Saturday, September 05, 2009

आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है

एक दिन कहने लगा मुझसे गगन का चांद यूं,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है।
उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता,
और फिर बेचैन हो जगता न सोता है।।
दिनकर

4 comments:

नीरज गोस्वामी said...

बेमिसाल पंक्तियाँ..वाह
नीरज

Ravi Srivastava said...

बहुत सुन्दरता पूर्ण ढंग से भावनाओं का सजीव चित्रण... बधाई स्वीकारें।

आप के द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं मेरा मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन करती हैं।
आप के अमूल्य सुझावों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...
Link : www.meripatrika.co.cc

विनीत उत्पल said...

बहुत खूब

विनय ‘नज़र’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति