Thursday, May 20, 2021

बात ज्योति यादव की

इन दिनों हर कोई महामारी के संक्रमण से बचने के लिए अपने घर में बंद है। हम सभी मोबाइल और अन्य डिजिटल माध्यमों से दुनिया जहान की बात करते हैं, दुनिया को देखते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं। इस कठिन समय में मीडिया से जुड़े कुछ लोग स्टूडियो और ऑफिस से कोसों दूर ग्राउंड से रिपोर्टिंग कर रहे हैं, ऐसे लोग दरअसल हमारी पीड़ा को आवाज देने का काम कर रहे हैं। ऐसी ही एक रिपोर्टर है अपनी ज्योति यादव, जो घूम घूम कर सच लिख रही हैं, जो इस दौर में सहज नहीं है, इसके लिए साहस चाहिए, जो अब बहुत कम के पास है।


ज्योति पिछले साल भी दिल्ली, यूपी होते हुए बिहार आई थीं, जब लाखों प्रवासी श्रमिक पैदल ही दिल्ली पंजाब आदि से घर लौट रहे थे। ज्योति उस कठिन समय में भी कोरोना संक्रमण और ग्राउंड की सच्चाई से हम सब को द प्रिंट के प्लेटफार्म के जरिए रूबरू करा रही थी। उस समय भी वह गाँव-गाँव घूम रही थीं, बिहार के कैंपों में जा रहीं थीं, जहाँ 14 दिनों तक बाहर से आए लोगों को रखा जाता था। 2020में जब वह पूर्णिया पहुंची थी तो हमारी मुलाकात हुई थी।


इस बार जब कोरोना महामारी हर दिन तांडव मचा रहा है, हम सब हर रोज अपनों को खो रहे हैं, ऐसे क्रूर समय में रिपोर्टिंग के सिलसिले में ज्योति शहर और गाँव पहुँच रही हैं। दिल्ली – यूपी होते हुए वह एक दिन बिहार के अररिया जिला के रानीगंज पहुँच गईं, जहाँ कोविड की वजह से माँ और पिता दोनों की मौत हो जाती है।


ज्योति की रिपोर्ट जब आप पढ़ते हैं तो पता चलता है कि इन सुदूर इलाकों में संक्रमण ने कितने घरों को तहस नहस कर दिया है।


जब हमने ज्योति से पूछा कि आप रिपोर्टिंग के सिलसिले में घर से कब निकली तो उन्होंने कहा कि अब तो महीने से ऊपर हो चले हैं। वह दिल्ली से आठ अप्रैल को लखनऊ पहुंची और फिर 11 अप्रैल से उनकी यात्रा शुरू होती है। लखनऊ से बाराबंकी, सीतापुर, वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, मऊ, बक्सर,आरा, पटना, बेगूसराय, अररिया,मधेपुरा, पूर्णिया, दरभंगा, मधुबनी और बिहार के कई और इलाके उनकी यात्रा के पड़ाव रहे हैं। शहर और ग्रामीण इलाकों तक वह पहुंचती हैं और लोगबाग से बात कर रिपोर्ट तैयार करती हैं।


लखनऊ में शमशान घाट की स्टोरी तैयार करते वक्त ज्योति बीमार पड़ जाती है। यात्रा के शुरुआत में ही संक्रमण की आशंका की वजह से उन्होंने खुद को तीन दिन के लिए आइसोलेट कर लिया और फिर निकल पड़ी यात्रा पर।


मधेपुरा के मेडिकल कॉलेज अस्पताल हो या फिर दरभंगा का डीएमसीएच, ज्योति ने इन अस्पतालों की सच्चाई हम सब तक पहुंचाने का काम किया है। वह यूपी के पंचायत चुनाव में ड्यूटी करने वाली आठ माह की गर्भवती महिला की कहानी सबके सामने लाती हैं, जिसे जबरन काम पर तैनात किया गया था।


ज्योति कहती हैं कि यह इमोशनल एसाइनमेंट है। उन्होंने बताया कि कई जगह संक्रमित लोगों के परिजन हाथ पकड़ कर कोविड वार्ड ले जाते हैं और दिखाते हैं असलियत...। वह कहतीं हैं, “फोन सिर्फ शमशान घाट , कोविड वार्ड और मरे हुए लोगों की तस्वीरों से भरी पड़ी है....।”


ज्योति यादव के रिपोर्टों से गुजरते हुए कई बार लगता है कि देखकर लिखना कितना दुखदायी है, दुख, जिसका आपके पास कोई इलाज नहीं लेकिन जब आप अस्पतालों में मरीजों के परिजनों से मिलते हैं तो वह बस आपको आशा भरी निगाहों से देखते रह जाते हैं....आप उनसे बात करते हैं...उनके दुख को महसूस करते हैं...

