Sunday, April 11, 2010

रेणु की दुनिया- जिसके बिना हम अधूरे हैं..

'' कई बार चाहा कि, त्रिलोचन से पूछूँ- आप कभी पूर्णिया जिला की ओर किसी भी हैसियत से, किसी कबिराहा-मठ पर गये हैं? किन्तु पूछकर इस भरम को दूर नहीं करना चाहता हूं। इसलिए, जब त्रिलोचन से मिलता हूं, हाथ जोड़कर, मन ही मन कहता हूं- "सा-हे-ब ! बं-द-गी !!"- फणीश्वर नाथ रेणु

“आंखों को वीजा नहीं लगता, सपनों की सरहद नहीं होती, बंद आखों से रोज मैं सरहद पार चला जाता हूं मिलने मेंहदी हसन से।“- गुलजार


रेणु और गुलजार, दोनों को पढ़ते वक्त मन परत दर परत खुलने लगता है। मेरे लिए दोनों ही शबद-योगी हैं। गुलजार जहां आंखों को वीजा नहीं लगता..बता रहे हैं वहीं रेणु अपने जिले में रहकर भी दुनिया की बात बताते हैं। यही खासियत है दोनों शबद योगी की। दोनों ही सीमाओं को तोड़ना सीखाते हैं।


साहित्य की तकरीबन सभी विधाओं में बराबर कलम चलाने वाले रेणु आज ही के दिन 11 अप्रैल 1977 को अनंत की ओर कूच कर गए थे। वे भले ही 33 वर्ष पहले हमसे दूर चले गए लेकिन अपनी तमाम कृतियों के कारण वे आज भी हमारे लिए जीवंत हैं।

मैला आंचल, परती परिकथा, रसप्रिया तीसरी कसम, पंचलाइट जैसी रचनाएं कब हमारे अंदर बैठ गई, हमें पता ही नहीं चला। ठीक गुलजार की रूमानियत की तरह, कोल्ड कॉफी के फेन की तरह। रेणु की दुनिया हमें प्रशांत (मैला आंचल का पात्र) की गहरी मानवीय बेचैनी से जोड़ती है, हीरामन (तीसरी कसम का पात्र) की सहज, आत्मीय आकुलता से जोड़ती है। वह हमें ऐसे रागों, रंगों, जीवन की सच्चाई से जोड़ते हैं जिसके बिना हमारे लिए यह दुनिया ही अधूरी है। अधूरे हम रह जाते हैं, अधूरे हमारे ख्वाब रह जाते हैं।

रेणु की दुनिया में जहां प्रशांत है तो वहीं जित्तन भी है। ठीक गुलजार के चांद की तरह। परती परिकथा का जित्तन ट्रैक्टर से परती तोड़ता है, रेणु असल जिंदगी में कलम से जमीन की सख्ती तोड़ते हैं। प्राणपुर में जित्तन परती को अपऩे कैमरे की कीमती आंखों से देख रहा है। किसान के पास इतनी कीमती आंख तो नहीं है पर उसकी अपनी ही आंख काफी कुछ देख लेती है। यह किसान और कोई नहीं अपने रेणु ही हैं।


रेणु की जड़े दूर तक गांव की जिंदगी में पैठी हुई है। ठीक आंगन के चापाकल पर जमी काई (हरे रंग की, जिस पर पैर रखते ही हम फिसल जाते हैं..) की तरह। वे कभी-कभी शहर में भी हमें गांवों का आभास करा देते हैं। उनका मानना था कि ग्राम समुदायों ने तथाकथित अपनी निरीहता के बावजूद विचित्र शक्तियों का उत्सर्जन किया है। वे संथाली गीतों के जरिए कई बातें कहा करते थे। उन्होंने एक संथाली गीत के जरिए कहा – जिदन संकु-संगेन , इमिन रेयो-लं सलय-एला। (सुख के जीवन के लिए, यहां आइए, यहां ढूंढ़ना है और पाना है..)

