Monday, February 26, 2007

एक नज़र लालू की रेल बजटवा पर


लालू की रेल बोली छयां-छयां...कमाल हो गयील्...भैया.

रेलवे को 20 हज़ार करोड़ रुपए का लाभ हुआ है. पिछले साल ये लाभ 14 हज़ार 700 करोड़ रुपए था.
किसी भी श्रेणी के यात्री किराए में कोई वृद्धि नहीं.
यात्री किराए में कमी- पैसेंजर गाडियों के दूसरी श्रेणी के किराए में प्रति यात्री एक रुपए की कमी. एसी प्रथम में व्यस्त सीजन में तीन फ़ीसदी और एसी द्वितीय श्रेणी के किराए में दो से चार प्रतिशत की कमी.
व्यस्त सीजन 16 अप्रैल से 14 जुलाई और 16 सितम्बर से 14 जनवरी
संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले परीक्षार्थियों के लिए किराए में पचास फ़ीसदी की छूट.
रेल के डिब्बों में यात्रियों की सहूलियत के हिसाब से बदलाव होगा और सामान्य श्रेणी के डिब्बों में सभी सीटें गद्देदार होंगी.
अकेले यात्रा करने वाले वरिष्ठ नागरिकों और 45 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं के लिए निचली बर्थ का कोटा बढ़ाया जाएगा.
दूधियों, सब्जी वालों और छोटे कारोबारियों के लिए यात्री गाड़ी में अलग डिब्बों की व्यवस्था.
रेलवे कॉल सेंटर के ज़रिए रेल टिकट और होटल की बुकिंग की जा सकेगी.
पेट्रोल पंपों और डाकघरों में रेलवे ई-टिकट बेचे जाएँगे.
दो साल के भीतर बड़े शहरों में छह हज़ार ऑटोमेटिक टिकट मशीनें लगाई जाएंगी.
पेट्रोल, डीजल परिवहन भाड़े में पाँच फ़ीसदी की कमी.
200 स्टेशनों को मॉडल स्टेशन बनाया जाएगा.
इस साल आठ नए ग़रीब रथ और 32 नई रेलगाड़ियाँ चलेंगी. 23 जोड़ी गाड़ियों का विस्तार और 14 जोड़ी गाड़ियों के फेरे बढ़ेंगे.
यात्री गाड़ियों में 800 अतिरिक्त डिब्बे लगाए जाएंगे.
शयनयानों में बर्थ की संख्या 72 से बढ़ाकर 84 की जाएगी.
रेलवे वर्ष 2007-08 को सफाई वर्ष के रूप में मनाएगा.
एक्सप्रेस ट्रेनों में दो और सामान्य श्रेणी के डिब्बे लगाए जाएँगे.
विकलाँगों के लिए विशेष दरवाज़े बनाए जाएंगे.
चार हाई स्पीड कोरीडोर के लिए अध्ययन. इन मार्गों पर ट्रेन 250 से 300 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से दौड़ेगी.
कुछ स्टेशनों पर सीसीटीवी कैमरे लगेंगे और सभी टीटीई को पाम-टॉप्स दिए जाएंगे.
मालभाड़ा दरों में कोई वृद्धि नहीं. तीन मंजिला कंटेनर चलाए जाएंगे.
रेलवे पूछताछ का नया टेलीफोन देशभर में 139 होगा.

Thursday, February 22, 2007

कोंकणी कविता रीति-रिवाजों का किला तोड कर.....

रीति-रिवाजों का किला तोड कर मुक्त हुआ
और सुख पाया
छोटी-बडी परंपराओं की
भयानाक भूतनियां
भिन्न भिन्न प्रकार से नाचती थीं
कोई मर गया रोने चलो
कोई पैदा हुआ हंसने चलो
किसी का ब्याह हुआ जल्दी जाकर काम का दिखवा करो
किसी के माथे पर काली मिर्च का लेप लगा
उठो, दौडो उसका हाल चाल पूछो
हमें रिवाज के मुताबिक कोट पहनना चाहिए
वैसी हीं धोती पहननी चहिए
पवित्र वस्त्र ओढ्ना चाहिए
नाते का कोई मर गया
कडा सूतक रखना होगा
सादा पत्र लिखना हो
सप्रेम नमस्कार विनती विशेष लिखना होगा
अगर मैं मंदिर गया तो गाल पीट कर माफी मांगनी होगी
दोस्तो के जन्मदिन पर तोहफे देने होंगे
घर मे कड्की है अमीर होने का दिखावा करना है
इश्वर मे आस्था नही पक्का भक्त होने दावा करना है
पत्नी के पास गले मे फूटी मणी भी नहीं
उसके लिए फूलो का आभूषण खरीदना होगा
कदम-कदम पर परंपराओ के नकाब ओढ्ने चाहिए
सच्चा मनुष्य दफन हो गया हो तो उसे खोद कर
निकालना चाहिए
ऊपरी दिखावा न करें तो समाज -बाहर होना चाहिए
जब मैं ने परंपराओ को छोडा
तभी मैं सुखी हुआ.

