Tuesday, January 10, 2017

बाबूजी की याद आ रही है..

पिता ऐसे पेड़ होते हैं, जिसकी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत होती है कि हम उससे लिपटते चले जाते हैं और अंतत: उसमें खो जाते हैं। इस खो जाने का अपना आनंद है। पता नहीं, हर कोई इसमें खोना चाहता होगा कि नहीं लकिन मैं तो ऐसा जरुर  चाहता हूं।  जब बाबूजी मुझसे बहुत दूर चले गए हैं तब उनकी जड़ों में लिपटने की चाह और बढ़ गयी है।


आज शहर से अपने गाँव जाते वक्त मेरी नजर एक बूढ़े शख्स पर टिक गयी जो लाठी के सहारे कदम बढ़ा रहा था. उम्र उसकी 80 के करीब होगी। बूढ़ा शख़्स सात -आठ साल के एक लड़के को थामे था। वह बूढ़ा उस लड़के को सहारा दे रहा था कि वह लड़का उस बुजुर्ग को थामे था, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन यह अहसास जरूर हुआ कि हम सब जड़ों में लिपटने की जुगत में रहते हैं। यही जुगत शायद जीने की आश को बचाए रखती है।

नहर के एक छोर पर उन दोनों को देखकर मुझे बाबूजी की याद सताने लगी। दरअसल हम सब स्मृति में जीवन तलाशते हैं। स्मृति की दूब हमेशा हरी बनी रहे, हम सब ऐसा सोचते हैं। कोई हमारे बीच से गुजरकर भी मन में एक पगडंडी बनाकर निकल जाता है, जिसकी लकीर पर हम जीवन भर चलते रहने की मंशा पाल बैठते हैं।   लेकिन नियति जो चाहती, होता तो वही है। कबीर की वाणी ऐसे में मुझे याद आने लगती है। गाम का कबीराहा मठ मुझे खींचने लगता है। मैं खुद ही बुदबुदाने लगता हूं- "कबीरा कुआं एक है..और पानी भरे अनेक..। "

फिर जीवन में फकीर की खोज में लग जाता हूं तो कबीर का यह लिखा सामने आ जाता है-  "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे. सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली बला..।"  

आज गाम-घर करते हुए यही सब सोचता रहा। इस बीच धूप की दुनिया बादलों में कब बदल गयी पता भी नहीं चला। दिन में आज धूप खिली थी। ठंड में धूप की आश होती है। ठंड में ओस की बूँदें और कुहासे को लेकर कई यादें हैं मन के भीतर, कई कहानियां हैं, कई नायक-नायिकाएं हैं..लेकिन फिलहाल आलू और मक्का के खेत का कैनवास ही मन में घर बनाए हुए है।  

ठंड में सुबह-सुबह कुहासे में मक्का के खेतों की हरियाली और भी मायावी दिखने लगती है। बाबूजी हमारी साल भर की रोजी-रोटी के लिए जी-तोड़ मेहनत करते थे। ट्रैक्टर से घंटों खेतों को समतल करते थे। देखिए न उन खेतों में अब मक्का के संग कदम्ब अपनी कविता-कहानी हमें सुनाने की जिद कर रहा है। इस अहसास के साथ कि बाबूजी भी ये सब सुन रहे होंगे, मैं आंखें बंद कर उन्हें याद कर लेता हूं। यह जानकर कि मेरा यह भरम भी टूट जाएगा एक दिन...   हर रोज शहर से गांव करते हुए इन दिनों एक साथ ऐसी ही कई चीजें मन में चलती रहती है।

4 comments:

Prince Kumar Sharma said...

बहुत ही सुंदर। ये लाइनें तो सोचने पर मजबूर कर दे रहीं,

कोई हमारे बीच से गुजरकर भी मन में एक पगडंडी बनाकर निकल जाता है, जिसकी लकीर पर हम जीवन भर चलते रहने की मंशा पाल बैठते हैं। लेकिन नियति जो चाहती, होता तो वही है।

Kamlesh Jha said...

आपकी हर एक पोस्ट पढ़ कर मुझे गांव की याद आने लगती है...आपको प्रणाम भैया

Amit Kumar Jha said...

फिर जीवन में फकीर की खोज में लग जाता हूं तो कबीर का यह लिखा सामने आ जाता है- "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे. सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली बला..।"

ओह.....

अपना विचार " एक संदेश एक सुझाव " said...

बहुत सुन्दर लिखें है गिरीनदर बाबू