Monday, February 23, 2009

छोटे दिल की छोटी सी आशा ने कहा - जय हो

आज सुबह से ही ऑस्कर में डूबा हूं। ऐसा लग रहा है मानों ऑस्कर इंडियन हो गया हो। वैसे टीवी स्क्रीनों पर जय हो की गूंज जारी है। रहमान का बुखार सभी पर चढ़ कर बोल रहा है। वैसे पिंकी भी स्माइल कर रही है। उसके जीवन पर बनी डॉक्यूमेंट्री ने भी बाजी मारी है। रहमान के बारे में गुलाबी शर्ट पहनकर तस्वीर में मुस्कुराते मेरे दोस्त संदीप कुमार पांडे ने अभी-अभी एक स्कैच तैयार किया है। आनंद लें, और जरी वाले गुलजार और रहमान के साथ कहें- जय हो

(वैसे कल ही दिल्ली-6 में डूबकी लगा रहा था, ससुराल गेंदा फूल ....की खुमारी अभी ताजा ही है।)

गिरीन्द्र


अल्ला रक्खा रहमान वैसे तो सिर्फ एक नाम है लेकिन हिंदुस्तानी फिल्म संगीत से जुड़े लोगों के लिए यह नाम कुछ खास मायने रखता है। सन 1992 में तमिल फिल्म रोजा के संगीतकार के रूप में एक लंबे बालों वाले लड़के ने फिल्मी दुनिया में कदम रखा और उस फिल्म के संगीत ने लोगों से एक वादा किया। यह वादा था फिल्म संगीत को आर्केस्टा की एकरस धुनों से निकाल कर एक ऐसे रूहानियत और पाकीजगी के मुकाम पर ले जाने का जहां वह ईश्वर से साक्षात्कार का माध्यम बन जाए।


भविष्य में जब कभी हिंदुस्तानी सिनेमा का इतिहास लिखा जाएगा तो रहमान को सिर्फ इसलिए नहीं याद किया जाएगा कि उन्होंने दो-दो ऑस्कर पुरस्कार अथवा गोल्डन ग्लोब समेत अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। बल्कि उन्हें याद किया जाएगा एक ऐसे संगीतकार के रूप में जिसने समकालीन संगीत के मायने बदल दिए। जिसके संगीत में ईश्वरीय पुकार थी और था राष्ट्र गौरव।


ए।आर. रहमान का जन्म चेन्नई में मलयाली फिल्मों के लिए संगीत रचना करने वाले संगीतकार आर.के. शेखर के बेटे ए.एस. दिलीपकुमार के रूप में हुआ था। महज नौ वर्ष की अवस्था में अपने पिता का सानिध्य खो देने वाले रहमान के परिवार को संगीत उपकरण किराए पर देकर अपना जीवन यापन करना पड़ा लेकिन संगीत तो उनकी रगों में बहता था।


एक सूफी संत से प्रभावित रहमान के पूरे परिवार ने सन 1989 में इस्लाम की दीक्षा ले ली और वर्ष 1992 में उन्हें प्रसिद्ध फिल्मकार मणिरत्नम ने फिल्म रोजा का संगीत देने के लिए आमंत्रित किया। सन 1993 में तमिल फिल्म रोजा के संगीत के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से शुरू हुआ यह सफर 2009 में स्लमडॉग मिलियनेयर के लिए ऑस्कर तक पहुंच चुका है।


सर्वश्रेष्ठ संगीत और गुलजार के साथ गीत रचना के दो ऑस्कर पुरस्कार हासिल करने के बाद रहमान ने कहा, "मेरी पूरी जिंदगी प्यार और नफरत के बीच झूलती रही, मैंने प्यार को चुना जिसकी वजह से आज मैं यहां हूं।"


टाइम मैगजीन द्वारा मोजार्ट ऑफ मद्रास के नाम से पुकारे गए रहमान ने चेन्नई में केएम म्यूजिक कंजरवेटरी के नाम से म्यूजिक स्कूल खोला है, जहां वह संगीत का प्रशिक्षण दे रहे हैं।


यही नहीं हाल ही में उन्होंने ए।आर। रहमान फाउंडेशन के नाम से उन्होंने एक संगठन की स्थापना की है जिसके सहारे वह देश से भूख और गरीबी का उन्मूलन करने के प्रयास कर रहे हैं। रोजा के गीत दिल है छोटा सा, छोटा सी आशा शुरू हुआ रहमान का सुरीला सफर बांबे, जींस, रंगीला, दिल से, ताल, लगान, जुबैदा, युवा और रंग दे बसंती, गुरू जैसी फिल्मों के सहारे जारी है।


3 comments:

इष्ट देव सांकृत्यायन said...

अच्‍छा लिखा्, लेकिन पूरा लेख तो ए आर रहमान को समर्पित होकर रह गया

गिरीन्द्र नाथ झा said...

इष्ठ देव जी, संदीप ने यह स्कैच रहमान को ही समर्पित किया है। इसी वजह से इसमें अन्य फिल्मों या पिंकी का जिक्र नहीं है।

शुक्रिया सरजी यहां आने के लिए।
गिरीन्द्र

Udan Tashtari said...

मुख्य मुद्दा भारत और भारतियों का ऑस्कर मंच पर सम्मान है, जो कि विदेशी नहीं बल्कि निर्विवाद विश्व स्तरीय सम्मान है. बहुत अच्छा लगा देख कर एवं गर्व की अनुभूति हुई.भविष्य के लिए भी शुभकामनाऐं.


महा शिव रात्रि की बहुत बधाई एवं शुभकामनाऐं.