Friday, July 10, 2026

आखिर क्यों महत्वपूर्ण साबित होगी ‘बॉर्डर डिस्ट्रिक्ट SPs कॉन्फ्रेंस-2026’ !

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार नौ जुलाई को नई दिल्ली में सीमावर्ती जिलों के पुलिस अधीक्षकों के साथ एक बैठक की। इस महत्वपूर्ण बैठक का नाम ‘बॉर्डर डिस्ट्रिक्ट SPs कॉन्फ्रेंस-2026’ दिया गया था। सम्मेलन में बॉर्डर से लगते 119 जिलों के एसपी और अन्य अधिकारी शामिल हुए।
बैठक में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्य सहित सीमावर्ती राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस अधीक्षक शामिल हुए थे।

माना जा रहा है कि इस बैठक में अवैध घुसपैठ पर लगाम लगाने के प्लान पर सबसे अधिक चर्चा हुई। देश में अवैध घुसपैठिया के नेटवर्क को खत्म करने पर अमित शाह लगातार बोलते रहे हैं। ऐसे में यह मीटिंग अहम मानी जा रही थी , क्योंकि देश को नक्समु्क्त बनाने के बाद मोदी सरकार अब अवैध घुसपैठ पर एक्शन की तैयारी में है।

गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में घुसपैठ, अवैध आप्रवासन, आबादी में बदलाव, बॉर्डर सिक्योरिटी, ड्रोन से खतरा और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। यह बैठक अवैध आप्रवासन के खिलाफ केंद्र के तेज अभियान के बीच अहम है। केंद्र ने इसे बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर स्थित जिलों की आबादी की बनावट को बदलने की एक संगठित कोशिश का हिस्सा बताया है। बैठक में सुरक्षा से जुड़ी नई चिंताओं को उजागर कर और इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया।

सीमांत जिला पुलिस अधीक्षक सम्मेलन-2026 को संबोधित करते हुये अमित शाह ने कहा कि इस सम्मेलन से समग्र सीमा सुरक्षा के दृष्टिकोण को संस्थागत रूप मिला है और आने वाले समय में तटीय सीमा सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में भी हम समग्रता से आगे बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन में सीमाओं की सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा, निराकरण की चिंता और इस दिशा में उपयुक्त उपायों को नीतिगत स्वरूप देने का काम होगा। मोदी सरकार, संबद्ध सीमा रक्षक बल, राज्य और जिला प्रशासन, भारत सरकार के संबंधित हितधारक और स्थानीय नागरिकों के परस्पर जुड़ाव के साथ एक मजबूत चतुष्कोणीय सुरक्षा ग्रिड का निर्माण कर रही है।

केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘स्मार्ट बॉर्डर की कल्पना पर आधारित भारत की बॉर्डर सुरक्षा व्यवस्था आने वाले समय में विश्व में सबसे आधुनिक होगी। सुरक्षित सीमा, समृद्ध सीमांत और सजग समाज के साथ ही देश सुरक्षित हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश को जम्मू-कश्मीर और नॉर्थईस्ट में आतंकवाद और नक्सलवाद से निजात मिली है, जो हमारी साझी सफलता का सूचक है। आने वाले तीन सालों में हम नारकोटिक्स की समस्या को गंभीर क्षति पहुंचाकर इस पर विजय प्राप्त करेंगे। ’

उन्होंने कहा, ‘देश को घुसपैठियामुक्त बनाने और घुसपैठ हो ही न सके, इसके लिए एक मजबूत तंत्र का निर्माण कर रहे हैं। पहले समस्याएं स्थायी और समाधान अस्थायी थे, मोदी सरकार में समस्याओं की जड़ पर प्रहार कर समाधानों को स्थायी बनाया जा रहा है. मोदी सरकार ने बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर में 400 प्रतिशत वृद्धि कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ इसे आगे बढ़ाया है।’

अमित शाह ने कहा, ‘पीएम मोदी ने वायब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम के तहत देश के अंतिम गांव को देश का प्रथम गांव कहा है. इसके तहत पलायन रोकने, रोजगार बढ़ाने और सरकारी योजनाओं का शत प्रतिशत क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है. मोदी ने जनसांख्यिकी परिवर्तन का अध्य्यन करने, उसमें असामान्य कारणों से हो रही वृद्धि को चिह्नित करने और भविष्य में इसे रोकने के उपाय सुझाने के लिए डेमोग्राफी मिशन की शुरूआत की है।‘

केंद्रीय गृह मंत्री ने सीमांत क्षेत्रों में असामान्य कारणों से जनसांख्यिकी में हो रहे बदलाव की सूचना जल्द से जल्द नीचे से उच्चतम स्तर तक पहुंचाने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा, ‘मोदी सरकार 31,000 करोड़ रुपये की लागत से 1,610 किलोमीटर लंबे म्यांमार बॉर्डर पर बाड़बंदी कर रही है।’

उन्होंने कहा, ‘प्रॉक्सी वार, घुसपैठ, कट्टरपंथ का प्रसार, नारकोटिक्स, तस्करी, ड्रोन, साइबर अपराध, संगठित अपराध और जनसांख्यिकीय परिवर्तन रोकना, सीमा को रहने लायक बनाना और वहां से पलायन रोकना और सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारे उद्देश्य है।’ 

अमित शाह लगातार कहते रहे हैं कि हम एक ऐसा मजबूत सुरक्षा तंत्र बना रहे हैं। जिससे देश को घुसपैठियां मुक्त करने के साथ ही घुसपैठ ही नहीं हो सकेगी। गुरुवार को हुई बैठक में भी उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा कि जिस तरह से देश को जम्मू कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट में आतंकवाद और नक्सलवाद से निजात मिली है। घुसपैठ को रोकने के साथ ही आने वाले 3 सालों में सरकार नारकोटिक्स की समस्या पर भी विजय प्राप्त करेगी। 

गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दिमाग में सीमांत (बॉर्डर) जिलों की सुरक्षा और डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) को संतुलित रखने की सबसे बड़ी प्राथमिकता चल रही है। उनके मुख्य विजन और रणनीतियों में शामिल है। वे सीमावर्ती जिलों में हो रहे असामान्य जनसंख्या परिवर्तन और अवैध घुसपैठ के मूल कारणों का पता लगाने और सुधार के लिए एक विशेष मिशन की शुरुआत कर चुके हैं। ऐसे में इस बैठक के बाद सीमांत जिलों में होने वाली घटनाओं पर सबकी निगाहें रहेंगीं।

पंजाब :धर्म और पंथ की रणनीति से लेकर लोक लुभावन योजना तक!




पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बुधवार को धुरी से बहुप्रतीक्षित ‘मुख्यमंत्री मावां-धीयां सत्कार योजना' लॉन्च की. लाभार्थी महिलाओं के खातों में तीन महीने की सम्मान राशि एकमुश्त जमा की गई. योजना के तहत पंजाब की महिलाओं के खाते में 1000-1500 रुपये हर महीने दिए जाने हैं. सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1000 रुपये, और अनुसूचित जाति की महिलाओं को 1500 रुपये . 

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल
ने मुख्यमंत्री मावां-धीयां सत्कार योजना को दुनिया का सबसे बड़ा महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम बताया था. सोशल साइट एक्स पर अरविंद केजरीवाल ने लिखा, पंजाब की सभी मां, बहनों और बेटियों को बहुत-बहुत बधाई. 1 जुलाई को उनके खाते में तीन महीने के पैसे एक साथ आएंगे. हर जनरल कैटेगरी की महिला को तीन हजार और हर SC कैटेगरी की महिला को 4500 रुपये मिलेंगे. एक परिवार में यदि एक से अधिक महिलाएं हैं, तो हर महिला को ये सम्मान राशि मिलेगी. पूरी दुनिया का ये सबसे बड़ा महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम है.

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर 8 मार्च को विधानसभा के विशेष सत्र में इस योजना की घोषणा की थी. उसके बाद वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में इस योजना के लिए 9300 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया. पंजाब सरकार का दावा है कि योजना से पंजाब की करीब 97 फीसदी वयस्क महिलाओं को फायदा मिलेगा.

इस हफ्ते पंजाब की इस घटनाक्रम को देखकर आपको असम की याद आई होगी. देखा जाए तो भगवंत मान भी असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के रास्ते पर चल रहे हैं. असम चुनाव से पहले हिमंता बिस्वा सरमा ने महिलाओं को बिहू के मौके पर एकमुश्त बड़ी रकम की सौगात दी थी. 

आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली में महिलाओं के लिए योजना शुरू की थी, लेकिन वक्त रहते उस पर अमल नहीं हो सका. लगता है, भगवंत मान दिल्ली में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की हार से सबक लेते हुए चुनाव से पहले ही महिलाओं के खाते में पैसा भेजने का फैसला किया है. 

चुनावी राजनीति में जनता तक रकम की सौगात पहुंचाने की कहानी अब हर राज्य में चुनाव से पहले देखने को मिल रही है, ऐसे में पंजाब की सरकार भी क्यों पीछे रहती! 

इन सब लोक लुभावन योजनाओं के बीच पंजाब की राजनीति धर्म और पंथ के इर्द-गिर्द भी घूमने लगी है। पिछले कुछ दिनों के भीतर ऐसे कुछ सियासी घटनाक्रम सामने आए हैं जिनका असर निश्चित ताैर पर भावी चुनाव पर पड़ेगा। इसी के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियां भावी समीकरणों से नफा और नुकसान के आकलन में जुट गई हैं।

दलों को जहां पंथक वोट बैंक बिखरने की आशंका सता रही हैं वहीं सिख-हिंदू एकता पर भी दलों की नजर गड़ी है।

पंजाब में सिख और हिंदू के बिखराव की बात कोई नहीं करेगा क्योंकि जीत के लिए यहां दोनों समुदाय के लोगों का वोट बेहद जरूरी है। यहां हिंदू और मुसलमान का शोर भी नहीं सुनाई देगा मगर फिर भी सियासत धूरी धार्मिक समीकरणों के आसपास ही घूमेगी।

शिरोमणि अकाली दल (शिअद) प्रदेश की सबसे पुराने पंथक पार्टी मानी जाती है मगर साल 2022 के बाद से थोड़ा हाशिये पर चल रही है। पहला झटका तब लगा जब शिरोमणि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) का गठन हुआ और दूसरी चोट शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) ने पहुंचाई। इस दौरान शिअद बिखरा और कुछ दिन पहले ही दाखा से शिअद के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली भी शिरोमणि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के खेमे में चले गए। अयाली बड़े पंथक नेता माने जाते हैं, जो जाहिर तौर पर शिअद को नुकसान पहुंचाकर वारिस पंजाब दे को मजबूत करेंगे। इस घटनाक्रम के बाद पंथक वोट बैंक का बिखराव निश्चित माना जा रहा है।

दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी पिछले दिनों से कुछ बड़े पंथक मसलों से संबंधित विवादों में उलझी हुई है। पहला विवाद बिना एसजीपीसी और श्री अकाल तख्त की रायशुमारी के सूबे में नया बेअदबी रोधी संशोधन कानून लागू कराना और दूसरा विवाद सीएम भगवंत सिंह मान की कथित विवादित वायरल वीडियो से जुड़ा है।

