबरिया जनाबों के द्वारा देखते या पढते है ठीक विपरीत उसके वाणी ने दिखया. हां यह अलग बात है कि एनडीटीवीवाले ऐसी सच्चाई को दिखाते आये है.मंदिर्-मस्जिद की राजनीति मे फंसीअयोध्या के बासिन्दे को वाणी ने बोलने का मौका दिया...तो सब् गुबार निकल पडे. मेले अट्खेलियां ..रामलला के दर्शन ....मस्जिद के अजान के बीच में भी वहां अब सियासत की बु आ रही. अब गलियो को देखकर कोई यह नही कह सकता है कि
तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे...
इक शाम चुडा लू गर बुरा न लगे..
पुलिस चौकी मे तब्दील हो चुकी अयोध्या के लोग अब परेशान नजर आते हैं. वाणी ने सबकुछ सपाट ढंग से पर्दे पर उतार डाला. वहां के लोगो की दास्तां सुनकर जहन में कुछ्-कुछ होने लगा.फुटेज और प्रतिक्रिया गजब के नजर आयी. शायद यही है अयोध्या गाथा. अपने एक दोस्त की जुबां पेश करुं तो इन सियासती लोगों की बत कह सकुं-
गंगा बोली मै सबसे बडी,
क्यो कि हर कोई मुझसे निकला.
शिव बोले मै सबसे बडा,
क्यो कि मेरी जटा से तु निकली.
हिमालय बोला मै सबसे बडा,
क्योकि मेरेपास तु ठहरा...
हनुमान बोले मै सबसे बडा ,
क्यो कि मै ने तुझे अपने हथेलीपर उठाया
संघ के लोग बोले मै ही सबसे बडा,,,
आखिर मेरी जेब मे तु सब..
अयोध्या के संग यही कु्छ हो रहा है, मंदर मस्जिद के बीच मे अपनी अयोध्या.......
आखिर मस्जिद् तो बना दी
शब भर मे इमां की हरारत वालो ने
मन अपना पुराना
पापी ठहरा बरसो मे नमाज़ी बन न सका...
लेकिन यहा की शाम मे भी वह कभी_कभार अपने शहर की परछाई को देखता है, यह अलग बात है कि वह यह सबकुछ पर्दे पर देखता है. कुछ ऐसा ही देखने मिला इंडिया हैबिटेट के गुलमोहर हाल में.
युवा डाक्युमेंट्री फिल्ममेकर वाणी की फिल्म अयोध्या गाथा में अयोध्या की गलियों को काफी सहजता से पेश किया गया.
आप या हम जिस अयोध्या कि खबरिया जनाबों के द्वारा देखते या पढते है ठीक विपरीत उसके वाणी ने दिखया. हां यह अलग बात है कि एनडीटीवीवाले ऐसी सच्चाई को दिखाते आये है.मंदिर्-मस्जिद की राजनीति मे फंसीअयोध्या के बासिन्दे को वाणी ने बोलने का मौका दिया...तो सब् गुबार निकल पडे. मेले अट्खेलियां ..रामलला के दर्शन ....मस्जिद के अजान के बीच में भी वहां अब सियासत की बु आ रही. अब गलियो को देखकर कोई यह नही कह सकता है कि
तुम्हारे शहर का मौसम बडा सुहाना लगे...
इक शाम चुडा लू गर बुरा न लगे..
पुलिस चौकी मे तब्दील हो चुकी अयोध्या के लोग अब परेशान नजर आते हैं. वाणी ने सबकुछ सपाट ढंग से पर्दे पर उतार डाला. वहां के लोगो की दास्तां सुनकर जहन में कुछ्-कुछ होने लगा.फुटेज और प्रतिक्रिया गजब के नजर आयी. शायद यही है अयोध्या गाथा. अपने एक दोस्त की जुबां पेश करुं तो इन सियासती लोगों की बत कह सकुं-
गंगा बोली मै सबसे बडी,
क्यो कि हर कोई मुझसे निकला.
शिव बोले मै सबसे बडा,
क्यो कि मेरी जटा से तु निकली.
हिमालय बोला मै सबसे बडा,
क्योकि मेरेपास तु ठहरा...
हनुमान बोले मै सबसे बडा ,
क्यो कि मै ने तुझे अपने हथेलीपर उठाया
संघ के लोग बोले मै ही सबसे बडा,,,
आखिर मेरी जेब मे तु सब..
अयोध्या के संग यही कु्छ हो रहा है, मंदर मस्जिद के बीच मे अपनी अयोध्या.......
आखिर मस्जिद् तो बना दी
शब भर मे इमां की हरारत वालो ने
मन अपना पुराना
पापी ठहरा बरसो मे नमाज़ी बन न सका...
Tuesday, January 09, 2007
GURU aur GULZAR

