Saturday, September 24, 2022

पितृपक्ष और बाबूजी

पितृपक्ष शब्द ही खुद में एक शास्त्र है। इस दौरान हम अपने पुरखों को याद करते हैं, उनकी स्मृति में कुछ न कुछ जरूर करते हैं। मेरे लिए पितृपक्ष शक्ति पूजा की तरह है। मेरे लिए पितृपक्ष की  अलग अलग तिथि पूर्वजों का आशीष है। 
बाबूजी हर दिन तर्पण करते थे, वे पुरखों को याद करते थे। तर्पण की परम्परा हमने बाबूजी से ही सीखी। वे नियम से तर्पण करते थे। शास्त्रीय - धार्मिक पद्धति के अलावा वे एक काम और किया करते थे, वह था अपने पूर्वजों के बारे में बच्चों को जानकारी देना। दादाजी की बातें वे बड़े नाटकीय अन्दाज़ में सुनाते थे।  वे उसमें वे शिक्षा, व्यवहार के संग खेती- बाड़ी को जोड़ते थे। सबसे बड़ी बात वे किसी की भी निंदा नहीं करते थे। उनके भीतर जो चलता हो लेकिन बाहर वे किसी की निंदा करने से बचते थे। अपने किये के प्रचार से वे हमेशा दूर रहे। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि हमने ये किया.. वे सबकुछ 'अपने पिता का किया' कहते थे। 

पितृपक्ष की परंपरा को समझने- बूझने के दौरान आज बाबूजी की बहुत याद आ रही है। लगता है वे आसपास कहीं टहल रहे हैं। हर दिन जब संघर्ष का दौर बढ़ता ही जा रहा है और सच पूछिए तो चुनौतियों से निपटने का साहस भी बढ़ता ही जा रहा है, ऐसे में लगता है कि बाबूजी ही मुझे साहस दे रहे हैं। अक्सर शाम में पूरब के खेत में घूमते हुए लगता है कि वे सफेद धोती और बाँह वाली कोठारी की गंजी में मेरे संग हैं।

लोग पितृपक्ष में परंपराओं के आधार पर बहुत कुछ करते हैं, मैं कोई अपवाद नहीं। लेकिन मैं उन चीज़ों से मोहब्बत करने लगा हूं, जिसे बाबूजी पसंद किया करते थे। खेत, पेड़-पौधे, ढ़ेर सारी किताबें, डायरी में लिखा उनका सच और उनकी काले रंग की राजदूत।

बाबूजी की पसंदीदा काले रंग की राजदूत को साफ़ कर रख दिया है, साइड स्टेण्ड में नहीं बल्कि मैन स्टेण्ड में। वे साइड स्टेण्ड में बाइक को देखकर टोक दिया करते थे और कहते थे : " हमेशा सीधा खड़े रहने की आदत सीखो, झुक जाओगे तो झुकते ही रहोगे..."

सच कहूं तो अब अपने भीतर, आस पास सबसे अधिक बाबूजी को महसूस करता हूं। पितृपक्ष में लोगबाग कुश-तिल और जल के साथ अपने पितरों को याद करते हैं। लेकिन मैं अपनी स्मृति से भी अपने पूर्वजों को याद करता हूं क्योंकि स्मृति की दूब हमेशा हरी होती है और इस मौसम में सुबह सुबह जब दूब पर ओस की बूँदें टिकी रहती है तो लगता है मानो दूब के सिर पे किसी ने मोती को सज़ा दिया है।

आज बाबूजी से जुड़ा सबकुछ याद आ रहा रहा है। उनका अंत कष्ट से भरा रहा। जीवन के अंतिम दो साल मानो वे कष्ट के हर रंग को देखना चाहते थे। पितृपक्ष में मुझे बाबूजी की दवा, बिछावन, व्हील चेयर, किताबों वाला आलमीरा...सबकुछ याद आता है, मेरे लिए स्मृति भी एक तरह का तर्पण ही है। 

मैं हर दिन सबकुछ उन्हें अर्पित करता हूं। वे मेरे लिए एक जज्बाती इंसान थे लेकिन यह भी सच है कि वे ऊपर से एक ठेठ-पिता थे,  जिसने कभी अपना दुख साझा नहीं किया, जिसने अपनी पीड़ा को कभी सार्वजनिक नहीं होने दिया।

आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्त्वपोऽञ्जलिम्।।
ॐ पितरस्यस्तृप्यन्ताम्।।




Saturday, August 13, 2022

जीवन चलता ही रहता है!

