आज मुन्नवर राना को पढ़ने का बहुत मन किया तो नेट को खंगाला। कविता कोष पर वह मिले। उन्हें पढ़ते वक्त पाठक एक अंश में खुद को भी पढ़ता है, ऐसा मेरा मानना है। बतौर पाठक, आप भी पढिए.
शुक्रिया
गिरीन्द्र
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1
कहीं भी छोड़ के अपनी ज़मीं नहीं जाते
हमें बुलाती है दुनिया हमीं नहीं जाते ।
मुहाजरीन से अच्छे तो ये परिन्दे हैं
शिकार होते हैं लेकिन कहीं नहीं जाते ।।
2
उम्र एक तल्ख़ हक़ीकत है मुनव्वर फिर भी
जितना तुम बदले हो उतना नहीं बदला जाता ।
सबके कहने से इरादा नहीं बदला जाता,
हर सहेली से दुपट्टा नहीं बदला जाता ।।
3
मियाँ ! मैं शेर हूँ, शेरों की गुर्राहट नहीं जाती,
मैं लहज़ा नर्म भी कर लूँ तो झुँझलाहट नहीं जाती ।
किसी दिन बेख़याली में कहीं सच बोल बैठा था,
मैं कोशिश कर चुका हूँ मुँह की कड़वाहट नहीं जाती ।।
4
हमारी ज़िन्दगी का इस तरह हर साल कटता है
कभी गाड़ी पलटती है, कभी तिरपाल कटता है ।
दिखाते हैं पड़ौसी मुल्क़ आँखें, तो दिखाने दो
कभी बच्चों के बोसे से भी माँ का गाल कटता है ।।
Nov 7, 2009
Nov 6, 2009
तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे.... प्रभाष जी आपने क्रीज़ क्यों छोड़ दी?
प्रभाष जोशी नहीं रहे, एक बार सुनकर विश्नास नहीं हुआ..दुखी हूं। बस आंखों में सफेद धोती-कुर्ता पहने प्रभाष जोशी याद आ रहे हैं। सुबह से ही दोस्तों से बात हो रही है। इसी बीच इंदौर में दैनिक भाष्कर में कार्यरत दोस्त संदीप कुमार पांडेय ने कहा-तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे..। संदीप ने शब्दों के जरिए प्रभाष जोशी को याद किया है, पढिए-
शुक्रिया
गिरीन्द्र
तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे। यह स्तब्ध कर देने वाली खबर आज तड़के एक मित्र से फोन पर मिली। नींद अभी टूटी नहीं थी लेकिन इस खबर से चेतना ऐसी जागी मानो हजारों हजार कांच की बारीक किरचें एक साथ दिमाग में पैबस्त हो गई हों।
प्रभाष जी बड़े पत्रकार थे उन्होंने जनसत्ता जैसा अखबार हमें दिया जिससे पढ़ने के संस्कार मिले। मैं उनकी पेशेवर खूबियों पर नहीं जाना चाहता। मुझे बस उन्हें पढ़ना अच्छा लगता था।
उनकी कलम की ईमानदारी। इस कठिन समय में सच को लेकर जिद और वो सारी बातें जो मुझे किसी और में नहीं दिखती थीं, वे मुझे उनकी ओर खींचती थीं।कुछ एक अंतरालों को छोड़ दिया जाए कमोबेश 20 वर्षों तक कागद कारे पढ़ता रहा उसी ललक के साथ की आज प्रभाष जी ने क्या लिखा होगा।
क्रिकेट और टेनिस पर लिखे उनके आलेख। खासकर सचिन के खेल पर उसी की तरह बेमिसाल कलम का ही जादू था कि सचिन की उम्दा पारियों के बाद हम ये सोचकर सोते थे कि कल प्रभाष जी क्या लिखेंगे! खबरों के मुताबिक कल रात ११.३० के आस पास उनका निधन हुआ जबकि भारत -ऑस्ट्रेलिया मैच करीब ११ बजे ख़त्म हुआ था।लगता है कहीं सचिन की कल रात की बेमिसाल पारी की खुशी और टीम की नाजुक हार का घालमेल तो उनके लिए जानलेवा नहीं बन गया। अगर ऐसा हुआ है तो तमाम रंज के बावजूद मुझे इस बात की खुशी ताउम्र रहेगी कि एक अद्भुत खेलप्रेमी अपने प्रिय खिलाड़ी को सर्वश्रेष्ठ खेलते देखकर गुजरा और एक शानदार खिलाडी ने अपने ऐसे चहेते को अनोखी भेंट दी मरने से पहले।
