Friday, October 16, 2026

क्या आपको जम्मू के बसोहली उत्सव की जानकारी है!


सनातन संस्कृति, कला और अनूठी ऐतिहासिक विरासत की भूमि बसोहल (प्राचीन नाम: विश्वस्थली) एक बार फिर अपने भव्य बसोहली उत्सव 2026 की मेजबानी के लिए पूरी तरह सज-धज कर तैयार है।

जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में रावी नदी के किनारे बसा छोटा-सा पहाड़ी शहर बसोहली अपने आकार से कहीं अधिक समृद्ध विरासत को समेटे हुए है। कभी 'विश्वस्थली'के नाम से जाना जाने वाला बसोहली आस्था और तीर्थ की भूमि होने के साथ-साथ ऐतिहासिक रूप से व्यापार, वस्त्र शिल्प और भारत की प्रसिद्ध लघु चित्रकला परंपरा के प्रमुख केंद्रों में से एक रहा है।

हाल के वर्षों में इस गौरवशाली विरासत को बसोहली उत्सव के माध्यम से एक औपचारिक और वार्षिक मंच मिला है। बहुदिवसीय यह उत्सव तेजी से जम्मू क्षेत्र के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में अपनी पहचान बना रहा है।

बसोहली उत्सव की शुरुआत वर्ष 2023 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य बसोहली को भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर उसका उचित स्थान दिलाना और इसकी गहरी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाना था।

इस पहल का आयोजन जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषाएँ अकादमी, जम्मू संभागीय प्रशासन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) और विश्वासस्थली संगठन द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। इन सरकारी सांस्कृतिक संस्थाओं और विरासत से जुड़े संगठनों ने मिलकर इस आयोजन को एक व्यापक सांस्कृतिक मंच का स्वरूप दिया है।

अपनी शुरुआत के बाद से बसोहली उत्सव लगातार आगे बढ़ रहा है। इसका तीसरा संस्करण 28 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक आयोजित किया गया था। जम्मू प्रशासन, IGNCA और अन्य संगठन द्वारा आयोजित इस संस्करण में क्षेत्र की जीवंत परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। इस दौरान रामायण परंपरा पर विशेष ध्यान दिया गया और रामायण आधारित प्रदर्शनियां एवं पुस्तिकाएं, लोक कला प्रदर्शनियां, लोक नृत्य एवं गायन की राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, स्थानीय खेल प्रतियोगिताएं तथा विभिन्न कला और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की गईं।

बसोहली के महत्व को समझने के लिए उसके गहरे ऐतिहासिक मूल को जानना आवश्यक है। ऐतिहासिक रूप से बसोहली कठुआ जिले की एक तहसील रहा है और पवित्र रावी नदी के किनारे स्थित है। ऋग्वेद में रावी को ‘इरावती’ कहा गया है और इसे सप्त-सिंधु की सात महान नदियों में शामिल किया गया है। शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित बसोहली अपने वर्तमान अपेक्षाकृत छोटे स्वरूप के बावजूद प्राचीन गौरव की एक समृद्ध विरासत रखता है।

बसोहली उत्सव का आयोजन विशेष रूप से शहर की ऐतिहासिक पहचान विश्वासस्थली के रूप में पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया। यह पहचान उस समय की ओर संकेत करती है जब बसोहली व्यापार का एक समृद्ध केंद्र था और अपने पश्मीना ऊन उत्पादों, लघु चित्रकला तथा रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के लिए प्रसिद्ध था। रावी नदी के किनारे अनेक मंदिरों की उपस्थिति और वहां होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के कारण बसोहली को लोकप्रिय रूप से “लघु काशी” अर्थात छोटी काशी या वाराणसी भी कहा जाता था।

बसोहली उत्सव के एक उद्घाटन अवसर पर उपराज्यपाल ने इसे “कला, संस्कृति और परंपरा का महाकुंभ” बताया था और कहा था बसोहली केवल मानचित्र पर स्थित एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह कला, साहित्य और परंपरा से जुड़े साधकों का “ऊर्जा क्षेत्र” है।

बसोहली उत्सव को केवल एक औपचारिक समारोह के रूप में नहीं, बल्कि एक बहुदिवसीय सांस्कृतिक उत्सव के रूप में तैयार किया गया है। इसमें बसोहली शॉल बुनाई के प्रदर्शन, क्षेत्र की प्रसिद्ध जीआई-टैग प्राप्त पश्मीना ऊन शिल्प, बसोहली चित्रकला की प्रदर्शनियां और प्रत्यक्ष प्रदर्शन, क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक विरासत से जुड़ी प्रदर्शनियां, पारंपरिक नृत्य और लोक संगीत, रामलीला एवं रामायण आधारित कार्यक्रम, लोक नृत्य और गायन की राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, स्थानीय खेल प्रतियोगिताएं, क्षेत्रीय डोगरा व्यंजनों के खाद्य स्टॉल तथा मनोरंजक खेल और सामुदायिक गतिविधियां शामिल हैं।

बसोहली की रामलीला परंपरा को विशेष पहचान मिली है।

इस बार भी बसोहली में ऐतिहासिक रामलीला की तैयारियां जोरों पर हैं, जहाँ कलाकार बिना किसी पारिश्रमिक के रामायण के पात्रों को जीवंत कर रहे हैं। यह 114 साल पुरानी परंपरा क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बसोहली की रामलीला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्ष 1912 में पहली बार बसोहली में रामलीला का मंचन किया गया था। इसके बाद से यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही है। 

उत्सव का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को भी बसोहली की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है, विशेष रूप से नवरात्र के दौरान वैष्णो देवी मंदिर आने वाले यात्रियों को। इस प्रकार बसोहली उत्सव केवल स्थानीय संस्कृति का उत्सव नहीं रह जाता, बल्कि जम्मू क्षेत्र के व्यापक तीर्थ और पर्यटन परिपथ में बसोहली को जोड़ने का प्रयास भी बनता है।

