Friday, February 13, 2015

गांव-देहात में लगी वेब मीडिया की चौपाल

चनका एक गांव है जो बिहार के पूर्णिया जिला में स्थित है। आप को यह जानकर हैरानी होगी कि इस गांव से दो साल पहले तक जिला और आसपास के लोग भी अनजान थे, जबकि यह एक पंचायत है। वो भी ऐसा पंचायत जहां अभी तक पक्की सड़क नहीं पहुंची है। बिजली भी हर टोले में नहीं है। इन तमाम विरोधाभासों के बीच यह गांव पिछले कुछ दिनों से सोशल मीडिया में अपने पांव पसार रहा है।
सोशल मीडिया के जरिए या कहिए इंटनेट के जरिए चनका गांव को वेब जगत में लोग जानने लगे हैं। इसी कड़ी में जनवरी की 18 तारीख को यहां फेसबुक, ट्विटर और ब्लाग की दुनिया से जुड़े लोग इकट्ठा हो गए और सभी ने मिलकर सजा ली फेसबुक की चौपाल। 

अभी तक बड़े शहरों के कॉफी हाउस या सेमिनार हॉल में या फिर गूगल हैंगआउट के जरिए लोगबाग के मिलने जुलने की खबर सुनता आया था लेकिन ख्य़ाल आया क्यों न गांव में ऐसा किया जाए। जब सोचा तो भरोसा नहीं था कि 10 लोग भी इकट्ठा होंगे लेकिन जब बैठक में 50 से अधिक लोग जमा हो गए तो पता चला कि डिजिटल नेटवर्क क्या चीज है।
सोशल मीडिया मीट में बिहार के विभिन्न इलाकों और पड़ोसी देश नेपाल से ऐसे लोग चनका गांव पहुंचे जो फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया मंचों पर सक्रिय हैं। इस गांव में भले ही सड़क नहीं पहुंची हो लेकिन मोबाइल पर 2 जी और 3 जी पहुंच चुका है। ऐसे में हमने सोचा क्यों न इसी माध्यम के जरिए गांव की आवाज दूर तलक तक पहुंचाई जाए। सरकार या प्रशासन का रोना रोने से अच्छा है कि हम अपने स्तर पर जहां तक हो सके गांव के लिए काम करें। आखिर गांव कनेक्शन भी तो यही है न। 

हमने फेसबुकियों के इस जुटान का नाम ‘सोशल मीडिया मीट’ दिया था। चनका को हमने इसलिए चुना क्योंकि जहाँ पहुंचने के लिए अभी भी ढंग की सडक नहीं है, लेकिन आभासी दुनिया से संपर्क के लिए इंटरनेट उपलब्ध है। तरह-तरह के लोग इस आयोजन में पहुंचे थे। कोई वामपंथी था, तो कोई उत्तर आधुनिक विमर्शकार। कोई आरएसएस का प्रचारक था तो कोई पत्रकार।

सोच और भाषा में सब अलग-अलग, लेकिन सबों को जोड़ रही थी एक अदृश्य तरंग। यह तरंग इंटनेट का महाजाल ही है।  लगभग पूरे दिन के इस जुटान में मुख्य रूप से सोशल मीडिया के लोकतंत्र पर चर्चा हुई। हमारा ऐसा मानना है कि  फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग जैसे सोशल मीडिया से जुड़े लोग जब शहर से गांव की ओर मुड़ते हैं तो कहानी ही बदल जाती है। हम जिसे आभासी दुनिया मानते हैं, उसी दुनिया के लोग जब असर में गांव देहात और वहां के लोगबाग से मिलते हैं तो ढेर सारी नई बातें निकलकर सामने आती है। फणीश्वर नाथ रेणु के कथा और रिपोतार्जों के लोकप्रिय होने के पीछे ग्राम्य जीवन की ताकत ही है क्योंकि वे उसे देखकर फिर लिखते थे।
बैठक में गाँव के विकास पर कई सुझाव आए और उस पर चर्चा हुई। सबने एक सुर में गाँव के विकास में इंटरनेट और सोशल मीडिया के योगदान को महत्वपूर्ण माना। साथ ही लोगों ने अपने अनुभवों को साझा किया। गीत संगीत का भी दौर चला।

सोशल मीडिया मीट में इसके अलावा ग्रामीण भारत, डिजिटाइलेजशन और सोशल मीडिया से जुड़े तमाम मुद्दों पर इस बैठक में चर्चा हुई।  बैठक में मुख्य रूप से नेपाल से आए युवा उद्यमी प्रवीण नारायण चौधरी, वरिष्ठ साहित्यकार और बिहार प्रशासनिक सेवा के अधिकारी तारानंद वियोगी, स्टील ऑथॉरटि ऑफ इंडिया के सेवानिवृत अधिकारी एनके ठाकुर, शिक्षाविद राजेश मिश्र,  प्राचीन धरोहरों की रक्षा पर काम करने वाले अमित आनंद, अंचल पर काम कर रहे चिन्मयानंद सिंह सहित कई लोग शामिल थे।

वैसे हमारे मन में एक शंका भी थी। हमें लग रहा था कि लोगों का जो स्वभाव हमें फेसबुक पर देखने को मिलता है, वास्तविक दुनिया में भी वे वैसे ही हैं या नहीं। लेकिन हमें तब राहत मिली जब यह अहसास हो गया कि आमंत्रण पर आए सभी लोग एक ढंग की ही बातें करते हैं। हम समझ गए कि फेसबुक या सोशल मीडिया के अन्य मंचों पर सक्रिय सभी लोग नकाबपोश नहीं हैं। वे जो वेब पर लिखते हैं, वैसे ही वास्‍तविकता में भी हैं।

रेणु की धरती पर फेसबुकिया यारों के इस चौपाल को सफल ही कहा जा सकता है क्योंकि जमा हुए लोगों ने एक सुर में कहा और माना कि हमारे गांव में कोई बाहरी लोग नहीं विकास करेंगे। ये हमें खुद ही करना होगा।

1 comment:

अर्चना चावजी Archana Chaoji said...

एक सही शुरूआत ..शुभकामनाएँ ...कि लोग जुड़े रहें