Friday, January 16, 2026

क्या सिंगूर फिर से खबरों में आने वाला है ?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर एक ऐसा नाम है जिसने बीते दो दशकों के दौरान सूबे की राजनीति का रंग ही बदल दिया है। यह इलाका राजनीतिक बदलाव का प्रतीक है। इसी एक नाम ने ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल का चेहरा बनाने का काम किया है।  
जैसा कि हम सभी को पता है कि टाटा मोटर्स की नैनो कार फैक्ट्री के खिलाफ हुए भूमि आंदोलन ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह से उलट दिया था और 2011 में इसी आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन की नींव रखी। टाटा के सिंगूर से चले जाने के 18 साल बाद आज हालात पर स्थानीय लोग आत्ममंथन कर रहे हैं। यहां के एख पूर्व विधायक का कहना है कि ममता दीदी ने सिंगूर को भुला दिया है। हालांकि राजनीति में कुछ भुलाया नहीं जाता है, वक्त का पहिया घूमता है और देखिए न उसी सिंगूर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली प्रस्तावित है। भारतीय जनता पार्टी के नेता मंगल पांडे ने हाल ही प्रस्तावित रैली के जगहों का मुयाना भी किया था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 18 जनवरी को सिंगूर के सिंगर भेरी मौजा में होने वाली निर्धारित रैली से पहले राज्य में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। यह मौजा उसी भूखंड का हिस्सा है, जिसे कभी कार फैक्टरी के लिए आरक्षित किया गया था।

केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सुकांत मजूमदार ने बुधवार को कहा कि सिंगूर बंगाल के “औद्योगिकीकरण के खोए हुए अवसर” का प्रतीक है।
सिंगूर में 18 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली होने वाली है। गौरतलब है कि सिंगूर में कभी टाटा की फैक्ट्री लगने वाली थी लेकिन विरोध के चलते फैक्ट्री नहीं लगी और गुजरात चली गई। इस बार भाजपा ने मोदी की रैली टीएमसी के दबदबे वाले इलाके में करने की ठानी है।

सिंगूर पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में वही जगह है, जहाँ टाटा मोटर्स ने अपनी महत्वाकांक्षी नैनो परियोजना का संयंत्र लगाने का फ़ैसला किया था। लेकिन तृणमूल कांग्रेस और ख़ासकर ममता बनर्जी के विरोध के कारण टाटा को आख़िरकार यहाँ से इस परियोजना को समेटना पड़ा था।

जिस ममता बनर्जी के भारी विरोध और आंदोलन के कारण टाटा को यहाँ से अपनी लखटकिया नैनो परियोजना को समेटकर गुजरात के साणंद जाना पड़ा था, वही ममता बंगाल की सत्ता में हैं।

सिंगूर और नंदीग्राम में ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों ने ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में पहुंचने का रास्ता साफ़ किया था। सिंगूर आंदोलन राज्य के सरकारी स्कूलों में आठवीं क्लास की इतिहास की किताब का हिस्सा बन चुका है।

34 वर्षों के वाममोर्चा के शासन में परिवर्तन का श्रेय अगर किसी एक घटना को दिया जाये, तो वह सिंगूर ही है। सिंगूर आंदोलन के बीच से उठी परिवर्तन की हवा ने राज्य की सत्ता में लगभग अपराजेय बन गये मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नीत वाममोर्चा गठबंधन को 2011 में जड़ से उखाड़ कर उड़ा दिया था तब से लेकर हाल तक वाम मोर्चा को नेतृत्व दे रही माकपा और उसके सहयोगी दल बंगाल की सियासत में लगातार कमजोर ही होते गये हैं।

हुगली लोकसभा क्षेत्र में सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक है सिंगूर। तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने टाटा मोटर्स की नैनो कार परियोजना के लिए सिंगूर में ही जमीन अधिग्रहण करना शुरू किया था। टाटा मोटर्स के लिए 997 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था। हालांकि सिंगूर की जमीन बेहद उपजाऊ होने के चलते कुछ किसान जमीन देने के प्रति अनिच्छुक थे। इसी मुद्दे पर वहां एक आंदोलन छिड़ गया, जिसका नेतृत्व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने किया था। इसमें उनका साथ बंगाल के नागरिक समाज के कई विशिष्ट व्यक्तियों के अलावा देश भर के पर्यावरणविदों ने भी दिया था।

सिंगूर में जमीन अधिग्रहण के विरोध पर उतारू ममता बनर्जी को प्रशासन ने वहां जाने से रोक दिया था। इसके बाद हाथों में संविधान की किताब लिये ममता बनर्जी विधानसभा पहुंच गयी थीं और फिर विधानसभा में जबरदस्त तोड़फोड़ की घटना हो गयी। जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के तहत ममता बनर्जी ने तब 26 दिनों का लगातार अनशन कर देशभर के लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा था। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, ने टाटा से बात कर नैनो कार परियोजना को अपने राज्य में मंगा लिया। जो कारखाना सिंगूर में लगना था, गुजरात के साणंद में लग गया।

2026 में एक बार फिर सिंगूर देश भर के लोगों की जुबान पर आने वाला है। इसकी शुरुआत हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 18 जनवरी को प्रस्तावित सिंगूर दौरे से पहले सभा स्थल को लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है। स्थानीय मीडियाके अनुसार जिस जमीन पर प्रधानमंत्री मोदी की सभा प्रस्तावित है, उसे जबरन लेने का आरोप लगाया गया है। इसे लेकर स्थानीय किसानों व जमीन मालिकों में भारी असंतोष देखा जा रहा है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार तक कुल 26 लोगों ने अपनी जमीन सभा के लिए देने से साफ इनकार कर दिया है। इनमें छह लोगों ने बुधवार और 20 लोगों ने गुरुवार को बीडीओ और स्थानीय थानेदार को लिखित रूप में आपत्ति दर्ज करायी है।

इस मुद्दे पर गुरुवार शाम सिंगूर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य के कृषि विपणन विभाग के मंत्री बेचाराम मन्ना ने आरोप लगाया कि किसानों की सहमति के बिना जमीन लेने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि सिंगूर तृणमूल कांग्रेस और सिंगूर कृषि जमीन रक्षा कमेटी की ओर से इस कदम का कड़ा विरोध किया जा रहा है।

हालांकि जो होगा वह हम सबके सामने होगा लेकिन इतना तो तय है कि सिंगूर में प्रधानमंत्री की रैली का प्रतीकात्मक महत्व है, क्योंकि यह वही भूमि है, जिसने 34 साल से सत्ता में रहे वाम मोर्चा को राज्य से बाहर किया और ममता बनर्जी को सत्ता की चाबी दी थी। अब देखना है कि इस विधानसभा चुनाव बंगाल की सत्ता वाली चाभी किसके पास जाती है।

Friday, January 09, 2026

ममता बनर्जी को गुस्सा क्यों आया?

