पुछते हैं वह कि गालिब कौन है
कोई बतला वो कि हम बतलायें क्या...
सचमुच कोई पुछे तो चेहरा लाल हो जाता है,लेकिन कोई ऐसी बेवकुफी नही करता है.मेरे गालिब चचा आज भी जिदा हैं.अपनी हवेली से लेकर मजार तक वो शेरो-शायरी करते मुझे मिल जाते हैं.लाल किले की सामने वाली सड्क पर चचा आज भी पतंगो पे शायरी लिख के चुन्ना बीबी के लिए उडाते हैं.....यकीन मानिए दोस्त्!
आप यह नही कह सकते है कि गालिब मर गए.वो तो खुद कहते हैं-
हुई मुद्द्त कि गालिब मर गया,पर याद आता है
वह हर इक बात पे कहना कि यु होता तो क्या होता...
गालिब का जन्मोत्सव जोश के साथ दिल्ली मे मनाया गया.पुरानी दिल्ली से लेकर निजामुद्दीन तक गालिब के नज्म महकते रहे.देश और विदोशो से आए शायर दिल्ली की वही रोनक लौटाने की कोशिश करते नज़र आए जैसा गालिब चचा किया करते थे.पाकिस्तान के मशहुर शायर फरहाज़ अहमद ने समां को बनाये रखा.वही विख्यात डांसर उमा शर्मा ने गालिब की गज़लो और शायरी के साथ बेले डांस पेश किया तो गालिब की ये चंद लाईने जुबां पे आ गयी-
इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के....
जब उमा जी ने गालिब की सुफिया नज़्मो को लेकर नाटिका शुरु की तो गालिब के ये शौक याद आ गये-
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने ,न होता तो मैं क्या होता........
मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Saturday, December 30, 2006
Tuesday, December 26, 2006
साहित्यकार यदि सत्ता के क़रीब रहेगा तो अच्छा नहीं लिख सकता.
वरवर की प्रिय कविता
कसाई का बयान
एक
मैं बेचता हूँ माँस चाहे आप मुझे कसाई कहें
यह आपकी इच्छा मैं मारता हूँ
हर रोज़ पशुओं को काटकर उनका माँस बेचता हूँ.
रक्त देखकर मैं नहीं चौंकता
अपने कसाई होने का अर्थ
उस दिन समझा था मैं
बस गया मेरी आँखों में उस मासूम का ख़ून
फँस गई है मेरे गले में उसकी आवाज़
रोज़ करता हूँ इन्हीं हाथों से पशुओं का वध
लेकिन गला नहीं अभी तक मेरे मन पर ख़ून का दाग़
उस दिन सड़क, पर नहीं.मेरे मन पर फैल गया था
उस बच्चे का ख़ून...क्या तुम इसे धो पाओगे? तुम्हारे इंसानी हाथ
.क्या बोझा हल्का कर पाएँगे मेरे दिल का.
-----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
उसके जिस्म पर टूट गई थीं छह लाठियाँ
क़ातिल के कांधे से बरस रहा था
उसके जिस्म पर बंदूक का कुंदा लगातार.
नली टकरा रही थी सिपाहियों के जबड़ों से और वह सड़क पर चित पड़ा थाशव की भाँति.
एक ने कहा-‘यह चाकू मार देगा’और सुनते ही दूसरे सिपाही ने दाग़ दी गोली
उसके मुठभेड़ में मारे जाने की ख़बरें छपी थीं दूसरे दिन.
मैं पशुओं से हरता हूँ प्राणक्रोध और घृणा से नहीं मैं बेचता हूँ माँसपर स्वयं को नहीं.
====================================================================
हज़ार ज़ख्मों से रिस रहा था रक्त हज़ारों भीगे नेत्र देख रहे थे
मेरे टोहे पर पड़ी बकरी की भाँति
.वह नहीं चीखा था
उसकी आँखों में नहीं थे अश्रु भी जाने क्यों क्या वह देख रहा था आने वाले कल को.
कसाई का बयान
एक
मैं बेचता हूँ माँस चाहे आप मुझे कसाई कहें
यह आपकी इच्छा मैं मारता हूँ
हर रोज़ पशुओं को काटकर उनका माँस बेचता हूँ.
रक्त देखकर मैं नहीं चौंकता
अपने कसाई होने का अर्थ
उस दिन समझा था मैं
बस गया मेरी आँखों में उस मासूम का ख़ून
फँस गई है मेरे गले में उसकी आवाज़
रोज़ करता हूँ इन्हीं हाथों से पशुओं का वध
लेकिन गला नहीं अभी तक मेरे मन पर ख़ून का दाग़
उस दिन सड़क, पर नहीं.मेरे मन पर फैल गया था
उस बच्चे का ख़ून...क्या तुम इसे धो पाओगे? तुम्हारे इंसानी हाथ
.क्या बोझा हल्का कर पाएँगे मेरे दिल का.
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उसके जिस्म पर टूट गई थीं छह लाठियाँ
क़ातिल के कांधे से बरस रहा था
उसके जिस्म पर बंदूक का कुंदा लगातार.
नली टकरा रही थी सिपाहियों के जबड़ों से और वह सड़क पर चित पड़ा थाशव की भाँति.
एक ने कहा-‘यह चाकू मार देगा’और सुनते ही दूसरे सिपाही ने दाग़ दी गोली
उसके मुठभेड़ में मारे जाने की ख़बरें छपी थीं दूसरे दिन.
मैं पशुओं से हरता हूँ प्राणक्रोध और घृणा से नहीं मैं बेचता हूँ माँसपर स्वयं को नहीं.
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हज़ार ज़ख्मों से रिस रहा था रक्त हज़ारों भीगे नेत्र देख रहे थे
मेरे टोहे पर पड़ी बकरी की भाँति
.वह नहीं चीखा था
उसकी आँखों में नहीं थे अश्रु भी जाने क्यों क्या वह देख रहा था आने वाले कल को.
Monday, December 25, 2006
आप इस किताब के जरिए उस्ताद को जान सकते हैं
आप इस किताब के जरिए उस्ताद को जान सकते हैं. पत्रकारिता की दुनिया के जाने पहचाने नाम शिवनाथ झा की यह प्रस्तुति वाकयी लाजबाब है.फोटो के साथ बातें बढाना इस किताब की खासियत है. वैसे भी शिवनाथ जी कलम की दुनिया में जौहर दिखाते ही रहते है, अब फोटो के साथ शब्द घोल रहे हैं....तो जनाब किताब को पलटने की कवायद तेज करें, लगे हाथ बता दूं कि किताब आपको online-http://www.aggarwaloverseas.com मिल सकती है..आखिर जमाने के साथ चलने में बुराई क्या है? बिस्मलाह की शहनाई को पन्ने में उकेरने के लिए एकबार फिर शिवनाथ झा को बधाई...........
Wednesday, December 20, 2006
एक फ्रांसीसी का हिंदी संगीत प्रेम
हिंदुस्तानी संगीत का प्रेम भारतीयों के दिलो में होना तो कुछ स्वभाविक नज़र आता है लेकिन किसी विदेशी के दिल में हिंदी गीतों के लिए प्यार जागना कुछ अनोखी सी बात लगती है.
एक फ्रांसीसी व्यक्ति ने पच्चीस हज़ार हिंदी गीतों के अधिकार ख़रीदे हैं और वह हिंदी गीतों के रचियताओं को समुचित रॉयल्टी दिलाने के लिए भी प्रयास कर रहे हैं.
अशील फ़ोर्लर 1969 से भारत में रह रहे हैं और उन्होंने देश का पहला संगीत प्रकाशन गृह खोला है जिसमें वह इन गानों का एक कैटलॉग प्रकाशित करेंगे.
अशील फ़ोर्लर ने अपनी कंपनी का नाम डीप इमोशंस पब्लिशिंग रखा है और दिल्ली में यह कंपनी शुरू करते हुए उन्होंने शुभा मुदगल को 1996 में बनी फ़िल्म कामसूत्र में गाए गए गीतों के लिए रॉयल्टी दिलाने में मदद की.
54 वर्षीय फ़ोर्लर भारत में फ्रांसीसी दूतावास में काम करते थे और वहाँ वह संगीत विभाग की देखरेख किया करते थे.
उन्होंने इन गानों के अधिकार ख़रीदने के लिए क़रीब तीस लाख डॉलर यानी क़रीब 15 करोड़ रुपए की धनराशि अदा की है.
इन गानों में गीतगार कुंदनलाल सहगल, राहुल देव बर्मन, जावेद अख़्तर और अन्नू मलिक जैसी हस्तियों की रचनाएँ शामिल हैं.