Wednesday, May 12, 2021

पूर्णिया में नहीं होने दी ऑक्सीजन क्राइसिस..

आज सुबह-सुबह मैसेज मिलता है कि पूर्णिया में ऑक्सीजन प्लांट खराब हो गया है और भागलपुर से भी आज ऑक्सीजन नहीं पहुंचा कुछ तकनीकी कारणों से। इस मैसेज को पढ़ने के बाद तो लगा कि अब क्या? क्योंकि शहर के अस्पतालों में सैकड़ों मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट में हैं। 

सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफार्म पर लोग इस मसले पर अपनी बात रखने लगे, सचमुच यह एक बड़ी समस्या थी। एक ने कहा कि लोग सिलेंडर लेकर भटक रहे हैं, अस्पतालों में भी घंटे-दो घंटे की व्यवस्था है... यह सब पढ़कर मन और विचलित हो गया।

इन सबके बीच खबर आती है कि पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार सदर अस्पताल के कंट्रोल रूम में हैं और खुद सभी मसलों पर नजर बनाए हुए हैं। वह खुद इस मसले पर एक ट्वीट भी करते हैं लेकिन इन सबके बावजूद ऑक्सीजन की कमी को लेकर शहर भर में बात फैल चुकी थी। लोग परेशान थे। इस मुश्किल वक्त में ऐसी सूचना किसी को भी विचलित कर सकती है। 
इस मुश्किल घड़ी में जिलाधिकारी राहुल कुमार एक उम्मीद की तरह सामने आए। उन्होंने एक इमरजेंसी प्लान बनाया। जिला के अनुमंडल अस्पतालों से सिलेंडर मंगवाकर उन प्राइवेट अस्पतालों तक पहुँचाया, जहाँ इमरजेंसी जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी। राहुल कुमार ने बताया कि धमदाहा के सरकारी अस्पताल से 15 सिलेंडर मंगाकर मैक्स को 10 और जीवन अस्पताल को 5 सिलेंडर तत्काल दिया गया। दरअसल इन दोनों अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर की सबसे अधिक जरूरत थी।

इसके बाद राहुल कुमार ने अपने प्लान बी पर काम करना शुरु किया। उन्होंने कटिहार, किशनगंज और सुपौल के जिलाधिकारियों से संपर्क किया और वहाँ से ऑक्सीजन सिलेंडर लाने की योजना बनाई। साथ ही किशनगंज स्थित माता गुजरी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के निदेशक दिलीप जायसवाल ने पहले 10 और फिर 30 जम्बो ऑक्सीजन सिलेंडर तुरंत पूर्णिया भेजा।

राहुल कुमार कहते हैं कि कटिहार से 10, किशनगंज से 10 और सुपौल से 15 सिलेंडर वहाँ के जिलाधिकारियों ने पूर्णिया भेजा। इसके अलावा पूर्णिया के अलग अलग सरकारी अस्पतालों से, जहाँ सिलेंडर की जरुरत नहीं थी, वहाँ से 100 सिलेंडर मंगवा लिए गए। ये सभी सिलेंडर उन सभी अस्पतालों को तत्काल मुहैया करवाया गया, जहां जरूरत थी। मरीजों को समस्या न हो, इसके लिए हर तरह की तैयारी हो रही थी। 

ऑक्सीजन क्राइसिस ऑपरेशन के दौरान राहुल कुमार लगातार कंट्रोल रुम में बने रहे। लगभग आठ घंटे तक यह ऑपरेशन चलता रहा, अलग अलग जिला से सिलेंडर आता रहा और उसे जरुरत के हिसाब से अस्पतालों को पहुँचाने का काम दिन भर जारी रहा। 

