Tuesday, February 07, 2012

तुम्हारे लिए

पंखुरी
तुम्हारा हंसना –ऐं ऐं ऐं...
तुम्हारा रोना- उं उं..हउं....
फिर सो जाना
फिर दोनों हाथों से
मुझे छू लेना
तुम्हारे स्पर्श में
नरम गरमी का अहसास
हर बार होता है,
मानो
ऐसा पहली बार होता है
हर सुबह,
उठते ही देखना- टुकटुक,
टुकुर टुकुर 
फिर धीरे से-मुस्कुरा देना
बेटी हो तुम मेरी
मैं पिता
होना पिता
होना बेटी
सबकुछ
तुम्हारे लिए
सब तुम्हारे लिए....
फिर एक दिन
तुमने खिलखिला कर हंस दिया
हम देखने लगे तुम्हें
तुम्हारी तरह
टकटकी लगाके
तुम्हारी अपनी आवाज की हंसी में
हम अपनी आवाज खोजने लगे
तुम्हारे लिए, बेटी
सब तुम्हारे लिए..
फिर आया वह दिन
जब तुमने पहली बार
पेट के बल
लेटना सीखा
दुनिया को
मानो लेटे लेटे
तुमने चख लिया ..
तुम्हीं ने हमें
दिया है अहसास
देखने का
दुनिया को
तुम्हारी पहली

खिल-खिल हंसी की
आवाज में ..
हमने भी दुनिया को
चख लिया,
शहद-शहद
तुम्हारे लिए.. 



(कानपुर, 6 फरवरी 2012, सुबह -पांच बजे) 

10 comments:

नीरज गोस्वामी said...

इस वात्सल्यपूर्ण रचना के लिए ढेरों बधाई स्वीकारें...

नीरज

Archana said...

बहुत मीठी.... बेटी होती ही ऐसी है ...स्नेह से भर देती है मन और ये जीवन..

दीपक की बातें said...

Bhavnao me doobi ek rachna.

Ramakant Singh said...

bachapan sang jina ek sukhad smriti.

Ramakant Singh said...

bachapan sang jina ek sukhad smriti.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
घूम-घूमकर देखिए, अपना चर्चा मंच
लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर लगाई गई है!

Rahul Singh said...

बच्‍चों के साथ एक जीवन और जी लेते हैं हम.

Anil Bajaj said...

इस सुन्दर रचना के लिए बहुत-बहुत, बधाई !

दिगम्बर नासवा said...

शब्दों में वात्सल्य उतर आया है ...
दरअसल बच्चे हिते ही ऐसे हैं ... बहुत सुन्दर रचना ...

रेखा said...

बहुत ही मीठी और प्यारी रचना है आपकी ,भावुक करती हुई सुन्दर प्रस्तुति ...