जीवन चलता ही रहता है ! लेकिन स्मृति में बिछड़ गए लोग बने रहते हैं, हर मोड़ पर वह मुस्कुराते मिल जाते हैं। ऐसे लोग हमेशा संग में बने रहते हैं।

स्मृति ऐसी चीज है, जिसमें हम अपने को खोज ही लेते हैं, कहीं भी! कहीं बजते किसी गीत के बोल में, किसी पेंटिंग - स्केच में तो किसी बहते पानी में... 

बिछड़े लोग कुछ न कुछ सीख देकर ही बिछड़ते हैं। बिछड़ कर वे गुरु की माफिक हो जाते हैं, जो दुःख भी देते हैं तो कुछ सिखाने के लिए ही। उम्र से परे हो जाते हैं बिछड़े लोग, मानो आसमां में उमड़-घुमड़ रहे हों। उनका बरस जाना हमें भीतर से भींगो देता है। आँख जब भर आती है तो लगता है, कन्धे पे हाथ दिये वह मुस्कुरा रहा हो... 
किसी के चले जाने का दुःख कोई बयां नहीं कर सकता। हम दुःख में अपने बिछड़े को याद करते रोते हैं, दिन काटते हैं लेकिन आसपास सबकुछ चलता रहता है, तेज़ रफ्तार में...

जीवन यही है! हमारा दुःख हमारा होता है, हमें ही ख़ुद को संभालना होता है, आसपास सबकुछ चलता रहता है, बहता रहता है, गंगा नदी की तरह, जिसमें सबकुछ है, पत्थर भी, माटी भी,  पूर्णिमा भी अमावस भी।

Wednesday, July 20, 2022

खेत उजड़ता दिख रहा है

खेत उजड़ता दिख रहा है। बारिश इस बार धरती की प्यास नहीं बुझा रही है। डीजल फूँक कर जो धनरोपनी कर रहे हैं और जो खेत को परती छोड़कर बैठे हैं, दोनों ही निराश हैं।  किसानी कर रहे हमलोग परेशान हैं। फ़सल की आश जब नहीं दिख रही है, तब ऋण का बोझ हमें परेशान कर देता है। नींद ग़ायब हो जाती है। खेती नहीं कर रहे लोग ऐसे वक़्त में जब ‘क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए’ का ज्ञान देते हैं तो लगता है कि उन्हें कहूँ कि बस एक कट्ठा में खेती कर देख लें। 
दरअसल किसानी का पेशा प्रकृति से जुड़ा है, लाख वैज्ञानिक तरीक़े का इस्तेमाल कर लें लेकिन माटी को तो इस मौसम में बारिश ही चाहिए। 
सुखाड़ जैसी स्थिति आ गयी है। 

डीज़ल फूँक कर धनरोपनी नहीं कराने का फ़ैसला डराता भी है लेकिन क्या करें ? सरकार तमाम तरह की बात करती है, योजनाएँ बनाती हैं लेकिन किसान को मज़बूत करने के बजाय उसे मजबूर बना रही है।

योजना का लाभ उठाने के लिए हमें इतनी काग़ज़ी प्रक्रियाओं से जूझना पड़ता है कि हम हार जाते हैं। डीज़ल अनुदान लेने के लिए जिस तरह की प्रक्रिया प्रखंड-अंचल मुख्यालय में देखने को मिलती है तो लगता है इससे अच्छा किसी से पैसा उधार लेकर खेती कर ली जाए। यही हक़ीक़त है। 

किसान बाप के बेटे-बेटी को, जिसकी आजीविका खेती से चलती है उसे अपनी ही ज़मीन  लिए बाबू सब के दफ़्तरों का चक्कर लगाना पड़ता है। 

बारिश के अभाव ने मन को भी सूखा कर दिया है। किसानी का पेशा ऐसे समय में सबसे अधिक परेशान करता है।

उधर, मानसून सत्र को लेकर मुल्क मगन है और इधर हम धनरोपनी और पानी का रोना रो रहे हैं। हमारी समस्या में ग्लैमर नहीं है, हमारी परेशानी में ख़बर का ज़ायक़ेदार तड़का नहीं है, हमारी बात न्यूज़रूम की टीआरपी नहीं है, हमारे सूखते खेत सरकार बहादुर के लिए वोट का मसाला नहीं है, ऐसे में हम जहाँ थे, वहीं हैं। हम रोते हैं तो ही हुक्मरानों को अच्छा लगता है। हमारा रोना सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए डाइनिंग टेबल का रायता है। 

