Friday, March 13, 2009

शहर की दास्तां....सुना है..

सुना है इस शहर में लोग कपडों से पहचाने जाते हैं

कपड़ों के रंगों और ब्रांड्स से दोस्ती करते हैं

सुना है इस शहर में लोग कपड़ों से पहचाने जाते हैं।

इस शहर में लोगों को खुश रखना पड़ता है

सुना है जो नहीं रख पाते, उन्हें दरवाजा दिखा दिया जाता है

सुना है इस शहर में लोगों को खुश रखना पड़ता है।

सुना है इस शहर में चापलूसी को कला कहते हैं

हमारे यहां तो इसे गाली कहते हैं

सुना है इस शहर में चापलूसी को कला कहते हैं।

3 comments:

संदीप पाण्डेय said...

आप सही कह रहे हैं

Udan Tashtari said...

आप तो हमारे शहर की बात खुले आम कर रहे हैं, गिरीन्द्र भाई.. :)

विनीत कुमार said...

सिर्फ शहर ही क्यों वो हर जगह और इलाका जो अपने उपर शहर का सेहरा बांधना चाहता है,
सुना है शहर में भावुक होने को बीमार कहा जाता है
सुना है शहर में पत्थर दिल होना, प्रैक्टिकल होना कहलाता है
सुना है गांवों में सफल होने और सार्थक होने के बीच अब भी एक विभाजन रेखा बरकरार है
लेकिन यहां तो यही सुनने में आया है कि जो सफल है
वही सार्थक भ है और हो सकता है।...
क्या बेहतर हो कि सुनी-सुनाई बातों पर भरोसा ही न करें
वही करें जो शहर का चलन करने को कहता है