मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Monday, August 09, 2021
बस अपने लिए खेती करता हूं ...
Saturday, December 15, 2018
गाम-घर और खेत -खलिहान
घंटों चुपचाप बैठना और फिर खेत तक टहलना, इन दिनों आदत सी बन गई है।गाछ-वृक्ष का जीवन देख रहा हूं, तालाब में छोटी मछलियों का जीवन समझ रहा हूं। तमाम व्यस्तताओं के बीच ख़ुद को कुछ दिन अकेला छोड़ देना, कभी कभी रास आने लगता है।
नीम का पौधा अब किशोर हो चला है। दो साल में उसकी लम्बाई और हरियाली, दोनों ही आकर्षित करने लगी है। इन्हें देखकर लगता है कि समय कितनी तेज़ी से गुज़र रहा है। लोगबाग से दूर गाछ-वृक्ष के बीच जीवन का गणित आसान लगने लगता है।
कुछ काम जब अचानक छूट जाता है और दुनिया का अर्थशास्त्र जब ज़बरन आप पर धौंस ज़माने लगता है, उस वक़्त आत्मालाप की ज़रूरत महसूस होती है।
अहाते के आगे कदंब के पेड़ बारिश इस मौसम में और भी सुंदर दिखने लगे हैं। पंक्तिबद्ध इन कदंब के पेड़ को देखकर लगता है जीवन में एकांत कुछ भी नहीं होता है, जीवन सामूहिकता का पाठ पढ़ाती है।
पेड़-पौधों से घिरे अपने गाम-घर में जीवन स्थिर लगता है। पिछले कुछ दिनों से एक साथ कई मोर्चे पर अलग अलग काम करते हुए जब मन के तार उलझने लगे थे तब लगा कि जीवन को गाछ-वृक्ष की नज़र से देखा जाए। बाबूजी ने जो खेती-बाड़ी दी, उस पर काकाजी ने हरियाली की दुनिया हम लोगों के लिए रच दी, अब जब सब पौधे वृक्ष हो चले हैं तो उसकी हरियाली हमें बहुत कुछ सीखा रही है।
खेत घूमकर लौट आया हूं, साँझ होने चला है, पाँव धूल से रंगा है। अपने ही क़दम से माटी की ख़ुश्बू आ रही है। पाँव को पानी से साफ़कर बरामदे में दाख़िल होता हूं, फिर एक़बार आगे देखना लगता हूं। हल्की हवा चलती है, नीम का किशोरवय पौधा थिरक रहा है। यही जीवन है, बस आगे देखते रहना है।
Wednesday, May 10, 2017
खेत-खलिहान, फूल-पत्ती और सब्जी
अब खेत के साथ खूब प्रयोग करने लगा हूं। दोस्त -यार गांव पहुंचकर हिम्मत बढ़ाते रहते हैं। कई लोग दूर-दराज से अब चनका आने लगे हैं। लोगबाग बाजार के लिए खेती करने का सुझाव देते हैं लेकिन मैं अभी अपने लिए उपजाता हूं। घर को जैविक तरीके से उगाई फसल मिले, इस पर जोर है। यह सब करते हुए खूब आनंद मिल रहा है। बारिश होती है, फसल को नुकसान होता है लेकिन इन सबके बावजूद इतना तो हासिल हो ही जाता है, जिससे घर की थाली भर जाए।
मौसम की सब्जी उगाने लगा हूं। फल के साथ फूल-पौधों से दोस्ती बढ़ा ली है। चनका रेसीडेंसी में जब मेहमान नहीं होते हैं तब मैं इन्हीं फूल-पत्ती और सब्जियों के पौधों से गूफ्तगू करता हूं। यह सब करते हुए खुद के अकेलेपन से भी लड़ता हूं।
अभी परवल का पौधा हर दो दिन में खाने के लिए सब्जी देने लगा है। ऐसा लगता है मानो परिवार में कोई नया सदस्य आया हो और वह चाहता है कि लोग उससे बात करें। ऐसे में दोपहर बाद परवल और भिंडी के पौधों के पास जाता हूं और उसे निहारने लगता हूं। यह बस करते हुए मन के भीतर भी हरी पत्तियां उगने लगी है। शहर के भागमभाग के बीच इन फूल पत्तियों की दुनिया बहुत कुछ नया सीखाती है, हर रोज।
उधर, मक्का अब खेत से खलिहान पहुंचने लगा है। कदंब के खेतों में मक्का अब उपजने लगा है। जबकि पहले लिखता था- 'मक्का के खेत में कदंब'। चार साल में कुछ शब्द भी बदले हैं हमने :)
हालांकि बारिश और आंधी ने इस बार भी फसल को प्रभावित किया है। कभी कभी सोचता हूं तो लगता है कि किसानी के पेशे के बारे मेंं हम सब सतही जानकारी क्यों रखते हैं जबकि हम सबका मूल गाम-घर से है। किसानी कर रहे लोगों के बीच जाकर कभी देखिए, उनका मन किस कदर कई चीजों में उलझा रहता है लेकिन इन सबके बावजूद वे अपने पेशे को उत्सव से जोड़ते रहते हैं। हर फसल की कटाई के बाद उत्सव, हर फसल की बुआई के वक्त उत्सव। पता नहीं और किस पेशे में उत्सव का इतना महत्व होता होगा। गाम में अभी से ही भगैत के लिए लोगबाग मन बनाने लगे हैं। मक्का बिका नहीं है अभी लेकिन उत्सव के लिए हम तैयारी में जुट गए हैं।
इन सबके बीच हमने आज अमरुद के कुछ नए पौधे लगाए हैं। परिसर को फलदार और फूल से भरने की कोशिश है। माटी साथ दे रही है। बरसात गिरते ही कदंब के भी नए पौधे लगाने हैं। बेली के फूल इस मौसम में मन को मोहने के लिए आतुर हैं। कल बारिश हुई तो बेली और भी सुंदर दिखने लगी है। देसी गुलाब खूब लगा रहा हूं- लाल और सफेद। फूल की वजह से तितलियां खूब आती है।
यही सब इन दिनों कर रहा हूं। मौसम की मार का डर अब दूर होने लगा है, किसानी करते हुए जीना सीख रहा हूं। लोगबाग आते हैं तो उनसे भी बहुत कुछ नया सीखने को मिल रहा है।
Tuesday, October 04, 2016
किसान की डायरी से सुखदेव की कहानी
मैं आज सुखदेव को लगातार सुनने बैठा हूं। स्टील की ग्लास में चाय लिए सुखदेव कहता है- " चाह जो है न बाबू, ऊ स्टील के गिलास में ही पीने की चीज़ है। हमको कप में चाह सुरका नै जाता है। कप का हेंडल पकड़ते ही अजीब अजीब होने लगता है। लगता है मानो किसी का कान पकड़ लिए हैं:) वैसे आपको पता है कि पहले पुरेनिया के डाक्टर बाबू भट्टाचार्यजी मरीज के पूरजा पे लिख देते थे- भोर और साँझ चाह पीना है, कम्पलसरी! अब तो बाल बच्चा सब चाह पिबे नै करता है।आपको पता नै होगा। आपके बाबूजी होते तो बताते। "
मैं सुखदेव से धूप और फ़सल पर बात करना चाहता था लेकिन आज वह चाय पर बात करने के मूड में है। 80 साल के इस वृद्घ के पास अंचल की ढेर सारी कहानियाँ है। उसने गाम घर और बाजार को बदलते देखा है। उसके पास चिड़ियों की कहानी है। मौसम बदलते ही नेपाल से कौन चिड़ियाँ आएगी, किस रंग की, चिड़ियों की बोली। सब उसे पता है। लेकिन बात करते हुए विषयांतर होना कोई उससे सीखे :)
सुखदेव की बातों में रस है। जब गाँव में पहली बार मक्का की खेती शुरू हुई थी, जब पहली बार हाईब्रिड गेहूँ की बाली आई थी और जब पहली दफे नहर में पानी छोड़ा गया था..ये सब एक किस्सागो की तरह उसकी ज़ुबान पे है। नहर की खुदाई में उसने हाथ बँटाया था।
