कल आपने मिहीर की बात सुनी...चक दे इंडिया पर। सभी ने खुलकर अपनी बात कही है। यूनूस भाई और विजय ने शायद विस्तार से अपनी बात रखी है। ठीक इसके बाद मिहीर ने इन लोगों के सवालों का उत्तर दिया है। हम उन्हीं बातों को यहां रख रहे हैं। एक-एक कर सभी की बातें यहां ऱखी जा रही है-
Manish said...
achchi sameeksha likhi hai aapne.shukriya!
4:18 AM
vijay said...
बहुत अच्छा लगा चकदे..... पर मिहिर की समीक्षा जिसमें शाहरुख और शिमित अमीन की फिल्म स्टाइलों पर एक नजर के अलावा भी बहुत कुछ दिया गया है। एक जगह मिहिर ने लिखा है, "सबसे पहले सबसे खास बात... याद कीजिये कि मुख्यधारा के सिनेमा में आखिरी बार आपने कब एक मुस्लिम को नायक के रूप में देखा था? आसानी से याद नहीं आयेगा ये तय है..." मैं इससे सहमत हूं मगर पूर्णतः नहीं क्योंकि बीच-बीच में विभिन्न विषयों पर कई मुस्लिम किरदार वाली फिल्में आती रही हैं यथा- फना, अनवर, मिशन कश्मीर, फिजा, मकबूल, शूट आउट एट लोखंडवाला, ब्लैक फ्राइडे...अब इनमें कुछ को तो मुख्यधारा की सिनेमा में रख ही सकते हैं, यह सही है कि हिन्दू नाम वाले किरदार की तरह फ्रिक्वेंट नहीं है।
मिहिर ने कुछेक दृश्यों को पकाऊ कहा है...सही है ...कई बार ऐसा दिखने में आता है कि दृश्य भावनात्मक बनाने के चक्कर में फिल्मकार दृश्य को पकाऊ बना देते हैं।
गिरीजी आपके साथ मिहिर को भी शुक्रिया इस लेखन के लिए
4:41 AM
BHUVNESH SHARMA said...
मैंने भी कल ही यह बेहतरीन फ़िल्म देखी. सबसे अच्छा लगा कि क्रिकेट के महिमामंडन वाली तमाम फ़िल्मों से हे हर मायने में सफ़ल है
5:13 AM
yunus said...
सही कहा ।
कुछ कारण समझ में आते हैं । मुस्लिम नायक बॉक्स ऑफिस के पैमान पर खरा नहीं उतरता ।
मुस्लिम नायक होने से फिल्म एक खास तरह के खांचे में अटक जाती है ।
मुस्लिम नायक एक सुविधा की बजाय दुविधा ज्यादा पैदा करता है ।
चक दे, के बाद ये लगने लगा है कि यशराज जैसे बड़े बैनरों को सिनेमा की बदलती दुनिया का
अहसास हो गया है । तारारम पम और झूम बराबर में यशराज ने बड़ी गहरी चोट खाई है ।
जाहिर है कि अब उनके कारखाने में पुराने खांचों को कबाड़ी के हवाले करके नए खांचे तैयार
करने पर काम किया जाने लगा होगा ।
चकदे की सबसे बड़ी खासियत ये है कि तमाम फिल्मी झटकों के बावजूद ये फिल्म मध्यवर्ग की
फिल्म है । जिसका नायक स्कूटर पर चलता है । वो भी खटारा ।
लड़कियां भी वैसे ही संघर्ष कर रही हैं जैसे हमारे घर मुहल्लों की लड़कियां करती हैं ।
सिस्टम के खिलाफ जाकर जीत हासिल करना हर भारतीय की दमित इच्छा है ।
और अंकुश जैसी नारेबाज़ फिल्मों से लेकर सनी देओल के घूंसों और फिर अभी अभी तक की
नाना पाटेकर नुमा फिल्मों तक कई फिल्मों ने इसी आधार पर झंडे गाड़े हैं ।
चकदे ने हॉकी के प्रति हमारे मन में दबे प्यार को उभार दिया है । बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन का प्यारा दोस्त
फोन पर बात करे तो प्यार उभरता नहीं । पर जब सामने आ जाए तो हम रोमांचित हो जाते हैं ।
प्यार छलक छलक जाता है । क्रिकेटी बुखार के बावजूद एक आम भारतीय हॉकी से प्यार करता है ।
दिक्कत ये है कि हॉकी में टीम जीत नहीं रही ।
अगर भारतीय हॉकी सुधरे और टीम दुनिया में सिरमौर हो जाए तो देखिए हम सब हॉकीबाज़ों को सिर माथे पर लगायेंगे ।
चक दे एक झूठी उम्मीद बंधाती है ।
काश कि फिल्मों से सिस्टम बदल पाता ।
6:00 AM
सुरेश Suresh नागर Nagar said...
बहुता ही अच्छा विषलेशण किया है, पर बस एक चीज़ के बारे में कहना चाहूंगा की - टॉम ऐंड जैरी में, चूहे का नाम जैरी है - टॉम तो बागड़ बिल्ला है.
7:02 AM
संजय तिवारी said...
शब्दों का चुनाव बहुत उम्दा है.
और फिर अपने मिहीर भाई ने क्या कहा...गौर करें-
7:32 AM
mihir said...
बिजय आपकी बात ठीक है कि मुस्लिम किरदार फिल्मों में आते रहे हैं लेकिन जब मैनें लिखा कि 'मुख्यधारा के सिनेमा में नायक' तो बात थोडी अलग है. ज़रा गौर कीजिये जिन फिल्मों का आपने नाम लिया.. फना, अनवर, मिशन कश्मीर, फिज़ा, ब्लैक फ्राइडे.. क्या इन सभी का मूल विषय आतंकवाद नहीं? और अब आतंकवाद पर फिल्म बनायेंगे तो मुख्य किरदार तो मुस्लिम ही होगा ना! हाँ दृष्टि का फर्क हो सकता है और ये मानना पडेगा कि इनमें से कई फिल्में एक सही दृष्टिकोण के साथ बनाई गयी हैं. लेकिन मेरा कहना ये है कि कोई ऐसा विषय जिसका मुस्लिम समाज और उसकी समस्याओं से सीधा लेना-देना ना हो (जैसा चक दे में है) वहाँ कोई मुस्लिम किरदार नायक क्यों नही होता? यूँ ही, बिना किसी वजह... कोई मसाला फिल्म जिसका उद्देश्य केवल पैसा कमाना हो, जो हमें बिल्कुल पसंद ना आये, जिसमें कोई संदेश ना हो, जिसका यथार्थ से दूर दूर तक कोई वास्ता ना हो. लेकिन जिसका नायक मुस्लिम हो (यूँ ही!). यह अब संयोग से भी नहीं होता...
-मिहिर
12:10 PM
mihir said...
अब अगर मैं अपनी बनाई परिभाषा के अनुसार फिल्मों की चीर्-फाड करूँ तो जो फिल्में मेरी इस 'मसाला फिल्म-मुस्लिम नायक' परिभाषा में आ सकती हैं वो होगीं- धूम जिसमें एक नायक अली है. (यहाँ भी वो द्वितीयक भूमिका में है और उसका ताल्लुक गैर-कानूनी धंधों से दिखाया गया है). तिग्मान्शू धूलिया की चरस याद आती है जिसमें एक मुस्लिम किरदार नायक था और जहाँ तक मुझे याद है दो लडकों की कहानी (जिम्मी शेरगिल तथा उदय चोपडा) होने के बावजूद वो ही मुख्य नायक था. यूँ तो रंग दे बसँती का नाम भी लिया जा सकता है लेकिन अबतक आप मेरी बात समझ ही गये होगें. अपर्णा सेन की मि. एण्ड मिसेस. ऐयर इसका सुन्दर उदाहरण है कि जब हम एक मुस्लिम को हमारे दिमाग़ में बना दी गयी छवि से उलट पाते हैं तो कितना अजीब और आश्चर्य का एहसास होता है. और् हमारी फिल्में इन स्टिरियोटाइप छवियों के निर्माण में एक प्रमुख कारक हैं.
12:52 PM
mihir said...
