Saturday, June 30, 2007

फणीश्वर नाथ रेणु : "त्रिलोचन के सॉनेट पढ़ते समय यह देह यंत्र "रामुरा झिं झिं" बजने लगता है................."




मेरे रेणु अक्सर लोगों को कलम के सहारे याद करते हैं, त्रिलोचन को याद करते हुए रेणु आज आपके सामने हैं.........("स्थापना" में सितम्बर 1970 में प्रकाशित "अपने-अपने त्रिलोचन" से ....)



कई बार चाहा कि, त्रिलोचन से पूछूँ- आप कभी पूर्णिया जिला की ओर किसी भी हैसियत से, किसी कबिराहा-मठ पर गये हैं? किन्तु पूछकर इस भरम को दूर नहीं करना चाहता हूं। इसलिए, जब त्रिलोचन से मिलता हूं, हाथ जोड़कर, मन ही मन कहता हूं- "सा-हे-ब ! बं-द-गी !!"

कविता मेरे लिए समझने-बूझने या समझाने का विषय नहीं, जीने का विषय है। कवि नहीं हो सका, यह कसक सदा कलेजे को सालती रहेगी। और, अगर कहीं कवि हो जाता तो, त्रिलोचन नहीं हो पाने का मलाल जीवन-भर रहता। संभव है तब त्रिलोचन के एक सॉनेट की एक पैरोडी लिखकर "सहस्त्रलोचन" नाम से प्रकाशित करवाने की हिमाकत भी कर बैठता।....और, मैं त्रिलोचन हीं क्यों होना चाहता- पन्त, नरेन्द्र, सुमन, बच्चन, महादेवी, दिनकर, नलिनविलोचन अथवा रेणु क्यों नहीं.? यह सवाल मैं अपने आपसे बार-बार पूछता रहता हूं।

त्रिलोचन ने अपने बारे में अपने मुंह से अपने सॉनेट में जो कुछ कहा है, उसके अतिरिक्त और कुछ जानने-सुनने की वासना मन में कभी नहीं जगी। और न कभी मन में लगनेवाली गुदगुदी को त्रिलोचन की गजलों को गुनगुनाकर सहलाया। गजल, काजी नजरूल की भी मुझे कभी नहीं रूची-जंची। त्रिलोचन के सॉनेट के लिए हीं मैं उसे "शबद योगी" कहता हैं। उसके कुछ सॉनेट हद-अनहद की सीमा को लांघकर- साखी, शबद, रमैनी की कोटि के हो गये हैं। त्रिलोचन ने बहुत कम लिखा है। अर्थात बहुत अल्प उत्पादन किया है। किन्तु मेरे लिए त्रिलोचन का होना मात्र उसकी रचनाओं से अधिक है। अतएव "सुपर मार्केट डिपार्टमेंट स्टोर संस्कृति" के बटखरों से त्रिलोचन को तोलने के लिए तुले हुए लघु गुरू आलोचकों से कभी बहस नहीं करना चाहता। बात बहककर साम्प्रदायिक युद्ध और जाति संघर्ष तक पहुंच जा सकती है। (बिहार को हीं जातिवाद के लिए नाहक बदनाम क्यों किया जाता रहा है....) और, भारत धर्मनिरपेक्ष देश है और इस सुरक्षा चैतन्य समाज में स्वयं को सुरक्षित रखना हीं जीवन का प्रथम प्रिन्सिपुल है।

मुझे त्रिलोचन के उस सॉनेट की पंक्तियां याद आयी, जिसमें दशाश्वमेध घाट के "चित्र-कल्प" हैं। सो मेरे लिए तो-

"दशाश्वमेध घाट पर गंगा की धारा है
तट पर जल के ऊपर ऊंचे(भवन नहीं)
त्रिलोचन खड़े हैं....।
"
कबीर को पढ़ते समय मेरा मन "भाई साधो" का हो जाता है। फारसी के कवि जलालुद्दीन रूमी का मैंने नाम सुना ही है। अर्थात विद्वानों के लेखों में उद्धृत उनकी पंक्तियों के भावानुवाद को पढ़कर ही रोम-रोम बजने लगते हैं। बंगाल के प्रसिद्ध बाउल गायक लालन फकीर के गीतों को सुनते समय "देहातीत" सुख का परस सा पाया है और त्रिलोचन के सॉनेट पढ़ते समय यह देह यंत्र "रामुरा झिं झिं" बजने लगता है और तन्मय मन को लगता है-

"वाणी से सावन फूटा ऋतुओं सहित,
भक्ति की गांठ कस गयी भींग-भींगकर,
आत्म- व्यंजना को जगा..........।"

(मैंने आत्म-व्यंजना ही लिखा है न.. आत्म-वंचना तो नहीं..?)
सा-हे-ब....बं-द-गी

त्रिलोचन (जी) को देखते ही हर बार मेरे मन के ब्लैक बोर्ड पर, एक अगणितक असाहित्यिक तथा अवैज्ञानिक प्रश्न अपने-आप लिख जाता है- वह कौन-सी चीज है, जिसे त्रिलोचन में जोड़ देने पर वह शमशेर हो जाता है और घटा देने पर नागार्जुन...............?

Friday, June 29, 2007

भगैत (भगत) आप जानते हैं.......


कोसी का इलाका यदि बाढ़ और बालू से अभिशप्त है तो यकीन मानिए यहां कुछ
ऐसा भी है, जिसे देख और सुनकर आप मस्ती के आलम में झूम सकते हैं। तो
चलिए, आपको ले चलते हैं कोसी के उन गावों में जहां आप रंग-बिरंगे,
चटकीले, मस्ताने या फिर गोसाईं जैसै गीतों का लुत्फ उठा सकें...।

फणीश्वर नाथ रेणु ने तो अपनी कृतियों ऐसे लोकगीतों को खूब उकेरा है। रेणु
के शब्दों में "ऐसे कईगीतों को सुनते समय "देहातीत" सुख का परस सा पाया
है और देह यंत्र मे "रामुरा झिं झिं" बजने लगता है .......।"

"विदापत-नाच" हो या फिर "भगैत" (भगत), आज भी यहां मौजूद है। विदापत-नाच
तो अब केवल सहरसा जिले में सिमट गया है लेकिन "भगैत" (भगत) आज भी कोसी
के तकरीबन सभी जिलों में खूब गाया और बांचा जाता है। दरअसल भगैत (भगत) एक
ऐसा लोकगीत है, जिसमें गीत के संग-संग डॉयलॉग भी चलता रहता है। कहानी के
फार्म में गायक अपने दल के साथ भगैत (भगत) गाता है। इसे सुनने के लिए
झुंड के झुंड लोग उस जगह जमा होते हैं जहां भगैत होता है। 10 से 11 लोगों
की एक टीम होती है जो भगैत गाते हैं। टीम के प्रमुख को "मूलगैन" कहते
हैं। अर्थात मूल गायक...। मूलगैन कहानी प्रारंभ करता है और फिर समां बंध
जाता है। हारमोनियम और ढ़ोलक वातावरण में रस का संचार करते हैं। दाता
धर्मराज, कालीदास, राजा चैयां और गुरू ज्योति, भगैत के मुख्य पात्र होते
हैं। ये पात्र तो हिन्दू के लिए होते हैं। मुसलमानों के लिए "मीरा साहेब
" प्रमुख पात्र माने जाते हैं। मुस्लिम के लिए होने वाले भगैत को "मीरन"
कहा जाता है।

