Wednesday, November 11, 2015

बिन बाबूजी के दीवाली...

मुझे पता है अब दीवाली ऐसी ही होगी, आपके बिना। दुर्गा पूजा और दीवाली ये दोनों उत्सव आपके लिए ख़ास होता था। लेकिन अब आप नहीं रहेंगे, यही सत्य है, जानता हूँ लेकिन भरोसा नहीं होता है। कुछ पल के लिए ठिठक जाता हूँ। यह पहली दीवाली होगी आपके बिना। डांट-डांट कर हुक्का-हुक्की और अन्य धार्मिक कार्य करवाते थे आप। आज सबकुछ याद आ रहा है।

आज आपकी बहुत याद आ रही है। आप कहीं से तो देख रहे होंगे न हमलोगों को ! सपने में आते हैं ... सफेद धोती-कुर्ते में। पटना गया था, सुबह सबेरे फ्रेजर रोड पर धोती कुर्ते में टहलते एक व्यक्ति को देखकर लगा कि आप यहां कैसे...मेरा वो कल का सुहाना भरम था।

हर बार जब कुछ अच्छा होता है लगता है कि आप कुछ मुझे बताते हैं और फिर बताकर  निकल जाते हैं। बताते भी नहीं हैं कि कहाँ निकल रहे हैं। यही टिस है बाबूजी !

आपकी पसंदीदा काले रंग की राजदूत को साफ़ कर रख दिया है, साइड स्टेण्ड में नहीं बल्कि मैन स्टेण्ड में, जैसा आप कहते थे। दीवाली में आप यह काम बड़ी मुस्तैदी से करवाते थे। सफेद हेलमेट को भी साफ़ कर दिया है।

सच कह रहा हूँ, आपको ढूढ़ने लगा हूँ...हर जगह, अपने भीतर भी। जहाँ जाता हूँ वहां...। इस बार दीप की रौशनी भी काट रही है। धर्म के प्रति आपकी अपार श्रद्धा भी इस बार आपकी यादों के सामने हार रही है।

दवा, बिछावन, व्हील चेयर,आलमीरा...सबकुछ आँखों के सामने है लेकिन आप नहीं हैं। इस बीच  न्यूज चैनलों, अखबारों, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल पर कितना कुछ दिख और छ्प रहा है लेकिन मैं किसे बताऊं? लिखते रहने का सम्मान मिला लेकिन आपको दिखा न सका। राजदीप सरदेसाई आपके चनका आये लेकिन आप नहीं थे। दूरदर्शन के मंजीत ठाकुर भी चनका आये थे और उन्होंने आपके खेतों में आपके किसानों की समस्याओं को सुना ....

बाबूजी,आज आपकी यादें मुझे भीतर से भींगा रही है। मुझे आज इस वक्त आपकी सबसे अधिक याद आ रही है। दीवाली की चमक धमक ,अंचल, खेत खलिहान सब खाली लग रहा है। आप कहाँ हैं ? आज सपने में आइयेगा तो बताइयेगा न ! कुछ दिखाना है आपको...

आप अक्सर साहिर का लिखा किसी किताब के सादे पन्ने पर लिख देते थे न - "हर इक तलाश के रास्ते में मुश्किलें हैं मगर
हर इक तलाश मुरादों के रंग लाती है...."

फिर जब बिछावन पकड़ लिए तो मैं आपको गुलजार का लिखा सुनाता था -
"तुमने शायद सोचा था,
मेरे सब मोहरे पिट जायेंगे,
मैंने एक चिराग़ जला कर,
अपना रस्ता खोल लिया..."

आज दीवाली है बाबूजी, सपने में आइयेगा... बहुत कुछ बताना है.....इक चिराग़ जलाना है।

2 comments:

JAY BARUA said...

बहुत अच्छा भाई जी

Mrinal Krant said...

Achha laga padh kar! Aapse kabhi batiyayenge.Aaap achha kaam kar rahe hain, karte rahiyega. Hum kabhi aapse to mil hi lenge. Raaste mudenge yaa naye banenge. Muzhe bhi kisaan banna hai par koi zameen nahin hai mere paas. Regards, Mrinal, born at Patna, lives in Bangalore.