बसोहली की सांस्कृतिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी प्रसिद्ध बसोहली चित्रकला है। इसे व्यापक पहाड़ी लघु चित्रकला शैली की प्रारंभिक शैली के रूप में देखा जाता है, जिससे आगे चलकर गुलेर, कांगड़ा, चंबा और कुल्लू जैसी शैलियां विकसित हुईं। बसोहली शैली स्थानीय शासकों संग्राम पाल (1635–1673) और बाद में किरपाल पाल (1678–1693) के संरक्षण में विकसित हुई। इस परंपरा को प्रमुख कलाकारों देविदास और बाद में मनाकू ने आगे बढ़ाया।

बसोहली चित्रकला के प्रारंभिक ज्ञात उदाहरणों में देविदास द्वारा 1694 ईस्वी में बनाई गई रसमंजरी की चित्रावली महत्वपूर्ण मानी जाती है। वहीं 1730 ईस्वी की मनाकू की गीत गोविंद श्रृंखला इस शैली के परिष्कार को दर्शाती है। प्रारंभिक बसोहली चित्रों में पश्चिमी भारत की चौरपंचाशिका शैली से समानता दिखाई देती थी, लेकिन समय के साथ यह एक विशिष्ट और जीवंत पहाड़ी कला शैली के रूप में विकसित हुई।

बसोहली चित्रकला अपने रंगों और रेखाओं की प्रभावशाली जीवंतता के लिए जानी जाती है। इसमें विशेष प्रकार का चित्र प्रारूप, वास्तु संबंधी विवरण और लाल सीमाएं दिखाई देती हैं। चित्रों में चेहरे प्रायः पार्श्व रूप में दिखाए जाते हैं और बड़ी, तीव्र अभिव्यक्ति वाली आंख उनकी विशेष पहचान होती है। चमकीला गेरुआ पीला, भूरा और हरा रंग इसकी रंग योजना में प्रमुख हैं। रंग और भावनाओं की इसी तीव्रता के कारण जर्मन विद्वान डॉ. हरमन गोल्ट्ज़ ने बसोहली चित्रों को “भारतीयों की महान उपलब्धियों में से एक” बताया था।

बसोहली कला की केंद्रीय प्रेरणा वैष्णव परंपरा है। इसके चित्रों में महान महाकाव्यों और पुराणों से विषय लिए गए हैं। इसके साथ ऐतिहासिक, समकालीन, साहित्यिक और अन्य विषय भी चित्रित किए गए। इन चित्रों में गहरी भावनात्मक तीव्रता के साथ बसोहली के प्राकृतिक परिवेश की काव्यात्मक अनुभूति दिखाई देती है। इन्हें सुंदर रूप से “रंगों में कविताएं” कहा गया है।


आधुनिक समय में बसोहली चित्रकला को औपचारिक पहचान मिली और इसे भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त हुआ। यह जम्मू क्षेत्र के हस्तशिल्प के लिए जीआई पंजीकरण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इसके साथ बसोहली पश्मीना ऊनी वस्तुओं को भी मान्यता मिली। आज यह कला केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक रूप से आज भी जीवित है। इसकी निरंतर कलात्मक परंपरा मनिकांठ परिवार से जुड़ी है, जिसके कलाकार मुगल दरबार से यहां आए थे। इस परंपरा को आज प्रसिद्ध कलाकार प्रकाश चंद मनिकांठ आगे बढ़ा रहे हैं।

बसोहली की कला परंपरा से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्वों में देविदास, जो 1694 की रसमंजरी चित्रावली के लिए प्रसिद्ध हैं; मनाकू, जो 1730 की गीत गोविंद श्रृंखला के लिए जाने जाते हैं; आनंद कुमार कूमारस्वामी, जिन्होंने बसोहली चित्रकला को वैश्विक विद्वत जगत के ध्यान में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई; तथा राजा संग्राम पाल और राजा किरपाल पाल, जिनके संरक्षण में यह कला शैली विकसित हुई, शामिल हैं। समकालीन समय में प्रकाश चंद मनिकांठ इस पारंपरिक चित्रकला के प्रमुख संरक्षक हैं। वहीं उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वर्ष 2023 में बसोहली उत्सव की परिकल्पना की और इसकी शुरुआत की।

बसोहली उत्सव केवल कैलेंडर में दर्ज एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का एक प्रयास है। चित्रकला, वस्त्र शिल्प, नृत्य, रंगमंच और तीर्थ-पर्यटन को एक मंच पर लाकर यह उत्सव आधुनिक पीढ़ी को उस शहर की विरासत से जोड़ने का प्रयास करता है, जिसने कभी भारतीय कला के इतिहास को प्रभावित किया था।

रावी नदी के दाहिने तट पर बसे इस खूबसूरत शहर में आगामी 19 से 21 अक्टूबर तक तीन दिवसीय सांस्कृतिक महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है। यह महोत्सव न केवल डोगरा संस्कृति और कलात्मक धरोहरों का अद्भुत संगम है, बल्कि इसका सीधा जुड़ाव पर्यटन को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने से है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भी अपने कार्यक्रम 'मन की बात' में बसोहली उत्सव की अनूठी सांस्कृतिक पहचान की सराहना की थी।

Sunday, October 11, 2026

खेती-बाड़ी कलम स्याही

आज फेसबुक मेमोरी में अपना ही स्टेटस मोहक लग रहा है ! आज के ही दिन फेसबुक को अपना परिचय दिया था - 'खेती - बाड़ी, कलम स्याही'! 
किसानी करते हुए ग्यारह साल गुजर गए। इन गुजरे वर्षों में जीवन इंद्रधनुष की माफिक हो गया। कितना कुछ बदल गया। एक से बढ़कर एक लोग मिलते रहे, कारवां बनता जा रहा है। 

गुजरे वर्षों में बहुत कुछ खोया भी, बहुत कुछ पाया भी। आप जब अपने काम-धाम का लेखा-जोखा करने बैठते हैं तो आपका मन शिक्षक की भूमिका में सामने खड़ा हो जाता है। वही बताता है कि आपने क्या खोया, क्या पाया! 

