Friday, September 29, 2006

RANG DE BASANTI


ऑस्कर के लिए जाएगी 'रंग दे बसंती'

'रंग दे बसंती' व्यावसायिक स्तर पर भी काफ़ी सफल रही थी
राकेश मेहरा की फ़िल्म 'रंग दे बसंती' ऑस्कर पुरस्कार के लिए भारत की ओर से नामित की गई है.
'रंग दे बसंती' को विशाल भारद्वाज की 'ओमकारा' और राजकुमार हिरानी की 'लगे रहो मुन्नाभाई' और मधुर भंडारकर 'कार्पोरेट' से कड़ी टक्कर मिली लेकिन अंत में फ़ैसला उसी के पक्ष में हुआ.

ऑस्कर के लिए भारत की ओर से फ़िल्म भेजने का निर्णय करने वाली 12 सदस्यीय समिति में प्रख्यात निर्देशक बासु चटर्जी, कल्पना लाजमी, एन चंद्रा और वेद राही जैसी फ़िल्मी हस्तियाँ शामिल थीं.
आमिर ख़ान अभिनीत फ़िल्म 'रंग दे बसंती' को सर्वश्रेष्ठ विदेशी फ़िल्म की श्रेणी में ऑस्कर एवार्ड के लिए नामित किया गया है.
इससे पहले भी आमिर ख़ान की फ़िल्म लगान को 2001 में ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामित किया गया था और फ़िल्म को ऑस्कर के नामांकन की सूची में भी जगह मिली थी लेकिन 'नो मैंस लैंड' ने बाज़ी मार ली थी.
इससे पहले भी भारत की दो और फ़िल्में मदर इंडिया (1957) और सलाम बॉम्बे (1988) भी ऑस्कर के नामांकन की सूची में जगह बना पाई हैं.
'लगान' के बाद से कोई भी फ़िल्म ऑस्कर के नामांकन तक नहीं पहुँच सकी हैं.
पिछले वर्ष अमोल पालेकर की फ़िल्म 'पहेली' को भारत की एंट्री के तौर पर भेजा गया था और उससे पहले संजय लीला भंसाली की फ़िल्म 'देवदास' को भी 2002 में भारत की ओर से भेजा गया था.
कनाडा की ओर से भारतीय मूल की निर्देशक दीपा मेहता की फ़िल्म 'वाटर' को नामित किया गया है.

इस फ़िल्म में जॉन अब्राहम और लीसा रे ने अभिनय किया है और विवादों की वजह से इसकी शूटिंग बनारस की जगह श्रीलंका में करनी पड़ी थी.

Sunday, September 24, 2006

GANDHI BABA..


मुन्नाभाई का बिंदास अंदाज़ लोगों को नेताओं के भाषण से ज़्यादा पसंद आ रहा है

गाँधीगिरी की चर्चा आजकल लाखों लोगों के ज़ुबान पर है और इसके पीछे है मुन्नाभाई ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ फ़िल्म.
एक सशक्त संदेश जिसमें महात्मा गाँधी को आम आदमी और आज की पीढ़ी के लिए चालू बंबईया हिंदी में पेश किया गया है.
फ़िल्म देखकर बाहर निकलते हुए बच्चे-बूढ़े सभी एक ही गीत गुनगुनाते हैं
'बंदे में था दम, वंदे मातरम्'.
गाँधीवाद या गाँधीगिरी अपनाने का नया अंदाज़ नई पीढ़ी को ख़ास तौर आकर्षित कर रहा है.
खाने की बाबत कहा जाए तो ये समझिए कि गाँधी को अब तक पकवान बना कर परोसा जाता था. पहली बार चाट-पापड़ी की तरह परोसा गया है तो लोग ज़्यादा ग्रहण कर रहे हैं


21 साल की एयर होस्टेस कुमुदिनी ने बताया, "किताबों में पढ़ने या नेताओं का भाषण सुनने से गांधी में रूचि पैदा होना मुश्किल है. यहाँ साबित करके दिखाया गया है कि जब प्यार से काम चल सकता है तो लड़ाई की ज़रूरत नहीं पड़ती. इसमें हम सबके लिए संदेश है


