Sunday, January 21, 2007

निठारी का सच्..


निठारी का सच्..

पापा मुझे निठारी जाना है, मुझे न वो घर देखना है जहां के बारे मे टीवी पर दिखाय जाता है...ये कुछ बाते है जो इन दिनो अक्सर कानो मे सुनाई दे जाते है,कुछ दिन पहले निठारी जाना हुआ. उस घर को देखने जहां मानवता की उन सारी व्याख्या को तार-तार किया गया जिसके बारे मे शब्द मेरे पास नही है. कलंक..कलंक और कलंक..मनसिक बिमारी और क्या.
खैर्, अब तो वह कु-कोठी पर्यटको का स्पाट बन गया है. फोटो के लिए तो फ्लेश चमकते रहते है. वही भेंट हुई अगंद सिन्ह से, उम्र तकरीबन पांच साल, अब भला वह क्यो आया था यहां, यह सवाल है न ! लेकिन खुद अगंद से सुनिए-" मैं न वह घर देखने आया हुं जहां पर बच्चो को मारा गया है....हड्डिया कहा है? वो नाला कित्थे है? जहां खुन दिखता था...वह बोलता जा रहा था. जो मारा है न उसे गोली मार दी जानी चाहिए.." अंगद के पिता चरण सिन्ह बताते है कि "अरे भाई इसने तो तंग कर दिया था कि वह घर देखना है .....मैं भी देखना चाहता था, सो पूरी फैमेलि यहा आ गयी.हर कोई आखें फाड फाड कर देख रहा था. दर असल चैनलो के कारण इस कोठी के बारे मे हर कोई जान ही चुका है लेकिन प्रत्यक्ष देखने की लालसा हर किसी मे है.
अंगद के ही परिवार को लें, बसंत कुंज से यहां आये हैं, लेकिन क्या बस देखने से सब कुछ हो जायेगा? ये सवाल था सेक्टर ३१ मे पान-सिगरेट बेचने वाले हरिशंकर का. बकौल हरिशंकर्- कुछ नही होने वाला बडे लोगो का, पैसा है, कैस को लट्काये रखेंगे ......साल पर साल गुजर जायेगा ...सरकार नयी आए तो भी नही ..अखिर बडे लोग है न !
बहुत सारी बाते सुनने और देखने को मिली इस कु-कोठी के पास ..!
अगर बातो को नजर अंदाज न किया जाए तो सरकारी तंत्र की कमजोरियो को हरि भाई बयां कर रहे है.
क्या यही है निठारी का सच्.....!

4 comments:

Anonymous said...

जानते हो गिरीन्द्र,
बहुत कम ही ऐसे लोग होते हैं जो कुछ करना चाहते हैं,सच कहा तुमने प्रत्यक्ष रुप से लीलाओं को होते देखना सभी चाहते हैं बस वो बचे रहें यही सोच कर्…

Anonymous said...

बहुत हृदय स्पर्शी प्रश्न..नाउत्तर जहां....यही है जिंदगी... ;(

संजय बेंगाणी said...

यही है सच.

Girindra Nath Jha said...

द्वियाभ भैया,
सच्चाई यही है, हर कोई देखने वाला बनना चाहता है, आखिर बिडा उठाने की हिम्मत किसी मे है ही नही, हां कुछ लोग है जिस पर नजरे समाज की टिकी है.
आपका
गिरीन्द्र्