गाम -घर और खेती-बाड़ी, जीवन का हर रंग दिखाने में कामयाब रहा और यह चेतावनी भी देता रहा कि अभी बहुत कुछ करना बांकी है, पड़ाव आते रहेंगे, लेकिन वह हमारी मंजिल नहीं होगी।

इन दस वर्षों में धान, मक्का, गाछ-वृक्ष, जल-जंगल-जमीन, सबकुछ किताब के पन्नों की तरह जीवन में समा चुका है। किसान की आवाज़ अंदर-भीतर रियाज़ करता रहता है। 'एक ऋतु आये एक ऋतु जाए' की सीख इसी पेशे में मिली।

धान के मौसम में किसानी करते हुए इन गुजरे ग्यारह साल का हिसाब करने बैठा हूँ तो धान की बाली और भी मोहक लगने लगी है। 

खेत को देखता हूँ लगता है कि कबीर लाठी लिए सामने खड़े हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि मन के भीतर कितना मैल बैठ गया है, पहले उसे तो साफ करो! तभी सूरदास की यह पाती याद आ जाती है- 

"मो सम कौन कुटिल खल कामी।
पापी कौन बड़ो है मोसे, 
सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, 
सुनिए श्रीपति स्वामी॥"

दरअसल खेती - बाड़ी, कलम स्याही करते हुए हर दिन कई लोगों से मुलाकात होती है, हर कोई कुछ न कुछ न सीख देकर ही जाते हैं। किसानी के पेशे में आने के बाद इस बात को लेकर मन और मजबूत हुआ कि वक्त सबसे बड़ा शिक्षक है, वही सम्पादक है, वही साथी है, वह सबकुछ सीखा देता है। 

इन गुजरे ग्यारह साल में बाबूजी की छाया भीतर पानी की तरह समाने लगी है, वे हर दिन कुछ नया दे जाते हैं ताकि संघर्ष जारी रहे। 

एक बार उन्होंने पूछा था - "झिंगुर की 'झीं-झीं' और गिरगिट की 'ठीक-ठीक' आवाज़ को पहचान सकते हो?" उस वक्त उनके सवाल को समझ न सका था, वे भीतर की शांति को समझने की सलाह दे रहे थे। दरअसल भीतर की शांति मन को धो देती है। 

खेती बाड़ी करते हुए लोगबाग से करीबी बढ़ती जा रही है, खेत की माया गाछ-वृक्ष की छाया में समाते जा रही है, नाटक की तरह। 

गुजरे वर्षों में गाँव भी बदला है, बहुत कुछ बदला। लेकिन किसानी के पेशे में आने के बाद जिस चीज ने मुझे मजबूत बनाया है वह संघर्ष ही है, रेणु की बोली में- 'तेरे लिए मैंने लाखों के बोल सहे...'

अभी बहुत कुछ करना बांकी है, यात्रा जारी है, हम सब यात्री बने रहें...

शारदीय नवरात्र के प्रथम दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं!

#ChankaResidency
#kisaan

Friday, October 09, 2026

यूपी में राजनीति का ‘चिराग मॉडल’

उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले चिराग पासवान राजनीति के नए दरवाजे खोलते नजर आ रहे हैं। अपने पिता और पार्टी संस्थापक रामविलास पासवान की पुण्यतिथि का बड़ा कार्यक्रम बिहार की जगह लखनऊ में कराकर उन्होंने उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी सक्रियता का साफ संदेश दे दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिहार की तरह यूपी में भी भाजपा के लिए ' चिराग मॉडल ' फायदेमंद साबित होगा!
पिछले कुछ महीने से चिराग पासवान की पार्टी ने यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों को लेकर संगठन विस्तार की तैयारी कर रही है। पार्टी का फोकस बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने और संभावित उम्मीदवारों को तैयार करने पर है। करीब 100 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रभारियों की तैनाती की जा चुकी है।

चिराग पासवान ने अपने पिता रामविलास पासवान की पुण्यतिथि के कार्यक्रम के लिए लखनऊ को चुनकर यूपी में चिराग मॉडल को शुरु करने की कोशिश की है। गुरुवार को लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के संस्थापक राम विलास पासवान की 6वीं पुण्यतिथि पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी जुटान देखने को मिली। 

लोजपा पार्टी अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के न्योते पर सीएम योगी ने भी कार्यक्रम में शिरकत की। इसके अलावा राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और अनुप्रिया पटेल, मंत्री दयाशंकर सिंह, लोनी विधायक नन्द किशोर गुर्जर भी शामिल हुए।

लखनऊ के दयाल बाग में आयोजित पुण्यतिथि समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 50 वर्ष पहले रामबिलास पासवान ने जो सामाजिक लड़ाई शुरू की थी, उसकी राजनीतिक विरासत को अब उनके पुत्र चिराग पासवान आगे बढ़ा रहे है। मुख्यमंत्री योगी ने यूपी में इस आयोजन के लिए आभार जताया।

दरअसल लखनऊ में आयोजन के जरिए चिराग ने यूपी की राजनीति में अपनी मौजूदगी और पार्टी के विस्तार की महत्वाकांक्षा दोनों को सामने रखा है। रामविलास पासवान की जयंती का कार्यक्रम भी इससे पहले लखनऊ में आयोजित किया गया था। अब पुण्यतिथि का बड़ा आयोजन राजधानी में होने से यह संकेत और मजबूत हुआ है कि LJP (रामविलास) यूपी को बिहार के बाहर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए अहम मान रही है।

पुण्यतिथि के बहाने पार्टी अपनी स्थिति के आकलन के ही साथ ही दूसरों को शक्ति का अहसास करा पासी समाज को लामबंद करने की भी कोशिश में जुटी है। इससे पहले 5 जुलाई को पार्टी संस्थापक राम विलास पासवान की जयंती भी आईजीपी में आयोजित की गई थी। अभी 27 सितंबर को ‘यूथ बोले तो’ कार्यक्रम प्रयागराज में था।