दोनों मामलों में श्री अकाल तख्त साहिब ने संज्ञान लेकर सीएम के खिलाफ हुक्मनामा जारी किया है। आप हाईकमान को लगता है कि इससे पंथक वोट बैंक का नुकसान हो सकता है, लिहाजा पार्टी ने अब हिंदू वोट बैंक पर भी पूरी नजरें गढ़ा ली हैं। पिछले दिनों हिंदू समुदाय के लोगों से जुड़ी पांच बड़ी घोषणाएं इसी का नतीजा हैं।

भाजपा-कांग्रेस को भी मालूम है कि जीत के लिए हिंदू-सिख वोट बैंक बेहद जरूरी है। भाजपा यह भी जानती है कि सूबे में पंथक वोट बैंक हमेशा उनसे दूर ही रहा है मगर इस बार पार्टी की रणनीति थोड़ी अलग है। भाजपा कुछ पंथक नेताओं को पार्टी से जाेड़ रही है और अध्यक्ष पद का चेहरा भी इस बार सिख ही दिया है। इतना हीं नहीं पार्टी महाराजा रणजीत सिंह के सरकार-ए-खालसा समावेशी शासन मॉडल को उजागर करते हुए यह साबित करने की कोशिश की है कि राज्य में सामाजिक सद्भाव और व्यापक प्रतिनिधित्व के प्रति भाजपा पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

कांग्रेस के पास सिख नेताओं की कमी तो नहीं है मगर फिलहाल पंथक और हिंदू वोट बैंक पर पकड़ और बनानी पड़ेगी। कांग्रेस का फोकस जट सिख और एससी वोट बैंक पर ज्यादा हो सकता है।

बीते दिनों बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों के दफ्तर में महाराजा रणजीत सिंह की तस्वीर लगाकर पार्टी ने पंथक राजनीति को लेकर बड़ा संदेश देने की कोशिश की थी. 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब की कुल आबादी में सिख समुदाय की हिस्सेदारी करीब 58 प्रतिशत है, जबकि हिंदू आबादी लगभग 39 प्रतिशत है. ऐसे में राज्य की राजनीति में सिख वोट बैंक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. पंजाब में अक्सर धार्मिक और पंथक मुद्दे चुनावी चर्चा के केंद्र में रहते हैं.

अब सामने विधानसभा चुनाव है! पंजाब के चुनाव पर सबकी नज़र है। आने वाले दिनों में पंजाब से ऐसे ही कई कहानियां सामने आएगी और चुनावी प्लेट के जायेके का रंग बदलने की कोशिश करेगी!

Girindra Nath Jha
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Friday, June 26, 2026

कौन हैं IPS महेश दीक्षित !


वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी महेश दीक्षित इंटेलिजेंस ब्यूरो के नए प्रमुख होंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी है।

आंध्र प्रदेश कैडर के 1993 बैच के आइपीएस अधिकारी दीक्षित वर्तमान आइबी निदेशक तपन कुमार डेका की जगह लेंगे।
वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डॉ. महेश दीक्षित को देश की सबसे अहम आंतरिक खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) का नया डायरेक्टर बनाया गया है. महेश दीक्षित 1993 बैच के आंध्र प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी हैं. वे अब तक आईबी में स्पेशल डायरेक्टर के तौर पर अहम जिम्मेदारी संभाल रहे थे. दीक्षित मौजूदा आईबी प्रमुख तपन कुमार डेका की जगह लेंगे. डेका 2022 से आईबी की कमान संभाल रहे थे.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी है. कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा जारी आदेश में लिखा है कि कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमिटी ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के स्पेशल डायरेक्टर, IPS महेश दीक्षित को इंटेलिजेंस ब्यूरो का डायरेक्टर बनाने को मंजूरी दे दी है. यह नियुक्ति आईपीएस तपन कुमार डेका की जगह पर होगी. उनका कार्यकाल पद संभालने की तारीख से दो साल या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, तक रहेगा.


कौन हैं महेश दीक्षित!

डॉ महेश दीक्षित देश के सबसे अनुभवी इंटेलिजेंस ऑफिसर्स में गिने जाते हैं. उनके करियर के सबसे अहम अध्यायों में से एक अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने से पहले की तैयारी में उनकी भूमिका थी. 

तत्कालीन राज्य के जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठन के बाद, दीक्षित को इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण इंटेलिजेंस जिम्मेदारियां सौंपी गईं. अधिकारियों का मानना ​​है कि उन्होंने राजनीतिक रूप से संवेदनशील दौर में जनता का भरोसा बहाल करने में मदद की और साथ ही आतंकवाद और अलगाववादी तत्वों से पैदा होने वाली सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया.

जम्मू-कश्मीर में अहम इंटेलिजेंस जिम्मेदारियां संभालने के दौरान, श्रीनगर ने 2023 में G20 टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठक की सफलतापूर्वक मेजबानी की. इस कार्यक्रम ने काफी अंतरराष्ट्रीय ध्यान और भागीदारी आकर्षित की. शिखर सम्मेलन का सुचारू संचालन क्षेत्र के बेहतर होते सुरक्षा माहौल को दिखाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना गया. इसी दौरान, कई विदेशी राजनयिक प्रतिनिधिमंडलों ने कश्मीर का दौरा किया, जो इस क्षेत्र के साथ बढ़ते अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव को दर्शाता है. इस मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने बताया कि दीक्षित ने जमीनी हकीकत और बदलती परिस्थितियों का सही आकलन करने में अहम भूमिका निभाई. इससे कूटनीतिक स्तर पर बेहतर तालमेल बनाने और जमीनी हालात में भरोसे को मजबूत करने में मदद मिली.

