Saturday, June 09, 2007

अथ टेलीफून बूथ कथा



अथ टेलीफून बूथ कथा

साल 1994, मई की तपती गर्मी, ट्रैक्टर-टेलर, बैलगाड़ी की सहायता से लोहे के खंभे जिला मुख्यालय से गांव आ रहे हैं। गांव के “बड़का मालिक” के यहां सूचना क्रांति की नयी “नवेली दुल्हन” आने वाली है, अरे अपना टेलीफून। एमपी साहब का खास आर्डर है कि इनके कामत पर जल्दी से जल्दी फोनवा लग जाए। एसडीओ साहब सकते में हैं, फोन मई के पहले सप्ताह तक गांव पहुंच जाए।
ये सब बातें हो रही है सूबा बिहार के पूर्णिया जिला के एक गांव की। जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर यह गांव मौजूद है। गांव का नाम है- चनका।
चनका गांव की आबादी चार हजार के लगभग है। ठेठ जमींदारी की बू यहां की माटी से आज भी आती है। खैर, फोन आने वाला है, सभी उत्सुक हैं। जब पोल (खंभा) गिराये जाने लगे तो गांव के बच्चों से लेकर जवान-बूढ़े तक इन खंभो को निहारते नजर आए। दिन-भर की मेहनत के बाद खंभे अब धरती पर अपना अस्तिव बना लिए हैं। बारी है अब उस तार की जो इस गांव को देश-दुनिया से जोड़ने वाली है। इसी तार के सहारे दिल्ली-पंजाब-हरियाणा से अपने लोगों की आवाजें चनका तक पहुंचेगी।
बड़े मालिक के आदमी कुछ ज्यादा हीं खुश हैं,क्योंकि उन्हें पता है कि कभी-कभी वे भी फून उठाकर कहेंगे “मालिक धान कट गया ....पूर्णिया से आते तो .......।" इस तरह के ख्याली पकवान मालिक के आदमी मन में खूब पका रहे हैं...। बड़े मालिक खुद गांव में डेरा डाले हुए हैं। आखिर क्यों न हो, अब पूर्णिया के आउट हाउस से सीधे नियंत्रण रखेंगे अपने कामत पर। वैसे उनकी खुशी का राज कुछ और ही है, दरअसल अभी तक उनके प्रखंड मुख्यालय श्रीनगर में भी टेलीफोन नहीं आया है। वहां थाना है, बैंक है...लेकिन फोन नहीं है। ब्लाक का पहला फोन उनके गांव में आ रहा है, वो भी उनके हीं कामत पे...।
एसडीओ निरंजन बाबू ने तीन फोन लाइन पास किया है। एक बड़े मालिक का प्राइवेट होगा, दूसरा उनके खास आदमी(मैनेजर) का ,जिसे इस इलाके में कमतिया कहा जाता है। तीसरा फोन लाइन पूरे गांव वालों का होगा, मतलब टेलीफोन बूथ। इस तीसरे लाइन को लेकर सभी गांव वाले उत्सुक हैं। आखिर यह उनका फोन होगा...। वैसे नियम के मुताबिक एक गांव में 12 कनेक्शन पास होने पर हीं दूरसंचार विभाग लाइन के लिए हरी झंडी दिखाता है। लेकिन बात यहां बड़े मालिक की है,उस पर एमपी साहेब का दबंगी फरमान..तो भला कानून की क्या पूछ....। बिजली के बाद गांव वालों के लिए टेलीफोन दूसरा अजूबा होगा। वैसे बिजली का “मैन ट्रांसफरमर” भी मालिक के कामत पर ही लगा है।
और वह शुभ दिन आ हीं गया, गांव के मचानों-चौपालों पर आज गपियाते लोग नजर नहीं आ रहे हैं। सभी कामत पर भीड़ लगाए हुए हैं। एसडीओ साहब बीच दुपहरिया में जीप से कामत के बाहरी गेट पर उतरे हैं,(अंदर कोई वाहन लाने पर पाबंदी है) वैसे जब उनका जीप बड़का पुल पार किया था तब से हीं गांव के छोटे बच्चे धुल उड़ाती जीप के पीछे लग गये थे।