सुखदेव बताता है- " कोसी प्रोजेक्ट का अफ़सर सब गाम आया। उससे पहले पुरेनिया से सिंचाई डपार्टमेंट का लोग सब आया। ज़मीन लिया गया तो पहले मालिक सबको सरकारी रेट पर ज़मीन का मुआवज़ा मिला और इसके बाद हमरा सब का बारी आया और मुसहरी टोल का टोटल लोग सरकारी मज़दूर बनकर नहर के लिए मिट्टी निकालने लगे। आज ई धूप में भी ऊ दिन याद करते हैं न तो देह सिहर जाता है। गर्व होता है, हमने गाम के खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए नहर बनाया है। इस गाम में भी कोसी का पानी हमने ला दिया। जिस दिन बीरपुर बाँध से ई नहर के लिए पानी छोड़ा गया, उस दिन जानते हैं क्या हुआ? धुर्र, आपको क्या पता होगा, आप तो तब आए भी न थे ई दुनिया में। बाबू, ऊ दिन कामत पर बड़का भोज हुआ और साँझ में बिदापत नाच। ख़ुद ड्योढ़ी के राजकुमार साब अपने बड़का कार से आए थे बिदापत नाच देखने। आह! ई पुरनका गप्प सब यादकर न मन हरियर हो जाता है..कोई पूछता भी नहीं है। "
सुखदेव बातचीत के दौरान नहर की तरह बहने लगा। वह हाट की बात बताने लगा लेकिन विषयांतर होते हुए दुर्गा पूजा के मेले में चला गया। चालीस साल पहले की बात, मेले में थिएटर और कुश्ती कहानी! उसने बताया कि तब मेले में बंगाल की थिएटर कम्पनी आती थी। धान बेचकर जो पैसा आता, वह सब मेला में लोग ख़र्च करते थे।
सुखदेव ने माथे पे गमछा लपेटते हुए कहा- " गमछा तो हम मेला में दो जोड़ी ख़रीदते ही थे। बंगाल के मालदा ज़िला वाला गमछा। लाल रंग का। अब ऊ गमछा नै आता है। तब इतना पैसा का दिखावा नहीं था। पूरा गाम तब एक था। उस टाइम इतना जात-पात नै था। पढ़ा लिखा लोग सब कहते हैं कि पहले जात-पात ज़्यादा था लेकिन ई बात ग़लत है जबसे पोलिटिक्स बढ़ा हैं न बाबू, तब से जात-पात भी बढ़ा है। बाभन टोल का यज्ञ वाला कुँआ तब सबका था। बुच्चन मुसहर हो या फिर सलीम का बाप, सब वहीं से पानी लाते थे और जगदेव पंडित तो काली मंदिर के लिए अच्छिन- जल यहीं से ले जाता था। अब होता है, बताइए आप? अब तो जात को लेकर सब गोलबंद हो गया है बाबू। "
बातचीत के दौरान सुखदेव ने अचानक आसमान की तरफ देखा और कहा- " रे मैया! सूरज तो दो सिर पसचिम चला गया। तीन बज गया होगा। जाते हैं, महिष को चराने ले जाना है। कल भोर में आएँगे और फिर चाह पीते हुए कहानी सुनाएँगे। काहे कि आप मेरा गप्प ख़ूब मन से सुनते हैं..."
सुखदेव निकल पड़ा और मैं एकटक उस 80 साल के नौजवान को देखता रहा। अभी भी वही चपलता, सिर उठाकर चलना, बिना लाठी के सहारे और स्मृति में पुरानी बातों का खजाना...
किसान की डायरी से सुखदेव की कहानी
मैं आज सुखदेव को लगातार सुनने बैठा हूं। स्टील की ग्लास में चाय लिए सुखदेव कहता है- " चाह जो है न बाबू, ऊ स्टील के गिलास में ही पीने की चीज़ है। हमको कप में चाह सुरका नै जाता है। कप का हेंडल पकड़ते ही अजीब अजीब होने लगता है। लगता है मानो किसी का कान पकड़ लिए हैं:) वैसे आपको पता है कि पहले पुरेनिया के डाक्टर बाबू भट्टाचार्यजी मरीज के पूरजा पे लिख देते थे- भोर और साँझ चाह पीना है, कम्पलसरी! अब तो बाल बच्चा सब चाह पिबे नै करता है।आपको पता नै होगा। आपके बाबूजी होते तो बताते। "
मैं सुखदेव से धूप और फ़सल पर बात करना चाहता था लेकिन आज वह चाय पर बात करने के मूड में है। 80 साल के इस वृद्घ के पास अंचल की ढेर सारी कहानियाँ है। उसने गाम घर और बाजार को बदलते देखा है। उसके पास चिड़ियों की कहानी है। मौसम बदलते ही नेपाल से कौन चिड़ियाँ आएगी, किस रंग की, चिड़ियों की बोली। सब उसे पता है। लेकिन बात करते हुए विषयांतर होना कोई उससे सीखे :)
सुखदेव की बातों में रस है। जब गाँव में पहली बार मक्का की खेती शुरू हुई थी, जब पहली बार हाईब्रिड गेहूँ की बाली आई थी और जब पहली दफे नहर में पानी छोड़ा गया था..ये सब एक किस्सागो की तरह उसकी ज़ुबान पे है। नहर की खुदाई में उसने हाथ बँटाया था।
सुखदेव बताता है- " कोसी प्रोजेक्ट का अफ़सर सब गाम आया। उससे पहले पुरेनिया से सिंचाई डपार्टमेंट का लोग सब आया। ज़मीन लिया गया तो पहले मालिक सबको सरकारी रेट पर ज़मीन का मुआवज़ा मिला और इसके बाद हमरा सब का बारी आया और मुसहरी टोल का टोटल लोग सरकारी मज़दूर बनकर नहर के लिए मिट्टी निकालने लगे। आज ई धूप में भी ऊ दिन याद करते हैं न तो देह सिहर जाता है। गर्व होता है, हमने गाम के खेतों तक पानी पहुँचाने के लिए नहर बनाया है। इस गाम में भी कोसी का पानी हमने ला दिया। जिस दिन बीरपुर बाँध से ई नहर के लिए पानी छोड़ा गया, उस दिन जानते हैं क्या हुआ? धुर्र, आपको क्या पता होगा, आप तो तब आए भी न थे ई दुनिया में। बाबू, ऊ दिन कामत पर बड़का भोज हुआ और साँझ में बिदापत नाच। ख़ुद ड्योढ़ी के राजकुमार साब अपने बड़का कार से आए थे बिदापत नाच देखने। आह! ई पुरनका गप्प सब यादकर न मन हरियर हो जाता है..कोई पूछता भी नहीं है। "
सुखदेव बातचीत के दौरान नहर की तरह बहने लगा। वह हाट की बात बताने लगा लेकिन विषयांतर होते हुए दुर्गा पूजा के मेले में चला गया। चालीस साल पहले की बात, मेले में थिएटर और कुश्ती कहानी! उसने बताया कि तब मेले में बंगाल की थिएटर कम्पनी आती थी। धान बेचकर जो पैसा आता, वह सब मेला में लोग ख़र्च करते थे।
सुखदेव ने माथे पे गमछा लपेटते हुए कहा- " गमछा तो हम मेला में दो जोड़ी ख़रीदते ही थे। बंगाल के मालदा ज़िला वाला गमछा। लाल रंग का। अब ऊ गमछा नै आता है। तब इतना पैसा का दिखावा नहीं था। पूरा गाम तब एक था। उस टाइम इतना जात-पात नै था। पढ़ा लिखा लोग सब कहते हैं कि पहले जात-पात ज़्यादा था लेकिन ई बात ग़लत है जबसे पोलिटिक्स बढ़ा हैं न बाबू, तब से जात-पात भी बढ़ा है। बाभन टोल का यज्ञ वाला कुँआ तब सबका था। बुच्चन मुसहर हो या फिर सलीम का बाप, सब वहीं से पानी लाते थे और जगदेव पंडित तो काली मंदिर के लिए अच्छिन- जल यहीं से ले जाता था। अब होता है, बताइए आप? अब तो जात को लेकर सब गोलबंद हो गया है बाबू। "
बातचीत के दौरान सुखदेव ने अचानक आसमान की तरफ देखा और कहा- " रे मैया! सूरज तो दो सिर पसचिम चला गया। तीन बज गया होगा। जाते हैं, महिष को चराने ले जाना है। कल भोर में आएँगे और फिर चाह पीते हुए कहानी सुनाएँगे। काहे कि आप मेरा गप्प ख़ूब मन से सुनते हैं..."
सुखदेव निकल पड़ा और मैं एकटक उस 80 साल के नौजवान को देखता रहा। अभी भी वही चपलता, सिर उठाकर चलना, बिना लाठी के सहारे और स्मृति में पुरानी बातों का खजाना...
Saturday, May 07, 2016
हमें हर साल लड़ना पड़ता है...
