Friday, November 06, 2026

क्या पंजाब में पुराने दोस्त साथ आएँगे ?




पंजाब की राजनीति इन दिनों चुनावी होती जा रही है। हर दल अपने अपने अंदाज में चुनावी कथा सुना रहा है। इन सबके बीच खबर आ रही है कि पंजाब की राजनीति के दो पुराने साथी अब फिर से गठबंधन करने जा रहे हैं। हालांकि अभी यह बस बात है, बात पक्की है कि कच्ची, यह तो बाद में पता चलेगा।
राजनीति के अंदरखाने की खबर है कि भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल अब फिर से गठबंधन करने जा रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो पंजाब में बड़े फेरबदल की शुरूआत होती दिखेगी। अभी से ऐसी बातें सुनने को मिल रही है कि पंजाब में पुरानी दोस्ती फिर से रंग ला रही है। 

राजनीति कब करवट लेती है, यह केवल आलाकमान को ही पता रहता है, बाद बाकी लोगबाग सूत्रों के नाम पर बातें करते आए हैं। लेकिन यह सच है कि भाजपा ने 2027 के चुनावों के लिए शिरोमणि अकाली दल से एक बार फिर से हाथ मिलाने का मन बना लिया है।

पंजाब के जानकार साथी बता रहे हैं कि दोनों के बीच सीटों की डील भी हो चुकी है, बस दिवाली तक का इंतजार करना होगा।

पंजाब चुनाव की सरगर्मियों के बीच दीपावली के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बठिंडा दौरे पर आ सकते हैं। इस दौरान मोदी सीमावर्ती पंजाब को बड़ी सौगात दे सकते हैं। वहीं अकाली दल बादल के साथ गठबंधन का भी एलान होने की संभावना जताई जा रही है। गौरतलब है कि बठिंडा मालवा क्षेत्र का प्रमुख राजनीतिक केंद्र है और बादल परिवार का भी इस क्षेत्र में मजबूत प्रभाव रहा है। ऐसे में यहां प्रधानमंत्री की मौजूदगी से भाजपा अपने चुनावी अभियान को धार देने के साथ गठबंधन की संभावनाओं को भी सियासी संदेश में बदल सकती है।

पंजाब भाजपा ने प्रधानमंत्री के दौरे और रैली के लिए केंद्रीय नेतृत्व से समय मांगा है। 15 से 20 नवंबर के बीच रैली की तारीख तय होने की संभावना है।

उधर, अंदरखाने की खबर है कि गठबंधन की डील लगभग पक्की हो चुकी है और फिलहाल सीटों के बंटवारे पर बातचीत चल रही है। शर्त यह रखी गई है कि पंजाब में अगर सरकार बनती है, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी अकाली दल के खाते में जाएगी। इस बार भाजपा पहले से ज्यादा यानी 35 से 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार सकती है, जबकि बाकी बची 67 सीटों पर अकाली दल चुनाव लड़ेगा। याद रहे, 1997 से 2017 तक बीजेपी सिर्फ 23 सीटों पर ही चुनाव लड़ती थी, लेकिन इस बार भाजपा बराबरी का हक मांग रही है।

कुछ दिन पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने 2027 में पंजाब में NDA की सरकार बनने का दावा किया था, जिससे इस गठबंधन की बात पुख्ता हो गई है।


चर्चा थी कि अकाली दल से अलग हुए बागी गुट (जैसे अकाली दल पुनर्सुरजीत) भी इस गठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं, लेकिन अब ऐसा होना मुश्किल लग रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह गुट अभी तक एक रजिस्टर्ड पार्टी नहीं बन पाया है। ऐसे में उन्हें चुनाव लड़ने के लिए भाजपा या अकाली दल के चुनाव चिह्न का ही सहारा लेना पड़ेगा।

गठबंधन होते ही अकाली दल को केंद्र सरकार में बड़ा तोहफा मिल सकता है। सुखबीर बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल को एक बार फिर से मोदी कैबिनेट में मंत्री बनाया जा सकता है। रवनीत बिट्टू के हटने के बाद से केंद्र में पंजाब का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, इसलिए चुनाव से पहले यह पंजाब के वोटरों को लुभाने का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक हो सकता है।


अकाली दल के मुखिया सुखबीर सिंह बादल ने भी इस गठबंधन को लेकर साफ इनकार नहीं किया है। उन्होंने हाल ही में बड़ा बयान देते हुए कहा था कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं, लेकिन जिनकी सोच उनसे मेल खाती है, उनके लिए गठबंधन के दरवाजे हमेशा खुले हैं। उनकी पत्नी हरसिमरत कौर भी पहले ही इसके साफ इशारे दे चुकी हैं।

बीते कुछ दिनों से पर्दे के पीछे चली बातचीत के बाद, दोनों दलों के नेताओं ने गठबंधन पर हामी भरी। कभी सहयोगी रहे और फिर एक-दूसरे के विरोधी बन गए इन दलों ने अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए अपने गठबंधन की रूपरेखा तय कर ली है। इस संबंध में जल्द ही कोई घोषणा की जा सकती है।

इससे पहले खबर आ रही थी कि भाजपा गठबंधन में बड़े भाई की तरह रहना चाहती है लेकिन शायद ऐसा होता नहीं दिख रहा है। शिरोमणी अकाली दल ही बड़े भाई का रोल अदा करेगी। माना जा रहा है कि भाजपा अब मान गई है कि उसे अकाली दल की बैसाखियों की जरूरत है।

इससे पहले केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामदास अठावले ने पंजाब की राजनीति को लेकर चंडीगढ़ में बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि यदि पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और भाजपा के बीच गठबंधन होता है तो आगामी विधानसभा चुनाव में जीत पक्की है।

गौरतलब है कि केंद्र के तीन कृषि कानूनों को लेकर विवाद के बाद सितंबर 2020 में अकाली दल ने NDA से नाता तोड़ लिया था। बाद में केंद्र सरकार ने इन कृषि कानूनों को वापस ले लिया था।

2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में दोनों पूर्व सहयोगी दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। चुनाव परिणामों ने दोनों पार्टियों के सामने खड़ी राजनीतिक चुनौतियों को उजागर कर दिया था।

अलग-अलग चुनाव लड़ने का खामियाजा दोनों दलों को भुगतना पड़ा। अकाली दल को जहां 18.38 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद केवल तीन सीटें मिलीं, वहीं भाजपा 6.60 प्रतिशत वोट हासिल कर सिर्फ दो सीटें जीत सकी।

जानकारों का मानना है कि भाजपा और अकाली दल के एक साथ आने से एनडीए को चुनावी लाभ मिल सकता है। इससे अकालियों के पारंपरिक ग्रामीण और सिख वोट बैंक के साथ भाजपा के शहरी तथा हिंदू वोट बैंक को एक मंच पर लाने का अवसर मिलेगा।

दूसरी ओर, यदि भाजपा और अकाली दल के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं होता है तो विपक्षी वोटों के बंटवारे का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है।


Girindra Nath Jha
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09661893820


Sunday, November 01, 2026

MLC चुनाव के बहाने नागपुर-बनारस!

उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक में 28 सीटों पर विधान परिषद (एमएलसी) के चुनाव हुए। इन चुनावों में एनडीए ने शानदार प्रदर्शन किया। इन 28 में से 16 सीटें पर एनडीए को जीत मिली है। कांग्रेस को सिर्फ 1 सीट पर जीत हासिल हुई, जो महाराष्ट्र के नागपुर से मिली है। हालांकि, वाराणसी और नागपुर में भाजपा की हार पार्टी के लिए एक सीख है कि उसे अपने भीतर झाँकना होगा!
इससे पहले, बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर ट्वीट करते हुए कांग्रेस पर तंज कसा था और लिखा कि बैलेट पेपर पर चुनाव होने के बावजूद कांग्रेस हार गई।

वैसे गौर करने की बात यह भी है कि यूपी एमएलसी चुनाव में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भाजपा को बड़ा झटका लगा है। पिछले चुनाव में भी सपा ने भाजपा को हराकर दोनों सीटें जीती थीं। सपा ने अपने प्रत्याशियों को रिपीट किया था। शिक्षक सीट पर सपा के लाल बिहारी यादव ने भाजपा के प्रमोद कुमार मिश्रा को प्रथम वरीयता में चार हजार से ज्यादा वोटों से हराया।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने देश के विभिन्न राज्यों में विधान परिषद की कुल 28 सीटों के लिए चुनाव घोषित किए थे। इसमें कांग्रेस की झोली में एक सीट आई।

कर्नाटक में सरकार होते हुए भी कांग्रेस सभी चारों सीट हार गई। कर्नाटक में हाल ही में पार्टी ने अपना मुख्यमंत्री बदला है, उसे जोर का झटका लगा है। पार्टी ने सिद्धारमैया को हटाकर डी के शिवकुमार को कुर्सी सौंपी। शिवकुमार की पहचान एक आक्रामक नेता और बड़े संगठनकर्ता की है, पर उनके नेतृत्व में पार्टी चारों सीट हार गई। भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने सभी सीटों पर बाजी मार ली है। तीन पर भाजपा और एक पर जेडीएस को जीत मिली है। यह तब हुआ, जब राज्य में भारतीय जनता पार्टी संगठन की हालत ठीक नहीं है और पार्टी अध्यक्ष विजयेंद्र को लेकर भारी धड़ेबंदी है। क्या कांग्रेस ने सिद्धारमैया को हटाकर राजनीतिक गलती की है? यह सवाल अब पूछा जा सकता है।

वहीं बिहार से भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी एक नए विकल्प के तौर पर उभर रही है। प्रशांत ने पहले बांकीपुर में भाजपा की जमीन छिटकाई और अब विधान परिषद चुनाव में एक सीट जीतकर उन्होंने भविष्य के संकेत दे दिए हैं। राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस बिहार में अब बैकफुट पर दिखने लगी है। भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि पटना और दरभंगा जैसी जगहों में वोटर उससे छिटकते दिख रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार से आते हैं और पहले उनके द्वारा खाली की गई बांकीपुर विधान सभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा हारी और अब एमएलसी चुनाव में पटना में भाजपा की हार हुई! जबकि राज्य में भाजपा के मुख्यमन्त्री हैं!

महाराष्ट्र विधान परिषद चुनावों में बड़ा उलटफेर हुआ है। कांग्रेस ने चौंकाते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के अभेद्य गढ़ नागपुर में जीत दर्ज की है। कांग्रेस के उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने लंबी चली मतगणना के बाद भाजपा के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को हरा दिया। नतीजों के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बीजेपी के खिलाफ नारे लगाए। इससे माहौल काफी गरमा गया। महाराष्ट्र में कुल पांच विधान परिषद की सीटों के चुनाव में विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी (MVA) ने तीन पर जीत हासिल की जबकि सत्तारूढ़ बीजेपी और शिवसेना को एक-एक सीट मिली।

बात अगर यूपी की विस्तार से करें तो वहां भाजपा को समाजवादी पार्टी से टक्कर मिलती दिख रही है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को सलीके से देखने वाले हमारे मित्र जितेन्द्र चतुर्वेदी फेसबुक पर लिखते हैं- "अखिलेश यादव ने भाजपा को रुला दिया है। कमाल का राजनीतिक कौशल दिखा रहे हैं। वे विरोधी को चौका रहे हैं,
छका रहे हैं। गोरखपुर में वे गजब खेले हैं। अंतिम समय में उन्होंने टिकट बदला था। कमलेश यादव की जगह संजय त्रिपाठी को दिया। आखिर यह दांव सपा प्रमुख ने क्यों चला? इसका सीधा सा जवाब है उन्होंने माप लिया कि कौन किस पाले में खड़ा है। दूसरा ब्राह्मण उतरा कर चुनाव को रोचक बना दिए। इस लिहाज से कि कितना BJP के पाले में गिरता है। तीसरा, अपनी राजनीतिक ताकत भी दिखा दी।
BJP को सजग हो जाना चाहिए। वे जिस अखिलेश से मुकाबिल है वह अलग अखिलेश है। प्रयोगधर्मी अखिलेश है। सियासत में जितना प्रयोग अखिलेश कर रहे हैं उतना शायद ही कोई राजनेता कर रहा होगा। वे इन दिनों जिस गठजोड़ को साधने में जुटे हैं यदि वह सध गया तो BJP बाहर हो जाएगी। इसलिए जरूरत इस बात की है कि बीजेपी फूंक फूंक कर कदम रखे।"

ऐसा अनायास नहीं कहा जा रहा है। यूपी की धुरी गोरखपुर और बनारस में सपा खेल कर रही है। एक जगह वह हार कर भी जीत जाती है। और प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में कमाल कर देती है। यह इस बात का प्रणाम है कि सपा मजूबत हुई है।

हमने जब जितेन्द्र से इस मसले पर बात की तो उन्होंने कहा कि राज्य में फिलहाल समीकरण बीजेपी के खिलाफ चला गया है। पहले अंदाजा लगाया जा रहा था। अब साफ हो गया। जाति की बात करें तो बनिया तक टूटा है। कारण चंपत राय को टार्गेट करना। पश्चिम से वे आते हैं। आगरा में देखिए क्या हुआ? भाजपा से ब्राह्मण भी टूटे हैं। उतना नहीं। लेकिन सबसे ज्यादा चौका रहे हैं क्षत्रिय। वे सिंह से बाहर नहीं जा रहे हैं। यानि पार्टी से ज्यादा सरनेम। गोरखपुर और बनारस में साफ दिखा।
तीसरा जो प्रबुद्ध है उसमें इतना जातीय विभाजन तो नीचे क्या होगा? इसका अनुमान लगाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि गोरखपुर और बनारस में दुर्गति हो गई। सत्ता के दोनों केन्द्र पर भाजपा का ये हाल ठीक संकेत नहीं है।
गोरखपुर मंडल में तकरीबन 30 सीट आती है विधानसभा की। जिस तरह से यहां बीजेपी जीती है उससे साफ है कि खतरे की घंटी बज गई है। अगर क्षेत्रवार देखे तो सपा पूरब, पश्चिम और बुंदेलखंड में बढ़त ले रही है।

यहां हमने यूपी पर अधिक बात इसलिए की है क्योंकि 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव सत्ता की नई पटकथा लिखने वाला है।

हालांकि इन सबके बीच एमएलसी चुनाव के परिणाम कांग्रेस के लिए बुरी खबर की तरह है। राहुल गांधी की तमाम आक्रामकता के बावजूद पार्टी को इन चुनावों में कोई फायदा क्यों नहीं हुआ? हाल ही में हुए आन्दोलन के बड़े चेहरे थे राहुल गांधी।इस पर पार्टी को गहन चिंतन करनी चाहिए! राहुल की सारी मेहनत चुनाव परिणाम में बेकार क्यों चली जाती है, इस पर पार्टी के भीतर मंथन हो, यह जरूरी है।

प्रधानमंत्री ने जब एक्स पर कांग्रेस के प्रदर्शन पर टिप्पणी की तो हर पक्ष से बात सामने आने लगी है। हालांकि
यह सच है, इन चुनावों से भाजपा का मनोबल जरूर बढ़ा होगा। लेकिन प्रधानमंत्री के संसदीय सीट और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में पार्टी की हार पर भाजपा नेतृत्व को सोचना होगा!