यूनुस आपने जो 'मध्यवर्ग की फिल्म' वाली बात कही है उसका मैं कायल हो गया. हिन्दी मुख्यधारा का सिनेमा एक पूँजीवादी सिस्टम का उपकरण है और इस कारण या तो अन्त में हमेशा यथास्थितिवाद की पुष्टि होती है या समस्या का मसीहाई हल. लेकिन यह दर्शकवर्ग ही तो है जो आम आदमी के असंतोष को कहीं ना कहीं जगह देनी ही पडती है इन पैसेवाले निर्माताओं को. जैसा आपने लिखा 'खटारा स्कूटर पर चलने वाला मध्यवर्ग जिसकी दमित इच्छा है सिस्टम के खिलाफ जाकर जीत हसिल करना'. और यहीं मेरी बात पुष्ट हो जाती है जब मैनें ये इशारा किया है की यहाँ शाहरुख एक मुस्लिम का नहीं एक निम्न मध्यवर्गीय व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है. वैसे ये एक बहस का मुद्दा है कि हम किसे मुस्लिम समाज क ठीक प्रतिनिधित्व मानेगें? आप अपनी बात रखें... बात आगे बढेगी...
और शुक्रिया सुरेश का (वैसे ही, सुरेश क्या आपने 'दो और दो पाँच' देखी है?) मेरी गलती सुधारने के लिये. इस लेख का इंग्लिश रूपान्तर पिछले दस दिनों से वेब पर है लेकिन ये भूल किसी ने नोटिस नहीं की और आपने एक ही दिन में पकड लिया! तो ये केवल आपकी तरीफ नहीं रही अब... ये हिन्दी की जागरुकता का सबूत है!
मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Thursday, August 30, 2007
Wednesday, August 29, 2007
चक दे इण्डिया देखते हुए एह्सास

मिहिर ने चक दे इंडिया फिल्म पर अपनी बात कही है.....आपने इसके बारे में अभी तक काफी पढ़ लिया होगा....लेकिन एक छात्र की नजर में इस फिल्म का आनंद उठाएं........
.....................................
ये एक अजीब सी तुलना है. पिछले सप्ताह मैनें अमिताभ को "सी.एन.एन. आई.बी.एन." पर बोलते सुना. स्वत्नंत्रता दिवस के दिन अमिताभ अपनी पसन्दीदा फिल्मों के बारे में बात कर रहे थे. अम्रर अकबर एन्थोनी की बात आने पर उन्होनें कहा कि हम सभी को लगता था कि इतना अतार्किक विचार कैसे चलेगा? संयोगों और अतार्किकताओं से भरी ये कहानी सिर्फ मनमोहन देसाई के दिमाग का फितूर है. आज भी हम उस फिल्म के पहले दृश्य को देखकर हंसते हैं. एक नली से तीनों भाइयों का खून सीधा माँ को चढता हुआ दिखाया जाना एक मेडीकल जोक है. लेकिन इन सबके बावजूद कुछ है जिसने देखने वाले से सीधा नाता जोड लिया. सारी अतार्किकतायें पीछे छूट गयीं और कहानी अपना काम कर गयी. अब आप क्या कहेंगे इसे...
मैं इसे एक फिल्मी नाम देता हूँ… दिल का रिश्ता. पिछ्ले ह्फ्ते शिमित अमीन की फिल्म चक दे इण्डिया देखते हुए भी मुझे ऐसा ही एह्सास हुआ. वैसे फिल्म के कई प्रसंग तो बहुत ही पकाऊ थे जैसे कबीर खान के घर छोडने का प्रसंग जहाँ पडोस में रहने वाला बच्चा अपने पिता से कह्ता है, "पापा मैनूं भी गद्दार देख्नना है". इस जगह भारी मेलोड्रामा दिखाई देता है. या वो सारी बोर्ड मीटिंग्स जहाँ चेयरमैन बार-बार ये ही दोहराता है, "ये चकला-बेलन चलाने वाली भारतीय नारियाँ हैं". क्या ये भी स्टिरियोटाइप किरदार नहीं हैं? लेकिन इनके बावजूद मुझे फिल्म पसन्द आयी और इसका कारण वो ही दिल का रिश्ता है. ये एक सच्चे दिल से बनाई गई फिल्म है जो नज़र आ ही जाता है.
सबसे पहले सबसे खास बात... याद कीजिये कि मुख्यधारा के सिनेमा में आखिरी बार आपने कब एक मुस्लिम को नायक के रूप में देखा था? आसानी से याद नहीं आयेगा ये तय है. हमारे दौर के सबसे बडे नायक शाहरुख ने भी हमेशा राज या राहुल या वीर प्रताप सिंह या मोहन भार्गव जैसी भूमिकाएँ ही निभाई हैं. हाँ हे राम् का अमज़द एक अपवाद कहा जा सकता है. शायद जयदीप के लिये सबसे मुश्किल ये ही रहा हो की यशराज को एक ऐसी कहानी के लिये कैसे मनाया जाये जिसके नायक का नाम कबीर खान है. यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है जिसे गौर से देखा जाना चाहिये. आज SRK ऐसा रोल कर सकता है, क्या ये पहले सम्भव था या हो सकता था? पुराने धुरंधर याद कर पायेंगे कि अमिताभ ने अपनी बादशाहत के दौर में मुस्लिम नायक की भूमिकाएँ भी निभाई हैं लेकिन शाहरुख के खाते में ये तथ्य नहीं है. यह समय का परिवर्तन है. मित्रों का तो यहाँ तक कहना है कि गदर जैसी दुर्घटना नब्बे के दशक में ही सम्भव थी. मनमोहन सिंह और लालकृष्ण आडवाणी ने इस दशक की शुरूआत में जो किया यह उसी का असर है. इसलिये चक दे अभी भी एक अपवाद ही कही जाएगी, मुख्यधारा नहीं. लेकिन ये एक खूबसूरत अपवाद है.
चक दे एक खेल आधारित फिल्म का मूल नियम ध्यान रखती है और वो है कमज़ोर की विजय. भारत द्वारा निर्मित सबसे चर्चित खेल फिल्म लगान की तरह चक दे भी कमज़ोरों के विजेता बनकर निकलने की कहानी है. यहाँ आपको सारे भेदभाव दिख जायेंगें जैसे जेन्डर, इलाका, खेल के आपसी भेदभाव और इनके खिलाफ लडाई साथ-साथ जारी है. टाँम एण्ड जैरी की लडाई में जीत हमेशा टाँम की ही होती है और यही नियम हमारी फिल्मों पर भी लागू होता है. सच यही है कि आम दर्शक ज़िन्दगी की लडाई हारे हुये किरदार से ही रिलेट करता है. वहीं उसे अपना अक्स दिखाई देता है.
हाँकी की भारत में क्या जगह थी इसे दिखाने के लिये बहुत सुन्दर प्रतीक चुना गया है. देश की राजधानी के ह्रदयस्थल को निहारती मेजर ध्यानचन्द की मूरत उस केन्द्रीय स्थान की गवाही देती है जो आजाद भारत में हाँकी ने पाया था. मेजर ध्यानचन्द हाँकी स्टेडियम जैसे लुटियंस की बनाई दिल्ली को निहार रहा है. इंडिया गेट के मध्य भाग से देखने पर ठीक सामने राष्ट्रपति भवन दिखाई देता है. अगर आप सुनील खिलनानी की आइडिया आँफ इंडिया का शहर और सपना अध्याय पढें तो मालूम होगा कि इस नक्शे को बनाने में क्या सत्ता संरचना काम कर रही थी. क्यों वायसराय के घर के लिये उन्नयन कोण सबसे ऊँचा रखा गया था. यहाँ ध्यानचंद का होना एक कमाल के प्रतीक की खोज है. और इसका श्रेय भी मैं जयदीप साहनी को दूंगा जिन्होंनें एकबार फिर साबित कर दिया है की नये बनते शहर की बुनावट और उसकी सत्ता संरचना को उनसे अच्छा समझने वाला हिन्दी सिनेमा में और कोई नहीं है. खोसला का घोसला के बाद चक दे एक और उपलब्धि है जयदीप के लिये. ये दिल्ली है बिना किसी लाग-लपेट के.
