Monday, March 28, 2011

‘ मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग ’


गांव और शहर, जीने के लिए दो घर की तरह। आप गांव में रहें या शहर में, मायने रखता है तो केवल आपका मन। एक मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले शख्स के लिए शहर सपना हो सकता है, रोशनी के आगोस में लिपटा रेस्टोरेंट हो सकता है...आप इस तरह के कई उपमा अलंकारों का प्रयोग कर सकते हैं। यह आपके ख्याल पर छोड़ देता हूं। दरअसल दो दिन पहले मशहूर ब्लॉग राइटर विनीत कुमार का इंटरव्यू सुन रहा था। इंटरव्यू के विषय की चौड़ाई में न जाकर मैं केवल उसके पहले सात मिनट की बात करना चाहता हूं। इन सात मिनटों में विनीत ने शहर की व्याख्या की है, अलग तरीक से।

विनीत कहते हैं कि पहले शहर को विलेन की तरह प्रोजेक्ट किया जाता था, गांव से ज्यादा बेहतर।‘  मैं अपने इस पोस्ट को विनीत के इसी वक्तव्य के चारों ओर घुमा रहा हूं। आखिर पहले शहर को विलेन की तरह क्यों प्रोजेक्ट किया जाता था?  मुझे अभी एक कहावत याद आ रही है, आप भी पढिए- उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। इस कहावत के अनुसार पहले गांव ही सबसे अच्छी जगह हुआ करती थी। संभावनाओं के सभी द्वार वहीं खुलते थे, इसी वजह से उत्तम की श्रेणी में खेती को रखा गया, लेकिन आज की सच्चाई सब के सामने है। हम सत्य से मुंह नहीं छुपा सकते।

इस इंटरव्यू में
विनीत कहते हैं कि वे शहर को संभावना की तरह देखते हैं। वे जैसे-जैसे बड़े शहर की ओर बढ़ते हैं, तरक्की उन्हें सामने दिखने लगती है। विनीत इसी बहाने दिल्ली के करीब पहुंचते हैं। टाटानगर से दिल्ली तक सफर पूरा करते हैं। हम आशा करते हैं कि वे तरक्की के आसमां के चांद बनें।

शहर को संभावना की तरह देखने की बात जब विनीत कर रहे थे, तो कान में लगे ईयर फोन जैसे खुद-ब-खुद वॉल्यूम बढ़ाते जा रहा था। संभावनाओं की सीमा मेरे लिए दूर होती जा रही थी। शहर को ख्वाब की तरह देखने वाले सैकड़ों लोग आंखों के सामने नाचने लगे थे। गांव- कस्बा- शहर- मेट्रो की दूरी पाटने में कितने दरवाजे खोलने पड़ते हैं, इसका एक अलग अनुभव है, इस पर लंबी बात की जा सकती है। 

विनीत के इस इंटरव्यू को मैं एक अलग परिप्रेक्ष्य में सुन रहा था। मेरे लिए गांव एक खुश्बू है और शहर एक फूल। विनीतने काफी हदतक यह बताया कि शहर में अपार संभावनाएं होती हैं। मेहनत के लिए स्पेस होता है। दरअसल वीनित के बहाने शहर की व्याख्या की जा सकती है लेकिन ये काम थ्योरी के रूप में समाजशास्त्री ही कर सकता है, हम तो अनुभवों के सहारे शहर को देखते हैं क्योंकि अनुभव गावै सो गीता।

विनीत टाटानगर और दिल्ली की दूरियों की बात कर रहे थे लेकिन मैं शहर और गांव की बात करना चाहता हूं, मैं विषयांतर हो रहा हूं....इससे पहले की बातों ही बातों में यह कह दूं कि मुझे तुम्हारे शहर का मौसम सुहाना लगता है, इससे पहले कि मैं कह दूं कि मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग आपसे विदा लेता हूं और वीनित कुमार का भी शुक्रिया।

विनीत कुमार से जुड़ा एक और पोस्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें।

2 comments:

Kajal Kumar said...

दूसरी तरफ ख़ुशी की संभावनाएं हमेशा ज़्यादा रहती हैं (शायद)

मनोज कुमार said...

@ मेरे लिए गांव एक खुश्बू है और शहर एक फूल।
आपसे सहमत।
पर आज शहर गांव की खुश्बू को लील रहा है। एक अपनी ही कविता के कुछ अंश पेश कर रहा हूं

सिकुड़ी आँखों झुककर
झांके झींगुर दास,
पेठिये के शोरगुल पर
मण्डी का उपहास।
कब्बार के कोने उपेक्षित
दादाजी की खड़ाउँ।