वैसे उत्तर प्रदेश की सियासी जंग है। सामने योगी आदित्यनाथ हैं। पंजाब पर भी नजर है। अभी तो रणनीति के मोर्चे पर हर पार्टी लगी हुई है, चुनाव की तारीख आने दें, असल राजनीति तब शुरू होगी! 

Girindra Nath Jha
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Friday, October 23, 2026

पंजाब चुनाव का कीवर्ड होगा ' नशा मुक्त पंजाब ' !

देशभर में चुनाव आयोग और मतदाता सूचियों के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) को लेकर विपक्ष और विभिन्न संगठनों के तीखे विरोध प्रदर्शनों और चुनावी धांधली के आरोपों के बीच, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर पूरी तरह सक्रिय है। उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब तक, चुनावी माहौल बनाने में भाजपा जुट गई है। लोगबाग अक्सर कहते हैं, भाजपा चुनावी मशीन है! उसे बस चुनाव चाहिए। वैसे लोकतंत्र में सबकुछ चुनाव से ही सम्भव है!

चलिए, अब बात करते हैं पंजाब की। पंजाब में अगले साल फरवरी-मार्च में होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा बेहद खास रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। ऐसा लग रहा है कि पार्टी पंजाब में पश्चिम बंगाल मॉडल पर चुनाव लड़ेगी। पश्चिम बंगाल की ही तरह पंजाब के लोगों को भरोसा दिलाया जाएगा कि भाजपा सत्ता की प्रबल दावेदार है। इसके लिए सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को उन्हीं के गढ़ में चुनौती देने का फैसला किया गया है।

गौरतलब है कि भाजपा ने यही रणनीति पश्चिम बंगाल में भी अपनाई थी, जब ममता बनर्जी के गढ़ भवानीपुर और नंदीग्राम में उनसे सीधे दो-दो हाथ किया गया था। इसी तरह तृणमूल कांग्रेस के गढ़ दक्षिण बंगाल और कोलकाता में बीजेपी ने पूरा जोर लगाया था।  यहां की 130 सीटों पर टीएमसी बेहद मजबूत थी। बीजेपी ने इस बार सबसे ज्यादा ताकत इन्हीं सीटों पर लगाई। इसका सीधा लाभ पार्टी को मिला और उसने ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया।


वैसे तो पंजाब की राजनीति में किसान हित, कृषि अर्थव्यवस्था, सिख समुदाय से जुड़े सवाल प्रमुख माने जाते रहे हैं लेकिन भाजपा ने नशे के मुद्दे को अहमियत देने का फैसला लिया है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह दशहरे के दिन पंजाब के 3 जिलों में गए और नशे की भेंट चढ़े 3 लोगों के परिवारों से मिले। अमित शाह भावुक होकर तीनों परिवारों से मिले और उन्हें न्याय दिलाने का आश्वासन दिया। अमित शाह से मिलने के बाद तीनों परिवार अब न्याय के लिए आश्वस्त भी दिख रहे हैं।

गृह मंत्री अमित शाह ने नशा विरोधी अभियान से जुड़े तीन पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। उन्होंने गुरुदासपुर, संगरूर और मानसा में पीड़ितों से मुलाकात की। मानसा में गृह मंत्री अमित शाह ने परविंदर सिंह झोटा के परिवार से मिलकर गृह मंत्री ने न्याय का आश्वासन दिया। झोटा की नशे के विरोध के चलते हत्या कर दी गई थी। पंजाब में बीजेपी चुनावों से पहले ड्रग्स की बिक्री को लेकर आप सरकार पर हमलावर है। सत्ताधारी आम आदमी पार्टी बीजेपी के दावों को खारिज करती आई है।

गौरतलब है कि अमित शाह ने पंजाब में नशे के खिलाफ अवाजा उठाने पर मारे गए तीन व्यक्ति के परिवारजनों से ऐसे वक्त पर मुलाकात की है जब कुछ समय पहले बीजेपी ने राज्यव्यापी नशामुक्त पंजाब यात्रा निकाली थी। अमित शाह ने इस यात्रा के समापन पर कहा था कि राज्य में मुद्दे तो कई हैं लेकिन बीजेपी ड्रग्स और नशामुक्त पंजाब बनाने के एजेंडे के साथ ही चुनाव मैदान में उतरेगी। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पंजाब में बढ़ते नशे (ड्रग्स) के कारोबार और उसके खिलाफ आवाज उठाने वाले कार्यकर्ताओं/पीड़ितों के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए अमित शाह ने यह दौरा किया था।

हालांकि यदि आप गौर करेंगे तो पंजाब में किसान भी मुद्दा है। किसान आंदोलन के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में विश्वास बहाली भाजपा के लिए चुनौती रही है। ऐसे में नशा के खिलाफ भाजपा ने कदम बढ़ाकर सवाल खड़े करने की कोशिश की है। वहीं, नशा तस्करी का सवाल अब कानून-व्यवस्था से आगे बढ़कर केंद्र और राज्य सरकार के बीच जवाबदेही का मुद्दा बन गया है।

बीते 30 सितंबर को जालंधर में भाजपा की ‘नशामुक्त पंजाब यात्रा’ के समापन पर अमित शाह ने दिसंबर 2029 तक पंजाब को नशामुक्त बनाने का लक्ष्य रखा था।

भाजपा के लिए नशा एक ऐसा मुद्दा है जिसके सहारे वह पंजाब में अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ा सकती है। पार्टी को कानून-व्यवस्था, सुरक्षा और नशे के कारोबार पर सरकार को घेरने का अवसर मिल रहा है। अमित शाह की 2029 की समय-सीमा वाली घोषणा पार्टी को एक स्पष्ट चुनावी वादा भी देती है। शिरोमणि अकाली दल के सामने नशा सबसे जटिल चुनौती है। उसे नशे, रोजगार और कानून-व्यवस्था पर अपनी विश्वसनीयता साबित करनी होगी। अकाली दल को अपने शासनकाल से जुड़े नशे के पुराने आरोपों पर भी मतदाताओं का भरोसा बहाल करना होगा।


पंजाब में नशे के खिलाफ विभिन्न सरकारों के दौरान कार्रवाई के आंकड़े सामने आए हैं। 2002 से 2007 तक कांग्रेस सरकार ने 111 किलोग्राम हेरोइन और 83 लाख इंजेक्शन व गोलियां बरामद कीं। 2007 से 2012 तक अकाली-भाजपा सरकार में 1,049 किलोग्राम हेरोइन और 5 करोड़ इंजेक्शन व गोलियां बरामद हुईं। 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने नशा खत्म करने का वादा किया लेकिन मुद्दा बना रहा। 2022 में आम आदमी पार्टी की सरकार ने नशा तस्करों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का वादा किया और फरवरी 2025 में ‘युद्ध नशियां विरुद्ध’ अभियान शुरू किया। सरकार ने अपने शुरुआती चार वर्षों में 5,600 किलोग्राम से अधिक हेरोइन बरामद करने और 10,000 से अधिक तस्करों को गिरफ्तार करने के आंकड़े पेश किए हैं।

अब पंजाब में यह साफ़ हो गया है कि 2027 की सबसे बड़ी राजनीतिक लड़ाई इस बात पर होगी कि पंजाब को नशे से मुक्त करने का भरोसा कौन दिलाता है और कौन अपने दावों को जमीन पर साबित कर पाता है।

अंतिम फैसला नशे की उपलब्धता में कमी, बड़े तस्करी नेटवर्क पर कार्रवाई, युवाओं के पुनर्वास और कानून-व्यवस्था में वास्तविक सुधार से तय होगा।

भाजपा की दूसरी बड़ी चुनौती शिरोमणि अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन है।

पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और भाजपा के बीच छह साल पहले टूटी दोस्ती बहाल होनी करीब-करीब तय है। हालांकि पार्टी नेतृत्व को चुनाव पूर्व गठबंधन के कारण राज्य में उसकी ओर से छेड़े गए नशे के खिलाफ अभियान को धक्का लगने की आशंका है। दरअसल शिअद की अगुवाई वाली 2007 से 2017 तक की सरकार के दौरान ही राज्य में ड्रग माफिया के पैर पसारने के आरोप लगे थे।

दोनों दलों के फिर से साथ आने के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण दोनों दलों की संयुक्त ताकत है। साथ रहते दोनों दलों को कम से कम 37% वोट मिले हैं। चूंकि इस बार की चुनावी जंग त्रिकोणात्मक होगी, ऐसे में चुनाव पूर्व गठबंधन सत्ता हासिल करने की स्थिति में होगी। इसके उलट अलग-अलग रहने का नुकसान दोनों दलों को हुआ है।

वैसे राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता है,  दावेदारी का दौर अभी चलता रहेगा। लेकिन इतना तो सच है कि इस बार पंजाब के चुनावी कंटेंट का कीवर्ड ' नशा मुक्त पंजाब ' ही रहने वाला है।

Friday, October 16, 2026

क्या आपको जम्मू के बसोहली उत्सव की जानकारी है!


सनातन संस्कृति, कला और अनूठी ऐतिहासिक विरासत की भूमि बसोहल (प्राचीन नाम: विश्वस्थली) एक बार फिर अपने भव्य बसोहली उत्सव 2026 की मेजबानी के लिए पूरी तरह सज-धज कर तैयार है।

जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में रावी नदी के किनारे बसा छोटा-सा पहाड़ी शहर बसोहली अपने आकार से कहीं अधिक समृद्ध विरासत को समेटे हुए है। कभी 'विश्वस्थली'के नाम से जाना जाने वाला बसोहली आस्था और तीर्थ की भूमि होने के साथ-साथ ऐतिहासिक रूप से व्यापार, वस्त्र शिल्प और भारत की प्रसिद्ध लघु चित्रकला परंपरा के प्रमुख केंद्रों में से एक रहा है।

हाल के वर्षों में इस गौरवशाली विरासत को बसोहली उत्सव के माध्यम से एक औपचारिक और वार्षिक मंच मिला है। बहुदिवसीय यह उत्सव तेजी से जम्मू क्षेत्र के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में अपनी पहचान बना रहा है।

बसोहली उत्सव की शुरुआत वर्ष 2023 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य बसोहली को भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर उसका उचित स्थान दिलाना और इसकी गहरी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाना था।

इस पहल का आयोजन जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषाएँ अकादमी, जम्मू संभागीय प्रशासन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) और विश्वासस्थली संगठन द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। इन सरकारी सांस्कृतिक संस्थाओं और विरासत से जुड़े संगठनों ने मिलकर इस आयोजन को एक व्यापक सांस्कृतिक मंच का स्वरूप दिया है।

अपनी शुरुआत के बाद से बसोहली उत्सव लगातार आगे बढ़ रहा है। इसका तीसरा संस्करण 28 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक आयोजित किया गया था। जम्मू प्रशासन, IGNCA और अन्य संगठन द्वारा आयोजित इस संस्करण में क्षेत्र की जीवंत परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। इस दौरान रामायण परंपरा पर विशेष ध्यान दिया गया और रामायण आधारित प्रदर्शनियां एवं पुस्तिकाएं, लोक कला प्रदर्शनियां, लोक नृत्य एवं गायन की राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, स्थानीय खेल प्रतियोगिताएं तथा विभिन्न कला और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की गईं।

बसोहली के महत्व को समझने के लिए उसके गहरे ऐतिहासिक मूल को जानना आवश्यक है। ऐतिहासिक रूप से बसोहली कठुआ जिले की एक तहसील रहा है और पवित्र रावी नदी के किनारे स्थित है। ऋग्वेद में रावी को ‘इरावती’ कहा गया है और इसे सप्त-सिंधु की सात महान नदियों में शामिल किया गया है। शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित बसोहली अपने वर्तमान अपेक्षाकृत छोटे स्वरूप के बावजूद प्राचीन गौरव की एक समृद्ध विरासत रखता है।

बसोहली उत्सव का आयोजन विशेष रूप से शहर की ऐतिहासिक पहचान विश्वासस्थली के रूप में पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया। यह पहचान उस समय की ओर संकेत करती है जब बसोहली व्यापार का एक समृद्ध केंद्र था और अपने पश्मीना ऊन उत्पादों, लघु चित्रकला तथा रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के लिए प्रसिद्ध था। रावी नदी के किनारे अनेक मंदिरों की उपस्थिति और वहां होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के कारण बसोहली को लोकप्रिय रूप से “लघु काशी” अर्थात छोटी काशी या वाराणसी भी कहा जाता था।

बसोहली उत्सव के एक उद्घाटन अवसर पर उपराज्यपाल ने इसे “कला, संस्कृति और परंपरा का महाकुंभ” बताया था और कहा था बसोहली केवल मानचित्र पर स्थित एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह कला, साहित्य और परंपरा से जुड़े साधकों का “ऊर्जा क्षेत्र” है।

बसोहली उत्सव को केवल एक औपचारिक समारोह के रूप में नहीं, बल्कि एक बहुदिवसीय सांस्कृतिक उत्सव के रूप में तैयार किया गया है। इसमें बसोहली शॉल बुनाई के प्रदर्शन, क्षेत्र की प्रसिद्ध जीआई-टैग प्राप्त पश्मीना ऊन शिल्प, बसोहली चित्रकला की प्रदर्शनियां और प्रत्यक्ष प्रदर्शन, क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक विरासत से जुड़ी प्रदर्शनियां, पारंपरिक नृत्य और लोक संगीत, रामलीला एवं रामायण आधारित कार्यक्रम, लोक नृत्य और गायन की राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, स्थानीय खेल प्रतियोगिताएं, क्षेत्रीय डोगरा व्यंजनों के खाद्य स्टॉल तथा मनोरंजक खेल और सामुदायिक गतिविधियां शामिल हैं।

बसोहली की रामलीला परंपरा को विशेष पहचान मिली है।

इस बार भी बसोहली में ऐतिहासिक रामलीला की तैयारियां जोरों पर हैं, जहाँ कलाकार बिना किसी पारिश्रमिक के रामायण के पात्रों को जीवंत कर रहे हैं। यह 114 साल पुरानी परंपरा क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बसोहली की रामलीला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्ष 1912 में पहली बार बसोहली में रामलीला का मंचन किया गया था। इसके बाद से यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही है। 

उत्सव का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को भी बसोहली की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है, विशेष रूप से नवरात्र के दौरान वैष्णो देवी मंदिर आने वाले यात्रियों को। इस प्रकार बसोहली उत्सव केवल स्थानीय संस्कृति का उत्सव नहीं रह जाता, बल्कि जम्मू क्षेत्र के व्यापक तीर्थ और पर्यटन परिपथ में बसोहली को जोड़ने का प्रयास भी बनता है।

