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Saturday, August 18, 2012

चल तो तू पड़ा है....

अंचल में धनरोपनी की कथा

अंचल में कथावाचक ने पांव रखने की कोशिश की है ताकि उसके भीतर के कथा को विस्तार मिल सके। आहा! ग्राम्य जीवन कहने वालों को वह अपने अंदाज में कथा सुनाना चाहता है शायद यही उसकी जिद भी है। वैसे जिद बड़ी हसीन चीज होती है, देखिए न कथावाचक चलने की जिद कर रहा है लेकिन वह उस भरम को छूना नहीं चाहता जिसमें बार-बार यह बताया जाता है कि चल तो तू पड़ा है, फासला बड़ा है…।

जिद के बहाने कथावाचक
 कथा बांचना चाहता है।  तो साहेबान, एक जिद जमीन की भी होती है, जिसके संग कागज का मोह जुड़ा है।

कागज भी कमाल का..जमीन की दिशा-दशा-मालिकाना सब कागज की उस पुड़िया में बंधी रहती है और जिद देखिए हर कोई उसे अपने हिस्से रखने की जुगत में लगा रहता है।

अंचल में आकर कथावाचक ऐसे ही कागजातों के फेर में पड़ गया है। कितनी मायावी होती है जमीनी कागजात। खेसरा, रकबा, खाता... परती परिकथा-कथा अनंता। इन शब्दों के फेर में उसे अपने प्रिय कथाकार फणीश्वर नाथ रेणु की लिखी बातें याद आने लगती है..।

अंचल में कोसी प्रोजेक्ट के नहर पर ऊंचाई से खेतों में पसरे हरे-हरे धान को निहारते हुए वह जमीन के मालिकाना हक की एबीसीडी पढ़ने लगता है, ऐसे में उसकी कथाएं भी नहर की भांति हाव-भाव दिखाने लगती है। एक ऐसा भी वक्त था जब वह जीवन की किताब में ऐसे रंगों से परहेज करता था लेकिन अब वह उसी डफली में जीवन का राग आलापने लगा है।

बाउंड्री, अमीन, जमीन सब उसे रंगरेज क तरह खींचने लगे हैं। सर्वे-सेटलमेंट-डिग्री...आदि-आदि। इन सबके बीच भी उसके भीतर का मानुष बुदबुदाते रहता है-
हर करम के कपड़े मैले हैं.....
सचमुच जीवन के प्रपंच में कपड़े सफेद रह जाएं यह तो हो नहीं सकता। अंचल का जीवन ऐसे ही मैले कपड़ों की आवृति है। गणित से डरने वाला अर्थशास्त्र के संग डुबकी लगाने लगा है।

अंचल में जिद की कथा ऐसे ही चलती है। मन जिद्दी होने चला है लेकिन मन पर लगाम कसने के लिए अभ्यास की जरुरत है। कथावाचक का गीता में छपे उस श्लोक पर ध्यान टिक जाता है, जिसमें कृष्ण कहते हैं-
मन चंचल बहुत है, पर मन को वैराग्य और अभ्यास से वश में किया जा सकता है। लेकिन कथावाचक इन सबसे अभी दूर है, और दूर रहना भी चाहता है।

दरअसल उसके हिस्से में जिद्दी मन आ टपका है, वह उसे भी जीवन के अवयव की तरह देखना चाहता है। जैसे कबीर ने कहा है-
राम हमारा हमे जपे रे, हम पायो विशराम  इन सब प्रपंचों और जिद्द के संग कथावाचक गाम के कबिराहा मठ में बैठना नहीं भूलता। वहां की बातें वह सुनता रहता है और मठ के सामने सैकड़ों एकड़ परती जमीन को निहारते रहता है।

देखिए न यह लिखते वक्त उसके भीतर फिल्म
गुलाल का यह गीत भी बज चला है-


 
चल तो तू पड़ा है,
  फासला बड़ा है
जान ले अंधेरे के सर पे खून चढा है
मुकाम खोज ले तू
मकान खोज ले तू
इंसान के शहर में इंसान खोज ले तू


   

Friday, June 29, 2007

भगैत (भगत) आप जानते हैं.......