वहीं कुछ महीने पहले लोजपा (रामविलास) सांसद और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के रिश्तेदार अरुण भारती ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा था- गूंजे धरती-आसमान, पंडित पासी-पासवान! उस वक्त भारती के इस नारे के सियासी निहितार्थ भी निकाले गए थे। राजनीतिक जानकारों की मानें तो लोजपा (रामविलास) यूपी में अपनी पैठ जमाने के लिए नए सियासी समीकरण बना रही है। इसके जरिए वह उन वर्गों को भी साथ लाने की जुगत में है जो अभी यूपी में उसके साथ नहीं हैं।

चिराग पासवान ने हाल ही में बयान दिया था कि नागालैंड में लोजपा (रामविलास) अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ेगी। वहां पार्टी के दो विधायक हैं। जबकि उत्तर प्रदेश में गठबंधन को लेकर अभी बातचीत और संगठनात्मक स्तर पर तैयारी चल रही है। चिराग ने कहा कि पार्टी यूपी में किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहती है।

विधानसभा चुनाव को लेकर चिराग पासवान ने कहा, 'मैं सभी 403 सीटों के लिए तैयारी करूंगा. हमारी पार्टी लंबे समय से गठबंधन की राजनीति का हिस्सा रही है, लेकिन गठबंधन में रहने का मतलब सिर्फ सीटें हासिल करना नहीं है.'

चिराग ने कहा कि पार्टी को हर सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए. इससे संगठन मजबूत होता है और जरूरत पड़ने पर सहयोगी दलों को भी इसका फायदा मिलता है. इसी तरह उनकी पार्टी बिहार की सभी 243 सीटों के लिए तैयारी की है. इसके अलावा पंजाब में भी 117 सीटों पर काम किया जा रहा है.

गौरतलब है कि यूपी चुनाव 2027 के लिए लोजपा (रामविलास) ने तैयारी काफी दिन पहले से ही कर दी थी। इसी के तहत 27 सितंबर को चिराग पासवान ने प्रयागराज में 'यूथ बोले तो' कार्यक्रम किया था। अब लोजपा ने यूपी चुनाव से पहले चिराग पासवान की कम से कम 20 रैलियां अलग-अलग जिलों में कराने की तैयारी की है। ताकि एक माहौल तैयार किया जा सके। इनके जरिए लोजपा रामविलास की नजर यूपी के दलित के साथ युवा वोटर पर है।

दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट लंबे समय से मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ जुड़ा रहा है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन बहुत की कमजोर रहा था। ऐसे में दलित वोट बैंक को लेकर नए समीकरण बनने लगे हैं।

चुनावी आंकड़ों पर यदि बात की जाए तो 2024 में भाजपा को गैर-यादव ओबीसी गैर-जाटव दलित वोटों में नुकसान हुआ था। ये वोट बैंक इंडिया गठबंधन की ओर शिफ्ट हो गया था। इसी की वजह से इंडिया गठबंधन यूपी में लोकसभा की 80 में से 43 सीटों पर जीत दर्ज कर सका था। ऐसे में चिराग मॉडल यदि ठीक से काम कर जाए तो भाजपा को फायदा मिल सकता है।

माना जा रहा है कि यदि चिराग पासवान यूपी में दलित मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाने में सफल होते हैं, तो इससे नुकसान इंडिया गठबंधन को हो सकता है। फिर चाहे वो एनडीए में लड़कर चुनाव लड़ें, या अकेले। लोकसभा चुनाव में जो वोटर भाजपा से नाराज था, उसने इंडिया गठबंधन को वोट किया था। अगर चिराग के रूप में दलित वोटर को विकल्प मिलेगा तो उनके लिए वोट कर सकते हैं।

वहीं दूसरी ओर खबर आ रही है कि विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश की सियासत में एक और बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम होने जा रहा है। समाजवादी पार्टी से बगावत कर चुके तीन विधायक अब औपचारिक तौर पर भाजपा का दामन थामेंगे। इनमें राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी शामिल हैं। नवरात्रि में 14 अक्तूबर को अमेठी में आयोजित कार्यक्रम में ये तीनो विधायक भाजपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे।

आने वाला हर दिन उत्तर प्रदेश के लिए चुनावी तैयारियों का दिन होगा! हर दल अपनी स्थिति मजबूत करते दिखेंगे। बाद बाकी जनता तो सबकुछ देख ही रही है!




Girindra Nath Jha
www.anubhaw.blogspot.com
Chanka Residency
09661893820

Friday, October 02, 2026

बापू के बहाने गाम- घर और शहर!

खेत-खलिहान और किताबों की दुनिया में रमे रहने वाले इस किसान को जिस एक शब्द में डूबने की चाहत है, वह है - 'महात्मा गांधी'। बचपन में गांधी जी हमारे पाठ्यक्रम में आए लेकिन तब इतिहास विषय को लेकर ही उन्हें समझ रहा था, या कहिए समझाया जा रहा था। लेकिन उम्र के साथ गांधी शब्द से अपनापा बढ़ता चला गया।

घर में गांधी डायरी दिखने लगी तो इस शब्द से नज़दीकी और बढ़ गई। लेकिन इन सबके बीच लेखक रामचंद्र गुहा की लेखनी से परिचय होता है और इस परिचय के सूत्रधार बनते हैं - सुशांत झा. सुशांत भाई ने रामचंद्र गुहा की किताबों का अनुवाद किया है। गांधी जी के शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफ़र पर गुहा ने 'गांधी भारत से पहले' किताब लिखी है और उनकी दूसरी किताब जिसने मुझे गांधी जी के क़रीब पहुंचाने का काम किया वह है - 'भारत गांधी के बाद.'

