Thursday, August 23, 2007

विदेशों में परचम लहराती भारतीय महिलाएं

विदेशों में अपने योगदान के लिए सराहे जाने वाले भारतीयों की कमी नहीं है. इन भारतीयों में पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी हैं। इनमें से कुछ भारतीय महिलाओं से आपको परिचित करा रहे हैं, आईएएनएस की हिन्दी सेवा के संजीव कुमार। जनाब को इंटरनेट का नशा इस कदर है कि समय मिलते हीं खोज पर निकल पड़ते हैं। इसी खोज का नतीजा है, यह रिर्पोट। संजीव कुमार ने हाल हीं में अपना ब्लॉग बनाया है। नाम रखा है- आवाज..। आप क्लिक कर सकते हैं-www.aawaj.blogspot.com
आप ने कहा है कि अब आप इन विषयों पर अनुभव में लगातार लिखते रहेंगे। तो पेश है पहली पाती संजीव के खजाने से.........

श्रिति वडेरा:
भारतीय मूल की अर्थशास्त्री श्रिति वडेरा को ब्रिटेन के प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन ने कनिष्ठ अंतर्राष्ट्रीय विकास मंत्री नियुक्त किया है। इस जिम्मेदारी के तहत उन्हें भारत संबंधी मसलों से भी निपटना होगा। अंतर्राष्ट्रीय विकास विभाग में संसदीय अवर विदेश मंत्री के रूप में वडेरा की नियुक्ति को खास माना जा रहा है। उनकी नियुक्ति इसलिए पक्की मानी जा रही थी क्योंकि वे ब्राउन की करीबी रही हैं। अब वे अफ्रीका समेत कई अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर ब्राउन को सलाह देती रहेंगी।

युगांडा में जन्मी वडेरा का परिवार १९७० के दशक में भारत चला गया था और उसके बाद यह परिवार इंग्लैंड चला आया जहां उन्होंने ऑक्सफोर्ड के समरविले कॉलेज में राजनीति, दर्शन शास्त्र और अर्थशास्त्र की पढाई की। वे लंदन के वित्तीय जिले में कई आर्थिक और वित्तीय पदों पर रह चुकी हैं।
वे यूबीएस वारबर्ग नामक निवेश बैंक में १४ साल बिता चुकी हैं, जहां उनकी ड्यूटी के दायरे में ऋण पुनर्संरचना जैसे मुद्दों पर विकासशील देशों की सरकारों को सलाह देने जैसी जिम्मेवारी शामिल थी।

वडेरा कई वर्षों तक ऑक्सफैम की ट्रस्टी भी रह चुकी हैं। पिछले आठ वर्षों से वे गॉर्डन ब्राउन की सलाहकार के पद को सुशोभित करती रही हैं। साथ ही वे ब्राउन की आर्थिक सलाहकार परिषद की भी सदस्य रह चुकी हैं। इंटरनेशनल फाइनेंस फैसिलिटी फॉर इम्यूनाइजेशन नामक परियोजना के अस्तित्व के पीछे भी उनकी खास भूमिका थी जिसके अंतर्गत गेट्स फाउंडेशन की मदद से बॉन्ड की बिक्री से चार अरब डॉलर जुटाए जाने का लक्ष्य रखा गया। इसका इस्तेमाल ५० करोड बच्चों को विभिन्न रोगों से बचाने के लिए किया जाना था।

वडेरा ब्राउन की विश्वस्त सलाहकार रही हैं। वे वित्त मंत्रालय और लंदन के वित्तीय जिले सीटी के बीच संपर्क सूत्र की भूमिका निभाती रही हैं। पिछले एक दशक में ब्राउन ने जो कुछ भी योगदान दिया है, उसके पीछे वडेरा की खास भूमिका रही है।

सिंथिया मलारवडी:
भारतीय मूल की सिंथिया मलारवडी की उम्र अभी महज २० साल है, लेकिन यह भारत के केरली मूल की यह महत्वाकांक्षी महिला स्विस संसद में अपनी जगह बनाना चाहती हैं और अक्टूबर में होने वाले चुनाव में किस्मत आजमाएंगी। स्विटजरलैंड की ग्रीन पार्टी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया है। अगर मलारवडी चुनाव जीतती तो वे २०० सदस्यीय नेशनल एसेंबली की सदस्य बन जाएंगी। यह स्विस संसद का मुख्य चैम्बर है जिसे भारत की लोकसभा की तरह माना जा सकता है।

पेशे से बैंककर्मी मलारवडी पिछले दो वर्षों से सोलोथॉर्न नगरपालिका की निर्वाचित सदस्य रही हैं। पर्यावरण मुद्दों में गहरी दिलचस्पी और स्विटजरलैंड में विदेशी मूल के लोगों की समस्याओं ने उन्हें राजनीति की ओर आकर्षित किया। मलारवडी कार्बनिक खेती की जबर्दस्त पैरोकार हैं। वे चाहती हैं कि पौधों और वनस्पतियों की रक्षा इंसान की तरह ही की जानी चाहिए। मलारवडी अपने राजनीतिक करियर की प्राथमिकताओं को लेकर बिल्कुल स्पष्टवादी हैं।

केरल के अलपुझा जिले के पी. टी. राजन और अनम्मा दंपती की पुत्री मलारवडी का भारत से संबंध केरल तक ही सीमित है। वे दो-तीन वर्षों में एक बार अपने पुश्तैनी इलाके का दौरा अवश्य करती हैं। वे यह स्वीकार करती हैं कि उन्हें भारतीय खाना और खासकर मां के हाथ का बना खाना पसंद है। उन्ह भारतीय फिल्में देखना, भारतीय पोशाक व जेवरात पहनना पसंद है। उन्होंने कहा कि दुर्भाग्यवश मैं भारत के बारे में जो कुछ भी जानती हैं, वह केरल तक ही सीमित है।