यहां बोली जाने वाली ठेठ मैथिली में भगैत और मीरन गाया जाता है। गौर करने
लायक बात यह है कि इस कथा-गीत में अंधविश्वास सर-चढ़कर बोलता है। मसलन
मूलगैन पर भगवान आ जाते हैं। वह जो कुछ बोल रहा है, वह ईश्वर-वाणी समझी
जाती इस कार्यक्रम बलि-प्रथा और मदिरा की खूब मांग होती है।

48 घंटे तक अनवरत चलने वाले इस कार्यक्रम का आयोजन अक्सर गांव के बड़े
भू-पति हीं करते हैं। क्योंकि इसके आयोजन में अच्छा-खासा खर्च होता है।
अक्सर फसल कटने के बाद हीं ऐसे आयोजन होते हैं। क्योंकि उस वक्त किसान के
पास अनाज और पैसे कुछ आ ही जाते हैं। हाल ही मैं पूर्णिया जिला के धमदाहा
में "भगत-महासम्मेलन" का आयोजन हुआ था। कोसी के अलावा अन्य जिलों से भी
कलाकार इस सम्मेलन में पहुंचे थे। किन्तु जिस उत्साह से कोसी में भगैत को
मंच मिलता आया है,वह अन्य जगहों में नहीं दिखता है। किसानों के बीच इसके
लोकप्रिय होने का मुख्य कारण यह है कि यहां के गावों में अंधविश्वास का
बोलबाला आज भी काफी है।

वैसे जो भी हो, भगैत एक कला के रूप में अलग हीं दुनिया में बसता है। यहां
के लोग-बाग में यह रच-बस गया है। मूलगैन (मूल गायक-टीम लीडर) कहता है न-

" हे हो... घोड़ा हंसराज आवे छै............
गांव में मचते तबाही हो...............
कहॅ मिली क गुरू ज्योति क जय....."

हिन्दी अनुवाद-
( सुनो सभी, घोड़ा हंसराज आने वाला है,
गांव में मचेगी अब तबाही,
सब मिलकर कहो गुरू ज्योति की जय )

Thursday, June 28, 2007

India to host World toilet summit

स्वास्थ्य के क्षेत्र में स्वच्छता महत्वपूर्ण विषय है। यह पूरे विश्व की समस्या है। शौचालय की समस्या से दुनिया के कई देश संघर्ष कर हैं। भारत पहली बार विश्व शौचालय सम्मेलन का आयोजन करने जा रहा है।
इस सम्मेलन के विषय में अधिक जानकारी के लिए आप इस आलेख को पढ़ सकते हैं। यह आलेख मूल रूप में अंग्रेजी में है, इसे मूल रूप में यहां पेश किया जा रहा है......
India to host World toilet summit
NEWDELHI:For the first time in the history, India will host the World Toilet Summit, the biggest international event in the field of sanitation. With the theme, “Toilet for all” the event will attract hundreds of experts from three dozen countries to exchange their views towards the progressive development and standardization of public toilet services. This was announced by Dr.Bindeshwar Pathak, the founder of Sulabh International, the organization which is jointly organizing this event with World Toilet Organisation, Singapore in New Delhi between October 31 and November 3, 2207. Stimulating platform for networking, sharing of ideas, and sourcing solutions and innovations for the improvement of toilets and hygiene standards, the main aim of this world summit is to develop strategies to widen the sanitation coverage.
According to Dr. Pathak, the summit will be an excellent meeting opportunity for the exchange of information, ideas and know-how with international experts on toilet-related topics. Large number of delegates representing different countries, UN agencies, N.G.Os, local bodies, town planners and policy makers are likely to take part to discuss the issue of sanitation and sustainable development during the summit.
The World Toilet Organization has chosen Sulabh to organize such even due to its contribution in the field of sanitation movement and indigenous low cost toilet system.
Its founder Dr. Pathak, a Padma bhushan recipient, is known for his low cost toilets technology which he had designed over three decades ago and which is now becoming a byword for sanitation in developing countries all over the world. The Indian government recently honoured him with Indira Gandhi Paryavaran Puraskar which is given to the pioneers who come out with ideas and projects that can reduce pollution and are environment friendly.
It may be mentioned here that the UNDP, in its latest Human Development Report, had appreciated Sulabh founder's initiatives in bringing about a change.''Sulabh has emerged as one of the world's largest non-governmental providers of sanitation facilities,'' the report said.
President APJ Abdul Kalam, in his latest book, Mission India, has also mentioned the contribution of Dr Pathak in the field of sanitation and liberation of scavengers.


For more visit- www.worldtoiletsummit2007.org

Wednesday, June 27, 2007

मृदुला ने उठाया बीड़ा


"हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले..."
लेकिन हर एक कि खवाहिश ऐसी नहीं होती है। बहुतों की ख्वाहिश दूसरों के लिए भी होती है। इसी कड़ी में एक ऐसी महिला का नाम है, जिसने महानगरों की हाई-प्रोफाइल जिंदगी को एक हीं झटके में छोड़कर बिहार के एक गांव की लड़कियों को बदलने का बीड़ा उठा लिया। मृदुला सिंहा नाम की यह महिला 1998 में बिहार के एक गांव में बसने का मन बनाया। पूर्णिया जिले एक गांव चम्पानगर में 1998 में इन्होंने नींव डाली एक संस्था की और नाम रखा "निखार"। तपती दुपहरी हो या फिर कपकपाती ठंड, हर पल यह 53 वर्षीय महिला गांव की लड़कियों को बदलने का काम करती रही। इस उपेक्षित गांव में लड़कियां पूरी तरह पिछड़ी हुई थी, लेकिन आज की तस्वीर साफ अलग है। यहां की लड़कियां जूट के कालिन बनाती है, ब्यूटीशियन का कोर्स करने के बाद अपने हम उम्रों को संवारती है, और अपनी तकदीर खुद लिख रही है।