कदंब के किशोर पेड़, मोहगनी और एमशोल जैसे लम्बे सुंदर पेड़, जिनकी उम्र छह से आठ साल होगी, सब टुकड़े टुकड़े हो गए। प्रकृति की मार सबसे ख़तरनाक होती है, किसानी करते हुए यह जान सका। हर साल हमलोग लड़ते हैं, कई लोगों ने सलाह दी, खेतों में कुछ अलग हो लेकिन जब आँधी आती है न, तब नया करने से डरने लगता हूं।
सुबह चनका पहुँचते ही मौसम की मार खेतों में आँखों के सामने देखने लगा। आम से लदे पेड़ की डालियाँ ज़मीन पर लेटने लगी। सैकड़ों आम जिन्हें पकना था एक महीने बाद, सब टूट कर बिखर गये। लीची बाड़ी में जाने के बाद मन और खट्टा हो गया। कटहल की तो पूछिए मत, पेड़ ही गिर पड़े।
मक्का की वह फ़सल जिसे हमने देर से बोया था, वह तो रूठ गया मुझसे। अभी तो मक्का के दाने में दूध ही आया था। किसान का दर्द मुआवज़े के गणित से दूर है और हाँ, मैं निजी तौर पर इससे दूर रहना भी चाहता हूं।
बाँस बाड़ी की क्षति शब्द में बयां नहीं कर सकता। जानते है क्यों? दरअसल यह महीना बाँस में नए कोपल आने का है, बाँस का परिवार इसी महीने बढ़ता है और प्रकृति की लीला देखिए, आधे घंटे में बाँस बाड़ी की झुरमुट ज़मीन पर। हमारा नक़दी फ़सल ख़त्म!
यही आजकी कहानी थी। कुछ तस्वीरें हैं। काले मेघ की तस्वीरें हैं, जिसे देखकर मन को ठंडक पहुँचेगी यदि आप गरमी झेल रहे होंगे लेकिन इसी तस्वीर के बाद ही तूफ़ान को हमने झेला।
यक़ीन मानिए हम हारेंगे नहीं, जिनसे हमने अपने खेतों में कुछ नया करने का वादा किया है, ज़रूर करूँगा। हम रिस्क उठाएँगे, हार नहीं मानेंगे, बस किसानों पर आपलोग भरोसा बनाए रखिए, किसानी समाज जो हर साल आपके लिए अन्न उपजाता है, उसे स्नेह दीजिए। सरकार तो है ही , देर सवेर वह सुन ही लेती है। आप सब भी गाँव को देखिए आपदा के समय में। हमसब माँगते नहीं हैं, बस चाहते हैं कि दुख-सुख में दूसरे पेशे के लोग भी खेतों तक पहुँचे। खेत किसी एक का नहीं होता, यह सबका होता है।
किसानी करते हुए, लिखते पढ़ते हुए पिछले तीन साल से यही सब भोग रहा हूं, हँसते हुए खेत-पथार को समझ रहा हूं। महाराष्ट्र में पानी संकट से जूझ रहे किसानों की सुनता हूं तो मन टूट जाता है लेकिन उनके लिए भी यह परीक्षा की घड़ी है, उन्हें भी नहीं हारना है, और हमें भी नहीं। मराठवाड़ा के किसानी समाज का दर्द महसूस कर सकता हूं, लेकिन उन्हें भी हारना नहीं है क्योंकि 'सब दिन होत न एक समाना' हमारे दिन भी हँसी ख़ुशी के आएँगे, ख़ुद पर, माटी पर और पानी पर भरोसा रखिए।
हर बुरे वक़्त से कुछ नया सीखता हूं, आज सुबह की आपदा से भी बहुत कुछ सीखने को मिला। और क्या कहूँ-'सबहि नचावत राम गोसाईं'
आपका
किसान
Saturday, March 19, 2016
यहाँ सबकुछ है फिर भी...
गाम में दोपहर में जब अकेले रहता हूं तब नीलकंठ, ख़ंजन, बुलबुल, पहाड़ी मैना की आवाज़ें मेरे अकेलेपन को दूर करती है लेकिन इन सबके बावजूद लगता है कि आप कहीं आसपास ही हैं। मुझे याद आता है आपका बैठकखाना, जहाँ दोपहर में आप शतरंज खेला करते थे। मुझे तो शतरंज कभी समझ में नहीं आया लेकिन आपकी चालें अब याद आ रही हैं। शतरंज की बात से आप ही याद आते हैं और फिर मैं गुलज़ार का लिखा बुदबुदाने लगता हूं-
"दोपहरें ऐसी लगती हैं
बिना मोहरों के खाली खाने रखे हैं
न कोई खेलने वाला है बाज़ी
और ना कोई चाल....."
बाबूजी, पुराने गोबर गैस प्लांट के पास आपने जो खजूर का पेड़ लगाया था न वह इस बार भी चहक रहा है। चिड़ियों ने इस पेड़ में घौसला बना लिया है, एकदम ऊँचाई पर। वहीं दरभंगा से आपने जो लक्ष्मेश्वरभोग नामक आम का पौधा लाया था न, इस बार उसमें ख़ूब मंज़र आया है। इन पेड़-पौधों को देखकर आप 'अब नहीं हैं' इस शब्द को ग़लत साबित करने में जुट जाता हूं लेकिन यह जानता हूं कि यह मेरा भरम है, जो टूट चुका है।
ख़ैर, पछिया और पूरबा हवा का असर अब भी है। पश्चिम के खेत में मक्का इस बार ठीक ठाक है लेकिन नहर इस बार भी बिन पानी है। आपकी डायरी पलट रहा था तो पाया कि 70 के दशक में जब नहर में पानी नहीं छोड़ा जाता था तब आप सिंचाई विभाग का चक्कर लगाते थे गाँव वालों के ख़ातिर। डायरी में ढ़ेर सारे आवेदन मिले, किसानी के अलावा आपके काम को देखना मन को सुकून देता है। इस बार के आम बजट में हर खेत तक पानी पहुँचाने की बात कही गयी है, देखते हैं बात कब रंग लाती है।
मक्का खेत में है तो गाम –घर में अभी उत्सव जैसा माहौल है। किसी न किसी के घर में भगैत या कीर्तन हो रहा है। हालाँकि पंचायत चुनाव की वजह से गाम में अभी चुनावी गणित का हिसाब चल रहा है।
उधर, आम और लीची के पेड़ फलों के लिए तैयार हो रहे हैं। आम के मंजर मन के भीतर टिकोले और आम के बारे में सोचने को विवश कर रहे हैं। मन लालची हुआ जा रहा है। उन मंजरों में किड़ों ने अपना घर बना लिया है, मधुमक्खियां इधर-उधर घूम रही है।
बांस के झुरमुटों में कुछ नए मेहमान आए हैं। बांस का परिवार इसी महीने बढ़ता है। वहीं उसके बगल में बेंत का जंगल और भी हरा हो गया है। लगता है गर्मी की दस्तक ने उसे रंगीला बना दिया है। कुछ खरगोश दोपहर बाद इधर से उधर भागते फिरते मिल जाते हैं, वहीं गर्मी के कारण सांप भी अपने घरों से बाहर निकलने लगा है। जो कुछ देखता हूं आज वो सब आपको सुनाने बैठा हूं बाबूजी।
अरे हाँ, यह तो बताना भूल ही गया, आपके गाम में अब सड़कों का जाल बिछ रहा है। नहर की पगडंडी से इतर अब सड़क दिखने लगी है। बिजली के खम्बे भी अब गिराए जा रहे हैं। गाम - घर की दुनिया अब बदल रही है बाबूजी। इतना कुछ बदल रहा है लेकिन अफ़सोस आप नहीं हैं।
होली से पहले गाँव में आपकी बैठकी को उत्सव कहा जाता था। गीत-नाद का आयोजन होता था। लेकिन आपके बिछावन पर जाने के बाद से सबकुछ कहीं खो गया। वक़्त कितनी तेज़ी से गुज़रता है, अब इसका अहसास हो रहा है। कुछ रूकता कहाँ हैं, बस यादें रह जाती है। बाँकि तो सबकुछ चलता रहता है।
दुर्गा पूजा , दीवाली के बाद अब होली भी आपके बिना होगी। यह सत्य है लेकिन कड़वा लग रहा है। गाम की होली, पूर्णिया की होली.... इस बार से आपके बिना ही होगी। शाम में सफ़ेद-धोती कुर्ता पहनना, बड़ों के पाँव में अबीर लगाकर आशीष लेना, लोगों को आग्रह कर मालपुआ खिलाना ....सब अब यादों की एक मोटी डायरी में बंद हो चुका है। मैं आज यादों की पोटली खोलकर बैठ गया हूं बाबूजी ....मैं कबीर की वाणी के ज़रिए आपको याद करता हूं-
“दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ “
Saturday, February 27, 2016
पोखर के बहाने
वहीं पोखर के पूरब के खेत में पटवन के बाद कीड़ों को ढूँढने के लिए बगूले आए हुए हैं। कुछ बगूले पोखर में भी ताकाझाँकी कर लेते हैं। जंगली बतकों के बच्चे 'पैक-पैक' करती हुई चक्कर मार रही है। सिल्ली चिड़ियाँ तो पोखर में जहाँ कुछ पानी बचा है उसमें डुबकी लगा रही है।
पोखर के कीचर में कोका के फूल आए हैं। पोखर को देखकर कोसी की उपधारा 'कारी-कोसी' की याद आ रही है। गाम की सलेमपुरवाली काकी कारी कोसी के बारे कहानी सुनाती थी। कहती थी कि डायन -जोगिन के लिए लोग सब कारी कोसी के पास जाते हैं। लेकिन हमें तो चाँदनी रात में कारी कोसी की निर्मल धारा में अंचल की ढेर सारी कहानियाँ दिखती थी।
बंगाली मल्लाहों के गीत सुनने के लिए कारी कोसी पर बने लोहे के पुल पर खड़ा हो जाता था। बंगाल से हर साल मल्लाह यहाँ डेरा बसाते थे और भाँति-भाँति की मछलियाँ फँसाकर बाज़ार ले जाते थे। इस पुल से ढेर सारी यादें जुड़ी हैं। यहाँ से दूर दूर तक परती ज़मीन दिखती है, बीच-बीच में गरमा धान के खेत भी हैं।
क़रीब दस साल पहले तक बंगाली मल्लाह कारी-कोसी के तट को हर साल बसाते थे, धार की जमीन में धान की खेती करते हुए सबको हरा कर देते थे। ये सभी मेहनत से नदी-नालों-पोखरों में जान फूँक देते थे।
गाँव का बिशनदेव उन बंगाली मछुआरों की बस्ती में ख़ूब जाता था और जब लौटकर आता तो उसके हाथ में चार-पाँच देशी काली मछली और कुछ सफ़ेद मछलियाँ होती थी। यह सब अंगना में बने चूल्हे के पास रखकर वह कहता- 'सब भालो, दुनिया भालो, आमि-तुमि सब भालो, दिव्य भोजन माछेर झोल.....'