प्रभाष जी ने सती अथवा ब्राह्मणों को लेकर हाल के समय में जो भी बयान दिए। उन्हें संदर्भ से काट कर उनका पाठ करने वालों ने ब्लाॅग जगत में जिस भाषा में उनका विरोध किया वो बेहद शर्मनाक था। बात केवल विरोध की नहीं विरोध के स्तर की थी। प्रभाष जी का विरोध करते हुए बातचीत का भाषा एक बेहतर स्तर हो सकता था लेकिन ब्लाॅगियों ने तो उन्हें गली के छोकरे की तरह रगेद ही लिया। क्या अब भी उन्हें अपनी गलतियों का कुछ एहसास होगा।
खैर जो भी हो मेरे लिए तो आज से जनसत्ता पढने की एक बड़ी वजह कम हो गयी। मैं उनसे कभी मिला नही, उन्हें कभी देखा नही लेकिन उनका जाना बड़ी गहरी चोट दे गया.
शुक्रिया
गिरीन्द्र
तुमने सुना! प्रभाष जोशी नहीं रहे। यह स्तब्ध कर देने वाली खबर आज तड़के एक मित्र से फोन पर मिली। नींद अभी टूटी नहीं थी लेकिन इस खबर से चेतना ऐसी जागी मानो हजारों हजार कांच की बारीक किरचें एक साथ दिमाग में पैबस्त हो गई हों।
प्रभाष जी बड़े पत्रकार थे उन्होंने जनसत्ता जैसा अखबार हमें दिया जिससे पढ़ने के संस्कार मिले। मैं उनकी पेशेवर खूबियों पर नहीं जाना चाहता। मुझे बस उन्हें पढ़ना अच्छा लगता था।
उनकी कलम की ईमानदारी। इस कठिन समय में सच को लेकर जिद और वो सारी बातें जो मुझे किसी और में नहीं दिखती थीं, वे मुझे उनकी ओर खींचती थीं।कुछ एक अंतरालों को छोड़ दिया जाए कमोबेश 20 वर्षों तक कागद कारे पढ़ता रहा उसी ललक के साथ की आज प्रभाष जी ने क्या लिखा होगा।
क्रिकेट और टेनिस पर लिखे उनके आलेख। खासकर सचिन के खेल पर उसी की तरह बेमिसाल कलम का ही जादू था कि सचिन की उम्दा पारियों के बाद हम ये सोचकर सोते थे कि कल प्रभाष जी क्या लिखेंगे! खबरों के मुताबिक कल रात ११.३० के आस पास उनका निधन हुआ जबकि भारत -ऑस्ट्रेलिया मैच करीब ११ बजे ख़त्म हुआ था।लगता है कहीं सचिन की कल रात की बेमिसाल पारी की खुशी और टीम की नाजुक हार का घालमेल तो उनके लिए जानलेवा नहीं बन गया। अगर ऐसा हुआ है तो तमाम रंज के बावजूद मुझे इस बात की खुशी ताउम्र रहेगी कि एक अद्भुत खेलप्रेमी अपने प्रिय खिलाड़ी को सर्वश्रेष्ठ खेलते देखकर गुजरा और एक शानदार खिलाडी ने अपने ऐसे चहेते को अनोखी भेंट दी मरने से पहले।
प्रभाष जी ने सती अथवा ब्राह्मणों को लेकर हाल के समय में जो भी बयान दिए। उन्हें संदर्भ से काट कर उनका पाठ करने वालों ने ब्लाॅग जगत में जिस भाषा में उनका विरोध किया वो बेहद शर्मनाक था। बात केवल विरोध की नहीं विरोध के स्तर की थी। प्रभाष जी का विरोध करते हुए बातचीत का भाषा एक बेहतर स्तर हो सकता था लेकिन ब्लाॅगियों ने तो उन्हें गली के छोकरे की तरह रगेद ही लिया। क्या अब भी उन्हें अपनी गलतियों का कुछ एहसास होगा।
खैर जो भी हो मेरे लिए तो आज से जनसत्ता पढने की एक बड़ी वजह कम हो गयी। मैं उनसे कभी मिला नही, उन्हें कभी देखा नही लेकिन उनका जाना बड़ी गहरी चोट दे गया.