वैसे बारिश आज नहीं तो कल आएगी...फिर एक दिन हम बाढ़ में डूब जाएँगे तब अचानक हवाई दौरा शुरू हो जाएगा...2024 की तैयारी शुरू हो जाएगी।

Friday, July 15, 2022

बारिश के इंतज़ार में

बारिश से भींगी माटी को देखने के लिए इस बार हम सब तरस गए हैं। खेत की आँखें लगभग सूख गई है, उस माँ की तरह, जिसने जीवन में बस दुख भोगा हो। धनरोपनी तो जैसे तैसे लोगों ने करवा ली है लेकिन आगे का एक एक दिन अब पहाड़ लगता है। 

खेतिहर की दुनिया अजीब होती है, हमारे लिए बारिश सुख भी है और दुख भी! हम बारिश को समझ ही न सके। कहीं बारिश से लोग तबाह हो रहे हैं तो कहीं हम जैसे लोग आसमां के सामने याचक बने खड़े हैं। मौसम विज्ञान जो कहे लेकिन किसान का मन अब कहने लगा है कि आगे विपत्ति है। 

हमारे इधर धान की खेती वैसे भी अब अल्पसंख्यक का दर्जा पा चुकी है। लोगबाग अन्य नकदी फसलों पर निगाहें टिकाए रखते हैं। लेकिन इस मौसम में खेत को देखकर लगता है और कितने दिन बिन पानी के.... खेत में रेखाएँ इस कदर दिख रही है मानो हथेली की रेखाएँ फट गई है! सचमुच रेखाओं का खेल है मुकद्दर!

Sunday, April 24, 2022

कथाकार अखिलेश

कुछ लोग होते हैं जो शब्दों के जरिये जीवन में आते हैं और फिर वे पानी की तरह जीवन में रच बस जाते हैं। ऐसे लोग अभिभावक कम, साथी अधिक जान पड़ते हैं। ऐसे लोगों के शब्दों में स्मृतियाँ होती है, ऐसे लोग जब लिखते हैं तो उनके साथ उनकी पूरी दुनिया चली आती है। स्मृतिहीनता के इस दौर में ऐसे लोग बहुत कम नज़र आते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि ऐसे लोग कमाल के किस्सागो होते हैं। मेरे लिए कथाकार अखिलेश ऐसे ही लोग हैं, जिनमें लोक रचा- बसा है। 
आज अपने शहर में अखिलेश जी से मुलाकात हुई। एक आत्मीय मुलाकात। उन्हें पहले मंच पर सुनने का सुख मिला फिर उनके संग लंबी गुफ्तगू हुई। 

वह मंच पर जो हैं, वही आम बातचीत में भी।पहले बात मंच की। अखिलेश जी ने वैसे तो कई बातें कही लेकिन मैंने उनकी चार बातों को मन में रखने की कोशिश की, जिसके आसपास इन दिनों हम सब भटक रहे हैं। 

राष्ट्र और देश की बात करते हुए अखिलेश जी ने कहा कि देश एक सार्थक शब्द है। उनके इस वक्तव्य पर लंबी बात हो सकती है। इसके बाद उन्होंने कहा कि विवेक वैश्विक होनी चाहिए। ऐसे दौर में जब विवेक के दायरे को हम सब एक परिधि में घेरते जा रहे हैं, अखिलेश जी उसे बन्धन मुक्त करने की बात कर रहे हैं। तीसरी बात, जो उन्होंने कही वह है - आभासी यथार्थ। उन्होंने कहा कि हम सब आभासी यथार्थ देखते हैं स्मार्टफोन के जरिये, स्क्रीन के जरिये। ऐसे में जरूरत है कि हम मूल से जुड़ें, माटी से जुड़ें।और उनकी चौथी बात जिसने मुझे  आकर्षित किया, वह है नया समाज और नई समझ। कथाकार और संपादक अखिलेश कहते हैं कि नये समाज को नई समझ के साथ सामने रखने की जरूरत है। 

