का हो लिखत काहे न हो ? यह सवाल मेरे कुछ दोस्त अक्सर पूछा करते हैं। क्या कहूँ उन्हें, आजकल काम सर चढ़ कर बोल रहा है, दिन भर कंप्युटर पर घिसिर पिकिर और जब समय मिलता है तो और नया काम करो- आका का हुक्म ......तो आप ही बताएं कैसे ब्लोगिया जाए ।
वैसे आज कल समय निकलने की कोशिश कर रहा हूँ... कुछ किताबों मे मन रमा रहा हूँ। उसमे एक है एम जे अकबर की ' Byline ' और जब मन और उचाट हो जाता है तो काशी का अस्सी- काशीनाथ सिंह को पलटने लगता हूँ।
जो भी ब्लॉग पर कुछ न कुछ लिखा जाएगा ..वैसे कहूँ अपनी नौकरी मे वीक मे एक दिन ब्लॉग पर एक स्पेशल रिपोर्ट तैयार करता हूँ ।
रिपोर्ट के लिए यहाँ आयें
गीतों से सजा ‘रेडियो ब्लॉग’
ब्लॉग जो सिर्फ बेटियों का है !
बांकी सब बाद मे बतियाते हैं।
मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Friday, February 29, 2008
Saturday, February 16, 2008
कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की इस रचना को जब भी पढता हूँ , कहीं और ही चल-निकलने का मन कर जाता है। दरअसल हम काम को केवल काम समझते हैं और आड़े हाथ अपना इश्क आ जाता है। खैर अहमद साब को पढ़ें ....
वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर
हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
वो लोग बहुत ख़ुशक़िस्मत थे
जो इश्क़ को काम समझते थे
या काम से आशिक़ी करते थे
हम जीते जी मसरूफ़ रहे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम किया
काम इश्क़ के आड़े आता रहा
और इश्क़ से काम उलझता रहा
फिर आख़िर तंग आकर
हम ने दोनों को अधूरा छोड़ दिया
Tuesday, February 12, 2008
ये बूढ़े लोग अजब होते हैं : गुलज़ार
मुझे गुलज़ार पसंद हैं, कोई कारण नही दे सकता ......बस उनके गीत...मन तक कब पहुंच गए पता भी नही चला ..जब भी सुनता या उन्हें पढता हूँ....बस उन्हीं का हो जाता हूँ.....

आज इंटरनेट पर आवारागर्दी करते उन्हें भी पा गया ....यह भी कमाल का है ।
आईये साथ-साथ मज़ा लेते हैं -----
अबे इसे पता नहीं क्या कहेंगे आप ऐसी नज़्म को...
देखने में पाजी लगती है॥
वैसे है नहीं
या फिर देखने में नहीं लगती पर है पाजी॥
ये बूढ़े लोग अजब होते हैं
छाज में डाल के
माज़ी के दिन
कंकर चुन कर दांत तले रख कर
उनको फिर से तोड़ने की कोशिश करने लगते हैं
तीस बरस की उमर मे जब हुआ दांत ना टूटा
सत्तर साल की उम्र मे तो दांत ही टूटेगा
-*-
हवा ना पानी, गर्द ना कूड़ा
ना कोई आवाज़, ना हरक़त
ग्रेविटी पे तो पाँव नहीं पड़ते हैं कहीं पर
अपने वतन का भी अहसास नही होता
जो भी घुटन है जैसी भी है,
चल कर ज़मीं पर रहते हैं
चलो चलें, चल कर ज़मीं पर रहते हैं
गुलज़ार

आज इंटरनेट पर आवारागर्दी करते उन्हें भी पा गया ....यह भी कमाल का है ।
आईये साथ-साथ मज़ा लेते हैं -----
अबे इसे पता नहीं क्या कहेंगे आप ऐसी नज़्म को...
देखने में पाजी लगती है॥
वैसे है नहीं
या फिर देखने में नहीं लगती पर है पाजी॥
ये बूढ़े लोग अजब होते हैं
छाज में डाल के
माज़ी के दिन
कंकर चुन कर दांत तले रख कर
उनको फिर से तोड़ने की कोशिश करने लगते हैं
तीस बरस की उमर मे जब हुआ दांत ना टूटा
सत्तर साल की उम्र मे तो दांत ही टूटेगा
-*-
नये नये ही चाँद पे रहने आये थे
हवा ना पानी, गर्द ना कूड़ा
ना कोई आवाज़, ना हरक़त
ग्रेविटी पे तो पाँव नहीं पड़ते हैं कहीं पर
अपने वतन का भी अहसास नही होता
जो भी घुटन है जैसी भी है,
चल कर ज़मीं पर रहते हैं
चलो चलें, चल कर ज़मीं पर रहते हैं
गुलज़ार
Sunday, February 10, 2008
गुलाबी चूड़ियाँ- नागार्जुन

नागार्जुन हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र है परंतु हिन्दी साहित्य में वे बाबा नागार्जुन के नाम से मशहूर रहे हैं।
नागार्जुन वास्तव में भारतीय वर्ग-संघर्ष के कवि हैं। नागार्जुन एक घुमंतू व्यक्ति थे। वे कहीं भी टिककर नहीं रहते और अपने काव्य-पाठ और तेज़-तर्रार बातचीत से अनायास ही एक आकर्षक सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण कर देते थे।
यहाँ प्रस्तुत है उनकी एक कविता - गुलाबी चूड़ियाँ
प्राइवेट बस का ड्राइवर है तो क्या हुआ,
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वर्ना किसे नहीं भाएँगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!
सात साल की बच्ची का पिता तो है!
सामने गियर से उपर
हुक से लटका रक्खी हैं
काँच की चार चूड़ियाँ गुलाबी
बस की रफ़्तार के मुताबिक
हिलती रहती हैं…
झुककर मैंने पूछ लिया
खा गया मानो झटका
अधेड़ उम्र का मुच्छड़ रोबीला चेहरा
आहिस्ते से बोला: हाँ सा’ब
लाख कहता हूँ नहीं मानती मुनिया
टाँगे हुए है कई दिनों से
अपनी अमानत
यहाँ अब्बा की नज़रों के सामने
मैं भी सोचता हूँ
क्या बिगाड़ती हैं चूड़ियाँ
किस ज़ुर्म पे हटा दूँ इनको यहाँ से?
और ड्राइवर ने एक नज़र मुझे देखा
और मैंने एक नज़र उसे देखा
छलक रहा था दूधिया वात्सल्य बड़ी-बड़ी आँखों में
तरलता हावी थी सीधे-साधे प्रश्न पर
और अब वे निगाहें फिर से हो गईं सड़क की ओर
और मैंने झुककर कहा -
हाँ भाई, मैं भी पिता हूँ
वो तो बस यूँ ही पूछ लिया आपसे
वर्ना किसे नहीं भाएँगी?
नन्हीं कलाइयों की गुलाबी चूड़ियाँ!
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