बचपन से सुनता आया हूं कि गांधी जी बिहार दौरे में पूर्णिया प्रवास भी करते थे। यहां उनके नाम पर दो मुख्य आश्रम हैं, एक टिकापट्टी में और दूसरा रानीपतरा में। महात्मा गांधी 1925, 1927 और 1934 में पूर्णिया आते हैं। यहां 13 अक्टूबर 1925 में बापू की पूर्णिया के एक गांव की यात्रा का जिक्र जरूरी है।

बापू पूर्णिया शहर से 25 मील दूर एक गांव विष्णुपुर पहुंचते हैं, एक पुस्तकालय का उद्घाटन करने। वहां उन्हें सुनने के लिए हजारों लोग जमा थे। गांधी ने वहां लोगों को संबोधित किया। शाम में वे एक पुस्तकालय पहुंचते हैं, जिसका नाम मातृ मंदिर था। गांधी जी ने इस पुस्तकालय का उद्घाटन किया। चौधरी लालचंद जी ने अपनी पत्नी की स्मृति में इस पुस्तकालय की स्थापना की थी।

गांधी जी ने पुस्तकालय के बाहर महिलाओं के एक समूह को संबोधित किया था। शहर से दूर देहात में पुस्तकालय और बापू का पहुंचना ही पूर्णिया परिचय है।

गांधीजी की सादगी भी हमें खींचती है। कोई आदमी इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रख सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी, जब उन्होंने देखा था कि ब्रिटिश हुकूमत में भारत का आम आदमी भूखा और नंगा बना दिया गया है। उन्होंने अपना कपड़ा खुद बुना और खुद धोया और जब वे वायसराय लॉर्ड इरविन से मिले तब भी अपनी चिर-परिचत वेशभूषा में थे जिसे देखकर चर्चिल ने घृणा से उन्हें 'अधनंगा फकीर' कहा था।

देश-विदेश की बातें करते हुए गांव की दुनिया में गांधी जी खोजने की इच्छा जाग गई है। ऐसे में पंचायती राज का ख़्याल आता है। गांधी जी ने पंचायती राज के बारे में जो सपना देखा था वह साकार हो चुका है। गांधी जी ने ‘मेरे सपनों का भारत’ में पंचायती राज के बारे में जो विचार व्‍यक्‍त किये हैं वे आज वास्‍तविकता के धरातल पर साकार हो चुके है क्‍योंकि देश में समान तीन-स्‍तरीय पंचायती राज व्‍यवस्‍था लागू हो चुकी है जिसमें हर एक गांव को अपने पांव पर खड़े होने का अवसर मिल रहा है। उनका मानना था कि जब पंचायती राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती।

हालांकि काग़ज़ पर यह सब पढ़ने में अच्छा लगता है लेकिन ज़मीन पर गांधी जी का ग्राम स्वराज भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। आज बापू की जयंती है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि हम सबसे अधिक झूठ बापू के ही नाम पर बोलते हैं। अब दो अक्टूबर को आयोजित होने वाले ग्राम सभा को ही लीजिये! यह भी एक झूठ है। जबकि यह लिखते हुए मुझे गांधी जी का यह लिखा याद आ रहा है - "अगर हिंदुस्‍तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्‍वीर की सच्‍चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी।”

पिछले एक दशक से बिहार के ग्रामीण इलाके में हूँ और सच कह रहा हूँ ' ग्राम सभा' का मजाक देख रहा हूँ। एक कॉपी या कहिये एक रजिस्टर में ग्राम सभा आयोजित होती है और उस कॉपी के पन्ने पर गांधी जयन्ती लिख कर झूठ का व्यापार किया जाता है। दरअसल यहीं से 'गांधी' नाम पर घोटाले की शुरुआत होती है।

यह कटु सच है कि हम सबकी चुप्पी गांधी जी के नाम पर होने वाले झूठ के व्यापार को बढ़ावा देती आई है। इसके लिए हम सब दोषी हैं क्योंकि यह देश की संसद की बात नहीं, हमारे आपके पंचायत - वार्ड की है।

आप दिल्ली- पटना या किसी भी सूबे के प्रधान को बड़ी आसानी से दो बात कह देते हैं लेकिन आँख के सामने घर-दुआर - पंचायत में होने वाली गलतियों पर गज़ब की चुप्पी साध लेते हैं। ईमानदारी से कहूँ तो ग्राम सभा में एक चुप्पी रहती है और फिर उस चुप्पी के एवज में लम्बा व्यापार चलता है।

हमें इस चुप्पी की ही सजा मिल रही है। गांधी हमें अन्याय सहने की बात नहीं कह गए हैं। कम से कम गाँव में चुनाव के जरिये जिन्हें चुनते हैं, उनसे तो सवाल करिये।

बापू की सादगी से सीखने का यह समय है। निजी तौर पर मुझे उनकी सादगी ही  खिंचती है। कोई आदमी इतनी ऊँचाई पर पहुँचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रखा होगा, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी। तो आइये, सादगी से ही सही सवाल करिये!



Sunday, September 27, 2026

चुनाव से पहले पंजाब!

किसी भी राज्य में जब चुनाव की तारीख नजदीक आने लगती है, वहां की सियासी हवा भी रंग बदलने लगती है। पिछले कुछ महीने से अपनी निगाह पंजाब पर है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होंगे। वैसे इन दिनों देश में चुनाव और मुख्य चुनाव आयुक्त की खबरें सबसे अधिक सुर्खियां बटौर रही है।  

चुनाव को लेकर पंजाब में हर दल अब अलर्ट मोड में है। कोई यात्रा निकाल रहा है, कोई आरोप- प्रत्यारोप लगाने में जुटा है तो कोई इधर से उधर नेताओं को करने में लगा हुआ है।

इन सबके बीच कांग्रेस पार्टी युवाओं को अपने पाले में करने के लिए योजना बनाने लगी है। आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी पंजाब कांग्रेस का फोकस इस बार युवाओं पर है। कांग्रेस ने इस बार सचिन पायलट पर दांव लगाया है और उन्हें पंजाब का नया प्रभारी बनाया है। सचिन पायलट सूबे में युवाओं को एकजुट करने की पूरी तैयारी में जुट गए हैं। उन्होंने यूथ कांग्रेस पदाधिकारियों और युवा नेताओं से फीडबैक लेने का काम शुरू कर दिया है, जिसका उद्देश्य है ऐसे नेताओं की पहचान करना जो बूथ स्तर पर सक्रिय हो और युवाओं के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ सके। आने वाले दिनों में वे पंजाब की यात्रा भी करेंगे।