बसोहली की सांस्कृतिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी प्रसिद्ध बसोहली चित्रकला है। इसे व्यापक पहाड़ी लघु चित्रकला शैली की प्रारंभिक शैली के रूप में देखा जाता है, जिससे आगे चलकर गुलेर, कांगड़ा, चंबा और कुल्लू जैसी शैलियां विकसित हुईं। बसोहली शैली स्थानीय शासकों संग्राम पाल (1635–1673) और बाद में किरपाल पाल (1678–1693) के संरक्षण में विकसित हुई। इस परंपरा को प्रमुख कलाकारों देविदास और बाद में मनाकू ने आगे बढ़ाया।

बसोहली चित्रकला के प्रारंभिक ज्ञात उदाहरणों में देविदास द्वारा 1694 ईस्वी में बनाई गई रसमंजरी की चित्रावली महत्वपूर्ण मानी जाती है। वहीं 1730 ईस्वी की मनाकू की गीत गोविंद श्रृंखला इस शैली के परिष्कार को दर्शाती है। प्रारंभिक बसोहली चित्रों में पश्चिमी भारत की चौरपंचाशिका शैली से समानता दिखाई देती थी, लेकिन समय के साथ यह एक विशिष्ट और जीवंत पहाड़ी कला शैली के रूप में विकसित हुई।

बसोहली चित्रकला अपने रंगों और रेखाओं की प्रभावशाली जीवंतता के लिए जानी जाती है। इसमें विशेष प्रकार का चित्र प्रारूप, वास्तु संबंधी विवरण और लाल सीमाएं दिखाई देती हैं। चित्रों में चेहरे प्रायः पार्श्व रूप में दिखाए जाते हैं और बड़ी, तीव्र अभिव्यक्ति वाली आंख उनकी विशेष पहचान होती है। चमकीला गेरुआ पीला, भूरा और हरा रंग इसकी रंग योजना में प्रमुख हैं। रंग और भावनाओं की इसी तीव्रता के कारण जर्मन विद्वान डॉ. हरमन गोल्ट्ज़ ने बसोहली चित्रों को “भारतीयों की महान उपलब्धियों में से एक” बताया था।

बसोहली कला की केंद्रीय प्रेरणा वैष्णव परंपरा है। इसके चित्रों में महान महाकाव्यों और पुराणों से विषय लिए गए हैं। इसके साथ ऐतिहासिक, समकालीन, साहित्यिक और अन्य विषय भी चित्रित किए गए। इन चित्रों में गहरी भावनात्मक तीव्रता के साथ बसोहली के प्राकृतिक परिवेश की काव्यात्मक अनुभूति दिखाई देती है। इन्हें सुंदर रूप से “रंगों में कविताएं” कहा गया है।


आधुनिक समय में बसोहली चित्रकला को औपचारिक पहचान मिली और इसे भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त हुआ। यह जम्मू क्षेत्र के हस्तशिल्प के लिए जीआई पंजीकरण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इसके साथ बसोहली पश्मीना ऊनी वस्तुओं को भी मान्यता मिली। आज यह कला केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक रूप से आज भी जीवित है। इसकी निरंतर कलात्मक परंपरा मनिकांठ परिवार से जुड़ी है, जिसके कलाकार मुगल दरबार से यहां आए थे। इस परंपरा को आज प्रसिद्ध कलाकार प्रकाश चंद मनिकांठ आगे बढ़ा रहे हैं।

बसोहली की कला परंपरा से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्वों में देविदास, जो 1694 की रसमंजरी चित्रावली के लिए प्रसिद्ध हैं; मनाकू, जो 1730 की गीत गोविंद श्रृंखला के लिए जाने जाते हैं; आनंद कुमार कूमारस्वामी, जिन्होंने बसोहली चित्रकला को वैश्विक विद्वत जगत के ध्यान में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई; तथा राजा संग्राम पाल और राजा किरपाल पाल, जिनके संरक्षण में यह कला शैली विकसित हुई, शामिल हैं। समकालीन समय में प्रकाश चंद मनिकांठ इस पारंपरिक चित्रकला के प्रमुख संरक्षक हैं। वहीं उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वर्ष 2023 में बसोहली उत्सव की परिकल्पना की और इसकी शुरुआत की।

बसोहली उत्सव केवल कैलेंडर में दर्ज एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का एक प्रयास है। चित्रकला, वस्त्र शिल्प, नृत्य, रंगमंच और तीर्थ-पर्यटन को एक मंच पर लाकर यह उत्सव आधुनिक पीढ़ी को उस शहर की विरासत से जोड़ने का प्रयास करता है, जिसने कभी भारतीय कला के इतिहास को प्रभावित किया था।

रावी नदी के दाहिने तट पर बसे इस खूबसूरत शहर में आगामी 19 से 21 अक्टूबर तक तीन दिवसीय सांस्कृतिक महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है। यह महोत्सव न केवल डोगरा संस्कृति और कलात्मक धरोहरों का अद्भुत संगम है, बल्कि इसका सीधा जुड़ाव पर्यटन को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने से है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भी अपने कार्यक्रम 'मन की बात' में बसोहली उत्सव की अनूठी सांस्कृतिक पहचान की सराहना की थी।

Sunday, October 11, 2026

खेती-बाड़ी कलम स्याही

आज फेसबुक मेमोरी में अपना ही स्टेटस मोहक लग रहा है ! आज के ही दिन फेसबुक को अपना परिचय दिया था - 'खेती - बाड़ी, कलम स्याही'! 
किसानी करते हुए ग्यारह साल गुजर गए। इन गुजरे वर्षों में जीवन इंद्रधनुष की माफिक हो गया। कितना कुछ बदल गया। एक से बढ़कर एक लोग मिलते रहे, कारवां बनता जा रहा है। 

गुजरे वर्षों में बहुत कुछ खोया भी, बहुत कुछ पाया भी। आप जब अपने काम-धाम का लेखा-जोखा करने बैठते हैं तो आपका मन शिक्षक की भूमिका में सामने खड़ा हो जाता है। वही बताता है कि आपने क्या खोया, क्या पाया! 

गाम -घर और खेती-बाड़ी, जीवन का हर रंग दिखाने में कामयाब रहा और यह चेतावनी भी देता रहा कि अभी बहुत कुछ करना बांकी है, पड़ाव आते रहेंगे, लेकिन वह हमारी मंजिल नहीं होगी।

इन दस वर्षों में धान, मक्का, गाछ-वृक्ष, जल-जंगल-जमीन, सबकुछ किताब के पन्नों की तरह जीवन में समा चुका है। किसान की आवाज़ अंदर-भीतर रियाज़ करता रहता है। 'एक ऋतु आये एक ऋतु जाए' की सीख इसी पेशे में मिली।

धान के मौसम में किसानी करते हुए इन गुजरे ग्यारह साल का हिसाब करने बैठा हूँ तो धान की बाली और भी मोहक लगने लगी है। 

खेत को देखता हूँ लगता है कि कबीर लाठी लिए सामने खड़े हैं और चेतावनी दे रहे हैं कि मन के भीतर कितना मैल बैठ गया है, पहले उसे तो साफ करो! तभी सूरदास की यह पाती याद आ जाती है- 

"मो सम कौन कुटिल खल कामी।
पापी कौन बड़ो है मोसे, 
सब पतितन में नामी।
सूर, पतित कों ठौर कहां है, 
सुनिए श्रीपति स्वामी॥"

दरअसल खेती - बाड़ी, कलम स्याही करते हुए हर दिन कई लोगों से मुलाकात होती है, हर कोई कुछ न कुछ न सीख देकर ही जाते हैं। किसानी के पेशे में आने के बाद इस बात को लेकर मन और मजबूत हुआ कि वक्त सबसे बड़ा शिक्षक है, वही सम्पादक है, वही साथी है, वह सबकुछ सीखा देता है। 

इन गुजरे ग्यारह साल में बाबूजी की छाया भीतर पानी की तरह समाने लगी है, वे हर दिन कुछ नया दे जाते हैं ताकि संघर्ष जारी रहे। 

एक बार उन्होंने पूछा था - "झिंगुर की 'झीं-झीं' और गिरगिट की 'ठीक-ठीक' आवाज़ को पहचान सकते हो?" उस वक्त उनके सवाल को समझ न सका था, वे भीतर की शांति को समझने की सलाह दे रहे थे। दरअसल भीतर की शांति मन को धो देती है। 

खेती बाड़ी करते हुए लोगबाग से करीबी बढ़ती जा रही है, खेत की माया गाछ-वृक्ष की छाया में समाते जा रही है, नाटक की तरह। 

गुजरे वर्षों में गाँव भी बदला है, बहुत कुछ बदला। लेकिन किसानी के पेशे में आने के बाद जिस चीज ने मुझे मजबूत बनाया है वह संघर्ष ही है, रेणु की बोली में- 'तेरे लिए मैंने लाखों के बोल सहे...'

अभी बहुत कुछ करना बांकी है, यात्रा जारी है, हम सब यात्री बने रहें...

शारदीय नवरात्र के प्रथम दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं!

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#kisaan

Friday, October 09, 2026

यूपी में राजनीति का ‘चिराग मॉडल’

उत्तर प्रदेश की सियासत में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले चिराग पासवान राजनीति के नए दरवाजे खोलते नजर आ रहे हैं। अपने पिता और पार्टी संस्थापक रामविलास पासवान की पुण्यतिथि का बड़ा कार्यक्रम बिहार की जगह लखनऊ में कराकर उन्होंने उत्तर प्रदेश की सियासत में अपनी सक्रियता का साफ संदेश दे दिया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बिहार की तरह यूपी में भी भाजपा के लिए ' चिराग मॉडल ' फायदेमंद साबित होगा!
पिछले कुछ महीने से चिराग पासवान की पार्टी ने यूपी की सभी 403 विधानसभा सीटों को लेकर संगठन विस्तार की तैयारी कर रही है। पार्टी का फोकस बूथ स्तर तक संगठन खड़ा करने और संभावित उम्मीदवारों को तैयार करने पर है। करीब 100 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव प्रभारियों की तैनाती की जा चुकी है।

चिराग पासवान ने अपने पिता रामविलास पासवान की पुण्यतिथि के कार्यक्रम के लिए लखनऊ को चुनकर यूपी में चिराग मॉडल को शुरु करने की कोशिश की है। गुरुवार को लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के संस्थापक राम विलास पासवान की 6वीं पुण्यतिथि पर लखनऊ में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी जुटान देखने को मिली। 

लोजपा पार्टी अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के न्योते पर सीएम योगी ने भी कार्यक्रम में शिरकत की। इसके अलावा राज्यपाल आनंदीबेन पटेल और अनुप्रिया पटेल, मंत्री दयाशंकर सिंह, लोनी विधायक नन्द किशोर गुर्जर भी शामिल हुए।

लखनऊ के दयाल बाग में आयोजित पुण्यतिथि समारोह में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 50 वर्ष पहले रामबिलास पासवान ने जो सामाजिक लड़ाई शुरू की थी, उसकी राजनीतिक विरासत को अब उनके पुत्र चिराग पासवान आगे बढ़ा रहे है। मुख्यमंत्री योगी ने यूपी में इस आयोजन के लिए आभार जताया।

दरअसल लखनऊ में आयोजन के जरिए चिराग ने यूपी की राजनीति में अपनी मौजूदगी और पार्टी के विस्तार की महत्वाकांक्षा दोनों को सामने रखा है। रामविलास पासवान की जयंती का कार्यक्रम भी इससे पहले लखनऊ में आयोजित किया गया था। अब पुण्यतिथि का बड़ा आयोजन राजधानी में होने से यह संकेत और मजबूत हुआ है कि LJP (रामविलास) यूपी को बिहार के बाहर अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने के लिए अहम मान रही है।

पुण्यतिथि के बहाने पार्टी अपनी स्थिति के आकलन के ही साथ ही दूसरों को शक्ति का अहसास करा पासी समाज को लामबंद करने की भी कोशिश में जुटी है। इससे पहले 5 जुलाई को पार्टी संस्थापक राम विलास पासवान की जयंती भी आईजीपी में आयोजित की गई थी। अभी 27 सितंबर को ‘यूथ बोले तो’ कार्यक्रम प्रयागराज में था।

वहीं कुछ महीने पहले लोजपा (रामविलास) सांसद और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के रिश्तेदार अरुण भारती ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा था- गूंजे धरती-आसमान, पंडित पासी-पासवान! उस वक्त भारती के इस नारे के सियासी निहितार्थ भी निकाले गए थे। राजनीतिक जानकारों की मानें तो लोजपा (रामविलास) यूपी में अपनी पैठ जमाने के लिए नए सियासी समीकरण बना रही है। इसके जरिए वह उन वर्गों को भी साथ लाने की जुगत में है जो अभी यूपी में उसके साथ नहीं हैं।

चिराग पासवान ने हाल ही में बयान दिया था कि नागालैंड में लोजपा (रामविलास) अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ेगी। वहां पार्टी के दो विधायक हैं। जबकि उत्तर प्रदेश में गठबंधन को लेकर अभी बातचीत और संगठनात्मक स्तर पर तैयारी चल रही है। चिराग ने कहा कि पार्टी यूपी में किसी भी स्थिति के लिए तैयार रहना चाहती है।

विधानसभा चुनाव को लेकर चिराग पासवान ने कहा, 'मैं सभी 403 सीटों के लिए तैयारी करूंगा. हमारी पार्टी लंबे समय से गठबंधन की राजनीति का हिस्सा रही है, लेकिन गठबंधन में रहने का मतलब सिर्फ सीटें हासिल करना नहीं है.'

चिराग ने कहा कि पार्टी को हर सीट पर चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए. इससे संगठन मजबूत होता है और जरूरत पड़ने पर सहयोगी दलों को भी इसका फायदा मिलता है. इसी तरह उनकी पार्टी बिहार की सभी 243 सीटों के लिए तैयारी की है. इसके अलावा पंजाब में भी 117 सीटों पर काम किया जा रहा है.

