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Tuesday, May 19, 2015

किसानों के अन्न बैंक ‘बखारी’ की कहानी

girindra nath jhaमुझे याद है जब बचपन में धान की तैयारी होती थी तो घर के सामने महिलाएं एक गीत गाती थीं. ‘सब दुख भागल कि आइलअगहनमा, धनमा के लागल कटनिया, भर लो कोठारी, देहरियो, भरल बा, भरल बाटे बाबा बखरिया अबकी बखारी में भरी-भरी धनमा, छूटी जइहें बंधक गहनमा।” इस गीत में बखारी और धान के संबंध के बारे में विस्तार से बताया गया है। बखारी, जो किसानों का अन्न बैंक होता है लेकिन अब यह बैंक गायब होने के कगार पर है और ऐसे में इस तरह के गीत भी सुनने को नहीं मिलते हैं।

अन्नदाताओं की जिन्दगी को जब आप नजदीक से देखेंगे तो पाएंगे कि वे गाँव घर में ही दुनिया की सारी खूबियों को समाकर रखते आए हैं। ये कोई नई कहानी नहीं है बल्कि बरसों पुरानी है। उनका अपना एक अन्न बैंक होता है। गोदाम संस्कृति तो अब आई है लेकिन अन्न रखने की उनकी अपनी शैली है, जिसे कोसी इलाके में बखारी कहते हैं।
bkhari 

गाँव से जुड़ाव रखने वाले यह बात जानते होंगे कि किसानी कर रहे लोग सालभर के लिए अन्न जमाकर रखते हैं। जब गोदाम संस्कृति का आगमन गाँव में नहीं हुआ था तब बड़े-बड़े किसान तो अपने घरों के सामने कई बखारी बनाकर रखते थे, जहां गाँव के छोटे और सीमांत किसान अपना अन्न रखते थे। गाँव के आपसी समन्वय को इस छोटी सी बात से आप समझ सकते हैं।


”धान के पान, मोरो पिया खइहें पान।” इस कहावत का अर्थ यह है कि यदि धान का ही पान है तो, मेरे पिया भी खाएंगे पान। यानी धान कोई महंगी वस्तु नहीं। दुर्लभ भी नहीं। कहावत भी उस समय बनी होगी जब किसान के घरों में पैसा नहीं होता था। कहावत में धान को गरीब का साथी बताया गया है। धान से ही पान मिलेगा तोए मेरा पिया भी पान खाएगा। ऐसे में बखारी ही उस समय किसानों का बैंक हुआ करता था।अन्नदाताओं और उसके भंडारण का महत्व हमारे यहां कि इस कहावत से आप समझ सकते हैं।


बखारी या अन्नागार में अन्न को भंडारित किया जाता है। प्राचीन काल में मिट्टी के बर्तनों में अन्न भंडारित किया जाता था। कुछ किसान कच्ची मिट्टी और भूसे से अन्नागार बनाते थे जिसको ‘डेहरी’ कहा जाता था। इसे ‘अन्न की कोठी’ भी कहते हैं।

बांस और घास-फूस की मदद से बखारी बनाया जाता है। बखारी को मिट्टी से लेपकर उसे खूबसूरत बना देते हैं किसानी करने वाले लोग। कई बखारी में लोक कलाओं को शामिल किया जाता है। बखारी किसानों की लोक कला संस्कृति का बेजोड़ नमूना है। माटी से अन्न का जुड़ाव भंडारण की देसी पद्धति का सबसे नायाब उदाहरण है। उत्तर बिहार के ग्रामीण इलाकों में एक समय में आपको हर घर के सामने बखारी देखने को मिल जाता, लेकिन समय के साथ-साथ बखारी की संख्या कम होती चली गई। इसके पीछे कई कारण हैं। बखारी मतलब अनाज के लिए बना भंडारगृह, जहां धान-गेहूं रखे जाते हैं।


बखारी शब्द का प्रयोग ग्रामीण इलाकों में कई मुहावरों में किया जाता है। मसलन गे गोरी तोहर बखारी में कतै धान। (ओ, गोरी तेरे भंडार में है कितना धान) बखारी बांस और फूस के सहारे बनाया जाता है। यह गोलाकार होता है और इसके ऊपर फूस (घास) का छप्पर लगा रहता है। इसके चारों तरफ मिट्टी का लेप लगाया जाता है। (जैसे झोपड़ी बानई जाती है) बखारी का आधार धरती से लगभग पांच फुट ऊपर रहता है, ताकि चूहे इसमें प्रवेश नहीं कर पाएं।


उत्तर बिहार के ग्रामीण इलाकों में अभी भी बखारी आसानी से देखे जा सकते हैं। हर किसान के घर के सामने बखारी बना होता है। जिस किसान के घर के सामने जितना बखारी, मानो वही है गाँव का सबसे बड़ा किसान। कई के घर के सामने तो 10 से अधिक बखारी भी होते हैं, हालांकि स्टोर परम्परा के आने के बाद पुरानी बखारी परम्परा कमजोर हो गई है।


इन बखारियों से अन्न निकला भी अलग तरीके से जाता है। इसके ऊपर में जो छप्पर होता है, उसे बांस के सहारे उठाया जाता है और फिर सीढ़ी के सहारे लोग उसमें प्रवेश करते हैं और फिर अन्न निकालते हैं। एक बखारी में कितना अनाज है, इसका अंदाजा किसान को होता है।

हर एक का अलग साइज होता है। इसे मन (40 किलोग्राम-एक मन) के हिसाब से बनाया जाता है। बखारी की दुनिया ऐसी ही कई कहानियों से भरी पड़ी है।


कुछ किसान तो अपने आंगन में छोटी बखारी भी बनाकर रखते थे। इन बखारियों को खासकर महिलाओं के लिए बनाया जाता था। इसकी ऊंचाई कम हुआ करती थी, ताकि आसानी से महिलाएं अन्न निकाल सके। धान और गेहूं के लिए जहां इस तरह की बखारी बनाई जाती थी वहीं चावल के लिए कोठी बनाया जाता था।

कोठी पूरी तरह से माटी का होता था। इसे महिलाएं और पुरुष कारीगर खूब मेहनत से बनाते थे। धीरे-धीरे गाँव घर से यह सारी चीजें गायब होती जा रही हैं। ग्राम्य संस्कृति इन चीजों के बिना हमें अधूरी लगती है।

Saturday, May 02, 2015

इंटरनेट की दुनिया में बस्ती-बसाती गांव की कहानी

इंटरनेट अब हमारी जिंदगी का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। बड़े शहरों से लेकर छोटे शहरों तक इंटरनेट का जाल बड़ी तेजी से बिछता चला जा रहा है। ऐसे में गांव-देहात भी कहां पीछे रहने वाला है।

इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली विभिन्न कंपनियों का नेटवर्क अब गांव में भी पहुंच चुका है। ऐसे में हम आपको बिहार के एक ऐसे गांव की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसकी अपनी खुद की एक वेबसाइट है। आइए, हम आप बिहार के उस ऐतिहासिक गांव की यात्रा करें, जो देश-विदेश के लोगों को वेबसाइट के जरिए जोड़ने का काम कर रही है। 

वैसे तो सूचना संचार के इस डिजीटल युग मे वेबसाइट बनाना कोई बड़ा काम नहीं है और न ही कोई नई बात लेकिन गांव के लिए इस तरह की बातें करना सचमुच में एक क्रांतिकारी कदम है। वो भी एक ऐसे गांव के लिए जो हर साल कोसी की विभीषिका को झेलता है, जिसके लिए बाढ़ शब्द एक बुरे सपने की तरह है। उस गांव का नाम है- महिषी। 

बिहार के सहरसा जिला स्थित महिषी गांव की अपनी वेबसाइट है। वैसे तो मंडन मिश्र की जन्मस्थली होने के कारण महिषी किसी पहचान का मोहताज नहीं है। गौरतलब है कि मध्यकाल के आध्यात्मिक चिंतन के पुरोधा माने जाने वाले मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ के लिए करीब बारह सौ वर्ष पूर्व जगतगुरु शंकराचार्य यहाँ पहुंचे थे।

अतीत में और पीछे जाएँ तो पाते हैं कि मुनि वसिष्ठ ने हिमालय की तराई तिब्बत में उग्रतारा विद्या की महासिद्धी के बाद धेमुड़ा (धर्ममूला) नदी के किनारे स्थित महिष्मति (वर्तमान महिषी) में माँ उग्रतारा की मूर्ति स्थापित की थी।
इतिहास की पन्नों से जब हम बाहर निकलते हैं तो गांव घर की बातों को इंटरनेट के जाल पर खोजने बैठ जाते हैं तभी हमारी मुलाकात महिषी गांव  के दो युवा अमित कुमार चौधरी और अमित आनंद से होती है। इन दोनों ने मिलकर महिषी की वेबसाइट http://mahishi.org/ बनाई है। साइबर संसार में गांव-देहात का दखल मेरे लिए एक रोचक कहानी की तरह है।