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने गुरुवार को पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के ठिकानों पर छापेमारी की. इस पर हाईवोल्टेज ड्रामा तब शुरू हो गया, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी रेड वाली जगहों पर पहुंच गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले ED की टीम उनकी पार्टी से जुड़े दस्तावेजों को जब्त करने की कोशिश कर रही है!
विधानसभा चुनाव के दहलीज पर खड़े पश्चिम बंगाल में आई-पैक के चीफ प्रतीक जैन के घर पर गुरुवार को ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की रेड को लेकर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में ठनती दिख रही है।

प्रतीक जैन के घर पर छापेमारी की सूचना पर ममता बनर्जी मौके पर पहुंचे और उन्होंने वहां से गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर लिया। ममता बनर्जी ने चिर परिचित अंदाज में हमला बोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह को नॉटी होम मिनिस्टर भी कहा। बनर्जी ने आरोप लगाया कि ईडी से छापेमारी करवाकर बीजेपी ने तृणमूल की चुनावी रणनीति को चोरी किया।

ममता बनर्जी यहीं पर नहीं रुकीं उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा कि वह अपने गृह मंत्री को काबू में रखें। बंगाल में मार्च-अप्रैल में चुनाव होने हैं, तो वहीं दूसरी तरफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी के खिलाफ आई-पैक ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। तो वहीं दूसरी ईडी ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में कोयला तस्करी से जुड़े हवाला कारोबारी ने आई-पैक को करोड़ों रुपये के लेनदेन में मदद की।

ईडी ने गुरुवार सुबह ही कोलकाता में सलाहकार संस्था आई-पैक के दफ्तर और इसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर तलाशी अभियान शुरू किया था। इसकी खबर मिलते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले प्रतीक के घर गई और वहां से आई-पैक के दफ्तर। उन्होंने तलाशी के दौरान ही वहां से दर्जनों फाइलें और लैपटॉप को अपने कब्जे में लेकर गाड़ी में रख लिया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार और भाजपा पर ईडी के जरिए आई-पैक के दफ्तर से तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से जुड़े दस्तावेजों को जब्त करने का प्रयास करने का आरोप लगाया है। 

दूसरी ओर, ईडी ने अपने बयान में कहा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने संवैधानिक पद का दुरुपयोग करते हुए ईडी तलाशी के दौरान कई दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को जबरन कब्जे में ले लिया और अपने साथ ले गई।

गौरतलब है कि आई-पैक एक पेशेवर राजनीतिक सलाहकार फर्म है। यह देश के विभिन्न राजनीतिक दलों को चुनावी रणनीति बनाने और चुनाव अभियान के संचालन में मदद करती है। इसका पूरा नाम है इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी। 

फिलहाल प्रतीक जैन इसके निदेशक है। वो तृणमूल कांग्रेस की आईटी सेल के प्रमुख भी हैं। इसी संस्था ने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए कई रणनीति तैयार की थी।

इस पूरे घटनाक्रम में ममता बनर्जी की बात तो सभी कर रहे हैं लेकिन यहां आईपैक के चीफ प्रतीक जैन को भी जानने की जरुरत है। आईपैक के निदेशक प्रतीक जैन ने आईआईटी- मुंबई से बीटेक की डिग्री ली है। 

डिग्री पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 2012 में डेलायट में एनालिस्ट के तौर पर काम किया। कुछ समय बाद ही उन्होंने प्रशांत किशोर के साथ सिटीजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस की स्थापना की थी। यही आगे चल कर आई-पैक में बदला। उस समय उनके साथ ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल भी थे। बाद में प्रशांत किशोर ने इस संस्था से दूरी बना ली। अब प्रमुख के तौर पर प्रतीक जैन ही संस्था का कामकाज देखते हैं। इसके साथ ही वो तृणमूल कांग्रेस की आईटी सेल के प्रमुख भी हैं।

यहां यह समझने की भी जरुरत है कि आखिर ईडी ने तलाशी अभियान क्यों आरंभ किया। दरअसल कोयला घोटाले की जांच के सिलसिले में प्रतीक जैन के आवास और आई-पैक के दफ्तर पर तलाशी अभियान शुरू किया गया।

ईडी के तलाशी अभियान की खबर सामने आते ही गुरुवार को ममता बनर्जी शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ पहले प्रतीक जैन के घर पहुंची। वहां करीब एक घंटे रहने के दौरान वो अपने हाथों में हरे रंग की एक फाइल लेकर बाहर निकलीं और आरोप लगाया कि ईडी तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों और उम्मीदवारों की सूची जब्त कर साथ ले जा रही थी। लेकिन उन्होंने उसे अपने कब्जे में ले लिया है।

उसके बाद वो भारी पुलिस बल के साथ साल्टलेक स्थित आई-पैक के दफ्तर पहुंची। वहां उनके पहुंचने के कुछ देर बाद ही पुलिस के जवान दर्जनों फाइलें और कई लैपटॉप ममता बनर्जी की कार में रखते देखे गए। वहां पुलिस और प्रशासन के तमाम शीर्ष अधिकारियों के अलावा तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता भी मौजूद थे।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया, “केंद्रीय एजेंसी इस छापेमारी की आड़ में तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से जुड़ी जानकारियां ‘ट्रांसफर’ कर रही है। यह गंभीर अपराध है।” 

उन्होंने कहा, “आई-पैक सिर्फ एक निजी संस्था नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस की अधिकृत टीम है। ईडी के इस हमले का जवाब आम लोग देंगे।

दूसरी ओर, प्रवर्तन निदेशालय ने यहां जारी एक बयान में ममता बनर्जी पर अपने संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग कर कई दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सबूत जबरन साथ ले जाने का आरोप लगाया है। 

बयान में कहा गया है कि ईडी कोयला घोटाले के मामले में ठोस जानकारी के आधार पर दस जगहों पर तलाशी अभियान चला रही है। यह अभियान न तो किसी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ है और न ही चुनाव से इसका कोई लेना-देना है।

Friday, January 02, 2026

बंगाल की चुनावी डायरी

बंगाल में अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी तैयारी में जुट गई है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन के बंगाल दौरे पर थे और उन्होंने पार्टी की कोर कमेटी की बैठक भी की। वहीं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी पूरी तरह से चुनावी तैयारी में जुट गईं हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अपने पश्चिम बंगाल प्रवास के दौरान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से बात की। दिलीप घोष फिर से पूरी तरह से एक्टिव हो गए हैं और पार्टी के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभालने वाले हैं। दिलीप घोष 6 जनवरी को एक रैली कर सकते हैं। वहीं उसके बाद 16 जनवरी को भी एक जनसभा को संबोधित कर सकते हैं।