मृदुला सिंहा बताती है ".शुरू में तो जैसे लग रहा था अब कुछ नहीं होने वाला, लड़कियां घर से नहीं निकलती थी, लेकिन मैंने धैर्य बनाए रखा और आज तो मेरा कारवां आसमां को छूने की ज़िद कर रहा है।" मृदुला जी अपनी पूरी जिंदगी हीं निखार को समर्पित कर चुकी है। सपनों को पूरा करने की एक मिशाल उन्होंने कायम की है। लड़कियों को सबल बनाने के बाद मृदुला जी लड़कों के लिए भी काम करेगी। दरअसल इस महिला के पास योजनाओं का पूरा भंडार है, यदि योजनाऐं यूं ही सफल होती जाती है तो यकीन मानिए समाज का आर्दश रूप चंपानगर में देखने को मिलेगा।
दिल्ली हाट, मुंबई और कोलकाता में इस संस्था द्वारा बनाए गए सामान धड़ल्ले से बिक रहे हैं। दरअसल यह कहानी आगे बढ़ाने के लिए है। आखिर किसी को तो बीड़ा उठाना हीं पड़ेगा। इसके लिए न तो संसद में बिल पास करने की आवश्यकता है और न हीं नेताओं के वादों की। उन लोगों के लिए तो मृदुला सिंहा एक प्रेरणा की मिशाल है, जो समाज को बदलने का ख्वाब रखते हैं। दिल्ली, मुंबई आदि महानगरों में रहने वालों की ख्वाहिशें अब उस जड़ की तरफ जानी चाहिए, जहां की ख्वाहिशें अभी तक सोई हुई है। आज "निखार" नामक यह संस्था गांव की आधी आबादी को जहां शिक्षा की राह दिखाई, वहीं रोजगार का भी बंदोबस्त कराया। एक महिला की चाहत ने अनेकों जिंदगी बदल डाली। खासकर महिलाओं को ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता है, क्योंकि आंकड़ों के जाल में भी समाज का यह तबका पिछड़ा हुआ है। विकास नहीं हुआ है का रोना रोने से भला है कि मृदुला जी की तरह खुद विकास का बीड़ा उठाया जाए। तो क्यों न निखार का यह रूप चमचमाते हुए और गांवों को एक नयी राह दिखाए..।
मृदुला जी अक्सर गुनगुनाती है-
"अपना गम ले के कहीं और न जाया जाए,
घर में बिखरी हुई चीज को सजाया जाए....।"

Monday, June 25, 2007

धक्के का समाजशास्त्र- आप बतकही के मुड में हैं क्या

धक्के का समाजशास्त्र
“धक्का” कई तरह का होता है, इसे आप परिभाषित नहीं कर सकते हैं। तो भी आप धक्के को कुछ ग्रुप में बांट सकते हैं, मसलन जीवन में धक्का, सड़क पे धक्का, चलते-चलते धक्का और न जाने ऐसे कितने धक्के। एक बात धक्के के बाद हीं समझ में आती है, वह यह कि आप सभंलने की कोशिश करते हैं..। खैर, एक धक्का जो अक्सर दिल्ली वालों को खाना पड़ता है, वह है “बस में धक्का ”....। आप इसे रेलम-पेल भी कह सकते हैं।

अधिकतर दिल्ली वाले इस धक्के से त्राहि-माम किए रहते हैं। लेकिन कुछ इस धक्के को सुख भी मानते हैं। धक्के के ऐसे अनेक रुपों को लेकर बतकही करने के मुड में आज साड्डी दिल्ली है।

बस का धक्का सचमुच अलग होता है। इसे चखने के लिए आपको चढ़ना होगा दिल्ली के रोड़ पर दौड़ते-चिल्लाते बसों पर। मतलब सवारी करनी होगी। इसका असली मजा यदि आपको लेना है तो इसके लिए दो उपयुक्त समय है। एक सुबह 9 से 10 बजे के बीच या फिर शाम 5 से 7 बजे के बीच। विशेषज्ञों की यदि माने तो यह वक्त दिल्ली में रोज आता है..। इस धक्के के लिए रूट मायने नहीं रखता है, जिस भी रुट में चढ़िए धक्के से आप रु-ब-रु हो सकते हैं।

इस धक्के से कईयों की रोजी-रोटी भी चलती है। पॉकेट-मार भैया इसी श्रेणी में आते हैं। पूर्वी दिल्ली के कल्याणपुरी-त्रिलोकपुरी आदि इलाकों में ऐसे कई भैया रहते हैं। धक्के को लेकर आप घबराना मत, क्योंकि यह दिल्ली का “धुव्र सत्य” है। इस धक्के से सुख लेने वालों की भी संख्या कम नहीं है। एक गैर सरकारी संस्था इस “सुख सिद्धांत” का सर्वे कर रही है। रिर्पोट जल्द हीं आने वाली है, मिलते ही आपको सूचित किया जाएगा। वैसे सर्वे के प्रारंभिक नतीजे गुड्डू की लेंग्वेज में “मस्त” है।
तो साहेबान, धक्के को लेकर तैयार रहिए। यह कभी भी लग सकता है और कहीं भी। “बस” तो, बस एक बहाना है....।

Friday, June 22, 2007

Friends, be a good journalist. Think for society and down-trodden…”


“Friends, be a good journalist. Think for society and down-trodden…”
– शिवनाथ झा


चार पन्नों की एक जीवंत विचार अखबार “मीडिया स्कैन”
की एक रिर्पोट मैंने अनुभव में छापी तो तुरंत एक कामेंट मेरे ब्लाग पर आया। यह कामेंट किसी और का नहीं बल्कि पत्रकारिता जगत के जाने-पहचाने नाम शिवनाथ झा का था। मेरे दौर के अधिकतर पत्रकार इस नाम से वाकिफ हैं। संर्घष का दूसरा नाम यदि ये हैं, तो कहना गलत नहीं होगा। खासकर मेरे लिए यह गौरव का क्षण था, क्योंकि शिवनाथ झा स्वयं जो मेरे ब्लाग पर थे।
आजकल आप अपनी किताबों को लेकर चर्चा में बने हुए हैं। पहले “बिस्मिलाह” खान को लेकर फिर “इंडिया कालिंग” को लेकर। इन दिनों आप अपने मोनोग्राफ “लालू प्रसाद- इंडियाज माइरेकल” को लेकर चर्चा में बने हुए हैं।
उनका कामेंट खुद में एक कहानी है, इसलिए उसे सामने लाना हमारा दायित्व बनता है। दरअसल शिवनाथ झा जी ने अपनी बात अंग्रेजी में कही, इस कारण उसका हिन्दी रूप मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। ..लेकिन अंत में उन्होने जो कहा है, उसे उसी रूप में यहां पेश कर रहा हूं-
“Friends, be a good journalist. Think for society and down-trodden…”

अब पूरी बात-

यह सचमुच खुशी की बात है। एक सच्ची पत्रकारिता वह नहीं है, जिसे हम प्रतिदिन महानगरों में देखते और पढ़ते हैं। मैं “हॉकर” से पत्रकार बना हूं।
बिहार के प्रसिद्ध पटना विश्वविद्यालय से मैंने स्नातकोत्तर किया है। आठ साल तक पटना की गलियों में मैंने साईकल से अखबार बांटा है। 1968 से 1975 तक मैंने यह काम किया, 1975 में ही मुझे “द इंडियन नेशन”- (पटना का प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक) में कॉपी होल्डर की नौकरी मिली। उस समय से मैंने पढ़ाई की ओर भी ध्यान दिया और अपने परिवार के लिए रोटी भी जुटायी।
एक दफे पत्रकारिता का स्वाद चखने के बाद यह तो मेरे लिए नशा सा बन गया। तब तक मैं बिहार और बंगाल के कई हिस्सों में काम कर चुका था।
1988 में मेरी जिंदगी में एक मोड़ आया, देश के प्रसिद्ध पत्रकार एम.जे.अकबर ने मुझे ब्रेक दिया। पत्रकारिता के मुख्य धारा में मेरा प्रवेश उन्होंने ही कराया। “टेलिग्राफ” के लिए बतौर स्ट्रींगर मैंने काम शुरू किया।
इसके बाद काम का दौर जैसे चल पड़ा। “द इंडियन एक्सप्रेस”, “द स्टेट्समेन”, “द एशियन एज” आदि अखबारों में काम करता चला गया।
मोनोग्राफ लिखने के क्रम में कई बातें जेहन में समाती गयी। निचले तबके के लिए, समाज का वह तबका, जो उपेक्षित है.................