जागे है देर तक हम
कुछ देर सोने दो
थोडी सी रात और है
सुबह तो होने दो
आधे-अधुरे ख्वाब
जो पुरे नहो सके
इक बार फिर से
नींद मे वो ख्वाब बोने दो....
भाई दिल थामे मे रहिए अपने गुलज़ार चचा फिर धमाल मचाने वाले हैं, मणी भाई के संग और रहमान के हाथो अपने कलम को ज़ुबान दे रहे हैं,,,,समझे न! अरे गुरु सिनेमा घर में आने वाला है....तो सुनिए बेहतरीन गीत और खो जाइए.......
ये कुछ हैं....हाय दिल को छु जाती है....
ये कुछ हैं....हाय दिल को छु जाती है....मुन्न्वर राणा जी की तो बात ही निराली है...बिंदास अंदाज में सबकुछ् कह जाते है....आप या हम जिसके बारे बस सोच कर रह जाते हैं, तो गौर फरमाईये-
मियां मैं शेर हुं ,शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
मै लहजा नरम भी कर लुं तो झुंझलाहट नहीं जाती...
कोयल बोले या गौरया अच्छा लगता है
अपने गांव में सबकुछ भैया अच्छा लगता है
गंगा मैया तेरे गोद में अच्छा लगता है
माया मोह बुढापे में अच्छा लगता है
बचपन में एक रुपया हीं अच्छा लगता है
लिपट जाता हुं मां से मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दु में गज़ल कहता हुं हिन्दी मुस्कुराती है.
मियां मैं शेर हुं ,शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
मै लहजा नरम भी कर लुं तो झुंझलाहट नहीं जाती...
कोयल बोले या गौरया अच्छा लगता है
अपने गांव में सबकुछ भैया अच्छा लगता है
गंगा मैया तेरे गोद में अच्छा लगता है
माया मोह बुढापे में अच्छा लगता है
बचपन में एक रुपया हीं अच्छा लगता है
लिपट जाता हुं मां से मौसी मुस्कुराती है
मैं उर्दु में गज़ल कहता हुं हिन्दी मुस्कुराती है.
Monday, January 08, 2007
जरा इक पल इधर नजर दौडायें-
Saturday, January 06, 2007
अब सबकुछ छुट गया है न !

याद आ रही है गांव
की
पता नही क्यों इस शहर का हर शख्स परेशां लगता है
सच्चाई क्या है..इसे खोजने मे लगा हुं
इसी उधेडबुन में कि यह शहर इतना परेशान क्यो है..
परेशां शहर में गांव की याद आ गयी
आज कई बरस हो गये-------
गांव मे घुमे हुए
क्या पता काका होगे या नही
अरे हां घुमरी काकी की मछली-भात कितनी अच्छी होती थी ना !
कोशी के कछार पर पांव से धुल उडाना
और दोस्तो के संग दिन भर मटरगस्ती करना
अब सबकुछ छुट गया है न !
तो याद आता है..मेरा गांव्..
Friday, January 05, 2007
कैफे बनाम बुथ्
एक जमाना था जब टेलीफोन बुथ की अपनी खास जिंदगी हुआ करती थी.आप याद करे ९० के दशक मे बुथ के सामने लाईने लगा करती थी. उस समय का हाल कुछ और था.
यहां इन बातो को कहने का आशय यह है कि अब टेलीफोन बुथ का सामना साईबर कैफे से हो रहा है.गली-गली में साईबर कैफे का जाल बिछा हुआ है.अब तो लाइने यहा लगती है.
हुजुर्.. जब मुझे कैफे मे काम करना होता है तो आपरेटर भाई साहब बोलते है कि आप १५-२० मिनट के बाद आये, एन वक्त मुझे अपने शहर की उन दिनो की याद ताजा हो उठती है जब मै किसी टेलीफोन बुथ से फोन करने की इच्छा व्यक्त करता लेकिन बुथ पर तो लंबी लाइने लगी रह्ती थी! मै दिल्ली के अनेक इलाको का चक्कर लगाया तो कैफे की स्थिती हर जगह ऐसी ही नजर आयी.हर कोई नेट की दुनिया से इतना जुड चुका है कि वह मेल चेक किये बिना रह ही नही सकता. फोन तो मोबाईल के पास आकर सिमट गया है लेकिन कैफे नुमा जिंदगी अभी भी गलियो मे चुलक-फुदक कर रही है...म्दर असल आज ऐसा ही हो रहा है मेरे साथ शहर के इन कैफों मे ...सो लिख डाला एक चिट्ठा..
यहां इन बातो को कहने का आशय यह है कि अब टेलीफोन बुथ का सामना साईबर कैफे से हो रहा है.गली-गली में साईबर कैफे का जाल बिछा हुआ है.अब तो लाइने यहा लगती है.
हुजुर्.. जब मुझे कैफे मे काम करना होता है तो आपरेटर भाई साहब बोलते है कि आप १५-२० मिनट के बाद आये, एन वक्त मुझे अपने शहर की उन दिनो की याद ताजा हो उठती है जब मै किसी टेलीफोन बुथ से फोन करने की इच्छा व्यक्त करता लेकिन बुथ पर तो लंबी लाइने लगी रह्ती थी! मै दिल्ली के अनेक इलाको का चक्कर लगाया तो कैफे की स्थिती हर जगह ऐसी ही नजर आयी.हर कोई नेट की दुनिया से इतना जुड चुका है कि वह मेल चेक किये बिना रह ही नही सकता. फोन तो मोबाईल के पास आकर सिमट गया है लेकिन कैफे नुमा जिंदगी अभी भी गलियो मे चुलक-फुदक कर रही है...म्दर असल आज ऐसा ही हो रहा है मेरे साथ शहर के इन कैफों मे ...सो लिख डाला एक चिट्ठा..
Thursday, January 04, 2007
ये कैसा महापर्व -मेरे खुदा

ये कैसा पर्व
मैं जब गया ओखला तो रस्ते पर
काटी जा रही थी मासुम बकरियां और भैंसे-
हाय कैसा था वह आलम
क्या यही है जश्न का तरीका
खुदा क्या सोचता होगा....
हमे तो विरोध करने के लिये बोलती जुबान दी गयी है..
लेकिन उस मासुम को तो सिवाय मिमयाने को कुछ नही आता है..
मैं सहम गया था उन गलियों में
आज भी भैंसे मेरे नज़रो के सामने रो रही है.
ये कैसा महापर्व -मेरे खुदा
Subscribe to:
Posts (Atom)



