Monday, November 24, 2008

ठंड से घर की याद

सुबह जब सूरज उगने वाला होता है,
घर से निकलता हूं ऑफिस के लिए
ठंडी हवा से घर की याद आती है,
ऐसे मौसम में आग जलाकर बैठा करते थे
हम अपने घर में.....

आज भी बाबूजी कमरे में आग तापते हैं...
कहते हैं हीटर का असर कुछ नहीं होता हम पर
हमें चाहिए आग हीं........
याद आती है पुरानी बातें..मास्टर साब की..

उनका कहना-
विद्यार्थी को आग से दूर रहना चाहिए....
आलस्य से भर देगा यह आग...

यादें कुहासे में खो सी गई
मैं डीएनडी फ्लाईवे के पास पहुंच चुका था..
ठंड का पता नहीं चल पा रहा था
गाड़ी के शीशे जो चढ़ा चुका था मैं....

3 comments:

संदीप पाण्डेय said...

गाडी के शीशे चढा चुका था मैं
और इस तरह अपने आप को बचा लिया था
उन यादों से जो मुझे परेशां करने के सिवा कुछ नही करतीं
जिनसे दूर है मेरी मंजिल ...
लेकिन मैं इनसे पार नही पता

यादों से बेशर्म शै जीवन में कोई नही.......

संगीता पुरी said...

सुंदर यादें और उन्‍हें भूलने को मजबूर हम सब ....अब ठंड भी शायद उतना नहीं रह गया है।

रंजीत said...

shisha chadhne ke bad thand kya duniya hee badal jatee hai. ham sab apne-apne shishe se ladte hue log hain bhai.
bahut achha.
ranjit