दोस्तों, एक अच्छे पत्रकार बने, अच्छाई के लिए सोचें, समाज के लिए सोचें, समाज के उस तबके के बारे में सोचें जो सबसे नीचे है..........

- शिवनाथ झा

लगे हाथ, प्रैस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने शिवनाथ जी के कार्यों के विषय में जो कुछ कहा, उसका भावानुवाद-

चार साल पहले, जब उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को पैसों का अभाव था, उस समय भारत सरकार ने उनकी सहायता के लिए पार्लियामेंट एनेक्सी में उनका हीं कार्यक्रम आयोजित करवाया।
इसके बाद हीं नीना (शिवनाथ झा की धर्मपत्नी) - शिवनाथ झा ने एक कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की उन शिक्षाविदों, संगीतकारों, कलाकारों के लिए जिन्होने देश का नाम रोशन किया। नीना-शिवनाथ झा ने एक मोनोग्राफ तैयार की उस्ताद साहेब पर। इस से होने वाले फायदे को इस जोड़ी ने खान साहेब को समर्पित किया। उस्ताद की अंतिम इच्छा कि इंडिया गेट पर शहनाई बजाऊं, को भी इस दंपति ने पूरा करने की ठान ली थी। भारत सरकार ने इस कार्यक्रम को हरी झंडी दिखा दी थी।
लेकिन उस्ताद का सपना पूरा न हो सका........शहनाई सम्राट ने अलविदा कह दिया...।

Thursday, June 21, 2007

"कामत की परिभाषा..? उत्पत्ति..?"- फणीश्वर नाथ रेणु


फणीश्वर नाथ रेणु का रचना संसार समुद्र की भांति है, अथाह..अनंत..। आंचलिकता को खुद में समेटने वाले रेणु कोसी के ग्राम अंचलों को खूब उकेरा है। इनके सभी पात्र जीवंत रहे... अपनी लेखनी के जरिए रेणु अपने जीवन काल में हीं मिथक बन गये.....।
आज पेश है जनवरी 1956, में "अवन्तिका " में छपी "विषयान्तर".. के कुछ अंश जो एक संस्मरण है..।

दरअसल "कामत" शब्द आज भी बिहार के पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, सहरसा, मधेपुरा
जिलों में खूब प्रचलित है। आज भी बड़े कामत वाले किसानों की यहां तूती बजती है।
तो आनंद लें कामत शब्द के विभिन्न अर्थों का...................


आपको एक दूसरे शब्द की कहानी बताऊं। मेरे जिले में "कामत" का प्रचलन खूब है। कभी कामत शब्द की जाति, धर्म, नस्ल पर ध्यान नहीं दिया। लिखना पड़ा, लिख दिया। मोहनपुर कामत पर कोई कामती स्थिर हो कर नहीं रहे, फिर भी एक सौ मन धान हुआ। आपने नहीं समझा, घर से दूर, दूसरे गांव में जमीन खरीदकर खेती करने के लिए जो घर बनाया जाता है, इसे "कामत" कहते हैं। फार्म कह लीजिए..। कामत की एक खास विशेषता है कि वहां स्त्री के साथ आप नहीं रह सकते। घर का कोई समांग भी कमतिया हो, तो भी नहीं।.....फिर भी एक-एक किसान के पास दर्जनों कामत।
तो भिंमल मामा ने प्रश्न उपस्थित किया एक दिन- "कामत की परिभाषा..? उत्पत्ति..?"
मैंने कहा, संभवत: यह उर्दू शब्द है। हमारे इलाके में मुसलमान जमींदारों के कई कामत थे।
उँहू.. रौंग..गलत.. सही अर्थ मैं जानता हूं। एक महिने का समय देता हूं। पटना जाते हो, लिख भेजना पण्डितों से बूझकर। देखूं सही अर्थ बता सकता है या नहीं....।
पटने आकर भूल गया। एक कार्ड मिला भिंमल मामा का- "ह्वाट्स कामत......?".
उर्दू के एक मशहूर कथाकार से पूछा। बोले-" यह तो अरबी का शब्द है अकामत। इसका अर्थ है- रहने की जगह। इसी से कामत हुआ है।.." भिंमल मामा को कार्ड लिख दिया।
दूसरे दिन एक पाली जानने वाले मित्र ने कहा-" कामन्ती का अर्थ पाली में होता है- खेती की रखवाली करने वाला..। इसी से कामन्त हुआ।"
भिंमल मामा को दूसरा कार्ड लिख दिया। दो महिने बाद घर गया तो भिंमल मामा हंसते हुए मिले- "बोथ रौंग..। दोनो गलत। न अकामत, न कामन्त। सही शब्द है कामान्त। पुराकाल में, बड़े गृहस्थ के परिवार में किसी व्यक्ति को यदि किसी कारणवश स्त्री-वियोग सहना पड़ा, तो वह अपने काम का अन्त कर देता था। परिवारवाले गांव से बाहर उसके लिए कामान्त बनवा देते थे। वहीं रहकर वह खेती-बारी देखता था। ऐसे कामान्तियों द्वारा लगायी फसल.......।"

Saturday, June 16, 2007

चार पन्नों की एक जीवंत विचार अखबार “मीडिया स्कैन”

15 जून, शाम 6 बजे, कुछ युवा छात्रों, पत्रकारों को सेन्ट्रल पार्क (सी.पी -दिल्ली) में जमा होना था। मौसम सुहाना था, रिम-झिम बारिस बंद हो चुकी थी। इस कारण युवा छात्रों, पत्रकारों की संख्या बढ़ गयी। तकरीबन 35-40 की संख्या हो गयी। इन सभी में उत्साह की कमी नहीं थी, अपितु कुछ करने का जज्बा इन लोगों में साफ झलक रहा था। कह सकते हैं कि सभी की जुबान तो नरम थी लेकिन तासिर एकदम गरम..। अब बात पते की हो जाए, दरअसल सभी के इकट्ठा होने का खास मकसद था। चार पन्नों की एक जीवंत विचार अखबार का लोकार्पण होना था।