महिषी की एतिहासिक बातों की जानकारी दुनिया के दूर दराज के लोगो तक पहुंचे इसके लिए इंटरनेट के जरिये महिषी पर आधारित वेबसाइट का निर्माण वर्ष 2011 मे किया गया था। महिषी डॉट ओर्ग के होम पेज की खुलते ही माँ उग्रतारा की लोगो को दर्शन होतें हैं जो कहीं न कहीं महिषी की झलक प्रदान करता है। महिषी का इतिहास
, कैसे महिषी देश के विभिन्न शहरों से आयें कहाँ ठहरे उसकी विस्तृत जानकारी वेबसाइट विजिटर के लिए है।

अमित कुमार चौधरी बताते हैं की वेबसाइट को देख कर राज्य के बाहर से लोग उनसे ईमेल के जरिए संपर्क कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के एक सज्जन ने महिषी की देवी माँ उग्रतारा के नाम प्रसाद चढाने की इच्छा जाहिर की।
वहीं दूसरी ओर वेबसाइट के कॉडिर्नेटर अमित आनंद की इच्छा है कि इस वेबसाइट को लोगबाग एक सन्दर्भ वेबसाइट के रूप में लें। उन्होंने बताया कि वे चाहते हैं कि गांव की प्राचीन जानाकरियां लोग हासिल करें और इस पर शोध हो। वे गांव को अंतराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर लाना चाहते हैं।

गौरतलब है कि आज से चार-पांच साल पूर्व तक जब भी बिहार के महिषी इलाके की चर्चा आती थी तो लोगों के जेहन में जल-प्रलय की भयावह तस्वीर उभर आती है
, जिसका सामना पूर्वोत्तर बिहार के कुछ जिले करते आए हैं। 2008 के प्रलयंकारी बाढ़ की तस्वीरें आज भी हमें डरा देती है। लेकिन यह क्षेत्र अपने इतिहास में न जाने कितने गौरव समेटे है पर इसे पुनर्स्थापित करने की सुध किसी को नहीं है।

महिषी का एक स्वर्णिम पक्ष मध्यकाल के एक ऐसे विद्वान मंडन मिश्र की जन्मभूमि होना भी है, जिनके विचारों पर आज भी शोध हो रहे हैं। महिषी गांव के के नाम पर विधानसभा क्षेत्र का नाम भी है
, लेकिन परिसीमन करने वालों ने महिषी विधानसभा में महिषी गांव को शामिल नहीं किया।

महिषी में उग्रतारा मंदिर में देवी की मूर्ति के ऊपर महात्मा बुद्ध की मूर्ति है। शायद बुद्ध की मूर्ति यह दर्शाता है कि एक समय में मिथिला में भी बौद्ध धर्म का खासा प्रभाव हो गया था। साथ ही बहुत सारी प्राचीन मूर्तियां हैं, जिसकी सुरक्षा भगवान भरोसे है।

हिंदी-मैथिली के प्रसिद्ध साहित्यकार राजकमल चौधरी का जन्म महिषी में ही हुआ था। इसके अलावा नई पीढ़ी में भी इस गांव का साहित्य और समाज के अन्य क्षेत्रों में दखल है। महिषी कहानी कहते हुए मुझे देश के गांवों को पत्रकारिता के केंद्र में लाने के लिए मशहूर पत्रकार पी. साइनाथ की भी याद आ रही है। दरअसल उन्होंने इस साल की शुरुआत में एक पहल की है। साईंनाथ ने ग्रामीण पत्रकारिता के अपने वर्षों के अनुभव के बाद एक वेबसाइट शुरू की। वेबसाइट का नाम रखा है- परी (पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया) यानी ग्रामीण भारत का जन संग्रहालय। ऐसे में महिषी गांव का इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय रहना डिजीटल युग के लिए सुखद खबर है और मैं इसे साईंनाथ की परी से जोड़कर देखने लगा हूं।

Monday, April 20, 2015

कोसी की माटी की खुश्बू है भगैत गायन

कोसी के कई जिले की उपजाउ मिट्टी जिस तरह से साल में तीन बंपर फसलें देती हैं, ठीक उसी तह यहां की फिजा ग्राम्य लोक संस्कृतियों से सालों भर महकती रहती है। यकीन मानिए यहां के गांवों में कई चीजें ऐसी छुपी है कि जिसे देख और सुनकर आप मस्ती के आलम में झूम सकते हैं। तो चलिए, आपको ले चलते हैं कोसी के उन गावों में जहां आपकी मुलाकात ऐसी ग्राम्य गीतों से हम करवाएंगे, जिसमें एक ओर सूफियाना रंग का अहसासा मिलेगा वहीं दूसरी ओर किसानों की आत्मा आपको दिख जाएगी। असल में गांव से कनेक्शन यही है क्योंकि गांव की कुछ चीजें आपको खुद के मोहपाश में बांध लेती है और गांव के ही हो जाते हैं।

भले ही बेमौसम बरसात ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है लेकिन इसके बावजूद जो कुछ फसल घर तक किसान लाए हैं उसी से वे खुश हैं। ग्राम्य गीतों के जरिए वे अपनी मन की बात रखते आए हैं। ऐसे कई गीतों को सुनते समय "देहातीत" सुख का आनंद मिलता है।

"विदापत-नाच" हो या फिर "भगैत", ये दोनों कोसी की माटी की खुश्बू को खुद में समेटी हुई है। हालांकि विदापत नाच अब खत्म हो चुका है लेकिन भगैत के प्रति लोगों का आकर्षण अभी भी बना हुआ है। "भगैत" कोसी के तकरीबन सभी जिलों में खूब गाया और बांचा जाता है।

भगैतक के तीन अंग माने गए हैं। गायन, नाट्य, और दर्शक। गायन में गीत के संग बोलचाल को शामिल किया जाता है। मंडली के सदस्यों को भगैतिया कहा जाता है। दरअसल भगैत एक ऐसा लोकगीत है, जिसमें गीत के संग-संग गायक लोगबाग को कुछ बातें भी बताता रहता है।

आप कह सकते हैं कि गीत के संग डॉयलॉग भी चलता रहता है। कहानी की शैली में गायक अपने दल के साथ भगैत गाता है। इसे सुनने के लिए झुंड के झुंड लोग उस जगह जमा होते हैं जहां भगैत होता है। 10 से 11 लोगों की एक टीम होती है जो भगैत गाते हैं।

भगैत दल के मुखिया को "मूलगैन" कहते हैं। मूलगैन गांव-घर की बोली का शब्द है, इसे आप ‘मूल-गायक’ भी कह सकते हैं। मूलगैन कहानी प्रारंभ करता है और फिर समां बंध जाता है। हारमोनियम और ढ़ोलक वातावरण में रस का संचार करते हैं। दाता धर्मराज, कालीदास, राजा चैयां और गुरू ज्योति, भगैत के मुख्य पात्र होते हैं।
भगैत सांप्रदायिक सौहार्द का शानदार उदाहरण हैं। जहां एक ओर इस गायन शैली में हिंदू पात्र होते हैं वहीं दूसरी ओर उसी सम्मान से मुस्लिम पात्र भी आपको मिल जाएंगे। दाता धर्मराद, गुरु ज्योंति जैसे हिंदू पात्रों की तरह मुस्लिम समुदाय के लिए "मीरा साहेब " प्रमुख पात्र हैं।

मुस्लिम के लिए होने वाले भगैत को "मीरन" कहा जाता है। यहां बोली जाने वाली ठेठ मैथिली में भगैत और मीरन गाया जाता है। गौर करने लायक बात यह है कि इस कथा-गीत में अंधविश्वास सिर-चढ़कर बोलता है। मसलन मूलगैन पर भगवान आ जाते हैं। वह जो कुछ बोल रहा है, वह ईश्वर-वाणी समझी जाती इस कार्यक्रम बलि-प्रथा और मदिरा की खूब मांग होती है।

48 घंटे तक अनवरत चलने वाले इस कार्यक्रम का आयोजन अक्सर गांव के बड़े भू-पति हीं करते हैं। क्योंकि इसके आयोजन में अच्छा-खासा खर्च होता है। अक्सर फसल कटने के बाद हीं ऐसे आयोजन होते हैं। क्योंकि उस वक्त किसान के पास अनाज और पैसे कुछ आ ही जाते हैं।