यह नियुक्ति एक अहम मोड़ पर हुई है, क्योंकि भारत आतंकवाद और कट्टरपंथ से लेकर साइबर खतरों और सीमा पार से गलत सूचना फैलाने वाले अभियानों जैसी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है. नए IB प्रमुख के तौर पर, दीक्षित से उम्मीद है कि वे आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और विभिन्न सुरक्षा व इंटेलिजेंस एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर बनाने के मकसद से इंटेलिजेंस ऑपरेशन्स की देखरेख करेंगे.

आईपीएस महेश दीक्षित के पास जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में काम करने का गहरा अनुभव है। उन्होंने श्रीनगर में सब्सिडियरी इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) के प्रमुख के रूप में आतंकवाद विरोधी अभियानों का नेतृत्व किया था, जिसका अधिकार क्षेत्र पूरे जम्मू, कश्मीर और लेह लद्दाख तक फैला हुआ था। उनके इसी जमीनी और खुफिया ऑपरेशन्स के अनुभव को देखते हुए सरकार ने उन्हें देश की आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है।

33 साल के करियर में मिले कई पुरस्कार

1993 के बैच के आईपीएस अधिकारी महेश दीक्षित को अपने 33 साल के पूरे कार्यकाल में कई पदकों से सम्मानित हो चुके हैं। उन्हें 2004 में पुलिस आंतरिक सुरक्षा सेवा पदक और सराहनीय सेवा के लिए 2009 में पुलिस पदक मिला था। इसके अलावा 2016 में विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक से नवाजा गया था।


Friday, June 19, 2026

पंजाब में चुनाव से पहले दलों की सियासी रणनीति की कहानी! क्या समय से पहले होंगे चुनाव?

पंजाब में विधानसभा चुनाव तय समय से पहले कराए जाने की संभावना को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। वर्ष 2027 में प्रस्तावित जनगणना और विधानसभा चुनाव के संभावित टकराव को देखते हुए चुनाव आयोग समय से पहले मतदान कराने के विकल्प पर विचार कर सकता है।
यदि यह ऐसा होता है तो फरवरी 2027 के बजाय नवंबर या दिसंबर 2026 में ही पंजाब सहित कुछ अन्य राज्यों में चुनाव कराए जा सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

जनगणना 2027 दो चरणों में आयोजित की जा रही है। पहला चरण हाउस लिस्टिंग का है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण पापुलेशन एन्यूमरेशन (पीई) फरवरी 2027 में प्रस्तावित है। इसी दौरान जातीय गणना भी कराई जाएगी। जनगणना और चुनाव, दोनों प्रक्रियाओं के लिए बड़ी संख्या में शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी लगती है। ऐसे में दोनों बड़े राष्ट्रीय कार्य एक ही समय पर होने से कर्मचारियों की उपलब्धता और प्रशासनिक प्रबंधन बड़ी चुनौती बन सकता है। इसी वजह से समयपूर्व चुनाव कराने के विकल्प पर मंथन चल रहा है। पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी इस संभावना को देखते हुए पहले ही चुनावी मोड में दिखाई दे रही है।

इन सबके बीच पंजाब में राजनीतिक पार्टियों ने जाति आधारित राजनीति को धार देना शुरू कर दिया है। आम आदमी पार्टी (AAP), शिरोमणि अकाली दल (SAD), बीजेपी और कांग्रेस चारों ही अलग-अलग समुदायों को साधने में जुट गए हैं। चुनाव से पहले इस तरह की हवा आम है!

ये चारों पार्टियां अपने पारंपरिक जनाधार को बचाने के साथ-साथ एक जातीय समीकरण बनाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। इन पार्टियों की नजर जाट सिख, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जातियां (SC) के अलावा व्यापारी, महिला और युवा वर्ग पर है।

आकड़ों के मुताबिक पंजाब की आबादी में सिखों की हिस्सेदारी लगभग 57 प्रतिशत है, जबकि हिंदू लगभग 38 प्रतिशत हैं। दशकों तक पंजाब में बीजेपी को मुख्य रूप से शहरी हिंदू वोटरों का ही समर्थन मिलता रहा है।  

हाल ही में बीजेपी ने सिख जाट नेता केवल सिंह ढिल्लों को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। बीजेपी का यह कदम पंजाब में उसकी 'हिंदू पार्टी' वाली छवि को बदलने और सिख वोटरों, खासकर प्रभावशाली जाट सिख समुदाय के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के तौर पर देख जा रहा है।
 
इसके अलावा बीजेपी ओबीसी, सैनी तथा अन्य पिछड़े वर्गों के बीच लगातार कोई न कोई कार्यक्रम या संवाद के जरिए पैठ बनाने का प्रयास कर रही है।
ऐसा लगता है जैसे बीजेपी की नजर रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण पंजाब  के मालवा, दोआबा और माझा पर है। केवल सिंह ढिल्लों मालवा इलाके से आते हैं, जहां पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 69 सीटें हैं। 

माझा इलाके में 25 सीटें, जबकि दोआबा में 23 सीटें हैं। मालवा इलाके में केवल सिंह ढिल्लों, पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जैसे जाट सिख नेताओं  के जरिए बीजेपी जाट वोटरों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने में लगी है। इसके अलावा दलित वोटबैंक को साधने के लिए बीजेपी के पास पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय सांपला, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री सोम प्रकाश और पूर्व मुख्य संसदीय सचिव अविनाश चंदर जैसे नेता हैं।

