Wednesday, March 04, 2009

फिल्म ऐसी ही मन को भाती है ..आख़िर चुभती जो है

कुछ फिल्में देखने के बाद आप तत्काल जो अनुभव करते हैं, ठीक उसके विपरित कुछ फिल्में ऐसी भी होती है जो आपको लंबे समय तक अनुभव कराती रहती है कि आप जो कुछ कर रहे हैं, या देख रहे हैं उसमें बदलाव लाने की जरूरत है। ऐसी ही एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म इंडिया अनटच्ड है, जिसे यहां दोबारा देखने का मौका मिला। पहली बार दिल्ली विश्वविद्यालय के ग्वायर हॉल में इस डॉक्यूमेंट्री को देखा था।

छुआछूत के मुद्दे पर बनी एक प्रमुख डॉक्यूमेंट्री फिल्म इंडिया अनटच्ड की विशेष स्क्रीन बिते हफ्ते दिल्ली के दो प्रमुख शिक्षण संस्थानों जामिया मिलिया इस्लामिया और दिल्ली विश्वविद्यालय में किया गया। जिसका आयोजन सफर नामक गैर सरकारी संगठन ने किया था।


फिल्म की स्क्रीनिंग में जामिया मिलिया में बड़ी संख्या में छात्रों ने हिस्सा लिया। फिल्म का निर्देशन स्टालिन के. ने किया है। उन्होंने विभिन्न धर्मों में होने वाले छुआछूत को फिल्म में दिखाया है। फिल्म के विशेष प्रदर्शन के मौके पर स्टालिन भी मौजूद थे। यह फिल्म एक घंटे 48 मिनट की है। फिल्म में भारत के अधिकतर हिस्सों में छुआछूत और जाति व्यवस्था के बढ़ते चलन को दिखाया गया है। दिल्ली से लेकर केरल तक पिछड़ी जातियों के साथ होने वाले भेदभाव को स्टालिन ने फिल्म में समेटा है।


जामिया और दिल्ली विश्वविद्यालय में स्क्रीनिंग के दौरान छात्रों ने फिल्म से जुड़े कई सवाल स्टेलिन के सामने उठाए। स्क्रीनिंग के बाद जामिया में छात्रों के बीच समता मूलक समाज पर बहस छिड़ गई। भारत के आठ राज्यों और यहां के प्रमुख चार धर्मो में होने वाले भेदभावों पर स्टालिन ने प्रकाश डाला।


फिल्म के बारे में स्टालिन से जब बातचीत हुई तो उसने बताया, "भारत में आज भी किस प्रकार छुआछूत को माना जा रहा है, मैंने उसे ही प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। मैंने इसके लिए चार वर्षो तक भारत के विभिन्न राज्यों की यात्रा की।"


फिल्म में सदियों से चली आ रही जाति व्यवस्था के विभिन्न पक्षों को दिखाया गया है। स्टालिन गुजरात के एक प्रसंग में फिल्म में दिखाते हैं कि कैसे पटेल (सवर्ण) की गाय का दूध स्थानीय बाजार में बिकता है और दलितों की गाय का दूध बाहर के राज्यों में भेज दिया जाता है। दरअसल, स्थानीय लोग दलितों की गायों का दूध नहीं पीते हैं। स्टालिन ने कहा, "ये गुजरात की कॉपरेटिव सोसाइटी की हकीकत है।"


फिल्म में बनारस के एक पंडित को यह कहते दिखाया गया है, "दलितों को शिक्षा प्राप्त करने का कोई हक नहीं है।" इसी प्रकार दक्षिण भारत के मदुरई के एक गांव में ऊंची जाति के घर के सामने से गुजरते वक्त दलितों को अपने चप्पल उतारने पड़ते हैं। इस प्रकार की कई हकीकतों को स्टालिन ने अपनी फिल्म में शामिल किया है।


स्टालिन फिल्म निर्माता-निर्देशक के साथ-साथ एक मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं और जाति व्यवस्था को लेकर उनकी यह दूसरी फिल्म है। स्क्रीनिंग के आयोजक सफर के प्रमुख राकेश कुमार सिंह ने कहा कि बेहतर समाज के निर्माण के लिए वह राजधानी और देश के अन्य हिस्सों में आगे भी इस प्रकार के काम करते रहेंगे।

1 comment:

सुशील कुमार छौक्कर said...

एक अच्छा प्रयास। काश कि ये चीजें बदलें। कुछ बदलाव तो आ रहा है। पर कुछ सीमित क्षैत्र में ही है वह बदलाव।