Friday, December 23, 2011

जीवठ साकेतानंद, जीवठ आनंद


साकेतानंद सिंह
साकेतानंद जी नहीं रहे, मेरे लिए उनका न रहना एक ऐसी परती जमीन की कहानी की तरह है, जिसपर इस बसंत में गुलाब के पौधे लगाने की बारी थी। उन्हें वही पसंद था जो शुभ है और जो सुंदर है। उनमें जीवठ बने रहने की ललक थी, वो किताबों की दुनिया के समानांतर एक लोक दुनिया गढ़ते रहे, आजीवन। बस एक मुलाकात और मेरी सारी परती भूमि लहलहा उठी थी। एक तरफ मानो सरसों के फूल खिले थे तो दूसरी ओर बांस के झुरमुट, जो कह रही हो कि परती में भी हरियाली होती है, नजर चाहिए बस।

आज यह पोस्ट लिखते वक्त ऐसी कई यादें मन के पर्दे पर चल रही है, जिसके केंद्र में साकेतानंद ही हैं। कुछ ही दिन पहले की तो बात है, जब हम उनके पूर्णिया निवास –
पुनश्च पहुंचे थे। मेरे बाबूजी मेरे साथ थे। हम उनके अहाते में दाखिल हुए तो बड़े-बड़े अक्षर में लिखा – पुनश्च पढ़ने को मिला। मेरी नजर उसी अक्षर के आसपास घुम रही थी कि तभी साकेतानंद सामने आए।

बाबूजी उन्हें बडे भाई मानते रहे हैं। यह कथाकार, जिस परिवार से ताल्लुक रखता आया है, उसके प्रति बाबूजी की तरह हमारे दिल में भी श्रद्धा के भाव रहे हैं लेकिन हमारे श्रद्धा भाव  के हिस्से में कथा और खासकर अंचल के प्रति मोह हमेशा हावी रहा है।
 "यश-अपयश हो, लाभ-हानि हो सुख हो अथवा शोक, सभ सँ' पहिने मोन पडैत अछि, अपने भूमिक लोक।   साकेतांनद हमारे लिए यही भाव लेकर हमेशा सामने आए। उनकी उपस्थिति मेरे लिए भूमिपुत्र की भांति रही है।

उस दिन पहली ही मुलाकात में ही पहला सवाल उन्होंने पूछा- इन दिनों क्या पढ़ रहे हैं
? संथालों को लेकर आपकी राय क्या है? किताब के अलावा एक बड़ी दुनिया है, उसके बारे में क्या सोचते हैं?   उनका परिसर हरियाली से इतना पूर्ण था कि मैं उनके सवालों के साथ तुरंत ही सामंजस्य स्थापित कर लिया। फिर क्या, बातों ही बातों में कोसी की कथा भूमि हमारे सम्मुख उपस्थित हो गई। तीखे बहस हुए तो मिठी चाह की चुस्की भी। बाबूजी बस चुपचाप हम दोनों की बात सुन रहे थे।

मैं उनकी कथा दुनिया की चर्चा नहीं करुंगा और न ही साहित्य अकादमी पुरस्कृत उनकी पोथी का, मैं तो बस उस साकेतानंद की चर्चा करुंगा जो कैंसर से जूझते हुए भी जीवन को उसी चाल से चलाते रहे, जैसा वह अपनी जवानी के दिनों में चला रहे होंगे। उनके करीबी कहते हैं कि कथा, संगीत और फोटोग्राफी उनकी जान रही लेकिन मैं उन्हें जीवठ मनुख के तौर पर याद करुंगा।


उस मुलाकात में उन्होंने मुझे लिखने को लेकर एक कहानीनुमा बात बताई, जो इस तरह है
(मुझे आज भी हूबहू याद है)-
लिखने की बाध्यता में कभी कभी अच्छा भी लिखा चला जाता है। मुझे अपनी ऐसी कई रचनाएं याद आ रही है, जिसे मैंने अत्यधिक दवाब और तनाव में लिखा था। बडे लेखक जैसे रेणुजी, राजकमल जी यात्री जी, ये सभी तो आर्थिक दवाब में भी लिखते रहते थे। कभी संपादक का तो कभी प्रकाशक का तगादा, वे लिखते रहते थे। दरअसल पैसा बहुत बड़ा मोटिभेटिंग फैक्टर होता है। मुझे तो आज यह लग रहा है कि पैसे ने यह निर्णय ले लिया है कि कौन लिखेगा, कब लिखेगा लेकिन यह नहीं फैसला ले सका है कि क्या लिखेगा? यह तुम जान लो कि यह फैसला लेखक ही लेगा।


साकेतानंद जी का तकनीकी दुनिया से उतना लगाव था जितना कागज कलम से। वे ब्लॉग लिखा करते थे, फेसबुक पर प्रतिक्रिया देते रहते थे। उनके चले जाने से ये दोनों अड्डे मुझे अजीब से लग रहे हैं। पूर्णिया जिले के किसी ऐसे गांव की तरह, जिसके बीच में नहर के गड्ढे तो हैं लेकिन बिन जल के। उनके विदा होने की खबर सुनते ही मैं खो सा गया। दरअसल साकेतानंद के जीवठ आनंद का मैं प्रशंसक हूं। आंख की कोर नम हुई, तभी सदन सर की एक टिप्पणी याद आई, जिसे उन्होंने मेरे एक पोस्ट के जवाब में लिखा था-

मौत जटिल जरुर है लेकिन अंत नहीं। पश्चिम से आई आधुनिकता में जिसमें पढ़कर हम आगे बढ़ रहे हैं. वहाँ यह अंत है, लेकिन जिस परिवेश के बीच हम पले-बढें हैं वहां यह महज कायांतरण है। इस फर्क से हम सभी वाकिफ रहते हैं लेकिन केवल सोच के स्तर तक ही। भीतर से कायांतरण को महज दिल को बहलाने का जरिया समझ बैठते हैं। हम धीरे धीरे उस
थाती को खोते जा रहे हैं जहाँ मौत अंत नहीं है, एक यात्रा की शुरुआत भर है…।

1 comment:

Arbind Jha said...

एकदम सच कह रहे है मौत जटिल जरुर है लेकिन अंत नहीं ये महज एक सुरुवात है यात्रा की आस्था की... साकेतानंद जी को हमारे तरफ से कोटि कोटि नमन और अन्तिम स्राधांजलि...