गौरतलब है कि पूर्णिया के मरंगा स्थित ऑक्सीजन प्लांट से हर दिन 350 और भागलपुर से 150 सिलेंडर पूर्णिया को मिलता है। ऐसे में यदि एक दिन भी प्लांट में गड़बड़ी आती है तो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि स्थिति कितनी भयावह हो सकती है। बुधवार को भी जिला के 3 सरकारी और 10 प्राइवेट अस्पतालों में लगभग 250 मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर थे और ऐसे समय में यदि मरीजों को ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी हो जाती तो एक बड़ी त्रासदी से हमारा सामना हो जाता। लेकिन जिला के अधिकारियों ने आज ऐसा नहीं होने दिया। राहुल कुमार कहते हैं, “यदि थोड़ी सी भी चूक होती तो कुछ भी हो सकता था लेकिन हमने अपने संसाधनों को बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया। साथ ही आसपास के जिला का पूरा सहयोग मिला, जिस वजह से मरीजों को कोई दिक्कत नहीं हुई।”

अब मरंगा स्थित ऑक्सीजन प्लांट पूरी तरह से ठीक है और काम करने लगा है। सच कहिए तो आज पूर्णिया बच गया। ऐसे वक्त में धैर्य की भी परीक्षा होती है। अक्सर हम सवाल उठाने लगते हैं, सवाल वाजिब है लेकिन लोगों के बीच भय का वातावरण बनाना ठीक नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर तो यहां तक पढ़ने को मिल गया कि आज ऑक्सीजन क्राइसिस से 20-25 मरीज की मौत तय है...ऐसी बातों को पढ़कर मन कमजोर होता है, जबकि यह वक्त मन मजबूत बनाकर रखने का है।

खैर, इस मुश्किल घड़ी में पूर्णिया के लिए राहुल कुमार जो कुछ भी कर रहे हैं, उसे याद रखा जाएगा। हर स्तर पर वह जरुरतमंदों की सहायता कर रहे हैं।उनकी बात जब भी होती है, अकबर इलाहाबादी का लिखा याद आ जाता है- 
“कहीं नाउम्मीदी ने बिजली गिराई, 
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है...”

Thursday, March 04, 2021

रेणु के बहाने : पलायन, राजनीति और किसानी...आज के हिरामन की तीन कसमें

खेत में जब भी फसल की हरियाली देखता हूँ तो लगता है कि रेणु हैं, हर खेत के मोड़ पर। उन्हें हम सब आंचलिक कथाकार कहते हैं लेकिन सच यह है कि वे उस फसल की तरह बिखरे हैं जिसमें गांव-शहर सब कुछ समाया हुआ है। उनका कथा संसार आंचलिक भी है और शहराती भी। यही कारण है कि रेणु आंचलिक होकर भी स्थानीय नहीं रह जाते। लेकिन जरा सोचिए, यदि इस दौर में रेणु होते तो क्या सोचते ? क्या होती उनकी तीन कसमें? महामारी, संक्रमण, देश-काल की राजनीति को यदि वे देखते – भोगते तो क्या वे पटना से हमेशा के लिए औराही लौट आते? क्या वे फिर से चुनाव लड़ते? क्या वे भी नई वाली हिंदी की बात करते या फिर वह भी निकालते किसान मार्च!

आज रेणु को याद करते हुए हम सब उनके साहित्य, जीवन और तमाम चीजों पर गुफ्तगू कर रहे हैं लेकिन आज हम आपको रेणु की ही बोली बानी में बताएंगे कि यदि फणीश्वर नाथ रेणु आज होते तो पलायन, राजनीति और किसानी मुद्दे पर क्या कहते....

दृश्य -एक
लोग महानगरों से लौट रहे हैं, हर दिन अखबार में पढ़ रहा हूँ कि महामारी, लॉकडाउन की वजह से नौकरी गंवाने वाले लोग अपने गाँव शहर लौट रहे हैं। सच कहूँ तो दुख होता है, लेकिन फिर सोचता हूँ कि लौटने वाले लोग घर ही तो लौटे हैं। मैं स्वार्थी हो गया हूँ शायद। मेरे टोले में लोगबाग लौट आएंगे तो चहल-पहल बढ़ जाएगी। गाँव मुर्दा तो नहीं लगेगा.. । फिर सोचता हूँ पलायन का दंश झेलना वाला यह अंचल अपनी माटी के लोगों का किस तरह स्वागत करेगा। क्या रोजगार का सृजन स्थानीय स्तर पर संभव है? क्या इस सदी में मैं फिर यह कह पाउंगा कि ‘आवरण दैवे पटुआ, पेट भरन देबे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान...’
सच कहूँ तो औराही के आसपास का जीवन भी अब बदल चुका है लेकिन उम्मीद तो मैं बेहतर कल के लिए ही करूंगा न। आशा है लौट रहे लोग अपने अंचल को संवारेंगे। मुझे परती परिकथा का अपना नायक जितेंद्र याद आ रहा है, वह भी तो लौटा था, उसके पास पुरखे की जमीन जायदाद थी लेकिन उनका क्या जिसके पास एक धूर जमीन भी नहीं है...जा रे जमाना....

