Sunday, May 10, 2009

लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती, बस एक माँ है जो कभी खफ़ा नहीं होती।

साल के ३६५ दिनों में एक दिन किसी ने कभी मां के लिए रखा होगा, शायद इसलिए १० मई को लोग मदर्स डे मनाते हैं। मां शब्द से हर एक को प्यार होता है। मुन्नवर राना साब ने इस पर जो लिखा है, बस आप उसे ही पढ़िए। याद आता है कुछ वर्ष पहले वे दिल्ली आए थे। उन्हें सुना तो पता चला कि उनकी आवाज उनके शब्द कितने अनमोल हैं। उन्होंने एक किताब लिखी है- मां। इस किताब के शुरुआत में राना साब कहते हैं–

“मैं दुनिया के सबसे मुकद्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ इसलिए करता हूँ कि अगर मेरे शेर पढ़ कर कोई भी बेटा माँ की खिदमत और ख्याल करने लगे, रिश्तों का एहतराम करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए। ये किताब भी आपकी ख़िदमत तक सिर्फ इसलिए पहुँचाना चाहता हूँ कि आप मेरी इस छोटी सी कोशिश के गवाह बन सकें और मुझे भी अपनी दुआओं में शामिल करते रहें। “
उन्होंने लिखा है-
लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती,
बस एक माँ है जो कभी खफ़ा नहीं होती।


गिरीन्द्र


हँसते हुए माँ बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते

हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
सगी है या कि सौतेली है माँ बच्चे समझते हैं

हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह

सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’
रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते

सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं

मुझे बस इसलिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा ।

आप इसे यहां भी पढ़ सकते हैं।

6 comments:

Avlokan said...

Bahut Badhiya Jha ji

Udan Tashtari said...

मुन्नवर राना जी की ्पुस्तक ’माँ’ तो कमाल की है साहेब...आपका आभार कुछ अंश यहाँ इस दिवस विशेष पर प्रस्तुत करने के लिए.


मातृ दिवस पर समस्त मातृ-शक्तियों को नमन एवं हार्दिक शुभकामनाऐं.

कुलवंत हैप्पी said...

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

माँ अलफाज ऐसा है, जिसको लेते ही जुबां मीठी हो जाती है..जिसकी गोद में सिर रखते ही, दुनियादारी भूल नींद आ जाती है..

जन्नत सा सकून मिलता है, उसकी गोद में
ए खुदा, मां को समझने समझ देना नई पौध में

------कुलवंत हैप्पी

sushant jha said...

कमाल का..वाकई आप कहां-कहां से ये चीजें खोजकर लातें है। आपसे तो अब मिलना ही पड़ेगा!

girindra said...

सुशांत दा, बोलें कब मिलना है। हमें अभी आपसे मुलाकात करने की इच्छा है।

आशीष कुमार 'अंशु' said...

Bahoot khoob bhai ...