Oct 29, 2009
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ...
कबीर, जिन्हें पढ़ते वक्त खोने का अहसास होता है। आज जब कौन ठगवा नगरिया लूटल हो पढ़ रहा था, तब मुझे अपने गांव में निरगुण गाने वाले अनहद की याद आ गई। वह इसे जब सस्वर सुनाता है तो आंखे खुलती नहीं रहती है। वह खासकर कबीर की इस पंक्ति पर जोर देता है-चंदन काठ के बनल खटोला/ता पर दुलहिन सूतल हो। ...आज आप भी पढिए और मन ही मन गुनगुनाइए भी-
शुक्रिया
गिरीन्द्र
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।
चंदन काठ के बनल खटोला
ता पर दुलहिन सूतल हो।
उठो सखी री माँग संवारो
दुलहा मो से रूठल हो।
आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा
नैनन अंसुवा टूटल हो
चार जाने मिल खाट उठाइन
चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो
जग से नाता छूटल हो
शुक्रिया
गिरीन्द्र
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।
चंदन काठ के बनल खटोला
ता पर दुलहिन सूतल हो।
उठो सखी री माँग संवारो
दुलहा मो से रूठल हो।
आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा
नैनन अंसुवा टूटल हो
चार जाने मिल खाट उठाइन
चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो
जग से नाता छूटल हो
Oct 27, 2009
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में
इन दिनों कबीर को पढ़ रहा हूं। मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी ..पढ़ते वक्त उनसे नजदीकी बढ़ जाती है। कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और साखी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने कहा था- पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार। वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार। लेकिन अभी पढिए- मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में..
शुक्रिया
गिरीन्द्र
जो सुख पाऊँ राम भजन में
सो सुख नाहिं अमीरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
भला बुरा सब का सुनलीजै
कर गुजरान गरीबी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
आखिर यह तन छार मिलेगा
कहाँ फिरत मग़रूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
प्रेम नगर में रहनी हमारी
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
कहत कबीर सुनो भयी साधो
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
शुक्रिया
गिरीन्द्र
जो सुख पाऊँ राम भजन में
सो सुख नाहिं अमीरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
भला बुरा सब का सुनलीजै
कर गुजरान गरीबी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
आखिर यह तन छार मिलेगा
कहाँ फिरत मग़रूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
प्रेम नगर में रहनी हमारी
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
कहत कबीर सुनो भयी साधो
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
Oct 24, 2009
रैंप पर कैटवॉक करती भैंस...