60 वर्षीय बरुना मैत्रा कहती हैं उन्हें गाँधी के संदेश को हँसी-हँसी में बताना बहुत अच्छा लगा
.
मुन्नाभाई गैंगस्टर को गाँधीवाद की धुन चढ़ती है रेडियो जॉकी जान्हवी (विद्या बालन) के दीवानेपन में. एक रेडियो प्रतियोगिता में भाग लेने और जान्हवी के साथ स्टूडियो में मेहमान बनने के चक्कर में मुन्नाभाई घंटों गाँधी के बारे में पढ़ते हैं और वहीं से शुरू होती है उनकी गाँधीगिरी.
जान्हवी का दिल जीतने के साथ ही साथ मुन्नाभाई जान्हवी के साथ एक लोकप्रिय रेडियो जॉकी बन जाते हैं और गाँधी के दो मूलमंत्र सत्य और अहिंसा का पाठ लोगों को पढ़ाने में लग जाते हैं.
गाँधीगिरी मुन्नाभाई पर इस क़दर छा जाती है कि उन्हें चारों ओर गाँधी दिखाई देते हैं जिसकी वजह डॉक्टर ‘कैमिकल इंबैलेंस’ बताते हैं और जिसे मुन्नाभाई अपनी ज़ुबान में ‘‘कैमिकल लोचा’’ कहते हैं.
तो 'गाँधी का लोचा' दर्शकों में इतना लोकप्रिय हो रहा है कि गोद में नवजात बच्चे दबाए माताएँ और छड़ी लेकर बूढ़े तक सभी 20-30 किलोमीटर यात्रा कर ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ देखने सिनेमा हॉल में जा रहे हैं. फ़िल्म रिलीज़ होने के लगभग एक हफ़्ते बाद भी टिकट मिलना मुश्किल हो रहा है.
सिर्फ आम आदमी ही नहीं गाँधीवादियों का मानना है कि गांधी की प्रासंगिकता सार्वभौमिक है और सामान्य आदमी के रूप में गाँधी को प्रस्तुत करना क़ाबिले तारीफ़ है.
चाट-पापड़ी
गाँधीजी के परपोते तुषार गाँधी कहते हैं, "जिस तरह से लोगों की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं उससे लगता है कि लोगों को पहली बार महात्मा गाँधी को सामान्य रूप में देखना अच्छा लग रहा है. गाँधी जी एक साधारण आदमी थे लेकिन अपने कर्मों से महान बने यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है."
वे उदाहरण देते हैं, "खाने की बाबत कहा जाए तो ये समझिए कि गाँधी को अब तक पकवान बना कर परोसा जाता था. पहली बार चाट-पापड़ी की तरह परोसा गया है तो लोग ज़्यादा ग्रहण कर रहे हैं."
गाँधी का खुमार या गाँधीगिरी लोगों पर इस क़दर छाई है कि यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि 'लगे रहो मुन्नाभाई' नई पीढ़ी के लिए गाँधीवाद के प्रति प्रेरणा का नया स्रोत बनकर आई है.
जहाँ तक फ़िल्म के निर्माता का सवाल है उनके लिए ये अंदाज़ा लगाना मुश्किल है कि मुन्नाभाई ने गाँधीजी को हिट बनाया है या गाँधीगिरी ने मुन्नाभाई को.

Saturday, September 23, 2006

mere NIDA FAZLI........



यादों का एक शहर...

निदा फ़ाज़लीशायर और लेखक


हर छोड़ा हुआ शहर थोड़े अरसे तक जाने वाले का इंतज़ार करता है, लेकिन जाने वाला, जब लंबी मुद्दत तक नहीं आता, तो शहर नाराज़ होकर शहर से बहुत दूर चला जाता है.
मेरे साथ भी ऐसा हुआ.
सन् 65 में ग्वालियर छोड़ के, रोटी-रोज़ी की तलाश में बंबई गया. वहाँ चारों तरफ फैले हुए विशाल समंदरो और आकाश छूते नारियल के दरख्तों से दोस्ती करने में काफ़ी वक़्त लग गया.