भगैत के इन सभी पक्षों पर नजर दौड़ाते हुए हमें यह भी समझ में आता है कि गायन की यह शैली म्यूजिक थेरेपी का भी काम करती है। हाल ही में एक भगैत में शामिल होने का मौका मिला तो वहां मैंने देखा कि एक बीमार आदमी को गीत के जरिए स्वस्थ किया जा रहा था।
गीत के विभिन्न रागों और आवाज के उतार-चढ़ाव के जरिए उस बीमार आदमी को हमने सामान्य अवस्था में चलते हुए पाया। दरअसल यह भगैत का एक दूसरा पक्ष है, जिस पर लंबी चर्चा हो सकती है, बहस की गुंजाइश है लेकिन इन ये भी सत्य है कि भगैत एक कला के रूप में अलग हीं दुनिया बसाता है, जिस दुनिया में गांव-घर के लोग आनंद खोजते हैं, सुख की तलाश करते हैं, दुख के बादल छंट जाने की प्रार्थना करते हैं।

कोसी के ग्राम्य संस्कृति में भगैत रच-बस गया है। हर साल गांव के लोग फसल कटने के बाद भगैत में डूब जाते हैं। भगैत के गायन शैली में वे सुख-दुख से ऊपर उठकर खो जाते हैं। चलत-चलते हम आपको भगैत गायन की एक पंक्ति सुनाना चाहेंगे, जिसमें गांव में भविष्य में आने वाली विपत्ति के प्रति गांव वालों को सचेत किया गया है। मूलगैन (मूल-गायक) कह रहा है-

" हे हो... घोड़ा हंसराज आवे छै/
गांव में मचते तबाही हो/
कहॅ मिली क गुरू ज्योति क जय..." 
( सुनो सभी, घोड़ा हंसराज आने वाला है, गांव में मचेगी अब तबाही, सब मिलकर कहो गुरू ज्योति की जय )

Saturday, April 18, 2015

रेणु की दुनिया- जिसके बिना हम अधूरे हैं...

साहित्य की तकरीबन सभी विधाओं में बराबर कलम चलाने वाले रेणु 11 अप्रैल 1977 को अनंत की ओर कूच कर गए थे। वे भले ही 38 वर्ष पहले हमसे दूर चले गए लेकिन अपनी तमाम कृतियों के कारण वे आज भी हमारे लिए जीवंत हैं।

 दरअसल रेणु पैदाइशी किसान थे। उनके रग रग में किसानी का रंग था। फसलों की दुनिया की तरह वे साहित्य की दुनिया रचते थे
, एक जीवठ किसान की तरह। कहानी उनके जीवन के रेशे-रेशे में थी और जितनी दफे उनकी कहानियां बाहर आती थी उतनी ही तेजी से नई कहानियां उनके भीतर समा जाया करती थी। दरअसल उन्हें पाठकों का मन पढ़ने आता था क्योंकि उनके भीतर जो लेखक था वह मूल रुप से एक किसान था।

रेणु की दुनिया हमें ऐसे रागों
, रंगों, जीवन की सच्चाई से जोड़ती हैं जिसके बिना हमारे लिए यह दुनिया ही अधूरी है। अधूरे हम रह जाते हैं, अधूरे हमारे ख्वाब रह जाते हैं। रेणु की दुनिया में जहां प्रशांत है तो वहीं जित्तन भी है। ठीक गुलजार के चांद की तरह।

परती परिकथा का जित्तन ट्रैक्टर से परती तोड़ता है
,  रेणु असल जिंदगी में कलम से जमीन की सख्ती तोड़ते हैं। प्राणपुर में जित्तन परती को अपऩे कैमरे की कीमती आंखों से देख रहा है। किसान के पास इतनी कीमती आंख तो नहीं है पर उसकी अपनी ही आंख काफी कुछ देख लेती है। यह किसान और कोई नहीं अपने रेणु ही हैं।

रेणु की जड़े दूर तक गांव की जिंदगी में पैठी हुई है। ठीक आंगन के चापाकल पर जमी काई (हरे रंग की, जिस पर पैर रखते ही हम फिसल जाते हैं..) की तरह। वे कभी-कभी शहर में भी हमें गांवों का आभास करा देते हैं। उनका मानना था कि ग्राम समुदायों ने तथाकथित अपनी निरीहता के बावजूद विचित्र शक्तियों का उत्सर्जन किया है।
रेणु रोज की आपाधापी के छोटे-छोटे ब्योरों से वातावरण गढ़ने की कला जानते थे। अपने ब्योरो, या कहें फिल्ड नोट्स को वे नाटकीय तफसील देते थे, ठीक उसी समय वे हमें सहज और आत्मीय लगने लगते हैं।

 रेणु जैसे महत्वपूर्ण कथाशिल्पी का पत्रकार होना अपने आप में एक रोचक प्रसंग है। उन्होंने अपने रिपोतार्जों के जरिए हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध किया है। एकांकी के दृश्य पुस्तक में उनके रिपोर्जों को संकलित किया गया है। उन्होंने बिहार की राजनीति
, समाज-संस्कृति आदि को लेकर पत्रिकाओं के लिए स्तंभ लेखन किया था।

चुनाव लीला- बिहारी तर्ज नाम से रेणु की एक रपट 17 फरवरी 1967 को प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने लिखा था-  पत्र और पत्रकारों से कोई खुश नहीं है। न विरोधी दल के लोग और न क्रांगेस-जन। एक पत्र को विरोधी दल की सभा में मुख्यमंत्री का पत्र कहा गया। और उसी पत्र के पत्रकार को मुख्यमंत्री के लेफ्टिनेंट ने धमकियां दीं। मुख्यमंत्री को शिकायत है कि पत्रकार उनके मुंह में अपनी बात पहना देते हैं। अ-राजनीतिक लोगों का कहना है कि चुनाव के समय पत्रकारों की पांचों ऊंगलियां घी में रहती हैं...।

पटना, दिल्ली, मुंबई करते हुए भी उनके भीतर गांव हमेशा से अपना राग अलापता रहा। उनका जब मन होता था तब वे गांव निकल पड़ते थे। वे कहते थे  "मैं हर दूसरे या तीसरे महीने शहर से भागकर अपने गांव चला जाता हूं। जहां मैं घुटने से ऊपर धोती या तहमद उठा कर फटी गंजी पहने गांव की गलियों में, खेतों मैदानों में घूमता रहता हूं। मुखौटा उतारकर ताजा हवा अपने रोगग्रस्त फेफड़ों में भरता हूं। सूरज की आंच में अंग प्रत्यंग को सेकता हूं (जो, हमारे गांव में लोग बांस की झाड़ियों में या खुले मैदान में मुक्तकच्छ होकर निबटते हैं न.)। झमाझम बरखा में दौड़ दौड़कर नहाता हूं। कमर भर कीचड़ में घुसकर पुरइन (कमल) और कोका (कोकनद) के फूल लोढ़ता हूं।
फणीश्वर नाथ रेणु को अपनी स्मृतियों से खास लगाव था। वे यादों को सहेजकर रखने में माहिर थे। उनके लेखन की पूंजी उनकी स्मृतियां ही थीं। कहानी या उपन्यास लिखते समय उन्हें जब भी थकावट महसूस होता था अथवा कहीं उलझ जाता थे तो वे कोई ग्राम्य - गीत गुनगुनाने लगते थे। लोकगीतों से उनका लगाव जगजाहिर है।

रेणु के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था क वह अपरिचित को परिचित और परिचित को आत्मीय बना लेता था। उनके पास आकर पीढ़ियों का भेद खत्म हो जाता था। वे तीन पीढ़ियों को जोड़ने वाले सेतु थे। पुरानों का स्नेह, समवयस्कों का सम्मान और नये लोगों का आदर उन्हें प्राप्त था। वे साहसी, दिलफेंक और खुले दिल के आदमी थे। कोई लुकाव-छिपाव नहीं, न दूसरों से न खुद अपनी जिंदगी से। झूठ पर सच का नकाब कभी नहीं ढाला।    

रेणु को अलग अलग रुपों में पढ़ते हुए मुझे वे एक बेबाक चरित्र नजर आने लगता था। एक ऐसा चरित्र नायक जिसका जीवन खेत की तरह उपजाउ है, जिसे केवल फसल पैदा करना आता है.. बान किसी स्वार्थ के।


फणीश्वर नाथ रेणु ने एक दफे कहा था, “एक एकड़ धरती में धान उपजाना, उपन्यास लिखने जैसा है।  लेखन का ही आनंद मिलेगा खेती करने में।साथ ही वे खेती को एक अलग नजरिए से लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करते थे। रेणु को पढ़ते हुए आप किसी किसानी करने वाले से यह सवाल पूछ सकते हैं कि क्या आप किसान हैंक्योंकि किसानी को बयां करना जहां एक ओर सबसे कठिन काम है वहीं ऐसे लोगों के लिए सबसे आसान काम है, जिनका रिश्ता खेत से..जिनका कनेक्शन गांव से है...