दूसरी तरफ अकाली दल की राजनीति पारंपरिक रूप से जाट सिख प्रभुत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अकाली दल का मुख्य समर्थन आधार प्रदेश में जाट सिख, पंथ सिख रहा है। वहीं, कांग्रेस का समर्थन आधार जाट सिख, दलित और कुछ हिंदूओं का समर्थन रहा है। साल 2022 में AAP के सत्ता में आने के बाद से इन पार्टियों के समर्थन आधार में सेंध लगी है। अकाली दल एक बार फिर से अपना पारंपरिक वोट वापस पाने में लगी है. हालांकि, SAD अपने वोट आधार से हटकर पहले 70 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में एससी-बीसी, महिला और युथ विंग को सक्रिय कर चुकी है। इसके अलावा SAD ने 67 विघानसभा क्षेत्रों में  व्यापार विंग के 67 विभिन्न विधानसभा हलकों के हलका प्रधानों की नियुक्ति की है। इस तरह ये पार्टी शहरी और गैर-पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने के प्रयासों में हैं। 
कांग्रेस हर स्तर पर पार्टी के समर्थन को मजबूत करने में जुटी
वहीं, कांग्रेस पार्टी दलित और जाट सिखों के समर्थन को वापस पाने में लगी है। पार्टी की मजबूती के लिए कांग्रेस जिला स्तर पर नियुक्तियों में विभिन्न सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर जोर दे रही है। इसके जरिए पार्टी उन वर्गों में अपनी पकड़ को मजबूत करेगी जहां उसका जनाधार कमजोर था। इसके अलावा कांग्रेस अपने एससी विभाग, ओबीसी विभाग, किसान कांग्रेस, महिला कांग्रेस, यूथ कांग्रेस और व्यापार प्रकोष्ठ को सक्रिय कर रही है ताकि हर स्तर पर अपने समर्थन को मजबूत कर सके।
 
इन सबके बीच पंजाब की सत्ताधारी पार्टी 
AAP का फोकस सत्ता में बने रहने और सत्ता विरोधी लहर को तोड़ना है। साल 2022 में AAP की जीत में दलित वर्ग, ग्रामीण मालवा क्षेत्र और जाट सिख किसानों की भूमिका रही थी। AAP विभिन्न समुदायों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए जिला और विधानसभा स्तर पर कल्याण बोर्ड का गठन कर रही है। प्रदेश सरकार पहले ही 21 राज्य स्तरीय कल्याण बोर्ड बना चुकी है। इसके जरिए विभिन्न समुदायों से सीधे बातचीत की जाएगी और उनसे सरकार के कामों को लेकर फीडबैक लिया जाएगा। 

समय पूर्व चुनाव और जाति की राजनीति की खबरों के बीच
पंजाब में एक सवाल लगातार चर्चा में बना हुआ है कि क्या 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल फिर से साथ आएंगे? दोनों दलों का करीब ढाई दशक पुराना गठबंधन कभी पंजाब की राजनीति का सबसे सफल समीकरण माना जाता था। लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर यह रिश्ता टूट गया और तब से दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। हाल के महीनों में इनके बीच गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं फिर तेज हुई हैं। बीजेपी के सीनियर नेता खुले तौर पर ऐलान कर चुके हैं कि पार्टी राज्य में अकेले चुनाव लड़ेगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तो मार्च 2026 में यहां तक कहा था कि बीजेपी अब पंजाब में ‘छोटा भाई’ नहीं बनेगी। लेकिन राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है, इसलिए अभी कुछ भी कहना सही साबित नहीं होगा!

Friday, June 12, 2026

एलएलसी निशांत कुमार 12 वीं पास!




एक समय बिहार में लालू यादव के बेटे तेज प्रताप और तेजस्वी की शिक्षा को सियासी मुद्दा बनाकर मीडिया में खूब परोसा जाता था। दरअसल, तेज प्रताप कॉलेज ड्रॉप आउट हैं और तेजस्वी यादव स्कूल ड्रॉप आउट। मतलब, उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। अब समय का फेर देखिए,  बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को लेकर 12 वीं पास का हल्ला जोड़ पकड़े हुए है। पिछले कुछ दिनों से यह मामला बिहार की हेडलाइन बनकर लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

कुछ महीने पहले तक जेडीयू के कई वरिष्ठ नेता निशांत को इंजीनियर बताते नहीं थकते थे। और तो और, इस बात पर न तो कभी नीतीश कुमार ने और ना ही निशांत ने किसी तरह की टिप्पणी दी। दरअसल ये बात तब सामने आई जब बिहार विधान परिषद के नॉमिनेशन फॉर्म में दर्ज किया गया कि निशांत सिर्फ 12वीं पास हैं।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, 'जिस नीतीश कुमार के बेटे को लोग इंजीनियर बताते नहीं थकते थे, वह 12वीं निकला। चुनावी हलफनामें में स्वयं बताया कि वह ग्रेजुएट नहीं है। ताउम्र परिवारवाद के विरोध की नौटंकी करने वाले बेईमान लोगों की सारी परतें खुलेंगी। इंतजार कीजिए।'

इस बीच अब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। गुरुवार (11 जून, 2026) को मीडिया से बातचीत में आरजेडी नेता ने इस पर बयान दिया। निशांत कुमार को लेकर तेजस्वी यादव ने कहा, "बिहार के शिक्षा मंत्री पर पूरा विश्वास है कि निशांत जी को इंजीनियर बनाने का काम करें. एक प्रोफेसर बन गए... एक इंजीनियर बन जाएंगे."

