Sunday, February 08, 2009

ये है दिल्ली मेरी जान – 2

“दिल्ली से रिश्ता रखोगे तो पहचान पाओगे कि आखिर बदलाव किसे कहते हैं।“ मेरे कान में पहली दफे यह शब्द दिल्ली विश्विवद्यालय के नार्थ कैंपस में आया। कॉलेज में पहला साल था, सबकुछ नया लग रहा था। एक अजनबी झोंके से मन पहली बार बावरा यहीं हुआ। जाना यहीं पहली बार आवारगी क्या होती है। जाने कितने शब्द मन और तन के डिक्शनरी में यहीं जुड़े हैं।


मुखर्जी नगर और वहां के बत्रा सिनेमा हॉल की ऊंची सीढ़ी पर बैठे हम दोस्तों के संग आवारगी किया करते थे। मुखर्जी नगर भाया कैंप और न जाने कहां से कहां हम धमाल मचाने जाया करते थे। बड़े बुजुर्ग कहा करते थे- समय जाया न करो, और एक हम ऐसे कि जाया करने और हंगामा बरपाने के लिए आतुर जैसे गुलाम अली साब कहते हैं-

हँगामा क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है, डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है।


साल दर साल हम यहां बनते और बिगड़ते चले जा रहे थे, एक ऐसा भी वक्त आया जब कॉलेज हमसे छूटा और हम जिंदगी के संग हाथ और और हाथ में रूपये कमाने की जुगत में लग गए। डीटीसी बस का पास छूटा और कॉलेज की दादागिरी से दूर हटकर जेब से पैसे निकालकर कंडक्टर को देने की शुरुआत हो गई।


नौकरी हमारी प्राथमिकता हो गई। यहीं से विषयांतर हो गई जीवन की मस्ती। ऑफिस और कमरे के बीच गांव की याद कभी तेज होती, मध्यम होती और कभी दूर भी हुई। छुट्टी की जुगत में कभी-कभार गांव की ओर भी रूख करुं इसकी भी याद जैसे छूटती गई।


जारी है।

5 comments:

अनिल कान्त : said...

विद्यार्थी जीवन .... कोल्ल्गे के दिन ...जीवन को जीने के लिए मसक्कत ....और गाँव का भूलना ..याद करना आपने बखूबी दर्शाया है ...


अनिल कान्त
मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

सुशील कुमार छौक्कर said...

हँगामा क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है, डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है।

जीवन में पता नही हर चीज का समय निर्धारित होता क्यों है? अच्छा गुजरी यादों को पढकर।

mamta said...

इसी का नाम तो जिंदगी है ।
यादों को खूबसूरती से संजोया है ।

गिरीन्द्र नाथ झा said...

आप सभी का यहां आने के लिए शुक्रिया।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बढ़िया यादे समेटी है आपने दिल्ली के संग