जब दोस्ती हो गई तो बंबई ने मुझे वह सब कुछ दिया जो आज मेरी पहचान है. लेकिन इनमें वक़्त का एक बड़ा हिस्सा गुज़र गया. गुज़रे हुए वक़्त के इस दर्द को मैंने एक ग़ज़ल का रूप दिया है, इसके दो शेर यूँ हैं.
कहीं छत थी, दीवारो दर थे कहीं,
मिला मुझको घर का पता देर
सेदिया तो बहुत ज़िंदगी ने मुझे,
मगर जो दिया वह दिया देर से
हुआ न कोई काम मामूल से,
गुज़ारे शबो रोज़ कुछ इस तरहकभी चाँद चमका ग़लत वक़्त पर,
कभी घर में सूरज उगा देर से


बंबई में जब सर पर छत आई, और रोटी पानी से फ़रागत पाई तो छोड़ा हुआ वह नगर याद आने लगा, जो बचपन से जवानी तक मेरे दिन रात का साथी था.


यादों का शहर

मगर मेरी लंबी ग़ैर हाज़िरी से नाराज़ होकर, वह वहाँ अब नहीं था जहाँ मैं बंबई आते समय उसे छोड़ गया था.
घर को खोजें रात दिन, घर से निकले गाँववो रस्ता ही खो गया, जिस रस्ते था गाँव
मुझे भी मेरा गाँव फिर नहीं मिला, मिलता भी कैसे, जिनके पास वह अपना पता-ठिकाना छोड़ के गया था उनमें कुछ बुज़ुर्ग पेड़ थे, कुछ रास्तों के मोड़ थे. एक दो मंजिला इमारत की सड़क की तरफ खुलने वाली खिड़की थी. अब इन में कोई भी अपने स्थान पर नहीं था.
मगर वो ग्वालियर जो मैंने जिया वह आज भी मेरे साथ है. यादों के रूप में.
इन यादों के दो रूप हैं. एक वह, जो मैंने देखा था या जिया था. दूसरा रूप वह था जिसके बारे में मैंने, बड़ी उम्रों की ज़ुबानी सुना था, या पुस्तकों में पढ़ा था.
इस देखे हुए और सुने हुए या पढ़े हुए ग्वालियर के बेशुमार चेहरे हैं. इनमें एक चेहरा साहित्य का भी है.
ग्वालियर में ग़ज़ल की शुरूआत, शाह मुबारक आबरू से होती है, जो मुहम्मद शाह के जमाने के शायर थे. वह सूफी शेख मुहम्मद ग़ौस ग्वालियरी की औलाद में थे.
ज़्यादा चाहत भी कभी दूसरे की मुसीबत बन जाती है, इस दरख्त के साथ भी यही हुआ. कभी जो छतनार पेड़ था अब ऊन कटी भेड़ के समान था. कभी यहाँ बगुले और तोते मँडराते थे. अब नंगी शाखों पर बैठे कौवे काँय-काँय फ़रमाते हैं