बिशनदेव की इस तरह की बातों को सुनकर गाम में सबने उसका नामकरण 'पगला बंगाली' कर दिया था। अब बिशनदेव नहीं है लेकिन आज पुराने पोखर के नज़दीक से गुज़रते हुए कारी-कोसी की यादें ताजा हो गयी।
Thursday, December 31, 2015
चलते-चलते किसानी की बात
खैर, इस वक्त फसल को पानी की जरूरत है , ऐसे में किसानी समाज खेतों की प्यास मिटाने में लगा है। 2015 के अंतिम दिन हम फसल के संग उम्मीद लिए खेतों में घूम रहे हैं। फट-फट करता पम्प सेट आज मुझे खींच रहा है। जिन खेतों में मक्का है वह आज खुश है और उसकी ख़ुशी से ही मेरे जैसा किसान अपने घर-आँगन-दुआर को खुश करेगा।
वैसे 2015 किसानी कर रहे मेरे जैसे लोगों के लिए ख़ास नहीं रहा। कम बारिश और आंधी तूफ़ान ने हमें तोड़ कर रख दिया लेकिन हम मन से कम ही टूटते हैं। क्योंकि टूट जाने पर हमारे पास बचता कुछ नहीं है। वैसे भी 12 महीने हमारे लिए कहानी ही है, जिसे हर किसान अपने अंदाज से बयां करता है या कहिये किसानी के जरिये लिख देता है।
आलू की कहानी, मक्का-धान-गेहूं की कहानी या फिर सरसों-दाल-गेहूं की कथा। हम सब तो बस खेत में बीज देकर चुप हो जाते हैं और सबकुछ कथा के नायक प्रकृति के भरोसे छोड़ देते हैं । इन सबके बीच धरती मैय्या हमें भरोसा देती रहती है कि 'सब अच्छा ही होगा' । इसी आशा के संग हर किसान 12 महीने गुजार देता है। सब अपने गुल्लक में आशा की किरण को बनाये रखने की कोशिश तो जरूर ही करता है।
यही वजह है कि आने वाले 2016 को लेकर हम सब आशावान है। देखिये न अभी एक महीने पहले की ही बात है, धान उपजाकर कोई भगैत-विदापत में डूबा है तो कोई बेटी की विदागरी में लगा है। हालांकि धान ने इस बार हमें निराश किया कम बरखा की वजह से लेकिन इसके बावजूद सब रमे हैं अपनी दुनिया में। गाम-घर की दुनिया यही है, यहां तनख्वाह तो नहीं है लेकिन उत्सव जरूर है। पल में ख़ुशी और पल में सन्तुष्ट हो जाना किसान की आदत है। पूर्णिया जिला में किसानी कर रहे लोग अक्सर कहते हैं - "खेती नै करब त खायब कि और खेती स निराश भ जायब त जियब केना..."
बाबूजी अब नहीं है, यह वाक्य जब भी लिखता हूँ तो लगता है कि कुछ गलत टाइप हो गया। मन का सम्पादक डांटने लगता है लेकिन सत्य तो सत्य है। इसी साल वो मुझे अपने खेतों में अकेला छोड़ कर अनन्त यात्रा पर निकल गए। वे होते तो खेत सिंचाई पर और भी बातें बताते मुझे । और मैं और भी कुछ नया लिख पाता लेकिन ....अब उनकी याद में कुछ नया करना है।
बाबूजी हमेशा कहते थे "जब फसल तुम्हें निराश कर दे तब उससे बात करो। खेत में टहलने लग जाओ। आशा बलवती होती है, इसे दुहराने लगो।"
बाबूजी की कही बातों को याद करते हुए आज डायरी लिखने जब बैठा हूँ तो लगता है सब सुंदर ही होगा। 2016 कल आ रहा है, नये साल में नए फसलों के संग हम खूब बातें करेंगे। नवान्न की पूजा करेंगे। मक्के के दानों को सहेजेंगे, धान की बालियों से प्रेम करेंगे , गेहूं की भूरे रंग की ब्रश की माफिक बाली को माटी से स्पर्श करते देखेंगे।
आशा है मुल्क के अलग अलग हिस्सों में मेहनतकश किसानी कर रहे लोग निराश नहीं होंगे। उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम हर कोने के किसान खेत से इश्क करेंगे...माटी से सोना उपजाने की कोशिश करेंगे... हिम्मत नहीं हारेंगे।
Wednesday, November 25, 2015
पुरानी कहानी, नया पाठ
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| चनका गांव के एक तालाब की तस्वीर। |
उस बस्ती से दूर जहां हमारे अपने लोग बसे हैं, जहां संस्कार नामक एक बरगद का पेड़ खड़ा है और जहां बसे वहां बांस का झुरमुट हमारे लिए आशियाना तैयार करने में जुटा था। मधुबनी से पूर्णिया की यात्रा में दो छोर हमारे लिए पानी ही है। उस पार से इस पार। कालापानी। कुछ लोग इसे पश्चिम भी कहते हैं। बूढ़े-बुजुर्ग कहते हैं- जहर ने खाउ माहुर ने खाउ, मरबाक होए तो पूर्णिया आऊ (न जहर खाइए, न माहुर खाइए, मरना है तो पूर्णिया आइए)। और हम मरने के लिए नहीं बल्कि जीने के लिए इस पार आ गए।
विशाल परती जमीन, जिसे हॉलीवुड फिल्मों में नो मेन्स लैंड कहा जा सकता है, हमारे हिस्से आ गई। शहर मधुबनी से शहर-ए-सदर पूर्णिया अड्डा बन गया। मधुबनी जिले के तत्सम मैथिली से पूर्णिया के अप्रभंश मैथिली की दुनिया में हम कदम रखते हैं। हमारी बोली-बानी पे दूसरे शहर का छाप साफ दिखने लगा। सूप, कुदाल खुड़पी सबके अर्थ, उच्चारण, हमारे लिए बदल गए, लेकिन हम नहीं बदले, जुड़ाव बढ़ता ही चला गया, संबंध प्रगाढ़ होते चले गए।
Sunday, November 22, 2015
खेत में फसल से गुफ्तगू
Tuesday, September 08, 2015
खेती-किसानी, बारिश-बाबूजी
आज शहर से अपने गाँव जाते वक्त मेरी नजर एक बूढ़े शख्स पर टिक गयी जो लाठी के सहारे कदम बढ़ा रहा था. उम्र उसकी 80 के करीब होगी। लेकिन इसके बावजूद वो सात -आठ साल के एक लड़के को थामे था। वह बूढ़ा उस लड़के को सहारा दे रहा था कि वह लड़का उस बुजुर्ग को थामे था, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन यह अहसास जरूर हुआ कि हम सब जड़ों में लिपटने की जुगत में रहते हैं। यही जुगत शायद जीने की आश को बचाए रखती है।
नहर के एक छोर पर उन दोनों को देखकर मुझे बाबूजी की याद सताने लगी। दरअसल हम सब स्मृति में जीवन तलाशते हैं। स्मृति की दूब हमेशा हरी बनी रहे, हम सब ऐसा सोचते हैं। कोई हमारे बीच से गुजरकर भी मन में एक पगडंडी बनाकर निकल जाता है, जिसकी लकीर पर हम जीवन भर चलते रहने की मंशा पाल बैठते हैं।
लेकिन नियति जो चाहती, होता तो वही है। कबीर की वाणी ऐसे में मुझे याद आने लगती है। गाम का कबीराहा मठ मुझे खींचने लगता है। मैं खुद ही बुदबुदाने लगता हूं- कबीरा कुआं एक है..और पानी भरे अनेक..।
फिर जीवन में फकीर की खोज में लग जाता हूं तो कबीर का यह लिखा सामने आ जाता है- "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे. सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली बला..।"
आज गाम-घर करते हुए यही सब सोचता रहा। इस बीच धूप की दुनिया बादलों में कब बदल गयी पता भी नहीं चला। अचानक खूब बारिश होने लगी। बारिश की कई यादें हैं मन के भीतर, कई कहानियां हैं, कई नायक-नायिकाएं हैं..लेकिन फिलहाल धान के खेत का कैनवास ही मन में घर बनाए हुए है।
बारिश से धान के खेतों की हरियाली और भी मायावी दिखने लगती है। बाबूजी का अंतिम संस्कार मैंने उन्हीं धान के खेतों के मुंडेर पर किया, जहां वे फसलों से अपनी और हम सबकी दुनिया रचते थे। हमारी साल भर की रोजी-रोटी के लिए जी-तोड़ मेहनत करते थे। ट्रैक्टर से घंटों खेतों को समतल करते थे।
देखिए न उन खेतों में अब धान के संग कदम्ब अपनी कविता-कहानी हमें सुनाने की जिद कर रहा है। इस अहसास के साथ कि बाबूजी भी ये सब सुन रहे होंगे, मैं आंखें बंद कर उन्हें याद कर लेता हूं। यह जानकर कि मेरा यह भरम भी टूट जाएगा एक दिन...