Sunday, April 05, 2015

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ...

शहरों में लोगबाग अपनी बालकनी से बारिश की रिमझिम का आनंद लेते हैं लेकिन गांव की कहानी कुछ औऱ है। मार्च के आखिरी दिनों में बिहार और देश कई हिस्सों में हुई बारिश ने किसानों का दिल तोड़ दिया। एक किसान के तौर पर 30 मार्च मेरे लिए कभी न भूलने वाली तारीख होगी।

उस दिन सुबह से ही मेघ को देखकर भय बना हुआ था। दरअसल कुछ ही दिन पहले मक्का के खेतों को पानी से सींचा था। मिट्टी अभी गिली ही थीं, इतनी गिली की हवा के झोंके में मक्के के जवान पौधे हिलने लग जाए। जो डर था वही हुआ। तेज आंधी और बारिश ने सब चौपट कर दिया।

बिन मौसम बारिश का इन दिनों कहर हर जगह देखा जा रहा है। एक किसान के तौर पर मैं इसे ग्लोबल वार्मिंग का हिस्सा मान रहा हूं। प्रकृति के संग हम जो छेड़छाड़ कर रहे हैं उसका नतीजा किसी अन्य ग्रह के लोग तो नहीं उठाएंगे न ! हमें ही उस कहर को भुगतना होगा।

मुझे याद है पहले बारिश तय समय पर हुआ करती थी। बारिश के वक्त गांव में गीत गाए जाते थे। फसल के अनुरुप बादलों का डेरा लगता था। बारिश मतलब केवल हम बरसात का मौसम समझते थे। जब खूब वर्षा होती थी तो हमारे आंगन के चूल्हे पर तरह तरह की मछलियां लाई जाती थी।

 लोगबाग घोंघा खाते थे। मछलियों की ढेर सारी प्रजातियां हमारे खाने की थालियों में दिखने लगती थी। लेकिन लेकिन अब सब दंतकथा जैसी लगती है। बसंत में भी बारिश, सुनकर अजीब लगता था। गर्मी की शुरुआत हुई नहीं कि बारिश की बूंदों ने घर आंगन को जूलाई के महीने का आभास करा दिया।

कोसी के इस पार जहां पूर्णिया आदि जिले हैं वहीं उस पार दरभंगा आदि हैं। हम बचपन में उधर के लोगों के मुंह से सुनते थे कि पूर्णिया बिहार का चेरापूंजी है, कभी भी बारिश होने लगती है उधर ! लेकिन तब बारिश बिन मौसम नहीं हुआ करती थी। इन दिनों हर महीने एक न एक दिन ऐसी बारिश होती है जो हमें आपदा की तरह दिखती है। शायद किसानी कर रहे अन्य लोग इसे अनुभव कर सकते हैं।

दरअसल जब हमारी जरुरत पानी की होती है तब नहीं लेकिन पता नहीं कैसे उस वक्त मेघ अपना रुप विकराल कर लेता है जब हम पटवन कर लिए होते हैं। मेघ को देखकर एक भय का वातावरण पसर जाता है। गांव घर की वह कहावत याद आने लगती है, जिसमें कहा गया है- का बरखा जब कृषि सुखानी...

बिहार में कई जगह तो बारिश के साथ ओले भी पड़े। इसके कारण खेतों में पक रही गेहूं की फसल गिर गयी। जहां गेहूं की फसल को काट कर खलिहान में रखा गया है, वह भींग गया है। आम व लीची के छोटे फल काफी मात्र में गिरे हैं। मुजफ्फरपुर में गेहूं समेत सभी फसलों में बारिश का पानी लग गया है। मसूर, चना सरसों व राई काट कर कुछ किसानों ने अपने दरवाजे पर तो कुछ किसानों ने खेत में ही रखे थे, उनकी फसल भींग गयी है।

सीतामढ़ी में 75 फीसदी गेहूं की फसल गिर गयी। शिवहर में दलहन, गेहूं, आम व लीची को भारी क्षति की सूचना है। दरभंगा के बिरौल में आम व लीची के छोटे दाने काफी मात्र में गिर गये। गेहूं की फसल खेत में गिर गयी है। जिन किसानों ने फरवरी या देर से मक्का लगाया है, उन्हें इस बारिश से थोड़ा फायदा होगा, लेकिन जिनके मक्का बड़े हो गया हैं, उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

मौसम की मार सबसे खतरनाक होती है। अब तो कई लोग मौसम को देखकर ही किसी कार्यक्रम की रुपरेखा तैयार करते हैं। कुछ कंपनियां ऐसी हैं जो मौसम की सूचनाओं पर नजर रखती है और उस मुताबिक अपने क्लाइंट को व्यापारिक गतिविधियां या पार्टी वगैरह तय करने की सलाह देती है। लेकिन किसान भला ऐसी कंपनियों से राय कैसे ले पाएगी। लेकिन हम आने वाले दिनों में ऐसी आशा तो रख ही सकते हैं कि दिन अच्छे आएंगे।

वैसे यह कटु सत्य है कि नुकसान उठाना किसानी कर रहे लोगों की नियति है। तो भी हम आशा रखते हैं, बेहतर कल को लेकर। दरसल हम किसानों के हाथ में केवल बीज बोना होता है। फसल होगी या कैसी होगी यह बात प्रकृति के हाथों में हैं। असमय बारिश का उपद्रव आँखों की कोरों को गीला कर दिया है।

मेरे जैसे किसानों की उम्मीदें अब मिर्च के खेतों पर है। किसान हार मानता कहाँ है, वो तो आशा भरी निगाहों से बस आसमाँ को निहारता रहता है ... इस आशा के साथ कि इस साल नहीं तो अगले बरस जरूर अच्छी फसल होगी...

लेकिन मार्च के अंत में बिन मौसम बारिश ने हमें यह बता दिया कि कोई तो है जो हमें हमारी गलतियों की सजा हमें सुना रहा है..और ऐसे में मैं कुमार गंधर्व की आवाज में सुनने लगता हूं- “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो....”

Tuesday, March 31, 2015

सुशील, मीनाक्षी और ‘हरी-भरी’

एक हैं जे सुशील और एक हैं मीनाक्षी। और इनके संग रहती हैं एक सुंदर सी हरी-भरी । आपके मन में यह सवाल कौंध रहा होगा कि आखिर ये हरी भरी कौन हैतो इसके लिए पहले हमें सुशील-मीनाक्षी को जानना होगा। दरअसल यह बुलेटबाज़ जोड़ी है, जिसने अपनी हरी बुलेट का नाम रखा है- हरी-भरी

हमने शहर
गांव करते हुए जीवन में बुलेट प्रेमी तो बहुत देखे लेकिन रंगरेज बुलेटबाज नहीं देखा था। इस जोड़ी से हमारी मुलाकात होती है अपने गांव चनका में। मक्का से सजे खेतों से गुजरते हुए हमारी नजर जब इस रंगरेज बुलेट प्रेमी पर पड़ती है तो मन के भीतर रंग से जुड़े कई गीत खुद ब खुद बजने लगे और मैं एक किसान मेजबान की तरह रंग से प्रेम करने वाले इस जोड़ी को अपने अहाते ले आता हूं।

पत्रकार जे. सुशील और कलाकार मीनाक्षी झा की कहानी बहुत मजेदार है। इस रंगरेज जोड़ी ने देश भर में दर्जनों शहरों के कई घरों और स्कूलों में घूम-घूम कर वॉल पेंटिग की है और अपनी संतुष्टि का नया जरिया ढूंढा है। जे सुशील जहां बीबीसी हिंदी सेवा में नौकरी करते हैं तो वहीं उनकी पत्नी मीनाक्षी ने जेएनयू से आर्ट हिस्ट्री में एमए किया है। जे सुशील ने अपनी पढ़ाईलिखाई जेएनयू और आईआईएमसी से की है।

