Friday, October 07, 2016

#युद्धकेविरुद्ध शुक्रिया एनडीटीवी

क्या हम पाकिस्तान की राह पे चलने जा रहे हैं? क्या लड़ना ही सत्य है? हम आतंकवाद के ख़िलाफ़ हैं या फिर देश के ख़िलाफ़? क्या युद्ध में विजय पताका लहराने के बाद हम पाकिस्तान की सोच को बदल देंगे? या फिर युद्ध के ज़रिए एक ही रात में अपना देश विकासशील से विकसित राष्ट्र की श्रेणी में आ जाएगा?

ये कुछ सवाल हैं, जिसका सामना मुझे पूर्णिया के इंजीनियरिंग कॉलेज विद्या विहार इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी में युवाओं के साथ बातचीत के दौरान करना पड़ा।  इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे युवाओं के इन सवालों का सामना कर मुझे इस बात का संतोष हुआ कि समाचार चैनलों के युद्धोन्माद के इस दौर में अभी भी कई लोग युद्ध के विरुद्ध हैं, ख़ासकर युवा वर्ग।

हालाँकि यहाँ यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि लोगबाग ‘सर्जिकल स्‍ट्राइक’ या सरकार के किसी कदम के खिलाफ नहीं हैं। हम सभी बस युद्ध के विरुद्ध हैं। लेकिन हाँ, इस 'सर्जिकल स्‍ट्राइक' में उन्‍माद को न मिलाया जाए, ये बहुत लोगों की इच्छा है।

एक छोटे शहर के युवाओं की बातें सुनकर लगा कि हम जिस मुहिम के साथी हैं, उसमें दम है। दरअसल युद्ध के विरुद्ध एक विचार है, जिसका प्रसार इस दौर में बहुत ही आवश्यक है।

युद्ध के विरुद्ध बात करने की वजह से कई लोग मुझे डरपोक की संज्ञा देने लगे हैं लेकिन मैं उन्हें यह कैसे बताऊँ कि युद्ध उपाय नहीं है। इसी दौरान भारत-नेपाल सीमा पर स्थित जोगबनी जाना हुआ। यहाँ मेरी मुलाक़ात एक समाजवादी विचारधारा के व्यक्ति देवनारायण शर्मा से होती है। उन्होंने राममनोहर लोहिया की एक उक्ति सुनाई - "इस सदी की दो ही महत्वपूर्ण घटना है, एक तो गांधी और दूसरा एटम बम। अब देखो किसकी जीत होती है। "  देवनारायण जी भी 'युद्ध के विरुद्ध' के साथ दिखे। उन्होंने लोहिया की जिस बात  का ज़िक्र किया ,  उस पर हमें गम्भीरता से विचार करना चाहिए क्योंकि हमें किस राह पे चलना है यह कोई और नहीं बल्कि हमें ही तय करना होता है।

यह समझने की ज़रूरत है कि आज दुनिया के जो भी गिनती के संपन्न और शक्तिशाली देश हैं, उनकी संपन्नता का बड़ा कारण युद्ध और हथियार का व्यापार है। ऐसे में यह जानने की आवश्यकता है कि युद्ध भी एक व्यापार है , कारोबार है और यह व्यापार हर देश यदि करने लगे तो इसका परिणाम क्या होगा, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। यह जान लें इस देश ने गांधी को देखा है, उनकी इच्छाशक्ति को महसूस किया है। ऐसे में हर एक बात पे युद्ध की बातें करना अच्छा नहीं लगता है। हम आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ें लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि युद्ध का वातावरण गढ़ें।

युद्ध के लिये वातावरण तैयार करने के लिए झूठ का सहारा लिया जाता है ताकि युद्ध के तर्क गढ़े जा सकें। यह झूठ कोई एक मुल्क नहीं गढ़ता है, यह झूठ कई देश मिलकर गढ़ते हैं और फिर मीडिया और प्रचार का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर युद्धोन्माद के बादल गरजने लगते हैं।

इंजीनियरिंग कॉलेज में युवाओं के साथ संवाद में एक ने दिनकर की कविता का पाठ किया- "क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो.."  वहीं दूसरी ओर कविता की बातों से आगे निकलकर एक ने कहा कि "हमारा डिप्‍लोमैटिक कदम होना चाहिए कि पाकिस्‍तान को आतंकी देश घोषित करवाया जाए। इस पर न केवल अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी प्रतिबंध लगाएं, बल्कि सार्क में अफगानिस्‍तान और बांग्‍लादेश में प्रतिबंध लगाएं। पाकिस्‍तान पर आर्थिक प्रतिबंध लगने से भी आतंकवादी हमलों में कुछ हद तक कमी लाई जा सकती है।"

मेरा मानना है कि एनडीटीवी ख़बर ने जो 'युद्ध के विरुद्ध' के नाम से जो लेखन की शुरुआत की है उसे बंद न किया जाए। लोग लगातार इस पर अपनी बात रखें। केवल एनडीटीवी ही नहीं अन्य समाचार चैनलों को भी युद्धोन्माद से अलग हटकर युद्ध के विरुद्ध बातें करनी चाहिए। एक बार फिर से एनडीटीवी का शुक्रिया कि उसने इस युद्धोन्माद के दौर में #युद्धकेविरुद्ध के ज़रिए संवाद स्थापित करने का काम किया है। और चलते -चलते सूफ़ी शैली के प्रसिद्ध क़व्वाल नुसरत फतह अली खान की आवाज़ में इन पंक्तियों को सुनिए और महसूस करिए कि जंग का कारोबार कितना ख़तरनाक होता है-
"शहर के दुकानदारों कारोबार-ए-उलफ़त में,
सूद क्या ज़ियाँ क्या है, तुम न जान पाओगे..."

3 comments:

Gopal Chaturvedi said...

Bilkul Sateek

Gopal Chaturvedi said...

Bilkul Sateek

Digamber Naswa said...

किसी उन्माद को ख़त्म करना युद्ध नहीं है ... ये भी युवा पीड़ी को समझना होगा .... नहीं तो अंत को कोई रोक नहीं सकता ...