गौरतलब है कि यूपी चुनाव 2027 के लिए लोजपा (रामविलास) ने तैयारी काफी दिन पहले से ही कर दी थी। इसी के तहत 27 सितंबर को चिराग पासवान ने प्रयागराज में 'यूथ बोले तो' कार्यक्रम किया था। अब लोजपा ने यूपी चुनाव से पहले चिराग पासवान की कम से कम 20 रैलियां अलग-अलग जिलों में कराने की तैयारी की है। ताकि एक माहौल तैयार किया जा सके। इनके जरिए लोजपा रामविलास की नजर यूपी के दलित के साथ युवा वोटर पर है।

दरअसल उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट लंबे समय से मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ जुड़ा रहा है, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में बसपा का प्रदर्शन बहुत की कमजोर रहा था। ऐसे में दलित वोट बैंक को लेकर नए समीकरण बनने लगे हैं।

चुनावी आंकड़ों पर यदि बात की जाए तो 2024 में भाजपा को गैर-यादव ओबीसी गैर-जाटव दलित वोटों में नुकसान हुआ था। ये वोट बैंक इंडिया गठबंधन की ओर शिफ्ट हो गया था। इसी की वजह से इंडिया गठबंधन यूपी में लोकसभा की 80 में से 43 सीटों पर जीत दर्ज कर सका था। ऐसे में चिराग मॉडल यदि ठीक से काम कर जाए तो भाजपा को फायदा मिल सकता है।

माना जा रहा है कि यदि चिराग पासवान यूपी में दलित मतदाताओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाने में सफल होते हैं, तो इससे नुकसान इंडिया गठबंधन को हो सकता है। फिर चाहे वो एनडीए में लड़कर चुनाव लड़ें, या अकेले। लोकसभा चुनाव में जो वोटर भाजपा से नाराज था, उसने इंडिया गठबंधन को वोट किया था। अगर चिराग के रूप में दलित वोटर को विकल्प मिलेगा तो उनके लिए वोट कर सकते हैं।

वहीं दूसरी ओर खबर आ रही है कि विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले उत्तर प्रदेश की सियासत में एक और बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम होने जा रहा है। समाजवादी पार्टी से बगावत कर चुके तीन विधायक अब औपचारिक तौर पर भाजपा का दामन थामेंगे। इनमें राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह और विनोद चतुर्वेदी शामिल हैं। नवरात्रि में 14 अक्तूबर को अमेठी में आयोजित कार्यक्रम में ये तीनो विधायक भाजपा की सदस्यता ग्रहण करेंगे।

आने वाला हर दिन उत्तर प्रदेश के लिए चुनावी तैयारियों का दिन होगा! हर दल अपनी स्थिति मजबूत करते दिखेंगे। बाद बाकी जनता तो सबकुछ देख ही रही है!




Girindra Nath Jha
www.anubhaw.blogspot.com
Chanka Residency
09661893820

Friday, October 02, 2026

बापू के बहाने गाम- घर और शहर!

खेत-खलिहान और किताबों की दुनिया में रमे रहने वाले इस किसान को जिस एक शब्द में डूबने की चाहत है, वह है - 'महात्मा गांधी'। बचपन में गांधी जी हमारे पाठ्यक्रम में आए लेकिन तब इतिहास विषय को लेकर ही उन्हें समझ रहा था, या कहिए समझाया जा रहा था। लेकिन उम्र के साथ गांधी शब्द से अपनापा बढ़ता चला गया।

घर में गांधी डायरी दिखने लगी तो इस शब्द से नज़दीकी और बढ़ गई। लेकिन इन सबके बीच लेखक रामचंद्र गुहा की लेखनी से परिचय होता है और इस परिचय के सूत्रधार बनते हैं - सुशांत झा. सुशांत भाई ने रामचंद्र गुहा की किताबों का अनुवाद किया है। गांधी जी के शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफ़र पर गुहा ने 'गांधी भारत से पहले' किताब लिखी है और उनकी दूसरी किताब जिसने मुझे गांधी जी के क़रीब पहुंचाने का काम किया वह है - 'भारत गांधी के बाद.'

बचपन से सुनता आया हूं कि गांधी जी बिहार दौरे में पूर्णिया प्रवास भी करते थे। यहां उनके नाम पर दो मुख्य आश्रम हैं, एक टिकापट्टी में और दूसरा रानीपतरा में। महात्मा गांधी 1925, 1927 और 1934 में पूर्णिया आते हैं। यहां 13 अक्टूबर 1925 में बापू की पूर्णिया के एक गांव की यात्रा का जिक्र जरूरी है।

बापू पूर्णिया शहर से 25 मील दूर एक गांव विष्णुपुर पहुंचते हैं, एक पुस्तकालय का उद्घाटन करने। वहां उन्हें सुनने के लिए हजारों लोग जमा थे। गांधी ने वहां लोगों को संबोधित किया। शाम में वे एक पुस्तकालय पहुंचते हैं, जिसका नाम मातृ मंदिर था। गांधी जी ने इस पुस्तकालय का उद्घाटन किया। चौधरी लालचंद जी ने अपनी पत्नी की स्मृति में इस पुस्तकालय की स्थापना की थी।

गांधी जी ने पुस्तकालय के बाहर महिलाओं के एक समूह को संबोधित किया था। शहर से दूर देहात में पुस्तकालय और बापू का पहुंचना ही पूर्णिया परिचय है।

गांधीजी की सादगी भी हमें खींचती है। कोई आदमी इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रख सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी, जब उन्होंने देखा था कि ब्रिटिश हुकूमत में भारत का आम आदमी भूखा और नंगा बना दिया गया है। उन्होंने अपना कपड़ा खुद बुना और खुद धोया और जब वे वायसराय लॉर्ड इरविन से मिले तब भी अपनी चिर-परिचत वेशभूषा में थे जिसे देखकर चर्चिल ने घृणा से उन्हें 'अधनंगा फकीर' कहा था।

देश-विदेश की बातें करते हुए गांव की दुनिया में गांधी जी खोजने की इच्छा जाग गई है। ऐसे में पंचायती राज का ख़्याल आता है। गांधी जी ने पंचायती राज के बारे में जो सपना देखा था वह साकार हो चुका है। गांधी जी ने ‘मेरे सपनों का भारत’ में पंचायती राज के बारे में जो विचार व्‍यक्‍त किये हैं वे आज वास्‍तविकता के धरातल पर साकार हो चुके है क्‍योंकि देश में समान तीन-स्‍तरीय पंचायती राज व्‍यवस्‍था लागू हो चुकी है जिसमें हर एक गांव को अपने पांव पर खड़े होने का अवसर मिल रहा है। उनका मानना था कि जब पंचायती राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती।

हालांकि काग़ज़ पर यह सब पढ़ने में अच्छा लगता है लेकिन ज़मीन पर गांधी जी का ग्राम स्वराज भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। आज बापू की जयंती है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि हम सबसे अधिक झूठ बापू के ही नाम पर बोलते हैं। अब दो अक्टूबर को आयोजित होने वाले ग्राम सभा को ही लीजिये! यह भी एक झूठ है। जबकि यह लिखते हुए मुझे गांधी जी का यह लिखा याद आ रहा है - "अगर हिंदुस्‍तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्‍वीर की सच्‍चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी।”

पिछले एक दशक से बिहार के ग्रामीण इलाके में हूँ और सच कह रहा हूँ ' ग्राम सभा' का मजाक देख रहा हूँ। एक कॉपी या कहिये एक रजिस्टर में ग्राम सभा आयोजित होती है और उस कॉपी के पन्ने पर गांधी जयन्ती लिख कर झूठ का व्यापार किया जाता है। दरअसल यहीं से 'गांधी' नाम पर घोटाले की शुरुआत होती है।

यह कटु सच है कि हम सबकी चुप्पी गांधी जी के नाम पर होने वाले झूठ के व्यापार को बढ़ावा देती आई है। इसके लिए हम सब दोषी हैं क्योंकि यह देश की संसद की बात नहीं, हमारे आपके पंचायत - वार्ड की है।

आप दिल्ली- पटना या किसी भी सूबे के प्रधान को बड़ी आसानी से दो बात कह देते हैं लेकिन आँख के सामने घर-दुआर - पंचायत में होने वाली गलतियों पर गज़ब की चुप्पी साध लेते हैं। ईमानदारी से कहूँ तो ग्राम सभा में एक चुप्पी रहती है और फिर उस चुप्पी के एवज में लम्बा व्यापार चलता है।

हमें इस चुप्पी की ही सजा मिल रही है। गांधी हमें अन्याय सहने की बात नहीं कह गए हैं। कम से कम गाँव में चुनाव के जरिये जिन्हें चुनते हैं, उनसे तो सवाल करिये।

बापू की सादगी से सीखने का यह समय है। निजी तौर पर मुझे उनकी सादगी ही  खिंचती है। कोई आदमी इतनी ऊँचाई पर पहुँचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रखा होगा, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी। तो आइये, सादगी से ही सही सवाल करिये!



Sunday, September 27, 2026

चुनाव से पहले पंजाब!

किसी भी राज्य में जब चुनाव की तारीख नजदीक आने लगती है, वहां की सियासी हवा भी रंग बदलने लगती है। पिछले कुछ महीने से अपनी निगाह पंजाब पर है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होंगे। वैसे इन दिनों देश में चुनाव और मुख्य चुनाव आयुक्त की खबरें सबसे अधिक सुर्खियां बटौर रही है।  

चुनाव को लेकर पंजाब में हर दल अब अलर्ट मोड में है। कोई यात्रा निकाल रहा है, कोई आरोप- प्रत्यारोप लगाने में जुटा है तो कोई इधर से उधर नेताओं को करने में लगा हुआ है।

इन सबके बीच कांग्रेस पार्टी युवाओं को अपने पाले में करने के लिए योजना बनाने लगी है। आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी पंजाब कांग्रेस का फोकस इस बार युवाओं पर है। कांग्रेस ने इस बार सचिन पायलट पर दांव लगाया है और उन्हें पंजाब का नया प्रभारी बनाया है। सचिन पायलट सूबे में युवाओं को एकजुट करने की पूरी तैयारी में जुट गए हैं। उन्होंने यूथ कांग्रेस पदाधिकारियों और युवा नेताओं से फीडबैक लेने का काम शुरू कर दिया है, जिसका उद्देश्य है ऐसे नेताओं की पहचान करना जो बूथ स्तर पर सक्रिय हो और युवाओं के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ सके। आने वाले दिनों में वे पंजाब की यात्रा भी करेंगे।

दरअसल, पंजाब में 18 से 29 साल के युवा मतदाताओं की संख्या करीब 48.9 लाख से अधिक है और ये कुल वोटरों की संख्या का करीब 22 फीसदी है। पंजाब के विभिन्न राजनीतिक दल इन्हें अपने पक्ष में करने की कवायद में जुटे हुए हैं। इसी क्रम में मंगलवार को सचिन पायलट ने दिल्ली के इंदिरा भवन में पंजाब युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष शुभम शर्मा समेत अन्य नेताओं के साथ बेठक की और उनका फीडबैक लिया।

इस बैठक का उद्देश्य 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को मजबूत करना, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से समन्वय बढ़ाना और संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना है। कांग्रेस चुनावों से पहले एक तरह से 'जेन Z' वोटरों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया ने दावा किया है कि पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में उनकी पार्टी चमत्कार करेगी। उन्होंने एक बार फिर साफ किया कि पार्टी कुल 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और अपनी स्ट्रैटजी, मैनेजमेंट और कैंपेन के बलबूते बहुमत का आंकड़ा पार कर लेगी।

भाजपा- कांग्रेस की सियासी तैयारियों के बीच राज्य की सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) ने गुरुवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह एहसास होने के बाद कि पंजाब ने बीजेपी को नकार दिया है, अब वे पंजाबियों से राजनीतिक बदला लेने और चुनाव से पहले उनके लिए मुश्किलें खड़ी करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। आप के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी) के ऑपरेशन ने तीन दिनों से पूरे पंजाब में सरकारी कामकाज को प्रभावित किया है। इससे लोगों को बहुत परेशानी हो रही है, जबकि छापों में कुछ हासिल नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार का विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों के खिलाफ ईडी, इनकम टैक्स विभाग और चुनाव आयोग का इस्तेमाल करना उनकी पहचान बन गया है, लेकिन पंजाब डरने वाला नहीं है और तीन करोड़ पंजाबी लोकतांत्रिक तरीके से भाजपा को जवाब देंगे।

राजनीतिक दलों की कथाओं के बीच पंजाब की राजनीति में एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला सियासी फेरबदल देखने को मिल रहा है। इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) के पूर्व चर्चित और तेज तर्रार अधिकारी निरंजन सिंह राजनीति की पिच पर भाग्य आजमाने जा रहे हैं। उन्होंने पंजाब की खडूर साहिब सीट से सांसद और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत आरोपी अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘अकाली दल (वारिस पंजाब दे)’ का दामन थाम लिया है। उनके इस राजनीतिक कदम ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

मीडिया से बात करते हुए निरंजन सिंह ने वारिस पंजाब दे में शामिल होने का कारण भी बताया। उन्होंने वारिस पंजाब दे में शामिल होने का कारण पंजाब में नशे और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को बताया। बता दें कि अमृतपाल सिंह ने पंजाब में नशे के खिलाफ खालसा वहीर मुहिम शुरू की थी। उन्होंने दावा किया कि इस अभियान से बड़ी संख्या में युवाओं को नशा छोड़ने के लिए प्रेरणा मिली।
 
गौरतलब है कि निरंजन सिंह मई 2021 में सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने कई चर्चित मादक पदार्थ मामलों की जांच की थी। इनमें करोड़ों रुपये के जगदीश भोला मादक पदार्थ तस्करी मामले की जांच भी शामिल है। उन्होंने पीएमएलए के तहत जांच किए गए इस मामले में पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया और सरवन सिंह फिल्लौर समेत कई वरिष्ठ नेताओं से पूछताछ की थी।

निरंजन सिंह का प्रशासनिक और जांच का इतिहास काफी सुर्खियां बटोर चुका है। ईडी में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल और बेहद संवेदनशील मामलों की जांच की कमान संभाली थी। पंजाब के बहुचर्चित ड्रग्स मामले में अकाली दल के सीनियर नेता बिक्रम सिंह मजीठिया से लंबी पूछताछ करने वाले अधिकारियों में निरंजन सिंह प्रमुख रूप से शामिल थे। उस दौरान मजीठिया से पूछताछ और अचानक निरंजन सिंह के ट्रांसफर को लेकर पंजाब की राजनीति में भारी भूचाल आया था और यह मुद्दा लंबे समय तक सुर्खियों में रहा था। अब उसी तेवर वाले पूर्व अधिकारी का एक ऐसे सांसद की पार्टी में शामिल होना, जो खुद गंभीर आपराधिक मामलों और आतंकवाद से जुड़े आरोपों का सामना कर रहा है, सवाल उठाता है। इस सियासी कदम से आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति में नए समीकरण बनते नजर आ रहे हैं, जहां एक तरफ प्रशासनिक अनुभव और सख्त छवि का दावा है, तो दूसरी तरफ विवादित पृष्ठभूमि का साया है।

चुनाव नजदीक हो और बिजली बिल माफी की खबरें न आए तो सियासी खिचड़ी बनती नहीं दिखती है। ऐसे में पंजाब से खबर आई है कि राज्य सरकार ने 518 गोशालाओं के 100 करोड़ रुपये से अधिक के बिजली बिल माफ किए हैं। इनमें अमृतसर जिले की 14 गोशालाएं भी शामिल हैं। यह जानकारी पंजाब गो सेवा आयोग के उपाध्यक्ष कीमती भगत ने जिला प्रशासनिक परिसर में अधिकारियों और गोशाला प्रबंधकों के साथ बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में दी। दरअसल चुनाव से पहले ऐसी खबरें बताती है कि आने वाले समय में सूबे की सियासत अभी और भी कई रंग दिखाएगी।