आशा श्रीनिवासन :
एक भारतीय अमेरिकी संगीत निर्देशक अमेरिका की नयी पीढी के लिए प्रेरणास्रोत बन गयी हैं। उन्हें अमेरिका की शीर्ष १५ महिला संगीतकारों की सूची में शामिल किया गया है। २६ वर्षीया आशा श्रीनिवासन ने मैरीलैंड विश्वविद्यालय से डॉक्टर की डिग्री ली है। उन्होंने न्यूयार्क में ऑर्केस्ट्रा ऑफ सट ल्यूक्स, जो अमेरिका का अग्रणी चैम्बर ऑर्केस्ट्रा है, द्वारा आयोजित नोटेबल वूमेन फेस्टिवल के सेलेब्रेशन ऑफ वूमेन कम्पोजर्स में कार्यक्रम पेश किया और इस आधार पर उन्हें शीर्ष संगीत निर्देशकों की सूची में शामिल किया गया। उन्होंने इस कार्यक्रम में अपनी मेधा का परिचय दिया। इस ऑर्केस्ट्रा को संगीत की दुनिया में खास प्रतिष्ठा हासिल है। श्रीनिवासन की रचना ‘दि रिवर नियर सवाथी’ को इसके लिए चुना गया। उन्होंने २० से ३० वर्ष की ६६ अन्य अमेरिकी संगीतकारों को पछाड कर इस सूची में अपनी जगह बनाई। यह प्रतियोगिता दिसंबर, २००६ में हुई।

उताह में जन्मी आशा की परवरिश अमेरिका और भारत में हुई है। उनकी संगीत रचनाएं दक्षिण भारतीय कर्नाटक संगीत से बेहद प्रभावित हैं। वैसे वे इसे अच्छी तरह नहीं जानतीं। लेकिन इस संगीत ने निश्चित रूप से उन्हें प्रभावित किया है। आशा मैरीलैंड विश्वविद्यालय में संगीत निर्देशन के क्षेत्र में पढाई कर रही हैं। वहां वे इलेक्ट्रानिक म्यूजिक का अध्यापन भी करती हैं। वर्ष २००६ में आशा को वालसोम प्रतियोगिता में एक चतुर्वाद्य कल्पिथा के लिए एक पुरस्कार मिला। साथ ही उन्हें प्रिक्सडी इटे कम्प्टीशन में बांसुरीवादन के लिए दूसरा पुरस्कार मिला। साथ ही उन्हें अपनी कम्प्यूटर संगीत रचना एलोन, डांसिंग के लिए भी पुरस्कार मिला। इसे २००५ में सीमस (सोसायटी फॉर इलेक्ट्राॅ-इकॉस्टिक म्यूजिक इन यूएस) में पेश किया गया था।


सीमा सिंह:
सीमा सिंह न्यूजर्सी प्रांत की राजनीति में अपना करतब दिखा रही हैं। सीमा सिंह न्यूजर्सी प्रांत के फेयर एंड क्लीन इलेक्शंस पायलट प्रोग्राम के लिए क्वालीफाई करने वाली पहली भारतीय अमेरिकी महिला उम्मीदवार बन गयी हैं। यह प्रोग्राम एक ऐसी सरकारी प्रणाली है जिसके तहत उम्मीदवारों को राजनीतिक चुनाव अभियान के लिए सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है।

डिस्ट्रिक्ट कंस्टीचुएंसी से डेमोक्रेट पार्टी की उम्मीदवार सीमा सिंह ने जून में इसकी पुष्टि की कि उन्होंने इस पायलट प्रोग्राम के लिए क्वालीफाई करने के उद्देश्य से दस्तावेज सौंप दिया है। क्लीन इलेक्शंस प्रोग्राम के तहत सरकारी वित्तीय सहायता हासिल करने के इच्छुक उम्मीदवार को खास संख्या में पंजीकृत मतदाताओं से वित्तीय योगदान (अक्सर पांच डॉलर तक) हासिल करना पडता है। बदले में उम्मीदवार को सरकार से उसके चुनाव अभियान के लिए रकम दी जाती है और उम्मीदवार यह वादा करता है कि वह चुनाव अभियान के लिए निजी स्रोत से रकम नहीं जुटाएगा। एक बार जब न्यूजर्सी चुनाव कानून प्रवर्तन आयोग ने इन सभी ४०० वित्तीय योगदानों को प्रमाणित कर दिया तो सीमा सिंह को राज्य सरकार से चुनावी अभियान के लिए ४६ हजार डॉलर का अनुदान मिलेगा। यह चुनाव नवंबर में होने वाला है। ४५ वर्षीया सीमा सिंह १९८४ में न्यूजर्सी आई थीं और उन्होंने रटगर्स यूनिवर्सिटी और सेटन हॉल लॉ स्कूल से पढाई की। वे अंतर्राष्ट्रीय कानूनी मामले की वकील रही हैं और उनका कार्य भारतीय और एशियाई समुदायों पर केन्द्रित रहा है। २००२ में उन्हें तब बडी कामयाबी मिली जब वे न्यूजर्सी मंत्रिमंडल में जगह बनाने वाली पहली भारतीय बन गयीं।

3 comments:

हरिराम said...

भारत एकदा विश्वगुरु था। भारतीय विश्व भर में अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करते आए हैं। यह समाचार अपने भारतीय नारियों को प्रोत्साहित करेगा।

Udan Tashtari said...

अच्छी खबर.

मुस्कुराहट said...

गिरीन्द्रजी हम अहां अनुपम खेर के साथ बातचीत सेहो पढ़ने छलहुं...अहांक परिश्रम फल जरूर देत..धन्यवाद