गौरतलब है कि दिलीप घोष 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। हालांकि उस चुनाव में हार के बाद वह पहले की तरह एक्टिव नहीं दिखे। अब दिलीप घोष 6 जनवरी को बैरकपुर में एक रैली कर सकते हैं। एक हफ्ते बाद वह सामिक भट्टाचार्य के साथ दुर्गापुर में एक और रैली कर सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि दिलीप घोष 13 जनवरी को उत्तरी बंगाल में बीजेपी के गढ़ कूचबिहार में भी एक रैली करने वाले हैं।

इन सबके बीच पश्चिम बंगाल में 15 साल से शासन कर रही तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थापना के 28वें वर्ष और एक नये चुनावी चक्र में प्रवेश कर चुकी है।

ममता बनर्जी की पार्टी एक ओर अपनी वैचारिक स्थिति को नये सिरे से गढ़ रही है, तो दूसरी ओर वह बंगाली ‘अस्मिता’ को ‘बंगाली हिंदू पहचान’ की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ जोड़ रही है। इसका उद्देश्य यह है कि वह अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को असहज किये बिना हिंदू समर्थन को मजबूत कर सके। इसका एक और मकसद है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तुष्टीकरण के विमर्श का मुकाबला करना।

गौरतलब है कि कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को वाम मोर्चा के जमे-जमाये शासन को चुनौती देने के उद्देश्य से तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। वर्ष 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के इर्द-गिर्द जमीनी स्तर पर हुए व्यापक जन आंदोलन के दम पर टीएमसी सत्ता में आयी थी।

वर्ष 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव को अब महज 3 महीने बचे हैं। पार्टी एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सामना कर रही है, जहां अस्मिता की राजनीति अधिक तीखी हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति में भी यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। उन्होंने दक्षिण बंगाल के दीघा में 213 फुट ऊंचे जगन्नाथ मंदिर, कोलकाता में दुर्गा मंदिर और सांस्कृतिक परिसर (दुर्गा आंगन) और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर जैसी कई मंदिर परियोजनाओं के उद्घाटन या निर्माण की घोषणा की है।

ममता बनर्जी के आक्रमक रूख के समानांतर पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कमान संभाल ली है। अपने तीन दिवसीय दौरे में शाह ने भाजपा कार्यकर्ताओं को राज्य की 294 में से दो-तिहाई सीटें जीतने का बड़ा टारगेट दिया है। इसके लिए उन्होंने घुसपैठ से लेकर सोनार बांग्ला तक 5 ऐसे मंत्र दिए हैं, जो बीजेपी की चुनावी रणनीति के प्रमुख स्तंभ होंगे।

भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह ने बंगाल चुनाव के लिए जिस प्रचार अभियान की नींव रखी है, वह पांच मुख्य मुद्दों पर टिकी है। अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब वे वोटरों के बीच जाएं, तो इन्हीं पांच बातों को प्रमुखता से रखें।
1. घुसपैठियों की समस्या
2. वंदे मातरम
3. जय श्री राम
4. सोनार बांग्ला का निर्माण
5. बंगाल की विरासत को दोबारा स्थापित करना
ये वो शब्द और मुद्दे हैं जो आने वाले दिनों में हर भाजपा कार्यकर्ता की जुबान पर होंगे और हर चुनावी जनसभा में गूंजेंगे। गृह मंत्री का मानना है कि यही वो भावनात्मक और जमीनी मुद्दे हैं जो बंगाल की जनता को बीजेपी के पक्ष में एकजुट करेंगे।

इन सब ग्राउंड की कहानियों के बीच पश्चिम बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सबको चौंका दिया।
प्रधानमंत्री संग मुलाकात में अधीर रंजन चौधरी ने विभिन्न राज्यों, विशेषकर बीजेपी शासित राज्यों में काम कर रहे बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ कथित हिंसा और हमलों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। अधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री से इन घटनाओं का संज्ञान लेने और मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। अधीर रंजन चौधरी की यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। इस वजह से इस बैठक ने राजनीतिक हलकों में अटकलों को भी जन्म दे दिया है।

अधीर चौधरी मुर्शिदाबाद जिले से आने वाले एक प्रभावशाली जमीनी नेता माने जाते हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कट्टर आलोचक रहे हैं। इस मामले में उनका रुख बीजेपी से मेल खाता नजर आता है, जिससे राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं। अधीर चौधरी ने लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के लिए मजबूत आधार बनाए रखा। उन्होंने बेरहामपुर लोकसभा सीट से लगातार पांच बार जीत दर्ज की थी, जबकि राज्य में कांग्रेस संगठन धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया। हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार यूसुफ पठान के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद अधीर चौधरी की पहचान एक मजबूत जमीनी नेता के रूप में बनी हुई है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति आने वाले दिनों में करवटें लेती दिखेगी। इन सबके बीच तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ अपनी रणनीति को धार देते हुए नया चुनावी नारा गढ़ दिया है!

टीएमसी का नया नारा है- "जोतोई कोरो हमला, आबार जीतबे बांग्ला'

(जितने भी हमले कर लो, बंगाल फिर जीतेगा)

अब देखना है कि इसके जवाब में अमित शाह कौन सा नारा अपनी पार्टी को देते हैं।



बिहार में पंचायत चुनाव पर भाजपा की नजर !



केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नव नियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन हाल ही में अपने गृह राज्य बिहार के दौरे पर आए थे। अपने बिहार दौरे में उनके एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

नितिन नबीन ने बिहार में कहा कि “पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर कार्यकर्ता को सक्रिय रहना होगा।

उनके इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी अब जमीनी स्तर पर संगठन को और मजबूत करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही है। उनके बयान को आगामी पंचायत चुनावों की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा स्थानीय निकाय चुनावों को इस बार बेहद गंभीरता से ले रही है।

अपने दौरे के दौरान नितिन नबीन ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर कार्यकर्ता को सक्रिय रहना होगा। संगठन की असली ताकत बूथ और पंचायत स्तर से ही निकलती है।” इस संदेश को संगठन की रीढ़ को और मजबूत करने की स्पष्ट अपील के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में उनके बयान को इस संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है कि भाजपा बिहार में पंचायत चुनावों को पार्टी स्तर पर लड़ने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रही है।

“पंचायत से पार्लियामेंट तक” का नारा यह दर्शाता है कि पार्टी स्थानीय निकाय चुनावों को संगठन विस्तार और राजनीतिक मजबूती का अहम मंच मान रही है।