Friday, September 18, 2026

विधानसभा चुनाव से पहले ग्राउंड से सियासी पंजाबी बातें

पंजाब में विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच राजनीतिक दल अब सिर्फ रैलियों और बैठकों को लेकर ही नहीं सोच रहे हैं बल्कि अब वे ग्राउंड रिपोर्ट कार्ड भी बनाने लगे हैं। हर दल अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि जमीन पर उनकी असली स्थिति क्या है? कौन सा विधानसभा क्षेत्र मजबूत है, कहां पार्टी को नुकसान हो सकता है और किन सीटों पर उम्मीदवार बदलने की जरूरत पड़ सकती है, इसे लेकर सीट-टू-सीट सर्वे कराया जा रहा है। मतलब साफ है, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, ये सभी अपने-अपने स्तर पर पता लगा रहे हैं कि उनकी पार्टी ग्राउंड में कितनी मजबूत है।

गौरतलब है कि पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं। आम आदमी पार्टी के पास फिलहाल 95 सीटें हैं। ऐसे में सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही आप के लिए अपने मौजूदा विधायकों की स्थिति जानना अहम है। वहीं कांग्रेस, बीजेपी और शिअद भी अपने संगठन, संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों की ताकत परख रहे हैं। इन सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर चुनावी रणनीति, उम्मीदवारों और कमजोर सीटों पर फोकस तय किया जा सकता है।

इन सबके बीच यदि आपको पंजाब के चुनावी मुद्दों को समझना है तो प्रदेश के तीन प्रमुख क्षेत्रों की आवोहवा से वाकिफ होना होगा। सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं, मालवा, माझा और दोआबा। दरअसल, इन क्षेत्रों के मतदाताओं के मिजाज पर यहां के स्थानीय मुद्दों का खासा असर पड़ता है।


पंजाब में कुल 117 में से 69 विधानसभा सीटें मालवा क्षेत्र में आती हैं। पंजाब की राजनीति में कहा जाता है कि इसी क्षेत्र से उठी सियासी लहर पंजाब में सत्ता का रुख तय करती है। यही कारण है कि मालवा को पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी कहा जाता है। यह पंजाब का सबसे बड़ा क्षेत्र है और 15 जिलों में फैला हुआ है। प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह, भगवंत मान जैसे दिग्गज नाम इसी क्षेत्र से रहे हैं इसलिए सभी दल मालवा में बेहतर प्रदर्शन के लिए खास रणनीति बनाने में जुट चुके हैं।

साल 2022 के चुनावों की स्थिति देखें तो आप ने मालवा में एकतरफा जीत दर्ज की थी। यहां 69 में से आप को 66, कांग्रेस को 2 व शिरोमणि अकाली दल को एक सीट मिली थी। किसान और किसानी से जुड़े मसले, भूजल और कैंसर बेल्ट, बेरोजगारी व युवाओं का पलायन इस क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे हैं।

अब आपको लेकर चलते हैं माझा का इलाका। अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन और पठानकोट का इलाका माझा क्षेत्र कहा जाता है। यहां कुल 25 विधानसभा सीटें आती हैं। माझा को पंजाब की पंथक और राजनीतिक राजधानी माना जाता है। भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे होने के कारण यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा, तस्करी और रक्षा रणनीति की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। साल 2022 में यहां 25 में से आप ने 16 सीटें, कांग्रेस ने 7, शिअद-भाजपा ने 1-1 सीटें जीती थीं। इस क्षेत्र में आप के समक्ष अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने, जबकि कांग्रेस और शिअद को इस पारंपरिक गढ़ में पंथक और ग्रामीण वोट बैंक को वापस पाने की चुनौती रहेगी। पठानकोट और अमृतसर जैसे शहरी इलाकों में हिंदू-सिख समीकरण साधकर पार्टियां जनाधार जुटाने की तैयारी में हैं। नशाखोरी व सीमा पार तस्करी, सीमावर्ती किसानों व व्यापारियों की समस्याएं यहां प्रमुख मुद्दे हैं।

माझा के बाद सभी की निगाहें दोआबा पर रहती है। सतलुज और ब्यास नदियों के बीच का भूभाग दोआबा सूबे की राजनीति में खास स्थान रखता है। चार जिलों जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर तक फैले इस क्षेत्र में कुल 23 विधानसभा सीटें हैं। साल 2022 में आप ने यहां 10, कांग्रेस ने 9, भाजपा ने 1 व शिअद और बसपा ने 1-1 सीट जीती थीं। इस क्षेत्र में दलित और एनआरआई पंजाबी खासे असरदार रहते हैं। इसलिए दलों का जोर यहां इन दोनों वर्गों को साधने पर रहेगा। दोआबा में दलित वोट बैंक का ध्रुवीकरण, एनआरआई और आव्रजन नीतियां, अवैध खनन और औद्योगिक व बुनियादी विकास सरीखे मुद्दे चुनाव में खासे उछाले जाते रहे हैं।

इन सबके बीच भाजपा ने चुनावी रोडमैप तैयार करना शुरू कर दिया है। नशे के खिलाफ पार्टी मुखर है। भाजपा ने ‘ट्रिपल C’ यानी क्राइम, करप्शन और चिट्टा (ड्रग्स) को केंद्र में रखकर अपने प्रचार अभियान को हॉट पॉलिटिकल टॉपिक बनाने की सोच रही है। इसके साथ ही युवा, रोजगार, कानून-व्यवस्था और जातीय समीकरण पर भी पार्टी जोर देने की तैयारी में है।

दूसरी ओर आम आदमी पार्टी की नवगठित पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) की गुरुवार को पहली बैठक हुई। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उनके आवास पर हुई बैठक में पीएसी से जुड़े पंजाब के नए सदस्य सीएम भगवंत सिंह मान और मंत्री हरपाल सिंह चीमा भी शामिल हुए। मनीष सिसोदिया ने बताया कि बैठक में मुख्य रूप से पंजाब, गोवा और गुजरात में होने वाले चुनावों को जितने को लेकर गहन मंथन हुआ। उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता भगवंत सिंह मान के काम से बेहद खुश है और उन्हें दोबारा बतौर मुख्यमंत्री देखना चाहती है, जबकि गोवा और गुजरात की जनता भाजपा के कुशासन से त्रस्त हो चुकी है और अब बदलाव चाहती है।

हर दल के बड़े नेता अब पंजाब की तरफ नजर लगाए हुए हैं, आने वाले दिनों में चुनावी अभियानों से जुड़ी खबरें खूब सामने आएगी लेकिन असल बात तो वही है कि सत्ता में आम आदमी पार्टी वापसी कर पाएगी या फिर पंजाब की जनता कांग्रेस या फिर भाजपा को मौका देगी।

देखिए, आने वाले दिनों में पंजाब में क्या होता है, फिलहाल ग्राउंड की कहानी यही है कि सियासी रणनीतिकार सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्रों मालवा, माझा व दोआबा के लिए अलग-अलग चुनावी रणनीति बनाने में जुटे हैं। 

Saturday, September 05, 2026

यहां बातचीत कन्नड़ या अंग्रेजी में नहीं, बल्कि संस्कृत में होती है!



कर्नाटक में एक ऐसा गांव है, जहां आज भी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत की भाषा संस्कृत है! इस गांव का नाम है मत्तूर। राजनीति की कथा कहानियों से कोसों दूर आज हम आपको इसी गांव की कहानी सुनाने जा रहे हैं। 
मत्तूर गांव कर्नाटक के शिमोगा जिले में स्थित है, जो बेंगलुरु से करीब 320 किलोमीटर की दूरी पर है। यह गांव तुंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहाँ के निवासियों की मातृभाषा ‘संकेथी’ होने के बावजूद, दैनिक बोलचाल में संस्कृत का व्यापक उपयोग किया जाना यहाँ की विलक्षणता को दर्शाता है।

मत्तूर की संस्कृत परंपरा का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में राजा कृष्ण देव राय ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए मत्तूर गांव को केंद्र बनाया था। हालांकि आधुनिक दौर में यह भाषा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी, लेकिन गांव के बुजुर्गों के मुताबिक साल 1981 से गांव ने संस्कृत को फिर से अपनाना शुरू किया और तभी से यह भाषा यहां की पहचान बन गई।

वैदिक जड़ों की ओर वापसी का सफर 1981 में शुरू हुआ, जब शास्त्रीय भाषा को बढ़ावा देने वाली संस्था संस्कृत भारती ने मत्तूर में 10 दिवसीय संस्कृत कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें पास के उडुपी स्थित पेजावर मठ के संत समेत कई अन्य लोग शामिल हुए। ग्रामीणों को संस्कृत को संरक्षित करने के इस अनूठे प्रयोग में उत्साहपूर्वक भाग लेते देख संत ने कहा, “एक ऐसी जगह जहाँ लोग संस्कृत बोलते हैं, जहाँ पूरे घर संस्कृत में बात करते हैं! आगे क्या? एक संस्कृत गाँव!” मत्तूर के निवासियों ने इस आह्वान को दिल से स्वीकार कर लिया। इस तरह संस्कृत गाँव की प्रमुख भाषा बन गई।

माना जाता है कि मत्तूर में संस्कृत के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में वहां की स्थानीय धार्मिक और शैक्षिक परंपराओं ने अहम भूमिका निभाई है। इस गांव में वैदिक और संस्कृत शिक्षा की पुरानी परंपरा रही है। बच्चों को कम उम्र में ही संस्कृत से परिचित कराया जाता है, और कई परिवार अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में इसका इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे दौर में जब संस्कृत को अक्सर सिर्फ़ प्राचीन ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है, मत्तूर गांव यह दिखाता है कि सांस्कृतिक और शैक्षिक पहलों के ज़रिए किसी भाषा को पीढ़ियों तक कैसे जीवित रखा जा सकता है। 

मत्तूर गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो चीज हैरान करती है, वह है यहां के लोगों का संस्कृत में सहज बातचीत करना। गांव के बच्चे, बुजुर्ग और जवान सभी धाराप्रवाह संस्कृत में बात करते हैं। बाजार में सामान खरीदना हो, खेत में काम करना हो या फिर घर की आम बातचीत, यहां सब कुछ संस्कृत में ही होता है.। गांव में प्रवेश करते ही माहौल भी अलग महसूस होता है, यहां के लोगों की वेशभूषा और रहन-सहन भी परंपरागत भारतीय संस्कृति की झलक देते हैं।

मत्तूर में सब्जी विक्रेता से लेकर पुजारी तक, हर कोई संस्कृत समझता है। अधिकांश लोग धाराप्रवाह संस्कृत बोलते भी हैं। नदी किनारे वैदिक मंत्रों का पाठ करते बुजुर्गों का समूह और उनके पास से साइकिल पर तेजी से गुजरते हुए कुछ युवकों का प्राचीन भाषा में मोबाइल फोन पर बातचीत करते हुए निकलना कोई असामान्य बात नहीं है।

मत्तूर एक कृषि प्रधान गाँव है जहाँ मुख्य रूप से सुपारी और धान की खेती होती है। यहाँ संकेठी समुदाय के लोग रहते हैं, जो एक प्राचीन ब्राह्मण समुदाय है। यह समुदाय लगभग 600 वर्ष पूर्व केरल से आकर मत्तूर में बस गया था। संस्कृत के अलावा, वे संकेठी नामक एक दुर्लभ बोली भी बोलते हैं, जो संस्कृत, तमिल, कन्नड़ और तेलुगु के कुछ अंशों का मिश्रण है। संकेठी बोली की कोई लिखित लिपि नहीं है और इसे देवनागरी लिपि में पढ़ा जाता है।

हमारे एक पत्रकार साथी ने बताया कि मत्तूर ने 30 से अधिक संस्कृत प्रोफेसर तैयार किए हैं जो कुवेम्पु, बेंगलुरु, मैसूर और मैंगलोर विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। मत्तूर कई प्रतिष्ठित हस्तियों का गृह ग्राम भी है, जिनमें भारतीय विद्या भवन, बैंगलोर के मथुर कृष्णमूर्ति, वायलिन वादक वेंकटराम औरगामाका प्रतिपादक एचआर केशवमूर्ति शामिल हैं।

भाषा और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए, मत्तूर भारत में घूमने की एक दिलचस्प जगह है।

Friday, August 21, 2026

उत्तर-बंग के दौरे पर अमित शाह, सीमा सुरक्षा पर फोकस !




कांग्रेस के साथ वंदे मातरम विवाद के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल के दौरे पर गुरुवार रात सिलीगुड़ी पहुंचे। उनका यह दौरा मुख्य रूप से सीमा सुरक्षा और प्रशासनिक समीक्षा पर केंद्रित है।
गृह मंत्री के इस दौरे को रणनीतिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए बेहद संवेदनशील इलाका है। यही संकरा गलियारा देश के पूर्वोत्तर राज्यों को बाकी भारत से जोड़ता है। ऐसे में यहां सीमा सुरक्षा, निगरानी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

इस अहम दौरे में अमित शाह सशस्त्र सीमा बल के जवानों से मुलाकात करेंगे, सीमा सुरक्षा परियोजनाओं की शुरुआत करेंगे और साथ ही सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल, खुफिया एजेंसियों व राज्य अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करेंगे। यह एक महीने में शाह का सिलीगुड़ी का दूसरा दौरा है।

गृह मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस दौरे का सबसे अहम फोकस देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन को मजबूत करना और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करना है। गृह मंत्री सिलीगुड़ी में उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करेंगे, जिसमें सीमा सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की समीक्षा की जाएगी।

गृह मंत्री अपने दौरे के पहले दिन शुक्रवार को सीमा सुरक्षा और सीमा प्रबंधन से जुड़े कई कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान सीमा सुरक्षा को मजबूत करने वाली विभिन्न परियोजनाओं का उद्घाटन और कई परियोजनाओं की आधारशिला रखे जाने का कार्यक्रम है।

इन परियोजनाओं का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करना, सुरक्षा बलों की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाना और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। सरकार लगातार देश की सीमाओं पर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, निगरानी व्यवस्था और तकनीकी क्षमता विकसित करने पर जोर दे रही है।

गृह मंत्री अपने दौरे के दौरान सशस्त्र सीमा बल यानी SSB के जवानों से भी मुलाकात करेंगे। SSB भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालता है।

गौरतलब है कि SSB भारत-नेपाल की करीब 1,751 किलोमीटर लंबी और भारत-भूटान की करीब 699 किलोमीटर लंबी सीमा की सुरक्षा करता है। दोनों सीमाएं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और सिलीगुड़ी क्षेत्र इन सीमाओं के व्यापक सुरक्षा नेटवर्क का अहम हिस्सा है। भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा पर सुरक्षा की चुनौती अन्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से कुछ अलग है। इन सीमाओं पर लोगों की आवाजाही, भौगोलिक परिस्थितियां और खुली सीमा की प्रकृति सुरक्षा एजेंसियों के लिए अलग तरह की चुनौतियां पैदा करती हैं। ऐसे में इंटेलिजेंस इनपुट, स्थानीय स्तर पर समन्वय, निगरानी और तकनीकी संसाधनों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।


