Tuesday, February 14, 2012

हेलमेट के बहाने ‘कौन ठगवा नगरिया लूटल हो’


सुशील भाई के फेसबुक पन्ने से उठाई गई तस्वीर
कौन सी याद कब धमक जाती है पता ही नहीं चलता, क्योंकि हम उसके बारे में तबतक सोचते ही नहीं कि एकाएक वो याद आंखों के सामने दौड़ने लगती है। आभासी दुनिया में लगातार घुमते हुए आपके कथावाचक को अंचल की यादें ऐसे ही वक्त पर सबसे अधिक आती है।

फेसबुक के आभासी जंगल में विचरते हुए अपने अजीज सुशील झा के अटरिया पर एक सफेद रंग का हेलमेट कथावाचक को दिख जाता है, इसे देखते ही वह भावुक हो जाता है। सफेद रंग के हेलमेट को देखते हुए उसे पहले काले रंग के राजदूत की याद आती है और उस पर सवार सफेद धोती-कुर्ते में बैठे शख्स याद आने लगते हैं।

आज का यह पोस्ट उसी स्मृति की देन है और उस रास्ते पर ले जाने का काम सुशील भाई ने किया है। नब्बे के शुरुआती साल में जब हॉस्टल में जिंदगी की ठुमरी हुआ करती थी
, जहां आपका कथावाचक ता-ता थैया किया करता था, घर से दूर रहा करता था। हालांकि वहां की यादों में घर से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है।

वैसे यह सच है कि यदि आप बहुत ही कम उम्र में होस्टल के अहाते में दाखिल होते हैं तो आप यह अच्छी तरह जान लेते हैं होस्टल की जिंदगी आप पर ताउम्र हावी रहेगी. एक ऐसा परिवेश
जहां सबकुछ होस्टल ही होता है। लेकिन इन सबके बावजूद जब कभी होस्टल के कैंपस में अभिभावक-नुमा कोई आता है तो आंखें जरुर नम होती है।

एक तो बचपना
, उस पर से दिल में घर को लेकर उठने वाली हूक..ये सभी कभी कभी आपके कथावाचक के मन में ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ती थी। ऐसे में कभी कभी बाबूजी भी आते थे होस्टल, शायद अभिभावकों की बैठकों में हिस्सा लेने या फिर साल भर की फीस जमा करने। खैर, तब उनकी पहचान अलग अंदाज में होती थी, जो गुस्साते थे, क्रोध से जिनकी अजीब यारी थी।

लेकिन इन सबके साथ
, उनकी यारी एसकोर्ट कंपनी की मोटरसाइकिल राजदूत से भी थी, जो आज भी है। बीआरके-5485 नंबर का मोटरसाइकिल। आज भी वह अहाते में खड़ा है। बाबूजी भी हैं लेकिन स्वास्थ्य कारणों से मोटरसाइकिल से दूर ही रहते हैं। उनके पास सफेद रंग का हेलमेट होता था,  जो अब संदूक में रखा है। दो तीन साल पहले उसे कपड़े में लपेट कर कथावाचक ने संदूक में छोड़ दिया था लेकिन सुशील झा के फेसबुक अटरिया पर सफेद रंग का उनाक हेलमेट देखकर न जाने क्य़ों उस संदूक की भी याद आने लगी है जो सफेद रंग के हेलमेट को खुद में छिपाकर रखा है।

जब यादें
, जेहन में काफी तेजी से चहलकदमी करने लगती है तब अंतर्मन में यह सूफियानी पंक्ति "ऐसो रंग,  रंग दो, रंग नाही छूटे, धोबिया धोय चाहे सारी उमरिया निजाम.." गूंजने लगती है। मन के गणित की किताब में सवाल दर सवाल उठने लगते हैं। एक हेलमेट, एक फेसबुक और उसके एवज में न जाने कितनी यादें। कथावाचक कुछ देर के लिए खो सा गया है।

कथावाचक के स्मृति के एलबम में मन हमेशा से
आत्मालाप करता रहता है। कथावाचक को कबीर,  बार -बार कुछ याद दिलाते हैं। वैसे अभी उसे कुमार गन्धर्व जी का गाया कबीरदास का एक अदभुत भजन याद आ रहा है, पता नहीं यही कबीर-वाणी उसे क्यों अभी याद आ रही है-

कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।
चंदन काठ के बनल खटोला
ता पर दुलहिन सूतल हो।
उठो सखी री माँग संवारो
दुलहा मो से रूठल हो।
आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा
नैनन अंसुवा टूटल हो
चार जाने मिल खाट उठाइन
चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो
जग से नाता छूटल हो

यहां इसे सुन सकते हैं। 

5 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

हम त सोचे थे कि एकरा पॉडकास्टिंग कर रहे होंगे!

गिरीन्द्र नाथ झा said...

समझा नहीं सर @इष्ट देव सांकृत्यायन

डॉ.अभिज्ञात said...

.............मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ।.....प्रिय भाई यह कामेंट आपने अपने ब्लाग के शीर्षक के नीचे इस तरह से दिया है कि आपका वक्तव्य लगे.. क्या यह केदारनाथ सिह की कविता का अंश नहीं है। और यदि है तो उनका नाम देने में आपको कोई हर्ज नहीं होना चाहिए।

डॉ.अभिज्ञात said...

मुझे लगा था यह कविता वेब जगत में नहीं है किन्तु खोजा तो वह नेट पर मिल गयी। उसका लिंक दे रहा हूं
http://pareshparmar.blogspot.in/2010/06/blog-post_13.html#!http://pareshparmar.blogspot.com/2010/06/blog-post_13.html
कृपया मेरी बात को अन्यथा न लें। आपके इरादे पर मुझे शुबहा नहीं है। आपकी टिप्पणियां अच्छी और पठनीय हैं। बस बातों का ध्यान रखे तो और अच्छा हो.

Girindra Nath Jha/ गिरीन्द्र नाथ झा said...

जी. उन्हीं की पंक्ति है @डॉ. अभिज्ञात