बिहार विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद भाजपा राज्य में अपना विजय रथ और आगे दौड़ाने की तैयारी करने लगी है। भाजपा अब बिहार में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव में भी जीत दोहराने की तैयारी कर रही है। नितिन नबीन ने पटना में मंगलवार को पार्टी के कार्यकर्ताओं को पंचायत चुनाव के लिए कमर कस लेने की हिदायत दी। पटना में एक सभा में उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं की तारीफ की।

नितिन नबीन ने भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा, आप बस अपने काम पर विश्वास कीजिए। जिस तरह बिहार से हमें मैंडेट मिला है, तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। ये जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का समय है। इसलिए हम सभी को मेहनत करनी पड़ेगी। पंचायत से पार्लियामेंट तक हमें परचम लहराना है। इसलिए बिहार के पंचायत चुनाव के लिए हमें अभी से ही लग जाना है और बिहार को विकसित बिहार बनाना है।


भाजपा का तर्क है कि उनका संगठन बिहार में बूथ स्तर पर काफी मजबूत हो चुका है। परिणाम बिहार विधानसभा चुनाव में सबने देख ही लिया है। इसलिए अब पंचायत चुनाव लक्ष्य है। बिहार में दिसंबर 2026 से पहले पंचायत चुनाव संपन्न करा लिए जाएंगे। बुधवार को पटना में जब राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने बूथ लेवल एजेंटों के साथ बैठक की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि हमलोगों को बिहार पंचायत चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार होना है। इसके लिए अभी से ही हमलोगों को हर बूथ पर काम करना होगा।

भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार की जनता ने भाजपा को एक बहुत बड़ा मैंडेट दिया है। इस वजह से उस जनता के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। इसलिए सरकार की उपलब्धियों को नीचे धरातल तक ले जाने के साथ-साथ जनता से जुड़कर हमें काम करना पड़ेगा। जनता ने जिस अपेक्षा से हमें वोट दिया है हमें उनके अपेक्षाओं पर खरा उतरने का समय आ गया है। हमें सरकार की योजनाओं को जनता तक ले जाना होगा और फिर उसे धरातल पर उनके अनुसार काम करना होगा। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह का सपना है कि पंचायत से पार्लियामेंट तक भगवा लहराए। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि नरेंद्र मोदी का सपना है कि एक लाख से अधिक युवा नेतृत्व निकाला जाय। और यह तभी होगा जब एक लाख से अधिक हमारे युवा नेतृत्व पंचायत से पार्लियामेंट तक आगे बढ़ेंगे।

नितिन नबीन ने कहा कि आने वाले समय में बिहार पंचायत में और नगर निकाय में चुनाव होने हैं, इसलिए मैं सभी कार्यकर्ताओं को आगाह करता हूं कि अगर नेतृत्वकर्ता बनना है तो अपने-अपने क्षेत्र में जाइए और जनता से जुड़कर काम कीजिए। जनता की समस्याओं में खरा उतरिये। नितिन नबीन ने कहा कि जब आप ऐसा कीजिएगा तभी आप निश्चित रूप से आप में से कोई वार्ड काउंसलर बनेगा, कोई मुखिया बनेगा और कोई भविष्य का नेतृत्वकर्ता बनेगा। पंचायत निकाय चुनाव में हम सबको अभी से ही लग जाना होगा, तभी निश्चित रूप से यह चुनाव बदलते हुए बिहार की एक नई तस्वीर प्रदान करेगा। नितिन नबीन ने कहा कि अगर पंचायत और निकाय स्तर पर अगर अच्छा नेतृत्व खड़ा कर देंगे तो 2047 का बिहार भी विकसित बिहार बनकर उभरेगा।

गौरतलब है कि बिहार में 534 प्रखंड और 8387 पंचायत में भाजपा का संगठन फैला हुआ है। सबसे पहले कार्यकर्ता बूथ स्तर पर जुड़ते हैं। अब इसे शक्ति केंद्र कहा जाता है। इस शक्ति केंद्र में 12 से अधिक सदस्य होते हैं। इन सदस्यों में युवा, किसान, महिलाएं और समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल होते हैं। इसका एक प्रमुख होता है। इसके ऊपर मंडल होता है। 12 से 15 शक्ति केंद्रों को मिलाकार मंडल बनता है। यह प्रखंड स्तर पर रहता है। हर मंडल में एक कमेटी रहती है। इसमें 30 से अधिक सदस्य रहते हैं। इसमें कम से 10 महिलाएं भी रहती हैं। साथ ही सदस्यों में समाज के हर वर्ग के लोग रहें, इसका भी ख्याल रखा जाता है। मंडल समितियों के सदस्य ही जिला स्तर पर प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इससे ही जिला स्तर पर कमेटी बनती है। यानी हर एक स्तर पर एक अलग समिति होती है।

भारतीय जनता पार्टी बिहार में अपने इसी ग्राउंड नेटवर्क को पंचायत चुनाव से जोड़कर देख रही ही। पार्टी सूत्रों के अनुसार पंचायत चुनाव यदि पार्टी आधारित होती है तो भाजपा पूरे राज्य में ग्राम पंचायत से लेकर शहरी निकाय में कमल खिलाने के मूड में है। अब देखना यह है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव पार्टी आधारित होती है या नहीं।



बिहार में पंचायत चुनाव पर भाजपा की नजर !
गिरीन्द्र नाथ झा

केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नव नियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन हाल ही में अपने गृह राज्य बिहार के दौरे पर आए थे। अपने बिहार दौरे में उनके एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

नितिन नबीन ने बिहार में कहा कि “पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर कार्यकर्ता को सक्रिय रहना होगा।

उनके इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी अब जमीनी स्तर पर संगठन को और मजबूत करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही है। उनके बयान को आगामी पंचायत चुनावों की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा स्थानीय निकाय चुनावों को इस बार बेहद गंभीरता से ले रही है।

अपने दौरे के दौरान नितिन नबीन ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर कार्यकर्ता को सक्रिय रहना होगा। संगठन की असली ताकत बूथ और पंचायत स्तर से ही निकलती है।” इस संदेश को संगठन की रीढ़ को और मजबूत करने की स्पष्ट अपील के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में उनके बयान को इस संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है कि भाजपा बिहार में पंचायत चुनावों को पार्टी स्तर पर लड़ने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रही है।

“पंचायत से पार्लियामेंट तक” का नारा यह दर्शाता है कि पार्टी स्थानीय निकाय चुनावों को संगठन विस्तार और राजनीतिक मजबूती का अहम मंच मान रही है।

बिहार विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद भाजपा राज्य में अपना विजय रथ और आगे दौड़ाने की तैयारी करने लगी है। भाजपा अब बिहार में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव में भी जीत दोहराने की तैयारी कर रही है। नितिन नबीन ने पटना में मंगलवार को पार्टी के कार्यकर्ताओं को पंचायत चुनाव के लिए कमर कस लेने की हिदायत दी। पटना में एक सभा में उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं की तारीफ की।