फ़ोर्लर ने सत्यजीत रे की फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी और बासु चटर्जी की रजनीगंधा जैसी फ़िल्मों के संगीत अधिकार भी ख़रीदे हैं.
जानकारी नहीं
अशील फ़ोर्लर कहते हैं कि फ्रांसीसी दूतावास ने 1990 से 1995 के बीच फ्रांस में इस्तेमाल हुए भारतीय संगीत के लिए क़रीब चार लाख डॉलर की रक़म इकट्ठी की थी लेकिन "हम नहीं जानते थे कि यह रक़म किसे अदा की जाए क्योंकि ज़्यादातर संगीत रचनाएँ पंजीकृत नहीं थीं."
फ़ोर्लर रॉयल्टी दिलाने के लिए काम कर रहे हैं
वह बताते हैं कि आख़िरकार यह रक़म फ्रांसीसी गीतकारों को प्रोत्साहित करने के लिए इस्तेमाल की गई.
अशील फ़ोर्लर कहते हैं कि भारत में संगीत रॉयल्टी के बारे में बहुत कम जानकारी है और उन्हें पता नहीं होता कि विदेशों में टेलीविज़न और रेडियो पर इस्तेमाल होने वाले गानों के लिए उन्हें रक़म मिल सकती है.
मसलन, प्रख्यात पटकथा लेखकर और शायर जावेद अख़्तर कहते हैं कि उन्होंने क़रीब 320 फ़िल्मों के लिए कहानियाँ और गीत लिखे हैं लेकिन उनमें से सिर्फ़ 30 के निर्माताओं के साथ ही रॉयल्टी के समझौते किए हैं.
अशील फ़ोर्लर कहते हैं कि इसराइल में इस्तेमाल किए जा रहे भारतीय संगीत के लिए भी कोई रॉयल्टी नहीं मिल रही है. वह बताते हैं कि इसराइल में पिछले क़रीब दो वर्षों में दो हज़ार से भारतीय गीतों का इस्तेमाल रेडियो और टेलीविज़न पर किया गया है.
एक फ्रांसीसी व्यक्ति ने पच्चीस हज़ार हिंदी गीतों के अधिकार ख़रीदे हैं और वह हिंदी गीतों के रचियताओं को समुचित रॉयल्टी दिलाने के लिए भी प्रयास कर रहे हैं.
अशील फ़ोर्लर 1969 से भारत में रह रहे हैं और उन्होंने देश का पहला संगीत प्रकाशन गृह खोला है जिसमें वह इन गानों का एक कैटलॉग प्रकाशित करेंगे.
अशील फ़ोर्लर ने अपनी कंपनी का नाम डीप इमोशंस पब्लिशिंग रखा है और दिल्ली में यह कंपनी शुरू करते हुए उन्होंने शुभा मुदगल को 1996 में बनी फ़िल्म कामसूत्र में गाए गए गीतों के लिए रॉयल्टी दिलाने में मदद की.
54 वर्षीय फ़ोर्लर भारत में फ्रांसीसी दूतावास में काम करते थे और वहाँ वह संगीत विभाग की देखरेख किया करते थे.
उन्होंने इन गानों के अधिकार ख़रीदने के लिए क़रीब तीस लाख डॉलर यानी क़रीब 15 करोड़ रुपए की धनराशि अदा की है.
इन गानों में गीतगार कुंदनलाल सहगल, राहुल देव बर्मन, जावेद अख़्तर और अन्नू मलिक जैसी हस्तियों की रचनाएँ शामिल हैं.
फ़ोर्लर ने सत्यजीत रे की फ़िल्म शतरंज के खिलाड़ी और बासु चटर्जी की रजनीगंधा जैसी फ़िल्मों के संगीत अधिकार भी ख़रीदे हैं.
जानकारी नहीं
अशील फ़ोर्लर कहते हैं कि फ्रांसीसी दूतावास ने 1990 से 1995 के बीच फ्रांस में इस्तेमाल हुए भारतीय संगीत के लिए क़रीब चार लाख डॉलर की रक़म इकट्ठी की थी लेकिन "हम नहीं जानते थे कि यह रक़म किसे अदा की जाए क्योंकि ज़्यादातर संगीत रचनाएँ पंजीकृत नहीं थीं."