रेणु रोज की आपाधापी के छोटे-छोटे ब्योरों से वातावरण गढ़ने की कला जानते थे। अपने ब्योरो, या कहें फिल्ड नोट्स को वे नाटकीय तफसील देते थे, ठीक उसी समय वे हमें सहज और आत्मीय लगने लगते हैं।
यही वजह है कि वह त्रिलोचन को इस तरह याद करते हैं-  कबीर को पढ़ते समय मेरा मन "भाई साधो" का हो जाता है। फारसी के कवि जलालुद्दीन रूमी का मैंने नाम सुना ही है। अर्थात विद्वानों के लेखों में उद्धृत उनकी पंक्तियों के भावानुवाद को पढ़कर ही रोम-रोम बजने लगते हैं। बंगाल के प्रसिद्ध बाउल गायक लालन फकीर के गीतों को सुनते समय "देहातीत" सुख का परस सा पाया है और त्रिलोचन के सॉनेट पढ़ते समय यह देह यंत्र "रामुरा झिं झिं" बजने लगता है और तन्मय मन को लगता है।


त्रिलोचन (जी) को देखते ही हर बार मेरे मन के ब्लैक बोर्ड पर, एक अगणितक असाहित्यिक तथा अवैज्ञानिक प्रश्न अपने-आप लिख जाता है- वह कौन-सी चीज है, जिसे त्रिलोचन में जोड़ देने पर वह शमशेर हो जाता है और घटा देने पर नागार्जुन...............
("स्थापना" में सितम्बर 1970 में प्रकाशित "अपने-अपने त्रिलोचन" से ....)


रेणु की खासियत उनका रचना संसार है। वे अपने पात्रों और परिवेश को एकाकार करना जानते थे। रेणु जैसे महत्वपूर्ण कथाशिल्पी का पत्रकार होना अपने आप में एक रोचक प्रसंग है। उन्होंने अपने रिपोतार्जों के जरिए हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध किया है। एकांकी के दृश्य पुस्तक में उनके रिपोर्जों को संकलित किया गया है। उन्होंने बिहार की राजनीति, समाज-संस्कृति आदि को लेकर पत्रिकाओं के लिए स्तंभ लेखन किया था।

चुनाव लीला- बिहारी तर्ज नाम से रेणु की एक रपट 17 फरवरी 1967 को प्रकाशित हुई थी। इसमें उन्होंने लिखा था-  पत्र और पत्रकारों से कोई खुश नहीं है। न विरोधी दल के लोग और न क्रांगेसजन। एक पत्र को विरोधी दल की सभा में मुख्यमंत्री का पत्र कहा गया। और उसी पत्र के पत्रकार को मुख्यमंत्री के लेफ्टिनेंट ने धमकियां दीं। मुख्यमंत्री को शिकायत है कि पत्रकार उनके मुंह में अपनी बात पहना देते हैं। अ-राजनीतिक लोगों का कहना है कि चुनाव के समय पत्रकारों की पांचों ऊंगलियां घी में रहती हैं...।

रेणु को इस रूप में पढ़ते हुए, जहां सबकुछ बेबाक लगता है, मुझे गुलजार भी याद आने लगते हैं। रेणु के ठेठ शब्दों में खोकर गुलजार से मिलना, एक अलग ही अनुभव है। गुलजार जब यह कहते हैं-

कुछ रिश्ते नाम के होते हैं/ रिश्ता वह अगर मर जाये भी/ बस नाम से जीना होता है/बस नाम से जीना होता है/रिश्ते बस रिश्ते होते हैं………

इसके तुरंत बाद दूसरा शबद योगी, सामने आ जाता है..मैं मन ही मन बुदबुदाता हूं- "सा-हे-ब ! बं-द-गी !

4 comments:

सुशील कुमार छौक्कर said...

अभी पिछले दिनों ही उनका लिखा एक हिंदी में अप्रकाशित लेख पढा उनकी पीड़ा शब्दों से होती हुई अंदर तक झकझोर रही थी उसमें वो गाँव को छोडकर पटना में रहने का जिक्र करते है। काश कि रेणुजी इतनी जल्दी ना जाते..........

रवि कुमार, रावतभाटा said...

आपने याद किया...
और याद दिलाया...आभार...

बेहतर आलेख....

Sadan Jha said...