यह वही सूफ़ी थे जो मुग़ल सम्राट अखबर के नौ रत्नों में एक रत्न तानसेन के भी गुरू थे. तानसेन का मज़ार आज भी ग़ौस साहब के मज़ार के पास, भारत के संगीतकारों की आस्था का केंद्र है.
मैं जब तक वहाँ था, इमली का एक घना वृक्ष इस मज़ार पर छाँव किए हुए था. संगीत प्रेमी जब वहाँ आकर श्रद्धा के फूल चढ़ाते थे, तो एक दो पत्तियाँ इस पेड़ से तोड़कर, मुँह में रख कर जाते थे, उनका विश्वास था कि इमली की इन पत्तियों के चबाने से आवाज़ में मिठास पैदा होगी.
पता नहीं, इस श्रद्धा से कितनों को लाभ मिला लेकिन यह हक़ीकत है, वह पेड़ जो की सैकड़ों का विश्वास था अब ऊपर से नीचे तक बेलिबास है.
ज़्यादा चाहत भी कभी दूसरे की मुसीबत बन जाती है, इस दरख्त के साथ भी यही हुआ. कभी जो छतनार पेड़ था अब ऊन कटी भेड़ के समान था. कभी यहाँ बगुले और तोते मँडराते थे. अब नंगी शाख़ों पर बैठे कौवे काँय-काँय फ़रमाते हैं.
एक बार उस्दात हाफ़िज़ अली खाँ के बड़े बेटे, सरोद नवाज़ मुबारक अली खाँ मेरे साथ थे. मैंने जब इस संबंध में उनसे बात की तो उन्होंने कहा,
'यह मज़ार का ही चमत्कार है कि कौवे जो सदियों से बेसुरे माने जाते हैं, यहाँ आकर जो काँय-काँय करते हैं तो उसमें भी लय और सुर जगमगाता है".
मुबारक अली खाँ, मौजूदा उस्ताद अमजद अली खाँ के बड़े भाई थे, जिन दिनों मैं ग्वालियर में था उन दिनों वह एक स्थानीय संगीत कॉलेज में, संगीत की शिक्षा देते थे.
वह जब भी मिलते थे संगीत पर कम बोलते थे, अदब और साहित्य पर ज़्यादा बात करते थे.
वह अक्सर कवि सम्मेलनों और मुशायरों की महफ़िलों में जाते भी थे, और अपनी जेब से ख़र्च करके, उन दिनों में ग्वालियर के अच्छे कवियों और शायरों को बुलाते भी थे.
रुझान
उन दिनों के कवियों और शायरों में प्रगतिशीलता का रूझान बहुत था.
इन कवियों-शायरों में शिवमंगल सिंह सुमन, जाँ निसार अख़्तर, मुकुट बिहारी सरोज और वीरेन्द्र मिश्र के नाम ख़ास हैं.
इन्हीं के साथ उन शायरों और कवियों के नाम थे, जो साहित्य में राजनीति के दख़ल को जायज़ नहीं समझते थे.
इनमें दुआ डिबाहवी, रियाज़ ग्वालियरी, अनवर प्रतापगढ़ी और दूसरे थे. कविता लिखी भी जाती है और सुनी भी जाती है.
कुछ ऐसे होते हैं, जो लिखते तो अच्छा हैं, मगर कविता सुनाने की कला से नावाकिफ़ होते हैं और इस तरह जो रचना काग़ज़ पर रिझाती है वह श्रोताओं में आकर थकी थकी सी लगती है.
जाँ निसार नर्म लहज़े के अच्छे रूमानी शायर थे... उनके अक्सर शेर उन दिनों नौजवानों को काफ़ी पसंद आते थे.
कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ अपने प्रेम-पत्रों में उनका इस्तेमाल भी करते थे– जैसे,

दूर कोई रात भर गाता रहातेरा मिलना मुझको याद आता रहा

छुप गया बादलों में आधा चाँदरौशनी छन रही है
शाखों सेजैसे खिड़की का एक पट खोलेझाँकता है कोई सलाखों से
लेकिन अपनी मिमियाती आवाज़ में, शब्दों को इलास्टिक की तरह खेंच-खेंचकर जब वह सुनाते थे, तो सुनने वाले ऊब कर तालियाँ बजाने लगाते थे.
जाँ निसार आखें बंद किए अपनी धुन में पढ़े जाते थे, और श्रोता उठ उठकर चले जाते थे.
इस संदर्भ में सुमन जी का कोई जवाब नहीं था, केवल सुनाते नहीं थे, आवाज़ के उतार चढ़ाव और आखों और हाथों के इशारों से ऐसा माहौल बनाते थे, कि सुनने वाले, कविता से अधिक उनके ड्रामाई अंदाज़ पर फ़िदा हो जाते थे.
सुमन जी की इस ड्रामाई काव्य-प्रस्तुति के सामने अगर कोई दूसरा नाम याद आता है तो वह नाम है कैफ़ी आज़मी का.
कैफ़ी आज़मी को भी कुदरत ने सुमन जी की तरह शरीर और सूरत से काफ़ी आकर्षक बनाया था. लंबा क़द और भारी साफ़ आवाज़ के साथ इन दोनों को सुनना, उन दिनों की मेरी ख़ूबसूरत यादें हैं.
कैफ़ी आज़मी, बड़े-बड़े तरन्नुमबाज़ शायरों के होते हुए अपने पढ़ने के अंदाज़ से मुशायरों पर छा जाते थे. एक बार ग्वालियर के मेलामंच से कैफी साहब अपनी नज़्म सुना रहे थे.