फ़ोर्लर रॉयल्टी दिलाने के लिए काम कर रहे हैं
वह बताते हैं कि आख़िरकार यह रक़म फ्रांसीसी गीतकारों को प्रोत्साहित करने के लिए इस्तेमाल की गई.
अशील फ़ोर्लर कहते हैं कि भारत में संगीत रॉयल्टी के बारे में बहुत कम जानकारी है और उन्हें पता नहीं होता कि विदेशों में टेलीविज़न और रेडियो पर इस्तेमाल होने वाले गानों के लिए उन्हें रक़म मिल सकती है.
मसलन, प्रख्यात पटकथा लेखकर और शायर जावेद अख़्तर कहते हैं कि उन्होंने क़रीब 320 फ़िल्मों के लिए कहानियाँ और गीत लिखे हैं लेकिन उनमें से सिर्फ़ 30 के निर्माताओं के साथ ही रॉयल्टी के समझौते किए हैं.
अशील फ़ोर्लर कहते हैं कि इसराइल में इस्तेमाल किए जा रहे भारतीय संगीत के लिए भी कोई रॉयल्टी नहीं मिल रही है. वह बताते हैं कि इसराइल में पिछले क़रीब दो वर्षों में दो हज़ार से भारतीय गीतों का इस्तेमाल रेडियो और टेलीविज़न पर किया गया है.
मुस्लिम महिला ने पढ़ाई नमाज़
अमरीका में एक मुस्लिम महिला प्रोफ़ेसर ने रच दिया जब उन्होंने लगभग 100 लोगों को नमाज़ पढ़ाई.
अमीना वदूद ऐसा करने वाली पहली मुसलमान महिला हैं. उनसे पहले केवल पुरूष ही इमाम हुआ करते थे.
अमीना का कहना है कि उन्होंने ये क़दम इसलिए उठाया है क्योंकि उनका मानना है कि इस्लामी दुनिया में महिलाओं को भी हर मामले में पुरूषों के बराबर के अधिकार होने चाहिए.
अमीना ने कहा,"इस्लाम में औरतों और मर्दों के बीच समानता का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है और मुसलमानों ने दुर्भाग्य से इतिहास का बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण से अर्थ निकाला है".
वे अमरीका के वर्जीनिया राज्य में इस्लामी अध्ययन विभाग की प्रोफ़ेसर हैं.
मगर उनके इस प्रयास की राह में कई अड़चनें भी आईं और कई लोगों ने इसका विरोध भी किया है.
गिरिजाघर में नमाज़
मुसलमानों ने दुर्भाग्य से इतिहास का बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण से अर्थ निकाला है
अमीना वदूद---------
इस विशेष नमाज़ को एक गिरिजाघर में आयोजित करवाना पड़ा क्योंकि कई मस्जिदों ने इसके लिए जगह देने से मना कर दिया.
हारकर आयोजकों ने इसके लिए जब एक भारतीय कला प्रदर्शनी केंद्र को चुना तो उस जगह को भी बम से उड़ा देने की धमकी दी गई.
आख़िर में न्यूयॉर्क में मैनहटन के सेंट जॉन द डिवाइन चर्च में नमाज़ पढ़ी गई.
नमाज़ के लिए लगभग 100 लोग इकट्ठा हुए जिनमें लगभग 40 पुरूष और कुछ बच्चे भी थे.
विरोध-समर्थन
अगर कोई महिला विद्वान हो या कोई पुरूष विद्वान हो, वे अगर नमाज़ पढ़ाना चाहते हैं तो पढ़ाएँ,ये तो बस इबादत के बारे में है
प्रोफ़ेसर वदूद के नमाज़ पढ़ाने का समर्थन तो हुआ है मगर अधिकतर मुसलमानों ने इसका विरोध किया है.
समर्थकों का कहना है कि इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जिसमें किसी महिला पर महिलाओं और पुरुषों को नमाज़ पढ़ाने पर पाबंदी हो.
नमाज़ पढ़ने के बाद बाहर निकले पाकिस्तानी मूल के युवक युसूफ़ अहमद ने कहा,"मुझे तो कोई फ़र्क़ नहीं लगा, अगर कोई महिला विद्वान हो या कोई पुरूष विद्वान हो, वे अगर नमाज़ पढ़ाना चाहते हैं तो पढ़ाएँ,ये तो बस इबादत के बारे में है".