ये तो हुई मंच की बात। कार्यक्रम के बाद अखिलेश जी से बात करते हुए लगा कि एक कथाकार इस बदलते वक्त में बदलाव को महसूस करना चाहता है। वे गाम घर, मौसम, किसानी और शहर और गाँव के बीच मिटते फासले को समझने की कोशिश में हैं। उनके साथ टहलते- बतियाते अहसास हुआ कि लेखन स्मृतियों और अनुभवों का मोक्ष है। और दूसरी तरफ यह कथाकार की भी मुक्ति है।

इस किस्सागो कथाकार का संसार स्मृतियों से भरा पड़ा है। उनको सुनते हुए लगा कि अखिलेश जी का संस्मरण अलग ही मिजाज का है, किसी फलदार वृक्ष की तरह। उन्हें सुनते हुए लगा कि वे स्मृतियों और अनुभवों को बंधन में बांध देते हैं। वे एक किताब की तरह हैं, जिसमें न जाने कितने किस्से, लतीफे, हिदायतें और आपबीती के पृष्ठ हैं। वे एक ऐसे कथाकार हैं, जिनके पास व्यक्ति को भी देखने का नजरिया है और साथ ही खेत और तालाब को भी! 

Tuesday, March 08, 2022

जीवन

सत्य को स्वीकारना साहस का काम है, क्योंकि सत्य 'क़ट्टा' है, चल गया तो चल गया। नहीं चला तो...! ऐसे में सत्य को स्वीकारना सबसे बड़ा साहस  है और हाँ, इस साहस का प्रदर्शन नहीं होता है, बस मन से हो जाता है वैसे ही जैसे क़ट्टा चल जाता है। 

कुछ लोगों के जीवन को देखता हूं तो "साहस" का अहसास होने लगता है। जिसके पास कुछ भी नहीं है, उसीसे जीवन में आनंद हासिल करने का पाठ पढ़ने को मिले तो लगता है- "धत्त, हम तो नाहक ही परेशान थे अबतक। ये सबकुछ तो माया है।"

यह सब टाइप करते हुए कबीर का लिखा मन में बजने लगता है- “माया महाठगिनी हम जानी ..निरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी.....” ठीक उसी पल मन के रास्ते पंडित कुमार गंधर्व की भी आवाज भी कानों में गूंज लगती है- “भक्तन के भक्ति व्है बैठी, ब्रह्मा के बह्मानी…..कहै कबीर सुनो भाई साधो, वह सब अकथ कहानी”

कभी कभी लगता है कि जीवन में कोई कथा संपूर्ण होती है क्या? इस दौरान मुझे जीवन आंधी के माफिक लगने लगती है, सबकुछ उड़ता नजर आने लगता है।

जब मेरे बाबूजी सक्रिय रूप से गाम - घर किया करते थे तो उस वक्त कई लोग उनके आसपास रहते थे, आते- जाते रहते थे। उनकी बैठकी में एक व्यक्ति जीप से अक्सर आया करते थे, खूब सिगरेट फूंका करते थे। वह धन, जमीन आदि की बात किया करते थे। किसी भी हाल में धन को हासिल करना उनका उदेश्य हुआ करता था। हालांकि वो आज भी वैसी ही बात करते हैं। बाद में पता चला कि वो किसी बड़े जमींदार परिवार से थे।

वहीं उनकी बैठकी में एक माली भी आते थे, जो सूरदास की बात करते थे। दोपहर के वक्त बाबूजी की बैठकी में वे बैठते और सूरदास के पद सुनाते। उनके कपड़े वाले झोले से सुंगध आती रहती थी, वन तुलसी और फूल की। वह शायद जानते थे कि माया के फेर में मन के भीतर कितनी कालिख भर जाती है। एक -आध घण्टे रहने के बाद वे जब जाने की तैयारी करते तो जाते वक्त झोले से एक मुट्ठी फूल और वन तुलसी की कुछ पत्तियां टेबल पर रख जाते। सब फूल सदाबहार गेंदा का होता था। उसकी खुशबू में हम खो जाते थे। 

बाबूजी की डायरी में उस जीप वाले भूपति का एक भी पन्ने में जिक्र नहीं है जबकि उस माली के बारे में लंबी कहानी लिखी है। और एक बात, बाबूजी उस माली से हम बच्चों को  मिलवाया करते थे लेकिन सिगरेट फूंकते, दुनिया जहान की बात करने वाले उस भूपति से बाबूजी ने कभी भी बच्चों को नहीं मिलवाया। 

दरअसल इस दुनियादारी में हम बहुत ही तेजी से भागते नज़र आ रहे हैं जबकि सत्य तो दुनियादारी में एक पर्दे की तरह है, जिसे उठाने के लिए हमें हल्का बनना होता है। दूब की तरह हल्का, जिसके ऊपर ओस की बूंद भी टिक जाती है। यही तो जीवन है, जहाँ हम हर किसी को ठहरने का मौका दे सकते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम लूटपाट की योजना बनाते हैं या फिर जीवन जीते हुए एक मुट्ठी फूल और वन तुलसी की कुछ पत्तियां टेबल पर रख आगे बढ़ जाते हैं।

Tuesday, January 25, 2022

पुस्तकालय क्यों जरूरी है!