Tuesday, February 20, 2007

मिथिला की संस्कृति और लोकगीत

विजय कुमार मेरे मित्रो मे एक हैं, पेशे से अनुवादक हैं और खुद में ढेर सारी जानकारी छुपा कर रखे हैं. कुछ दिन पहले इनसे मुलाकात हुई तो मैंने इन्हें अपने "अनुभव" के बारे में बताया. जनाब लिखने को तैयार हो गये. मिथिला के ग्रामीण इलाके से ये अब ढेर सारी बातों को अपने अनुभव के द्वारा "अनुभव" में बयां करेगें.
विजय भाई की पहली पाती "अनुभव" के लिए आपके सामने-


मिथिला की लोक संस्कृति का एक अभिन्न एवं अनुपम भाग वहां विभिन्न अवसरों पर गाया जानेवाला लोकगीत है जो बेजान से मौसम को भी रस-आनंद से सराबोर कर देता है। होली के इस रंगीन मौसम में पूरा वातावरण यहां तक कि भूमि, हवा, जल -- सारा कुछ रंगीन हुआ दिखता है। वैसे तो यह बसंत पर्व हर रिश्ते में मिठास घोलने के लिए रस मुहैया कराता है लेकिन इस मौसम में देवर-भाभी के बीच का सौम्य-प्रणय यहां कुछ अलग ही छटा बिखेरता है-

"भैयाक सनेह छै कि हमर गुलाल छै

किछु कहियौ ने केकर कमाल छै

हे यै भौजी ई गाल किएक लाल छै..."

उधर बागों में आम के महकते मज्जर में टिकोले आ जाते हैं और इधर होली का यौवन और प्रौढ़ हो जाता है और आ जाता है बैसाखी पर्व, 'जूड़-शीतल' – एकदम अलबेला... भांग की मस्ती में धूल-धुसरित... जहां रंग की जगह मिट्टी घोल और अबीर-गुलाल की जगह जन्मभूमि की सुरभित-सुवासित मिट्टी पाउडर बना मिलता है।

आनंद का यह मौसम अपना पंख और फैला लेता है जब गेहूं, दलहन आदि फसल कटने लगता है और किसानों की खाली कोठी-बखारी अनाजों से भरने लगते हैं। भैया दूज, चौठ-चन्द्र (गणेश चतुर्थी), दुर्गापूजा, दिवाली आदि के बाद छठ पर्व आता है जिसमें पोखरा, नदी आदि के किनारे सजे हुए कलश जहां उन आस्तिकों की श्रद्धा को दर्शाता है वहीं पूरा वातावरण रंग-बिरंगे सुरीले रागों से आह्लादित रहता है-

"अंगना में पोखरी खुनाइब

छठि मइया अएथिन्ह आइ..."

मुंडन, जनेऊ और विवाह गीत की चर्चा के बिना मिथिला लोकगीत की चर्चा बेमानी है। इन शुभ अवसरों पर प्रेम और आह्लाद के शृंगार से सुसज्जित गीत ऐसे ही स्वतः अपने साथ आनंदातिरेक में बहा ले जाता है। एक मुंडन गीत, जो सुनते ही बनता है, कुछ ऐसा है-

"...बउआ के मौसी हजमा तोरे देबौ रे

हजमा रे धीरे-धीरे कटही बौआक केश

कि बउआ बड दुलारू छै रे...."

अब एक जनेऊ गीत को देखें, जहां हर बरुआ में राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न की छवि देखी जाती है-

"आगे माय के देता मूजक डोरी के मिरगा छाल

आगे माय के देता पियर जनेउआ बरुआ चारू भाय..."

वहीं शादी-विवाह में अपनी तीखे तेवरों वाली सालियों से घिरे दुल्हे राजा उनकी खिलखिलाती हंसी के बीच कुछ ऐसे मजाक का सामना करते हैं-

"अहांक बहिनी पूछत भैया रूसल छी किया

अप्पन शायरक नाम नइ हंसायब यौ दुल्हा

अप्पन चोटकल-चोटकल गाल के फुलाउ यौ दुल्हा…"

वहीं विवाह के अन्य गीतों का कुछ अपना ही गहरा भाव है-

"लाजो नइ लगै छौ रघुवर हाथ धरै छा

रघुनंदन हो पोषल धीया सियाजी हमार..."

वहीं सिन्दुरदान के समय का यह गीत-

"…दुल्हा सिन्दुर लियौ हाथ, सोना सुपारी के साथ

सीता उघारी लियौ मांग सिन्दुर लै लाय..."

सरीखे गीतों का माधुर्य हृदय को एक अलौकिक रसानुभूति कराता है। वहीं कन्यादान का यह गीत रिश्तों के अंतरंग दर्द से ओत-प्रोत गहरी संवेदना को जन्म देता है-

"…जंघिया चढ़ाय बाबा बैसल मंडप पर

आजु करिय धीयादान यौ..."
जिसपर जिन्दगी की हर खुशी निसार है वह दिल का टुकड़ा आज खुद से अलग हो रहा है, लगता है यह शरीर मृतप्राय होने जा रहा है, जबकि ये सामाजिक रश्म भार स्वरूप बेटी की विदाई पर खुश होने को कहता है...स्थिति ऐसी है जिसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। यह गीत ही बताता है कि इस संस्कृति में भावनात्मक स्तर पर आपसी रिश्तों की जुड़ाव का जड़ कितना गहरा है।

Saturday, February 17, 2007

देखें और जसराज के रस में डूबकी लगाऐं...