और वो सोलह लडकियाँ... सोलह अलग-अलग नाम, सोलह अलग-अलग किरदार, सोलह अलग-अलग पहचान. हर एक ऊर्जा की खान. जैसे उबलता लावा. वैसे कोमल चौटाला को सबसे ज्यादा पसंद किया गया है और खुद ममता खरब ने कहा है कि कोमल मे मेरी छवि है लेकिन काम के मामले में मेरी पसंद शिल्पा शर्मा रही. आपने उसे खामोश पानी में देखा होगा और हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी में नहीं देखा होगा. लेकिन आप बिन्दिया नायक को नहीं भूल सकते. अगर ये उनका फिल्म जगत में आगमन माना जाये तो ये एक धमाकेदार आगमन है. वो आयी… वो छायी टाइप! लेकिन आखिर में श्रेय तो जयदीप को ही जाएगा जिन्होंनें इतने तीखे, तेज़्-तर्रार किरदार रचे.
शाहरुख के लिये ये फिल्म स्वदेस वाले खाते में जाती है जहाँ उसने अपना किंग खान वाला स्टाइल छोडकर काम किया है. स्वदेस हालाँकि ज्यादा परतदार फिल्म थी लेकिन चक दे भी उसी खाते में है. स्तर भले कम हो लेकिन खाना वोही है. शाहरुख को चाहनेवालों के लिये ये एक नया रूप तो है ही. (हाँ मेरी पसंद अभी भी कभी हाँ, कभी ना को ही शाहरुख का सर्वश्रेष्ठ काम मानती है. ना स्वदेस को और ना चक दे को).
ये फिल्म तो बस उम्मीद है कि हिन्दुस्तानी फिल्मों की मुख्यधारा किसी नये प्रयोगशील रास्ते पर आगे बढ रही है...
http://youtube.com/watch?v=1lp7nbAjUqk
Tuesday, August 28, 2007
राखी पर एक अनमोल उपहार- बहन दिया भाई को किडनी उपहार में

एक बहन ने ऱाखी के शुभ अवसर पर अपने भाई को एक ऐसा उपहार दिया, जो सचमुच में अलग है।
छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक अस्पताल है- Modern medical Institute यहां के ट्राउमा यूनिट के बेड नं. 5 पर एक भाई को राखी के अवसर पर एक नई जिंदगी नसीब हुई है। आप इसे पुर्नजनम कह सकते हैं।
असीम कुमार सिंहा नाम के इस भाई को बहन अनुमिता ने किडनी उपहार स्वरूप भेंट की है। 36 वर्षीय अनुमिता अपने भाई से बेहद प्यार करती है। बकौल अनुमिता-"असीम हमारा प्यारा भाई है, हम चार बहने हैं और असीम हमारा इकलौता भाई। हम उसके लिए कुछ भी कर सकते हैं।"
दरअसल असीम अपने दोनों किडनी खराब हो जाने के कारण जिंदगी और मौत से जूझ रहा था। बहन क्या करती, राखी के शुभ मौके पर इससे अच्छा उसके लिए और क्या तौहफा हो सकता था...................................
ऱाखी के दिन अनुमिता अपने भाई के बगल के बेड पर लेटी है। रविवार रात डॉक्टरों ने असीम के शरीर मे अनुमिता की किडनी प्रत्यारोपित कर हीं दी। बहन अनुमिता बेहद खुश नजर आ रही थी। सुबह उसने अपने भाई के कलाई में राखी बांधी तो अस्पताल के लोगों की आंखे भी नम हो गयी। बहन ने न केवल कलाई में राखी बांधी है, बल्कि उसने अपने भाई को एक नई जिंदगी भी दी है।
असीम के स्वास्थ में सुधार हो रहा है। राखी के इस पावन अवसर यह कार्य सचमुच काबिल-ए- तारिफ है....
बहन को सलाम...
Thursday, August 23, 2007
विदेशों में परचम लहराती भारतीय महिलाएं
विदेशों में अपने योगदान के लिए सराहे जाने वाले भारतीयों की कमी नहीं है. इन भारतीयों में पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी हैं। इनमें से कुछ भारतीय महिलाओं से आपको परिचित करा रहे हैं, आईएएनएस की हिन्दी सेवा के संजीव कुमार। जनाब को इंटरनेट का नशा इस कदर है कि समय मिलते हीं खोज पर निकल पड़ते हैं। इसी खोज का नतीजा है, यह रिर्पोट। संजीव कुमार ने हाल हीं में अपना ब्लॉग बनाया है। नाम रखा है- आवाज..। आप क्लिक कर सकते हैं-www.aawaj.blogspot.com
आप ने कहा है कि अब आप इन विषयों पर अनुभव में लगातार लिखते रहेंगे। तो पेश है पहली पाती संजीव के खजाने से.........
श्रिति वडेरा:
भारतीय मूल की अर्थशास्त्री श्रिति वडेरा को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कनिष्ठ अंतर्राष्ट्रीय विकास मंत्री नियुक्त किया है। इस जिम्मेदारी के तहत उन्हें भारत संबंधी मसलों से भी निपटना होगा। अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग में संसदीय अवर विदेश मंत्री के रूप में वडेरा की नियुक्ति को खास माना जा रहा है। उनकी नियुक्ति इसलिए पक्की मानी जा रही थी क्योंकि वे ब्राउन की करीबी रही हैं। अब वे अफ्रीका समेत कई अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर ब्राउन को सलाह देती रहेंगी।
युगांडा में जन्मी वडेरा का परिवार १९७० के दशक में भारत चला गया था और उसके बाद यह परिवार इंग्लैंड चला आया जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड के समरविले कॉलेज में राजनीति, दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र की पढाई की। वे लंदन के वित्तीय जिले में कई आर्थिक और वित्तीय पदों पर रह चुकी हैं।
वे यूबीएस वारबर्ग नामक निवेश बैंक में १४ साल बिता चुकी हैं, जहां उनकी ड्यूटी के दायरे में ऋण पुनर्संरचना जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों की सरकारों को सलाह देने जैसी जिम्मेवारी शामिल थी।
वडेरा कई वर्षों तक ऑक्सफैम की ट्रस्टी भी रह चुकी हैं। पिछले आठ वर्षों से वे गॉर्डन ब्राउन की सलाहकार के पद को सुशोभित करती रही हैं। साथ ही वे ब्राउन की आर्थिक सलाहकार परिषद की भी सदस्य रह चुकी हैं। इंटरनेशनल फाइनेंस फैसिलिटी फॉर इम्यूनाइजेशन नामक परियोजना के अस्तित्व के पीछे भी उनकी खास भूमिका थी जिसके अंतर्गत गेट्स फाउंडेशन की मदद से बॉन्ड की बिक्री से चार अरब डॉलर जुटाए जाने का लक्ष्य रखा गया। इसका इस्तेमाल ५० करोड बच्चों को विभिन्न रोगों से बचाने के लिए किया जाना था।