ये कुछ दृश्य हैं, जो विगत दो साल के दौरान पूर्णिया जिला में देखने को मिला, मसलन क्रिकेट मैच हो रहा हो, और मैदान में किताबों को जगह दी गई हो। 

शहर में कुछ बुजुर्ग, जो घर से निकलने में असमर्थ हैं लेकिन वे कुछ किताबें पुस्तकालय तक पहुंचाना चाहते हैं, फोन करते हैं और एक गाड़ी आती है, किताबें ले जाती है। हर पंचायत के पुस्तकालय के लिए लोगबाग किताबें दान कर रहे हों...

शहर के मुख्य चौराहे के पास दीवार पर किताबों से संबंधित एक ‘ज्ञान की दीवार’ बना दी गई हो....

यह कुछ ऐसी बातें हैं जो इस दौर में सुनने और देखने  को बहुत कम मिलती है। क्योंकि विकास के मानकों में भौतिक चीजें हमारे आपके जीवन में इतनी हावी हो चली है कि किताबें बहुतों से दूर हो गई है। ऐसे में यदि कोई जिला किताब और पुस्तकालय के लिए अभियान चला रहा हो तो इसकी गंभीरता को समझने की जरूरत है।
पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार अक्सर कहते हैं कि समाज को समझने – बूझने का एक तरीका यह भी है कि उस समाज में किताबों को क्या स्थान है। 

वह कहते हैं, “किसी समाज या समुदाय के मिज़ाज या उसके टोन को परखने का एक प्रतिमान ये हो सकता है कि उसकी सामूहिक चेतना में किताबों को क्या स्थान प्राप्त है। पढ़ने वाला समाज प्रायः ज्यादा उदार, ज्यादा लचीला एवं ज्यादा विकासशील होता है। वह परिवर्तन के प्रति ज्यादा स्वीकार्यता भी रखता है। समुदाय से उतर कर जब हम व्यक्तिमात्र पर किताबों के प्रभाव की पड़ताल करते हैं तो पाते हैं कि किताब के आरंभ में व्यक्ति जो होता है अंत तक बिल्कुल वही नहीं रह जाता। प्रभाव कम, ज्यादा, अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है, किन्तु व्यक्ति बिल्कुल वही नहीं रह जाता। ”

शायद यही वजह है कि साहित्य-कला अनुरागी जिलाधिकारी राहुल कुमार ने अभियान किताब दान की शुरुआत की।
 
मुझे याद है, 25 जनवरी 2020 को इस अभियान की जब शुरूआत हुई थी तो पहले दिन ही 400 किताबें प्राप्त हुई थी। जिला के समाहरणालय सभागार में किताब दान अभियान की शुरूआत हुई थी। राहुल कुमार ने उस दिन भी कहा था कि यह अभियान लोगों का है, इसमें हर कोई सहयोग करेगा। उस दौरान पूर्णिया के डीडीसी अमन समीर और ट्रेनी आईएएस प्रतिभा रानी जी भी मौजूद थीं। 

हालांकि कोराना महामारी की वजह से यह अनोखा अभियान प्रभावित हुआ लेकिन इसके बावजूद अबतक लोगों ने एक लाख पचास हजार किताबें इस अभियान में दान दी है जो जिला के विभिन्न पुस्तकालयों में पहुंच चुकी है।
मुझे उस वक्त सबसे अधिक खुशी मिली जब यह खबर सुनने को मिली कि दस साल का एक लड़का, जिसका नाम ‘सक्षम’ है, उसने अपने जन्मदिन पर इस अभियान में 151 पुस्तकें भेंट की। आप इससे समझ सकते हैं कि पूर्णिया जिला के लोगों के बीच किताब और पुस्तकालय ने किस अंदाज़ में अपनी जगह बना ली है। 