नजर चिकन नेक’ पर


सिलीगुड़ी कॉरिडोर को आम बोलचाल में ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। यह भारत के नक्शे में एक संकरा भू-भाग है जो देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों को भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इसकी रणनीतिक स्थिति इसे देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल करती है। ये कॉरिडोर लगभग 60 किलोमीटर लंबा और करीब 22 किलोमीटर तक चौड़ा बताया जाता है। इसके आसपास भारत की कई अंतरराष्ट्रीय सीमाएं हैं। एक तरफ बांग्लादेश, दूसरी तरफ नेपाल और भूटान तथा उत्तर में तिब्बत क्षेत्र है। इस वजह से सिलीगुड़ी कॉरिडोर का महत्व केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि ये पूरे पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। पूर्वोत्तर के आठ राज्यों तक सड़क और रेल संपर्क के लिए यह क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी भी आपात स्थिति में इस कॉरिडोर की सुरक्षा और निर्बाध कनेक्टिविटी बेहद अहम हो जाती है।

यही कारण है कि केंद्र सरकार यहां इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा दोनों को लेकर लगातार समीक्षा करती रही है। अमित शाह की बैठक में सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा व्यवस्था, सीमा क्षेत्रों में निगरानी और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय प्रमुख मुद्दों में हैं।



अमित शाह का पश्चिम बंगाल दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है, जब भारत की पूर्वी सीमा पर सुरक्षा और बॉर्डर मैनेजमेंट लगातार केंद्र सरकार की प्राथमिकता में है। पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसके अलावा राज्य का उत्तरी हिस्सा नेपाल और भूटान की सीमाओं के करीब है।

इस लिहाज से सिलीगुड़ी में होने वाली बैठक का दायरा केवल भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा तक सीमित नहीं माना जा सकता। पूरे पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था, सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय भी चर्चा का हिस्सा बन सकता है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार की रणनीति अब सीमा सुरक्षा को मल्टी-लेयर सिक्योरिटी मॉडल के तहत मजबूत करने की है। इसमें भौतिक सुरक्षा के साथ-साथ तकनीकी निगरानी, बेहतर सड़क और संचार नेटवर्क, इंटेलिजेंस इनपुट और एजेंसियों के बीच तत्काल सूचना साझा करना शामिल है।

अमित शाह के दौरे का एजेंडा केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। वह सिलीगुड़ी में तीन नए आपराधिक कानूनों पर आधारित एक प्रदर्शनी का भी उद्घाटन करेंगे। इन तीन कानूनों में भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) शामिल हैं। इन कानूनों ने औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे पुराने आपराधिक कानूनों की जगह ली है और एक जुलाई 2024 से लागू हुए हैं।

प्रदर्शनी के जरिए नए कानूनों के प्रमुख प्रावधानों और उनके महत्व की जानकारी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। केंद्र सरकार देशभर में इन कानूनों को लेकर जागरूकता अभियान चला रही है, ताकि आम नागरिकों के साथ-साथ पुलिस, जांच एजेंसियों और न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों को इनके प्रावधानों की जानकारी हो।

अमित शाह की बैठक का एक अहम पहलू विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय भी है। सिलीगुड़ी जैसे रणनीतिक इलाके में ये समन्वय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

गृह मंत्री की बैठक में सुरक्षा एजेंसियों की मौजूदा तैयारियों के साथ भविष्य की चुनौतियों से निपटने की रणनीति पर भी चर्चा होने की संभावना है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर का सीधा संबंध सुरक्षा से है। मजबूत सड़क और संचार नेटवर्क न केवल आम लोगों की कनेक्टिविटी बेहतर करते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सुरक्षा बलों की तेज आवाजाही और लॉजिस्टिक सपोर्ट में भी मदद करते हैं।

अमित शाह के दौरे के दौरान जिन परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास होगा, उन्हें इसी व्यापक बॉर्डर सिक्योरिटी रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।

अमित शाह का ये दौरा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। एक तरफ भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे SSB की तैयारियों की समीक्षा होगी। वहीं, दूसरी तरफ रणनीतिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा व्यवस्था पर भी नजर रहेगी। इसके अलावा बांग्लादेश सीमा से जुड़े व्यापक सुरक्षा परिदृश्य, पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी और सीमा क्षेत्रों में चल रही परियोजनाओं की प्रगति भी इस दौरे को महत्वपूर्ण बनाती है। कुल मिलाकर अमित शाह का सिलीगुड़ी दौरा ‘बॉर्डर सिक्योरिटी, बेहतर कॉर्डिनेशन और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ की केंद्र सरकार की रणनीति का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है।




Friday, August 14, 2026

महज 13 की उम्र में सीने पर खाई गोली, कहानी बिहार के बाल शहीदों की

आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं और लोकतंत्र में अपनी बात रखने की आजादी का अधिकार रखते हैं, उसके पीछे लाखों स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष, त्याग और बलिदान छिपा है। हजारों क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर झूले और असंख्य लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएं सहीं। लेकिन यह भी सच है कि इनमें से कई क्रांतिकारियों को हम सबने भूला दिया है। आज इस बात की आवश्यकता है कि हम अपने अंचल के उन लोगों की स्मृति को नमन करें जिनके बलिदान की वजह से हम सब को आजादी मिली।
बिहार के सीमांचल इलाके के इन्हीं गुमनाम और समर्पित सेनानियों की संघर्षगाथा आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं। जिस प्रकार अमर शहीद खुदीराम बोस ने कम उम्र में ही देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे, उसी प्रकार मात्र 13 वर्ष की अल्प आयु में 13 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश गोलियों का सामना करते हुए ध्रुव कुंडू ने कटिहार-पूर्णिया क्षेत्र में अद्वितीय शौर्य और बलिदान का परिचय दिया था।

देश की स्वतंत्रता के लिए 13 वर्ष की उम्र में बलिदान देने वाले अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में गुरुवार को पूर्णिया शहर में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

पूर्णिया शहर के ध्रुव उद्यान में अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहरवासियों ने हिस्सा लेकर ध्रुव कुंडू के साहस, संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए बलिदान को याद किया। कार्यक्रम के आयोजक, युवा सामाजिक कार्यकर्ता एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी शौर्य राय ने कहा कि ध्रुव कुंडू की स्मृति में शुरू की गई यह पहल किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्णिया के नागरिकों की साझी भावना है। उन्होंने कहा कि जिस बालक ने 13 वर्ष की उम्र में देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, उसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।

ध्रुव कुंडू का जन्म 1929 में कटिहार, बिहार के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉक्टर किशोरीलाल कुंडू के घर हुआ था। देशभक्त पिता का यह बेटा बचपन से ही अंग्रेज विरोधी गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता था| 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उनकी उम्र केवल 13 वर्ष थी फिर भी इन्होंने अंग्रेजों के प्रतिकार के लिए अपनी एक टोली बनाई| 11 अगस्त 1942 को ध्रुव के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने “रजिस्ट्री कार्यालय” के दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया। 13 अगस्त 1942 को कटिहार नगर के सब रजिस्ट्रार का कार्यालय भी उन्होंने ध्वस्त करा दिया| उन्होंने मुंसिफ कोर्ट सहित कई सरकारी दफ्तरों से अंग्रेजी हुकूमत के झंडे उखाड़ दिए और वहां भारतीय तिरंगा फहरा दिया। जब ध्रुव के नेतृत्व में क्रान्तिकारी दल मुंसिफ कोर्ट पर तिरंगा फहरा कर आगे बढ़ रहा था तो अंग्रेजों ने प्रतिकार के लिए क्रान्तिकारियों पर गोलियां चला दी| ध्रुव कुंडू घायल हो गए और उन्हें पूर्णिया सदर अस्पताल ले जाया गया लेकिन मात्र 13 वर्ष की उम्र में ही ध्रुव कुंडू ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

अपने वीर सपूत के बलिदान दिवस पर भले कुछ लोग हर साल अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करते हों, लेकिन उनकी यादों को सहेजने के लिए उनके नाम पर बने ध्रुव कुंडू स्मारक और पार्क अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

जिस उम्र में बच्चे खेलने कूदने में मस्त रहते उस उम्र में 13 वर्षीय ध्रुव कुंडू महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन में कूद पड़े थे। 1942 का यह आंदोलन 13 अगस्त तक आजादी की लहर बनकर फैल चुकी थी। जब गांधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन और करो या मरो का नारा दिया था तो पूर्णिया में भी हजारों लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम छेड़ दिया था। इस दौरान धमदाहा में 25 अगस्त को हजारों लोगों की भीड़ ने धमदाहा और रुपौली थाना को घेरकर आग लगा दिया था। इस घटना में अंग्रेजों की तरफ से अंधाधुंध गोली चलाई गयी थी, जिसमें धमदाहा में 14 और रुपौली में सात सपूत शहीद हुये थे।

आज भी पूर्णिया के टाउन हॉल, धमदाहा और रुपौली में बने शहीद स्मारक में इन शहीदों का नाम लिखा हुआ है। इसके अलावा 1942 में शहीद हुये 13 वर्षीय कुताय साह और ध्रुव कुंडू का भी स्मारक बना है। लेकिन, आज ये सभी स्मारक और शहीद स्थल उपेक्षा का शिकार होकर गुमनामी की कगार पर हैं।

पूर्णिया के इन शहीदों के बारे में बताया जाता है कि 9 अगस्त 1942 को पूर्णिया शहर के सिपाही टोला के पास 13 साल के बच्चा कुताय साह के साथ सैकड़ों लोग जब स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेजों का विरोध कर रहे थे। उस समय अंग्रेज अधकारी ने कुताय साह को चेतावनी दी। लेकिन, निडर कुताय साह ने अपनी शर्ट का बटन खोलकर अंग्रेजों को ललकारते हुये आगे बढ़ गए और कहा कि चलाओ गोली। तभी अंग्रेज अधिकारी ने उनके सीने में गोली मार दी जिस कारण वह वहीं शहीद हो गए। इसके बाद ध्रुव कुंडू को भी अंग्रेजों ने गोली मार दी। दोनों शहीदों के शव को मधुबनी महावीर मंदिर के प्रांगण में लाया गया जहां उनके नाम पर ध्रुव कुताय उद्यान बना है। लेकिन यह ऐतिहासिक धरोहर बदहाली और उपेक्षा का शिकार है।

सिपाही टोला मे बने कुताय साह स्मारक और बनभाग में बने ध्रुव कुन्डू का स्मारक भी जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। 

गुरुवार को पूर्णिया में अमर शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में स्थानीय लोगों की भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि लोग अपने अंचल की स्मृति को मिटने नहीं देंगे। 

कार्यक्रम के आयोजक शोधार्थी Shourya Roy ने बताया कि पूर्णिया और सीमांचल क्षेत्र के जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया है, उन्हें इतिहास और सार्वजनिक स्मृति में उनका वाजिब स्थान मिलना चाहिए। स्थानीय इतिहास और नायकों को संजोने से न केवल क्षेत्रीय पहचान मजबूत होती है, बल्कि युवाओं में देशप्रेम की भावना भी बलवती होती है।


Friday, August 07, 2026

संसद में जारी गतिरोध खत्म हो पाएगा?





मौजूदा मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए केंद्र सरकार अपनी अंतिम कोशिशों में जुट गई है। संसद में जारी गतिरोध खत्म करने के लिए संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने तीन दिन में तीसरी बार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से बात कर मनाने का प्रयास किया।

जैसा कि हम सभी को पता है कि इस सत्र में अभी तक लोकसभा में एक भी प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका है। पांच बिल पास हुए हैं, लेकिन बिना चर्चा के। यहां तक कि जब लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पेश किया गया, तब भी वक्त का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया। भले ही बिल पास हो रहे हों और सरकार अपने विधायी कार्य आगे बढ़ा रही हो, लेकिन यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। संसदीय परंपरा में बहस और चर्चा सदन की कार्यवाही के सबसे जरूरी अंग हैं। इसी से बेहतरी का रास्ता मिलता है।

सूत्रों के अनुसार, नीट पेपर लीक आंदोलन में बल प्रयोग पर गृह मंत्री अमित शाह संसद में बयान दे सकते हैं, जिसके बाद गतिरोध खत्म होने की उम्मीद है। हालांकि,  नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुरानी शर्तों को दोहराते हुए इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की सलाह दी है। वहीं, राज्यसभा के सभापति ने भी रिजिजू से गतिरोध तोड़ने के लिए विपक्ष की भावनाएं शाह तक पहुंचाने को कहा है।

विपक्ष अगर गतिरोध तोड़ने पर राजी हो जाता है, तो सरकार की रणनीति मानसून सत्र का कार्यकाल बढ़ाने या स्वतंत्रता दिवस के तत्काल बाद विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन व महिला आरक्षण का रास्ता साफ करने की है। सरकार के सूत्रों का कहना है कि इसके लिए जरूरी दो तिहाई सांसदों के समर्थन का रोडमैप तैयार है। डीएमके और एनसीपी (एसपी) ने सरकार को सकारात्मक संदेश दिया है। उधर, तमिलनाडु के सीएम विजय ने परिसीमन और इसके प्रभाव पर चर्चा के लिए आठ अगस्त को राज्य के सभी सांसदों की बैठक बुलाई है।

हालांकि, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू की दो दिनों की बातचीत के बाद भी संसद में सरकार और कांग्रेस के बीच गतिरोध बरकरार है। इन सबके बीच कयास लगाए जा रहे हैं कि गृह मंत्री  अमित शाह आज संसद में विपक्ष के सवालों के जवाब दे सकते हैं जिसके बाद संसद में गतिरोध खत्म होने के आसार हैं।

दूसरी ओर राहुल गांधी विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) और महिला आरक्षण व परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर सर्वदलीय बैठक की मांग पर अड़ गए हैं।

सर्वदलीय बैठक की जरूरत को नकारते हुए सरकार का कहना है कि सभी दलों से बात हो चुकी है। एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि इन विधेयकों को पास कराने के लिए अगले एक-दो दिनों में फैसला ले लिया जाएगा।

गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो रहा है। ऐसे में अगला हफ्ता अहम हो सकता है। दरअसल विपक्ष और खासतौर पर कांग्रेस के साथ चल रहे गतिरोध को दूर करने के लिए सरकार की ओर से बुधवार को गंभीर पहल शुरू हुई।

रिजीजू और राहुल गांधी की लगभग 50 मिनट तक हुई मुलाकात में नेता प्रतिपक्ष ने सहयोगी दलों से सलाह-मशविरा के लिए समय मांगा।

गुरुवार को विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए के घटक दलों की बैठक में सरकार की पहल पर विस्तार से चर्चा हुई, जिसमें सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला लिया गया। फिर रिजीजू और राहुल गांधी के बीच फोन पर बातचीत हुई। इसमें नेता प्रतिपक्ष ने सर्वदलीय बैठक बुलाने की विपक्ष की मांग रखी।

