मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Tuesday, October 09, 2007
आवारगी हमारी
आवारगी हमारी प्यारि-सी थी कभी जो
वही आज हमको रुलाने लगी है
जो भरती थी दिल में तरंगे हमेशा
वही आज दिल को जलाने लगी है
आवारगी हमारी
न कोई ग़म न गिला न कोई शुगह क निशाँ
पायी थी हर खुशी हर सुक़ूँ हमको था
नग़मे थे, बहारों के तरन्नुम हर कहीं
फिर भी क्यों हम भटका किये
यह तू ही बता, आवारगी, आवारगी
आवारगी हमारी
खामोशियाँ हैं हर तरफ़, तन्हाइयाँ हैं हर तरफ़
यादों के भँवर से अब कैसे निकलें
साथी न रहा कोई न कोई हमसफ़र
ज़िंदगी के सफ़ें पर लिखने को
है अब तो बस आवारगी, आवारगी
आवारगी हमारी ...
Monday, October 08, 2007
पहले पन्ने पर राजनीति ज्यादा, शिक्षा-स्वास्थ्य गौण
आजकल राजनीति व अपराध की खबरें अखबारों के पहले पन्ने के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं. ये खबरें शिक्षा व स्वास्थ्य की खबरों से कई गुना ज्यादा संख्या में हैं. सीएमएस मीडियालैब द्वारा जारी एक ताजा रिपोर्ट में यह जानकारी दी गयी है. यह रिपोर्ट प्रमुख अखबारों के पहले पन्ने पर छपी खबरों का अध्ययन करके तैयार की गयी है.
रिपोर्ट के अनुसार इस पन्ने पर सबसे ज्यादा संख्या में राजनीति की खबरें छपती हैं. राजनीति के बाद अपराध की खबरों को महत्व दिया गया है जबकि शिक्षा , स्वास्थ्य, अर्थ-व्यवस्था , कृषि-व्यापार व बुनियादी सुविधाएं जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों को पहले पन्ने पर बहुत कम प्राथमिकता मिली है.
सीएमएस मीडियालैब ने कहा है कि अध्ययन अवधि में इन अखबारों के पहले पन्ने पर छपी 21.5% खबरें राजनीति की थी वहीं 12% खबरें अपराध से थी. इन दोनों की संख्या मिला दे तो वह पहले पन्ने की खबरों का लगभग एक तिहाई होती है. राजनीति या अपराध की खबर को अलग अलग ही देखें तो ये शिक्षा या स्वास्थ्य की खबरों से दस गुना संख्या में हैं.
दूसरी ओर इस पन्ने पर छपी अन्य गंभीर मुद्दों ( शिक्षा, नागरिक मामले, आर्थिक मामले , स्वास्थ्य, जननिति व शासन, पर्यावरण व वन्य जीवन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, कला-संस्कृति, भ्रष्टाचार, कृषि और मीडिया ) की सभी खबरों को मिला दें तो इनकी कुल संख्या 19% हो पाती है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि पहले पन्ने के समाचारों के लिए दोनों भाषाओं के अखबारों की प्राथमिकता लगभग एक जैसी है. अंतर्राष्ट्रीय मामले , राजनीति और सुरक्षा की खबरों की संख्या में दोनों भाषाओं के अखबारों में थोडा-बहुत अंतर है.
सीएमएस मीडियालैब की इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पहले पन्ने पर राष्ट्रीय और प्रादेशिक प्रभाव की खबरों को काफी प्रमुखता दी गयी है वहीं अंतर्राष्ट्रीय और स्थानीय प्रभाव वाली खबरों को बहुत कम प्राथमिकता मिली है.
स्थानीय प्रभाव वाली खबरों के प्रति दोनों भाषाओं के अखबारों की प्राथमिकता में बडा अंतर है. हिन्दी अखबारों ने अंग्रेजी के मुकाबले लगभग दुगुनी संख्या में इन खबरों को छापा. हिन्दी अखबारों के पहले पन्ने पर 15% खबरें स्थानीय प्रभाव वाली थी वहीं अंग्रेजी अखबारों में ये खबरें कुल खबरों का 8% थीं.
रिपोर्ट में बताया गया है कि पहले पन्ने पर दिल्ली और शहरी क्षेत्रों से आयी खबरें हावी हैं जबकि ग्रामीण क्षेत्रों से नगण्य संख्या में खबरें छपी हैं. पहले पन्ने पर दिल्ली से आयी खबरों की औसत संख्या कुल खबरों का 61% थी. दूसरी ओर इस दौरान हिन्दी के तीन और अंग्रेजी के एक अखबार ने पहले पन्ने पर ग्रामीण क्षेत्रों से आयी सिर्फ एक एक खबर को छापा.