नौकरीपेशा जिंदगी में भी यह जोड़ी न केवल खुद के लिए बल्कि पूरे समाज के लिए वक्त निकाल रहे हैं। अक्सर ऐसा देखा जाता है कि छुट्टियां मिलते हीं हम सब अपने परिवार के संग बाहर घुमने निकल जाते हैं लेकिन यह जोड़ी रंग के लिए बाहर तो निकलती है लेकिन एक खास उदेश्य से। उदेश्य भी ऐसा कि मन ही रंग जाता है। सुशील बताते हैं कि वे बहुत सारी छुट्टियों को इक्कट्ठा कर बुलेट लेकर देश के किसी हिस्से में निकल पड़ते हैं मीनाक्षी के संग घर-दिवार रंगने लगते हैं। उन्होंने कहा कि आमतौर पर वे छुट्टियों में रंग के अलावा दूसरा कोई काम नहीं करते हैं। लोगबाग सोशल मीडिया के जरिए उनसे संपर्क करत हैं और उन्हें अपने घरों, स्कूलों आदि में रंग करने बुलाते हैं। इस काम में इस जोड़ी को संतुष्टि मिलती है। उन्होंने कहा कि पेंटिग के लिए वे किसी से मांगते नहीं हैं। कोई रहने का इंतजाम कर देता है तो कोई बोजन आदि का।

श्रीनगर हो या फिर गोवा या पुणे। हर जगह यह जोड़ी बुलेट से पहुंच चुकी है। इस बार इनकी यात्रा खास इसलिए है कि ये बिहार आए हैं और वो भी गांव घुमने। पटना, जहानाबाद, वैशाली, मुज्जफरपुर होते हुए ये पूर्णियां पहुंचे हैं। यहां इन्होंने जहां शहर के कुछ स्कूलों में पेंटिग की वहीं उन्होंने इस दौरे का सबसे खास पड़ाव संथाल बस्ती है। जहां उन्हें काफी कुछ सीखने को मिल रहा है।  मीनाक्षी ने बताया कि उन्होंने यात्रा आरंभ करने से पहले ही योजना बना ली थी कि वे इस बार आदिवासियों के संग कुछ वक्त बिताएंगे ताकि वे समझ सकें कि आखिर उनकी पेंटिंग से कितना कुछ सीखा जा सकता है। बिहार के बाद वे झारंखड में आदिवासियों के कला से रूबरु होंगे।

पूर्णिया शहर में इन्होंने एक निजी स्कूल विद्या विहार और एक इजीनियरिंग कालेज में पेंटिग की। वहीं दूसरी ओर पूर्णिया जिले के चनका गांव के एक संथाली टोले में इस रंगरेज जोड़ी ने मिट्टी के दीवारों पर अपनी कला बिखेरी। यहां उनका अनुभव कई मायने में खास रहा। दरअसल संथाल टोले में मीनाक्षी ने फेवरिक रंग नहीं बल्कि देसी रंगों का प्रयोग किया। यहां इनका ब्रश भी देसी था। पटसन और लकड़ी के पतले टुकड़े की मदद से ब्रश बनाया गया था। मिट्टी के घरों को रंगने के बाद जे सुशील और मीनाक्षी ने कहा कि संथालों के साथ पेंटिग करना पढ़ाई करने जैसा है, इन लोगों से काफी कुछ नया सीखने को मिला।

इस अनोखे काम के बारे में जे सुशील ने कहा कि दरअसल मीनाक्षी को पेंटिंग का शौक है और उन्हें देश-दुनिया घूमने का। उन्होंने बताया कि स रंग यात्रा की शुरुआत मीनाक्षी के संग उन्होंने गोवा से की जिसके बाद उन्होंने ऑर्टोलॉग (http://artologue.in)  नाम से एक ब्लॉग बना लिया। इसके बाद तो ये दोनों लगातार घुमते ही हैं। पूणा, गोआ, बेंगलुरु, मंगलोर, होसूर, चेन्नई, दिल्ली, हरियाणा के शहर, चंडीगढ़, श्रीनगर, जम्मू  के बाद यह जोड़ी इन दिनों बिहार-झारखंड के शहर और गावों को रंग रही है। 

Sunday, March 15, 2015

बांस से बने अनोखे चचरी-पुल की यात्रा



रपट की तस्वीर साभार - चिन्मयानंद सिंह
बिहार के कोसी इलाके में एक गांव से दूसरे गांव में प्रवेश करते हुए मेरी नजर अक्सर बांस के बने पुलों पर आकर ठहर जाती है। सरकार जहां तक पहुंचने से बचने की कोशिश करती है वहां गांव वाले खुद अपनी मेहनत से पुल बना देते हैं, ताकि वे उपेक्षा के शिकार से बच सकेँ।

पुल एक ऐसा शब्द है, जिसका महत्व सबसे अधिक ग्रामीण इलाकों में समझा जा सकता है। बरसात के मौसम में जब बेकाबू नदियां या नहर गांव को दो हिस्से में बांट देती है तब भले ही सरकार गांव वालों के दर्द को समझ नहीं पाती है लेकिन बांस के सहारे बने चचरी के पुल गांव के दर्द को साझा कर लेती है अपनी ममतामयी आंचल के सहारे।

अब आप पूछेंगे कि भला यह चचरी पुल है क्या?  तो आपको बता दें कि चचरी बांस को आपस में बांध कर बनाए गए अस्थाई पुल को कहते हैं। बांस का ही खंबा बनता है और बांस के टुकड़े को आपस में बांधकर आने जाने का रास्ता बनाया जाता है।

देश के अन्य हिस्सों में तो चचरी पुल के दर्शन शायद दुर्लभ हों लेकिन बिहार के अधिकांश ग्रामीण इलाकों में यह चचरी पुल लोगों के जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन चुका है।

कोसी के इलाके में नदी और नहरों की संख्या अधिक है लेकिन उस अनुपात में पुल नसीब नहीं है। ऐसे में गांव का आधा हिस्सा नदी के इस पार है तो आधा उस पार। घर इस पार है तो खेत उस पार, स्कूल इस पार है तो पढ़ने वाले बच्चे उस पार। कहीं कहीं तो अस्पताल और पंचायत भवन तक जाने के लिए लोगों को चचरी पुल का सहारा लेना पड़ता है। केवल लोगबाग ही नहीं बल्कि जानवरों के लिए भी यह पुल वरदान है। बकरी आदि छोटे जानवर इस पुल से एक तरफ से दूसरी तरफ आसानी से निकल जाते हैं।

देश जब मेट्रो और न जाने किस तरह के फ्लाईओवर्स की बातें कर रहा है तो वहीं दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में एक सामान्य सा कंक्रीट का पुल भी लोगों को नसीब नहीं हो रहा है। सरकार की तरफ आशा भरी निगाहें डाले-डाले जब ग्राम्य समुदाय थक जाता है तब चचरी पुल उनके लिए राम बाण साबित होता है।

दरअसल चचरी पुल का निमार्ण बहुत आसान काम है। बांस के सहारे बनने वाले इस कामचलाऊ पुल के लिए ना किसी टेक्नीकल एक्सपर्ट इंजीनियर की इंजीनियरिंग की जरुरत होती है और न ही लाखों – करोड़ों रुपये के टेंडर पास होने की। इसके लिए तो बस चाहिए बांस और स्थानीय लोगों का सहयोग। स्थानीय लोगों के सहयोग से बांस का जुगाड़ करके चंद घंटों में ही तैयार कर लिया जाता है। दरअअसल कोसी के इलाके में बांस आसानी से उपलब्ध है जिस वजह से यह पुल बनाने में लोगों को दिक्कत नहीं होती है।

चचरी पुल बनाने के लिए पहले बांस को चीरकर बत्तियां बनाई जाती हैं और फिर उन बत्तियों को आपस में गूंथकर जालीदार और मज़बूत चचरी तैयार किया जाता है।  यह पुल के ऊपरी हिस्से का काम करती है। उसके बाद नदी के पानी में बांस डालकर खंबे बनाए जाते हैं जिनके ऊपर इस चचरी को टिका दिया जाता है। पुल की मज़बूती खंबो की मज़बूती और चचरी में बांस की बत्तियों की गुंथाई पर निर्भर है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि ज़रूरत ना होने पर इस पुल को उखाड़कर भविष्य के लिए संभाल कर भी रखा जा सकता है।

हालांकि चचरी पुल कंक्रीट की तरह मजबूत तो नहीं होते लेकिन इन पर से मोटरसाइकिल आसानी से निकल जाते हैं। वैसे पुल के लचीले होने के कारण इन पर से सावधानी से गुज़रना पड़ता है। हालांकि गांव वाले इस पर यात्रा करने में अभ्यस्त हो चुके हैं लेकिन शहरी लोगों को इस पर से यात्रा करने में पहली बार जरुर डर लगता है।

कोसी के ग्राम्य इलाकों की लगातार यात्रा करते हुए हमने चचरी पुल के इतिहास को जानने की कोशिश की लेकिन कोई ठोस जानकारी नसीब नहीं हुई। इस पुल को लेकर कोई लिखित दस्तावेज भी हाथ नहीं आया है। आखिर गांवों को जोड़ने वाली इस देसी पुलों का इतिहास तो कुछ जरुर ही होगा। आखिर यह पुल प्रचलन में कैसे आया, इसे जानने समझने की जरुरत है।

पिछले साल फेसबुक पर जब चचरी पुल की तस्वीर साझा की थी तो लंदन में रहने वाले कवि मोहन राणा ने एक कविता इसी चचरी पुल के नाम तैयार किया था-
“टिकोला से लदल गरमियाँ पार करती हैं चचरी पुल
मटमैले पानी में जा छुपा दिन अपने सायों के साथ...”