नितिन नबीन ने भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा, आप बस अपने काम पर विश्वास कीजिए। जिस तरह बिहार से हमें मैंडेट मिला है, तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। ये जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का समय है। इसलिए हम सभी को मेहनत करनी पड़ेगी। पंचायत से पार्लियामेंट तक हमें परचम लहराना है। इसलिए बिहार के पंचायत चुनाव के लिए हमें अभी से ही लग जाना है और बिहार को विकसित बिहार बनाना है।


भाजपा का तर्क है कि उनका संगठन बिहार में बूथ स्तर पर काफी मजबूत हो चुका है। परिणाम बिहार विधानसभा चुनाव में सबने देख ही लिया है। इसलिए अब पंचायत चुनाव लक्ष्य है। बिहार में दिसंबर 2026 से पहले पंचायत चुनाव संपन्न करा लिए जाएंगे। बुधवार को पटना में जब राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने बूथ लेवल एजेंटों के साथ बैठक की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि हमलोगों को बिहार पंचायत चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार होना है। इसके लिए अभी से ही हमलोगों को हर बूथ पर काम करना होगा।

भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार की जनता ने भाजपा को एक बहुत बड़ा मैंडेट दिया है। इस वजह से उस जनता के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। इसलिए सरकार की उपलब्धियों को नीचे धरातल तक ले जाने के साथ-साथ जनता से जुड़कर हमें काम करना पड़ेगा। जनता ने जिस अपेक्षा से हमें वोट दिया है हमें उनके अपेक्षाओं पर खरा उतरने का समय आ गया है। हमें सरकार की योजनाओं को जनता तक ले जाना होगा और फिर उसे धरातल पर उनके अनुसार काम करना होगा। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह का सपना है कि पंचायत से पार्लियामेंट तक भगवा लहराए। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि नरेंद्र मोदी का सपना है कि एक लाख से अधिक युवा नेतृत्व निकाला जाय। और यह तभी होगा जब एक लाख से अधिक हमारे युवा नेतृत्व पंचायत से पार्लियामेंट तक आगे बढ़ेंगे।

नितिन नबीन ने कहा कि आने वाले समय में बिहार पंचायत में और नगर निकाय में चुनाव होने हैं, इसलिए मैं सभी कार्यकर्ताओं को आगाह करता हूं कि अगर नेतृत्वकर्ता बनना है तो अपने-अपने क्षेत्र में जाइए और जनता से जुड़कर काम कीजिए। जनता की समस्याओं में खरा उतरिये। नितिन नबीन ने कहा कि जब आप ऐसा कीजिएगा तभी आप निश्चित रूप से आप में से कोई वार्ड काउंसलर बनेगा, कोई मुखिया बनेगा और कोई भविष्य का नेतृत्वकर्ता बनेगा। पंचायत निकाय चुनाव में हम सबको अभी से ही लग जाना होगा, तभी निश्चित रूप से यह चुनाव बदलते हुए बिहार की एक नई तस्वीर प्रदान करेगा। नितिन नबीन ने कहा कि अगर पंचायत और निकाय स्तर पर अगर अच्छा नेतृत्व खड़ा कर देंगे तो 2047 का बिहार भी विकसित बिहार बनकर उभरेगा।

गौरतलब है कि बिहार में 534 प्रखंड और 8387 पंचायत में भाजपा का संगठन फैला हुआ है। सबसे पहले कार्यकर्ता बूथ स्तर पर जुड़ते हैं। अब इसे शक्ति केंद्र कहा जाता है। इस शक्ति केंद्र में 12 से अधिक सदस्य होते हैं। इन सदस्यों में युवा, किसान, महिलाएं और समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल होते हैं। इसका एक प्रमुख होता है। इसके ऊपर मंडल होता है। 12 से 15 शक्ति केंद्रों को मिलाकार मंडल बनता है। यह प्रखंड स्तर पर रहता है। हर मंडल में एक कमेटी रहती है। इसमें 30 से अधिक सदस्य रहते हैं। इसमें कम से 10 महिलाएं भी रहती हैं। साथ ही सदस्यों में समाज के हर वर्ग के लोग रहें, इसका भी ख्याल रखा जाता है। मंडल समितियों के सदस्य ही जिला स्तर पर प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इससे ही जिला स्तर पर कमेटी बनती है। यानी हर एक स्तर पर एक अलग समिति होती है।

भारतीय जनता पार्टी बिहार में अपने इसी ग्राउंड नेटवर्क को पंचायत चुनाव से जोड़कर देख रही ही। पार्टी सूत्रों के अनुसार पंचायत चुनाव यदि पार्टी आधारित होती है तो भाजपा पूरे राज्य में ग्राम पंचायत से लेकर शहरी निकाय में कमल खिलाने के मूड में है। अब देखना यह है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव पार्टी आधारित होती है या नहीं।

सैन्य कैंप को लेकर क्यों सुर्खियों मे हैं किशनगंज !




बिहार के किशनगंज जिला में प्रस्तावित सैनिक कैंप इन दिनों सबसे अधिक सुर्खियों में है। दरअसल किशनगंज जिला के कोचाधामन और बहादुरगंज में सैनिक कैंप के लिए जमीन अधिग्रहण का विरोध होने लगा है। विरोध अब पटना से दिल्ली तक पहुंच गया है। किशनगंज जिले के कोचाधामन अंचल के सतभीट्टा और कन्हैयाबाड़ी मौजा तथा बहादुरगंज अंचल के शकोर और नटवापाड़ा मौजा में भारतीय सेना के सैनिक स्टेशन निर्माण के लिए करीब 250 एकड़ जमीन चिन्हित की गई है।
सरकार के इस योजना का उद्देश्य सीमावर्ती इलाके में सुरक्षा मजबूती और सैन्य ढांचा विकसित करना है। लेकिन स्थानीय स्तर पर इस प्रस्ताव को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। ग्रामीणों के साथ-साथ क्षेत्र के जनप्रतिनिधि भी जमीन अधिग्रहण के खिलाफ खुलकर सामने आ गए हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र में सैकड़ों परिवार वर्षों से रह रहे हैं। यहां ईदगाह, मस्जिद और कब्रिस्तान जैसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं, जिनका स्थानांतरण असंभव और भावनात्मक रूप से संवेदनशील मुद्दा है।

ग्रामीणों का आरोप है कि यदि इस जमीन को अधिग्रहण कर लिया गया, तो बड़ी संख्या में परिवार बेघर हो जाएंगे और उनकी आस्था से जुड़े स्थलों को भी खतरा उत्पन्न हो जाएगा।