जसराज , नाम हीं काफी है..हर संगीत प्रेमी उनके गीत-भजन का दिवाना होता है. जब भी दिल्ली आते हैं तो उन्हे सुनने का मौका मैं खोज निकालता हूं.
एक संगीत कार्यक्रम में जब १६ फरवरी को उनका दिल्ली आना हुआ तो मैं निकल पडा,उन्हे सुनने को. महाशिवरात्रि के पावन मौके में उनके शिव भजन को लोग कैसे न सुने ! मध्य रात्रि तक पं.जी का कार्यक्रम चलता रहा...
हम सब ध्यानमग्न होकर सुनते रहे.
अपने जय घोष -जय हो ! के स्वर से हर किसी को अपनी ओर खिंचने वाले जसराज के साथ तकरीबन एक घंटे ग्रीन रूम में बात करने का मौका मिला. बेहद संजीदगी से बात करने वाले जसराज बेहद नट्खट बच्चे की तरह बतियाते रहे. बातों के साथ्-साथ उनका रियाज़ भी जारी था. मनमोहक अंदाज में हाथों का घुमाना हो या फिर आंखों ही आखों बातों को कहना..ये सब जसराज जी के संग मैं महसूस करता रहा.
बीच-बीच में एक व्यक्ति उनका नब्ज भी जांच करता रहा.
समय कैसे गुजरे पता न चला, जसराज जी बोले-" अब चलो, स्टेज पे देखना.." तभी एकाएक बच्चे की तरह कह उठे-" मुझे जोर से भूख लगी है..पहले कुछ खाउंगा.."
ऐसे हैं..सहज अपने जसराज.
इस बीच मैंने उनके कुछ फोटो लिए...
देखें और जसराज के रस में डूबकी लगाऐं...



Thursday, February 15, 2007

विद्रोह है या क्रांति


ब्रजेश कुमार झा का लेखन की दुनिया से पुराना नाता है, जमकर लिखते हैं, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली से इन्होने अपनी पढ़ाई पूरी की। सम्प्रति पत्रकारिता की दुनिया से जुड़े हुए हैं। फिल्मी गीतों पर इनका अध्ययन काफी रोचक है। पिछले साल सराय-सीएसडीएस के स्वतंत्र शोधवृत्ति कार्यक्रम मे इन्होनें हिन्दी फिल्मों के गीतों पर शोध किया। आजकल भी इनका शोधकार्य जारी है, यह अलग बात है कि सराय के कार्यक्रम से ये अब जुड़े हुए नहीं है. तथापि इनका काम हिन्दी फिल्मी गीतों को लेकर चलता ही रहेगा। यहां पेश कर रहा हूं, उनके एक आलेख का जो काफी दिन पहले मुझे मेल पर मिला। आनंद उठाइए...
(यह आलेख उस समय का है जब "रंग दे बसंती" फिल्म हमलोगों के सामने आयी थी. )
कैसा लगा जरूर बतायें.

क्या है न कि बालीवुड में कबीरा चल चला चल वाली स्थिति है। सही भी है। आखिर रूका क्या है जो रहेगा। फिल्में आनी -जानी हैं। जो फिल्में दर्शक के दिमागों पर चढ़ जाती है वो जाने में थोड़ा वक्‍त लगाती है।ठीक यही स्थिति बड़े जगहों में ' रंग दे बसंती को ' लेकर भी हुई। फिल्म आई और दम भर चली। लोगों ने कई-कई बार फिल्म को देखा। वे लगातार बेचैनी महसूस करते रहे। गाने लगे-
घर बता कर आए है ,
हम सुलगने आए है,

खलबली है खलबली

है खलबली……… ।

तभी तो अखबारों- पत्रिकाओं के कई पन्ने खर्च हो गए इसके पीछे।

बालीवुड में हर हप्‍ते दसों फिल्में आती हैं। किन्तु, इससे शहरी जीवन में बाहरी बदलाव को छोड़ कर कोई खास बात नहीं होती। यहां युवा वर्ग अपनी मर्जी से मनचाहा रफ्तार लेता है। ' धूम' आई तो बड़े शहरों में मोटरसाइकिलों की आवाज और रफ्तार एक साथ बदल गई। यह साफ-साफ दिखा। छोटे शहर इससे बिलकुल अछूते रहे, कस्बों की तो बात ही छोड़ दें। उसी तरह ऐसा हरगिज नहीं है कि ' रंग दे बसंती' आई और बसंती-बसंती लगा पूरा देश करने। छोटे शहरों, गांव– कस्बों में कोई खलबली नहीं मची है।जबकि इस पंक्‍ति के लेखक का ख्याल है कि देश के युवाओं में हताशा, बेरोजगारी का जो आलम है उस स्थिति में यह असम्भब नहीं था।

