Friday, July 06, 2007

यात्रा के बहाने

दिल्ली - मथुरा – आगरा - कानपुर

घूमते वक्त दिल और दिमाग को स्थिर रखना मेरे बस की बात नहीं है। इस क्रम में मेरे दिमाग में एक साथ कई बातें धमाल मचाने लगती है। यही सब हुआ मेरे इस यात्रा-क्रम में। मैं निकला मथुरा - आगरा – कानपुर को खंगालने....। हाईवे पर हमारी गाड़ी जिस तेजी से रफ्तार पकड़ रही थी, ठीक उसी रफ्तार में दिमाग भी अपना रूप दिखा रहा था। मथुरा रिफाइनरी हो या फिर दिल्ली बॉर्डर से आगे पलवल का इलाका हर जगह कुछ ऐसा नजर आया जो सचमुच अलग था। लोगबाग से रू-ब-रू होने का ऐसा मौका कम ही मिलता है। तपतपाती दुपहरी में आज भी औरतें पलवल जिला के होडल गांव में माथे पे मटके लिए फोर लेन हाईवे को क्रॉस करती है। हाईवे के दो अलग-अलग छोरों पर बसे इन गांवों में पानी की घोर किल्लत है। वहीं आगरा के ताज परिसर में विदेशी पर्यटकों को प्रवेश टिकट के एवज में पानी का बोतल मुफ्त बांटा जा रहा है.....। विषमताओं से लबरेज भारत की कहानी हर मोड़ पे बदलती नजर आती है। आगरा में एक संग कई खास बातों से हमारा सामना हुआ। लाल किला और ताजमहल की ओर जाने वाली सड़क के दोनो ओर पुरानी इमारते हैं। इमारतों को लेकर कोई नयी बात मेरे पास नही है। लेकिन इन इमारतों के दीवारों पर जो विज्ञापन हैं, उनकी बात यहां रखना लाज़मी है। 95 फिसदी विज्ञापन अखबारों के हैं.......। हमें खुशी इस बात की हुई कि छोटे बजट के अखबारो ने भी दीवारों पे अपनी जगह बना रखी है। खैर, ताजमहल को नजरों से निहारने का अलग ही मजा है। हमलोगों ने तपती दुपहरिया में तपते संगमरमर पर जब पैरों को तपाया तो मन कह उठा - वाह ताज.....। दिल्ली की तरह ताज के कैंपस में प्यार का अभद्र खेल नजर नहीं आया। प्रेम यहां शालीनता के संग अपना इजहार करता नजर आया। यमुना तो अपने हाल पे रो रही थी, लेकिन जो कुछ भी पानी वह खुद में बचा कर रखी थी, वह खुद में मिशाल हीं है। कहते हैं चांदनी रात में जब ताजमहल की परछाई यमुना में परती है तो नजारा कुछ और हीं होता है.....।
लालकिला और ताजमहल की दूरियां नजदीकियों के लिए हमेशा तड़पती रहती है। बहरहाल बातों को आगे बढ़ाने की जरूरत हमें यहां महसूस हो रही है।

तो साहेबान, इस यात्रा में हमलोग ढ़ाबों में खूब रूके..ठहरे.। अलबेले नामों वाले इन ढ़ाबों का खाना भी लाजबाब था..। कानपुर शहर और देहात का इलाका भी हमारे जेहन में जगह बनाता चला गया। इटावा से लेकर कानपुर शहर तक हमें उजले गमछों से रू-ब-रू होना पड़ा। मोटरसाईकल सवार अपने कंधे पर मस्ताने अंदाज में गमछे को रखे नजर आये.।
सबसे मजेदार वाकया घटा कानपुर में, रात के साढ़े ग्यारह बजे हमलोग कानपुर शहर पहुंचे। हमें वायुसेना क्वार्टर पहुंचना था। एक ठेले वाले से रमादेवी चौक पर हमने पूछा- एयरफोर्स का जे.के. क्वार्टर किधर होगा.. ,वह तकरीबन 18 साल का युवक कुछ इस अंदाज में हमें समझाया- आप ठीक जगह पहुंचे हैं, यहां से दाहिने मुड़े फिर जो चौराहा आएगा वहां आप बायें की ओर मुड़ जाऐं...। लड़के की भाषा में इतनी मिठास थी कि हमलोग उसके दिवाने हो गये। दरअसल इससे पूर्व हमलोगों ने जिससे भी पूछा उनका जबाब रूखेपन का चादर ओढ़े था।

यात्रा के बहाने ऐसे पल अक्सर दिल में अपने लिए जगह बना लेती है। आखिर विविधताओं वाले भारत की असली तस्वीर यही है।

2 comments:

Pratik said...

अरे! यह तो बड़ी गड़बड़ हो गई। आप आगरा आए और हमारी आपसे मुलाक़ात भी न हो सकी। ख़ैर, अगली बार आएँ तो आपसे मिलना तय रहा। बस ख़बर भर कर दीजिएगा।

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव said...

अच्छा लिखा है। आपके साथ हमने भी घूम लिया