वडेरा ब्राउन की विश्वस्त सलाहकार रही हैं। वे वित्त मंत्रालय और लंदन के वित्तीय जिले सीटी के बीच संपर्क सूत्र की भूमिका निभाती रही हैं। पिछले एक दशक में ब्राउन ने जो कुछ भी योगदान दिया है, उसके पीछे वडेरा की खास भूमिका रही है।
सिंथिया मलारवडी:
भारतीय मूल की सिंथिया मलारवडी की उम्र अभी महज २० साल है, लेकिन यह भारत के केरली मूल की यह महत्वाकांक्षी महिला स्विस संसद में अपनी जगह बनाना चाहती हैं और अक्टूबर में होने वाले चुनाव में किस्मत आजमाएंगी। स्विटजरलैंड की ग्रीन पार्टी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है। अगर मलारवडी चुनाव जीतती तो वे २०० सदस्यीय नेशनल एसेंबली की सदस्य बन जाएंगी। यह स्विस संसद का मुख्य चैम्बर है जिसे भारत की लोकसभा की तरह माना जा सकता है।
पेशे से बैंककर्मी मलारवडी पिछले दो वर्षों से सोलोथॉर्न नगरपालिका की निर्वाचित सदस्य रही हैं। पर्यावरण मुद्दों में गहरी दिलचस्पी और स्विटजरलैंड में विदेशी मूल के लोगों की समस्याओं ने उन्हें राजनीति की ओर आकर्षित किया। मलारवडी कार्बनिक खेती की जबर्दस्त पैरोकार हैं। वे चाहती हैं कि पौधों और वनस्पतियों की रक्षा इंसान की तरह ही की जानी चाहिए। मलारवडी अपने राजनीतिक करियर की प्राथमिकताओं को लेकर बिल्कुल स्पष्टवादी हैं।
केरल के अलपुझा जिले के पी. टी. राजन और अनम्मा दंपती की पुत्री मलारवडी का भारत से संबंध केरल तक ही सीमित है। वे दो-तीन वर्षों में एक बार अपने पुश्तैनी इलाके का दौरा अवश्य करती हैं। वे यह स्वीकार करती हैं कि उन्हें भारतीय खाना और खासकर मां के हाथ का बना खाना पसंद है। उन्ह भारतीय फिल्में देखना, भारतीय पोशाक व जेवरात पहनना पसंद है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश मैं भारत के बारे में जो कुछ भी जानती हैं, वह केरल तक ही सीमित है।
आशा श्रीनिवासन :
एक भारतीय अमेरिकी संगीत निर्देशक अमेरिका की नयी पीढी के लिए प्रेरणास्रोत बन गयी हैं। उन्हें अमेरिका की शीर्ष १५ महिला संगीतकारों की सूची में शामिल किया गया है। २६ वर्षीया आशा श्रीनिवासन ने मैरीलैंड विश्वविद्यालय से डॉक्टर की डिग्री ली है। उन्होंने न्यूयार्क में ऑर्केस्ट्रा ऑफ सट ल्यूक्स, जो अमेरिका का अग्रणी चैम्बर ऑर्केस्ट्रा है, द्वारा आयोजित नोटेबल वूमेन फेस्टिवल के सेलेब्रेशन ऑफ वूमेन कम्पोजर्स में कार्यक्रम पेश किया और इस आधार पर उन्हें शीर्ष संगीत निर्देशकों की सूची में शामिल किया गया। उन्होंने इस कार्यक्रम में अपनी मेधा का परिचय दिया। इस ऑर्केस्ट्रा को संगीत की दुनिया में खास प्रतिष्ठा हासिल है। श्रीनिवासन की रचना ‘दि रिवर नियर सवाथी’ को इसके लिए चुना गया। उन्होंने २० से ३० वर्ष की ६६ अन्य अमेरिकी संगीतकारों को पछाड कर इस सूची में अपनी जगह बनाई। यह प्रतियोगिता दिसंबर, २००६ में हुई।
उताह में जन्मी आशा की परवरिश अमेरिका और भारत में हुई है। उनकी संगीत रचनाएं दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत से बेहद प्रभावित हैं। वैसे वे इसे अच्छी तरह नहीं जानतीं। लेकिन इस संगीत ने निश्चित रूप से उन्हें प्रभावित किया है। आशा मैरीलैंड विश्वविद्यालय में संगीत निर्देशन के क्षेत्र में पढाई कर रही हैं। वहां वे इलेक्ट्रानिक म्यूजिक का अध्यापन भी करती हैं। वर्ष २००६ में आशा को वालसोम प्रतियोगिता में एक चतुर्वाद्य कल्पिथा के लिए एक पुरस्कार मिला। साथ ही उन्हें प्रिक्सडी इटे कम्प्टीशन में बांसुरीवादन के लिए दूसरा पुरस्कार मिला। साथ ही उन्हें अपनी कम्प्यूटर संगीत रचना एलोन, डांसिंग के लिए भी पुरस्कार मिला। इसे २००५ में सीमस (सोसायटी फॉर इलेक्ट्राॅ-इकॉस्टिक म्यूजिक इन यूएस) में पेश किया गया था।
सीमा सिंह:
सीमा सिंह न्यूजर्सी प्रांत की राजनीति में अपना करतब दिखा रही हैं। सीमा सिंह न्यूजर्सी प्रांत के फेयर एंड क्लीन इलेक्शंस पायलट प्रोग्राम के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय अमेरिकी महिला उम्मीदवार बन गयी हैं। यह प्रोग्राम एक ऐसी सरकारी प्रणाली है जिसके तहत उम्मीदवारों को राजनीतिक चुनाव अभियान के लिए सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है।
डिस्ट्रिक्ट कंस्टीचुएंसी से डेमोक्रेट पार्टी की उम्मीदवार सीमा सिंह ने जून में इसकी पुष्टि की कि उन्होंने इस पायलट प्रोग्राम के लिए क्वालीफाई करने के उद्देश्य से दस्तावेज सौंप दिया है। क्लीन इलेक्शंस प्रोग्राम के तहत सरकारी वित्तीय सहायता हासिल करने के इच्छुक उम्मीदवार को खास संख्या में पंजीकृत मतदाताओं से वित्तीय योगदान (अक्सर पांच डॉलर तक) हासिल करना पडता है। बदले में उम्मीदवार को सरकार से उसके चुनाव अभियान के लिए रकम दी जाती है और उम्मीदवार यह वादा करता है कि वह चुनाव अभियान के लिए निजी स्रोत से रकम नहीं जुटाएगा। एक बार जब न्यूजर्सी चुनाव कानून प्रवर्तन आयोग ने इन सभी ४०० वित्तीय योगदानों को प्रमाणित कर दिया तो सीमा सिंह को राज्य सरकार से चुनावी अभियान के लिए ४६ हजार डॉलर का अनुदान मिलेगा। यह चुनाव नवंबर में होने वाला है। ४५ वर्षीया सीमा सिंह १९८४ में न्यूजर्सी आई थीं और उन्होंने रटगर्स यूनिवर्सिटी और सेटन हॉल लॉ स्कूल से पढाई की। वे अंतर्राष्ट्रीय कानूनी मामले की वकील रही हैं और उनका कार्य भारतीय और एशियाई समुदायों पर केन्द्रित रहा है। २००२ में उन्हें तब बडी कामयाबी मिली जब वे न्यूजर्सी मंत्रिमंडल में जगह बनाने वाली पहली भारतीय बन गयीं।
आप ने कहा है कि अब आप इन विषयों पर अनुभव में लगातार लिखते रहेंगे। तो पेश है पहली पाती संजीव के खजाने से.........