दरअसल, पंजाब में 18 से 29 साल के युवा मतदाताओं की संख्या करीब 48.9 लाख से अधिक है और ये कुल वोटरों की संख्या का करीब 22 फीसदी है। पंजाब के विभिन्न राजनीतिक दल इन्हें अपने पक्ष में करने की कवायद में जुटे हुए हैं। इसी क्रम में मंगलवार को सचिन पायलट ने दिल्ली के इंदिरा भवन में पंजाब युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष शुभम शर्मा समेत अन्य नेताओं के साथ बेठक की और उनका फीडबैक लिया।

इस बैठक का उद्देश्य 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को मजबूत करना, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से समन्वय बढ़ाना और संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना है। कांग्रेस चुनावों से पहले एक तरह से 'जेन Z' वोटरों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया ने दावा किया है कि पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में उनकी पार्टी चमत्कार करेगी। उन्होंने एक बार फिर साफ किया कि पार्टी कुल 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और अपनी स्ट्रैटजी, मैनेजमेंट और कैंपेन के बलबूते बहुमत का आंकड़ा पार कर लेगी।

भाजपा- कांग्रेस की सियासी तैयारियों के बीच राज्य की सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) ने गुरुवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह एहसास होने के बाद कि पंजाब ने बीजेपी को नकार दिया है, अब वे पंजाबियों से राजनीतिक बदला लेने और चुनाव से पहले उनके लिए मुश्किलें खड़ी करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। आप के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी) के ऑपरेशन ने तीन दिनों से पूरे पंजाब में सरकारी कामकाज को प्रभावित किया है। इससे लोगों को बहुत परेशानी हो रही है, जबकि छापों में कुछ हासिल नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार का विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों के खिलाफ ईडी, इनकम टैक्स विभाग और चुनाव आयोग का इस्तेमाल करना उनकी पहचान बन गया है, लेकिन पंजाब डरने वाला नहीं है और तीन करोड़ पंजाबी लोकतांत्रिक तरीके से भाजपा को जवाब देंगे।

राजनीतिक दलों की कथाओं के बीच पंजाब की राजनीति में एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला सियासी फेरबदल देखने को मिल रहा है। इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) के पूर्व चर्चित और तेज तर्रार अधिकारी निरंजन सिंह राजनीति की पिच पर भाग्य आजमाने जा रहे हैं। उन्होंने पंजाब की खडूर साहिब सीट से सांसद और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत आरोपी अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘अकाली दल (वारिस पंजाब दे)’ का दामन थाम लिया है। उनके इस राजनीतिक कदम ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

मीडिया से बात करते हुए निरंजन सिंह ने वारिस पंजाब दे में शामिल होने का कारण भी बताया। उन्होंने वारिस पंजाब दे में शामिल होने का कारण पंजाब में नशे और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को बताया। बता दें कि अमृतपाल सिंह ने पंजाब में नशे के खिलाफ खालसा वहीर मुहिम शुरू की थी। उन्होंने दावा किया कि इस अभियान से बड़ी संख्या में युवाओं को नशा छोड़ने के लिए प्रेरणा मिली।
 
गौरतलब है कि निरंजन सिंह मई 2021 में सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने कई चर्चित मादक पदार्थ मामलों की जांच की थी। इनमें करोड़ों रुपये के जगदीश भोला मादक पदार्थ तस्करी मामले की जांच भी शामिल है। उन्होंने पीएमएलए के तहत जांच किए गए इस मामले में पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया और सरवन सिंह फिल्लौर समेत कई वरिष्ठ नेताओं से पूछताछ की थी।

निरंजन सिंह का प्रशासनिक और जांच का इतिहास काफी सुर्खियां बटोर चुका है। ईडी में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल और बेहद संवेदनशील मामलों की जांच की कमान संभाली थी। पंजाब के बहुचर्चित ड्रग्स मामले में अकाली दल के सीनियर नेता बिक्रम सिंह मजीठिया से लंबी पूछताछ करने वाले अधिकारियों में निरंजन सिंह प्रमुख रूप से शामिल थे। उस दौरान मजीठिया से पूछताछ और अचानक निरंजन सिंह के ट्रांसफर को लेकर पंजाब की राजनीति में भारी भूचाल आया था और यह मुद्दा लंबे समय तक सुर्खियों में रहा था। अब उसी तेवर वाले पूर्व अधिकारी का एक ऐसे सांसद की पार्टी में शामिल होना, जो खुद गंभीर आपराधिक मामलों और आतंकवाद से जुड़े आरोपों का सामना कर रहा है, सवाल उठाता है। इस सियासी कदम से आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति में नए समीकरण बनते नजर आ रहे हैं, जहां एक तरफ प्रशासनिक अनुभव और सख्त छवि का दावा है, तो दूसरी तरफ विवादित पृष्ठभूमि का साया है।

चुनाव नजदीक हो और बिजली बिल माफी की खबरें न आए तो सियासी खिचड़ी बनती नहीं दिखती है। ऐसे में पंजाब से खबर आई है कि राज्य सरकार ने 518 गोशालाओं के 100 करोड़ रुपये से अधिक के बिजली बिल माफ किए हैं। इनमें अमृतसर जिले की 14 गोशालाएं भी शामिल हैं। यह जानकारी पंजाब गो सेवा आयोग के उपाध्यक्ष कीमती भगत ने जिला प्रशासनिक परिसर में अधिकारियों और गोशाला प्रबंधकों के साथ बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में दी। दरअसल चुनाव से पहले ऐसी खबरें बताती है कि आने वाले समय में सूबे की सियासत अभी और भी कई रंग दिखाएगी।