दृश्य- दो
दरअसल बात ऐसी हुई कि पुलिस की लाठी से एक छात्र का सिर फट गया। उस समय पुलिस वालों को माइक पर आदेश दिया जा रहा था माइल्ड लाठी चार्ज का, जिसका मतलब होता है लाठी कमर के नीचे लगनी चाहिए, और इधर कई लड़के बुरी तरह घायल हो गए थे। मुझे याद है, उन्हें बचाने के लिए जयप्रकाश जी भी अपनी जीप से कूद आए और मैं भी लपका। जिस लड़के के सिर में चोट आई थी, वह लड़खड़ा कर गिरने लगा तो मैंने आगे बढ़कर उसे अपनी बांहों में ले लिया। मेरे सारे कपड़े उसके खून से तर हो गए। लोगों ने समझा यह मेरा खून है। कुछ भी हो, खून तो खून ही होता है- मेरा हो चाहे किसी और का...। आपको बताता चलूं कि यह घटना 74 की है। मन से कहूं तो राजनीति मेरे बस की बात नहीं। चुनाव भी लड़ा, जमानत जब्त हुई। आंदोलनों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया लेकिन सच कहूं तो मन टूट गया था। 74 में मुझे देह से अधिक चोट हृदय में लगी, बहुत बड़ी चोट है यह! अब तो मुखिया के चुनाव में भी धनबल का जोर दिखता है, विधायक की तो बात ही छोड़िए। लेकिन क्या यह सब सोचकर जो जहाँ है, वहीं चुप बैठ जाए? नहीं, यह उचित नहीं होगा। नए सवेरे की आशा है। मन है अपने गाम में एक आश्रम खोल दूं लोगों को स्वराज की बात कहूं, पता है लोग मजाक बनाएंगे लेकिन मुझे पता है कि मैं लोकतंत्र का मजाक नहीं उड़ा रहा हूं। क्या मेरे आश्रम में कोई जनप्रतिनिधि आएंगे, मेरी बात सुनने या फिर आएंगे केवल चुनाव के वक्त....मुझे अपनी ‘चुनावी लीला’ याद आने लगी है...

दृश्य-तीन
किसान हर दौर में प्रासंगिक रहे हैं और रहेंगे। आप इस कौम को दबा नहीं सकते। आज किसान आंदोलन की बात हर घर में हो रही है, यदि कोई चुप है तो जान लें, वक्त सबसे हिसाब मांगता है। मुझे आज यह सोचकर हंसी आ रही है कि मैंने कभी यह लिखा था कि एक बीघा खेत में खेती कर लेना पाँच लेख और पाँच कहानियां लिखने से ज्यादा फायदेमंद है। अफसोस होता है, कि यह मैंने कैसे लिख दिया। किसान और हिंदी लेखन दोनों की स्थिति देखकर निराश हो जाता हूँ। मैं फसलों की बुआई या कटाई के समय गाँव आ ही जाता था। अब लगता है कि उस गुजरे वक्त में मैंने गाँव को कम समय दिया। हिंदी लेखन को अधिक दिया। वैसे 1949 में मैंने एक किसान यात्रा का नेतृत्व किया था। मेरे गाँव औराही हिंगना से शुरू हुई इस यात्रा में 550 किसान शामिल हुए थे। 13 दिनों तक पैदल चलकर हम सब पटना पहुँचे थे। मैं पटना पहुंचते ही बीमार हो गया। आज जब दिल्ली से और देश के अलग-अलग हिस्सों से किसान आंदोलन को लेकर खबरें सुनने को मिलती है तो मैं अपने पुराने दिनों को याद करने लगता हूँ।

और चलते-चलते..
खेती-बाड़ी करते हुए इस धरती के धनी कथाकर-कलाकार से मेरी अक्सर भेंट होती है, आप इसे मेरा भरम मान सकते हैं लेकिन जब भी रोज की डायरी लिखने बैठता हूँ तो लगता है फणीश्वर नाथ रेणु खड़े हैं सामने। छोटे-छोटे ब्योरों से लेखन का वातावरण गढ़ने की कला उनके पास थी। रेणु को पढ़ते हुए गांव को समझने की हम कोशिश तो कर ही सकते हैं। रेणु पर सोचते हुए अक्सर एक चीज मुझे चकित करती रही है कि आखिर क्या है रेणु के उपन्यासों - कहानियों में जो आज के डिजिटल युग में भी उतना ही लोकप्रिय है, जितना पहले थे।

परती परिकथा का परानपुर कितने रंग-रूप में रेणु हमारे सामने लाते हैं। गांव की बदलती हुई छवि को वे लिख देते हैं। वहीं मैला आंचल का मेरीगंज देखिए। हर गांव की अपनी कथा होती है, इतिहास होता है। इतिहास के साथ वर्तमान के जीवन की हलचल को रेणु शब्दों  में गढ़ देते हैं। गांव की कथा बांचते हुए रेणु देश और काल की छवियां सामने ला देते हैं।

रेणु अपने साथ गांव लेकर चलते थे। इसका उदाहरण 'केथा' है। वे जहां भी जाते केथा साथ रखते। बिहार के ग्रामीण इलाकों में पुराने कपड़े से बुनकर बिछावन तैयार किया जाता है, जिसे केथा या गेनरा कहते हैं। रेणु जब मुंबई गए तो भी 'केथा ' साथ ले गए थे। दरअसल यही रेणु का ग्राम है, जिसे वे हिंदी के शहरों तक ले गए। उन्हें अपने गांव को कहीं ले जाने में हिचक नहीं होती थी। वे शहरों से आतंकित नहीं होते थे. रेणु एक साथ देहात -शहर जीते रहे, यही कारण है कि मुंबई में रहकर भी औराही हिंगना को देख सकते थे और चित्रित भी कर देते थे। रेणु के बारे में लोगबाग कहते हैं कि वे ग्रामीणता की नफासत को जानते थे और उसे बनाए रखते थे।

गिरीन्द्र नाथ झा 

( रेणु जन्मशती पर दैनिक भास्कर में प्रकाशित) 




Monday, January 25, 2021

पूर्णिया में किताब दान अभियान और गाँव-गाँव में लाइब्रेरी की बात

किताबों के साथ हम सभी का रिश्ता रहा है। हम उस रिश्ते को हर उम्र में नए सिरे से अनुभव करते हैं। तकनीकी दौर में भी यह रिश्ता कमजोर नहीं हुआ है। हम सभी के घरों में किताबों का एक ठिकाना जरूर रहता है, जहाँ पहुँचकर हम सभी पन्नों में लिखे शब्दों की दुनिया में खो जाते हैं। एक वक्त था जब गाँव-गाँव में लाइब्रेरी हुआ करती थी, लोगबाग वहाँ जाते थे लेकिन समय की तेज रफ्तार में ऐसी जगहें कम होने लगी। ऐसे दौर में जब देश के अलग-अलग हिस्सों में विकास का मतलब निर्माण कार्यों को समझा जाने लगा है, ऐसे वक्त में कोई जिला यदि किताबों की बात करता है तो उसके मर्म को समझने की जरूरत है।



भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी राहुल कुमार बिहार के पूर्णिया जिला में कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। साल 2020 के जनवरी महीने में पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार ने एक अभियान की शुरुआत की थी- अभियान किताब दान। कोराना महामारी की वजह से यह अनोखा अभियान प्रभावित हुआ लेकिन इसके बावजूद लोगों ने 61000 किताबें इस अभियान में दान दी। और साल 2021 में इस अभियान को मूर्त रूप देने की शुरूआत राहुल कुमार ने कर दी है। 25 जनवरी को जिला के परोरा गाँव में राहुल कुमार ने एक पुस्तकालय की शुरूआत की, जिसमें इस अभियान से प्राप्त किताबों को रखा गया है।

मुझे याद है, 25 जनवरी 2020 को इस अभियान की जब शुरूआत हुई थी तो पहले दिन ही 400 किताबें प्राप्त हुई थी। जिला के समाहरणालय सभागार में किताब दान अभियान की शुरूआत हुई थी। राहुल कुमार ने उस दिन भी कहा था कि यह अभियान लोगों का है, इसमें हर कोई सहयोग करेगा और आज एक साल बाद जब परोरा गाँव में वह लोगों के बीच थे, उस वक्त भी उन्होंने यही बात दोहरायी।