एसडीओ साहब टेलीफोन के तीन सेट लेकर आए हैं। बड़े मालिक ने एसडीओ साहब का हाल-चाल पूछा और फिर माहौल टेलीफोन के आस-पास घुमने लगा।
“तार तो जुड़ चुका है?” साहब ने लाइनमैन राजेश से पूछा, उसने तुरंत “जी” का शब्द फेंका। इसके बाद साहब ने खुद फोन सेट में जक्शन प्लग जोड़ा और पूर्णिया हेड आफिस फोन लगाया- “हैलो........मैं निरंजन सिंह बोल रहा हूं, अंजान बाबू के गांव से.... एक बार यहां रिंग करो तो..।” कुछ हीं देर में ट्रिन-ट्रिन की ध्वनि समवेत स्वर में गूंजने लगी। पूरा का पूरा कामत खुशी से नाचने लगा..जय विश्वकर्मा...जय काली मैया..की आवाज से कामत गूंजायमान हो उठा। कामत के मुख्य कमतिया(चीफ मैनेजर) सुरेश काका ने काली थान(काली मंदिर) जाकर पूजा-पाठ किया। कामत पर लड्डू बांटने का दौर अब शुरू हो चुका है। लेकिन अभी भी सभी की नजर टेलीफोन पर हीं है। एसडीओ साहब ने भी एक लड्डू उठाया और मुंह में डालते हुए बोले-“अंजान बाबू प्राइवेट नंबर हुआ 47442, कामत वाला नंबर हुआ 47446 और पीसीओ वाला नंबर है 47451..।”
अंजान बाबू ने पनबट्टी से पान निकालकर अपने मुंह में डालकर एक लंबी चुप्पी साधी.। कुछ देर बाद अपने मेन कमतिया को संबोधित करते हुए बोले-“ सुरेश भाय(भाई) मनोजवा को फोन लगाइए, शुरूआत आपके हीं बेटे से हो.. क्या निरंजन बाबू। ” (मनोज सुरेश काका का बेटा है जो दिल्ली के पहाड़गंज के एक होटल में फोन आपरेटर है)
सुरेश काका गर्व से सिर उठाए सामने आए भीड़ की तरफ अपनी कुटिल मुस्कान बिखेरते कुर्ते के जेब से अपनी पुरानी डायरी निकाली। इसमें से मनोज का नंबर नोट करते हुए सुरेश काका बोले-“मालिक अपने ही लगा दीजिए न! इ शुभ काम आपके ही हाथ से होता तो..........।” अंजान बाबू बोले- “सुरेश भाय, आज तो हम लगा देते हैं लेकिन इ काम तो आपका हीं है न! इ लाइन भी टेलीफोन बूथ का है..। एक बात ध्यान रखियेगा ,जहां भी फोन लगाइए उसका नंबर नोट कर लीजिएगा...।”(गुरू वाणी की तरह काका सभी बात ध्यान से सुन रहे थे) बड़े मालिक (अंजान बाबू) तो काका को समझा रहे थे ..लेकिन पूरा गांव शांति से उनकी बात सुन रहा था। खैर, मनोज को फोन लगाया गया। उधर घंटी बजी तो अंजान बाबू ने गंभीर मुद्रा को अपनाया। जब किसी ने फोन उठाया तो अंजान बाबू चालू हो गये....”हैलो मैं अंजान मिश्र बोल रहा हूं....” कि तभी खर्र-खर्र की आवाज मालिक साहब को तंग करने लगी। उन्होने फोन रख दिया, फिर बोले- “एसडीओ साहेब लाइन तो बड़ा डिस्ट्रब है । ”