जैसे ईसाईयों में महिला पादरी नहीं बन सकतीं, वैसे ही कोई मुस्लिम महिला भी इमाम नहीं बन सकत
नुसरतवहीं विरोध करनेवालों में से कई तो गिरिजाघर के बाहर भी जमा हुए और प्रदर्शन किया.
एक युवती नुसरत ने इसे इस्लाम के ख़िलाफ़ बताया.
उन्होंने कहा,"इस्लाम में किसी महिला को पेश इमाम बनाने की इजाज़त नहीं है. 1400 साल से इस्लाम में पुरूष ही नमाज़ पढ़ा रहे हैं तो इसमें बदलाव क्यों हो. जैसे ईसाईयों में महिला पादरी नहीं बन सकतीं, वैसे ही कोई मुस्लिम महिला भी इमाम नहीं बन सकती".
वैसे इस पूरे आयोजन में दो घंटे लगे जिसके बीच पूरे गिरिजाघर को पुलिस ने घेरे में ले रखा था और ज़बरदस्त चौकसी बरती जा रही थी.
यहाँ तक कि अमीना वदूद स्वयँ नमाज़ पढ़ने के बाद गुप-चुप तरीक़े से बाहर चली गईं.
अमीना वदूद ऐसा करने वाली पहली मुसलमान महिला हैं. उनसे पहले केवल पुरूष ही इमाम हुआ करते थे.
अमीना का कहना है कि उन्होंने ये क़दम इसलिए उठाया है क्योंकि उनका मानना है कि इस्लामी दुनिया में महिलाओं को भी हर मामले में पुरूषों के बराबर के अधिकार होने चाहिए.
अमीना ने कहा,"इस्लाम में औरतों और मर्दों के बीच समानता का मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है और मुसलमानों ने दुर्भाग्य से इतिहास का बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण से अर्थ निकाला है".
वे अमरीका के वर्जीनिया राज्य में इस्लामी अध्ययन विभाग की प्रोफ़ेसर हैं.
मगर उनके इस प्रयास की राह में कई अड़चनें भी आईं और कई लोगों ने इसका विरोध भी किया है.
गिरिजाघर में नमाज़
मुसलमानों ने दुर्भाग्य से इतिहास का बहुत ही संकीर्ण दृष्टिकोण से अर्थ निकाला है
अमीना वदूद---------
इस विशेष नमाज़ को एक गिरिजाघर में आयोजित करवाना पड़ा क्योंकि कई मस्जिदों ने इसके लिए जगह देने से मना कर दिया.
हारकर आयोजकों ने इसके लिए जब एक भारतीय कला प्रदर्शनी केंद्र को चुना तो उस जगह को भी बम से उड़ा देने की धमकी दी गई.
आख़िर में न्यूयॉर्क में मैनहटन के सेंट जॉन द डिवाइन चर्च में नमाज़ पढ़ी गई.
नमाज़ के लिए लगभग 100 लोग इकट्ठा हुए जिनमें लगभग 40 पुरूष और कुछ बच्चे भी थे.
विरोध-समर्थन
अगर कोई महिला विद्वान हो या कोई पुरूष विद्वान हो, वे अगर नमाज़ पढ़ाना चाहते हैं तो पढ़ाएँ,ये तो बस इबादत के बारे में है
प्रोफ़ेसर वदूद के नमाज़ पढ़ाने का समर्थन तो हुआ है मगर अधिकतर मुसलमानों ने इसका विरोध किया है.
समर्थकों का कहना है कि इस्लाम में ऐसा कुछ नहीं है जिसमें किसी महिला पर महिलाओं और पुरुषों को नमाज़ पढ़ाने पर पाबंदी हो.
नमाज़ पढ़ने के बाद बाहर निकले पाकिस्तानी मूल के युवक युसूफ़ अहमद ने कहा,"मुझे तो कोई फ़र्क़ नहीं लगा, अगर कोई महिला विद्वान हो या कोई पुरूष विद्वान हो, वे अगर नमाज़ पढ़ाना चाहते हैं तो पढ़ाएँ,ये तो बस इबादत के बारे में है".
जैसे ईसाईयों में महिला पादरी नहीं बन सकतीं, वैसे ही कोई मुस्लिम महिला भी इमाम नहीं बन सकत
नुसरतवहीं विरोध करनेवालों में से कई तो गिरिजाघर के बाहर भी जमा हुए और प्रदर्शन किया.