अखबार को सबके सामने पेश किया गया। “मीडिया स्कैन” नाम का यह अखबार खासतौर पर इन्हीं लोगों का है। पत्रकारिता के क्षेत्र में कदम रखने वाले इन नौजवानों की कलम मीडिया स्कैन के पहले अंक में जलवा बिखेरती नजर आयी। “मीडिया स्कैन” के अंतिम पृष्ट पर दो लेख किसी का भी ध्यान अपनी ओर खिंच सकते हैं। “पत्रकारिता के छात्र की डायरी” और “शोषण वाया बेगार गाथा....” एक अलग दुनिया से पढ़ने वालों को रु-ब-रु करा सकता है। आनंद कुमार और रुद्रेश नारायण की यह प्रस्तुति सचमुच लाजबाब है।

दिल्ली जैसे महानगर में जिसे मीडिया का मक्का कहा जाता है, वहां मीडिया का स्कैन करना आखिर क्या कहता है.... ? दरअसल इस क्षेत्र में पांव पसारने के लिए कैसे-कैसे पापड़ बेलने पड़ते हैं...(वाकिफ तो होंगे हीं..)। वहां आए एक पत्रकारिता के छात्र ने बेबाक लहजे में बताया- “दिल्ली ऊंचा सुनती है ........।”
यह पहला अंक है, अभी इसे काफी आगे बढ़ना है। कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन इन नौजवानों के आंखों में उमड़ते सपने साफ तौर पर इशारा कर रही थी कि मीडिया स्कैन काफी दूर तक अपना जलवा बिखेरेगी।


अंत में-
“गज़ब ये है कि अपनी मौत की आहट नहीं सुनते
वो सब के सब परीशां है,वहां पर क्या हुआ होगा
यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहां पर किस तरह का जलसा हुआ होगा..”
-दुष्यंत कुमार

-(यदि आप इच्छुक हैं)
मीडिया स्कैन की प्रति के लिए आप संपर्क कर सकते हैं-
माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान, नोएडा-9868743411
भारतीय विद्या भवन- 9971686971
श्री गुरूनानक देव खालसा कालेज- 9911307468
अंबेदकर कालेज- 9968044312

Friday, June 15, 2007

दुमका में झुमका हैरोलनि काशी में कनबाली.....


दरभंगा, मिथिला की अघोषित राजधानी। बोली-बानगी में मधु का प्रसार, हर बात को कहने का एक अलग की अंदाज, यही है खासियत मिथिला की। प्रेम को गीतों के माध्यम से यहां खूब बांचा जाता है। एक बानगी पेश है। विजय जी अक्सर इस गीत को गुनगुनाते हैं। शाम में जब हमारी मुलाकात होती है तो मेरे कई दोस्त जो मैथिली जानते भी नहीं हैं, इस गीत को सुनने की ज़िद करने लगते हैं। यहां तो आप सुन नहीं पाऐंगे, परन्तु पढ़कर आनंद जरूर उठा सकते हैं।
यहां दो पंक्ति में गीत के विषय में बता दूं कि यह गीत एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए गा रहा है। प्रेमिका अलग-अलग स्थानों में अपने आभूषण को खो चूकी है, फिर क्या ...प्रेमी गा उठता है----------------------


दुमका में झुमका हैरोलनि काशी में कनबाली
हम पुछलियनि के चुरौलक अहांक ठोरक लाली
हुनकर नथिया बरामद भेल हमरा रंगीला जिला बलिया में-2
मुंह हुनक पूर्णिमाक चंदा - 2
कोन मनुक्ख सं परलनि फंदा
जौ कियो केलखिन हुनकर निंदा -2
तिनका ओ केलखिन शर्मिन्दा
नैन हुनक दुइधारी खंजर
यवनक भार अपार
पटना सन शहर में हरौलनि ओ नौलखा हार
हुनकर बाली बरामद भेल कि हमरा कि मुशरी घरारी में..............
दुमका में झुमका हैरोलनि काशी में कनबाली
हम पुछलियनि के चुरौलक अहांक ठोरक लाली
हुनकर नथिया बरामद भेल हमरा रंगीला जिला बलिया में-2..................

रोज लिपिस्टिक चाहबे करियनि-2
रुबिया वायल पहिनबे करथिन्ह
चाहे लोक जतेक घायल हो-2
ओ नहि अप्पन चाल बदलती
पान दबौने गाल में हरदम
चप्पल हिल छैन चारि-2
जे कियो हुनका किछु कहती ओ मारती नैनक वाण
हुनकर ओढनि लय भागि गेल कौवा शहर दरभंगा में........
दुमका में झुमका हैरोलनि काशी में कनबाली
हम पुछलियनि के चुरौलक अहांक ठोरक लाली
हुनकर नथिया बरामद भेल हमरा रंगीला जिला बलिया में-2............