Monday, March 09, 2015

''पानी रे पानी तेरा रंग कैसा'

भवानीप्रसाद मिश्र की कविता की पंक्ति है- "उमड़ती नदी का खेती की छाती तक लहर उठना " मार्च की शुरुआत में देश के विभिन्न हिस्सों में जब बे-मौसम बारिश हो रही है तो यह पंक्ति मुझे सबसे अधिक अपनी ओऱ खींच रही है।

 इस खींचाव के पीछे गांव की पगडंडी है, जिसे आप गांव कनेक्शन कह सकते हैं। सोच रहा हूं कि यदि इन दिनों कोई फोटोग्राफर देश के अधिकांश गांवों की तस्वीरें खींचें तो आंखों के सामने कीचड़ से सनी सड़क और लबालब खेत पेंटिंग की तरह सबके सामने आ जाएगी। 

बे –मौसम बारिश की बढ़ती रफ्तार से सूखे नहर में पानी ने दस्तक देने की कोशिश की है। उधर
खेत में गरमा धान की खुशी देखने लायक है। जहां पानी जमा है वहां मछली की छपाछप संगीत की भांति हमें खींच रही है। सच कहिए तो ये सब मेरी आंखों में अंचल की श्वेत-श्याम तस्वीरों की एलबम तैयार कर रही है, जिसे मैं अपने मन की आलमारी में सहेजकर रखना चाहूंगा।
 
आज से तीन साल पहले 
मुझे इस बात का अहसास नहीं था कि धानगेंहूमूंगतोड़ी या पटूआ की खेती किस महीने होती हैमुझे तो बस यही मालूम था कि बारिश में खेत सबसे सुंदर दिखती हैसखी की तरह। "हवा का ज़ोर वर्षा की झरीझाड़ों का गिर पड़ना..."

घर के आगे दूर-दूर तक फैले खेत और उसकी सीमाओं पर खड़े पेड़ चुंबकीय आकर्षण पैदा करती रही है। आज बे-मौसम बारिश के बारे में लिखते वक्त जब किसानी के अनुभव को समझने बूझने लगा हूं तो खेती और लेखन का आनंद और बढ़ गया है।
बारिश के वक्त मुझे खेतों से एक अजीब तरह की सुगंध अपनी ओर खींचती हैमिट्टी की ऐसी खुश्बू और कहीं नहीं मिलती हैबस यहीं मिलती हैअपने गाम में।  नहर में बलूहाई पानी और बारिश की तेज बूंदे धार (खेतजहां पानी जमा होता हैपूर्णिया जिले में इसमें पटुआ को रखा जाता है) में इठलाती प्रवेश करती है तो गांव का सुदेस उरांव खुश हो जाता है क्योंकि  सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा पूरी कर भांति-भांति की मछलियां जो गांव आ पहुंची है।

माछ
सुनकर ही मन छप-छप करने लगता है। यह बारिश सचमुच दीवाना बना रही है लेकिन अफसोस सुदेस के हाथों फंसाई गई मछली हमें इस साल नसीब नहीं हो रही है। उधरबंसबट्टी (बांस) में बांस के नए-नए उपले उग आए होंगे। बांस के नवातुर गाछ के रंग मुझे रहस्मय लगते हैं। ऐसा हरापन कहां नसीब होता हैउस पर से बंसबट्टी की गंधआह जादू रे...।

कई तरह की कहानियां प्रचलित हैं बंसबट्टी को लेकर। बचपन से सुनता आया हूं कि पूर्णिमा की रात कोई आती है
उस बंसबट्टी में। सलेमपुर वाली (श्यामलपुर से ब्याह कर आई एक महिला) हमें जब यह कहानी सुनाती थी तो डर से अधिक रोमांच हुआ करता था।

तीन साल पहले ही वह गुजर गईं। वह खूब बीड़ी पीती थी। हमारे एक चैन स्मोकर चचा जब कामत पर आते थे
तो उनकी अधजली फेकी सिगरेट को सलेमपुर वाली बीछ कर पीती थी,  और कहती थी- एहन मजा ककरो में नै छै,  आई हम कुमार साहेब वला सिगलेट पीने छी..।“  उससे अंतिम मुलाकात जब हुई थी तो मैं उसके लिए क्लासिक माइल्ड की एक डिब्बी ले गया था। सिगरेट फूंकते हुए वह अजीब संतुष्टि का अहसास पाती थी और उसी अंदाज में कहानियां भी सुनाती थी।
 खैरबांस भी हमारे यहां कई प्रकार के होते हैं। बांस के पास ही बेंत की झाड़ी लगाई जाती है। बेंत की झाड़ी भी कम मायावी नहीं होती है। सूरज के ताप में जब हरे बेंत झुकते हैं तो ऐसा लगता मानो वो कुछ छुपा रही होठीक उसी वक्त धूप से बचने खरगोश उसमें पनाह लेते हैं।

हरे पर उजले का छाप बड़ा प्यारा लगता है। ठंड में बेंत को संथाल टोले के लोग काटने आते हैं
उस वक्त मुझे काफी दुख होता है क्योंकि इन्हीं बेंत के झाड़ और बंसबट्टी में हट्टा (बड़ी बिल्ली) भी रहता है। जंगल कट जाने से ये जंगली बिल्ली गांव को छोड़ दती है। हट्टे को संथाल अपने तीर का निशाना बनाते हैं।   वैसे अब बांस की जगह कदंबपोपुलरन्यू सागवान जैसी लकड़ियों ने ले लिया। यदि किसान के पास जमीन प्रचुर है तो वह पांच साल में लाखों रुपये कमा लेता है। मतलब काटकर बेच दिजिएप्लाइवुड के लिए।


मार्च के महीने में जब खेतों में मक्का और गरमा धान चहक रहे हैं तो किसानी कर रहे लोग अंचल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए उसी रफ्तार में जी तोड़ मेहनत करने में जुट चुके हैं और ठीक उसी वक्त बारिश का अहसास मेरे जैसे किसान को रुहानी अहसास देने लगा है।

नहर-खेत के बहाने में गीतों में खो जाना चाहता हूं। हिंदी सिनेमा में बरसात को लेकर लिखे गीतों में डूब जाना चाहता हूं। देखिए न इस वक्त एक अदभुत फ़िलासॉफ़िकल गीत 
''पानी रे पानी तेरा रंग कैसा'' तेज आवाज में सुनने का मन कर रहा है। किसानी का रंग यही है, अहसास यही है...

Monday, March 02, 2015

गांव - देहात और वो गुदरी माई

किसानी करते हुए बीते दिनों को याद करना इन दिनों जैसे रुटिन का हिस्सा बन गया है। कोसी नदी की एक उपधारा कारी कोसी के कछार पर बसे अपने गांव में मक्का की खेती करते हुए आपका किसान बीस साल पीछे अपने बचपन में खो जाने की जिद करने लगा है। यादों में वह एक बरगद पेड़ को फिर से जानने की कोशिश करने लगा है, जिसे आस पड़ोस के गांव-देहात के लोग पूजने आया करते थे। नाम था उसका ‘गुदरी माई’। पेड़ किस तरह लोगों को और गावों को जोड़ता है, हमने इसे ग्रामीण परिवेश में ही सीखा। शायद गांव कनेक्शन यही है क्योंकि गांव हमें जोड़ना सीखाता है न कि तोड़ना।

बचपन में कारी कोसी पर बने पुराने लोहे पुल को पारकर दुर्गा पूजा में लगने वाले मेले में दाखिल होने से ठीक पहले एक पुराने बरगद पेड़ पर लाल, उजले, हरे रंग के कई कपड़े टंगे दिखते थे। बैलगाड़ी से उतरकर लोगबाग आंखे मूंदकर बुदबुदाते थे और फिर कपड़े के कुछ-एक टुकड़े पेड़ की डाली में बांध देते थे। न अगरबत्ती की सुगंध न कोई दीप लेकिन इसके बावजूद भी यह पूजा की एक पद्दति थी, जो आज भी है।