एक युवती नुसरत ने इसे इस्लाम के ख़िलाफ़ बताया.
उन्होंने कहा,"इस्लाम में किसी महिला को पेश इमाम बनाने की इजाज़त नहीं है. 1400 साल से इस्लाम में पुरूष ही नमाज़ पढ़ा रहे हैं तो इसमें बदलाव क्यों हो. जैसे ईसाईयों में महिला पादरी नहीं बन सकतीं, वैसे ही कोई मुस्लिम महिला भी इमाम नहीं बन सकती".
वैसे इस पूरे आयोजन में दो घंटे लगे जिसके बीच पूरे गिरिजाघर को पुलिस ने घेरे में ले रखा था और ज़बरदस्त चौकसी बरती जा रही थी.
यहाँ तक कि अमीना वदूद स्वयँ नमाज़ पढ़ने के बाद गुप-चुप तरीक़े से बाहर चली गईं.
Sunday, December 10, 2006
Call CENTRE Story....HO Ho....Ho


Winter 2004 ,a writer meet a young girl on a night train journey. Writer comes from Kanpur . To pass the time young girl offered to tell a story .But she had a condition ,that writer makes it into his second book.The writer hesitated ,but asked what the story.........the girl said the story ws about six people working in a call center -CONNEXIONS...three guys and three girls who worked at CONNEXION.
The story begins and ends......but the story makes a home at reader's mind.Because the style and the way of of telling the story is so beautiful that anybody who read it wants to meet "three guys and three girls of CONNEXION..
Chetan bhagat' s this novel is in different shape of book , because this is a new experiment in the field of writting.the novel tell us about work culture ,the behaviour of the employee, the languges, the iner voice of emolyee of the callcenter.......etc.We know that the call center culture" at India attracts the young generation ....because this booming industry gives a lot of pocket money ... fashion....food culture and so many western style of living.....But when a young generation enters at callcenter bulding and recive a call or chatt from abroad then they knows the fact of CALLL CENTER....
Chetan bhagat tells something about it , thanks to him that he points out the callcenter and says yes to key board to type on these items.(so he also thanks to MS-WORD).
A very intersting parts comes in this story when a call comes from the God.......God gives a long lesson to six people........God says that there are four things a person needs for sucess---------
1. a medium amount of intelligence
2. a bit of imagination
3. self confidence
4. faliure--to be really sucessful
So this book gives us a wonderful experience to know something extra and something .........
BRAND BIHAREE

Brand- biharee
It takes 27 kilometre drive through bad roads.This is the only way to to reach Chanka, in North Bihar. A small Police station which uses Mahindra Jeep and Tractor as its official vehicle, but this Police station is also 5 km. from this village ! School is without teacher..and there is no doctor to to attend any medical emergency.
But even though the benifit of modern times may be missing, there are occassional signs of urban modernism in this village.The villagers watch the latest mavies with generator powered systems, elder occassionally replace their traditional country liquor with english.. and the young wear Jeans.Thos village is connected to Urban India through its increasing number of migrant labour and WLL Telephone Booth.
2001 census report says that 12 lakh people are estimated to have left Bihar ! "at least 50 per cent of all people of my age have migrated ,more than desperation,it is search for better economic opportunities....." says Manoj kumar .a 22year old , who runs a WLL public telephone booth in Chanka village. When the agricultural season peaks in Punjab , there are days in in North Bihar's Kathiar Railway station. when a lot of tickets are sold for Ludhiana ....the daily Amarapalee Express's general bogy tells the migration story of this district. Moneyorders are the other way to know migration story.In 2001-2002 moneyorder remittance from Bihari migrants to their homes was Rs518 crore! in 2002-2003 it is Rs682 crore up by 32 per cent.Delhi is among the original destinations of migrating Biharis.In 2001 ,the NATIONAL CAPITAL REGION PLANNING BOARD estimated that nearly 11 per cent of Delhi population was from Bihar .
A study conducted by the INSTITUTE OF HUMAN DEVELOPMENT,New Delhi,in six villages of Gopalganj, Madshubani an PURNEA districs shows migration nearly doubled in the last two decades.In 2000, 49 per cent families had a migrant, compared to 28 per cent in 1983.The same study finds that only 6.56 per cent of the migrants hsd a government job at their destinations.
