Thursday, January 29, 2009

सिनेमाई गीतों में शब्दों के प्रयोग पर ब्रजेश बोल रहे हैं

हिन्दुस्तानी सिनेमा में गीत को जितना तवज्जह मिला, उतना संसार के किसी भी अन्य फिल्मोद्योग में नहीं मिला। यहां फिल्में आती हैं, चली जाती हैं। सितारे भी पीछे छूट जाते हैं। बस रह जाते हैं तो कुछ अच्छे-भले गीत जो 'अफसाना लिख रही हूं तेरे इंतजार का' गीत की तरह युगों तक बजते रहे। इसमें दो राय नहीं कि आगे भी ऐसी ही संभावनाएं हैं।

बहरहाल, शुरुआती दिनों में बतौर गीतकार जो लोग हिन्दी सिनेमा जगत से जुड़े उनमें ज्यादातर शायर और कवि थे। जैसे- आरजू लखनवी, पं। सुदर्शन, गोपाल सिंह नेपाली, मजाज लखनवी, जोश मलीहाबादी, प्रदीप, शैलेंद्र, साहिर, मजरूह आदि। हालांकि, गीत लिखने के कुछ कहे व कई अनकहे नियम शुरुआती दिनों से ही लागू थे। इस वजह से कई लोगों को ये नगरी रास आई और कईयों को नहीं। किन्तु गीतों के भाषाई निर्माण की प्रक्रिया यहीं से शुरू हुई और निरंतर चलती रही।

गीत लिखते समय दूरस्थ अंचलों में बसने वाले लोगों को भी ध्यान में रखकर अरबी-फारसी के दिलकशी, पुरपेच, उलफत, बदहवासी, मुरदा-परस्त जैसे भारी-भरकम शब्दों के साथ बतियां, छतियां, नजरिया, हमरी, तुमरी जैसे शब्दों का बेजोड़ तरीके से इस्तेमाल किया गया। जिससे आंचलिकता की खूब गंध मिलती रही। जैसे- मत बोल बहार की बतियां, धधक गई मोरी छतियां (प्रेमनगर), सांची कहो मोसे बतियां, कहां रहे सारी रतियां (ट्रैप्ड-1931)। साहिर ने अरबी-फारसी शब्द का कुछ यूं इस्तेमाल किया- ये कूचे ये नीलाम-घर दिलकशी के, ये लूटते हुए कारवां जिन्दगी के। (प्यासा)।

गीतों की भाषा को समृद्ध करने में मजरुह सुल्तानपुरी ने बड़ा योगदान दिया। इन्होंने कई फारसी शब्दों से फिल्मी गीतों को परिचित कराया। जैसे- बंदा-नवाज, वल्लाह, खादिम, आफताब, दिलरूबा, दिलबर, सनम, वादे-सदा आदि। जैसे- माना जनाब ने पुकारा नहीं, वल्लाह जवाब तुम्हारा नहीं (पेइंग-गेस्ट)आंखों-ही-आंखों में इशारा हो गया, किसी दिलरूबा का नजारा हो गया (सीआईडी) अब आम नागरिकों की जुबान पर ये शब्द चढ़ चुके हैं। दूसरी तरफ शकील बदायूंनी ने उलफत (अरबी) शब्द का खूब इस्तेमाल किया। जैसे- उलफत की जिन्दगी को मिटाया न जाएगा (दिल्लगी)

इस तरह हिन्दी सिनेमा से जुड़े उर्दू साहित्यकार कई अरबी-फारसी के कठिन शब्दों का गीतों में सरलता से इस्तेमाल किया। यह एक बड़ी वजह है कि आज अरबी-फारसी के कठिन से कठिन शब्द आम लोगों की जुबान पर हैं।

हालांकि, इसके साथ यह धारणा भी बनती गई कि उर्दू अल्फाल व शायरी के बगैर फिल्मी गीत का लिखा जाना संभव नहीं है। प्रेम, प्यार के स्थान पर मुहब्बत, इश्क का इस्तेमाल जरूरी है। इस धारणा के प्रबल होने के बावजूद धनवान, निर्धन, ह्रदय, प्रिये, दर्पण, दीपक जैसे विशुद्ध हिन्दी शब्द प्रयोग में लाए गए। भरत व्यास, प्रदीप, इंदीवर, नीरज ने इन शब्दों का खूब प्रयोग किया। जैसे- तुम गगन के चंद्रमा हो, मैं धरा की धूल हूं। तुम प्रणय के देवता हो, मैं समर्पित फूल हूं। (सती सावित्री)। इंदीवर ने भी लिखा- चंदन सा बदन, चंचल चितवन या कोई जब तुम्हारा ह्रदय तोड़ दे। इन गीतों की जबर्दस्त कामयाबी ने फिल्म जगत में बन रही उस धारणा को झुठला दिया कि सफल गीतों में उर्दू के शब्दों की बहुलता जरूरी है।

(सिनेमाई गीत पर लगातार अध्ययन करने वाले ब्रजेश भाई के ब्लॉग खंभा से साभार. )

3 comments:

Anonymous said...

is gaane ke baare me kuchh likhiye
http://sushubh.net/3308-emosanal-atyachar

vinit utpal said...

bahut khub, achhee jankaree milee.

Manish Kumar said...

पर आज एक बार फिर उर्दू लफ़्जों का प्रयोग करने वाले गीतकारों का वर्चस्व हिंदी फिल्म उद्योग में बना हुआ है तो वहीं दूसरी ओर हिंगलिश गीत भी नई पीढ़ी के चहेते बनते जा रहे हैं।

वैसे उर्दू जुबान की मिठास गीतों का ज़ायका बढ़ा देती है पर गीतों के माध्यम से हिंदी कवि भी उभरें तो दोनों भाषाओं के लिए खुशी की बात होगी।

काव्यात्मक हिंदी गीतों की परंपरा को आगे ले जाने में सिर्फ प्रसून जोशी और स्वान्द किरकिरे से ही कुछ आशा दिख रही है।