बालीवुड का इतिहास गवाह है कि पूरी फिल्म की तो बात छोड़ें केवल एक गाना ऐसी खलबली मचा सकता है। ऐसे कई उदाहरण हैं। गुलाम भारत में बनी ' बंधन' फिल्म का एक गीत है ' चल- चल रे नौजवान' ।इसे कवि प्रदीप ने लिख था। कड़े सेंसर के बावजूद इस गीत ने अंग्रेजी हुकूमत को बड़ी परेशानी में डाल दिया था। महादेव भाई देसाई ने इस गीत की उपमा उपनिषद के मंत्र से की थी। बलराज साहनी उन दिनों बी.बी.सी.लंदन में थे। इस गीत को उन्होंने लंदन से प्रसारित कर दिया। या फिर आजाद भारत में – ऐ मेरे वतन के लोगो। हाँ! यह बात सही है कि तब परिस्थितियां दूसरी थी। पर , आज से भी लोग कहां संतुष्‍त हैं। नक्‍सली गतिविधियां, आतंकवादी घटनाएं रोज अखबारी खबर बनती है। हर अगली सुबह और भी साफ होता है कि युवाओं ने अपना सब्र खोया है।

लिहाजा , बालीवुड युवाओं के वास्ते फिल्म तो बना रहा है पर छोटे शहरों व कस्बाई-ग्रामीण युवकों को अपनी ओर नहीं खींच पाता। उनसे बालीवुड का सरोकार कम होता गया है।

खैर! बालीवुड देशभक्ति की एक नई परिभाषा गड़ रहा है। फिल्मों में घटनाचक्र कुछ इस प्रकार बुने जाते हैं कि एक खासा दर्शक वर्ग के बीच द्वंद्व पैदा हो सके। वह कई अनाम भावों को जन्म देता है। युवकों में देशभक्ति का जज्बा पैदा करने से कहीं ज्यादा उन्हें विद्रोही बनाने की सफल कोशिश करता है। हु तू तू को इस श्रेणी में रखा जा सकता है।

' रंग दे बसंती ' के पात्र गाते हैं- कुछ कर गुजरने को खुन चला खुन चला…… । यहं हम उसकी प्रतिबद्धता को महसूस कर सकते हैं।खासकर बड़े शहरों में रह रहे या उस ओर पलायन कर चुके युवाओं में फक्कड़पन, गैर जिम्मेदाराना रवैया व पलायनवादी प्रवृति के बावजूद एक हूब्ब है। एक जुनून है। यही बातें वक्‍त आने पर उन्हें जिम्मेदार बना देती हैं। वह कुछ भी करने को तैयार दिखता है। अंतत: कर डालता है। हु तू तू फिल्म को ही याद करें। यहां नक्सलवादियों के साथ होकर लड़की मानवबम का रूप लेती है। और तत्कालीन मुख्यमंत्री की हत्या कर देती है जो उसकी मां थी। यह बात दूसरी है कि ' रंग दे बसंती' फिल्म बड़ी होशियारी पिता की हत्या पर देशभक्‍ति का मुलम्‍मा चढ़ा कर पेश करती है।यह अटपटा भी नहीं लगता है।

पिछले साल एक फिल्म आई थी ' हजारों ख्‍वाहिशें ऐसी' इसमें विश्‍वविद्यालय के छात्र नक्सलवाड़ी आंदोलन की राह हो लिए थे। भूल-भुलैया में न रह कर क्या हम मान लें कि आजाद भारत का सच अब यही है। क्योंकि , रक्षामंत्री की हत्या तो एक आतंकवादी घटना हुई ना। वह किसी विचार के तहत की गई हो या फिर भावावेश में आकर।सिनेमा होल तालियों की गड़गड़ाहट से इतना गूंजा कि पूछिए मत! यकायक महसूस हुआ कि दर्शक ऐसे समाधानों से सहमत है। ' हु तू तू ' को अंत तक देखने की हिम्मत कम ही लोग जुटा पाए थे। अत: वहां तालियों की आवाज कम ही सुनाई देती थी। यह भी कह सकते हैं कि ' हु तू तू ' से ' रंग दे बसंती ' तक के सफर में विद्रोही प्रवृति और प्रबल हुई हो। तभी तो गाने आए —–

ऐ साल, वो अभी- अभी हुआ यकीं

की आग है मुझमें कहीं

हुई सुबह में जल गया

सूरज को मैं निगल गया।

एक बात गौरतलब है कि नई फिल्में कई दृश्‍यों व प्रसंगों का आभास मात्र कराती है। किन्तु , चुम्बन या उससे आगे के दृश्‍य स्पष्‍ट करती है। यहं प्रतीकों के दिन अब लद गए हैं। बाकी, जो खुलापन है वह हदतोड़ है। इस बदलाव को जैसी मर्जी हो वैसे देखें। बाजार की मांग के रूप में

