कर्नाटक में एक ऐसा गांव है, जहां आज भी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत की भाषा संस्कृत है! इस गांव का नाम है मत्तूर। राजनीति की कथा कहानियों से कोसों दूर आज हम आपको इसी गांव की कहानी सुनाने जा रहे हैं।
मत्तूर गांव कर्नाटक के शिमोगा जिले में स्थित है, जो बेंगलुरु से करीब 320 किलोमीटर की दूरी पर है। यह गांव तुंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहाँ के निवासियों की मातृभाषा ‘संकेथी’ होने के बावजूद, दैनिक बोलचाल में संस्कृत का व्यापक उपयोग किया जाना यहाँ की विलक्षणता को दर्शाता है।
मत्तूर की संस्कृत परंपरा का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में राजा कृष्ण देव राय ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए मत्तूर गांव को केंद्र बनाया था। हालांकि आधुनिक दौर में यह भाषा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी, लेकिन गांव के बुजुर्गों के मुताबिक साल 1981 से गांव ने संस्कृत को फिर से अपनाना शुरू किया और तभी से यह भाषा यहां की पहचान बन गई।
वैदिक जड़ों की ओर वापसी का सफर 1981 में शुरू हुआ, जब शास्त्रीय भाषा को बढ़ावा देने वाली संस्था संस्कृत भारती ने मत्तूर में 10 दिवसीय संस्कृत कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें पास के उडुपी स्थित पेजावर मठ के संत समेत कई अन्य लोग शामिल हुए। ग्रामीणों को संस्कृत को संरक्षित करने के इस अनूठे प्रयोग में उत्साहपूर्वक भाग लेते देख संत ने कहा, “एक ऐसी जगह जहाँ लोग संस्कृत बोलते हैं, जहाँ पूरे घर संस्कृत में बात करते हैं! आगे क्या? एक संस्कृत गाँव!” मत्तूर के निवासियों ने इस आह्वान को दिल से स्वीकार कर लिया। इस तरह संस्कृत गाँव की प्रमुख भाषा बन गई।
माना जाता है कि मत्तूर में संस्कृत के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में वहां की स्थानीय धार्मिक और शैक्षिक परंपराओं ने अहम भूमिका निभाई है। इस गांव में वैदिक और संस्कृत शिक्षा की पुरानी परंपरा रही है। बच्चों को कम उम्र में ही संस्कृत से परिचित कराया जाता है, और कई परिवार अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में इसका इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे दौर में जब संस्कृत को अक्सर सिर्फ़ प्राचीन ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है, मत्तूर गांव यह दिखाता है कि सांस्कृतिक और शैक्षिक पहलों के ज़रिए किसी भाषा को पीढ़ियों तक कैसे जीवित रखा जा सकता है।
मत्तूर गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो चीज हैरान करती है, वह है यहां के लोगों का संस्कृत में सहज बातचीत करना। गांव के बच्चे, बुजुर्ग और जवान सभी धाराप्रवाह संस्कृत में बात करते हैं। बाजार में सामान खरीदना हो, खेत में काम करना हो या फिर घर की आम बातचीत, यहां सब कुछ संस्कृत में ही होता है.। गांव में प्रवेश करते ही माहौल भी अलग महसूस होता है, यहां के लोगों की वेशभूषा और रहन-सहन भी परंपरागत भारतीय संस्कृति की झलक देते हैं।
मत्तूर में सब्जी विक्रेता से लेकर पुजारी तक, हर कोई संस्कृत समझता है। अधिकांश लोग धाराप्रवाह संस्कृत बोलते भी हैं। नदी किनारे वैदिक मंत्रों का पाठ करते बुजुर्गों का समूह और उनके पास से साइकिल पर तेजी से गुजरते हुए कुछ युवकों का प्राचीन भाषा में मोबाइल फोन पर बातचीत करते हुए निकलना कोई असामान्य बात नहीं है।
मत्तूर एक कृषि प्रधान गाँव है जहाँ मुख्य रूप से सुपारी और धान की खेती होती है। यहाँ संकेठी समुदाय के लोग रहते हैं, जो एक प्राचीन ब्राह्मण समुदाय है। यह समुदाय लगभग 600 वर्ष पूर्व केरल से आकर मत्तूर में बस गया था। संस्कृत के अलावा, वे संकेठी नामक एक दुर्लभ बोली भी बोलते हैं, जो संस्कृत, तमिल, कन्नड़ और तेलुगु के कुछ अंशों का मिश्रण है। संकेठी बोली की कोई लिखित लिपि नहीं है और इसे देवनागरी लिपि में पढ़ा जाता है।
हमारे एक पत्रकार साथी ने बताया कि मत्तूर ने 30 से अधिक संस्कृत प्रोफेसर तैयार किए हैं जो कुवेम्पु, बेंगलुरु, मैसूर और मैंगलोर विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। मत्तूर कई प्रतिष्ठित हस्तियों का गृह ग्राम भी है, जिनमें भारतीय विद्या भवन, बैंगलोर के मथुर कृष्णमूर्ति, वायलिन वादक वेंकटराम औरगामाका प्रतिपादक एचआर केशवमूर्ति शामिल हैं।
भाषा और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए, मत्तूर भारत में घूमने की एक दिलचस्प जगह है।