Friday, August 12, 2016

सखी दिल्ली के नाम

डियर दिल्ली,

आज तुमसे गुफ़्तगू करने मन है। दरअसल तुम्हारे पास आने के बाद खो जाता हूं। बात यह है मेरी प्यारी दिल्ली, कि तुम मेरे सब ख़ास लोगों को अपनी बाहों में समेटे हुए हो और जब भी आता हूं सबसे मिलने का वादा अधूरा ही रह जाता है !

और देखो न ! इन गुज़रे 14 साल में तुमने ख़ुद को इतना बदला है और बाहों को इतना फैलाया है कि ग़ाज़ियाबाद, नॉएडा, ग्रेटर नॉएडा, वैशाली, कौशाम्बी, वसुंधरा, फ़रीदाबाद ये सब मुझे तुम्हारी बहनें लगने लगी है।

मैं महसूस करने लगा हूं कि इन सब इलाक़ों को तुमने अपने प्रभाव में कर लिया है। यार, तुम तो पहले से ही मायावी रही हो। तुमने मुझे डूबना सीखाया है। 2002 की एक सर्द शाम मॉल रोड पे तुमने मुझे कहा था : 'जो डूबा सो पार..' लेकिन आजतक 'पार' को मैं समझ न सका हूं।

यार दिल्ली, यह तो मैं हर समय स्वीकारता हूं कि तुमने ही मुझे बसावटों से इश्क़ करना सीखाया, तुमने ही मुझे ययावर बनाया लेकिन अब जब टुकड़ों-टुकड़ों में दिल्ली आता हूं तो मन अपना अधूरा रह जाता है, प्यासा ही लौटता हूं, किसी से मिल नहीं पाता। तुम्हारे विस्तार में खो जाता हूं।

मेरी प्यारी दिल्ली,  ढेर मनमीत हैं तुम्हारे यहाँ लेकिन यही सोचकर फिर लौट जाता हूं कि "बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की...। हर बार आता हूं और हर बार मुलाक़ात अधूरी ही रह जाती है।

तुमने पहले रिंग रोड पे घुमाया, फिर मेट्रो से और अब 'ओला' की माया में लपेट रही हो। तुम बड़ी ऊँची आवाज़ में अब कहती हो कि दूरियाँ अब सिमट रही है। लेकिन प्यारी दिल्ली अप्पन अब थक जाते हैं। जहाँ जाता हूं वहीं रूक जाता हूं।

दरअसल पिछले कुछ साल से कुछ ख़बर ही नहीं  कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की...बस चलता जा रहा हूं।

एक चीज़ और कहनी है मेरी सखी दिल्ली तुमसे, तुमने जो ख़ुद का विस्तार किया है न, प्रवासियों को अपना बनाने के लिए, वह अन्दाज़ बड़ा मायावी है यार।

ख़ैर, रात में तुम्हें देखकर मैं बुदबुदाने लगता हूं: "उजाले की परियाँ नहाने लगीं/ सितारों  को शायद ख़बर ही नहीं/
मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की..."

और चलते - चलते दिल्ली रानी, एक गुज़ारिश है तुमसे, सबकुछ करना, अपना विस्तार करना, साम्राज्य बढाना, चकमक -चकमक होना लेकिन यार! 'लूटियंस-ज़ोन' दूसरा मत बसाना। मुझे 'लूटियंस कल्चर' से बहुत्ते डर लगता है।

बस इतना ही कहना था डियर दिल्ली।

तुम्हारा

गिरीन्द्र

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