या मानसिक खुलापम के तौर पर ।

वैसे भी ,सिनेमा दर्शकों की रुचि को परिष्‍कृत करने का जिम्मा कब का त्याग चुका है।

अब आगे–

व्यवस्था की खामी, विचारघारा की लड़ाई आदि कई चीजें बालीवुड दर्शकों को विभिन्न स्तरों पर महसूस कराता है। वह साफ करता है कि स्वतंत्र भारत में भी विरोध का कोई लोकतांत्रिक तरीका अपनाना बड़ा कठिन है। ' रंग दे बसंती' के घटना क्रम को ही याद कर लें या फिर ' हु तू तू' के दलित नेता को। यहां एक काबिल आदमी को जिन्दा लाश में तब्दील कर दिया जाता है। देश की सभी सरकारों ने अपने छोटे-बड़े कार्यकाल में कई बड़े-बड़े उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। इस हमाम में कपड़े वाले कौन हैं इसे लेकर तो सतर्क निगाह के बावजूद जनता धोखा खाती रही है। ऐसे में बिस्मिल अश्फाक आदि की याद वो हमें क्या दिलाएंगे! बड़े आश्‍चर्य की बात है कि हममें बिस्मिल आदि को बाहरी निगाहों से देखने की आदत पड़ गई है। एक विदेशी लड़की हमें महसूस कराती हैं कि ऐसे व्यक्‍ति हमारे लिए कितनी अहमियत रखते हैं। वरना हमने तो अपनी आखें ही मूंद रखी हैं।

जब नया युवा वर्ग अपनी स्मृति से इन क्रांतिकारियों को बाहर कर चुका है तो वह क्रांति और विद्रोह में कैसे फर्क कर पायेगा! वह कुछ भी करेगा तो हूब्ब में ही। आगे इसके परिणाम कभी अच्छे होंगे, ऐसी सम्भावनाएं बड़ी कम रहती हैं। माचिस, हु तू तू से होता हुआ ' रंग दे बसंती' तक का अंत इसका प्रमाण है।

एक बात और यहं देशप्रेम बहुत बिकाउ है और इसका सिने जगत के कुछ लोगों बड़ा फायदा उठाया है। " रंग दे बसंती ' इसी परंपरा की एक मौलिक कड़ी है।