श्रिति वडेरा:
भारतीय मूल की अर्थशास्त्री श्रिति वडेरा को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कनिष्ठ अंतर्राष्ट्रीय विकास मंत्री नियुक्त किया है। इस जिम्मेदारी के तहत उन्हें भारत संबंधी मसलों से भी निपटना होगा। अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग में संसदीय अवर विदेश मंत्री के रूप में वडेरा की नियुक्ति को खास माना जा रहा है। उनकी नियुक्ति इसलिए पक्की मानी जा रही थी क्योंकि वे ब्राउन की करीबी रही हैं। अब वे अफ्रीका समेत कई अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर ब्राउन को सलाह देती रहेंगी।
युगांडा में जन्मी वडेरा का परिवार १९७० के दशक में भारत चला गया था और उसके बाद यह परिवार इंग्लैंड चला आया जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड के समरविले कॉलेज में राजनीति, दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र की पढाई की। वे लंदन के वित्तीय जिले में कई आर्थिक और वित्तीय पदों पर रह चुकी हैं।
वे यूबीएस वारबर्ग नामक निवेश बैंक में १४ साल बिता चुकी हैं, जहां उनकी ड्यूटी के दायरे में ऋण पुनर्संरचना जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों की सरकारों को सलाह देने जैसी जिम्मेवारी शामिल थी।
वडेरा कई वर्षों तक ऑक्सफैम की ट्रस्टी भी रह चुकी हैं। पिछले आठ वर्षों से वे गॉर्डन ब्राउन की सलाहकार के पद को सुशोभित करती रही हैं। साथ ही वे ब्राउन की आर्थिक सलाहकार परिषद की भी सदस्य रह चुकी हैं। इंटरनेशनल फाइनेंस फैसिलिटी फॉर इम्यूनाइजेशन नामक परियोजना के अस्तित्व के पीछे भी उनकी खास भूमिका थी जिसके अंतर्गत गेट्स फाउंडेशन की मदद से बॉन्ड की बिक्री से चार अरब डॉलर जुटाए जाने का लक्ष्य रखा गया। इसका इस्तेमाल ५० करोड बच्चों को विभिन्न रोगों से बचाने के लिए किया जाना था।
वडेरा ब्राउन की विश्वस्त सलाहकार रही हैं। वे वित्त मंत्रालय और लंदन के वित्तीय जिले सीटी के बीच संपर्क सूत्र की भूमिका निभाती रही हैं। पिछले एक दशक में ब्राउन ने जो कुछ भी योगदान दिया है, उसके पीछे वडेरा की खास भूमिका रही है।
सिंथिया मलारवडी:
भारतीय मूल की सिंथिया मलारवडी की उम्र अभी महज २० साल है, लेकिन यह भारत के केरली मूल की यह महत्वाकांक्षी महिला स्विस संसद में अपनी जगह बनाना चाहती हैं और अक्टूबर में होने वाले चुनाव में किस्मत आजमाएंगी। स्विटजरलैंड की ग्रीन पार्टी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है। अगर मलारवडी चुनाव जीतती तो वे २०० सदस्यीय नेशनल एसेंबली की सदस्य बन जाएंगी। यह स्विस संसद का मुख्य चैम्बर है जिसे भारत की लोकसभा की तरह माना जा सकता है।
पेशे से बैंककर्मी मलारवडी पिछले दो वर्षों से सोलोथॉर्न नगरपालिका की निर्वाचित सदस्य रही हैं। पर्यावरण मुद्दों में गहरी दिलचस्पी और स्विटजरलैंड में विदेशी मूल के लोगों की समस्याओं ने उन्हें राजनीति की ओर आकर्षित किया। मलारवडी कार्बनिक खेती की जबर्दस्त पैरोकार हैं। वे चाहती हैं कि पौधों और वनस्पतियों की रक्षा इंसान की तरह ही की जानी चाहिए। मलारवडी अपने राजनीतिक करियर की प्राथमिकताओं को लेकर बिल्कुल स्पष्टवादी हैं।
केरल के अलपुझा जिले के पी. टी. राजन और अनम्मा दंपती की पुत्री मलारवडी का भारत से संबंध केरल तक ही सीमित है। वे दो-तीन वर्षों में एक बार अपने पुश्तैनी इलाके का दौरा अवश्य करती हैं। वे यह स्वीकार करती हैं कि उन्हें भारतीय खाना और खासकर मां के हाथ का बना खाना पसंद है। उन्ह भारतीय फिल्में देखना, भारतीय पोशाक व जेवरात पहनना पसंद है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश मैं भारत के बारे में जो कुछ भी जानती हैं, वह केरल तक ही सीमित है।
आशा श्रीनिवासन :
एक भारतीय अमेरिकी संगीत निर्देशक अमेरिका की नयी पीढी के लिए प्रेरणास्रोत बन गयी हैं। उन्हें अमेरिका की शीर्ष १५ महिला संगीतकारों की सूची में शामिल किया गया है। २६ वर्षीया आशा श्रीनिवासन ने मैरीलैंड विश्वविद्यालय से डॉक्टर की डिग्री ली है। उन्होंने न्यूयार्क में ऑर्केस्ट्रा ऑफ सट ल्यूक्स, जो अमेरिका का अग्रणी चैम्बर ऑर्केस्ट्रा है, द्वारा आयोजित नोटेबल वूमेन फेस्टिवल के सेलेब्रेशन ऑफ वूमेन कम्पोजर्स में कार्यक्रम पेश किया और इस आधार पर उन्हें शीर्ष संगीत निर्देशकों की सूची में शामिल किया गया। उन्होंने इस कार्यक्रम में अपनी मेधा का परिचय दिया। इस ऑर्केस्ट्रा को संगीत की दुनिया में खास प्रतिष्ठा हासिल है। श्रीनिवासन की रचना ‘दि रिवर नियर सवाथी’ को इसके लिए चुना गया। उन्होंने २० से ३० वर्ष की ६६ अन्य अमेरिकी संगीतकारों को पछाड कर इस सूची में अपनी जगह बनाई। यह प्रतियोगिता दिसंबर, २००६ में हुई।
उताह में जन्मी आशा की परवरिश अमेरिका और भारत में हुई है। उनकी संगीत रचनाएं दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत से बेहद प्रभावित हैं। वैसे वे इसे अच्छी तरह नहीं जानतीं। लेकिन इस संगीत ने निश्चित रूप से उन्हें प्रभावित किया है। आशा मैरीलैंड विश्वविद्यालय में संगीत निर्देशन के क्षेत्र में पढाई कर रही हैं। वहां वे इलेक्ट्रानिक म्यूजिक का अध्यापन भी करती हैं। वर्ष २००६ में आशा को वालसोम प्रतियोगिता में एक चतुर्वाद्य कल्पिथा के लिए एक पुरस्कार मिला। साथ ही उन्हें प्रिक्सडी इटे कम्प्टीशन में बांसुरीवादन के लिए दूसरा पुरस्कार मिला। साथ ही उन्हें अपनी कम्प्यूटर संगीत रचना एलोन, डांसिंग के लिए भी पुरस्कार मिला। इसे २००५ में सीमस (सोसायटी फॉर इलेक्ट्राॅ-इकॉस्टिक म्यूजिक इन यूएस) में पेश किया गया था।
सीमा सिंह:
सीमा सिंह न्यूजर्सी प्रांत की राजनीति में अपना करतब दिखा रही हैं। सीमा सिंह न्यूजर्सी प्रांत के फेयर एंड क्लीन इलेक्शंस पायलट प्रोग्राम के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय अमेरिकी महिला उम्मीदवार बन गयी हैं। यह प्रोग्राम एक ऐसी सरकारी प्रणाली है जिसके तहत उम्मीदवारों को राजनीतिक चुनाव अभियान के लिए सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है।
डिस्ट्रिक्ट कंस्टीचुएंसी से डेमोक्रेट पार्टी की उम्मीदवार सीमा सिंह ने जून में इसकी पुष्टि की कि उन्होंने इस पायलट प्रोग्राम के लिए क्वालीफाई करने के उद्देश्य से दस्तावेज सौंप दिया है। क्लीन इलेक्शंस प्रोग्राम के तहत सरकारी वित्तीय सहायता हासिल करने के इच्छुक उम्मीदवार को खास संख्या में पंजीकृत मतदाताओं से वित्तीय योगदान (अक्सर पांच डॉलर तक) हासिल करना पडता है। बदले में उम्मीदवार को सरकार से उसके चुनाव अभियान के लिए रकम दी जाती है और उम्मीदवार यह वादा करता है कि वह चुनाव अभियान के लिए निजी स्रोत से रकम नहीं जुटाएगा। एक बार जब न्यूजर्सी चुनाव कानून प्रवर्तन आयोग ने इन सभी ४०० वित्तीय योगदानों को प्रमाणित कर दिया तो सीमा सिंह को राज्य सरकार से चुनावी अभियान के लिए ४६ हजार डॉलर का अनुदान मिलेगा। यह चुनाव नवंबर में होने वाला है। ४५ वर्षीया सीमा सिंह १९८४ में न्यूजर्सी आई थीं और उन्होंने रटगर्स यूनिवर्सिटी और सेटन हॉल लॉ स्कूल से पढाई की। वे अंतर्राष्ट्रीय कानूनी मामले की वकील रही हैं और उनका कार्य भारतीय और एशियाई समुदायों पर केन्द्रित रहा है। २००२ में उन्हें तब बडी कामयाबी मिली जब वे न्यूजर्सी मंत्रिमंडल में जगह बनाने वाली पहली भारतीय बन गयीं।
