Saturday, January 31, 2009

बदलाव यूं ही नहीं होता है, इसके लिए प्रयास किए जाते हैं

देर आए दुरूस्त आए, ये कहावत अब बिहार के कुछ इलाकों में सटीक साबित हो रही है। बदहाल और धूल उड़ाती सड़कों के स्थान पर चमचमाती सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां इस बात का सूचक है कि बदलाव हो रहे हैं, दरअसल इसके लिए प्रयास हो रहे हैं। जिन सड़कों पर चलने में एक भय मन में बैठा था, वह अब दूर हो चुका है। प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना ने यहां के कुछ ग्रामीण इलाकों की तकदीर साफ बदल दी है और बदलने में जुटी है।

बिजली और सड़क किस प्रकार इलाके को बदल डालते हैं, इसका उदाहरण यहां के ग्रामीण इलाके हैं। इन दोनों आधारभूत आवश्यक सुविधा ने ग्रामीणों की दैनिक क्रियाकलापों में भी बड़े बदलाव करने में क्रांतिकारी कदम उठा रहे हैं।

पूर्णिया से श्रीनगर और उससे आगे अररिया जिले की सीमा तक यदि घूमा जाए तो बदलाव के नए रूपकों से आप रूबरू हो सकते हैं। जगैली से चनका गांव तक के सफर में स्थानीय लोगों में एक गजब का आत्मविश्वास देखने को मिला। यहां के आदिवासी टोले में लोगों का विश्वास देखने लायक रहा। आज से तकरीबन एक वर्ष पहले की इनकी जिंदगी और आज की जिंदगी में बड़े अंतर दिखाई दे रहे हैं, जो यकीनन सकारात्मक रूख की ओर इशारा करते हैं।

बदलाव केवल जमीनी नहीं होते, बल्कि बोली और व्यवहार में भी उसे देखा जा सकता है। चनका के प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते बच्चों की आंखों में चमक और संतोष को देखकर यह कहा जा सकता है कि भारत के गांवों में तेजी से बदलाव हो रहे हैं। स्कूल में छुट्टी की घंटी बजते हीं घर की ओर दौड़ते बच्चों की आंखों में आगे बढ़ने की ललक साफ देखने को मिली।

जहां भारत का यह गांव मुझे थमा नजर आया वह स्वच्छता को लेकर था, जो एक बड़ी समस्या है। स्वच्छता को लेकर बड़े स्तर पर प्रयास करने होंगे, जिसके लिए सरकारी और सामाजिक स्तर दोनों को साथ लेकर कदम उठाने की जरुरत है, तभी जाकर बदलते भारत के स्वप्न को हकीकत में बदला जा सकता है।

3 comments:

Anwar Qureshi said...

आज कल जो भगत सिंह तो चाहते है सर ..लेकिन अपने घर नहीं पड़ोसी के घर ये मैं नहीं कह रहा लोग कहते है

chalte chalte said...

it's too good

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

बदलाव के लिए प्रयास बहुत जरूरी हैं।