लोकसभा में शून्य काल के दौरान कांग्रेस के सांसद मोहम्मद जावेद ने भी सरकार से सैन्य कैंप को किशनगंज में कहीं और दूसरी जमीन पर बनाने की मांग की है। उन्होंने कहा कि जो जमीन अभी लिया जा रहा है, वो किसानों की है और घनी आबादी वाला इलाका है। सांसद ने कहा कि सरकार कैंप को घनी आबादी से दूर बनाए ताकि किसी को दिक्कत ना हो।

पटना में भी इसको लेकर औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम के पांचों विधायक काफी सक्रिय हैं और स्थानीय स्तर पर भी इस मु्ददे पर राजनीति गर्म कर रहे हैं। एआईएमआईएम विधायक तौसिफ आलम ने इस मुद्दे पर पिछले दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी मुलाकात की थी।

कांग्रेस ने कुछ दिन पहले अपने ऑफिशियल ट्विटर हैंडल से ट्विट किया था – “कोचाधामन, बहादुरगंज और किशनगंज में सैनिक कैंप बनाने के लिए जमीन अधिग्रहण हो रहा है।

इसके चलते गरीब किसानों से उनकी जमीन ली जा रही है, जहां घनी आबादी भी है।“

वहीं एआईएमआईएम के विधायक सरबर आलम और तौसीफ आलम ने किशनगंज के जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपकर अधिग्रहण का विरोध दर्ज कराया है। विधायकों का कहना है कि चिन्हित जमीन पर ईदगाह, मस्जिद, कब्रिस्तान के अलावा सैकड़ों परिवारों की घनी बस्तियां हैं। दोनों विधायकों ने कहा कि वे सेना का सम्मान करते हैं, लेकिन जिस जमीन को चिन्हित किया गया है, वह पूरी तरह आबादी और धार्मिक स्थलों से भरी है। ऐसे में जरूरी है कि सरकार किसी वैकल्पिक स्थान की तलाश करे। यदि यहां का जमीन का अधिग्रहण हुआ तो सैकड़ों परिवार बेघर हो जाएंगे। हमारी ईदगाह, मस्जिद और कब्रिस्तान खतरे में पड़ जाएगा।

उन्होंने जिला प्रशासन से मांग की है कि अधिग्रहण प्रक्रिया रोकते हुए नए सिरे से ऐसी जमीन चुनी जाए, जहां स्टेशन निर्माण में किसी प्रकार की सामाजिक या धार्मिक बाधा न उत्पन्न हो। विधायक और ग्रामीणों की अपील है कि सरकार विकास और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए न्यायपूर्ण समाधान निकाले।

गौरतलब है कि भारत ने एक बड़े रणनीतिक कदम के तहत बांग्लादेश के साथ लगने वाली अपनी पूर्वी सीमा पर तीन नए सैन्य अड्डे स्थापित किए हैं। इन फारवर्ड बेस पर राफेल, ब्रह्मोस के साथ अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम तैनात किए जा रहे हैं।

भारत ने अपनी पूर्वी सीमा पर अब तक की सबसे बड़ी सैन्य तैनाती शुरू कर दी है। सिलिगुड़ी कॉरिडोर, यानी 22 किलोमीटर चौड़ा वह क्षेत्र जिसे चिकन नेक कहते हैं, जिसके जरिए उत्तर-पूर्वी भारत के सात राज्य देश की मुख्य भूमि से जुड़े हैं, अब पूरी तरह अभेद्य किला बनने जा रहा है। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में तीन नए मिलिट्री स्टेशन स्थापित किए जा रहे हैं, जो नई दिल्ली की सैन्य रणनीति में मूलभूत बदलाव का संकेत देते हैं।

असम के धुबरी के पास लाचित बोरफुकन मिलिट्री स्टेशन स्थापित किया जा रहा है। वहीं बिहार के किशनगंज और पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में फॉरवर्ड बेस बनाए जा रहे हैं। चोपड़ा फारवर्ड बेस बांग्लादेश सीमा से कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

ये सिर्फ सैन्य अड्डे नहीं, रैपिड डिप्लॉयमेंट फोर्स, पैरा स्पेशल फोर्सेज, इंटेलिजेंस यूनिट और हाई-टेक सर्विलांस उपकरणों से लैस स्ट्रैटेजिक नोड हैं, जो किसी भी विपरीत परिस्थिति में 'सिलिगुड़ी कॉरिडोर' की सुरक्षा सनिश्चित करेंगे।

नए सैन्य स्टेशन पूरे सिलिगुड़ी कॉरिडोर को फुल सिक्योरिटी कवर देते हैं। चोपड़ा स्टेशन की लोकेशन ऐसी है कि यहां से बांग्लादेश के अंदर तक निगरानी की जा सकती है। भारत ने इस क्षेत्र में पहले ही राफेल फाइटर जेट्स, ब्रह्मोस मिसाइलें और S-400 एयर डिफेंस सिस्टम तैनात कर दिए हैं। यानी खतरे की किसी भी स्थिति में भारतीय सेना मिनटों में जवाब देने की क्षमता रखती है।

इन सबके बीच सिलीगुड़ी में बहु-स्तरीय सुरक्षा लागू की गई है। जमीनी निगरानी, एयर डिफेंस (एस-400), राफेल फाइटर जेट्स, ब्रह्मोस मिसाइलें, ड्रोन और सैटेलाइट मॉनिटरिंग से सुरक्षा मजबूत हो चुका है। बिश्नुपुर, किशनगंज और चोपड़ा में नई गैरिसन तैनात हैं।

गौरतलब है कि भारत ने अपने पूर्वी मोर्चे पर रक्षा ढांचे को तेज़ी से मजबूत करते हुए सिलीगुड़ी कॉरिडोर के आसपास तीन नई फॉरवर्ड सैन्य बेस बनाने की प्रक्रिया तेज की है। दरअसल यह वही संवेदनशील गलियारा है, जिसे “चिकन नेक” भी कहा जाता है और जो मात्र 22 किलोमीटर चौड़ा है। यह गलियारा देश के सात पूर्वोत्तर राज्यों को मेनलैंड भारत से जोड़ता है। अब इसी कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर वर्षों से रणनीतिक चिंता बनी हुई थी।

इन सब खबरों के बीच बांग्लादेश सिलीगुड़ी कॉरिडोर से सटे अपने लालमोनिरहाट एयरबेस को फिर से शुरू करने जा रहा है। ब्रिटिश काल में बना यह एयरबेस लंबे समय से वीरान पड़ा था। बांग्लादेश सेना प्रमुख जनरल वकार-उज-जमां ने 16 अक्तूबर को ही 1931 में बने इस पुराने एयरबेस का दौरा किया था। यहां लड़ाकू विमान रखने के लिए विशाल हैंगर बनवाया जा रहा है। एयरबेस शुरू करने के पीछे चीन का हाथ होने के आसार हैं। मोहम्मद यूनुस ने मार्च में चीन का दौरा किया था और बीजिंग में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की थी।

Friday, December 12, 2025

ममता बनर्जी के गढ़ पर भाजपा की नजर !