Saturday, June 09, 2007

अथ टेलीफून बूथ कथा



अथ टेलीफून बूथ कथा

साल 1994, मई की तपती गर्मी, ट्रैक्टर-टेलर, बैलगाड़ी की सहायता से लोहे के खंभे जिला मुख्यालय से गांव आ रहे हैं। गांव के “बड़का मालिक” के यहां सूचना क्रांति की नयी “नवेली दुल्हन” आने वाली है, अरे अपना टेलीफून। एमपी साहब का खास आर्डर है कि इनके कामत पर जल्दी से जल्दी फोनवा लग जाए। एसडीओ साहब सकते में हैं, फोन मई के पहले सप्ताह तक गांव पहुंच जाए।
ये सब बातें हो रही है सूबा बिहार के पूर्णिया जिला के एक गांव की। जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर यह गांव मौजूद है। गांव का नाम है- चनका।
चनका गांव की आबादी चार हजार के लगभग है। ठेठ जमींदारी की बू यहां की माटी से आज भी आती है। खैर, फोन आने वाला है, सभी उत्सुक हैं। जब पोल (खंभा) गिराये जाने लगे तो गांव के बच्चों से लेकर जवान-बूढ़े तक इन खंभो को निहारते नजर आए। दिन-भर की मेहनत के बाद खंभे अब धरती पर अपना अस्तिव बना लिए हैं। बारी है अब उस तार की जो इस गांव को देश-दुनिया से जोड़ने वाली है। इसी तार के सहारे दिल्ली-पंजाब-हरियाणा से अपने लोगों की आवाजें चनका तक पहुंचेगी।
बड़े मालिक के आदमी कुछ ज्यादा हीं खुश हैं,क्योंकि उन्हें पता है कि कभी-कभी वे भी फून उठाकर कहेंगे “मालिक धान कट गया ....पूर्णिया से आते तो .......।" इस तरह के ख्याली पकवान मालिक के आदमी मन में खूब पका रहे हैं...। बड़े मालिक खुद गांव में डेरा डाले हुए हैं। आखिर क्यों न हो, अब पूर्णिया के आउट हाउस से सीधे नियंत्रण रखेंगे अपने कामत पर। वैसे उनकी खुशी का राज कुछ और ही है, दरअसल अभी तक उनके प्रखंड मुख्यालय श्रीनगर में भी टेलीफोन नहीं आया है। वहां थाना है, बैंक है...लेकिन फोन नहीं है। ब्लाक का पहला फोन उनके गांव में आ रहा है, वो भी उनके हीं कामत पे...।
एसडीओ निरंजन बाबू ने तीन फोन लाइन पास किया है। एक बड़े मालिक का प्राइवेट होगा, दूसरा उनके खास आदमी(मैनेजर) का ,जिसे इस इलाके में कमतिया कहा जाता है। तीसरा फोन लाइन पूरे गांव वालों का होगा, मतलब टेलीफोन बूथ। इस तीसरे लाइन को लेकर सभी गांव वाले उत्सुक हैं। आखिर यह उनका फोन होगा...। वैसे नियम के मुताबिक एक गांव में 12 कनेक्शन पास होने पर हीं दूरसंचार विभाग लाइन के लिए हरी झंडी दिखाता है। लेकिन बात यहां बड़े मालिक की है,उस पर एमपी साहेब का दबंगी फरमान..तो भला कानून की क्या पूछ....। बिजली के बाद गांव वालों के लिए टेलीफोन दूसरा अजूबा होगा। वैसे बिजली का “मैन ट्रांसफरमर” भी मालिक के कामत पर ही लगा है।
और वह शुभ दिन आ हीं गया, गांव के मचानों-चौपालों पर आज गपियाते लोग नजर नहीं आ रहे हैं। सभी कामत पर भीड़ लगाए हुए हैं। एसडीओ साहब बीच दुपहरिया में जीप से कामत के बाहरी गेट पर उतरे हैं,(अंदर कोई वाहन लाने पर पाबंदी है) वैसे जब उनका जीप बड़का पुल पार किया था तब से हीं गांव के छोटे बच्चे धुल उड़ाती जीप के पीछे लग गये थे।
एसडीओ साहब टेलीफोन के तीन सेट लेकर आए हैं। बड़े मालिक ने एसडीओ साहब का हाल-चाल पूछा और फिर माहौल टेलीफोन के आस-पास घुमने लगा।
“तार तो जुड़ चुका है?” साहब ने लाइनमैन राजेश से पूछा, उसने तुरंत “जी” का शब्द फेंका। इसके बाद साहब ने खुद फोन सेट में जक्शन प्लग जोड़ा और पूर्णिया हेड आफिस फोन लगाया- “हैलो........मैं निरंजन सिंह बोल रहा हूं, अंजान बाबू के गांव से.... एक बार यहां रिंग करो तो..।” कुछ हीं देर में ट्रिन-ट्रिन की ध्वनि समवेत स्वर में गूंजने लगी। पूरा का पूरा कामत खुशी से नाचने लगा..जय विश्वकर्मा...जय काली मैया..की आवाज से कामत गूंजायमान हो उठा। कामत के मुख्य कमतिया(चीफ मैनेजर) सुरेश काका ने काली थान(काली मंदिर) जाकर पूजा-पाठ किया। कामत पर लड्डू बांटने का दौर अब शुरू हो चुका है। लेकिन अभी भी सभी की नजर टेलीफोन पर हीं है। एसडीओ साहब ने भी एक लड्डू उठाया और मुंह में डालते हुए बोले-“अंजान बाबू प्राइवेट नंबर हुआ 47442, कामत वाला नंबर हुआ 47446 और पीसीओ वाला नंबर है 47451..।”
अंजान बाबू ने पनबट्टी से पान निकालकर अपने मुंह में डालकर एक लंबी चुप्पी साधी.। कुछ देर बाद अपने मेन कमतिया को संबोधित करते हुए बोले-“ सुरेश भाय(भाई) मनोजवा को फोन लगाइए, शुरूआत आपके हीं बेटे से हो.. क्या निरंजन बाबू। ” (मनोज सुरेश काका का बेटा है जो दिल्ली के पहाड़गंज के एक होटल में फोन आपरेटर है)
सुरेश काका गर्व से सिर उठाए सामने आए भीड़ की तरफ अपनी कुटिल मुस्कान बिखेरते कुर्ते के जेब से अपनी पुरानी डायरी निकाली। इसमें से मनोज का नंबर नोट करते हुए सुरेश काका बोले-“मालिक अपने ही लगा दीजिए न! इ शुभ काम आपके ही हाथ से होता तो..........।” अंजान बाबू बोले- “सुरेश भाय, आज तो हम लगा देते हैं लेकिन इ काम तो आपका हीं है न! इ लाइन भी टेलीफोन बूथ का है..। एक बात ध्यान रखियेगा ,जहां भी फोन लगाइए उसका नंबर नोट कर लीजिएगा...।”(गुरू वाणी की तरह काका सभी बात ध्यान से सुन रहे थे) बड़े मालिक (अंजान बाबू) तो काका को समझा रहे थे ..लेकिन पूरा गांव शांति से उनकी बात सुन रहा था। खैर, मनोज को फोन लगाया गया। उधर घंटी बजी तो अंजान बाबू ने गंभीर मुद्रा को अपनाया। जब किसी ने फोन उठाया तो अंजान बाबू चालू हो गये....”हैलो मैं अंजान मिश्र बोल रहा हूं....” कि तभी खर्र-खर्र की आवाज मालिक साहब को तंग करने लगी। उन्होने फोन रख दिया, फिर बोले- “एसडीओ साहेब लाइन तो बड़ा डिस्ट्रब है । ”
