Monday, February 02, 2009

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा....

‘पानी का रंग कैसा, स्वाद कैसा’, एक अजीब सवाल से बात शुरू कर रहा हूं। अजीब सवाल से इसी कारण, क्योंकि बात शुरू करने की इच्छा नहीं है। खैर, मैं लोकतंत्र के प्रारंभिक स्तर माने जाने वाले पंचायती राज की कलई खोलती एक रिपोर्ट से आपको परिचित कराना चाहता हूँ।

बिहार के एक पंचायत प्रमुख से बातों के दरम्यां कुछ ऐसी बातें उसके मुख से निकल पड़ी की मैं सोचने लगा- “ पानी रे पानी हाय, तेरा रंग कैसा।“
हम कहते हैं कि आखिर गांवों का संपूर्ण विकास क्यों नहीं हो पाता है। एक चुभता सवाल है। जब भी किसी साक्षात्कार में मंत्री या वरिष्ठ अधिकारियों से बात होती है तो वे अक्सर चुप्पी साध लेते हैं या फिर कुछ तर्कविहिन बातों का जाल फेंक देते हैं। लेकिन बिहार के एक पंचायत प्रमुख से लंबी बातचीत के दौरान मुझे कई ऐसी बातों को समझने का मौका मिला, जिसे निर्देशक-निर्माता प्रकाश झा अक्सर अपनी फिल्मों में पर्दे पर उतारते हैं।

बहरहाल, बात को आगे बढ़ाते हुए पंचायत प्रमुख की जुबानी में, 12 लाख के मकान के निर्माण में पैसे निर्गत होने से पहले 25 प्रतिशत विभिन्न अधिकारियों, ठेकेदारों और विधायकों को देना पड़ता है। जरा सोचिए ऐसी स्थिती में उस मकान में बालू, सिमेंट और लोहा किस किस्म का और कितना प्रयोग किया जाएगा! लेकिन, हर सवाल का जबाव मेरे पंचायत प्रमुख के पास है। उनका कहना है कि रिश्वत लेना और देना मजबूरी है और यह एक परंपरा है।

पंचायत प्रमुख की बातों से ऐसा लगा कि सुशासन का दावा करने वाले राजनीतिक दलों के नेताओं को सर्तक रहने की आवश्यकता है, अन्यथा विस्फोट हो सकता है। कई ऐसी योजनाएं हैं, जिनकी पहुंच गांव तक है, लेकिन ग्रामीण अनजान है और योजनाओं की राशि बंदरबांट का हिस्सा बन जाती है।

पंचायत प्रमुख के साथ उनके पंचायत का दौरा करने के दौरान आंखों के सामने जो भी कुछ गुजरा वो सभी भ्रष्टाचार का सबसे गंदा रूप रहा। हालांकि, भ्रष्टाचार खुद गंदा है, लेकिन यहां तो गंदापन की भी अलग ही परिभाषा से रूबरू होना पड़ा।

जिन योजनाओं के असली हकदार वैसे किसान हैं, जिनके पास खेती के लिए जमीन नहीं है, वैसी योजना गांव के सबसे संपन्न किसान के परिसर में पहुंच रही है। एक अंतहीन भ्रष्टाचार, अनैतिक और न जाने क्या से क्या यहां हो रहा है।

पंचयात प्रमुख का मानना है कि वे उतना ही लेते हैं, जितना बंधा हुआ है। बांकि जगह तो और भी अधिक झपटमारी होती है (बकौल पंचायत प्रमुख)। पंचायत प्रमुख से जब यह पूछा गया कि यदि प्रखंड विकास पदाधिकारी से सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत आवेदन देकर योजनाओं के बारे में पूछा जाए तो क्या कुछ बात निकल पाएगी, पंचायत प्रमुख का उत्तर सुनिए, ‘ भाई यहां उसे मार दिया जाएगा।‘

जनाब, ये है बदलते भारत की बदलती तस्वीर। भले ही राजनीतिक दल चुनाव की तैयारियों मे जुटे हैं लेकिन कटु सत्य यही है कि ग्रामीण इलाकों में आज भी अधिकांश लोग यह भी नहीं जानते हैं कि रोजगार गारंटी योजना क्या है।

हमें स्वीकार करना होगा कि यदि पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार के अविरल प्रवाह को रोका नहीं गया, तो बदलते भारत की खुशहाल तस्वीर कभी स्पष्ट नहीं हो पाएगी।

6 comments:

रंजना said...

सही कहा आपने. कई वर्षों में जो ऊपर से नीचे तक व्यवस्था सडी है, किसी एक व्यक्ति के किए और चाहे स्वस्थ होने वाली नही.

रंजना said...

सही कहा आपने. कई वर्षों में जो ऊपर से नीचे तक व्यवस्था सडी है, किसी एक व्यक्ति के किए और चाहे स्वस्थ होने वाली नही.

Anonymous said...

विकास का नारा नागाने वालों के मुख पर झा साब आपने जोर का तमाचा मारा है. गंदगी को पहले घर से हटाना होगा..
सार्थक पोस्ट के लिये शुक्रिया दोस्त
आशा

संगीता पुरी said...

अच्‍छा आलेख है...सहमत हूं आपसे।

Anonymous said...

सुना है आपके घर में भी राजनीती हावी है. यहाँ तो खूब लिख रहे है लेकिन जहाँ आपकी सल्तनत चल रही है वहां आवाज़ उठाने में फ....है. अरे लिखते है तो अछ्हा है कुछ अपने इलाके का भी कल्याण कीजये ..
aatmmaraam

गिरीन्द्र नाथ झा said...

आत्माराम जी आप कौन है मुझे नही पता है लेकिन जो भी है मैं आपको बता देता हूँ की यहाँ मैं जो लिखा है वह आपने इलाके के बारे में ही लिखा है और जहाँ तक बदलाव की बात है न ..वो हम ला रहे हैं. खुली लडाई लड़ रहे है.. और आपकी सुभकामनायें मिलती रहेगी तो मेहनत भी रंग लायगी .
बस दिक्कत में दिक्कत यही है की वहां हमे ख़ुद अपने लोगों से लड़ना पर रहा है.. लेकिन अंत में सत्य की ही जीत होगी
कोमरेड को सलाम