पश्चिम बंगाल के 294 सीट के लिए अगले साल विधानसभा चुनाव होने जा रहा है। यह चुनाव राजनीतिक लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। यह चुनाव बंगाल के साथ में देश की राजनीति को आकार देगा।

आगामी बंगाल चुनाव को जीतकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राज्य में चौथी बार सत्ता पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रही हैं। दूसरी तरफ बीजेपी सालों से मेहनत करके बंगाल में अपने पक्ष में सियासी माहौल बनाने की कोशिश में जुटी है। भाजपा इस बार ममता दीदी के गढ़ में कमल खिलाने के लिए जी जान से जुट गई है।

भारतीय जनता पार्टी राज्य में हर उस मुद्दे को हवा दे रही है, जो उसके लिए विधानसभा चुनाव में फायदेमंद साबित हो सकते हैं। ऐसे में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी दलों के लिए आगामी चुनाव निर्णायक जंग के तौर पर देखा जा रहा है।

उधर, ममता बनर्जी ने बंगाल चुनाव 2026 से पहले केंद्र पर जमकर हमला बोलना शुरू कर दिया है।
ममता ने राज्य में 1.5 करोड़ मतदाताओं के नाम काटने के आरोप लगाये हैं। उन्होंने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह पर हमला तेज करते हुए उन्हें ‘खतरनाक’ करार दिया। आरोप लगाया कि केंद्र सरकार तथा निर्वाचन आयोग मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का इस्तेमाल 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल के लाखों योग्य मतदाताओं के नाम गैरकानूनी तरीके से हटाने के लिए कर रहे हैं।

सीएम ममता के कदमों से यह तय है कि टीएमसी चुनाव में अकेले उतरेगी, जबकि भाजपा, वाम दल और कांग्रेस नए गठबंधनों और रणनीतियों पर काम कर रही हैं। भाजपा ने राज्य में अभी से माहौल बनाना शुरू कर दिया है। पार्टी ने करीब-करीब तस्वीर भी साफ कर दी है कि राज्य में वो मुद्दा कौन सा होगा, जिसपर भाजपा चुनाव लड़ेगी।

पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होना है। यहां 27 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। ऐसे में मुस्लिम वोटरों पर सबकी निगाह है। तृणमूल पार्टी लगातार मुसलमानों को अपने पाले में करने में जुटी हुई हैं, लेकिन बीते कुछ समय से सीएम ममता बनर्जी ने कुछ फैसले ऐसे लिए हैं, जो मुस्लिम समुदाय को असहज कर रहे हैं। इसके साथ ही, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी, आईएसएफ और अब तृणमूल से निलंबित किए जा चुके हुमांयू कबीर भी इस वोट बैंक पर नजर टिकाए हुए हैं।

पूरे राज्य में 30% मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। लोकसभा की 42 में से 10 सीटों और विधानसभा की 294 में से करीब 80 सीटों पर मुस्लिम आबादी 45% से अधिक है। पिछले कुछ चुनावों से मुस्लिम वोट तृणमूल के पक्ष में रहा है। भाजपा ने आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति कर ध्रुवीकरण करने की कोशिश की है। 2019 के आम चुनाव में उसे कुछ हद तक सफलता जरूर मिली, लेकिन उसके बाद हुए विधानसभा चुनाव और फिर 2024 के आम चुनाव में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा।

तृणमूल कांग्रेस से निकाले जा चुके विधायक हुमांयू कबीर ने हाल ही में मुस्लिम बहुल जिले मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद की नींव रखी। इस दौरान लाखों की संख्या में मुस्लिम समुदाय के लोग इकट्ठा हुए। इसके बाद हुमांयू कबीर ने मीडिया से कहा कि हम अगले चंद दिनों में नई पार्टी का ऐलान करने वाले हैं। कई बड़ी पार्टियों के नेता हमारे संपर्क में हैं। हम राज्य के मुसलमानों की आवाज बनने की कोशिश करेंगे। राज्य के अल्पसंख्यक समुदाय के हितों की रक्षा करने में सीएम ममता बनर्जी असफल रही हैं। उन्होंने कहा कि हम आगामी चुनाव में 135 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। हुमांयू कबीर ने 90 सीटों पर जीत का दावा किया।

टीएमसी के भीतर भी मुस्लिम वोट बैंक खिसने का डर सता रहा है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि ओबीसी आरक्षण को लेकर प्रदेश के मुसलमानों में तृणमूल के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा है। अल्पसंख्यक वर्ग के भीतर यह धारणा भी बन रही है कि तृणमूल सरकार ने अपने एंटी वक्फ कानून के रुख से पीछे हटकर अपनी हार मान ली है।

एसआईआर के मुद्दे को लेकर भी पश्चिम बंगाल में राजनीति उबाल मार रही है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस बीच एक भड़काऊ भाषण दिया है। ये बंगाल है बिहार नहीं की चेतावनी देने के बाद ममता बनर्जी ने अब राज्य की महिलाओं से कहा कि अगर वोटर लिस्ट की समीक्षा के दौरान उनके नाम हटा दिए जाते हैं, तो वे किचन के औजारों के साथ तैयार रहें। ममता बनर्जी ने कहा कि आप एसआईआर के नाम पर माताओं और बहनों के अधिकार छीन लेंगे? वे चुनाव के दौरान दिल्ली से पुलिस लाएंगे और माताओं और बहनों को डराएंगे। माताओं और बहनों, अगर आपके नाम काट दिए जाते हैं, तो आपके पास औजार हैं, है ना? वे औजार जिनका इस्तेमाल आप खाना बनाते समय करती हैं। आप में ताकत है, है ना? अगर आपके नाम काटे जाते हैं, तो आप इसे बर्दाश्त नहीं करेंगी, है ना? महिलाएं आगे लड़ेंगी, और पुरुष उनके पीछे रहेंगे।

नदिया जिले के कृष्णानगर में एक रैली को संबोधित करते हुए सुश्री बनर्जी ने आरोप लगाया कि शाह मतदाता सूचियों से ‘डेढ़ करोड़ नाम’ हटाने की कोशिशों को सीधे तौर पर निर्देशित कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी कि अगर मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान एक भी पात्र मतदाता का नाम हटाया गया, तो वह अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ जायेंगी।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) के कार्यालय ने इसे लेकर गुरुवार को बंगाल प्रशासन व विभिन्न एजेंसियों के साथ जरूरी बैठक की।

बैठक में पुलिस, राज्य सरकार के परिवहन, वन व सहकारिता विभाग, आयकर, आबकारी व सीमा शुल्क विभाग, रिजर्व बैंक, राजस्व खुफिया निदेशालय, भारतीय तटरक्षक बल, सशस्त्र सीमा बल, रेलवे सुरक्षा बल, सीआइएसफ, डाक विभाग, सीमा सुरक्षा बल इत्यादि के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।

सीईओ कार्यालय के सूत्रों ने बताया कि बैठक में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर अग्रिम चर्चा हुई।


Friday, December 05, 2025

ममता के बंगाल में क्या है भाजपा का प्लान!