एसडीओ साहब ने कहा- सर हमको दीजिए हम लगाते हैं। भीड़ में रामपुर वाली ने सुरतिया से कहा- “इ तो गजब क चीज है भौजी, बैठल-बैठल कका क मनोज भाय से बात हो जाएगी...।“ तब तक एसडीओ साहब फोन लगाने में सफल हो चुके हैं। उन्होने सुरेश काका को रिसीवर थमा दिया। सुरेश काका वैसे तो फोन की प्राइमरी दुनिया से अवगत हैं,क्योंकि पूर्णिया में मालिक के यहां से वे मनोज को फोनियाते रहे हैं। लेकिन वे आज कामत पर थोड़ा असहज महसूस कर रहे हैं। ऱिसीवर थामे काका बोले-“ हैलो (जोर से) हम चनका से सुरेश बोल रहे हैं। मनोज से बात हो सकती है क्या....।“ आखिर मनोज से बात हुई, काका बोल रहे हैं-“ मनोजवा रे...कामत पे आज फोन लग गया है, लो मालिक से बात करो।“ अंजान बाबू ने रिसीवर थामा और मनोज को आशीष देते हुए बोले- “मनोज नंबर नोट कर लो, 47451 हां पूर्णिया का ही कोड लगेगा। वैसे तुम अब यहां आ सकते हो,मैंने यह लाइन बूथ के लिए हीं पास करवाया है। तुम आओ और इसे संभालो....वैसे तुम्हारी जो मर्जी..।“ (बड़े मालिक ने आखिर मनोज के पाले में गेंद फेंक ही दिया)
कामत के पूर्वी हिस्से के एक कमरे की सफाई पूरी हो चुकी है। दरअसल टेलीफोन बूथ अपना बसेरा यहीं बसाएगा। एक टेबल, कुर्सी और एक बड़ा बेंच यहां रखा गया है। अजंता कंपनी की एक दिवाल घड़ी यहां टिक-टिक कर समय की सूचना दे रही है। बूथ के लिए अभी कंप्यूटराइज्ड मीटर नहीं आया है, दो सप्ताह में मीटर यहां पहुंच जाएगा। ऐसा एसडीओ साहब ने कहा है।
चाय-पानी होते दोपहर ढ़ल चुकी है, एसडीओ साहब अब पूर्णिया की ओर रूख करेंगे। बड़े मालिक ने लाइन मैन और कर्मचारियों को सौ-सौ रूपये बख्सीस दी। एसडीओ साहब के लिए खासतौर पर “चंदनचूर चावल” की दो बोरियां जीप में रखायी गयी है। उनके आंगन के लिए भी कुछ पैकट जीप में डाले गये हैं। कुछ देर बाद जीप स्टार्ट हुई और सरपट पूर्णिया की ओर दौड़ पड़ी।
कामत पर भीड़ बरकरार है, अंजान बाबू पनबट्टी से पान निकालते हुए बोले-“ देखिए फोन लग गया है, अब आप लोग परदेश में रहने वाले बेटे-भाई से बात कर सकते हैं। लेकिन ध्यान रखिए हफ्ते बाद मीटर लग जाएगा,उस पर जो पैसा उठे अदा कर दीजिएगा। क्योंकि महिने के अंत में टोटल बिल आता है,उसे पूर्णिया में जमा करना होगा। जमा नहीं करने पर फोन लाइन काट दिया जाता है। आप लोग समझ रहे हैं न... !”
सभी शांति पूर्वक बातें सुन रहे हैं, तभी सुरेश कका पसीना पोंछते आए और मालिक को इतल्ला किया कि टेलीफोन बूथ का आफिस तैयार हो गया है। मालिक ने सिर हिलाकर अपनी स्वीकृति दी। कामत की सारी भीड़ अब टेलीफोन बूथ के आस-पास मंडारने लगी। इधर अंजान बाबू भी हवेली में चले गये। बूथ के पास खड़ी गोमती की मां ने आंचल की खूंट से एक कागज का टुकड़ा निकाला और काका की तरफ बढ़ाते हुए कहा-“ए हो मनेजर बाबू कनी गोमती के बाबू क फोन लगा द न...उ फारबिसगंज में हैं।” इस तरह बूथ अपना काम बिना मीटर के हीं करने लगा। काका घड़ी देखकर पल्स जोड़ने लगे...।
बूथ के आने से गांव काफी कुछ बदला, लोग-बाग अब शहर से नजदीकी बनाने लगे हैं। अब तो गुलाबबाग मंडी के भाव से अनाज की खरीददारी होने लगी है। समय के संग बहुत कुछ यहां बदला है।
2006 में जब पटना से पंकज यहां आया तो उसे सबकुछ बदला नजर आया। यदि बदला कुछ नहीं तो कामत और टेलीफोन बूथ। अभी भी गांव का बूथ यहीं है, हां कामत पर एक और टेलीफोन बूथ ने अपनी जगह बना ली है- डब्लूएलएल के रूप में। तकनीकी रूप से विकास की राह पकड़ता चनका गांव बेतार के माध्यम से भी जुड़ चुका है।
दिल्ली-पंजाब से पैसा कमाकर आने वाले कमाऊ पूत जिंस-टीशर्ट, गाना-बाजा से लबरेज हो गए हैं। बूथ के आसपास मंडराते लोग एक अलग ही भाषा को फैला रहे हैं। दिल्ली का भाषायी साफ्टवेयर अब इस गांव में फिट नजर आ रहा है। सुरेश काका अब बूढ़े हो चले हैं, उनकी जिन्दगी अब टेलीफोन बूथ से जुड़ गयी है। उनका बेटा मनोज डब्लूएलएल बूथ का आपरेटर है। अंजान बाबू हफ्ते में एक दफे कामत का दौरा करते हैं। इनके छोटे भाई अब मुखिया जी हो गये हैं। गांव की कमान अब उनके हाथ में है। लेकिन गांव वालों के अनुसार “बड़े मालिक हीं पर्दे के पीछे हैं”। मुखिया जी ने बूथ पर सौर लाइट की व्यवस्था कर दी है। इस कारण अब रात के 9 बजे भी लोग बूथ पर डटे रहते हैं। पुराने बूथ पर एक परचून की दुकान खोल दी गयी है। इसकारण बूथ का स्वरूप अब बदला-बदला नजर आता है।
पूरा गांव अब बिजली, टेलीफोन,और गाने-बाजे से चकाचक कर रहा है। सुनने में आया है कि मुखिया जी विडियो हाल खोलने वाले हैं। बिजली के बाद जबसे टेलीफोन यहां आया है ,कुछ न कुछ नयापन देखने को मिलता रहा है। गांव के अधिकतर पुरूष जो पलायन कर चुके हैं, अब सभी टेलीफोन के सहारे गांव से जुड़े हैं। तो न कमली कहती है-
“सजन छोड़ न अपन गांव रे,
तू कर याद टेलीफून से......”
यादव टोले के हरिश ने एक मोबाइल खरीदा है। वह इसे आजादी का अस्त्र मानता है। हरिश अक्सर कामत पर काका के साथ मोबाइल को लेकर घंटो बहस करता है। काका बड़े ध्यान से मोबाइल की बारीकियों को समझ रहे हैं। इससे पहले काका केवल मालिक के हाथ में इसे देखते थे। लेकिन हरिश ने जब नोकिया-1100 का सेट उनके हाथ में थमाया तो वे खुद को काफी आगे देखने लगे।
काका की जुबान में-“ टेक्नीकल विकास का बीज अब घर-घर पहुंच रहा है।” अंजान बाबू अक्सर कहा करते हैं- “गांव को बदलने के लिए नौजवानों को टेक्नीकल नालेज प्राप्त करना होगा।“
गांव के इस नये रूप को देखकर आज वे खुश तो जरूर होंगे..।