बिहारः पहचान से विकास तक






बिहार एक ऐसी भूमि जिसकी उर्वरता हीं उसकी पहचान है. उर्वरता के सभी
मायने में बिहार सर्वोच्य हीं रहा है. कृषि से लेकर राजनीति के पाठशाला
तक यह भू-भाग अपनी पहचान बनाए रखा है. वैसे हर पक्ष का सकारात्मक और
नकारात्मक पक्ष होता ही है, इसलिए बिहार को लेकर भी कई हलकों में बहसे
हुआ करती है. शायद जीवंत भू-भाग का होना ही बहस की मौलिकता होती है. इसी
कारण इस क्षेत्र को लेकर भी बहसे हुआ करती है.
१९१२ में जब बिहार बना था
और २००० में बिहार से बंट्कर झारखंड बना तो भी कई बहसें हुई. लेकिन इन
सबके बीच भी बिहार की उर्वरता बनी रही और अपनी जीवंत मौलिकता को बिहार
खुद में समेटे रहा. यह अलग बात है कि उद्योग के सभी प्रमुख स्थल बिहार से
जुदा होकर झारखंड के हो गये. लेकिन अभी भी बिहार के संग कई प्रमुख स्थल
जुडे हैं.
बिहार की पहचान और विकास की लडाई अरसे से लडी जा रही है. दरअसल पहचान के
लिए बिहार की जनता न केवल अपने राज्य में अपितु देश के अन्य हिस्सो में
भी संघर्ष कर रही है. बडी संख्या में बिहार के ग्रामीण इलाकों से मजदूरों
का पलायन हो या फिर शिक्षा,उद्योग,प्रंबधन या फिर पत्रकारिता के क्षेत्र
में बिहार के बुद्धिजीवियों का तबका, ये सभी देश के अलग-अलग हिस्सो में
विजय पताका लहरा रहे हैं. सच्चाई यही है कि यहां के लोग मेहनत को अपना
मौलिक अधिकार समझते हैं.जिसकारण देर ही सही सफलता इनके हाथों में चली हीं
आती है. बिना किसी राजनैतिक-सामाजिक या सैद्धांतिक वैमनस्य के ये लोग
देश-विदेश के अलग-अलग हिस्सों में अपना काम बखूबी निभा रहे हैं.
बिहार-झारखंड के विभाजन से पहले भी पिछली शताब्दी में यह राज्य भौगोलिक
विभाजन का शिकार हुआ है.
बीसवीं सदी के प्रारंभिक काल में जब बंगाल
प्रेसिडेंसी से बिहार अलग हुआ , को छोड् यहां जाति एवं वर्ग भेद को
नकारने वाला कोई राज्य केन्द्रित आन्दोलन कभी नहीं हुआ. अलग बिहार राज्य
के उस वक्त् के आन्दोलन का भी सामाजिक आधार सीमित था.
१९४७ में आजादी के वक्त बिहार की स्थिती अन्य राज्यों के तुलना में बुरी
नहीं थी. वस्तुतः उस समय राज्य में दो बडे निवेश किए गए थे. जमशेदपुर में
टाटा द्वारा इस्पात कारखाना स्थापित करने का पूर्णतः देशी औद्योगिक
उपक्रम आरंभिक बीसवीं सदी के पूरे औपनिवेशिक पटल पर संभवतः पहला और अकेला
प्रयास था. आजादी से पहले भी डालमिया द्वारा बिहार के मैदानी
हिस्से(डालमियानगर)में भारी औद्योगिक निवेश किया गया था. आजादी के बाद इन
प्रयासों को और मजबूत और प्रोत्साहित करने के बजाय, बिहार की विकास-नीति
कुछ ऐसी रही कि १९६१ के आते-आते बिहार पूरे देश में नीचे से दूसरे स्थान
पर धकेल दिया गया और १९७१ तक बिहार सबसे नीचे पहुंच गया. आंकडो के जाल से
यदि हम बाहर निकलने की कोशिश करें तो अभी भी बिहार के अंदर कई उम्मीदें
उबाल मार रही है. दरभंगा,
भागलपुर,पुर्णिया,मुज्जफरपुर,
हाजीपुर,
,गया,सोनपुर आदि जगहों असीम
संभावनाये हैं. वहां तो स्थानीय स्तर पर कई कार्य हो रहे हैं. गौरतलब है
कि देश के बडे जमीन्दारों में अग्रणी दरभंगा महाराज ने स्वतंत्रता पूर्व
और देश के स्वंतत्र होने के बाद भी कई महत्वपूर्ण कार्य किए. अभी भी राज
परिवार की विशाल और भव्य इमारतें दरभंगा शहर को क्लासिक सुन्दरता प्रदान
करती है. स्थानिय विश्वविद्यालय की इमारतें और कैंपस भी कुछ यही बयां
करती है. पर्यटन के लिहाज़ से यदि इस शहर पर ध्यान दिया जाए तो बडी संख्या
में पर्यट्कों को दरभंगा अपनी खींच सकता है. अतुल्य भारत (भारत सरकार का
पर्यट्न अभियान)की कडी में भी यह शहर जुड्ने के काबिल है. इसी राजपरिवार
ने १९३२ में प्रसिद्ध अंग्रेजी दैनिक अखबार "इंडियन नेशन" को बाजार में
उतारा. गौरतलब है कि यह अखबार अपने समय में पत्रकारिता जगत को कई मशहूर
नाम दिए हैं. बाद में इसी दरभंगा राज परिवार ने "आर्यावत" के नाम से
हिन्दी अखबारी दुनिया में कदम रखा. इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि
दरभंगा राज ने समाज विकास के क्षेत्र में कैसे-कैसे माँड्ल पेश किए.
ऐसा कहा जाता है कि इतिहास वर्तमान और अतित के बीच संवाद होता है, इसी
कारण बिहार के विषय में भी अतित को जानना जरूरी है. अपने गौरवशाली इतिहास
के कारण यहां की हर बात ही निराली है. वैसे भी बिहार संस्कृति और व्यंजन
के क्षेत्र में आकर्षक बाज़ार उपलबद्ध कराया है. पिछे पलट कर देखे तो पता
चलता है कि जब कोई भी उभरता कलाकार राष्ट्रीय पट्ल पर स्थापित होना चाहता
था तो उसे पट्ना शहर में दशहरा के अवसर पर अयोजित होने वाली संगीत-संध्या
में आना अनिवार्य था. यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि बहुत से बडे
सितारे राष्ट्र स्तर की ख्याति प्राप्त करने से पहले पट्ना की गलियों में
अवतरि हुए थे. पट्ना का पुणे के समान्तर ही ट्रैक रिकार्ड रहा
है,आवश्यकता इस बात की है कि इन रिर्काडों का बाजारीकरण किया जाए.

बिहार से पलायन की स्थिती भी काफी रोचक है. ग्रामीण इलाको से पलायन हो या
फिर शहरी मध्यवर्गीय युवाओं का पलायन, ये सभी दिल्ली,मंबई,
गुवाहाटी,पंजाब आदि जगहों में अपनी स्थिती मजबूत बनाए रखे हैं. दिल्ली
जैसे महानगर में तो स्थिती और भी रोचक है. एक सर्वे के मुताबिक दिल्ली और
एनसीआर के इलाके में हर तीसरा व्यक्ति बिहार से ताल्लुक रखता है. ये लोग
दिल्ली की तकदीर बदलने में सहायक स्तंभ माने जाते हैं. मेट्रो का जाल
बिछाना हो या फिर उसका प्रबंधन हिस्सा, हर जगह इनकी उपस्थिती मायने रखती
है. कुछ यही हाल दिल्ली विश्वविद्यालय और जेएनयू का है.
बिहार की उर्वरता इन्हीं तथ्यों और पलायित लोगों से बढ्ती जा रही है.

