Saturday, December 30, 2006

हुई मुद्द्त कि गालिब मर गया,पर याद आता है.........

पुछते हैं वह कि गालिब कौन है
कोई बतला वो कि हम बतलायें क्या...
सचमुच कोई पुछे तो चेहरा लाल हो जाता है,लेकिन कोई ऐसी बेवकुफी नही करता है.मेरे गालिब चचा आज भी जिदा हैं.अपनी हवेली से लेकर मजार तक वो शेरो-शायरी करते मुझे मिल जाते हैं.लाल किले की सामने वाली सड्क पर चचा आज भी पतंगो पे शायरी लिख के चुन्ना बीबी के लिए उडाते हैं.....यकीन मानिए दोस्त्!
आप यह नही कह सकते है कि गालिब मर गए.वो तो खुद कहते हैं-
हुई मुद्द्त कि गालिब मर गया,पर याद आता है
वह हर इक बात पे कहना कि यु होता तो क्या होता...
गालिब का जन्मोत्सव जोश के साथ दिल्ली मे मनाया गया.पुरानी दिल्ली से लेकर निजामुद्दीन तक गालिब के नज्म महकते रहे.देश और विदोशो से आए शायर दिल्ली की वही रोनक लौटाने की कोशिश करते नज़र आए जैसा गालिब चचा किया करते थे.पाकिस्तान के मशहुर शायर फरहाज़ अहमद ने समां को बनाये रखा.वही विख्यात डांसर उमा शर्मा ने गालिब की गज़लो और शायरी के साथ बेले डांस पेश किया तो गालिब की ये चंद लाईने जुबां पे आ गयी-
इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया
वर्ना हम भी आदमी थे काम के....
जब उमा जी ने गालिब की सुफिया नज़्मो को लेकर नाटिका शुरु की तो गालिब के ये शौक याद आ गये-
न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझको होने ने ,न होता तो मैं क्या होता........

3 comments:

Anonymous said...

चलिए गालिब को धूमधाम से याद किया आप लोगों ने । पढ़कर अच्छा लगा ।

Anonymous said...

hi, badi tabiyat se puchaa Ghalib ko woh dar badar nahi tha na hai aaj ki mehfill me.kuch jagaya tum ne girindra kahkar isskadar iss raat me mujhako Ghalib hi Ghalib nazar aata hai.

श्रीश । ई-पंडित said...

गालिब चचा को कोई भूल सकता है भला। खुदा उनकी रुह को सुकून दे और फिर से हिन्दुस्तान में पैदा करे।

नववर्ष बहुत-बहुत मुबारक गिरीन्द्र जी।

अगर आप ब्लॉग का टाइटल हिन्दी में लिखें तो ज्यादा अच्छा लगेगा - अनुभव