-गिरीन्द्र नाथ झा
सराय-सीएसडीएस के स्वतंत्र शोधवृति कार्यक्रम (2006) के दौरान प्रस्तुत शोध पत्र से साभार।
(विषय- प्रवासी इलाकों में टेलीफोन बूथ संस्कृति)

Thursday, June 07, 2007

“ सबकुछ बदला यारों न बदली कहानी...फिर भी रटते कि बदली कहानी.........”


कैसी है शिक्षा व्यवस्था.....
- गुरू टिक्कू

घुमने के क्रम में कभी - कभी कुछ ऐसा देखने को मिल जाता है कि आंखे फटी की फटी रह जाती है। ऐसा हीं हाल गुरू टिक्कू का हुआ। गुरू टिक्कू बिहार के दौरे पर थे, इलाका था शेखपुरा। वैसे तो यहां काफी कुछ ऐसा है,जिससे गुरू टिक्कू को अचरज हीं हुआ होगा। गौरतलब है कि यह हाल उस इलाके का है, जिस इलाके के लोग स्व. राजो सिंह को विकास पुरूष के नाम से पुकारते हैं। विकास क्या और किसका हुआ यह तो राम जाने....।
विकास की बयार में यहां गुरू टिक्कू को कुछ भी देखने को नहीं मिला। बकौल गुरू टिक्कू – “अरे भाऊ का बोलूं सड़क भी .यहां खुद के हाल पे रोवत है।“
मगर कहानी का रूप यहां कुछ और हीं है। कहानी एक ऐसी शिक्षिका की है जिसे पहले अपनी 10 वर्षीय बेटी से पढ़ना होता है फिर जाकर वह कक्षा ले पाती है। शिक्षिका शिक्षा-मित्र के पद को शोभामान कर रही है, लेकिन अ.आ.इ.ई........भी नहीं जानती है। बिटीया पढ़ाती है तब जाकर हीं वह कक्षा ले पाती है। कहने और दिखाने के लिए इस टीचर दीदी के पास 10 वीं का प्रमाण पत्र है..वो भी पंचायत में सबसे ज्यादा अंको वाला। गुरू टिक्कू अचंभित है....का करें उन्हें समझ मे नहीं आ रहा है। गांव में घुमते वक्त जब गुरू की निगाह में यह वाकया टकराया तो वे इस विषय की खोजबीन करने लगे, आखिर सच्चाई से उनका आमना-सामना हुआ और जनाब मुंह –बाये(खोले) खड़े के खड़े रह गये।
गुरू टिक्कू कहते हैं-“ यार यह कैसी शिक्षा व्यवस्था है...... जब शिक्षिका का यह हाल है तो पढ़ने वालों का क्या होगा..।“
दरअसल शिक्षिका की नौकरी ऐसे बच्चों को पढ़ाने की है जिन्हें प्राइमरी का भी ज्ञान नही होता है.....किन्तु शिक्षिका भी तो वैसी हीं है। लेकिन धन्यवाद शिक्षिका की बिटिया को, जो कम से कम मां को पाठ पढ़ा कर स्कूल भेजती है। बलिहारी ऐसी बेटी का।
गुरू टिक्कू की यात्रा का यह एक रोचक प्रसंग है। शिक्षा व्यवस्था की कलई खोलती यह तस्वीर आखिर क्या बयां कर रही है ...जरा सोचें...।
बदलाव-बदलाव की रट लगाने वाली सरकार ,ये आपका कैसा रूप है, हेमा की गाल की तरह या ओमपुरी की गाल जैसी..।
तो न गुरू टिक्कू फरमाते हैं-“ सबकुछ बदला यारों न बदली कहानी...फिर भी रटते कि बदली कहानी.........”

Monday, June 04, 2007

अपनी ही पहचान बनाने में




विश्वनाथ प्रताप सिंह, राजनीति के दांव-पेंच के अलावे कविता और पेंटिग के लिए भी पहचाने जाते हैं। कुछ दिनो पहले एक किताब हाथ लगी. "मंजिल से ज्यादा सफर"
राजकमल प्रकाशन की इस किताब में इनकी कुल 11 कविताऐं हैं। दरअसल . "मंजिल से ज्यादा सफर" पूर्णतया विश्वनाथ प्रताप सिंह पर हीं है। यहां जो कविता मुझे पसंद आयी, वही आपके सामने................


1.
अपनी ही पहचान बनाने में
जब सब अपनी जान लगाए हों
तो बताओ यहां कैसे
जान-पहचान हो....
2.
जो एक्का भी न बन सके
और दुग्गी भी
मौका पड़ने पर बादशाह
और फिर गुलाम भी
वही है जोकर
यानी "जो वक्त कहे सो कर"
इसलिए
सत्ता में भी ऐसा ही पत्ता
सबसे ज्यादा चलता है
गड्डी चाहे जितनी फेंटो
जोकर
सबके ऊपर हावी रहता है।
4
कितनी रंगीनियां झेल चुका हूं
सिनेमा-स्क्रीन की तरह
औरों के लिए
कहानी हूं
अपने लिए
कोरा का कोरा हूं--------------------........

Saturday, June 02, 2007

आपको जीना है, तो खेल के नियम बदलने होंगे.........



"सत्ता शिखर पर बैठे सिरफिरे लोगों की उटपटांग हरकतों ने जनता का जीना दुभर कर दिया है । कितना भी सिर धुन लीजिए आप स्थापित नियमों के सहारे इनसे पार नहीं पा सकते। हमें और आपको जीना है, तो खेल के नियम बदलने होंगे।"

मंडी हाउस में चाय की चुस्की के संग संजय भाई ने ये बातें कही। लगे हाथ संजय भाई का परिचय दे दूं , जनाब "सेंटर फार सिविल सोसाइटी" से जुड़े हैं।
यह सोसाइटी सीमित सरकार, कानून का शासन और प्रतिस्पर्धी बाजार के संदर्भ में सार्वजनिक नीतियों पर चिंतन करने वाला एक वैचारिक संगठन है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने ट्रैफिक व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए कुछ कड़े आदेश जारी किए हैं ( ये आदेश 9 अप्रैल 2007 से लागू हैं)।
संजय भाई इसी आदेश को लेकर बहस के मूड में हैं. ये अपनी बात यहां किश्तों में रखने जा रहे हैं, प्रस्तुत है पहली किश्त........

फर्ज कीजिए कि राष्ट्रपति महोदय ने एक सपना देखा कि सन् 2020 तक देश में सौ फीसदी संपूर्ण साक्षरता आ जाए ....तो क्या इस स्वप्न को साकार करने का सही तरीका यही होगा कि न्यायालय एक आदेश जारी करे दे कि 2020 तक हर कोई पढ़ ले, वरना उसे देश से बाहर खदेड़ दिया जाएगा...।
बस चालकों के लिए न्यूनतम 12वीं तक की शैक्षणिक योग्यता तय करना क्या ऐसा हीं कदम नहीं है ? अगर देश की शिक्षा व्यवस्था सबको शिक्षा दे पाने का लक्ष्य हासिल करने में नाकाम रही है, तो इसके लिए सजा किसे दी जाए? शिक्षा अधिकारियों को या उन्हें, जो अशिक्षित रह गये?
मौटे तौर पर न्यायालय के आदेश में दो तरह की व्यवस्था की गयी है।
1. बस चालकों के लिए शैक्षणिक योग्यता बढ़ा दी गयी है। उनके लिए नियमित ट्रैनिंग एवं रिफ्रेशर कोर्स अनिवार्य कर दिया गया है।
2. नियमों , पाबंदियों एवं चालान के सहारे ट्रैफिक कर्मियों का रौब-दाब बढ़ा
दिया गया है।

आखिर बस चालकों के लिए शिक्षा जैसी शर्त जोडने के पीछे न्यायालय की सोच क्या है? दिल्ली देश की राजधानी है और एक अंतर्राष्ट्रीय शहर है। यहां 2010 में अंतर्राष्ट्रीय खेल का आयोजन होगा शायद इसी कारण न्यायालय ने सोचा होगा.....
मैं सोचता हूं ...क्या पढ़े-लिखे बस चालक तमीज एवं तहजीब से बात करेगें ?
आप भी अपनी राय दें, शायद बात आगे बढ़े.....