सफ़र बदल रहा है ग्रामीण भारत की तस्वीर


कहते हैं सफ़र में कई मोड़ आते हैं, और हर मोड़ पे सफ़र हमें खास अंदाज में कुछ कहता जरूर है। सफ़र के इसी अंदाज से रु-ब-रु होने का मौका मिला दिल्ली में । यहां एक संस्था है- सफ़र । समाज में उपेक्षित तबकों की बेहतरी और उनके सशक्तीकरण के के मद्देनजर सफ़र संवाद और गतिविधियों का खुला मंच है। खासकर दिल्ली में सफ़र ने लगातार हीं संवाद का माहौल बनाए रखा है। दिल्ली के अलावा बिहार के कुछ ग्रामीण इलाकों में भी यह संस्था बढ़-चढ़ कर काम कर रही है।
सफ़र ने बिहार के शिवहर जिले के कुछ ग्रामीण युवाओं को सिल्वर स्क्रीन की दुनिया में प्रवेश कराने का जिम्मा उठाया है। आप चौंकिए मत, इन्हें नायक (अभिनेता) नहीं बनाया जा रहा है, बल्कि ये अब फिल्म बना रहे हैं। कुछ फिल्में बनकर तैयार हो चुकी है। उदयपुर की संस्था शिक्षांतर ने इन युवाओं को फिल्म-निर्माण के क्षेत्र में प्रशिक्षण दिया तो इनके अंदर छिपी प्रतिभा उभर कर सामने आ गयी।
अभय, रामप्रवेश और विजय ने यह सिद्ध कर दिया कि कामयाबी को मेहनत और लगन से कोई भी हासिल कर सकता है। ये सभी युवा हैं। उम्र 18 से 20 साल के बीच। लेकिन जब आप इनके द्वारा बनायी गयी लघु फिल्में को देखेंगे तो शायद आप भी बोल पड़ेगें- “क्या बात है.......!” रामप्रवेश , विजय और अभय शिवहर के अपने गांव में शिक्षा घर और क्लब चला रहे हैं। इनमें जोश है, जो इनसे बात करने से साफ झलकता है। विजय कहते हैं
“मेरे पास आइडिया है, मैं आस-पास होने वाली घटनाओं को ध्यान में रखकर फिल्म बना सकता हूं। और हां, मैंने जो फिल्म उदयपुर के वर्कशॉप में बनायी है, वह भी तो कुछ ऐसा हीं कहती है।” इसी अंदाज से ये तीनो बोल रहे हैं। शायद आने वाला वक्त इन्हें और भी मौका देने वाला है। ये तीनो जिस परिस्थिती में बिहार से आये हैं, वो भी काबिले-तारिफ है। गौरतलब है कि बिहार के कई इलाकों में इन दिनों बाढ़ ने भयानक तबाही मचा रखी है। आप भयावकता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि इन लोगों ने 35 किलोमीटर की दूरी 6 घंटे में पूरी की तब जाकर स्टेशन तक पहुंचे। विजय की फिल्म भी बाढ़ से जुड़े सवालों को ही उठाती है। जब विजय से पूछा गया कि अब आगे क्या करने का विचार है तो वो बेबाकी से बोल उठा -
“मैं गांव जाकर सबसे पहले अपनी फिल्म गांव वालों को दिखाऊंगा, ताकि वे समझ सकें कि मैं भी कुछ कर सकता हूं, मुझमें भी फिलींग है........मैं आने वाले समय में सफ़र के सहयोग से अपने गांव में सामुदायिक फिल्म केन्द्र बनाने का प्रयास करूंगा, मुझे आशा है कि गांव वालों को इससे जरूर फायदा पहुंचेगा।”
सफ़र के इस प्रयास की सराहना की जानी चाहिए। सफ़र के राकेश कुमार सिंह, जो सराय- सीएसडीएस से जुड़े हैं, कहते हैं कि इनलोगों ने सचमुच कमाल कर दिखाया है। वे बताते हैं कि “आनेवाले समय में इनके द्वारा बनायी गयी फिल्में बिहार में तो दिखायी हीं जाऐंगी, साथ-साथ दिल्ली में भी इसे सामने लाया जाएगा, हम और भी संभावनाओं पर गौर कर रहे हैं।”
गौरतलब है कि बिहार के गांवों में चल रहे शिक्षा घर और क्लब सफ़र के सौजन्य से हीं चल रहे हैं, और इन सभी सार्थक प्रयासों के पिछे राकेश कुमार सिंह का हीं हाथ है।
समाज मे इस प्रकार के प्रयास हीं सही अर्थों में सार्थक प्रयास कहलाते हैं। आशा की किरण मात्र से कई लोगों में उत्साह छा जाता है। इन लोगों से मिलने और इनकी फिल्मों को देखने आए दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र मयंक कहते हैं,
“बदलाव इसी का नाम है”।
लेकिन सवाल यह उठता है कि विजय, अभय जैसे लाखों युवाओं को ऐसे मौके क्या लगातार मिलते रहेंगे? यदि सफ़र जैसी संस्था और भी संख्या में सामने आए तो शायद तस्वीर जल्द बदल सकती है।
Wednesday, August 22, 2007
सात साल का नाई........हिट है भाई !
झारखंड में एक जिला है हजारीबाग। इसी जिले में एक जगह है- रामगढ़। यहीं रहते है प्रदुमन ठाकुर। जनाब की उम्र है सात(7) साल। आप इनके उम्र पर मत जाऐं, जाना ही है तो इनके सैलून में पधारें। प्रदुमन ठाकुर अपने हाथों से आपके बाल और दाढ़ी बना देगें। इनका हाथ इस कला में पारंगत है। हेयर-कट दो रुपये में और सेव एक रूपये में... है न सस्ता। प्रदुमन की दुकान पर लंबी लाईने लगी रहती है।
प्रदुमन ने यह काम पांच साल की उम्र से शुरू किया था। इसके पिता रामटहल अब 65 साल के हो गये हैं। उम्र के इस पड़ाव में अब उनका हाथ काम करना बंद कर दिया है। तो क्या हुआ, प्रदुमन ने अपने पिता के काम को अब अपना लिया है। माता-पिता के नही चाहने पर भी इस सात साल के लड़के ने पिता के सैलून को संभाल लिया है। प्रदुमन बताता है "मैं अपने परिवार का सबसे बड़ा लड़का हूं। जब बाबूजी काम करने में
असमर्थ हो गये तो हमारे घर की स्थिती डगमगा गयी, उसी समय मैंने निर्णय लिया कि मैं यह काम करूंगा।"
वह दिन भर मे 30 से 35 रूपये कमा लेता है। उसके कई फिक्सड ग्राहक हैं, जो केवल उसी की सेवा लेते हैं। प्रदुमन स्थानीय प्राथमिक स्कूल के कक्षा दो का छात्र है। लेकिन वह मुश्किल से ही पढाई कर पा रहा है। वह प्रतिदिन कक्षा नहीं जा पाता है।
प्रदुमन की मां कुल्लो देवी कहती है "मेरी इच्छा नहीं थी कि प्रदुमन नाई का काम करे। परिस्थति ने उसे यहां पहुंचाया है। मेरी तमन्ना है कि उसके हाथों में कैंची और अस्तूरे के बदले कलम रहे......।"
प्रदुमन ने यह काम पांच साल की उम्र से शुरू किया था। इसके पिता रामटहल अब 65 साल के हो गये हैं। उम्र के इस पड़ाव में अब उनका हाथ काम करना बंद कर दिया है। तो क्या हुआ, प्रदुमन ने अपने पिता के काम को अब अपना लिया है। माता-पिता के नही चाहने पर भी इस सात साल के लड़के ने पिता के सैलून को संभाल लिया है। प्रदुमन बताता है "मैं अपने परिवार का सबसे बड़ा लड़का हूं। जब बाबूजी काम करने में
असमर्थ हो गये तो हमारे घर की स्थिती डगमगा गयी, उसी समय मैंने निर्णय लिया कि मैं यह काम करूंगा।"
वह दिन भर मे 30 से 35 रूपये कमा लेता है। उसके कई फिक्सड ग्राहक हैं, जो केवल उसी की सेवा लेते हैं। प्रदुमन स्थानीय प्राथमिक स्कूल के कक्षा दो का छात्र है। लेकिन वह मुश्किल से ही पढाई कर पा रहा है। वह प्रतिदिन कक्षा नहीं जा पाता है।
प्रदुमन की मां कुल्लो देवी कहती है "मेरी इच्छा नहीं थी कि प्रदुमन नाई का काम करे। परिस्थति ने उसे यहां पहुंचाया है। मेरी तमन्ना है कि उसके हाथों में कैंची और अस्तूरे के बदले कलम रहे......।"
Tuesday, August 21, 2007
गुलजार एक महशूर शायर हैं जो फिल्में बनाते हैं..... गुलजार एक अप्रतिम फिल्मकार हैं जो कविता लिखते हैं

गुलजार एक महशूर शायर हैं जो फिल्में बनाते हैं। गुलजार एक अप्रतिम फिल्मकार हैं जो कविता लिखते हैं। विमल राय के सहायक निर्देशक के रूप में शुरू हुए। फिल्मों की दुनिया में उनकी कविताई इस तरह चली कि हर कोई गुनगुना उठा। एक गुलजार टाइप बन गया। अनूठे संवाद, अविस्मरणीय पटकथाएँ, आसपास की जिन्दगी के लम्हें उठातीं मुग्धकारी फिल्में। परिचय, आँधी, मौसम, किनारा, खुश्बू, नमकीन, अंगूर, इजाजत...हर एक अपने में अलग..।
1934 में दीना (अब पाकिस्तान) में जन्में गुलजार ने रिश्ते और राजनीति- दोनों की बराबर परख की। उन्होंने माचिस और हू-तू-तू बनाई, सत्या के लिए लिखा- गोली मार भेजे में, भेजा शोर करता है......................