अब भले निशांत कुमार एलएलसी बन चुके हैं लेकिन राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार के बेटे और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर निशांत कुमार की शैक्षणिक योग्यता पर सियासत जारी है। उनकी तथाकथित बी.टेक  की डिग्री को लेकर सबसे पहले आरजेडी ने हल्ला बोल किया था।

हालांकि अबतक निशांत कुमार ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोला है। समाचार चैनलों के मुताबिक बुधवार (10 जून, 2026) को निशांत कुमार जब मीडिया के सामने आए तो पत्रकारों ने बी.टेक पर सवाल किया था पत्रकार पूछने लगे कि कुछ तो इस पर बोल दीजिए लेकिन निशांत कुमार सवालों को सुनकर चुप रहे। उन्होंने किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी थी

बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए दाखिल हलफनामे ने निशांत की डिग्री की सच्चाई सबके सामने खोलकर रख दी है।अब तक उन्हें इंजीनियर माना जाता रहा, लेकिन चुनावी दस्तावेजों से साफ हो गया कि उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी ही नहीं की थी।

हलफनामे के अनुसार निशांत कुमार ने 1998 में पटना साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (BIT Mesra) में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कंप्यूटर साइंस) में दाखिला लिया।
हालांकि, 8 सेमेस्टर के कोर्स में वे केवल 5 सेमेस्टर तक ही पढ़ाई कर सके और वर्ष 2001 में उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।
यानी लंबे समय से उन्हें “इंजीनियर” बताने की जो धारणा बनी हुई थी, वह अब गलत साबित हुई है। चुनावी हलफनामे में उनकी शैक्षणिक योग्यता ने इस भ्रम को पूरी तरह खत्म कर दिया।


विपक्ष का कहना है कि यह मामला केवल शैक्षणिक योग्यता का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक छवि का भी है जो वर्षों से निशांत कुमार के बारे में बनाई गई। राजद का दावा है कि कई जदयू नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उन्हें इंजीनियर बताया, जबकि इस पर कभी सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

गौरतलब है कि लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे बिहार के शीर्ष दिग्गज नेताओं ने शिक्षा और सुधारों की बात तो की, लेकिन उनके अपने ही घरों में इसका असर नहीं दिखा। तेजस्वी और चिराग के बाद अब विपक्ष के निशाने पर नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार हैं, जिन्हें '12वीं पास' बताकर घेरा जा रहा है। हालांकि इस मुद्दे पर सबकी स्थिति एक जैसी ही है,  इसे बिहार का दुर्भाग्य ही माना जाएगा!

पिछले महीने सम्राट चौधरी सरकार के विस्तार के दौरान मंत्री पद की शपथ लेने वाले निशांत को स्वास्थ्य मंत्रालय का महत्वपूर्ण प्रभार सौंपा गया था। जबकि उपमुख्यमंत्री पद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं बिजेंद्र प्रसाद यादव और विजय कुमार चौधरी को दिए गए, जेडीयू ने निशांत को अपना भावी नेता घोषित किया है।

कैबिनेट में निशांत की तेजी से एंट्री और उसके बाद उन्हें एमएलसी बनाने की सियासी पहल दरअसल बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाता है। सालों तक नीतीश कुमार ने परिवारवाद का खुलकर विरोध किया और अपने परिवार को पार्टी के मामलों से दूर रखा।लेकिन अब जब यह वरिष्ठ नेता अपनी विरासत को सुरक्षित करने और पार्टी के भविष्य के नेतृत्व ढांचे को औपचारिक रूप देने की कोशिश कर रहे हैं, तो निशांत का आगे आना जेडीयू के भीतर एक सोची-समझी प्रक्रिया का संकेत है, जिससे राज्य के कामकाज में अगली पीढ़ी को आगे लाया जा रहा है।

गौरतलब है कि बिहार विधान परिषद चुनाव में सभी 10 उम्मीदवारों ने निर्विरोध जीत दर्ज कर ली है। कई उम्मीदवारों ने 11 जून को बिहार विधानमंडल जाकर जीत का सर्टिफिकेट भी लिया। कुल 10 सीटों के लिए 10 उम्मीदवार थे, इसलिए वोटिंग की नौबत ही नहीं आई।

भारतीय जनता पार्टी के सभी चारों उम्मीदवारों को जीत हासिल हो गई है। बिहार विधानपरिषद चुनाव में एनडीए के पास अपने 8 उम्मीदवारों के लिए पूरे वोट थे। जबकि नीतीश कुमार की खाली सीट पर भी जीत तय थी। इस तरह से बीजेपी के सभी चारों उम्मीदवार निर्विरोध विधान पार्षद निर्वाचित हो गए हैं।

उधर जदयू के भी चारों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए। इनमें से एक ललन मंडल उर्फ ललन प्रसाद पूर्व सीएम नीतीश कुमार की खाली की गई सीट से उम्मीदवार थे। यानी उपचुनाव में भी एनडीए को किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा।

लोजपा रामविलास ने एनडीए की तरफ से अपने उम्मीदवार अशरफ अंसारी को मैदान में उतारा था। वो चिराग पासवान के पुराने वफादार नेताओं में से एक हैं। अब वो भी एलएलसी चुनाव में निर्विरोध जीत कर पहली बार अपने संसदीय जीवन की शुरूआत करेंगे। वहीं राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने सुनील कुमार सिंह को उम्मीदवार बनाया था। राज्यसभा चुनाव की तरह राजद को यहां चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा और सुनील सिंह निर्विरोध विधान पार्षद चुन लिए गए।

Friday, June 05, 2026

कैसा रहेगा पंजाब का चुनावी जायका!


पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. भारतीय जनता पार्टी की तरह ही कांग्रेस ने भी अपनी कमर कस ली है और चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं. इसी क्रम में कांग्रेस ने राज्य संगठन में बड़े फेरबदल की योजना बना रही है और पंजाब प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी किसी और को सौंप रही है. 

गौरतलब है कि पंजाब चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने भी अपना प्रदेश अध्यक्ष बदला है. अब केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब बीजेपी की जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसके बाद कांग्रेस में भी बदलाव की चर्चा तेज हो गई. 

पिछले हफ्ते कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पंजाब के शीर्ष पांच नेताओं को दिल्ली बुलाया था. इस मीटिंग में पंजाब प्रदेश अध्यक्ष के नए नाम पर चर्चा हुई. इसके संकेत पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री और गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर रंधावा ने दिए.