अभी घर से भाग कर आफिस आया कि बैठकर एक लेख को पूरा कर लूँ. प्रकाशन में जाना जरुरी है और अभी भी महज मसला ही जुटा पाया. लेकिन यहाँ आते ही गिरीन्द्र का stetus बता रहा था कि रेणु पर कुछ लिख मारा है ब्लाग पर और फिर सब कुछ बिसरा कर अनुभव पढ़ने बैठ गया. रेणु और गुलजार दोनों ही प्रिय दोनों ही को पढ़कर मेरा मानस बना है. शायद मेरे जैसे बहुतेरे हैं. दोनों में एक अजीब किस्म की रहस्यात्मकता है. लेकिन गुलजार जहाँ इस दुनिया को सूफियों के समान देखते हैं और परोसते हैं, पिरोते हैं ऐसे जैसे की दुनिया घने कोहरे की चादरों में लिपटा हो वहीं रेणु में यह रहस्यवाद बहुत अलग तरह से आता है. उनके लिए दुनिया किसी चादर में लिपटा नहीं है. दुनिया कराकती धुप से परेसान है. रूमानियत हर तरफ बेचारगी में, भूख और गरीबी में कैद है. लेकिन रेणु भी रहस्यात्मक हैं. यह दुनिया को बयां करने के क्राफ्ट को लेकर. इनके यहाँ शव्दों की अर्थ-बहुलता से जीवन की आन्तरिकता का अहसास होता है. रेणु और गुलजार में यह फर्क इस कदर है की गुलजार पहले से गढ़े भाषाई थाती की गरिमा का मान रखते हैं, व्‍याकरण उनके लिये पूजनिय है। रेणू इस परंपरा, इस थाती को तोड़ते मरोड़ते हैं उनके लिये किरदारों का अनुभव, उनके कथानक का भाषाई परिवेश सबसे अहम है एक ही वाक्‍य में तदभव, तत्‍सम, देशज, विदेशज और शुद्‍ध संस्‍कत सभी कुछ।
गुलजार की भाषा जहां बहुत सहजता के साथ सीमा पार जाती है रेणू अपने पाठकों को अपने पात्रों के भौगोलिक, सामाजिक और अतित की ओर खींचते हैं। गुलजार के लिये भूगोल मायने नहीं रखता है वे अंतराष्‍ट्रीय है, यूनिवर्सल हैं जबकि रेणू भूगोल की मर्यादा को समझते हैं उनके यहां जगह, स्‍थानिकता स्‍पेस में विलीन नहीं होता। क्षेत्रियता महज उपस्‍थित मात्र नहीं है यह हमारे भाषाई संस्‍कारों को परिमार्जित करती चलती है हमे मजबूर करती है कि हम भाषा-भंजक बने, अनुभबों को बयाँ करने के रहस्‍य को उदगार देने हेतु। अनुभव जो अपने क्षेत्रियता में लिप्‍त है। अनुभव जो आपको ठोस जमीन पर ला खड़ा कर देता है अनुभव जो महज गुलपोश के महक की तरह हवा में नहीं तैरता है।

विनीत कुमार said...

गिरीन्द्र
आपको पढ़ते हुए अक्सर महसूस करता हूं कि तुम्हें 'लेखनी की जमावन' जिसे दही जमावन या जोरन के संदर्भ में प्रयोग करते हैं,हाथ लग गयी है। ये जमावन खुद रेणु की लेखनी की है। इसे मैं बाकी के लोगों की तरह अनुगामी लेखन इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि जमावन का महत्व बस जमने तक है फिर वो अपना असर छोड़ देती है। मैं रेणु से तुम्हें जोड़ते हुए भी,तुम्हें सेल्फ को उनकी लेखनी में इमर्ज नहीं करना चाहता। इसलिए सिर्फ जमावन कह रहा हूं।

हरहराती हुई बाढ़ के बीच जैसे जवान हाथ भी लाचार हो जाते हैं,वो पानी के बीच पत्ते की तरह अस्तित्व के खत्म होने की तरह डोलने लग जाता है,तुम्हारा लेखन उन्हीं हाथों की अंजुरी है जो अपने भीतर ज्यादा से ज्यादा समेटकर बचाने की कोशिश में लगा है। मुझे न तो मौजूदा माध्यमों के हवाला देने की जरुरत है और न ही बचाने के नाम पर नास्टॉलजिक होने की लेकिन इतना जरुर कह सकता हूं कि बाजिब किस्म से पुराना जो कुछ भी बच जाए,उसके लिए दम तक तुम्हारे शब्द जिद करते हैं,बहुत ही शांत लेकर असर के लिहाज से से छीना-झपटी करते हैं।
विनीत