तुझको पहचान लियादूर से आने वाले,जाल बिछाने वाले
दूसरी पंक्तियों में ‘जाल बिछाने वाले’ को पढ़ते हुए उनके एक हाथ का इशारा गेट पर खड़े पुलिस वाले की तरफ था. वह बेचारा सहम गया.
उसी समय गेट क्रैश हुआ और बाहर की जनता झटके से अंदर घुस आई और पुलिसवाला डरा हुआ खामोश खड़ा रहा, भीड़ के इस हल्ले को भी कैफ़ी की पाटदार आवाज़ ने मुशायरे को ख़राब नहीं होने दिया.
बुजुर्गों की ज़ुबानी सुनी हुई, ग्वालियर की एक घटना याद आती है.
नारायण प्रसाद मेहर और मुज़्तर ख़ैराबादी, ग्वालियर के दो उस्ताद शायर थे.
मेहर साहब दाग़ के शिष्य और उनके जाँनशीन थे, मुज़्तर साहब दाग़ के समकालीन अमीर मीनाई के शागिर्द थे. दोनों उस्तादों में अपने उस्तादों को लेकर मनमुटाव रहता था, दोनों शागिर्दों के साथ मुशायरों में आते थे और एक दूसरे की प्रशंसा नहीं करते.
मुजतर के बारे में कहा जाता है, वह शेर इस तरह सुनाते थे कि शेर तस्वीर बन जाता, मुज़्तर ने शेर सुनाया.


ज़माना रोटियों पर फ़ातेहा मुर्दों की देता है
हमारे वास्ते लाया है
वह शमशीर के टुकड़े
मुज़्तर ने शेर को इस तरह पेश किया,
कि मेहर साहब सारी रंजिश भूल कर शेर सुनते ही लोट-पोट हो गए और चीख़-चीख़ कर दाद देने लगे.
मुशायरा ख़त्म होने के बाद जब उनके शागिर्दों ने उन्हें शेर दोबारा सुनाकर पूछा कि इसमें ऐसा क्या था कि आप इतनी तारीफ़ करने लगे तो बोले,
"शेर वाकई बुरा है, लेकिन वह कमबख़्त इस तरह सुना रहा था कि अचानक मुझे अपनी पत्नी की याद आ गई, जो पिछले कई दिनों से बीमार चल रही है."
नारायण प्रसाद मेहर ने इस छंद में उस मुशायरे में जो ग़ज़ल सुनाई थी उससका मतला यूँ है,

मिले हैं यूँ मुझको मेरे ख़्वाब की ताबीर के टुकड़ेमुझे भेजे हैं उसने मेरी ही तस्वीर के टुकड़े

मुज़्तर, जाँनिसार अख़्तर के वालिद और गीतकार जावेद अख्तर के दादा थे.

Wednesday, September 20, 2006

"लगे रहो मुन्ना भाई" के बाद अपुन बदल गया ...भाई...

आज कल कुछ अलग सा हो रहा है,पता नहीं यह परिवर्तन है या कुछ और..खैर बात को आगे बढाया जाए.
दरअसल बात निकलती है तो दूर तलक जाती है, ऐसा सुना था.
रिवोली में "लगे रहो मुन्ना भाई भाई" रात में देखा,हाल से निकलने से पहले भी बहुत कुछ लोचा दिमाग में केमेस्ट्री बना रहा था.
गांधीगीरी का जादू अपून के मन में चल रहा था..तू समझ रही है न्..?
मुन्ना और सकिर्ट का कमाल है जनाब्,,,सच बोलना अपुn सीख् रहा था,
धिरे हीं सही गांधी का जादू चल गया.
मेरा भाई है न अब सिगरेट कम फुंकने लगा है,रात को समय से घर पे हाजिर ..जय हो गांधी बाबा की !
सिंपल लाईफ स्टाइल को अपनाना हीं गांधी का थाट है...अपुन देर से समझा./ लेकिन समझा.
दुसरों को दोष देने से पहले खुद के गिरेबां में झांकना शुरु कर दिया था..