हर रोज शहर से गांव करते हुए इन दिनों एक साथ ऐसी ही कई चीजें मन में चलती है। तबियत ठीक नहीं रहने की वजह से लिखना कम हो गया है। ड्राइविंग और लेखन से थोड़ी दूरी बनाने को डाक्टर ने कहा है, दोनों ही अति-प्रिय चीज...जा रे जमाना..हर कुछ पर पाबंदी। डाक्टर भी न ..लेकिन करना तो वही होगा..।
कम बारिश की वजह से खेती-बाड़ी इस बार मन माफिक नहीं होगी, ये पता है लेकिन इसके बावजूद हार मानने वाले हम हैं नहीं। बाबूजी अक्सर कहते थे- ‘ किसानी करते हुए निराशा के बादल खूब मंडारते हैं, उन बादलों को बस बरस जाने दो...।’
आज खेती-किसानी और बारिश के बहाने बस इतना ही।
Thursday, May 21, 2015
मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता..
अब जब रोज आपको बिछावन से उठाता हूँ और फिर वहीं लेटाता हूँ तो आपके शरीर को छूने भर से अजीब की शक्ति मिलती है। इस शक्ति को खुद को खुद से लड़ने के लिए बचाकर रख रहा हूँ।
आपके शरीर में जबसे घाव ने अपनी जगह बना ली तो मैं अंदर से टूट गया। मैंने कभी आपके शरीर को इस तरह लाचार नहीं देखा था। धोती-कुर्ते में आपको सलीके से देखता आया। माँ हमेशा आपके घाव को साफ़ करने में लगी रहती है, वही सबकुछ करती हैं। नहीं मालूम कि आप ये सब समझ रहे हैं या नहीं लेकिन हर बार जब आपके घाव पर बेटाडिन दवा लगाई जाती है तो मैं सिहर जाता हूँ।
मैं जानता हूं कि ये दवा घाव के फंगस को हटाने का काम करती है लेकिन दर्द भी तेज करती है कुछ देर के लिए ...इन सब प्रक्रिया में भी आप के चेहरे पर भाव नहीं देखकर आपका दर्द खुद पी लेता हूँ। आपको उठाकर कुर्सी पर नहीं बैठा सकता, क्योंकि बैठते ही आपका बीपी हाई हो जाता है और फिर घंटों मूर्छित पड़े रहते हैं।
आपको स्नान भी नहीं सकता, घाव के डर से। लेकिन इन सबके बावजूद अपना भरम बनाये रखने के लिए आपको घाव सूखने की सबसे ताकतवर दवा बायोसेफ सीवी- 500 देता हूँ कि आप ठीक हो जाएंगे और बेड सोर को हरा देंगे। मैं जानता हूं कि यह सब वक्त का फेर है, जो आपको तंग कर रहा है।
याद है आपको, दसवीं पास करने के बाद जब आपने टाइटन की कलाई घड़ी दी थी तो क्या कहा था? मुझे याद है, आपने कहा था वक्त बड़ा बलवान होता है। वक्त हर दर्द की दवा भी अगले वक्त में देता है। गणित में कम अंक आने पर आप गुस्सा गए थे। आपने कहा था जीवन गणित है और तुम उसी में पिछड़ गए...फिर आपने 12वीं में कॉमर्स विषय लेने को कहा और चेतावनी दी थी कि इसमें पिछड़ना नहीं है। याद है न आपको बाबूजी! मैंने आपके भरोसे को बनाये रखा था तो आपने गिफ्ट में हीरो साइकिल दी थी। फिर दिल्ली भेज दिया, कॉलेज की जिंदगी जीने।
जब भी पैथोलॉजिकल जांच में आपका सोडियम गिरा हुआ और सूगर लेवल हाई देखता हूँ तो मैं खुद चक्कर खा जाता हूँ। इलोकट्रेट इम्बैलेंस आपके लिए अब नई बात नहीं रही लेकिन मैं डर जाता हूं। हमेशा अपने कन्धे पर भार उठाने वाले शख्स को इस कदर लाचार देखकर मेरा मन टूट जाता है। लेकिन तभी आपकी एक चिट्ठी की याद आ जाती है जो आपने मुझे 2003 में भेजी थी दिल्ली के गांधी विहार पते पर। रजिस्ट्रड लिफाफे में महीने के खर्चे का ड्राफ्ट था और पीले रंग के पन्ने पर इंक कलम से लिखी आपकी पाती थी।
आपने लिखा था कि “बिना लड़े जीवन जिया ही नहीं जा सकता। लड़ो ताकि जीवन के हर पड़ाव पर खुद से हार जाने की नौबत न आए।“ आपकी इन बातों को जब याद करता हूँ तो सोचता हूँ कि आप क्यों नहीं अपने घाव से लड़ रहे हैं। आप क्यों हार रहे हैं।
मैं आपको फिर से खड़ा देखना चाहता हूँ। बाबूजी, मुझे आप लेटे हुए अच्छे नहीं लगते। मुझे आपसे कार ड्राइव करना सीखना है। दीदी ने जब कार दी तो पहली बार स्टेयरिंग पर हाथ रखा तो आपकी वो बात याद आई – “जब कार लाओगे तो मैं क्लच- ऐक्सिलेटर-गियर का खेल तुम्हें सिखाऊंगा ....” लेकिन वो भी नहीं हो सका और यही वजह है कि मैं आज भी कार चलाने से झिझकता हूँ। मैं हर बात सबको कह नहीं पाता, बहुत कुछ मन में ही रख लेता हूं। जानता हूं ये ठीक नहीं है लेकिन आदत से मजबूर हूं।
जब भी चनका जाता हूं तो आपका केसरिया रंग का वो दोनों एस्कार्ट ट्रेक्टर याद आ जाता है, जिसे आप हाफ पेंट , जूता और हेट पहनकर खेत में निकालते थे..आप तो देवघर , दरभंगा सबजगह ट्रेक्टर से पहुंच जाते थे या फिर अपनी काले रंग की राजदूत से। कितनी यात्राएं की आपने। याद है न आपको दिल्ली के बसंतकुंज स्थित फोर्टिस अस्पताल में डाक्टर दीपक ने क्या कहा था – आपने ड्राइव बहुत किया है, लंबी दूरी मोटरसाइकिल से तय की है...इतना नहीं चलाना चाहिए था...। जब भी मैं लंबी दूरी बाइक से तय करता हूं तो आप याद आ जाते हैं।
जानते हैं जब आपके लिए व्हील चेयर खरीदकर लाया था तो रास्ते में रूककर खूब रोया था। मैंने कभी भी आपको सहारा लेकर चलते नहीं देखा था ...सहारा देते हुए ही देखा। बिजली के बिछावन पर लेटे देखकर भी मेरा यही हाल होता है। सच कहूँ तो अब डाक्टरों से डर लगता है। डाक्टरी जांच से भय होता है। मैं खुद साउंड एपिलेप्सी का मरीज बन गया..मेडिकल फोबिया का शिकार हो गया हूँ। अस्पताल जाने के नाम पर पसीने छूट जाते हैं। पहले गूगल कर लेता हूं कि फलां रोग का इलाज क्या है...