क्या आपने कभी रैंप पर भैंस को कैटवॉक करते देखा है? शायद नहीं, लेकिन बिहार के मधेपुरा जिले में गुरुवार को कई लोगों ने रैंप पर मॉडल बनीं भैंस को कदम से कदम मिलाकर चलते देखा। अभी तक मुझे भी इसकी जानकारी नहीं थी लेकिन हमारे एक सहयोगी ने जब पटना से मेल किया तो जाकर विश्वास हुआ कि भैंस भी कैटवॉक कर सकती हैं।
मधेपुरा जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर साहुगढ़ गांव में गुरुवार को भैंसों के लिए विशेष रूप से एक फैशन शो का आयोजन किया गया था। शो में मॉडल बनी भैंसों ने रैंप पर सजधर कर अपने 'सौंदर्य' की नुमाइश की। कार्यक्रम के अंत में भैंसों को पुरस्कार भी दिया गया।
इस फैशन शो के आयोजनकर्ता प्रभात रंजन ने कहा , "शो में जया, माधुरी, राधा, शिल्पा सहित एक दर्जन भैंसों ने भाग लिया। इन भैंसों को शो में भाग लेने के पहले स्नान करवाया गया था और उन्हें लाल और पीले रंग के आकर्षक कपड़े भी पहनाए गए थे।"
रंजन ने बताया कि कोसी के इलाके में पशुपालकों को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के फैशन शो का आयोजन लगातार किया जाएगा। उन्होंने बताया, "राधा नाम की भैंस के आकर्षक पहनावे और उसकी शालीनता को देखते हुए उसे विजेता घोषित किया गया और प्रथम पुरस्कार के रूप में 501 रुपये का इनाम भी दिया गया। वहीं दूसरे स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 301 रुपये तथा तृतीय स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 101 रुपये का पुरस्कार दिया गया।"
पुरस्कार की राशि प्रतिभागी भैंसों के पालकों को दी गई। इस कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष कोसी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद इन क्षेत्रों के पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था, जिसके बाद अधिकांश लोगों ने यहां पशुपालन करना ही छोड़ दिया।
(यह जानकारी मिली- आईएएनएस के पटना संवाददाता मनोज पाठक से)
मधेपुरा जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर साहुगढ़ गांव में गुरुवार को भैंसों के लिए विशेष रूप से एक फैशन शो का आयोजन किया गया था। शो में मॉडल बनी भैंसों ने रैंप पर सजधर कर अपने 'सौंदर्य' की नुमाइश की। कार्यक्रम के अंत में भैंसों को पुरस्कार भी दिया गया।
इस फैशन शो के आयोजनकर्ता प्रभात रंजन ने कहा , "शो में जया, माधुरी, राधा, शिल्पा सहित एक दर्जन भैंसों ने भाग लिया। इन भैंसों को शो में भाग लेने के पहले स्नान करवाया गया था और उन्हें लाल और पीले रंग के आकर्षक कपड़े भी पहनाए गए थे।"
रंजन ने बताया कि कोसी के इलाके में पशुपालकों को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के फैशन शो का आयोजन लगातार किया जाएगा। उन्होंने बताया, "राधा नाम की भैंस के आकर्षक पहनावे और उसकी शालीनता को देखते हुए उसे विजेता घोषित किया गया और प्रथम पुरस्कार के रूप में 501 रुपये का इनाम भी दिया गया। वहीं दूसरे स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 301 रुपये तथा तृतीय स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 101 रुपये का पुरस्कार दिया गया।"
पुरस्कार की राशि प्रतिभागी भैंसों के पालकों को दी गई। इस कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष कोसी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद इन क्षेत्रों के पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था, जिसके बाद अधिकांश लोगों ने यहां पशुपालन करना ही छोड़ दिया।
(यह जानकारी मिली- आईएएनएस के पटना संवाददाता मनोज पाठक से)
Oct 17, 2009
दीवाली में आई याद
बरसों, कि याद नहीं कब था
दीवाली में अपने घर पे।
शायद 12 साल पहले घर पर
अपने लोगों के साथ दीप जलाया था।
कुछ-कुछ याद है लेकिन तंदरूस्त याद नहीं..
पटाखों की आवाज यहां भी सुनता हूं
लेकिन अपने शहर की मिरचया पटाखे की तरह नहीं।
बमों, फूलझड़ियों से मोहल्ले को गुलजार करते बच्चे
फिर सुबह में बचे पटाखों को सड़कों पर खोजते बच्चे..