इन दिनों किसानी करते हुए अपना मानस गुदरी माई के आसपास चक्कर लगाने लगा है  खुद को 20 साल पीछे रखकर आज गुदरी माई को याद करने का जी कर रहा है। खेत की पगडंडियों पर चलते हुए आज यादों में अपनी दुनिया रचने की इच्छा है।

कारी कोसी पर बने लोहे के पुल पर पहुंचने से पहले एक लाल रंग का मकान दिखता था, वही थी रामनगर डयोढ़ी लेकिन हमें तो चंपानगर जाना होता था। हमारी बैलगाड़ी आगे निकल पड़ती थी। चंपानगर डयोढ़ी के पास से गुजरते हुए मन में अजीब से छनछनाहट दौड़ पड़ती थी। वहां संगीत की आराधना होती थी। अंचल में ख्याल गायिकी की तस्वीर गढ़ी जाती थी। कुमार श्यामानंद सिंह ठाकुर जी की अराधना शास्त्रीय संगीत के जरिए करते थे। फुटबॉल मैच का आयोजन होता था, कुश्ती के अखाड़े लगते थे।  लेकिन अभी मेरी याद में ड्योढ़ी से अधिक वह बरगद का पेड़ ही नाच रहा है।

लोगबाग और अंचल की स्मृति को खंगालने के बाद पता चला कि हमारे इलाके में मंदिर मस्जिद से दूर 'ऊपरवाला' गाछ-वृक्ष में वास करता आया है। काली मंदिर भी काली-थान कहलाती है। जमीन के एक छोटे से टुकड़े में खड़ा एक बूढ़ा पेड़ 'बाबूजी थान' जाने कब बन गया, पता नहीं हैं। यहां इतिहास स्मृति की पोथी में बैठ जाती है, जिसे खंगालना पड़ता है। जोगो काका कहते हैं कि अभी भी पू्र्णिमा की रात सफेद घोड़े पर ब्रह्म (देवता टाइप) आते हैं, उन्हीं का है यह 'बाबूजी थान'। मैं अक्सर पू्र्णिमा की रात उस जंगल में गुजारने की कोशिश करता हूं, ताकि महसूस कर सकूं अंचल की स्मृति को।

गांव देहात की स्मृति यही है। यहां दिखावा कुछ भी नहीं है। लोगबाग जीवन को यहां जीते हैं खेत-पथार के लिए..अन्न के लिए। मेरी गुदरी माई की कहानी भी उसी स्मृति की श्रेणी में आती है। दुर्गा पूजा के आठवें दिन यानि अष्टमी को चंपानगर में लगने वाले मेले में दाखिल होने से पहले लोग गुदरी माई के पास  पहुंच जाते थे, मन्नतें मांगने। ‘मांगना’ अजीब शब्द है, कई अर्थ निकल आते हैं। मांगना शब्द से यह गीत याद आने लगता है- "अर्जियां सारी मैं चेहरे पे लिख के लाया हूं, तुमसे क्या मांगूं तुम खु़द ही समझ लो मौला। दरारे-दरारे है माथे पे मौला, मरम्मत मुकद्दर की कर दो मौला...।"

खैर, मन्नतें पूरी  होने पर लोगबाग उस बरगद पेड़ के किसी टहनी पर एक कपड़ा टांग देते थे, नए कपड़े नहीं पुराने। पता नहीं इसकी शुरुआत कैसे हुई होगी लेकिन अध्ययन करने पर कई कथाओं को विस्तार मिल सकता है। हम इसकी शुरुआत कर सकते हैं, यादों को सहेज सकते हैं। इन दिनों लगातार कबीर की साखियों पर ध्यान लगाने की वजह से गुदरी माई की याद और भी तेज हो गई है। दरअसल कबीर को पढ़ते वक्त इस तरह के कई ख्याल आते हैं। "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली...।"

हाल ही में दिल्ली, कानपुर, कुशीनगर के रास्ते पूर्णिया के अपने गांव चनका आने पर मुझे गुदरी माई में पीरबाबा दिखने लगे हैं, मैं याद करते हुए बौरा जाता हूं। कानपुर में कैंट इलाके में दाखिल होते ही वहां हमें एक पीर बाबा से सामना होता है। पता चला कि हर गुरुवार को वहां भीड़ जुटती है लेकिन मुझे वहां जलने वाली अगरबत्ती से उठने वाली  सुगंध अपनी ओर खींचती है और मैं सिर झुका लेता हूं...। मैं फिर अपनी यादों के जरिए चनका से कानपुर पहुंच जाता हूं। सोचता हूं कि गुदरी माई ने न जाने कितने लोगों की अर्जियां सुनी होगी..क्या हम बाद में उसे याद करने की भी जरुरत महसूस करते हैं?  मशीन की तरह बनती जा रही जिंदगी में क्या हमारा नाता गाछ-वृक्षों से यूं ही बना रहेगा? ऐसे सवाल इन दिनों खूब तंग करने लगे हैं।

Monday, February 23, 2015

खेती से भंग हो रहा मोह

नहरखेतपगडंडीगाछ-वृक्षचिडियों की आवाजेंबरसात में माटी की सुगंधधनरोपनी के वक्त कादो से सने रोपनी करते लोगों के पैर..। आप समझ रहे होंगे कि लिखने वाला’ रुहानी होता जा रहा है लेकिन बात यह है कि लिखने वाला’ किसानी करने वाले लोगों की बात करना चाहता है। अपनी कथाओं के जरिए जन-मानस को गांव से करीब लाने वाले लेखक फणीश्वर नाथ रेणु अक्सर कहते थे कि खेती करना कविता करना हैकहानी लिखना है..।

फणीश्वर नाथ रेणु ने एक दफे कहा था
, “एक एकड़ धरती में धान उपजानाउपन्यास लिखने जैसा है।  लेखन का ही आनंद मिलेगा खेती करने में। साथ ही वे खेती को एक अलग नजरिए से लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- "आबरन देवे पटुआपेट भरन देवे धान। पूर्णिया के बसइयारहै चदरवा तान।" रेणु को पढ़ते हुए आप किसी किसानी करने वाले से यह सवाल पूछ सकते हैं कि क्या आप किसान हैं?  क्योंकि किसानी को बयां करना सबसे कठिन काम है।
चलिए आपसे न पूछकरसवाल करने वाला खुद से यह सवाल करता हैदरअसल किसानी पृष्ठभूमि में जिसका मानस तैयार हुआ हैवह भी ऐसे सवाल पर लंबी चुप्पी साध लेता है। हालांकि अभी भी किसानी की दुनिया में खुश्बू बरकरार हैबस हिंदुस्तानी समाज का नजरिया बदल गया है। रेणुकोसी के जिस इलाके में पटसन (जूट) की खेती से खुशहाल रहने वाले किसानी युग की चर्चा करते थेअब वह युग बदल गया है। पटसन के जगह पर पहले सूरजमुखी ने किसानों को खुशहाल बनायाफिर मक्का ने और अब वह जगह लकड़ी ले रहा है।

इन सब उदाहरणों के संग खेती छोड़ने वाले लोगों का भी जिक्र जरुरी है। आखिर ऐसी क्या वजह सामने आ गई बिहार के कोसी इलाके के तथाकथित बड़े किसानों का खेती से मोह भंग हो गया
यह एक बड़ा सवाल है और इसी के आसपास क्या आप किसान हैं’ जैसा सवाल उठ खड़ा हुआ है।  इन सबके बीच फेसबुक पर मेरे एक दोस्त की टिप्पणी है-  पूर्णिया का ही कोई आदमी समझ सकता है कि पटुआ की सोंधी खुशबू किसान की आत्मा को तर कैसे करती होगी और ललका भदईया चौर (चावल) का भात की महिमा क्या होती है...।” 
पूर्णियाकटिहारअररियाकिशनगंजमधेपुरासहरसा जिले के ग्रामीण इलाकों में खेती एक पुरानी परंपरा को ढ़ो रही हैजिसकी वजह से खेती का जोड़-घटाव खराब हो रहा है। क्या आप किसान हैं?  के सकारात्मक जवाब के लिए किसानी के अंदाज को पेशेवर ढंग से पेश करने की भी जरुरत है। ऐसी बात नहीं है कि धानगेंहू या अन्य किसी नकदी फसल के बदौलत एक परिवार का भरन पोसन नहीं हो सकता है। बस किसानी का अंदाज बदलना होगा।