आप जानते हैं बाबूजी, मेरी एक किताब आ रही है राजकमल प्रकाशन से। आपने कहा था न कि हिंदी में राजकमल प्रकाशन का स्तर ऊंचा है और जब भी लिखना तो उम्मीद रहेगी कि राजकमल से ही किताब आए... बाबूजी, मेरी किताब उसी प्रकाशन से आ रही है। आप यह सुनकर क्यों नहीं खुश हो रहे हैं ? आप सुनिए तो...
चनका में आपकी अपनी एक लाइब्रेरी थी न जहां राजकमल प्रकाशन की किताबें रखने के लिए काठ वाली एक आलमारी थी अलग से! आपने दादाजी के नाम से वह लाइब्रेरी तैयार की थी। मुझे कुछ कुछ याद है। लाइब्रेरी की सैंकडों किताबें आपने बांट दी। आप लोगों को किताब पढ़ाते थे।
एक बार जब मैंने आपसे पूछा कि किताबें जो लोग ले जाते हैं वो तो लौटा नहीं रहे हैं? आपने कहा था- “किताब और कलम बांटनी चाहिए। लोगों में पढ़ने की आदत बनी रहे, यह जरुरी है। देना सीखो, सुख मिलेगा। “ अब जब मेरी किताब की बातें हो रही है तो आप चुप हैं ..इसलिए मैं सबकुछ करने के बाद भी खुद से खुश नहीं हूँ क्योंकि आप मेरे लिखे में गलती नहीं निकाल रहे हैं। आप मेरे आलोचक हैं, प्रथम पाठक हैं.. आप समझ क्यों नहीं रहे हैं।
किताब को लेकर जब भी राजकमल प्रकाशन के संपादकीय निदेशक सत्यानंद निरूपम से बात होती है तो मैं अपना दुःख छुपा लेता हूँ। मैं उन्हें कैसे बताऊँ अपने भीतर की पीड़ा...एक एक शब्द लिखते वक्त अंदर का संत्रास झेलता हूँ। यह दुःख मैं शेयर नहीं कर पा रहा हूँ ...किसी से नहीं। जब भी सत्यानन्द निरूपम से किताब आदि को लेकर बात करता हूँ तो बस मुस्कुरा देता हूँ ताकि अंदर की पीड़ा और आंसू बाहर न आ जाए।
सत्यानंद निरुपम सर को कैसे कहूँ कि बाबूजी के लिए ही लिखता रहा हूँ लेकिन अबकी बार वे कुछ नहीं समझ पा रहे हैं। मैं भीड़ में अकेला हो चला हूँ। फिर सोचता हूँ कि शायद मन के तार सत्यानंद से कभी न कभी जुड़ जाएंगे तो उन्हें सब बातें बताऊंगा।
बाबूजी, आपको तो रवीश की रिपोर्ट बहुत पसंद है न। आपने तो उसीके लिए ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में केबल का तार लगाया था ..याद है न। अयोध्या पर रवीश की एक रपट आई थी तो आपने फोन किया था कि रिपोर्टिंग को इस अंदाज में करना चाहिए। बाबूजी, हाल ही में रवीश ने अपने रिपोर्ट में मेरा लिखा पढकर सुनाया था, दुःख की ही घड़ी में लेकिन सुनाया था। आपने उसे भी नहीं देखा...क्यों ..? रवीश आपका हालचाल पूछते हैं और आप है कि जवाब भी नहीं देते। कुछ तो कहिये....
बाबूजी, सुशांत झा आपको याद हैं न ! विरंची जी के बेटे, मधुबनी वाले। आप उनकी बात खूब सुनते थे न जब वे पूर्णिया आये थे। वे भी आपका हाल चाल लेते हैं। आपने उनके बारे में कहा था कि इनके संपर्क में रहिये, इनके पास इतिहास - भूगोल की कथाएँ हैं। इनसे बहुत कुछ सीखने की बात आपने कही थी। हां बाबूजी , मैं सुशांत भाई के संपर्क में रहता हूँ, उनसे सीखता रहता हूं। वे तो आपके चनका के बारे में भी बात करते रहते हैं। मेरे सभी दोस्त आपके बारे में पूछते रहते हैं लेकिन आप है जो खामोशी का चादर ओढ़ लिए हैं।
जानते हैं आपकी खामोशी की वजह से है कि मैं परेशान रहता हूँ। जबसे आपने बिछावन पकड़ा है, कहां कुछ कहा मुझसे। अब तो साल होने जा रहे हैं। कुछ तो बोलिए..डांट ही लगाइए..लेकिन कुछ तो कहिए।
एक बात जानते हैं, इस बार आंधी बारिश के तांडव में भी आपके हाथ से लगाये लीची और कटहल गाछ फल से लदे हैं। दोपहर में गाम के बच्चे उसमें लूदके रहते हैं , चमगादरों की तरह ...मैं बस उन्हें हँसते खिलखिलाते देखता रहता हूँ। आप सबके लिए कुछ न कुछ लगाकर लेट गए हैं ..अब उठिए और मुझे भी यह तरकीब सीखा दीजिये न बाबूजी.....आप मेरी बात सुनिए न ...।
Friday, May 08, 2015
जब शहर हमारा सोता है...
मुखर्जी नगर और गांधी विहार से मन के तार अचानक जुड़ गए हैं। बत्रा सिनेमा से कुछ कदम आगे आईसीआईसीआई बैंक का एटीएम और उसके सामने मैंगो-बनाना सैक वाले सरदार जी का स्टॉल याद आ रहा है, पता नहीं ये दोनों अब वहां हैं या नहीं और हैं तो किस रूप में।
रोशनी में डूबे मुखर्जीनगर में हम शाम ढलते ही एक घंटे के लिए आते थे। इधर –उधर कभी कभार घुमते थे। दरअसल हम आते थे गर्मी में सरदार जी के स्टाल पर जूस पीने और उसके सामने चारपाई पर बिछी पत्र पत्रिकाओं में कुछ देर के लिए खोने के लिए।
20 रुपये में एक ग्लास जूस पीते थे और फिर मुफ्त में हफ्ते की हर पत्रिका पर नजर घुमा लेते। उस वक्त नौकरी नहीं थी, पढ़ने के लिए पैसे मिलते थे। इसलिए खर्च को लेकर बेहद सतर्क रहना पड़ता था। कथादेश पत्रिका से मेरा पहला इनकाउंटर उसी चारपाई वाले बुक स्टॉल पर हुआ था।
आज पता नहीं एक साथ इतना कुछ क्यों याद आ रहा है ? सचमुच मन बड़ा चंचल होता है। मुखर्जीनगर का वो चावला रेस्तरां याद आ रहा है जहां बिहार के होस्टल वाली जिंदगी से निकलने के बाद पहली दफे चाइनीज व्यंजनों का मजा उठाया था। उस वक्त लगा कि यह रेस्तरां नहीं बल्कि पांच सितारा होटल है। हम पहली बार किसी रेस्तरां में खाए थे।
चावला रेस्तरां के बगल से एक गली आगे निकलती थी। कहते थे कि इस गली में इंडियन सिविल सर्विसेज का कारखाना है, मतलब कोंचिग सेंटर । उस गली में खूब पढ़ने वाले लोगों का आना जाना हमेशा लगा रहता था। ऐसे लोगों को हम सब 'बाबा' कहते थे उस वक्त। पता नहीं अब क्या कहा जाता है :)
मैं इस वक्त खुद को 2002 यानि की 13 साल पीछे ले जाकर खड़ा कर दिया है। फेसबुक का वह काल नहीं था..वो तो बस मौखिक काल था..हम आमने सामने बैठकर चैट करते थे तब :)
मैं याद करता हूं तो स्मृति में मुखर्जी नगर और गांधी विहार के बीच एक पुलिया आ जाती है। बदबूदार पुलिया। लेकिन उस बदबू में भी अपना मन रम जाता था। पूरे दिल्ली में उस वक्त केवल मेरे लिए, एक वही जगह थी जहां पहुंचकर मैं सहज महसूस करता था।
दरअसल उस पुलिया पर मुझे गाम के कोसी प्रोजेक्ट नहर का आभास होता था। भीतर का गाँव वहां एक झटके में बाहर निकल पड़ता और मैं मन ही मन खुश हो जाता था।
इस वक्त मुझे 81 नंबर की बस याद आ रही है, फटफट आवाज करते शेयर वाले ऑटो, रंगीन रिक्शे...ये सब आँखों के सामने तैर रहे हैं इस वक्त। मैं अब इंदिरा विहार की तरफ पहुँच जाता हूँ वहां एक बस स्टॉप था, जिसका नाम था- मुखर्जी नगर मोड़। मैं उस मोड़ पर 912 नंबर की बस का इंतजार करता था, सत्यवती कालेज जाने के लिए।
बसों के नंबर से उस वक्त हम दिल्ली को जीते थे। तब मेट्रो नहीं आया था। धुआं उड़ाती बसों का आशियाना था दिल्ली। मेरा वैसे तो अंक गणित कमजोर रहा है लेकिन बस के अंकों में कभी हम मात नहीं खाए :)
कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मुखर्जी नगर के आसपास का इलाका हमारा गांव हो गया था, जिसके मोहल्ले, गलियां, पार्क .. ये सब मेरे लिए गाम के टोले की तरह हो चले थे। सब जगह अपने इलाके के लोग मिल जाते। इसलिए उस शहर ने कभी भी मेरे भीतर के गांव को दबाने की कोशिश नहीं की क्योंकि हम बाहर-बाहर शहर जीते थे और भीतर-भीतर गांव को बनाए रखने की पूरी कोशिश करते हुए अंचल की सांस्कृतिक स्मृति को मन की पोथी में संजोते हुए शहर को जी रहे थे...