रिपोर्ट के अनुसार अखबारों के पहले पन्ने पर विश्लेषण और फीचरों की संख्या बहुत कम रहती है. अधिकतर स्पेस में समाचार ही होते हैं. चित्रों का प्रयोग बहुलता के साथ किया जाता है. कई बार खबरों की जगह सिर्फ चित्र छापे जाते हैं.
सीएमएस मीडियालैब राष्ट्रीय मीडिया द्वारा प्रस्तुत खबरों का विश्लेषण करती है. विश्लेषण में यह देखा जाता है कि मीडिया किन खबरों को ज्यादा महत्व दे रही है , किन मुद्दों पर कितना समय या स्पेस दिया जा रहा है और उन खबरों/ मुद्दों को किस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है .
इस रिपोर्ट के लिए प्रमुख हिन्दी दैनिकों हिन्दुस्तान , दैनिक जागरण, राष्ट्रीय सहारा व नवभारत टाइम्स और अंग्रेजी दैनिकों हिन्दुस्तान टाइम्स , द टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू और द इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर छपी खबरों का अध्ययन किया गया.
Wednesday, October 03, 2007
हिन्दी ब्लॉग ने ताकत दी है, एक पहचान दी है.......
ऐसे कई उदाहरण हैं जिससे इस बात की पुष्टि हो सकती है कि एक आम आदमी ब्लाग के जरिए किस प्रकार तकनीकी दुनिया से सहज होता गया। दरअसल यहीं से हिन्दी आनलाईन की तकदीर बदलनी शुरू हुई। भले हीं कुछ लोग इस दुनिया से पहले से ही परिचित थे, लेकिन उनकी संख्या कुछ खास नहीं थी। दरअसल वे इस दुनिया के आम नहीं खास रहे हैं। शायद इसी काऱण वे इस दुनिया में काफी तेजी से अपनी राह बना पाए।
लेकिन एक ऐसा भी दौर आया जब लोग यहां काफी सहज होकर अपना आशियाना बनाने लगे। यह दौर काफी नया है। यूनिकोड के सुलभ हो जाने से सभी ने नेट पर हिन्दीयाना (हिन्दी में लिखना) प्रारंभ किया। कंप्यूटर से खार खाए लोग भी की-बोर्ड से यारी करने लगे, और यहीं से हिन्दी का एक अलग रूप सामने आया। ब्लॉगस्पाट डाट कॉम ने इस पूरे प्रकरण में तो कमाल का काम किया है। कुछ इसी तरह का काम हिन्दीनी डाट काम ने भी किया। इस वेब के औजार विभाग ने तो हिन्दी को सर्व सुलभ बनाने में ऐतिहासिक काम किया है। ठीक उसी प्रकार जैसे रवि रतलाम रचनाकार और अपने काम के द्वारा कर रहे हैं।
वैसे हिन्दीनी को लोगों से रू-ब-रू कराने में सराय-सीएसडीएस के रविकान्त का भी हाथ है। सराय के दीवान@ सराय द्वारा इसका प्रचार-प्रसार हुआ है। फरवरी 2007 से तो हिन्दी ब्लॉगिंग सुनामी की तरह फैलने लगी। ऑन-लाइन हिन्दी का यह स्वर्णिम काल रहा है। पानीपत के हरिराम किशोर भी हिन्दनी के जरिए ब्लागियाने लगे। इसी बीच लोग मंगल फॉन्ट से परिचित हुए। यह तो और भी आसान निकला। अपने एक्सपी सिस्टम में लोग खुद हीं हिन्दी इन्सटॉल करने लगे। पहली बार जब किशनगंज बिहार के अरमान ने अपने सिस्टम के टुलबार पर HN और EN को स्थापित किया तो वह खुशी से पागल हो उठा। उसके अनुसार अब मैं तो फाईल नेम भी हिन्दी में ही लिखूंगा..। सबकुछ आसान होता गया, कह सकते हैं डॉट-कॉम की राह हमारे लिए टनाटन बन गयी। आज लोग जमकर हिन्दी में वेब पन्नों पर लिख रहे हैं। शायद राह और भी आसान होगी हमारे लिए, ठीक इसी बीच हमारे परिचय के दायरे में गूगल का ट्रांसलेटर औजार आ धमका। खुशी और भी बढ़ी..अब कमल लिखने के लिए kamal हीं लिखना पड़ रहा है। यहां मात्राओं और वर्णों में भी शुद्दता का ध्यान रखा गया है। दरअसल www.hindini.com के औजार पर इस तरह की आसानी का अनुभव हम नहीं कर पा रहे थे।
आनेवाला समय हिन्दी को ऑन-लाईन की दुनिया में और भी तेज रफ्तार से आगे ले जाएगा, ठीक फटाफट ट्वेंटी-20 क्रिकेट की तरह। बस हम सब अपने-अपने कामों के बीच भी हिन्दी को ऑन-लाईन दुनिया में पूरा स्पेस देते रहें...........।