Friday, September 18, 2026

विधानसभा चुनाव से पहले ग्राउंड से सियासी पंजाबी बातें

पंजाब में विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच राजनीतिक दल अब सिर्फ रैलियों और बैठकों को लेकर ही नहीं सोच रहे हैं बल्कि अब वे ग्राउंड रिपोर्ट कार्ड भी बनाने लगे हैं। हर दल अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि जमीन पर उनकी असली स्थिति क्या है? कौन सा विधानसभा क्षेत्र मजबूत है, कहां पार्टी को नुकसान हो सकता है और किन सीटों पर उम्मीदवार बदलने की जरूरत पड़ सकती है, इसे लेकर सीट-टू-सीट सर्वे कराया जा रहा है। मतलब साफ है, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, ये सभी अपने-अपने स्तर पर पता लगा रहे हैं कि उनकी पार्टी ग्राउंड में कितनी मजबूत है।

गौरतलब है कि पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं। आम आदमी पार्टी के पास फिलहाल 95 सीटें हैं। ऐसे में सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही आप के लिए अपने मौजूदा विधायकों की स्थिति जानना अहम है। वहीं कांग्रेस, बीजेपी और शिअद भी अपने संगठन, संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों की ताकत परख रहे हैं। इन सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर चुनावी रणनीति, उम्मीदवारों और कमजोर सीटों पर फोकस तय किया जा सकता है।

इन सबके बीच यदि आपको पंजाब के चुनावी मुद्दों को समझना है तो प्रदेश के तीन प्रमुख क्षेत्रों की आवोहवा से वाकिफ होना होगा। सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं, मालवा, माझा और दोआबा। दरअसल, इन क्षेत्रों के मतदाताओं के मिजाज पर यहां के स्थानीय मुद्दों का खासा असर पड़ता है।


पंजाब में कुल 117 में से 69 विधानसभा सीटें मालवा क्षेत्र में आती हैं। पंजाब की राजनीति में कहा जाता है कि इसी क्षेत्र से उठी सियासी लहर पंजाब में सत्ता का रुख तय करती है। यही कारण है कि मालवा को पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी कहा जाता है। यह पंजाब का सबसे बड़ा क्षेत्र है और 15 जिलों में फैला हुआ है। प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह, भगवंत मान जैसे दिग्गज नाम इसी क्षेत्र से रहे हैं इसलिए सभी दल मालवा में बेहतर प्रदर्शन के लिए खास रणनीति बनाने में जुट चुके हैं।

साल 2022 के चुनावों की स्थिति देखें तो आप ने मालवा में एकतरफा जीत दर्ज की थी। यहां 69 में से आप को 66, कांग्रेस को 2 व शिरोमणि अकाली दल को एक सीट मिली थी। किसान और किसानी से जुड़े मसले, भूजल और कैंसर बेल्ट, बेरोजगारी व युवाओं का पलायन इस क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे हैं।

अब आपको लेकर चलते हैं माझा का इलाका। अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन और पठानकोट का इलाका माझा क्षेत्र कहा जाता है। यहां कुल 25 विधानसभा सीटें आती हैं। माझा को पंजाब की पंथक और राजनीतिक राजधानी माना जाता है। भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे होने के कारण यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा, तस्करी और रक्षा रणनीति की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। साल 2022 में यहां 25 में से आप ने 16 सीटें, कांग्रेस ने 7, शिअद-भाजपा ने 1-1 सीटें जीती थीं। इस क्षेत्र में आप के समक्ष अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने, जबकि कांग्रेस और शिअद को इस पारंपरिक गढ़ में पंथक और ग्रामीण वोट बैंक को वापस पाने की चुनौती रहेगी। पठानकोट और अमृतसर जैसे शहरी इलाकों में हिंदू-सिख समीकरण साधकर पार्टियां जनाधार जुटाने की तैयारी में हैं। नशाखोरी व सीमा पार तस्करी, सीमावर्ती किसानों व व्यापारियों की समस्याएं यहां प्रमुख मुद्दे हैं।

माझा के बाद सभी की निगाहें दोआबा पर रहती है। सतलुज और ब्यास नदियों के बीच का भूभाग दोआबा सूबे की राजनीति में खास स्थान रखता है। चार जिलों जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर तक फैले इस क्षेत्र में कुल 23 विधानसभा सीटें हैं। साल 2022 में आप ने यहां 10, कांग्रेस ने 9, भाजपा ने 1 व शिअद और बसपा ने 1-1 सीट जीती थीं। इस क्षेत्र में दलित और एनआरआई पंजाबी खासे असरदार रहते हैं। इसलिए दलों का जोर यहां इन दोनों वर्गों को साधने पर रहेगा। दोआबा में दलित वोट बैंक का ध्रुवीकरण, एनआरआई और आव्रजन नीतियां, अवैध खनन और औद्योगिक व बुनियादी विकास सरीखे मुद्दे चुनाव में खासे उछाले जाते रहे हैं।

इन सबके बीच भाजपा ने चुनावी रोडमैप तैयार करना शुरू कर दिया है। नशे के खिलाफ पार्टी मुखर है। भाजपा ने ‘ट्रिपल C’ यानी क्राइम, करप्शन और चिट्टा (ड्रग्स) को केंद्र में रखकर अपने प्रचार अभियान को हॉट पॉलिटिकल टॉपिक बनाने की सोच रही है। इसके साथ ही युवा, रोजगार, कानून-व्यवस्था और जातीय समीकरण पर भी पार्टी जोर देने की तैयारी में है।

दूसरी ओर आम आदमी पार्टी की नवगठित पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) की गुरुवार को पहली बैठक हुई। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उनके आवास पर हुई बैठक में पीएसी से जुड़े पंजाब के नए सदस्य सीएम भगवंत सिंह मान और मंत्री हरपाल सिंह चीमा भी शामिल हुए। मनीष सिसोदिया ने बताया कि बैठक में मुख्य रूप से पंजाब, गोवा और गुजरात में होने वाले चुनावों को जितने को लेकर गहन मंथन हुआ। उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता भगवंत सिंह मान के काम से बेहद खुश है और उन्हें दोबारा बतौर मुख्यमंत्री देखना चाहती है, जबकि गोवा और गुजरात की जनता भाजपा के कुशासन से त्रस्त हो चुकी है और अब बदलाव चाहती है।

हर दल के बड़े नेता अब पंजाब की तरफ नजर लगाए हुए हैं, आने वाले दिनों में चुनावी अभियानों से जुड़ी खबरें खूब सामने आएगी लेकिन असल बात तो वही है कि सत्ता में आम आदमी पार्टी वापसी कर पाएगी या फिर पंजाब की जनता कांग्रेस या फिर भाजपा को मौका देगी।

देखिए, आने वाले दिनों में पंजाब में क्या होता है, फिलहाल ग्राउंड की कहानी यही है कि सियासी रणनीतिकार सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्रों मालवा, माझा व दोआबा के लिए अलग-अलग चुनावी रणनीति बनाने में जुटे हैं। 

Saturday, September 05, 2026

यहां बातचीत कन्नड़ या अंग्रेजी में नहीं, बल्कि संस्कृत में होती है!