कितना अच्छा लगता था, उन बच्चों को देखना
पटाखों की गंध सुबह तक हमारे साथ रहती थी।
वो हुका-हुकी..जो हम खेला करते थे
वो तो बस अब याद का हिस्सा है
संठी की बनी हुका-हुकी और उसे जलाने का आनंद
बस पुराने अनुभवों की तरह ही रह गया है।
दिल्ली की भी दीवाली कोई बुरी नहीं है
यह भी रास आता है पर लगता है
जैसे पैसों से ही यहां दीवाली होती है..
चमचम करते पैक में बंद गिफ्ट..
ये सब कहां होता है अपने शहर में...
इसी बीच अजय ब्रह्मात्मज चैट पर कहते हैं
"दीप पर्व में अक्षर रोशन करें"
दीवाली में अपने घर पे।
शायद 12 साल पहले घर पर
अपने लोगों के साथ दीप जलाया था।
कुछ-कुछ याद है लेकिन तंदरूस्त याद नहीं..
पटाखों की आवाज यहां भी सुनता हूं
लेकिन अपने शहर की मिरचया पटाखे की तरह नहीं।
बमों, फूलझड़ियों से मोहल्ले को गुलजार करते बच्चे
फिर सुबह में बचे पटाखों को सड़कों पर खोजते बच्चे..
कितना अच्छा लगता था, उन बच्चों को देखना
पटाखों की गंध सुबह तक हमारे साथ रहती थी।
वो हुका-हुकी..जो हम खेला करते थे
वो तो बस अब याद का हिस्सा है
संठी की बनी हुका-हुकी और उसे जलाने का आनंद
बस पुराने अनुभवों की तरह ही रह गया है।
दिल्ली की भी दीवाली कोई बुरी नहीं है
यह भी रास आता है पर लगता है
जैसे पैसों से ही यहां दीवाली होती है..
चमचम करते पैक में बंद गिफ्ट..
ये सब कहां होता है अपने शहर में...
इसी बीच अजय ब्रह्मात्मज चैट पर कहते हैं
"दीप पर्व में अक्षर रोशन करें"
Oct 13, 2009
यहां गांव नहीं जीवन डूबा है...
इस समय पूरा मुल्क तीन राज्यों में हो रहे मतदान में उलझा हुआ है। इस बीच आंध्र और कर्नाटक में आई भीषण बाढ़ को जैसे हम भूलते जा रहे हैं। हम मतदान को लेकर एक से बढ़कर एक लीड खबर बनाकर परोस रहे हैं। लेकिन इस बीच में हम बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को छोड़ते जा रहे हैं। ठीक ऐसा ही कोसी के साथ भी हुआ था। बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के संवाददाता उमर फ़ारुक बाढ़ से तबाह हो गए आंध्रप्रदेश के ऐतिहासिक महत्व वाले कस्बे आलमपुर से लौटे हैं । उनकी रपट को पढ़िए और जरा सोचिए॥
गिरीन्द्र
आंध्रप्रदेश में महबूबनगर ज़िले का आलमपुर क़स्बा अब तक अपने प्राचीन मंदिरों के लिए मशहूर था पर अब वो लगभग पूरी तरह से मिट चुका है।
तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के संगम क्षेत्र में स्थित इस 20 हज़ार की आबादी का यह कस्बा भीषण बाढ़ में पूरी तरह डूब गया था और लगभग दो सप्ताह बाद भी वहां ठहरे हुए बाढ़ के गंदे पानी, मलबे, कीच और दुर्गंध ने स्थानीय लोगों के लिए वापस लौटना असंभव बना दिया है।
जहाँ कुछ परिवारों ने साहस का प्रदर्शन करते हुए वहां लौटने, अपने घर साफ़ करके एक नए सिरे से जीवन प्रारंभ करने की कोशिश की हैं, वहीं आलमपुर की आबादी का अधिकतर हिस्सा अभी यहाँ से पांच किलोमीटर दूर एक स्कूल में शरण लिए हुए हैं और किसी कीमत पर वापस जाने के लिए तैयार नहीं है।
आलमपुर के बीचोबीच स्थित गांधीजी की मूरत तो बाढ़ के पानी से बाहर निकल चुकी है लेकिन जितना आप इस कस्बे के अंदर जाएंगे, उतना ही पानी का स्तर और कीचड़ की गहराई बढ़ती जाएगी। दुर्गंध बर्दाश्त से बाहर होने लगेगी.
