Friday, December 02, 2016

खेत की पाती, किसान के नाम

मेरे प्यारे किसान
ख़ुश रहो।

ऐसा कम ही होता है जब माँ अपने बेटे से यह पूछे कि ' कैसे हो? ' माँ तो अक्सर यही पूछती है 'ख़ुश हो न ! कोई दिक़्क़त नहीं है न ? ' लेकिन इस बार जब मुल्क में सब पैसे के लिए लाइन में लगे हैं, ठीक उस वक़्त जब तुम्हारी दिक़्क़तों को लेकर सबने चुप्पी साध ली है, तब लगा कि माँ अपने बेटे का हालचाल ले, अपनी संतान को हिम्मत दे। तो इसलिए मैंने सोचा कि आज तुमसे लंबी बातें करूँ।

बेटे, मुझे पता है इस बार तुम अपनी खेती से घर नहीं चला पाओगे, मुझे पता है कि तुमने पैसे के अभाव में इस बार जुताई भी ठीक ढंग से नहीं की है। मुनाफ़े की बात मैं नहीं करूँगी, क्योंकि मुझे पता है कि किसान को उतना ही पैसा मिलता है जितना उसने मुझमें (खेत) लगाया, वह भी यदि मौसम साथ दे तो ।  मुनाफ़े का खाता तो किसी और के पास है। मैं उस 'और' की बात नहीं करूँगी, आज तो बस तुम्हारी बात करूँगी।

माना कि पैसे के अभाव में तुम्हारी खेती ख़राब हो रही है लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं है न कि तुम हार मान लो। याद करो दो साल पहले जब तूफ़ान की तबाही में तुम्हारी खेती लूट गई थी। मराठवाड़ा के किसानों की पीड़ा तो तुम जानते ही हो न ! बेटे, हार मत मानो, लड़ो।

इतना तो तय है कि तुम्हारा चूल्हा नहीं बुझेगा। ये अलग बात है कि इस बार आँगन-दुआर अन्न की बदौलत चहकेगा नहीं लेकिन इसका मतलब ये थोड़े है कि तुम हाथ पर हाथ रखकर केवल सोचते रहोगे। आओ, आगे आओ और नोट के लिए तड़पाने वालों को दिखा दो कि हम बिन खाद के भी अच्छी फ़सल उगा सकते हैं।

मुझे पता है कि मुल्क के हुज़ूर ने बिना तैयारी के बड़े नोटों पर रोक लगा दी लेकिन ये भी सोचो कि किसानों की राय लेकर किस सरकार ने कोई बड़ा क़दम उठाया है ?

बेटे, तुम लोग हमेशा से ठगे गए हो और इस बार भी ऐसा ही हुआ है। 'जय जवान- जय किसान' का नारा बस ठगने के लिए है। ऐसे में तुम सबको अपने लिए ख़ुद ही रास्ता बनाना होगा। ये सच है कि सरकार और बाज़ार ही सबकुछ तय करती है लेकिन यह जान लो, तुम्हारे बिना न सरकार हो सकती है और न ही बाज़ार सज पाएगी।  ऐसे में अब तुम सब ही तय करो कि खेती किसके लिए करना है !

किसान के बेटे-बेटियाँ  भी किसान बने, ठाठ से रहे, यह तब ही होगा जब तुम अपनी खेती से बाज़ार को चलाओगे। याद रहे, बाज़ार तुमसे है न कि तुम बाज़ार से हो। यदि सरकार कोई बड़ा फ़ैसला लेने से पहले उद्योगपतियों से राय ले सकती है तो फिर तुमसे क्यों नहीं ? जानते हो, इसकी वजह क्या है , दरअसल तुम सब संगठित नहीं हो, ऋण के नाम पर बहुत जल्दी ख़ुश हो जाते हो और तुरंत निराश भी। मन मजबूत करो बेटे।

बेटे, निराश मत हो, यह साल भी बीत जाएगा, निराशा के बादल को उड़ा दो। ख़ूब मेहनत करो। माँ तुम्हारे संग है, इस बार उपज कम होगी लेकिन अगली बार सरकार से सवाल करना कि बड़े फ़ैसले लेने से पहले किसान से वह क्यों नहीं कुछ पूछती है।

बात-बात पर डिजिटल और एप्प की बात करने वालों से कहो कि खेत में क़दम रखे, माटी की बात करे। डरो मत, सवाल करो और सरकार से कहो कि किसानी इस मुल्क का सबसे बड़ा रोज़गार सेक्टर है और वह इस सेक्टर को केवल वोट बैंक न समझे।

तुम्हारी
धरती माँ

(Ndtvkhabar.com पर प्रकाशित)

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