Saturday, May 02, 2015
इंटरनेट की दुनिया में बस्ती-बसाती गांव की कहानी
इंटरनेट सेवा प्रदान करने वाली विभिन्न कंपनियों का नेटवर्क अब गांव में भी पहुंच चुका है। ऐसे में हम आपको बिहार के एक ऐसे गांव की कहानी बताने जा रहे हैं, जिसकी अपनी खुद की एक वेबसाइट है। आइए, हम आप बिहार के उस ऐतिहासिक गांव की यात्रा करें, जो देश-विदेश के लोगों को वेबसाइट के जरिए जोड़ने का काम कर रही है।
वैसे तो सूचना संचार के इस डिजीटल युग मे वेबसाइट बनाना कोई बड़ा काम नहीं है और न ही कोई नई बात लेकिन गांव के लिए इस तरह की बातें करना सचमुच में एक क्रांतिकारी कदम है। वो भी एक ऐसे गांव के लिए जो हर साल कोसी की विभीषिका को झेलता है, जिसके लिए बाढ़ शब्द एक बुरे सपने की तरह है। उस गांव का नाम है- महिषी।
बिहार के सहरसा जिला स्थित महिषी गांव की अपनी वेबसाइट है। वैसे तो मंडन मिश्र की जन्मस्थली होने के कारण महिषी किसी पहचान का मोहताज नहीं है। गौरतलब है कि मध्यकाल के आध्यात्मिक चिंतन के पुरोधा माने जाने वाले मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ के लिए करीब बारह सौ वर्ष पूर्व जगतगुरु शंकराचार्य यहाँ पहुंचे थे।
अतीत में और पीछे जाएँ तो पाते हैं कि मुनि वसिष्ठ ने हिमालय की तराई तिब्बत में उग्रतारा विद्या की महासिद्धी के बाद धेमुड़ा (धर्ममूला) नदी के किनारे स्थित महिष्मति (वर्तमान महिषी) में माँ उग्रतारा की मूर्ति स्थापित की थी।
महिषी की एतिहासिक बातों की जानकारी दुनिया के दूर दराज के लोगो तक पहुंचे इसके लिए इंटरनेट के जरिये महिषी पर आधारित वेबसाइट का निर्माण वर्ष 2011 मे किया गया था। महिषी डॉट ओर्ग के होम पेज की खुलते ही माँ उग्रतारा की लोगो को दर्शन होतें हैं जो कहीं न कहीं महिषी की झलक प्रदान करता है। महिषी का इतिहास, कैसे महिषी देश के विभिन्न शहरों से आयें कहाँ ठहरे उसकी विस्तृत जानकारी वेबसाइट विजिटर के लिए है।
अमित कुमार चौधरी बताते हैं की वेबसाइट को देख कर राज्य के बाहर से लोग उनसे ईमेल के जरिए संपर्क कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली के एक सज्जन ने महिषी की देवी माँ उग्रतारा के नाम प्रसाद चढाने की इच्छा जाहिर की। वहीं दूसरी ओर वेबसाइट के कॉडिर्नेटर अमित आनंद की इच्छा है कि इस वेबसाइट को लोगबाग एक सन्दर्भ वेबसाइट के रूप में लें। उन्होंने बताया कि वे चाहते हैं कि गांव की प्राचीन जानाकरियां लोग हासिल करें और इस पर शोध हो। वे गांव को अंतराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर लाना चाहते हैं।
गौरतलब है कि आज से चार-पांच साल पूर्व तक जब भी बिहार के महिषी इलाके की चर्चा आती थी तो लोगों के जेहन में जल-प्रलय की भयावह तस्वीर उभर आती है, जिसका सामना पूर्वोत्तर बिहार के कुछ जिले करते आए हैं। 2008 के प्रलयंकारी बाढ़ की तस्वीरें आज भी हमें डरा देती है। लेकिन यह क्षेत्र अपने इतिहास में न जाने कितने गौरव समेटे है पर इसे पुनर्स्थापित करने की सुध किसी को नहीं है।
महिषी का एक स्वर्णिम पक्ष मध्यकाल के एक ऐसे विद्वान मंडन मिश्र की जन्मभूमि होना भी है, जिनके विचारों पर आज भी शोध हो रहे हैं। महिषी गांव के के नाम पर विधानसभा क्षेत्र का नाम भी है, लेकिन परिसीमन करने वालों ने महिषी विधानसभा में महिषी गांव को शामिल नहीं किया।
हिंदी-मैथिली के प्रसिद्ध साहित्यकार राजकमल चौधरी का जन्म महिषी में ही हुआ था। इसके अलावा नई पीढ़ी में भी इस गांव का साहित्य और समाज के अन्य क्षेत्रों में दखल है। महिषी कहानी कहते हुए मुझे देश के गांवों को पत्रकारिता के केंद्र में लाने के लिए मशहूर पत्रकार पी. साइनाथ की भी याद आ रही है। दरअसल उन्होंने इस साल की शुरुआत में एक पहल की है। साईंनाथ ने ग्रामीण पत्रकारिता के अपने वर्षों के अनुभव के बाद एक वेबसाइट शुरू की। वेबसाइट का नाम रखा है- परी (पीपल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया) यानी ग्रामीण भारत का जन संग्रहालय। ऐसे में महिषी गांव का इंटरनेट की दुनिया में सक्रिय रहना डिजीटल युग के लिए सुखद खबर है और मैं इसे साईंनाथ की परी से जोड़कर देखने लगा हूं।
Thursday, April 30, 2015
एक किसान की कहानी, रवीश कुमार की जुबानी
किसान गिरीन्द्र का पूरा ब्लॉग पढ़ें
मैं गिरीन्द्र। दो साल पहले तक दिल्ली और कानपुर में खबरों की दुनिया में रमा रहने वाला एक शख्स, जिसके लिए खबर की दुनिया ही रोजी रोटी थी, लेकिन उसके भीतर अपना एक गांव था, जिसमें रेणु की एक बस्ती थी...उनका मैला आंचल था...परती परिकथा थी।
उसी गांव ने मुझे महानगरीय जीवन से कोसों दूर अपनी परती जमीन की ओर ले जाने का काम किया और पेशे से पत्रकार गिरीन्द्र पहुंच गया सूबा बिहार के पूर्णिया जिला। अपने गाम-घर। खेती बारी करने। वही पूर्णिया जिला, जो इन दिनों तूफान की तबाही के कारण आप लोगों के जेहन में है। जहां के बारे में फणीश्वर नाथ रेणु कहते थे- आवरन देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान.. । यह सब एक झटके में नहीं हुआ था, इसके पीछे मन से हमने पांच साल तक लड़ाई लड़ी। तब जाकर मन राजी हुआ, गांव लौटने के लिए।
अब तो किसानी करते हुए दो साल हो गए हैं, मतलब कुल जमा 730 दिन। गिनती के इन दिनों में हमने ढेर सारे उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन साल 2015 मेरे जैसे किसानी कर रहे लोगों की परीक्षा ले रहा है। मार्च के अंत में हमने बिन मौसम बारिश का तांडव देखा। गेंहू और सरसों की फसलों को आंखों के सामने तबाह होते देखा, लेकिन पिछले मंगलवार को यानी 21 अप्रैल को प्रकृति की मार ने हमारी रही सही कमर भी तोड़ दी।
तूफान की चपेट में हमने सब कुछ गंवा दिया। मक्का की फसल चौपट हो गई। कहते हैं कि पूर्णिया जिले में घासफूस के घर में रहने वाले किसान मक्का की फसल से पक्का मकान का सफर तय करते हैं। खूब आमदनी होती है इसकी खेती से, लेकिन वक्त के आगे किसी की नहीं चलती है।