जिन पांच नेताओं को दिल्ली बुलाया गया था उनमें चरणजीत सिंह चन्नी, प्रताप बाजवा, सुखजिंदर रंधावा, डॉ. अमर सिंह और राजा वडिंग शामिल थे. इनके अलावा, राहुल गांधी, कांग्रेस पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल और अन्य पार्टी नेता भी बैठक में मौजूद रहे.

वहीं दूसरी ओर पंजाब के राजनीतिक गलियारों में पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह की 'घर वापसी' की अटकलें तेज हो गई हैं. यानी, कैप्टन अमरिंदर बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में वापसी कर सकते हैं. ऐसी अटकलें इसलिए लगाई जा रही हैं, क्योंकि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा का कहना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के संपर्क में हैं.

कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस वापसी की अटकलें ऐसे समय लगाई जा रही हैं, जब कुछ ही महीनों में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले ही कैप्टन अमरिंदर कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में चले गए थे.

इन सबके बीच भाजपा ने पंजाब में नशे की समस्या को अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाने का फैसला किया है. पार्टी राज्यव्यापी जनसंपर्क कार्यक्रमों और यात्राओं की तैयारी कर रही है. उसका प्रयास है कि नशे के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ चुनावी वादा नहीं, बल्कि एक सामाजिक मिशन के रूप में पेश किया जाए. अमित शाह के लिए भी यह कोई नया मुद्दा नहीं है. वे इस पर काफी पहले से काम करते आए हैं.

यह एक ऐसा मुद्दा है जो जाति, क्षेत्र और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर लोगों को प्रभावित करती है. यह देखना बाकी है कि यह रणनीति मतदाताओं को कितना प्रभावित कर पाती है, लेकिन इतना तय है कि भाजपा इसे 2027 चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाने जा रही है. 

इस चुनाव में लंबे समय तक राज्य में सहयोगी दलों के सहारे अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने वाली बीजेपी अपने दम पर लड़ने और सत्ता के लिए मजबूत दावेदारी पेश करने की रणनीति पर काम कर रही है। यहीं कारण है कि वो अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय और आक्रामक नजर आ रही है।
वहीं अकेले चुनाव लड़ने की बात करते हुए भाजपा और भी बहुत कुछ सोच रही है. दशकों तक पंजाब में भाजपा, शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ गठबंधन के जरिए राजनीति करती रही है. लेकिन इस बार अकेले लड़ने की बात करके वह जनता के बीच अपनी आवाज मुखर तरीके से पहुंचाने की कोशिश में है.

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा ने पूरे राज्य में अपना अभियान तेज कर दिया है. इसके लिए वो काफी हद तक आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व नेताओं राघव चड्ढा और संदीप पाठक के अनुभव पर भरोसा कर रही है, जिन्होंने राज्य में आम आदमी पार्टी के उभार में अहम भूमिका निभाई थी.

भाजपा अपनी रणनीति के केंद्र में संगठनात्मक विस्तार और नशे की समस्या को भी रख रही है. राज्य में भाजपा का लक्ष्य साफ है, संगठन को मजबूत करना और नशे की समस्या को राजनीतिक मुद्दा बनाना है.

इस बार भाजपा अकेले चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार नजर आ रही है. पंजाब की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहने का दौर खत्म होता दिख रहा है. असम, बंगाल के नतीजों के बाद भाजपा नेताओं के अंदर बहुत उत्साह नजर आ रहा है.

माना जा रहा है कि यदि भाजपा पूरी ताकत और संसाधनों के साथ मैदान में उतरे, तो पंजाब में सत्ता हासिल करना अब कोई दूर का सपना नहीं है. 

लोगबाग कह रहे हैं कि पंजाब की राजनीतिक पटकथा में इस बार दो नेताओं की भूमिका अहम होने वाली है. पहला संदीप पाठक और दूसरा राघव चड्ढा. दोनों ने दिल्ली के बाहर आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी सफलता दिलाने में अहम योगदान दिया था. अब ये दोनों भाजपा में हैं.

संदीप पाठक को आम आदमी पार्टी के 'पंजाब मॉडल' का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता रहा है। पाठक ने बूथ स्तर की मैपिंग, डेटा विश्लेषण, सर्वेक्षण और स्वयंसेवकों के मजबूत नेटवर्क के जरिए 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की जमीनी पकड़ मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। राजनीति में उनका काम करने का तरीका हमेशा पर्दे के पीछे रहकर संगठन को मजबूत करने वाला माना जाता रहा है। वहीं, राघव चड्ढा ने पंजाब में आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरे के रूप में काम किया। उन्होंने दिल्ली नेतृत्व और पंजाब इकाई के बीच समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन दोनों नेताओं के आलावा भी आनेवाले दिनों में ऐसे कई चेहरे सामने आयेंगे जो 'पंजाबी पोलिटिकल जायके' को लजीज बनाने का काम करेंगे! 

आने वाले दिनों में पंजाब पर देश की निगाहें होगी! कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल की राजनीतिक गुटबाजी के बीच भाजपा अपने प्रचार तंत्र से किस अंदाज में प्रहार करेगी, इस पर सभी की नजर रहेगी! अभी तो पंजाब की चुनावी कहानी शुरू ही हुई है!

Friday, May 29, 2026

आइए, जानते हैं कि क्या है अन-नैचुरल डेमोग्राफिक चेंज !