कई किताबें लिखीं। चौरस रात और रावी पार में कहानियाँ हैं। कुछ नज्में, साईलेंसेस, पुखराज, चांद पुखराज का, ऑटम मून, त्रिवेणी वगैरह में कविताएँ हैं। बच्चों के मामले में बेहद गंभीर। बहुलोकप्रिय गीतों के अलावा ढ़ेरों प्यारी-प्यारी किताबें लिखीं जिनमें कई खंडों वाली बोसकी का पंचतंत्र भी है। मेरा कुछ सामान.........फिल्मी गीतों का पहला संग्रह था, छैंया-छैंया दूसरा। सनसेट प्वाइंट, विसाल, वादा, बूढ़े पहाड़ों पर या मरासिम...जैसै अल्बम हैं तो फिजा और फिलहाल भी..। यह विकास यात्रा का नया चरण है।
बाकी कामों के साथ-साथ मिर्जा गालिब जैसा प्रामाणिक टीवी सीरियल बनाया..कई अलंकरण पाए। सफर इसी तरह जारी है। फिल्में भी हैं और पाजी नज्मों का मजमुआ भी आकार ले रहा है।
चिट्ठी का पता वही है-
बोस्कियाना, पाली हिल, बांद्रा, मुंबई।
(राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित गुलजार की एक बेहद संवेदनशील फिल्म मेरे अपने की कहानीनुमा प्रस्तुती- मेरे अपने ..से साभार.)
Sunday, August 19, 2007
हिन्दू मुस्लिम दंगा.....और रोज जुतम-जूती, लत्तम-लत्ती से दो अलग-अलग कविताऐं
तरूण कुमार 'तरूण' एक बार फिर अनुभव में हाजिर हैं। वादे के मुताबिक वे अब अपनी कविताऐं यहां देते रहेंगे। आज उनकी दो अलग-अलग मुड की कविता हाजिर है।
तो , पढ़ें, और अपनी प्रतिक्रियाओं से हमें अवगत कराऐं।
हिन्दू-मुस्लिम दंगा
गलतफहमी में दोनों कौमें गिरगिट से ले बैठी पंगा
हिन्दू ने समझा गिरगिट मुसलमां
मुस्लिम ने समझा गिरगिट काफिर
इस खबर से नेताओं का माथा गया फिर
तुरंत जेड श्रेणी का प्रोटेक्शन गिरगिट को मिला
सारा फोर्स प्रोटेक्शन में पिला
सुबह खबर आयी-
नेता गिरगिट भाई-भाई
आखिर रंग बदलने वाले इन जीवों की एक हीं तो है माई........
----------------------------------------------------------------------------------
रोज जुतम-जूती, लत्तम-लत्ती से
जनता की नींद हुई हराम
प्रतिक्रिया स्वरुप उन्होंने,
संसद भवन को घेर लिया सरेआम.
एक विचित्र मांग-
उच्च सदन, निम्न सदन और स्वयं नेता सदन,
सार्वजनिक जगहों से हों दूर
सबसे उपयुक्त स्थल होगा-
कुरूक्षेत्र, पानीपत, प्लासी और हस्तिनापुर
आपकी लड़ाई और सिर-फुटौव्वल से,
भीम, अर्जुन,अब्दाली और अंग्रेजों की शान रहेगी,
जनता शांति से वोट दोने के लिए
दो-चार साल ज्यादा जिएगी...................
तो , पढ़ें, और अपनी प्रतिक्रियाओं से हमें अवगत कराऐं।
हिन्दू-मुस्लिम दंगा
गलतफहमी में दोनों कौमें गिरगिट से ले बैठी पंगा
हिन्दू ने समझा गिरगिट मुसलमां
मुस्लिम ने समझा गिरगिट काफिर
इस खबर से नेताओं का माथा गया फिर
तुरंत जेड श्रेणी का प्रोटेक्शन गिरगिट को मिला
सारा फोर्स प्रोटेक्शन में पिला
सुबह खबर आयी-
नेता गिरगिट भाई-भाई
आखिर रंग बदलने वाले इन जीवों की एक हीं तो है माई........
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रोज जुतम-जूती, लत्तम-लत्ती से
जनता की नींद हुई हराम
प्रतिक्रिया स्वरुप उन्होंने,
संसद भवन को घेर लिया सरेआम.
एक विचित्र मांग-
उच्च सदन, निम्न सदन और स्वयं नेता सदन,
सार्वजनिक जगहों से हों दूर
सबसे उपयुक्त स्थल होगा-
कुरूक्षेत्र, पानीपत, प्लासी और हस्तिनापुर
आपकी लड़ाई और सिर-फुटौव्वल से,
भीम, अर्जुन,अब्दाली और अंग्रेजों की शान रहेगी,
जनता शांति से वोट दोने के लिए
दो-चार साल ज्यादा जिएगी...................