कोसी का इलाका यदि बाढ़ और बालू से अभिशप्त है तो यकीन मानिए यहां कुछ
ऐसा भी है, जिसे देख और सुनकर आप मस्ती के आलम में झूम सकते हैं। तो
चलिए, आपको ले चलते हैं कोसी के उन गावों में जहां आप रंग-बिरंगे,
चटकीले, मस्ताने या फिर गोसाईं जैसै गीतों का लुत्फ उठा सकें...।

फणीश्वर नाथ रेणु ने तो अपनी कृतियों ऐसे लोकगीतों को खूब उकेरा है। रेणु
के शब्दों में "ऐसे कईगीतों को सुनते समय "देहातीत" सुख का परस सा पाया
है और देह यंत्र मे "रामुरा झिं झिं" बजने लगता है .......।"

"विदापत-नाच" हो या फिर "भगैत" (भगत), आज भी यहां मौजूद है। विदापत-नाच
तो अब केवल सहरसा जिले में सिमट गया है लेकिन "भगैत" (भगत) आज भी कोसी
के तकरीबन सभी जिलों में खूब गाया और बांचा जाता है। दरअसल भगैत (भगत) एक
ऐसा लोकगीत है, जिसमें गीत के संग-संग डॉयलॉग भी चलता रहता है। कहानी के
फार्म में गायक अपने दल के साथ भगैत (भगत) गाता है। इसे सुनने के लिए
झुंड के झुंड लोग उस जगह जमा होते हैं जहां भगैत होता है। 10 से 11 लोगों
की एक टीम होती है जो भगैत गाते हैं। टीम के प्रमुख को "मूलगैन" कहते
हैं। अर्थात मूल गायक...। मूलगैन कहानी प्रारंभ करता है और फिर समां बंध
जाता है। हारमोनियम और ढ़ोलक वातावरण में रस का संचार करते हैं। दाता
धर्मराज, कालीदास, राजा चैयां और गुरू ज्योति, भगैत के मुख्य पात्र होते
हैं। ये पात्र तो हिन्दू के लिए होते हैं। मुसलमानों के लिए "मीरा साहेब
" प्रमुख पात्र माने जाते हैं। मुस्लिम के लिए होने वाले भगैत को "मीरन"
कहा जाता है।

यहां बोली जाने वाली ठेठ मैथिली में भगैत और मीरन गाया जाता है। गौर करने
लायक बात यह है कि इस कथा-गीत में अंधविश्वास सर-चढ़कर बोलता है। मसलन
मूलगैन पर भगवान आ जाते हैं। वह जो कुछ बोल रहा है, वह ईश्वर-वाणी समझी
जाती इस कार्यक्रम बलि-प्रथा और मदिरा की खूब मांग होती है।

48 घंटे तक अनवरत चलने वाले इस कार्यक्रम का आयोजन अक्सर गांव के बड़े
भू-पति हीं करते हैं। क्योंकि इसके आयोजन में अच्छा-खासा खर्च होता है।
अक्सर फसल कटने के बाद हीं ऐसे आयोजन होते हैं। क्योंकि उस वक्त किसान के
पास अनाज और पैसे कुछ आ ही जाते हैं। हाल ही मैं पूर्णिया जिला के धमदाहा
में "भगत-महासम्मेलन" का आयोजन हुआ था। कोसी के अलावा अन्य जिलों से भी
कलाकार इस सम्मेलन में पहुंचे थे। किन्तु जिस उत्साह से कोसी में भगैत को
मंच मिलता आया है,वह अन्य जगहों में नहीं दिखता है। किसानों के बीच इसके
लोकप्रिय होने का मुख्य कारण यह है कि यहां के गावों में अंधविश्वास का
बोलबाला आज भी काफी है।

वैसे जो भी हो, भगैत एक कला के रूप में अलग हीं दुनिया में बसता है। यहां
के लोग-बाग में यह रच-बस गया है। मूलगैन (मूल गायक-टीम लीडर) कहता है न-

" हे हो... घोड़ा हंसराज आवे छै............
गांव में मचते तबाही हो...............
कहॅ मिली क गुरू ज्योति क जय....."

हिन्दी अनुवाद-
( सुनो सभी, घोड़ा हंसराज आने वाला है,
गांव में मचेगी अब तबाही,
सब मिलकर कहो गुरू ज्योति की जय )