बिहार की भौगोलिक स्थिती,प्राकृतिक सुन्दरता,पौराणिक और ऐतिहासिक महत्ता
के कारण ही बिहार की भूमि जहां खुद पर गर्व करती है वहीं संर्पूण भारत
बिहार पर खुशी जाहिर करता है. साहित्य्, संस्कृति,और संगीत के क्षेत्र
में भी बिहार की अपनी अलग पहचान है. बुद्ध्,महावीर,गांधी और जयप्रकाश
नारायण की यह कर्मभूमि असल में एक जीवंत प्रयोगशाला है. गंगा-जमुनी तहजीब
को अपनी शहनाई में पिरोने वाले शंहशाह-ए-शहनाई उस्ताद बिस्मिल्लाह खान की
जन्मभूमि यह बिहार सही मायने मे अपनी पहचान और विकास का खुद मापक है.

Sunday, February 04, 2007

टेलिफोन बूथो की एक अलग ही दुनिया है,खासकर ग्रामीण इलाको के बुथो की.बिहार के एक गाँव श्रीनगर (पुरनिया)मे मौजुद बुथो के



टेलिफोन बूथो की एक अलग ही दुनिया है,खासकर ग्रामीण इलाको के बुथो की.बिहार के एक गाँव श्रीनगर (पुरनिया)मे मौजुद बुथो के अध्ययन के दौरान कुछ ऐसा ही देखने को मिला.वहाँ एक बूथ है-"चाँद पे फोन". इस बुथ के मालिक है -चाँद खाँ.इनके साथ मैने एक पुरा दिन गुजारा तो काफी कुछ जान पाया इस "तकनीकी बिजनेस" के बारे मे... सुबह के ६ बजे है...सङके सुनसान है,इक्का-दुक्का लोग नजर आ रहे है..चाँद खाँ अपने घर से निकलकर दुकान पर आता है,दुकान उसके घर के बाहरी दरवाजे पर ही है,इसलिए वह फटाफट दुकान की साफ सफाई कर लेता है.कि तभी राजेश आ जाता है.उसे लुधियाना फोन करना है..वहाँ उसका भाई काम करता है.चाँद झट से फोन लगा देता है.वह बात करके चला जाता है.....खाँ साहब की ये है "पहली बोहनी"(दिन की पहली कमाई)चाँद कहता है-"आज का दिन अच्छा होगा भैया,दुकान खोलते ही कस्ट्मर आ गया.."चाँद ने १२वी तक पढाई की है,आगे न पढ सका.घर वाले काम के लिए कहने लगे थे..बाते हो रही थी कि फोन की घटी बज़ उठी,चाँद ने रिसीव किया तो पता चला पटना से फोन है..."उसे सदानन्द से बात करनी है..,चाँद ने कहा"५मिनट बाद फोन किजीए बुला देता हुँ.." कुछ देर बाद सदानन्द आता है,बात कर चला जाता है,परन्तु वह १०रुपए देत है.मैने बाद मे पुछा"ये पैसा क्यू खाँ साहब?" उसने कहा-"यही तो कमाई है भैया,यहाँ से काल कम होती है,ज्यादा तो बाहर से फोन ही आता है..उसी की कमाई से तो दुकान चल रहा है." बातचीत से मालुम हुआ कि रिसीवीग चार्ज हर जगह क अलग्-अलग है.मसलन दिल्ली का १० रुपए तो पुरनिया का ५रुपए.बातो ही बातो मे ११ बज गए,तो लोगो का आना भी बढ गया.इस समय से लेकर २-३ बज़े तक लोकल काल ज्यादा होती है.दोपहर ढलने के साथ ही चाँद भी ढ्लने लगा(थक गया है चाँद्)...कारण है,वह करीब १५ द्फे इस टोले(बस्ती)से उस टोले गया है,लोगो को बुलाने के लिए.आखिर जिसका फोन आएगा उसे तो बुलाना ही होगा न् !चाम्द कहता है"भैया कभी-कभी तो मन करता है मै भी दिल्ली-पजाब चला जाउँ....थक जाता हुँ.आब्बाज़ान सम्भाले बुथ को.."असल मै यह पीङा है,जो छुपी हुई थी. आज मगलवार है,हटिया(साप्ताहिक बाज़ार्)का दिन ,आसपास के गाँव के लोग आज यहाँ खुब आते है.इसलिए बुथ वालो की भी आज "चलती" रहती है.चाँदआ ब नोरमल है,दोपहर की चिन्ता अब गायब है.बाहर मे वह दो कुर्सी और लगा देता है.तभी एक औरत घुघट ओढे आती है.सुमतीया नामक इस औरत को अपने घरवाले से बात करनी है.वह दिल्ली के करोलबाग इलाके मे रिक्शा चलाता है.सुमतिया एक पुर्ज़ा निकालकर चाँद को देती है.उसमे फोन नम्बर है.वह बात करती है...और पैसे देकर खुशी-खुशी चली जाती है. दरअसल शाम को एसटीडी काल ज्यादा होती है.चाँद कहता है"इस टाइम बाहर काम करने वाले फ्री रहते है,तो लोग बात करते है या वही से फोन आ जाता है....." चाँद आज सचमुच अच्छी कमाई हुई है,कुल ३८० रुपए!भाई यह बोहनी का कमाल है..चाँद के साथ मेरी बाते जारी है..पर लोगो का आना अब कम हो गया है..रात के ८:३० जो बज़ गए है.रेडियो पर राष्ट्रीय समाचार शुरु हो गया है...असल मे चाँद खाँ समाचार सुनकर ही दुकान बद करता है. बिहार के एक गाँव श्रीनगर (पुरनिया) मे मौजुद बुथो के अध्ययन के दौरान कुछ ऐसा ही देखने को मिला. वहाँ एक बूथ है- "चाँद पे फोन". इस बुथ के मालिक है -चाँद खाँ. इनके साथ मैने एक पुरा दिन गुजारा तो काफी कुछ जान पाया इस "तकनीकी बिजनेस" के बारे मे...