पिछले साल पूर्णिया जिला के परोरा गाँव के पुस्तकालय जब जाना हुआ था, तो वहां के युवाओं का उत्साह देखने लायक था। सच कहूं तो लगा कि क्या इवेंट की तरह उत्साह भी चलता बनेगा, लेकिन बात कुछ और थी। किताबों के प्रति लोगों का स्नेह बढ़ता गया और आज एक साल बाद फिर उसी पुस्तकालय परिसर पर जब पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार पहुंचे तो दोपहर बाद किताबों में घिरे लोग ही दिखे। यह दृश्य ही समाज में पुस्तकालय के महत्व को बताने के लिए काफी है।

सोशल मीडिया के इस दौर में सबकुछ एक झटके में सबके सामने आ जाता है। आप चाहें तो अपने काम को दुनिया जहान को दिखा सकते हैं। यह इस मीडियम का एक सकारात्मक पक्ष है लेकिन वहीं दूसरी ओर एक पक्ष यह भी है कि काम का रंग जबतक चढ़ता है, सोशल मीडिया के लिए वह काम तबतक पुराना हो जाता है। ऐसे में किताब दान अभियान की बात की जाए तो भला किताबों की बात, पढ़ने – लिखने की बात कब पुरानी हुई है। यदि समाज जागरूक है और उसके मन के स्पेस में किताबों के लिए जगह है तो जान लें, इस तरह के अभियान सिर पर रखे जाएंगे। हम उम्मीद तो बेहतर कल की कर ही सकते हैं। 

कभी कभी सोचता हूँ कि जिला की कमान संभालने वाले अधिकारी को लोगबाग ढेर सारे विकास कार्यक्रमों, भवनों या अन्य सरकारी परियोजनाओं के लिए याद करते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें लोग बदलाव के लिए याद करते हैं। किताब दान अभियान की शुरूआत करने वाले राहुल कुमार ऐसे ही लोगों में एक हैं। 

पूर्णिया में गाँव -गाँव तक पुस्तकालय पहुँचाने का उनका अभियान दरअसल पूर्णिया के जन-जन का अभियान है। लोगबाग अपनी आदतों में किताब को शामिल करें, इससे बेहतर और क्या हो सकता है।

राहुल कुमार के इस अभियान को पूर्णिया को अपनी आदत में शामिल करना चाहिए ताकि आने वाले समय में भी पुस्तकालय हर पंचायत में जीवित रहे, यह काम हम आप ही कर सकते हैं। उनके काम की जहां भी बात होती है, वह बड़ी दूर तक अपनी आवाज पहुंचाती है।

मैं इस अभियान को बहुत नजदीक से देखता आया हूं। उम्मीद है कि हर पंचायत में लाइब्रेरी जीवित रहेगी और लोगबाग गाँव के उस किताब घर को इज़्ज़त देंगे। इन सबके बीच यहां यह भी बताना जरूरी है कि पूर्णिया में महात्मा गांधी तीन दफे आए थे। 1925, 1927 और 1934 में गांधी जी यहां आए थे। यहां एक घटना का जिक्र जरूरी है। 13 अक्टूबर 1925 को बापू ने पूर्णिया के बिष्णुपुर इलाके का दौरा किया था। बापू को सुनने बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे। शाम को गांधी जी ने स्थानीय ग्रामीण श्री चौधरी लालचंद की दिवंगत पत्नी की स्मृति में बने एक पुस्तकालय मातृ मंदिर का उद्घाटन किया था। बापू ने अपने नोट्स में लिखा है कि ‘बिष्णुपुर जैसे दुर्गम जगह में एक पुस्तकालय का होना यह संकेत देता है कि यह स्थान कितना महत्वपूर्ण है।'

उस दौर में पुस्तकालय का होना यह बताता है कि पूर्णिया जिला के ग्रामीण इलाकों में पढ़ने के प्रति लोगों का खास जुड़ाव था। 

आज एक बार फिर पूर्णिया पुस्तकालय को लेकर गंभीर हुआ है और इसका श्रेय जाता है पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार को। तो चलिए, आइये हम सब अपने व्यस्त समय से कुछ पल निकालकर जिला के विभिन्न पंचायतों के लाईब्रेरी चलते हैं और किताबों के साथ समय गुजारते हैं। साथ ही उन किताबों को नजदीक से देखते हैं जिसने ' अभियान किताब दान ' के तहत इतनी लंबी दूरी तय की है।