कर्नाटक में एक ऐसा गांव है, जहां आज भी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत की भाषा संस्कृत है! इस गांव का नाम है मत्तूर। राजनीति की कथा कहानियों से कोसों दूर आज हम आपको इसी गांव की कहानी सुनाने जा रहे हैं। 
मत्तूर गांव कर्नाटक के शिमोगा जिले में स्थित है, जो बेंगलुरु से करीब 320 किलोमीटर की दूरी पर है। यह गांव तुंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहाँ के निवासियों की मातृभाषा ‘संकेथी’ होने के बावजूद, दैनिक बोलचाल में संस्कृत का व्यापक उपयोग किया जाना यहाँ की विलक्षणता को दर्शाता है।

मत्तूर की संस्कृत परंपरा का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में राजा कृष्ण देव राय ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए मत्तूर गांव को केंद्र बनाया था। हालांकि आधुनिक दौर में यह भाषा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी, लेकिन गांव के बुजुर्गों के मुताबिक साल 1981 से गांव ने संस्कृत को फिर से अपनाना शुरू किया और तभी से यह भाषा यहां की पहचान बन गई।

वैदिक जड़ों की ओर वापसी का सफर 1981 में शुरू हुआ, जब शास्त्रीय भाषा को बढ़ावा देने वाली संस्था संस्कृत भारती ने मत्तूर में 10 दिवसीय संस्कृत कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें पास के उडुपी स्थित पेजावर मठ के संत समेत कई अन्य लोग शामिल हुए। ग्रामीणों को संस्कृत को संरक्षित करने के इस अनूठे प्रयोग में उत्साहपूर्वक भाग लेते देख संत ने कहा, “एक ऐसी जगह जहाँ लोग संस्कृत बोलते हैं, जहाँ पूरे घर संस्कृत में बात करते हैं! आगे क्या? एक संस्कृत गाँव!” मत्तूर के निवासियों ने इस आह्वान को दिल से स्वीकार कर लिया। इस तरह संस्कृत गाँव की प्रमुख भाषा बन गई।

माना जाता है कि मत्तूर में संस्कृत के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में वहां की स्थानीय धार्मिक और शैक्षिक परंपराओं ने अहम भूमिका निभाई है। इस गांव में वैदिक और संस्कृत शिक्षा की पुरानी परंपरा रही है। बच्चों को कम उम्र में ही संस्कृत से परिचित कराया जाता है, और कई परिवार अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में इसका इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे दौर में जब संस्कृत को अक्सर सिर्फ़ प्राचीन ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है, मत्तूर गांव यह दिखाता है कि सांस्कृतिक और शैक्षिक पहलों के ज़रिए किसी भाषा को पीढ़ियों तक कैसे जीवित रखा जा सकता है। 

मत्तूर गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो चीज हैरान करती है, वह है यहां के लोगों का संस्कृत में सहज बातचीत करना। गांव के बच्चे, बुजुर्ग और जवान सभी धाराप्रवाह संस्कृत में बात करते हैं। बाजार में सामान खरीदना हो, खेत में काम करना हो या फिर घर की आम बातचीत, यहां सब कुछ संस्कृत में ही होता है.। गांव में प्रवेश करते ही माहौल भी अलग महसूस होता है, यहां के लोगों की वेशभूषा और रहन-सहन भी परंपरागत भारतीय संस्कृति की झलक देते हैं।

मत्तूर में सब्जी विक्रेता से लेकर पुजारी तक, हर कोई संस्कृत समझता है। अधिकांश लोग धाराप्रवाह संस्कृत बोलते भी हैं। नदी किनारे वैदिक मंत्रों का पाठ करते बुजुर्गों का समूह और उनके पास से साइकिल पर तेजी से गुजरते हुए कुछ युवकों का प्राचीन भाषा में मोबाइल फोन पर बातचीत करते हुए निकलना कोई असामान्य बात नहीं है।

मत्तूर एक कृषि प्रधान गाँव है जहाँ मुख्य रूप से सुपारी और धान की खेती होती है। यहाँ संकेठी समुदाय के लोग रहते हैं, जो एक प्राचीन ब्राह्मण समुदाय है। यह समुदाय लगभग 600 वर्ष पूर्व केरल से आकर मत्तूर में बस गया था। संस्कृत के अलावा, वे संकेठी नामक एक दुर्लभ बोली भी बोलते हैं, जो संस्कृत, तमिल, कन्नड़ और तेलुगु के कुछ अंशों का मिश्रण है। संकेठी बोली की कोई लिखित लिपि नहीं है और इसे देवनागरी लिपि में पढ़ा जाता है।

हमारे एक पत्रकार साथी ने बताया कि मत्तूर ने 30 से अधिक संस्कृत प्रोफेसर तैयार किए हैं जो कुवेम्पु, बेंगलुरु, मैसूर और मैंगलोर विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। मत्तूर कई प्रतिष्ठित हस्तियों का गृह ग्राम भी है, जिनमें भारतीय विद्या भवन, बैंगलोर के मथुर कृष्णमूर्ति, वायलिन वादक वेंकटराम औरगामाका प्रतिपादक एचआर केशवमूर्ति शामिल हैं।

भाषा और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए, मत्तूर भारत में घूमने की एक दिलचस्प जगह है।