सुबह के ६ बजे है...सङके सुनसान है, इक्का-दुक्का लोग नजर आ रहे है..


चाँद खाँ अपने घर से निकलकर दुकान पर आता है, दुकान उसके घर के बाहरी दरवाजे पर ही है, इसलिए वह फटाफट दुकान की साफ सफाई कर लेता है. कि तभी राजेश आ जाता है. उसे लुधियाना फोन करना है..वहाँ उसका भाई काम करता है. चाँद झट से फोन लगा देता है.वह बात करके चला जाता है.....खाँ साहब की ये है "पहली बोहनी"(दिन की पहली कमाई)चाँद कहता है-"आज का दिन अच्छा होगा भैया,दुकान खोलते ही कस्ट्मर आ गया.."चाँद ने १२वी तक पढाई की है, आगे न पढ सका.

घर वाले काम के लिए कहने लगे थे..बाते हो रही थी कि फोन की घटी बज़ उठी,चाँद ने रिसीव किया तो पता चला पटना से फोन है..."उसे सदानन्द से बात करनी है.., चाँद ने कहा "५मिनट बाद फोन किजीए बुला देता हुँ.." कुछ देर बाद सदानन्द आता है, बात कर चला जाता है, परन्तु वह १०रुपए देत है.मैने बाद मे पुछा"ये पैसा क्यू खाँ साहब?" उसने कहा-"यही तो कमाई है भैया,यहाँ से काल कम होती है, ज्यादा तो बाहर से फोन ही आता है.. उसी की कमाई से तो दुकान चल रहा है." बातचीत से मालुम हुआ कि रिसीवीग चार्ज हर जगह क अलग्-अलग है. मसलन दिल्ली का १० रुपए तो पुरनिया का ५रुपए.

बातो ही बातो मे ११ बज गए, तो लोगो का आना भी बढ गया. इस समय से लेकर २-३ बज़े तक लोकल काल ज्यादा होती है. दोपहर ढलने के साथ ही चाँद भी ढ्लने लगा(थक गया है चाँद्).. .कारण है, वह करीब १५ द्फे इस टोले(बस्ती)से उस टोले गया है, लोगो को बुलाने के लिए. आखिर जिसका फोन आएगा उसे तो बुलाना ही होगा न् ! चाम्द कहता है "भैया कभी-कभी तो मन करता है मै भी दिल्ली-पजाब चला जाउँ....थक जाता हुँ. आब्बाज़ान सम्भाले बुथ को.."असल मै यह पीङा है,जो छुपी हुई थी.

आज मगलवार है, हटिया(साप्ताहिक बाज़ार्) का दिन , आसपास के गाँव के लोग आज यहाँ खुब आते है.इसलिए बुथ वालो की भी आज "चलती" रहती है.चाँद आ ब नोरमल है, दोपहर की चिन्ता अब गायब है. बाहर मे वह दो कुर्सी और लगा देता है. तभी एक औरत घुघट ओढे आती है. सुमतीया नामक इस औरत को अपने घरवाले से बात करनी है. वह दिल्ली के करोलबाग इलाके मे रिक्शा चलाता है. सुमतिया एक पुर्ज़ा निकालकर चाँद को देती है फोन नम्बर है. वह बात करती है...और पैसे देकर खुशी-खुशी चली जाती है. दरअसल शाम को एसटीडी काल ज्यादा होती है.

चाँद कहता है"इस टाइम बाहर काम करने वाले फ्री रहते है,तो लोग बात करते है या वही से फोन आ जाता है....."

चाँद आज सचमुच अच्छी कमाई हुई है,कुल ३८० रुपए ! भाई यह बोहनी का कमाल है.. चाँद के साथ मेरी बाते जारी है.. पर लोगो का आना अब कम हो गया है.. रात के ८:३० जो बज़ गए है. रेडियो पर राष्ट्रीय समाचार शुरु हो गया है... असल मे चाँद खाँ समाचार सुनकर ही दुकान बद करता है.