एसडीओ साहब ने कहा- सर हमको दीजिए हम लगाते हैं। भीड़ में रामपुर वाली ने सुरतिया से कहा- “इ तो गजब क चीज है भौजी, बैठल-बैठल कका क मनोज भाय से बात हो जाएगी...।“ तब तक एसडीओ साहब फोन लगाने में सफल हो चुके हैं। उन्होने सुरेश काका को रिसीवर थमा दिया। सुरेश काका वैसे तो फोन की प्राइमरी दुनिया से अवगत हैं,क्योंकि पूर्णिया में मालिक के यहां से वे मनोज को फोनियाते रहे हैं। लेकिन वे आज कामत पर थोड़ा असहज महसूस कर रहे हैं। ऱिसीवर थामे काका बोले-“ हैलो (जोर से) हम चनका से सुरेश बोल रहे हैं। मनोज से बात हो सकती है क्या....।“ आखिर मनोज से बात हुई, काका बोल रहे हैं-“ मनोजवा रे...कामत पे आज फोन लग गया है, लो मालिक से बात करो।“ अंजान बाबू ने रिसीवर थामा और मनोज को आशीष देते हुए बोले- “मनोज नंबर नोट कर लो, 47451 हां पूर्णिया का ही कोड लगेगा। वैसे तुम अब यहां आ सकते हो,मैंने यह लाइन बूथ के लिए हीं पास करवाया है। तुम आओ और इसे संभालो....वैसे तुम्हारी जो मर्जी..।“ (बड़े मालिक ने आखिर मनोज के पाले में गेंद फेंक ही दिया)
कामत के पूर्वी हिस्से के एक कमरे की सफाई पूरी हो चुकी है। दरअसल टेलीफोन बूथ अपना बसेरा यहीं बसाएगा। एक टेबल, कुर्सी और एक बड़ा बेंच यहां रखा गया है। अजंता कंपनी की एक दिवाल घड़ी यहां टिक-टिक कर समय की सूचना दे रही है। बूथ के लिए अभी कंप्यूटराइज्ड मीटर नहीं आया है, दो सप्ताह में मीटर यहां पहुंच जाएगा। ऐसा एसडीओ साहब ने कहा है।
चाय-पानी होते दोपहर ढ़ल चुकी है, एसडीओ साहब अब पूर्णिया की ओर रूख करेंगे। बड़े मालिक ने लाइन मैन और कर्मचारियों को सौ-सौ रूपये बख्सीस दी। एसडीओ साहब के लिए खासतौर पर “चंदनचूर चावल” की दो बोरियां जीप में रखायी गयी है। उनके आंगन के लिए भी कुछ पैकट जीप में डाले गये हैं। कुछ देर बाद जीप स्टार्ट हुई और सरपट पूर्णिया की ओर दौड़ पड़ी।
कामत पर भीड़ बरकरार है, अंजान बाबू पनबट्टी से पान निकालते हुए बोले-“ देखिए फोन लग गया है, अब आप लोग परदेश में रहने वाले बेटे-भाई से बात कर सकते हैं। लेकिन ध्यान रखिए हफ्ते बाद मीटर लग जाएगा,उस पर जो पैसा उठे अदा कर दीजिएगा। क्योंकि महिने के अंत में टोटल बिल आता है,उसे पूर्णिया में जमा करना होगा। जमा नहीं करने पर फोन लाइन काट दिया जाता है। आप लोग समझ रहे हैं न... !”
सभी शांति पूर्वक बातें सुन रहे हैं, तभी सुरेश कका पसीना पोंछते आए और मालिक को इतल्ला किया कि टेलीफोन बूथ का आफिस तैयार हो गया है। मालिक ने सिर हिलाकर अपनी स्वीकृति दी। कामत की सारी भीड़ अब टेलीफोन बूथ के आस-पास मंडारने लगी। इधर अंजान बाबू भी हवेली में चले गये। बूथ के पास खड़ी गोमती की मां ने आंचल की खूंट से एक कागज का टुकड़ा निकाला और काका की तरफ बढ़ाते हुए कहा-“ए हो मनेजर बाबू कनी गोमती के बाबू क फोन लगा द न...उ फारबिसगंज में हैं।” इस तरह बूथ अपना काम बिना मीटर के हीं करने लगा। काका घड़ी देखकर पल्स जोड़ने लगे...।
बूथ के आने से गांव काफी कुछ बदला, लोग-बाग अब शहर से नजदीकी बनाने लगे हैं। अब तो गुलाबबाग मंडी के भाव से अनाज की खरीददारी होने लगी है। समय के संग बहुत कुछ यहां बदला है।