उधर, रिजीजू का कहना था कि सरकार की पहले ही सभी दलों से बातचीत हो चुकी, सिर्फ कांग्रेस से वार्ता बाकी है। दरअसल तीनों विधेयकों की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार इन्हें बिना चर्चा के पास कराने के पक्ष में नहीं है, लेकिन कांग्रेस के रवैये के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है। सरकार इन विधेयकों से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत कर उनकी आशंकाओं को दूर करने का प्रयास कर रही है।

सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल कांग्रेस के विरोध के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों को रोका नहीं जा सकता है। हंगामे के बीच लोकसभा और राज्यसभा दोनों से कई विधेयक पारित किए जा चुके हैं।

वर्तमान मानसून सत्र के केवल पांच कार्यकारी दिन बचे हैं, ऐसे में सत्र का कार्यकाल बढ़ाने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। सूत्रों का दावा है कि सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा हो गया है। लेकिन सदन में वोटिंग के लिए सही माहौल बनाने में विपक्ष के सहयोग की आवश्यकता होगी।

एक अटकल यह भी है कि यदि सरकार ने परिसीमन पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया तो इसे पहले राज्यसभा में पेश किया जा सकता है जहां सरकार के लिए संख्या बल जुटाना अपेक्षाकृत आसान है। ऐसा माना जा रहा है कि इस मामले में अंतिम निर्णय शुक्रवार यानि आज लिया जा सकता है।

इन सबके बीच गृहमंत्री अमित शाह संसद भवन लगातार आ रहे हैं और अधिकारियों संग बैठक कर रहे हैं। बिते दिनों अमित शाह ने एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों पर फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने की पहल शुरू की। इस सिलसिले में उन्होंने ईसाई समुदाय से जुड़े विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर चर्चा की।

इसके पहले शाह कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस आफ इंडिया के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर चुके हैं। संसद भवन परिसर में हुई मुलाकात में ईसाई प्रतिनिधिमंडल ने एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अपनी आशंकाओं को खुलकर रखा।

सूत्रों के अनुसार शाह ने उनकी आशंकाओं को दूर करते हुए कहा कि प्रस्तावित संशोधनों के बारे में कई तरह से दुष्प्रचार किए जा रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि संशोधनों में ईसाई सहित सभी समुदायों के हितों का ख्याल रखा है।

उन्होंने इन संसोधनों की जरूरत के बारे में भी विस्तार से बताया। शाह ने कहा कि सरकार की कोशिश सिर्फ विदेशी अनुदान में पारदर्शिता लाने और उन्हें सुचारू बनाने की है। सूत्रों के अनुसार एफसीआरए बिल पर सदन में 12 अगस्त को चर्चा हो सकती है।



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Friday, July 31, 2026

न विधायक न MLC, फिर कैसे मंत्री बने हुए हैं?

क्या कोई व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने लंबे समय तक मंत्री बना रह सकता है? क्या संविधान में दी गई 6 महीने की छूट को बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है? यह वैधानिक सवाल इन दिनों देश के सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया है।

बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश के मामले में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने साफ कहा कि यह पूरी तरह कानून की व्याख्या का मामला है और राज्य सरकार को बताना होगा कि कोई व्यक्ति छह महीने से अधिक समय तक निर्वाचित हुए बिना मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है। इस टिप्पणी के बाद बिहार की राजनीति के साथ-साथ संवैधानिक मामलों के जानकारों की नजर भी इस मामले पर टिक गई है।

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को बिहार के मंत्री दीपक प्रकाश से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से सवाल करते हुए कहा कि बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं है। फिर भी वह 6 महीने से ज्यादा समय से अपने पद पर कैसे बने हुए हैं।

याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत से याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि छह महीने से ज्यादा समय बीत चुका है। दीपक प्रकाश न विधायक हैं और न ही एमएलसी, इसके बावजूद वह मंत्री पद पर बने हुए हैं। वकील ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में दखल लेने की अपील करते हुए कहा, 'माई लॉर्ड, अब छह महीने से ज़्यादा हो गए हैं। वह मंत्री बने हुए हैं।'

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से कानून से जुड़ा है। राज्य सरकार को यह बताना होगा कि दीपक प्रकाश कुशवाहा, जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, वो किस संवैधानिक आधार पर छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री पद पर बने हुए हैं? मंत्री बने रहने की अनुमति देने का संवैधानिक आधार क्या है।

यह याचिका दीपक प्रकाश के राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य न होने के बावजूद बिहार के पंचायती राज मंत्री के तौर पर बने रहने की संवैधानिक वैधता से जुड़ी है।

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता और व्हिसलब्लोअर राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर बिहार सरकार को नोटिस जारी किया था। याचिका में बिहार में नई सम्राट सरकार बनने के बाद दीपक प्रकाश की मंत्री के तौर पर दोबारा नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) से जुड़ा एक अहम संवैधानिक सवाल उठाया गया है, जो किसी ऐसे व्यक्ति को, जो विधायक नहीं है, अधिकतम छह महीने तक मंत्री के तौर पर काम करने की अनुमति देता है; इस अवधि के भीतर उस व्यक्ति को विधायिका का सदस्य बनना ज़रूरी होता है।

क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 15 अप्रैल, 2026 को पद छोड़ने से पहले दीपक प्रकाश ने पंचायती राज मंत्री के रूप में चार महीने और 26 दिनों तक कार्य किया, जिसके साथ ही उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।

इसके बाद अगले 22 दिनों तक उन्होंने कोई भी मंत्री पद नहीं संभाला। 7 मई, 2026 को सम्राट चौधरी द्वारा नई सरकार बनाने के बाद, प्रकाश ने निर्वाचित न होने के बावजूद फिर से मंत्री पद की शपथ ली।

इसके बाद 30 मई को दायर याचिका में उनकी नियुक्ति को अमान्य घोषित करने की मांग की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह संविधान के साथ धोखाधड़ी है। क्योंकि, दीपक प्रकाश अब तक कुल मिलाकर छह महीने से अधिक समय से पद पर बने हुए हैं, जबकि वे किसी भी सदन के लिए निर्वाचित नहीं हुए हैं।

क्या कहता है कानून?
अनुच्छेद 164(4) प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री द्वारा नियुक्त किए जाने पर मंत्रियों को निर्वाचित होने के लिए छह महीने की छूट अवधि प्रदान करता है। इसमें कहा गया है, "कोई भी मंत्री जो लगातार छह महीनों की अवधि के लिए राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।"

इसलिए, यदि कोई मंत्री छह महीने की अवधि के भीतर निर्वाचित नहीं होता है, तो उसे पद से इस्तीफा देना होगा।

क्यों अलग है बिहार का मामला?
बिहार का मामला इसलिए अलग है क्योंकि मंत्री दीपक प्रकाश ने लगातार छह महीने तक पद पर कार्य नहीं किया है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में वे चार महीने और 26 दिन तक मंत्री रहे, जो छह महीने की छूट अवधि के भीतर था। इसके बाद सीएम स्रमाट चौधरी द्वारा फिर से नियुक्त किए जाने के बाद से दीपक प्रकाश ने कुछ महीने ही सेवा की है। लेकिन कुल मिलाकर, वे बिना निर्वाचित हुए छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर बने रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल
बता दें कि किसी मंत्री के पदभार ग्रहण करने के महीनों बाद उसे निर्वाचित कराने की प्रथा अपने आप में विवादास्पद नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी मंत्री के लिए छह महीने की समय सीमा से पहले इस्तीफा देना, कुछ दिनों बाद फिर से पदभार ग्रहण करना और यह दावा करना कि छह महीने की अवधि नए शपथ ग्रहण की तारीख से फिर से शुरू हो जाएगी, यह कानूनी रूप से कितना सही है?

आने वाले 4 अगस्त को दीपक प्रकाश केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल एक मंत्री की कुर्सी का फैसला नहीं होगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि क्या छह महीने की संवैधानिक छूट दोबारा ली जा सकती है या नहीं। यदि कोर्ट कहती है कि दोनों कार्यकाल जोड़कर अवधि गिनी जाएगी तो भविष्य में कोई भी सरकार इस तरह की नियुक्ति नहीं कर सकेगी। वहीं यदि कोर्ट नई शपथ के साथ नई छह महीने की अवधि मानती है तो यह संविधान की नई न्यायिक व्याख्या होगी, ऐसे में 4 अगस्त की सुनवाई पर सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक और कानूनी नजरें टिकी रहेंगी।

Friday, July 24, 2026

सबकी निगाहें दिल्ली पर!





नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जारी छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बीच गुरुवार देर रात जहां एक ओर प्रधानमंत्री खुद सोशल मीडिया पर संदेश देते दिखे, वहीं आखिरकार 26 दिन बाद सोनम वांगचुक ने भी अपना अनशन तोड़ दिया। लेकिन निगाह अभी भी देश की छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर ही है।

ऐसे में सवाल यही है कि अब आज क्या होगा?

ऐसा माना जा रहा है कि शुक्रवार का दिन भी काफी हलचल भरा रहने वाला है। दरअसल शुक्रवार को ही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने देशव्यापी प्रदर्शन का ऐलान किया है।
CJP ने एक पोस्टर जारी कर लोगों से सभी जिलों और शहरों में शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की अपील की है। कॉकरोच पार्टी ने कल एक नया नारा भी दिया- 'Every District. One Day. One Demand'

इस पार्टी ने देशव्यापी प्रदर्शन में जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ मारपीट का विरोध करने की अपील की गई है।

शुक्रवार को CJP के प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में सुरक्षा चाक-चौबंद कर दी गई है। दिल्ली मेट्रो ने सुबह 7:30 बजे से ही 16 मेट्रो स्टेशन भी बंद कर दिए हैं। हालांकि इस वजह से लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

जैसा कि कल देर रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों के नाम एक वीडियो जारी किया था, जिसमें उन्होंने भरोसा दिलाया कि पेपर लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने कहा कि शुक्रवार को कैबिनेट में पेपर लीक के खिलाफ और सख्त फैसला लिया जाएगा।

ऐसे में आज हम सभी की निगाहें कैबिनेट मीटिंग पर भी होगी। यह मीटिंग इसलिए अहम है, क्योंकि इसमें पेपर लीक को लेकर सख्त फैसला लिया जा सकता है। क्योंकि पीएम मोदी ने वीडियो संदेश में बताया कि फास्ट ट्रैक कोर्ट और कठोर सजा के प्रावधान के साथ मसौदे पर शुक्रवार को कैबिनेट में चर्चा होगी। उन्होंने बताया कि इस बिल को जल्द से जल्द सदन में पास कराया जाएगा।

कल देर शाम के घटनाक्रम को लेकर हर कोई अपने-अपने अंदाज में सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। दरअसल सरकार ने पेपर लीक से जुड़े मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट भी बना दी और आखिरकार 26 दिन बाद सोनम वांगचुक ने अनशन भी तोड़ दिया। इससे पहले शिक्षा सचिव का भी ट्रांसफर हुआ।


गौरतलब है कि सोनम वांगचुक ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नीट पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन के समर्थन में 28 जून को अनशन शुरू किया था। इसी बीच तबीयत खराब होने के बाद सोनम को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर सोनम को मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

अनशन तोड़ने के बारे में गुरुवार रात सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "अभी-अभी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह तथा लेह-लद्दाख की सर्वोच्च समिति के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में मैंने 26 दिनों के बाद अपना अनशन तोड़ा। इससे पहले विभिन्न राजनीतिक दलों के 65 सांसदों ने मुझसे मुलाकात की थी या पत्र लिखकर मुझसे अनशन तोड़ने का आग्रह किया था। यह देश में संभावित हिंसा को देखते हुए और विभिन्न शर्तों पर लंबी बातचीत के बाद किया गया। मैं जल्द ही एक अलग वीडियो में इन शर्तों का विस्तार से वर्णन करूंगा। इस बीच, मैं आप सभी से आग्रह करता हूं कि किसी भी प्रकार की हिंसा को रोकने के लिए पूरी तरह सतर्क रहें।"

शिक्षा सचिव का तबादला
बदलते घटनाक्रम के बीच गुरुवार रात केंद्र सरकार ने शिक्षा मंत्रालय में शिक्षा सचिव विनीत जोशी का ट्रांसफर कर दिया। उनकी जगह नरेश पाल गंगवार को शिक्षा विभाग का नया सचिव नियुक्त किया गया। विनीत जोशी को अब पंचायती राज मंत्रालय का सचिव बनाया गया है। उनके साथ-साथ 10 और सीनियर आईएएस अधिकारियों के तबादले किए गए।

इन्हीं सबके बीच गुरुवार रात को पेपर लीक से जुड़े मामलों के ट्रायल के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट को नोटीफाई किया गया। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाई जाएगी। दिल्ली हाई कोर्ट ने तीस हजारी कोर्ट के मीडिएशन सेंटर की इंचार्ज जज जस्टिस अनु ग्रोवर बालीगा का तबादला राउज एवेन्यू कोर्ट में स्पेशल जज के तौर पर किया है। पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई यही करेंगी।

दूसरी तरफ नीट पेपर लीक मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देर रात जारी किए गए वीडियो पर लोकसभा में नेता विपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सवाल उठाए हैं। राहुल गांधी ने सरकार के सामने प्रमुखता से तीन मांगें रखी हैं और देर रात जारी किए गए वीडियो को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधा।

राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, "मिस्टर मोदी, हमारे छात्र धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं. आधी रात को जारी इस बेकार वीडियो से उनकी समझदारी का अपमान न करें।"

राहुल गांधी ने आगे कहा कि सरकार इन तीन मांगों को पूरा करे। इनमें पहली और मुख्य मांग है धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।

राहुल गांधी की दूसरी मांग है संसद चलो मार्च के दौरान छात्रों पर हुए लाठीचार्ज को लेकर, उनका कहना है कि जिन्होंने भी छात्रों को पीटा है उन सभी को सजा दी जाए। राहुल गांधी की तीसरी मांग है कि सरकार इन छात्रों से माफी मांगे. इससे पहले राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मोदी सरकार पर गंभीर सवाल उठाए थे।





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Friday, July 17, 2026

धनरोपनी महोत्सव के बहाने बात धान की!