नया साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव लेकर आ रहा है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा की कुल सीटें 294 है। यहां बहुमत का आंकड़ा 148 है। राज्य में इस समय तृणमूल कांग्रेस की सरकार है, जबकि भारतीय जनता पार्टी मुख्य विपक्षी दल है।
पश्चिम बंगाल में 2026 के मार्च-अप्रैल में विधानसभा चुनाव होना है। भारतीय जनता पार्टी अभी से अपनी रणनीति बनाने में जुट गई है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसदों से संसद भवन में मुलाकात की थी। इस मुलाकात में मोदी ने पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसदों से राज्य में कड़ी मेहनत करने को कहा था।

दरअसल बिहार के बाद भाजपा का अब लक्ष्य बंगाल है, जहां पार्टी आज तक सरकार नहीं बना पाई है।
 
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में कई राज्यों में कमल खिल चुका है लेकिन पश्चिम बंगाल में अबतक कमल नहीं खिला है। वैसे बीजेपी बंगाल में कमल खिलाने की कोशिश में लंबे समय से लगी है। बंगाल फतह करने का बीजेपी का सपना अभी तक अधूरा है।

पश्चिम बंगाल में फतह हासिल करना भाजपा की दिली तमन्ना है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया था। लेकिन, उसके बाद के दो चुनावों 2022 के विधानसभा और फिर 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी अपने उस प्रदर्शन को नहीं दोहरा पाई।

तमाम कोशिश के बाद भी वह एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पा रही है। कहा जा रहा है कि भाजपा पश्चिम बंगाल में अपनी चुनावी रणनीति बदल रही है। वह अब चुनाव को पूरी तरह से हिंदू राष्ट्रवाद के मसले पर केंद्रित नहीं करना चाहती है क्योंकि राज्य में करीब 30 फीसदी मुस्लिम आबादी है। इसके साथ पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य है जहां बिहार-यूपी की तरह जाति बहुत अहम मुद्दा नहीं है।

वैसे यह सच है कि बिहार चुनाव में जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी का आत्मविश्वास मज़बूत हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बंगाल के बीजेपी सांसदों के साथ बैठक में टीएमसी की नाकामियों पर फोकस करने की सलाह दी थी। ऐसे में बंगाल में बीजेपी के सांसदों और विधायकों ने कमर कस ली है और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी चुनाव अभियान के लिए तैयारियों को बढ़ा दिया है।

बंगाल में चुनाव जीतने के लिए बीजेपी के 'बंगाल मिशन' के तहत पार्टी पूरे महीने राज्य में 13,000 रैलियाँ करेगी, जो 5 दिसंबर से 5 जनवरी तक चलेंगी। ये रैलियाँ ग्रामीण और शहरी इलाकों में आयोजित होंगी। बीजेपी ममता और पार्टी के सदस्यों पर व्यक्तिगत हमले करने के बजाय भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और वंशवाद जैसे मुद्दों पर टीएमसी को निशाना बनाएगी।

इसके अलावा बीजेपी स्थानीय मुद्दों जैसे बेरोजगारी, प्रवासी मजदूरों की समस्या और बांग्लादेश के घुसपैठियों के मुद्दे पर भी टीएमसी को घेरेगी। इसके लिए पार्टी ने राज्य के सभी बूथों पर संगठनात्मक सक्रियता बढ़ाने का फैसला लिया है।

बंगाल चुनाव में बीजेपी को जीत दिलाने के लिए पीएम मोदी भी राज्य में रैलियाँ कर सकते हैं। सूत्रों के अनुसार चुनाव अभियान के तहत पीएम मोदी राज्य में 7 चुनावी रैलियाँ कर सकते हैं।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसी क्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 दिसंबर को बंगाल का दौरा करेंगे। वह नादिया जिले में जनसभा को संबोधित करेंगे। सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान पीएम मोदी बंगाल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ बैठक भी करेंगे। उसमें संगठन की तैयारियों, चुनावी रणनीति, प्रमुख मुद्दों और अभियान की दिशा पर मंथन होगा। पार्टी राज्यभर में व्यापक जनसंपर्क की तैयारी कर रही और जनवरी में 4 से 6 परिवर्तन यात्राएं शुरू करने की योजना है।

इन यात्राओं का मकसद जिलों में जनता से जुड़ना, संगठन को मजबूत करना और तृणमूल सरकार से जुड़े मुद्दों को उजागर करना है। प्रधानमंत्री के भी इनमें से एक बड़ी परिवर्तन यात्रा को संबोधित करने की संभावना है, जिससे चुनावी माहौल और गरमाएगा।

वहीं, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी जनवरी से बंगाल का दौरा शुरू कर सकते हैं। वह बूथ स्तर पर जमीनी हालात का जायजा लेंगे, संगठन को मजबूत करने पर ध्यान और पार्टी की रणनीति को धार देंगे। भाजपा आगामी चुनावों में बिगड़ती कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, महिला सुरक्षा, घुसपैठ और स्थानीय शासन संबंधी मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करेगी।

इन सबके बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ा रही है। क्योंकि हाल ही में कई राज्यों में हुए चुनावों में प्रदेश सरकार की योजनाओं के बदौलत ही पार्टियां सत्ता में बरकरार रही है। राज्य सरकार श्रमश्री योजना, स्वास्थ्य साथी योजना, ग्रामीण आवास सुरक्षा योजना (बांग्लार बारी), महिलाओं और छात्रों के लिए योजनाएं, खाद्य साथी योजना जैसी लोक कल्याणकारी योजनाओं को तेजी से घर – घर तक पहुंचाने में जुट गई है।

अगले साल बंगाल में होने वाला विधानसभा चुनाव टीएमसी और बीजेपी दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। सवाल है कि ममता बनर्जी चौथी बार मुख्यमंत्री बन पाएंगी या बीजेपी राज्य में अपनी सरकार बनाने में सफल हो पाएगी। बंगाल के चुनाव को लेकर राज्य की राजनीति जोर पकड़ती जा रही है। अब देखना इस बार बंगाल का सियासी ऊंट किस करवट बैठता है।

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