निज़ा फाज़ली ने लिखा है----
रस्ते को भी दोष दें, आंखें भी कर लाल

चप्पल में जो कील है पहले उसे निकाल्..

जय हो गांधी बाबा.

पता नहीं कुछ लाईनें दिल् को कैसे टच कर जाती है....

हमारे बाद अब महफ़िल में अफ़साने बयां होंगे

बहारे हमको ढूँढेंगी ना जाने हम कहाँ होंगे

ना हम होंगे ना तुम होंगे और ना ये दिल होगा

फिर भीहज़ारो मंज़िले होंगी हज़ारो कारँवा होंगे


गिरीन्द्र.....

Sunday, September 17, 2006

मुझे काफी पंसद है..

हम इक उम्र से वाकिफ हैं,अब न समझाओ.
कि लुत्फ क्या है मेरे मेहरबां सितम क्या है...

फैज़्.

असफाक पत्रकार बन गया...


उसका ख्वाब जैसे आज पुरा हो गया..एक चाहत थी उसकी,पत्रकार बनने की.खुदा ने आखिर उसकी सुन हीं ली..असफाक है नाम उसका.दिल्ली के एक दैनिक अखबार में जनाब रिपोर्टर बनें.एक नया ज़ोश था,सो काम पर भी उसका असर दिखा.एक हफ्ते के अंदर असफाक अखबार के हाईप्रोफाइल लोगो का चेहेता बन गया.लेकिन इस चेहेते होने के कारण असफाक के आफिस लाईफ में कई नये मोड आ गए.


रविन्द्रनाथ की चोखेरबाली की तरह असफाक भी आफिस में कई लोगों के आखों किरकिरी बन गया.खबरों के साथ रोज़ नये प्रयोग करने वाला असफाक तो भी अपना काम बिंदाश अंदाज में करता रहा.लेकिन दिल के किसी न किसी कोने से वह अब स्वंय को उपेक्षित महसुस कर रहा था.कभी कभी तो उसे ऐसा लगता था कि वह यहां एकदम अकेला है...लेकिन बिते पलों को याद कर वह अपने दिल को तस्सली दिया करता था.एक दिन वह अपने कमरे में लेटा था,दिमाग लेकिन आफिस की राजनीति पर दौर रहा था.बहुत दिनों के बाद आज वह उस पल को याद कर रहा था जब वह पहली द्फे अपने एक आर्ट रिपोर्ट के बारे मे एक खुबशूरत लडकी से बात कर रहा था,असफाक यह नहीं समझ पा रहा था कि आज क्यूं उसे यह सब कुछ याद आ रहा है..!आफिस की राजनीति में उसके संग हर कोई हाथ पिछे कर लिया था..लेकिन कोई तो था जो असफाक के संग था..दर असल यह एक पहेली थी ,जिसका उत्तर असफाक भी नहीं जानता था.कहानी फिल्मी न थी लेकिन रंग जरुर उसी का था.खैर....खुदा के रहमों करम से काम में टिव्सीट जरुर आया.

असफाक राजनीति के दलदल में फंसकर भी उसका हिस्सा तो नहीं बना लेकिन हाँ अब वह प्रोफेशनल पत्रकार जरूर बन गया था.काम से काम और कुछ भी नहीं,मस्ती के आलम में फिक्र को वह धुएं में उडाता चला गया...........

लेकिन इतने दिनों के बाद भी वह सुंदर सी लड्की असफाक के दिल के करीब है कि नही वह आज तक नहीं जान पाया ....