नौ प्राचीन शिव मंदिरों का झुरमुट, जो क़रीब 1300 वर्ष पुराने बताए जाते हैं, दक्षिण काशी कहे जाने वाले इस कस्बे की सीमा पर स्थित हैं। बड़ी दीवार से तुंगभद्रा के पानी को रोकने वाला यह इलाका आज पूरी तरह से जलमग्न है.
दिलचस्प बात यह है कि हिंदू समुदाय के लिए धार्मिक महत्व रखने वाले आलमपुर में हमेशा ही आधे से ज़्यादा आबादी मुस्लिम समुदाय की रही है और दोनों समुदाय हमेशा की तरह अब की बार भी प्राकृतिक आपदा की यह मार मिलजुलकर झेल रहे हैं।
मैं जब आलमपुर पहुंचा तो मुझे थोड़ी ही दूरी पर घुटनों भर पानी में कीचड़ से लथपथ खड़े सलाम मियां दिखाई दिए। उन्होंने कहा, "मैंने अपने जीवन में इतना पानी कभी नहीं देखा. अब हमारे पास कुछ नहीं रह गया है. अब हम कैसे ज़िंदा रहें, कुछ समझ नहीं आ रहा है. कुछ अच्छे लोग हमें खाना दे रहे हैं लेकिन ज़िंदगी इस तरह तो नहीं गुज़र सकती."
सलाम मियां की आँखें आंसुओं से भारी हो गई थीं और बात करना मुश्किल हो गया था।
दर्द, दुख और रोष
इस कस्बे का हर आदमी गुस्से और दुख की मिलीजुली भावनाओं में डूबा हुआ मिला। चाहे वो 27 वर्ष के मारुति वैंकटनारायणा रहे हों या 90 वर्षीय जैनब खातून, हर एक की यही मांग थी कि नया आलमपुर एक नई जगह बसाया जाना चाहिए जहाँ वो कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों की बाढ़ से बचा रहे.आलमपुर के लगभग सभी वासी अपनी ज़िन्दगी भर की कमाई से वंचित हो गए हैं और अब उन के पास शरीर पर कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचा है.
आलमपुर के लोग कई कारणों से सरकार से नाराज़ हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रशासन ने समय रहते बाँध के दरवाज़े नहीं खोले और बांध के पिछले हिस्से के पानी से बाढ़ आ गई.
अस्सी वर्षीय कोटाम्मा का परिवार उन चंद घरों में से एक था जो हिम्मत करके सफाई की कोशिश में लगे थे. कोटाम्मा ने बाढ़ से नष्ट अपने घर की ओर इशारा करते हुए कहा, "क्या एक दिन पहले हमें चेतावनी देना सरकार का काम नहीं था. उनकी लापरवाही का परिणाम हमें भुगतना पड़ रहा है."
दो बहनों चाँद बी और आयशा का कहना था की बाढ़ में उन का दो लाख रूपए का नवनिर्मित घर और 50 हज़ार का सामान नष्ट हो गया। उनमें से एक बताती हैं, "वो सोना भी चला गया जो हमने अपनी छोटी बहन के विवाह के लिए खरीदा था। अब हमारे पास कुछ नहीं रहा."
साभार-बीबीसी हिंदी डॉट कॉम
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