दरअसल
इस सवाल के बीच में दो तरह के लोग अतृप्त’ हुए खड़े हैं। एक ऐसे किसानजिनके पास जमीन है और जो पहले खुट्टा गाड़कर गांव में जमे रहते थे और उसी के संग लोग काम करते थे। (कृप्या इन अतृप्त जमात के बीच हम-आप भूमि-वितरण को न खड़ा करें क्योंकि राजनीति करने वाले इसका हल कभी नहीं निकालेंगे क्योंकि वे पिछले कई दशकों से इसी की बदौलत अपनी दुकान चला रहे हैं। हमें खुद इसका हल निकालना होगासकारात्मक तरीके से।) अब सवाल उठता है कि फिर ऐसी तस्वीर कैसे उभर गई कि दोनों जमात गांव से दूर हो गए। ऐसे में यह भी सवाल लाजमी है कि क्या उन इलाकों में अब खेती ही नहीं हो रही हैक्योंकि जमीन वालेकाम करने वाले हैं ही नहीं। दरअसल इन सबके संग एक दूसरी तस्वीर भी तैयार हुईवह पलायन के भीतर पलायन का है। गांव से पलायन का रुख शहर का रास्ता तय करता है लेकिन यह भी जानने की जरुरत है कि एक पलायन का रास्ता गांव से गांव का भी है। ये ऐसे लोग होते हैंजो नकदी फसल के लिए एक ही जिले के दूसरे गांव का रुख करते हैं।

कोसी के अधिकांश इलाकों में पलायन का यह रुप सबसे अधिक देखा जा रहा है। मेहनतकश लोगों की बड़ी जमात पहले पंजाब
हरियाणादिल्ली आदि जगहों से मेहनत कर आते हैंकुछ पूंजी जमा करते हैं और फिर उन किसानों के संपर्क में आते हैंजो अब शहर का रास्ता अपना चुके हैं। यहीं आकर खेती एक कांट्रेक्ट का रुप अख्तियार करती है। ये मेहनतकश प्रवासी किसान अधिक भूमि वाले किसानों के खेतों को ठेके पर लेते हैं और शुरु होती है नकदी फसल की एक नई फिल्मजिसमें फसल के लिए नकद का प्रावधान है। इस फिल्म का नायक एक प्रवासी किसान होता हैजिसमें परिस्थितियों के संग कदम मिलाने की ताकत होती है। किसानी की नई परिभाषा गढ़ते इन लोगों को करीब से समझने की जरुरत है। इसमें प्रवासियों की मनोस्थिति को भी जानना होगा। समाजशास्त्र के अध्येताओं को इस पर नजर डालने की जरुरत है। मीडिया को इस ओर देखना होगाताकि एक बड़े तबके का किसानी व्यवस्था से मोह भंग न हो और जब यह सवाल कोई पूछे कि क्या आप किसान हैं ? ” तो जवाब सकारात्मक ही आएइसकी गारंटी मिले।

Friday, February 13, 2015

गांव-देहात में लगी वेब मीडिया की चौपाल

चनका एक गांव है जो बिहार के पूर्णिया जिला में स्थित है। आप को यह जानकर हैरानी होगी कि इस गांव से दो साल पहले तक जिला और आसपास के लोग भी अनजान थे, जबकि यह एक पंचायत है। वो भी ऐसा पंचायत जहां अभी तक पक्की सड़क नहीं पहुंची है। बिजली भी हर टोले में नहीं है। इन तमाम विरोधाभासों के बीच यह गांव पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में अपने पांव पसार रहा है।
सोशल मीडिया के जरिए या कहिए इंटनेट के जरिए चनका गांव को वेब जगत में लोग जानने लगे हैं। इसी कड़ी में जनवरी की 18 तारीख को यहां फेसबुक, ट्विटर और ब्लाग की दुनिया से जुड़े लोग इकट्ठा हो गए और सभी ने मिलकर सजा ली फेसबुक की चौपाल। 

अभी तक बड़े शहरों के कॉफी हाउस या सेमिनार हॉल में या फिर गूगल हैंगआउट के जरिए लोगबाग के मिलने जुलने की खबर सुनता आया था लेकिन ख्य़ाल आया क्यों न गांव में ऐसा किया जाए। जब सोचा तो भरोसा नहीं था कि 10 लोग भी इकट्ठा होंगे लेकिन जब बैठक में 50 से अधिक लोग जमा हो गए तो पता चला कि डिजिटल नेटवर्क क्या चीज है।
सोशल मीडिया मीट में बिहार के विभिन्न इलाकों और पड़ोसी देश नेपाल से ऐसे लोग चनका गांव पहुंचे जो फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर सक्रिय हैं। इस गांव में भले ही सड़क नहीं पहुंची हो लेकिन मोबाइल पर 2 जी और 3 जी पहुंच चुका है। ऐसे में हमने सोचा क्यों न इसी माध्यम के जरिए गांव की आवाज दूर तलक तक पहुंचाई जाए। सरकार या प्रशासन का रोना रोने से अच्छा है कि हम अपने स्तर पर जहां तक हो सके गांव के लिए काम करें। आखिर गांव कनेक्शन भी तो यही है न। 

हमने फेसबुकियों के इस जुटान का नाम ‘सोशल मीडिया मीट’ दिया था। चनका को हमने इसलिए चुना क्योंकि जहाँ पहुंचने के लिए अभी भी ढंग की सडक नहीं है, लेकिन आभासी दुनिया से संपर्क के लिए इंटरनेट उपलब्ध है। तरह-तरह के लोग इस आयोजन में पहुंचे थे। कोई वामपंथी था, तो कोई उत्तर आधुनिक विमर्शकार। कोई आरएसएस का प्रचारक था तो कोई पत्रकार।

सोच और भाषा में सब अलग-अलग, लेकिन सबों को जोड़ रही थी एक अदृश्य तरंग। यह तरंग इंटनेट का महाजाल ही है।  लगभग पूरे दिन के इस जुटान में मुख्य रूप से सोशल मीडिया के लोकतंत्र पर चर्चा हुई। हमारा ऐसा मानना है कि  फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग जैसे सोशल मीडिया से जुड़े लोग जब शहर से गांव की ओर मुड़ते हैं तो कहानी ही बदल जाती है। हम जिसे आभासी दुनिया मानते हैं, उसी दुनिया के लोग जब असर में गांव देहात और वहां के लोगबाग से मिलते हैं तो ढेर सारी नई बातें निकलकर सामने आती है। फणीश्वर नाथ रेणु के कथा और रिपोतार्जों के लोकप्रिय होने के पीछे ग्राम्य जीवन की ताकत ही है क्योंकि वे उसे देखकर फिर लिखते थे।
बैठक में गाँव के विकास पर कई सुझाव आए और उस पर चर्चा हुई। सबने एक सुर में गाँव के विकास में इंटरनेट और सोशल मीडिया के योगदान को महत्वपूर्ण माना। साथ ही लोगों ने अपने अनुभवों को साझा किया। गीत संगीत का भी दौर चला।

सोशल मीडिया मीट में इसके अलावा ग्रामीण भारत, डिजिटाइलेजशन और सोशल मीडिया से जुड़े तमाम मुद्दों पर इस बैठक में चर्चा हुई।  बैठक में मुख्य रूप से नेपाल से आए युवा उद्यमी प्रवीण नारायण चौधरी, वरिष्ठ साहित्यकार और बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तारानंद वियोगी, स्टील ऑथॉरटि ऑफ इंडिया के सेवानिवृत अधिकारी एनके ठाकुर, शिक्षाविद राजेश मिश्र,  प्राचीन धरोहरों की रक्षा पर काम करने वाले अमित आनंद, अंचल पर काम कर रहे चिन्मयानंद सिंह सहित कई लोग शामिल थे।

वैसे हमारे मन में एक शंका भी थी। हमें लग रहा था कि लोगों का जो स्वभाव हमें फेसबुक पर देखने को मिलता है, वास्तविक दुनिया में भी वे वैसे ही हैं या नहीं। लेकिन हमें तब राहत मिली जब यह अहसास हो गया कि आमंत्रण पर आए सभी लोग एक ढंग की ही बातें करते हैं। हम समझ गए कि फेसबुक या सोशल मीडिया के अन्य मंचों पर सक्रिय सभी लोग नकाबपोश नहीं हैं। वे जो वेब पर लिखते हैं, वैसे ही वास्‍तविकता में भी हैं।

रेणु की धरती पर फेसबुकिया यारों के इस चौपाल को सफल ही कहा जा सकता है क्योंकि जमा हुए लोगों ने एक सुर में कहा और माना कि हमारे गांव में कोई बाहरी लोग नहीं विकास करेंगे। ये हमें खुद ही करना होगा।