Thursday, June 18, 2009

मेरा फॉस्ट फ्रैंड, शायद अब इस दुनिया में न रहे.....

सुबह के चार बजे, वह उठ जाते थे आधे घंटे में तैयार होने के बाद चकाचक धोती-कुर्ते में सुबह की सैर पर उनका निकलना एक ध्रुव सत्य हुआ करता था। शेक्सपियर से लेकर अंग्रेजी साहित्य की कई नामचीन हस्तियों की लाइनों को वे गुनगुनाते हुए सड़कों पर चहलकदमी किया करते थे, लेकिन आज वह ऐसा कुछ भी नहीं कर रहे हैं। इस समय वह बिस्तर पर जीवन रक्षक यंत्रों के सहारे सांस ले रहे हैं, जिंदगी से उनकी अपनी जंग, जहां हमें और उनके निजी डाक्टरों को केवल मौत ही दिख रही है।

मैं अपने निकट संबंधियों में जिनसे फॉस्ट फ्रैंड की तरह बर्ताव करता हूं, उसमें केवल और केवल मेरे नानाजी ही हैं। परसों खबर आई कि उनकी तबियत अचानक खराब हो गई, फिर खबर आई कि डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है। मैं कुछ देर के लिए अचेत सा हो गया। ऑफिस जाना था लेकिन गया नहीं, चुपचाप...नानाजी का चेहरा याद आने लगा, मुस्कुराते हुए शेक्सपियर की बातों को बताते हुए उनका कहना कि-"When sorrows come, they come not single spies, but in battalions". मुझे तंग करने लगा..। मुझे अंग्रेजी से थोड़ी बहुत नजदीकी और मन में किसी बात को नहीं छुपाने की कला नानाजी ने ही सीखाया, अभी दो दिनों से उन्हीं के याद में खोया हूं।

वह इस समय बेहद कठिन दौर से गुजर रहे हैं, उनके पास पहुंचे लोगों का कहना है कि उनकी मौत उनके लिए जरूरी है आखिर वे कितना कष्ट सहेंगे...। बुधवार दोपहर जब वे होश में आए तो उन्होंने मुझे याद किया, फोन पर ममेरी बहन ने उनसे मेरी बात करवाई। जब वे बात कर रहे थे तो जिंदगी में पहली बार मैंने उनकी थकी आवाज सुनी। वे बोले- " मैं अब तुम्हारी शादी में शामिल नहीं हो पाऊंगा, मैं अब मरना चाहता हूं....प्लीज, तुम मत आना, मैं इस स्थिती में तुम्हें देखना नहीं चाहता.., तुम्हें रोते नहीं देख सकता और खुद भी रोना नहीं चाहता। मैं मरना चाहता हूं, मौत ने मेरे कमरे का दरवाजा नॉक कर दिया है। बौआ, बस अब दरवाजा खुलना बांकी है।"

फोन रखते ही फफक-फफकर रोने लगा..मैं, एक शब्द नहीं बोल पाया....मौत को नजदीक से सुनने को बाद लगा कि एक बारगी ही मुझसे जिंदगी सबकुछ छिनने के लिए उतारू हो गई है। नानाजी का बड़ा सा कमरा, आंखों में तैरने लगा। हमलोंगो के लिए बाजार से रसगुल्ला मंगावाकर इसी घर में ऱखते और हम बच्चा पार्टी उनेक बड़े से कैंपस में दौड़ते-धूपते खूब मिठाइयां दबाया करते। आज याद आ रहा है वह कमरा, उसका बरामदा, वह कुर्सी जहां वह बैठा करते। महसूस हो रहा है मानो बरामदे पर आरामकुर्सी पर बैठकर वह कह रहे हों-

Love's not Time's fool, though rosy lips and cheeks
Within his bending sickle's compass come:
Love alters not with his brief hours and weeks,
But bears it out even to the edge of doom
If this be error and upon me proved,
I never writ, nor no man ever loved

वे इन सारी पंक्तियों को हमें खेल में समझा देते और हमारी जुबां भी उन्हीं की तरह बोलने लगती। अब शायद मैं उनसे नहीं मिल पाऊंगा, उनकी आवाज में शेक्सपियर की लाइनें मैं दोहरा नहीं पाऊंगा...ऐसे समय में ही कभी-कभी महसूस होता है कि यार, यादें कितनी कमीनी चीज होती है....नानाजी की याद ने तो शेक्सपियर की पंक्तियों से भी कुछ देर के लिए नफरत करना सीखा दिया।.....

5 comments:

Dipti said...

ऐसा वक़्त बेहद ही मुश्किल होता है। अपने ज़िंदादिल नानाजी का इस वक़्त पूरा साथ दे...

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वाकई आप के लिए कठिन समय, नाना जी को प्रणाम। वे अपनी संतानों और उन की संतानों के रुप में जीवित रहेंगे।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वाकई आप के लिए कठिन समय, नाना जी को प्रणाम। वे अपनी संतानों और उन की संतानों के रुप में जीवित रहेंगे।

काजल कुमार Kajal Kumar said...

समय आपके लिए बहुत कठिन हैं, मैं समझ सकता हूँ...पर हम सभी को एक दिन इससे होकर गुज़रना ही पड़ता है..ऐसे में बहुमूल्य सुंदर स्मृतियाँ बहुत काम आती हैं..

सुशील कुमार छौक्कर said...

गिरीन्द्र भाई बडी दुखद सूचना दी आपने। ये क्या मोड लिया वक्त ने। बडा मुश्किल समय है। कुछ चीजें अपने हाथ में नही होती है भाई। भगवान आपको इस समय में से गुजरने की शक्ति दें।