बच्चों को प्रकृति से जोड़ने का प्रयास हर व्यक्ति को करना चाहिए, खासकर खेती- बाड़ी की दुनिया से शहरी बच्चों को रूबरू कराते रहना चाहिए। भागमभाग भरी जीवन शैली में किसानी की दुनिया से नई पीढ़ी को परिचित कराना भी हम सबका काम है। इसी कड़ी में गांव में धनरोपनी उत्सव को करीब से बच्चों को दिखाने का काम किया गया, जिसकी शुरुआत एक दशक पहले चनका रेसीडेंसी ने की थी।  
हमारे यहां धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है। धान हमारे लिए फसल भर नहीं है, वो हम सबके लिए ‘धान्या’ है। धान की बाली हमारे घर को ख़ुशी से भर देती है। साल भर वो कितने प्यार से हमारे घर आँगन को सम्भालती है। आँगन के चूल्हे पर भात बनकर या दूर शहरों में डाइनिंग टेबल पर प्लेट में सुगंधित चावल बनकर, धान सबका मन मोहती है।

हमारे अंचल में पहले धान का नाम बहुत ही प्यारा हुआ करता था, मसलन 'पंकज' 'मनसुरी', 'जया', 'चंदन', 'नाज़िर', 'पंझारी', 'बल्लम', 'रामदुलारी', 'पाखर', 'बिरनफूल' , 'सुज़ाता', 'कनकजीर' , 'कलमदान' , 'श्याम-जीर', 'विष्णुभोग' आदि। समय के साथ हाइब्रीड ने किसानी की दुनिया बदल दी। एक किसान के तौर पर मन तो यही करता है कि उन पुराने बीज को इकट्ठा कर पूर्णिया का बीज बैंक बनाया जाए, जहां हम अपने अंचल के धान को एक ब्रांड के तौर पर पेश करते।

बीज बैंक के बारे में लिखते हुए मुझे असम के जोरहाट के किसान मोहान चन्द्र बोरा याद आ रहे हैं। उन्होंने अन्नपूर्णा सीड लाइब्रेरी बनाई है, जहां धान की 270 किस्म के बीज हैं।  

धान की रोपनी और कटाई की बात जब भी होती है तो मन में कई गीत भी गूंजने लगते हैं जो अब खेत में सुनाई नहीं देते हैं। सुख की तलाश हम फसल की तैयारी में ही करते हैं। एक गीत पहले सुनते थे, जिसके बोल कुछ इस तरह हैं -
"सब दुख आब भागत, कटि गेल धान हो बाबा..."

हम खेती किसानी दुनिया के लोग अन्न की पूजा करते हैं। धान की जब भी बात होती है तो जापान का जिक्र जरूर करता हूं। जापान के ग्रामीण इलाक़ों में धान-देवता इनारी का मंदिर होता ही है।

जापान में एक और देवता हैं, जिनका नाम है- जीजो। जीजो के पांव हमेशा कीचड़ में सने रहते हैं। कहते हैं कि एक बार जीजो का एक भक्त बीमार पड़ गया, भगवान अपने भक्तों का खूब ध्यान रखते थे। उसके खेत में जीजो देवता रात भर काम करते रहे तभी से उनके पांव कीचड़ में सने रहने लगे।

धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है। मंहगाई और तमाम तरह की राजनीतिक उलट-बांसी के बीच किसानी की बात हमें उम्मीद से भर देती है और हम पूर्णिया से असम और जापान की बात करने लगते हैं जिसके केंद्र में केवल और केवल धान ही है।

जापान की दो प्रमुख कम्पनियां होंडा और टोयोटा का अर्थ धान होता है। होंडा का मतलब मुख्य धान खेत और टोयोटा का मतलब बम्पर फसल वाला धान खेत। जापान में एक हवाई अड्डा है- नरीटा, इसका अर्थ है लहलहाता धान खेत।

दरअसल जापान में धान को प्रधानता दी जाती है। ऐसी बात नहीं है कि वहां अन्य फसलों की खेती नहीं होती है लेकिन यह बड़ी बात है कि वहां खेत का अर्थ धान के खेत से जुड़ा है। वहां धान की आराधना की बड़ी पुरानी परंपरा है।
हम भी धान को कम स्नेह नहीं देते। हमारे यहां तो धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है। धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है। बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध के पिता का नाम था- शुद्धोदन यानी शुद्ध चावल। वट वृक्ष के नीचे तप में लीन गौतम बुद्ध ने एक वन-कन्या सुजाता के हाथ से खीर खाने के बाद बोध प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए. इस कहानी को पढ़कर लगता है शायद इसी वजह से 70 के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाक़ों में एक पुरानी नस्ल की धान का नाम 'सुज़ाता' होगा। इस धान का चावल बहुत ही सुगन्धित हुआ करता था।

गूगल करिएगा तो पता चलेगा कि दुनिया का 90 प्रतिशत धान एशिया में ही उगाया और खाया जाता है। धान के पौधे को हर तरह की जलवायु पसंद है. नेपाल और भूटान में 10 हजार फुट से ऊंचे पहाड़ हों या केरल में समुद्रतल से भी 10 फुट नीचे पाताल-धान दोनों जगह लहराते हैं। ऐसे में जापान ने धान और धान के खेतों की जो ब्रांडिंग की है इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

वैसे आपने कभी इस बात का पता लगाया है कि धान के नाम पर अपने देश में कोई कंपनी है या फिर कोई व्यावसायिक प्रतिष्ठान है? सारी लड़ाई अन्न को लेकर है। हम सभी अपनी ज़िंदगी सुख-चैन से जीने के लिए मेहनत करते हैं ताकि डाइनिंग टेबल पर हम भोजन कर सकें और दूसरों को भी खिला सकें लेकिन दूसरी ओर खेतों में लहलहाती फ़सलों के नाम पर क्या हम किसी कम्पनी का नाम नहीं रख सकते? या अपने घर का नाम हम धान- गेहूं- मक्का- गन्ना के उन्नत नस्लों के नाम पर नहीं रख सकते?

खेती – किसानी की दुनिया से नई पीढ़ी को करीब लाने के उदेश्य से 2014 में जब चनका रेसीडेंसी ने धनरोपनी उत्सव की शुरुआत की थी तो इस बात अंदाजा नहीं था कि यह कारवां बढ़ता ही चला जाएगा। इस बार भी हमने धन-रोपनी महोत्सव आयोजित किया। इस बार की धन रोपनी कई मायनों में खास रही क्योंकि इसमें बिहार बाल भवन किलकारी के कला प्रेमी बच्चों ने न केवल हिस्सा लिया बल्कि धान रोपाई से सम्बन्धित गीतों को अपनी आवाज़ भी दी।

धान के बहाने यह कहानी हमने इसी कारण सुनाई क्योंकि अन्न ही जीवन है और अन्न को हम सबके घर तक पहुंचाने वाले किसानी दुनिया के लोगों के जीवन से हम सब दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में जब भी आप बरसात के इस मौसम किसी गांव के करीब से गुजरिएगा तो एक बार जरूर किसी खेत के पास ठहरने का काम करिएगा, ताकि आप भी समझ सकें, कैसी है किसानों की दुनिया, किस रंग में हैं धान के खेत ! 




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अमित शाह का दो दिवसीय बंगाल दौरा: सीमा सुरक्षा को मजबूत करने पर रहेगा जोर, आला अधिकारियों के साथ करेंगे बैठक

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 17 से 19 जुलाई तक बंगाल के दो दिवसीय दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वह उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी और राजधानी कोलकाता में सीमा सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन तथा विभिन्न विकास परियोजनाओं की समीक्षा करेंगे। साथ ही कई कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेंगे।
प्रदेश भाजपा द्वारा जारी निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार गृह मंत्री शुक्रवार रात नौ बजे उत्तर बंगाल के बागडोगरा हवाई अड्डे पर पहुंचेंगे।

वहां से वह सिलीगुड़ी के कदमतला स्थित सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के उत्तर बंगाल फ्रंटियर मुख्यालय जाएंगे, जहां वह रात्रि विश्राम करेंगे।

अगले दिन 18 जुलाई, शनिवार को वह सुबह साढ़े 11 बजे जुमागाछ स्थित बीएसएफ की 18वीं बटालियन की सीमा चौकी पहुंचेंगे। यहां प्रहरी सम्मेलन में भाग लेने के साथ पौधारोपण करेंगे तथा विभिन्न परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करेंगे। वह सीमा प्रहरियों से संवाद भी करेंगे।

इसके बाद सिलीगुड़ी स्थित उत्तरकन्या सभागार में विभिन्न समीक्षा बैठकों में हिस्सा लेंगे। इनमें प्रशासनिक बैठक, बंगाल में नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन की समीक्षा तथा जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था को लेकर बैठक शामिल है। शनिवार शाम को गृह मंत्री कोलकाता पहुंचेंगे और यहां अलीपुर स्थित सरकारी सौजन्य गेस्ट हाउस में रात्रि विश्राम करेंगे।

19 जुलाई, रविवार को अमित शाह सौजन्य गेस्ट हाउस में बंगाल की कानून-व्यवस्था को लेकर उच्चस्तरीय बैठक करेंगे। इसके बाद वह अलीपुर स्थित राष्ट्रीय पुस्तकालय में नवनिर्मित देश के पहले वर्ड म्यूजियम का उद्घाटन करेंगे।

दौरे के अंतिम कार्यक्रम में गृह मंत्री कोलकाता के न्यूटाउन स्थित विश्व बंगला कन्वेंशन सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से हावड़ा जिले के सांकराइल में अमूल डेयरी के प्रस्तावित दुनिया के सबसे बड़े दही संयंत्र की आधारशिला रखेंगे।

Friday, July 10, 2026

आखिर क्यों महत्वपूर्ण साबित होगी ‘बॉर्डर डिस्ट्रिक्ट SPs कॉन्फ्रेंस-2026’ !

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार नौ जुलाई को नई दिल्ली में सीमावर्ती जिलों के पुलिस अधीक्षकों के साथ एक बैठक की। इस महत्वपूर्ण बैठक का नाम ‘बॉर्डर डिस्ट्रिक्ट SPs कॉन्फ्रेंस-2026’ दिया गया था। सम्मेलन में बॉर्डर से लगते 119 जिलों के एसपी और अन्य अधिकारी शामिल हुए।
बैठक में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्य सहित सीमावर्ती राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस अधीक्षक शामिल हुए थे।

माना जा रहा है कि इस बैठक में अवैध घुसपैठ पर लगाम लगाने के प्लान पर सबसे अधिक चर्चा हुई। देश में अवैध घुसपैठिया के नेटवर्क को खत्म करने पर अमित शाह लगातार बोलते रहे हैं। ऐसे में यह मीटिंग अहम मानी जा रही थी , क्योंकि देश को नक्समु्क्त बनाने के बाद मोदी सरकार अब अवैध घुसपैठ पर एक्शन की तैयारी में है।

गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में घुसपैठ, अवैध आप्रवासन, आबादी में बदलाव, बॉर्डर सिक्योरिटी, ड्रोन से खतरा और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। यह बैठक अवैध आप्रवासन के खिलाफ केंद्र के तेज अभियान के बीच अहम है। केंद्र ने इसे बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर स्थित जिलों की आबादी की बनावट को बदलने की एक संगठित कोशिश का हिस्सा बताया है। बैठक में सुरक्षा से जुड़ी नई चिंताओं को उजागर कर और इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया।

सीमांत जिला पुलिस अधीक्षक सम्मेलन-2026 को संबोधित करते हुये अमित शाह ने कहा कि इस सम्मेलन से समग्र सीमा सुरक्षा के दृष्टिकोण को संस्थागत रूप मिला है और आने वाले समय में तटीय सीमा सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में भी हम समग्रता से आगे बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन में सीमाओं की सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा, निराकरण की चिंता और इस दिशा में उपयुक्त उपायों को नीतिगत स्वरूप देने का काम होगा। मोदी सरकार, संबद्ध सीमा रक्षक बल, राज्य और जिला प्रशासन, भारत सरकार के संबंधित हितधारक और स्थानीय नागरिकों के परस्पर जुड़ाव के साथ एक मजबूत चतुष्कोणीय सुरक्षा ग्रिड का निर्माण कर रही है।

केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘स्मार्ट बॉर्डर की कल्पना पर आधारित भारत की बॉर्डर सुरक्षा व्यवस्था आने वाले समय में विश्व में सबसे आधुनिक होगी। सुरक्षित सीमा, समृद्ध सीमांत और सजग समाज के साथ ही देश सुरक्षित हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश को जम्मू-कश्मीर और नॉर्थईस्ट में आतंकवाद और नक्सलवाद से निजात मिली है, जो हमारी साझी सफलता का सूचक है। आने वाले तीन सालों में हम नारकोटिक्स की समस्या को गंभीर क्षति पहुंचाकर इस पर विजय प्राप्त करेंगे। ’

उन्होंने कहा, ‘देश को घुसपैठियामुक्त बनाने और घुसपैठ हो ही न सके, इसके लिए एक मजबूत तंत्र का निर्माण कर रहे हैं। पहले समस्याएं स्थायी और समाधान अस्थायी थे, मोदी सरकार में समस्याओं की जड़ पर प्रहार कर समाधानों को स्थायी बनाया जा रहा है. मोदी सरकार ने बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर में 400 प्रतिशत वृद्धि कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ इसे आगे बढ़ाया है।’

अमित शाह ने कहा, ‘पीएम मोदी ने वायब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम के तहत देश के अंतिम गांव को देश का प्रथम गांव कहा है. इसके तहत पलायन रोकने, रोजगार बढ़ाने और सरकारी योजनाओं का शत प्रतिशत क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है. मोदी ने जनसांख्यिकी परिवर्तन का अध्य्यन करने, उसमें असामान्य कारणों से हो रही वृद्धि को चिह्नित करने और भविष्य में इसे रोकने के उपाय सुझाने के लिए डेमोग्राफी मिशन की शुरूआत की है।‘

केंद्रीय गृह मंत्री ने सीमांत क्षेत्रों में असामान्य कारणों से जनसांख्यिकी में हो रहे बदलाव की सूचना जल्द से जल्द नीचे से उच्चतम स्तर तक पहुंचाने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा, ‘मोदी सरकार 31,000 करोड़ रुपये की लागत से 1,610 किलोमीटर लंबे म्यांमार बॉर्डर पर बाड़बंदी कर रही है।’

उन्होंने कहा, ‘प्रॉक्सी वार, घुसपैठ, कट्टरपंथ का प्रसार, नारकोटिक्स, तस्करी, ड्रोन, साइबर अपराध, संगठित अपराध और जनसांख्यिकीय परिवर्तन रोकना, सीमा को रहने लायक बनाना और वहां से पलायन रोकना और सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारे उद्देश्य है।’ 

अमित शाह लगातार कहते रहे हैं कि हम एक ऐसा मजबूत सुरक्षा तंत्र बना रहे हैं। जिससे देश को घुसपैठियां मुक्त करने के साथ ही घुसपैठ ही नहीं हो सकेगी। गुरुवार को हुई बैठक में भी उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा कि जिस तरह से देश को जम्मू कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट में आतंकवाद और नक्सलवाद से निजात मिली है। घुसपैठ को रोकने के साथ ही आने वाले 3 सालों में सरकार नारकोटिक्स की समस्या पर भी विजय प्राप्त करेगी। 

गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दिमाग में सीमांत (बॉर्डर) जिलों की सुरक्षा और डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) को संतुलित रखने की सबसे बड़ी प्राथमिकता चल रही है। उनके मुख्य विजन और रणनीतियों में शामिल है। वे सीमावर्ती जिलों में हो रहे असामान्य जनसंख्या परिवर्तन और अवैध घुसपैठ के मूल कारणों का पता लगाने और सुधार के लिए एक विशेष मिशन की शुरुआत कर चुके हैं। ऐसे में इस बैठक के बाद सीमांत जिलों में होने वाली घटनाओं पर सबकी निगाहें रहेंगीं।