But that has not stopped the Biharis from abandoning Bihar
Thursday, December 07, 2006
'कैफ़ी और मैं'

शबाना आज़मी के लिए यह नाटक एक निजी कहानी भी था
मरहूम शायर कैफ़ी आज़मी की शायरी एक बार फिर जीवंत हो गई जब 'कैफ़ी और मैं' नामक नाटक का मंचन न्यूयॉर्क में किया गया.
कैफ़ी आज़मी की बेटी और बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री शबाना आज़मी और उनके पति और मशहूर शायर जावेद अख्तर ने न्यूयॉर्क में कैफ़ी आज़मी और शौकत कैफ़ी की यादों पर आधारित इस नाटक का मंचन किया.
न्यूयॉर्क के मशहूर लिंकन सेंटर के एलिस टुली सभागार में शेरो शायरी के शौकीन ही नहीं बल्कि शबाना आज़मी और जावेद अख्तर की अदायगी के अंदाज़ के शौकीन भारी संख्या में जमा हुए.
दूरदराज़ से न्यूयॉर्क आने वाले इन उर्दू शायरी के प्रेमियों में बहुत से कैफ़ी आज़मी की शायरी के साथ साथ शबाना आज़मी के अंदाज़ का भी लुत्फ़ उठाना चाहते थे और उन्हें कतई मायूसी भी नहीं हुई.
इस नाटक में संगीत औऱ गायकी को मिलाकर एक अलग तरह की प्रस्तुति तैयार की गई है.
जावेद अख्तर के लिखे इस नाटक में शबाना आज़मी और जावेद अख्तर के अलावा गायक जसविंदर सिंह की भी भूमिका है.
नाटक का आगाज़ हुआ, पर्दा खुला, शबाना आज़मी और जावेद अख्तर स्टेज के अलग अलग किनारों पर नज़र आए.
फिर शुरू हुआ सिलसिला कैफ़ी आज़मी औऱ शौकत कैफ़ी के पत्रों और शेरो शायरी की झलकियों का.
ज़िंदगी के विभिन्न पहलू
इस नाटक के ज़रिए शबाना आज़मी और जावेद अख्तर ने कैफ़ी आज़मी और शौकत कैफ़ी की ज़िंदगी के विभिन्न पहलुओं को पेश किया.
शबाना आज़मी और जावेद अख्तर ने नाटक में प्रमुख निभाई
कैफ़ी आज़मी और शौकत कैफ़ी की ज़िंदगियों के कुछ लम्हों को इन दो महारथियों ने कुछ ऐसे अंदाज़ में पेश किया जो सिर्फ़ यही दोनों कर सकते थे.
तीन घंटों तक यह सिलसिला चलता रहा और दर्शकगण अपनी सीटों पर जड़ से गए. जब कोई हंसी का लम्हा आता तो दर्शकों की हंसी से सभागार जाग उठता.
शबाना आज़मी के लिए यह नाटक एक निजी कहानी भी था जिसका उन्हें पूरा एहसास भी था.
नाटक के दौरान कई बार तो शबाना के चेहरे के हाव भाव उनके दिल का हाल बयान कर देते थे.
खासकर वह लम्हा जब वह अपने पिता कैफ़ी आज़मी के मृत्यु का ज़िक्र करती हैं, तो उनकी आंखें छलक आती हैं. इस मौक़े पर कई दर्शकों को भी आंसू पोछते देखा जा सकता था.
कैफ़ी आज़मी अपनी ग़ज़लों और हिंदी फ़िल्मों में मशहूर हुए गानों के लिए जाने जाते थे. उनके गानों को ज्यादातर मोहम्मद रफ़ी ने गाया था.
लेकिन इस नाटक में उभरते हुए ग़ज़ल गायक जसविंदर सिंह ने उन ग़ज़लों को गाने की ज़िम्मेदारी सर अंजाम दी.
फ़िल्म अर्थ की ग़ज़ल – तुम इतना क्यूं मुस्कुरा रहे हो....- और हीर रांझा जैसी फ़िल्मों की ग़ज़लें गाकर जसविंदर ने दर्शकों का मन मोह लिया.
नाटक में संगीत दिया जसविंदर के ही पिता कुलदीप सिंह ने और सेट की डिज़ाइन की ज़िम्मेदारी, गरम हवा से मशहूर हुए फ़िल्म निर्देशक एम एस सथ्यू ने संभाली थी.
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