2006 में जब पटना से पंकज यहां आया तो उसे सबकुछ बदला नजर आया। यदि बदला कुछ नहीं तो कामत और टेलीफोन बूथ। अभी भी गांव का बूथ यहीं है, हां कामत पर एक और टेलीफोन बूथ ने अपनी जगह बना ली है- डब्लूएलएल के रूप में। तकनीकी रूप से विकास की राह पकड़ता चनका गांव बेतार के माध्यम से भी जुड़ चुका है।
दिल्ली-पंजाब से पैसा कमाकर आने वाले कमाऊ पूत जिंस-टीशर्ट, गाना-बाजा से लबरेज हो गए हैं। बूथ के आसपास मंडराते लोग एक अलग ही भाषा को फैला रहे हैं। दिल्ली का भाषायी साफ्टवेयर अब इस गांव में फिट नजर आ रहा है। सुरेश काका अब बूढ़े हो चले हैं, उनकी जिन्दगी अब टेलीफोन बूथ से जुड़ गयी है। उनका बेटा मनोज डब्लूएलएल बूथ का आपरेटर है। अंजान बाबू हफ्ते में एक दफे कामत का दौरा करते हैं। इनके छोटे भाई अब मुखिया जी हो गये हैं। गांव की कमान अब उनके हाथ में है। लेकिन गांव वालों के अनुसार “बड़े मालिक हीं पर्दे के पीछे हैं”। मुखिया जी ने बूथ पर सौर लाइट की व्यवस्था कर दी है। इस कारण अब रात के 9 बजे भी लोग बूथ पर डटे रहते हैं। पुराने बूथ पर एक परचून की दुकान खोल दी गयी है। इसकारण बूथ का स्वरूप अब बदला-बदला नजर आता है।
पूरा गांव अब बिजली, टेलीफोन,और गाने-बाजे से चकाचक कर रहा है। सुनने में आया है कि मुखिया जी विडियो हाल खोलने वाले हैं। बिजली के बाद जबसे टेलीफोन यहां आया है ,कुछ न कुछ नयापन देखने को मिलता रहा है। गांव के अधिकतर पुरूष जो पलायन कर चुके हैं, अब सभी टेलीफोन के सहारे गांव से जुड़े हैं। तो न कमली कहती है-
“सजन छोड़ न अपन गांव रे,
तू कर याद टेलीफून से......”
यादव टोले के हरिश ने एक मोबाइल खरीदा है। वह इसे आजादी का अस्त्र मानता है। हरिश अक्सर कामत पर काका के साथ मोबाइल को लेकर घंटो बहस करता है। काका बड़े ध्यान से मोबाइल की बारीकियों को समझ रहे हैं। इससे पहले काका केवल मालिक के हाथ में इसे देखते थे। लेकिन हरिश ने जब नोकिया-1100 का सेट उनके हाथ में थमाया तो वे खुद को काफी आगे देखने लगे।
काका की जुबान में-“ टेक्नीकल विकास का बीज अब घर-घर पहुंच रहा है।” अंजान बाबू अक्सर कहा करते हैं- “गांव को बदलने के लिए नौजवानों को टेक्नीकल नालेज प्राप्त करना होगा।“
गांव के इस नये रूप को देखकर आज वे खुश तो जरूर होंगे..।


-गिरीन्द्र नाथ झा
सराय-सीएसडीएस के स्वतंत्र शोधवृति कार्यक्रम (2006) के दौरान प्रस्तुत शोध पत्र से साभार।
(विषय- प्रवासी इलाकों में टेलीफोन बूथ संस्कृति)

2 comments:

Shrish said...

वाह एकदम जीवंत और रुचिकर वर्णन किया। फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी 'पंचलाइट' की याद आ गई।

सच में पुराने जमाने में टेलीफोन का ऐसा ही क्रेज था।

Avinash said...

Really your description of telephone history is remarkable, and appricable with truth and fact.