Saturday, August 18, 2007
सुलभ का एक और कारनामा

-एक नयी तकनीक की गयी विकसित
-इससे पहले टू-पिट शौचालय तकनीक जिसने पूरे विश्व में प्रसिद्धि पायी
सफाई के क्षेत्र में सुलभ ने शुरू से हीं कई बड़े कार्य किए हैं। एक ब्रांड के तौर पर सुलभ का कार्य इन दिनों आगे की ओर बढ़ रहा है। न केवल भारत बल्कि विदेशों में यह संस्था बढ़-चढ़ कर काम कर रही है। सफाई के क्षेत्र में पूरी दुनिया में टॉप सुलभ इंटरनेशनल सोशल सर्विस ऑर्गेनाजेशन ने एक बार फिर सफाई के क्षेत्र में एक बड़ा कारनामा किया है।
सुलभ ने अपनी नयी तकनीक के बदौलत गंदी होती जा रही यमुना-गंगा नदी के जल को साफ करने की बात कही है। सुलभ के डॉ. विन्देश्वर पाठक ने बताया कि यह नयी तकनालाजी न केवल नदियों को प्रदूषित होने से बचाएगी, अपितु कुछ दूरी तक रहने वाले लोगों के लिए पानी की समस्या का भी समाधान करेगी।
सुलभ स्वच्छता और सामाजिक सुधार आंदोलन के प्रणेता और इस नयी तकनीक को विकसित करने वाले डॉ. पाठक का कहना है कि हमारी रिसर्च टीम ने तारकोल आधारित जिस अल्ट्रा वॉयलेट वाटर फिल्टर का विकास किया है वह मानव मल से चलने वाली बॉयोगैस प्लांट के अवशिष्ट और अपजल का शोधन करती है। यह शोधित जल रंगहीन, गंधहीन और पैथोजेन से मुक्त होता है।
डॉ. पाठक ने आगे बताया कि इस जल का उपयोग आप मछली पालन में कर सकते हैं, वहीं बागवानी में भी सिंचाई के लिए इस जल का आराम से इस्तेमाल किया जा सकता है। अल्ट्रा वॉयलेट वाटर फिल्टर से एकत्रित जल का आप कई तरह से उपयोग में ला सकते हैं। मसलन इस प्रक्रिया से जमा किए गये जल को तालाब या नदी में छोड़ा जा सकता है। डॉ. पाठक के अनुसार आप यकिन कर सकते हैं कि इससे कोई प्रदूषण नहीं होगा। खासकर इस विधि से गंगा और यमुना जैसी नदियों को प्रदूषण से मुक्ति मिल सकती है।
सुलभ की इस नयी तकनीक को लेकर डॉ. पाठक काफी प्रसन्न नजर आए। गौरतलब है कि 1986 में पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने गंगा कार्ययोजना नाम से एक महत्वाकांक्षी योजना का श्रीगणेश किया था। सुलभ की इस नयी तकनीक को उसी से जोड़ कर देखा जा सकता है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस जल में कई प्रकार के सूक्ष्मतम पोषक तत्व मौजूद रहते हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि यह तकनीक भी सुलभ के टू-पिट शौचालय की तरह लोकप्रियता हासिल कर पाएगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या ग्रामीण विकास मंत्रालय सुलभ के इस नये कारनामे को अपने निर्मल-ग्राम योजना में शामिल करता है। यह सच है कि यदि इस तकनीक का उपयोग ग्रामीण इलाके में युद्द स्तर पर किया जाए तो कई फायदे एक साथ नजर आ सकते हैं।
सुलभ के विषय में और अधिक जानकारी के लिए लॉग-ऑन कर सकते हैं-
www.sulabhinternational.org
www.sulabhtoiletmuseum.org
या आप ई-मेल कर सकते हैं-
Sulabh1@nde.vsnl.net.in
Sulabh2@nde.vsnl.net.in
Tuesday, August 14, 2007
खादी ओ श्वेत खादी
तरूण कुमार 'तरूण' आईएनएस के हिन्दी सेवा के प्रमुख हैं, इसलिए मेरे आका भी हुए। खैर, जनाब अपने कार्यों के अलावे साहित्य में रुचि रखते हैं। एक दिन यूं हीं अपना काम खत्म करने के बाद मैं ब्लाग पे हाथ चला रहा था, तो तरूण सर ने भी इसमे अपनी रुचि दिखायी। फिर क्या था, हम दोनों ब्लाग विषय पर बतियाने लगे। मैंने उन्हें अनुभव में कलम चलाने की गुजारिश की, सर तैयार हो गये। आज उन्होने अनुभव को एक कविता दी है।
कविता में काफी बातें छुपी है....तो खुलकर भी बातें जमकर कही गयी है.
आज आप इसे पढ़े, और हां प्रतिक्रिया भी अवश्य दें। इंतजार रहेगा।
गिरीन्द्र
खादी ओ श्वेत खादी
कितने अश्वेत, कितने धब्बेदार हो गए तुम
बापू की दी हुई पहचान
गिरगिट काया पर हो गई गुम
रक्त के अहम भरे कोटि धब्बे
उत्कोच, घोटाले का अनवरत पान
ओह खादी आज भी तुम पर न्योछावर है ये असंख्य जान
बदला है सिर्फ स्वरूप
शायद अब धागा ही हो गया है कुरूप,
पहले तुम्हारी अपील पर
निकलते थे,
सुभाष, धींगरा और वीर भगत
आज अपील नहीं, तुम्हारे इशारे पर
निकलते हैं कितने बगुलाभगत.................
कविता में काफी बातें छुपी है....तो खुलकर भी बातें जमकर कही गयी है.
आज आप इसे पढ़े, और हां प्रतिक्रिया भी अवश्य दें। इंतजार रहेगा।
गिरीन्द्र
खादी ओ श्वेत खादी
कितने अश्वेत, कितने धब्बेदार हो गए तुम
बापू की दी हुई पहचान
गिरगिट काया पर हो गई गुम
रक्त के अहम भरे कोटि धब्बे
उत्कोच, घोटाले का अनवरत पान
ओह खादी आज भी तुम पर न्योछावर है ये असंख्य जान
बदला है सिर्फ स्वरूप
शायद अब धागा ही हो गया है कुरूप,
पहले तुम्हारी अपील पर
निकलते थे,
सुभाष, धींगरा और वीर भगत
आज अपील नहीं, तुम्हारे इशारे पर
निकलते हैं कितने बगुलाभगत.................
Sunday, August 12, 2007
राह देख देख कर कही ऐसा न हो....................................
मेरे कुछ दोस्त अक्सर मुझे अटपटा मेल करते आए हैं..। कुछ ऐसे मेल जिसे समझ ही नही पाता..।
खैर मेरे एक मित्र, जो बीपीओ में खट रहे हैं, ने एक स्क्रेप भेजा। आरकूट पर आयी यह कविता मुझे अच्छी लगी। कारण यह भी है कि मेरा यह मित्र अंग्रेजीदां बन गया है.... उसे इन दिनों हिन्दी से एक बार फिर प्यार होने जा रहा है। ऐसा मैं मानता हूं। पता नहीं यह उसने कहां से उठाया है.. यह मैं नहीं जानता.। अगर आप जानते हैं तो जरूर बतावें..............
गिरीन्द्र
किसी के इतने पास न जा
के दूर जाना खौफ़ बन जाये
एक कदम पीछे देखने पर
सीधा रास्ता भी खाई नज़र आये
किसी को इतना अपना न बना
कि उसे खोने का डर लगा रहे
इसी डर के बीच एक दिन ऐसा न आये
तु पल पल खुद को ही खोने लगे
किसी के इतने सपने न देख
के काली रात भी रंगीली लगे
आंख खुले तो बर्दाश्त न हो
जब सपना टूट टूट कर बिखरने लगे
किसी को इतना प्यार न कर
के बैठे बैठे आंख नम हो जाये
उसे गर मिले एक दर्द
इधर जिन्दगी के दो पल कम हो जाये
किसी के बारे मे इतना न सोच
कि सोच का मतलब ही वो बन जाये
भीड के बीच भी लगे तन्हाई से जकडे गये
किसी को इतना याद न कर
कि जहा देखो वो ही नज़र आये
राह देख देख कर कही ऐसा न हो
जिन्दगी पीछे छूट जाये ..
खैर मेरे एक मित्र, जो बीपीओ में खट रहे हैं, ने एक स्क्रेप भेजा। आरकूट पर आयी यह कविता मुझे अच्छी लगी। कारण यह भी है कि मेरा यह मित्र अंग्रेजीदां बन गया है.... उसे इन दिनों हिन्दी से एक बार फिर प्यार होने जा रहा है। ऐसा मैं मानता हूं। पता नहीं यह उसने कहां से उठाया है.. यह मैं नहीं जानता.। अगर आप जानते हैं तो जरूर बतावें..............
गिरीन्द्र
किसी के इतने पास न जा
के दूर जाना खौफ़ बन जाये
एक कदम पीछे देखने पर
सीधा रास्ता भी खाई नज़र आये
किसी को इतना अपना न बना
कि उसे खोने का डर लगा रहे
इसी डर के बीच एक दिन ऐसा न आये
तु पल पल खुद को ही खोने लगे
किसी के इतने सपने न देख
के काली रात भी रंगीली लगे
आंख खुले तो बर्दाश्त न हो
जब सपना टूट टूट कर बिखरने लगे
किसी को इतना प्यार न कर
के बैठे बैठे आंख नम हो जाये
उसे गर मिले एक दर्द
इधर जिन्दगी के दो पल कम हो जाये
किसी के बारे मे इतना न सोच
कि सोच का मतलब ही वो बन जाये
भीड के बीच भी लगे तन्हाई से जकडे गये
किसी को इतना याद न कर
कि जहा देखो वो ही नज़र आये
राह देख देख कर कही ऐसा न हो
जिन्दगी पीछे छूट जाये ..
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