मंगल की रात आधे घंटे का तूफान ने हमारी जिंदगी को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है, जिसके आगे घुप्प अंधेरा है। पिछले चार दिनों से बिजली हमसे दूर है। बिजली जो रोशनी देती है, वह भी हमसे दूर हो गई है। पता नहीं किसानी की किस्मत का गणित जोड़ घटाव करते हुए कैसे सब कुछ बांट देता है। गणित के उस सवाल की तरह जिसमें भाग करते हुए हमारे हिस्से में केवल शून्य ही नसीब होता है। शायद यही जीवन है। किसानी करते हुए हमने जीवन का इतना उलझा गणित नहीं देखा था।
कल तक जिस खेत में मक्के का जवान पौधा अपनी जवानी पर इठला रहा था, उसे हमने अपनी नजरों के आगे धरती मैया के गोद में रोते बिलखते देखा। खेती करते हुए हमने जाना कि हर फसल हमारे लिए संतान है। धान मेरे लिए बेटी की तरह है तो मक्का मेरा बेटा है, जो मुझे साल भर का राशन पानी देता है। उस मक्के को जब मैंने खेत में लुढके देखा तो मन के सारे तार एक साथ टूट गए।
जब मैं वातानुकूलित कैबिन वाले ऑफिस में पत्रकारिता किया करता था तो लंच टाइम में हम गांव देहात की बातें करते थे। आह ग्राम्य जीवन! जैसे जुमले से गांव घर की बातें करते थे। हमारे लिए गांव उस वक्त एक ऐसी दंतकथा की तरह था, जिसमें केवल सुख ही सुख होता है। हम अंचल की सांस्कृतिक स्मृति में हरी दूब की तलाश किया करते थे, लेकिन जब किसानी करने धरती पर उतरे तो जान गया कि इस धरती पर किसानी ही एक ऐसा पेशा है जहां हम सौ फीसदी प्रकृति पर निर्भर होते हैं और यहां सुख की तलाश में दुख से रोज मिलनाजुलना होता है।
प्रकृति की बदौलत दौलत बनाते हैं और उसी की बदौलत दौलत को पानी में बहते भी देखते हैं। गाम की सुलेखा काकी का आंगन मंगल की रात तबाह हो गया। आंगन के चूल्हे में रात में रोटी पकी थी, दूध उबला था। खाने के बाद सब जब सोने गए तभी हवा का जोर बारिश के संग तबाही की पटकथा लिखकर आ चुका था और आंगन-घर सब कुछ उड़ाते हुए निकल गया और छोड़ दिया सुलेखा काकी को बस रोने के लिए।
सूबे के मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से ऊपर से देखकर निकल लिए। मुआवजा की मौखिक बारिश करते हुए वे शांत-चित्त मुद्रा में अखबारों –चैनलों पर अवतरित हुए लेकिन सुलेखा काकी जैसे लोगों का दुख बांटने जमीन पर कोई नहीं आना चाहता। गाम के अलाउद्दीन चच्चा कहते हैं-“ तुम तो खेती किसानी करते हुए लिखते पढ़ते भी हो न! तब तो तुम्हें पता होना चाहिए कि सूबे में चुनाव होने वाले हैं। अब तो तूफान भी सियासी करने वालों के लिए वक्त पर आने लगा है...। “ इतना कहने के बाद चच्चा की आंखें भर आईं और वे मुझे अपनी बंसबट्टी दिखाने लगे जहां बांस उखड़े पड़े हैं..।
किसानी करते हुए हम सुनहरे भविष्य का सपना देखते रहते हैं। फसल बेचकर जीवन की गाड़ी को और आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं। देखिए न, इस बार उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी तो बाबूजी को एक बार फिर दिल्ली ले जाएंगे। वहां किसी अनुभवी न्यूरो सर्जन से दिखाएंगे। इस आशा के साथ कि वे फिर खड़े हो जाएं और मुझे समझाएं कि फलां खेत में आलू लगाना तो पूरब के खेत में गरमा धान। बाबूजी की तबीयत को लेकर मैं खुद को एक भरम में रखता आया हूं इस आशा के साथ कि वह ठीक हो जाएंगे। पिछले दो साल से मक्का की फसल मेरे उस भरम को मजबूत करता रहा है, लेकिन इस बार वो भरम भी टूट गया।
ये अनुभव केवल मेरा नहीं बल्कि मेरे जैसे सैंकड़ों किसानों का होगा, जिसने इस बार तूफान की तबाही को भोगा है। कल रात रेडियो पर सुना कि लोकसभा में शून्यकाल के दौरान संसद में तूफान से हुई तबाही का मुद्दा छाया रहा। मेरे जैसे किसान की गुजारिश बस इतनी है कि किसानी-मुद्दे को राजनीति की किताब का कवर पेज न बनाया जाए। पूर्णिया और प्रभावित जिले के किसानों तक सहायता पहुंचे।
उस किसान के बारे में दिल्ली में बैठे लोग सोचने की कोशिश करें, जिनके घर में मातम फैला है, उन घरों के बारे में सोचें जहां कि छत हवा में उड़कर कहीं दूर चली गई और बिलखते बच्चे धूप में रो रहे हैं। यह सब आंखों से देख रहा हूं। कैमरे का लैंस तस्वीरें लेने से मना कर रहा है।
मन के भीतर बैठा खुद का संपादक दुख की मार्केटिंग करने से मना कर रहा है, वह कहता है शब्दों के जरिये लोगों तक अपनी बातें पहुंचाओ। शब्द की ताकत ऐसी होती है कि वह दिल को छू लेता है। मन की बात सुनकर मैं सहम जाता हूं और एक नजर फिर अपने खेत की ओर देता हूं और फिर मुड़कर बिछावन पर लेटे बाबूजी को देखने लगता हूं। सोचता हूं कि यदि वे ठीक रहते तो मुझे समझाते- “डरो मत, लड़ो। किसानी करते हुए लड़ना पड़ता है और फिर वे कुछ मुहावरा सुनाते और कहते कि जाओ घुमो और तबाही के मंजर को महसूस करो ताकि तुम्हें अपना दुख कम दिखने लगे क्योंकि तुमसे भी ज्यादा क्षति और लोगों की हुई है।“
किसानी करते हुए खुद का दुख मैं शब्दों के जरिये बयां करता हूं। इस बार की तबाही मुझे सुखर कर रही है। तबाही का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। किसानी के मुद्दों से राजनीति की रोटी सेंकने वाले लोगों से डर भी लग रहा है। मुआवजा का बंदरबांट होना अभी बाकी है। लोगों तक मुआवजे की राशि कब पहुंचेगी या कितनी पहुंचेगी, ये भी एक कहानी होगी। हम सब उस कथा के चरित्र होंगे, जिसे बाद हर कोई हमें भूला देगा। लेकिन याद रखिए, रोटी के लिए गेहूं , चावल के लिए धान और मल्टीप्लेक्स में आपके पॉपकार्न के लिए मक्का हम सब ही उपजाते हैं। यदि एक आंधी हमें बरबाद कर सकती है तो याद रखिए एक अच्छा मानसून हमें बंपर फसल भी देगा। हम हार नहीं मानेंगे। हम जानते हैं कि हमारे हाथ में केवल बीज बोना है। फसल की नियति प्रकृति के हाथों में हैं। आंधी और बारिश की मार से हम हार नहीं मानेंगे। सरकारी मुआवजा हमारे बैंक-खातों में कब पहुंचेगा ये तो हमें पता नहीं, लेकिन इतना तो जरूर पता है कि अगली फसल के लिए हमें खूब मेहनत करनी है। मौसम की मार सहने के बाद हिम्मत जुटाकर फिर से खेतों में लग जाना है। केवल अपने और परिवार के पेट के लिए नहीं बल्कि आप सबों के डाइनिंग टेबल के लिए भी।
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