पिछले कुछ सालों में असम, बंगाल, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड जैसे सीमावर्ती राज्यों के साथ-साथ बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और यूपी जैसे राज्यों में डेमोग्राफिक चेंज (जनसांख्यिकी बदलाव) को लेकर विवाद सामने आए हैं. इन इलाकों में अवैध प्रवास, सीमा पार से घुसपैठ और फर्जी पहचान पत्रों के सहारे बसने के आरोप लगते रहे हैं.
सरकार का मानना है कि इस बदलाव का सीधा असर वहां के स्थानीय संसाधनों, रोजगार, सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ रहा है. खासकर जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक पहचान और जमीन के अधिकारों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं. 

ऐसे में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या सचमुच में भारत की डेमोग्राफी क्या बदल रही है? अब इसकी स्टडी के लिए केंद्र सरकार ने एक हाई लेवल कमेटी बना दी है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब से कमेटी बनाए जाने का ऐलान किया है, तभी से इस मसले पर खूब चर्चा हो रही है. यह कमेटी एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. हालांकि, जरूरत पड़ी तो इसका कार्यकाल 6 महीने और बढ़ाया जा सकता है. 

इस कमेटी का काम घुसपैठ और दूसरे कारणों से बदल रही भारत की डेमोग्राफी पर स्टडी करना है. डेमोग्राफी चेंज से कैसे निपटा जा सकता है? इसे लेकर भी कमेटी अपने सुझाव देगी.

गृह मंत्री अमित शाह ने X पर पोस्ट कर कहा है कि अप्राकृतिक तरीके से डेमोग्राफी बदलना किसी भी देश के वर्तमान और भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है. इसी चुनौती से निपटने के लिए 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक हाई-लेवल कमेटी बनाने का ऐलान किया था और अब सरकार ने इस कमेटी का गठन कर दिया है.

केंद्र सरकार लंबे समय से डेमोग्राफी चेंज होने की बात करती रही है. पिछले साल 15 अगस्त को लाल किले से भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेमोग्राफी चेंज को एक बड़ी चुनौती बताया था.

अमित शाह डेमोग्राफी चेंज के लिए सबसे बड़ा कारण 'घुसपैठ' को मानते हैं. पिछले साल अक्टूबर में अमित शाह ने X पर आबादी को लेकर कुछ आंकड़े जारी किए थे. इसमें 1951 से 2011 तक की जनसंख्या के आंकड़े बताए गए थे.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और घुसपैठ बड़ा मुद्दा था. इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार का घेराव किया था. इसी आधार पर बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मात दी और पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की. ऐसे में अब केंद्र सरकार द्वारा डेमोग्राफिक चेंज पर हाई लेवल कमेटी गठित करना अहम माना जा रहा है. 

अब लोगबाग यह सवाल करने लगे हैं कि यह कमिटी आने वाले दिनों में कैसे काम करेगी. आसान भाषा में समझें तो यह कमेटी 6 काम करेगी- 
1. डेमोग्राफिक चेंज से जो चुनौतियां पैदा हुईं, उन पर विचार करना।
2. डेमोग्राफिक चेंज की वजहें- जैसे सीमापार से अवैध घुसपैठ, आर्थिक वजहें और दूसरे सोशियो-इनवायरमेंटल फैक्टर्स की स्टडी करना।
3. डेमोग्राफिक चेंज के पीछे कुछ और अंडरलाइंग फैक्टर- जैसे बस्तियां बसाने के असामान्य पैटर्न, माइग्रेशन वगैरह की पहचान करना।
4. धार्मिक या सामाजिक कम्युनिटीज में पॉपुलेशन चेंज की एनालिसिस करना। खास तौर पर वहां, जहां पॉपुलेशन नॉर्मल ट्रेंड से काफी अलग तरीके से बदल रही है।
5. देश में मौजूद घुसपैठियों को कानूनी तरीके से पहचानने, हिरासत में लेने और डिपोर्ट करने की स्थायी मैकेनिज्म बनाना।
6. बॉर्डर मैनेजमेंट, आबादी कंट्रोल करने और इससे जुड़ी चीजों को मॉनिटर करने के लिए एक मैकेनिज्म सुझाना।
इनके अलावा कमेटी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अवैध घुसपैठ, डेमोग्राफिक चेंज के मामले में बेहतर को-ऑर्डिनेशन के लिए पॉलिसी बनाने का भी सुझाव देगी।

यह समिति मुख्य रूप से इन तीन क्षेत्रों पर प्रमुखता से काम करेगी- 

• असामान्य बदलावों की जांच और विश्लेषण: समिति यह पता लगाएगी कि देश के किन खास क्षेत्रों और सामाजिक समुदायों में असामान्य रूप से जनसंख्या का असंतुलन पैदा हुआ है.
• अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन: भारत में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और उनके वापस भेजने के लिए एक स्थायी और मजबूत कानूनी व्यवस्था का सुझाव देना इस समिति का प्रमुख काम होगा.
• कड़े नियमों और नीति का निर्माण: भविष्य में किसी भी तरह की घुसपैठ को पूरी तरह रोकने के लिए सीमा प्रबंधन को कैसे मजबूत किया जाए, समिति इस पर सरकार को विस्तृत योजना सौंपेगी ताकि डेमोग्राफिक असंतुलन को सुधारा जा सके.

दरअसल सरकार पूरे देश के डेमोग्राफिक पैटर्न का वैज्ञानिक और संस्थागत अध्ययन कराना चाहती है, ताकि वास्तविक स्थिति के आधार पर ठोस नीतियां बनाई जा सकें. गौरतलब है कि भारत की बदलती डेमोग्राफी के पीछे घुसपैठ, धर्मांतरण, कथित लव जिहाद और ज्यादा आबादी को बड़ा कारण बताया जाता है. लेकिन अब तक आधिकारिक तौर पर इसका कोई ठोस कारण नहीं बताया गया है. उम्मीद है इस कमेटी की रिपोर्ट से इस सवाल का जवाब भी मिल जाएगा. 



Girindra Nath Jha
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