Saturday, January 27, 2007

अंदर की बात (मीडिया) है..


मेरे कमरे मे उनका आना-जाना लगा रहता है, मुझे वे प्रभावित करते हैं. जैसे अंदर के वैसे बाहर के,सपाट ढंग से बातो को कहने मे माहिर हैं. मीडिया से जुडे हैं तो बातो को रखने की कला मे भी महारत हासिल है..जो भी वो मुझे भाते हैं...बस..!

कल शाम मे घुमते-फिरते डेरा पे आये...कहे कि थोडा उधर से आया हूं..दर असल उनके ढेर सारे ताल्लुकात है.साहित्य हो या फिर उनके अपने वैचारिक साथी हर जगह उनका आना- जाना लगा रहता है. वो आये तो गप्प के पिटारे भी साथ लाये. दर असल उनके पास गप्पो का लंबा कारंवा भी साथ साथ चलता है.
अब उनकी बातो पर मैं सिधे आता हूं.. ओह नाम तो बताना भूल ही गया...नाम अखबारी दुनिया मे कुछ और है..मैं उन्हे पुकारता हूं- बाबा भैया. अपने भोजपुरिया बेल्ट से ताल्लुक रखते हैं. वे जिस अखबार मे काम करते है वहा कई लड्किया काम करती है.. उसी मे दो की रिर्पोट उन्ही की खल्ल्लास---जुबानी पेश कर रहा हूं (बाबा भैया की अनुमति अभी नही मिली है....देखा जायेगा..डांट खा ली जाएगी..)

बाबा भैया आफिस मे बैठे थे कि दिमाग मे खुलबली मची (वैसे मचती ही रह्ती है..एक्टीव पर्सन की यही खासयित होती है.) तो सामने संपादन का कार्य कर रही लड्की को बोले-"मैंने राममनोहर लोहिया की इंटरव्यू ली है..! तो उसे देख लेना.. (उ तेरी कामाल का रिर्पोटर है..मरे हुए आदमी का इंटरव्यू भी ले आता है..(मेरा विचार)) अभी तक उस लड्की के दिमाग का बल्ब नही जला..है. उसने प्रिंट मागा तो अपने बाबा भैया तो है ही नं वन , उन्होने किसी अन्य समाजवादी शख्स का इंटरव्यू लड्की के हाथ मे थमा दिया..उसके मुख्य सिरे में लिखा था- लोहिया के चेले..आदि..आदि.

अरे अब तक लड्की यही समझ रही थी कि स्व. लोहिया का ही इंटरव्यू है. धत तेरे कि पढा नही क्या ? शायद नही..(देखे पत्रकारिता की नयी दुनिया). अब बाबा भैया की नजर दूसरी लड्की पर है. उसके संग उनका संवाद देखें- अरे तुम तो कल कनाट प्लेस की ओर जा रही हो..लड्की ने सकारात्मक उत्तर दिया. बाबा ने कहा ऐसा करना मैने लोहिया जी का इंटरव्यू लिया तो तुम उनके घर जाकर उनका फोटो खिंच आना. यह लड्की भी कमाल की निकली ..बोली ठीक है..अच्छा उनका घर कहां है? बाबा भैया ने कुछ बता दिया.
आफिस में कुछ लोग हंस भी रहे थे,लेकिन इन दोनो महारथियो को कोई खास प्रभाव नही पडा ,पड्ता भी कैसे वो दोनो तो खुद को ठीक समझ रही थी.. हाय रे लोग क्या समझ कर इस पत्रकारिता जगत मे आत हैं..!
खैर ये दोनो लडकिया खुश थी कि चलो मैं एडिट कर लूंगी और दूसरी खूश थी कि कल लोहिया जी की फोटो खिंच आउंगी.
बाबा भैया की बात यही थी...लेकिन अंदाजा लगाऐ मीडिया के इस चेहरे का,, भले बाद मैं संपादक महोदय ने जब पुरे घट्नाक्रम को समझा तो बात कुछ जरुर हुई होगी ऐसा मेरा अंदाजा है.. लेकिन ..क्या कहूं...

3 comments:

शशि सिंह said...

समझ में नहीं आ रहा है कि इस पर हंसा जाये या रोया जाये. राजनीति में अपराधीकरण, प्रशासन में भष्ट्राचार, पुलिस में असंवेदनशीलता आदि-इत्यादि जाने कितनी बड़ी-बड़ी बातें हम मीडिया वाले करते हैं. हम भी शीशे के घरों में रहते हैं. देर-सवेर पत्थर तो पढ़ेंगे ही. आपके बाबा भैया जैसे लोग हैं तब तक तो उम्मीद है, पर डरता हूं कि उन लोगों के बाद क्या होगा?

Anonymous said...

वैसे मीडिया को बहुत कुछ सीखना है,जो दुसरों का स्टींग आपरेशन करते हैं अगर उनका भी कोई इसी प्रकार आपरेशन हो तो बहुत खुलासे सामने आ सकते हैं…बहुत कुछ कह डाला न कह्ते हुए…बधाई।

Anonymous said...

girindra ye bihari ada bhut acchi hai likhane ki, vaise in adhunik media valo se aap achaha anand lete rahte hai. fhilhal ye P3 ki bate hai, yahi log to media ki durgati karne par lage hai

Pramod yadav