दरअसल हम सभी के घरों में ऐसी ढेर सारी किताबें होती है, जिसे हम पढ़ चुके होते हैं और वह रखी रह जाती है। ऐसी किताबों को हम लाइब्रेरी तक पहुँचा सकते हैं ताकि शब्द की यात्रा जारी रहे। पूर्णिया के जिलाधिकारी का यह अभियान हमें बताता है कि गाँव-गाँव में किताबों का एक सुंदर सा ठिकाना बनना चाहिए। उनका कहना भी है कि जिला के हर पंचायत में एक मिनी लाइब्रेरी शुरू होगी। जिले में अब तक अभियान किताब दान के तहत 61 हजार पुस्तकें प्राप्त हुई है। इन पुस्तकों से पंचायतों में मिनी पुस्तकालय खोलने का सुझाव दिया गया है। जहाँ पंचायत सरकार भवन है वहाँ तथा अन्य भवनों में जगह देखी जा रही है। इसके लिए एक समिति भी बनाई जाएगी, जो पुस्तकालय की देख-रेख कर सकेगी।



पूर्णिया जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित परोरा गाँव में आज जब पंचायत भवन परिसर में लाइब्रेरी की शुरूआत हुई तो लगा बदलाव इस तरह भी लाया जा सकता है। जब भी किसी गाँव के ग्राम पंचायत भवन के परिसर में जाता हूँ तो सबसे पहले मन में गाँधी की छवि ही आती है। बापू ने ‘मेरे सपनों का भारत’ में पंचायती राज के बारे में जो विचार व्‍यक्‍त किये हैं वे आज वास्‍तविकता के धरातल पर साकार हो चुके है क्‍योंकि देश में समान तीन-स्‍तरीय पंचायती राज व्‍यवस्‍था लागू हो चुकी है जिसमें हर एक गाव को अपने पांव पर खड़े होने का अवसर मिल रहा है। बापू का मानना था कि जब पंचायती राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती। आज परोरा गाँव में लाइब्रेरी के बहाने बापू की लिखी बातें भी याद आने लगी।

कभी कभी सोचता हूँ कि जिला की कमान संभालने वाले अधिकारी को लोगबाग ढेर सारे विकास कार्यक्रमों, भवनों या अन्य सरकारी परियोजनाओं के लिए याद करते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें लोग बदलाव के लिए याद करते हैं। किताब दान अभियान की शुरूआत करने वाले राहुल कुमार ऐसे ही लोगों में एक हैं। पूर्णिया में गाँव -गाँव तक पुस्तकालय पहुँचाने का उनका अभियान दरअसल पूर्णिया के जन-जन का अभियान है। लोगबाग अपनी आदतों में किताब को शामिल करें, इससे बेहतर और क्या हो सकता है। 

आज जब परोरा गाँव से लौट रहा था तो सोचने लगा कि किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं.... लिखने वाले गुलज़ार काश पूर्णिया आते और गाँव के किसी लाइब्रेरी में पढ़ते लोगों को देखते तो फिर यह नहीं कहते बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें..’ 


यदि आप भी किताब दान करना चाहते हैं तो जिला शिक्षा पदाधिकारी पूर्णिया के कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं, नंबर है- 8544411773

Tuesday, January 12, 2021

वेब स्पेस पर उम्मीद वाला ठिकाना - The Better India

 

महामारी के दौरान हम सब घरों में बंद थे। सच कहूं तो हम सब खुद से जूझ रहे थे। हर एक इंसान अपने जीवन में पहली बार एक ऐसी महामारी के संक्रमण से जूझ रहा था, जिसके बारे में कुछ भी सटीक कहना नामुमकिन था। कल कैसा होगा, यह सोचकर बस अंधेरा ही दिखता था।

 

हम सभी के बही-खाते में साल 2020 की कहानी कुछ इस तरह ही शुरू हुई थी और इसी अंदाज में खत्म भी हुई। 2020 में सबकुछ बंद ही रहा। मैं भी खेती-बाड़ी, गाम-घर और अपने चनका रेसीडेंसी के कामकाज से दूर शहर के घर में बंद हो चुका था। किताबें एकमात्र सहारा थी। इस बीमारी ने पॉजीटिव शब्द की व्याख्या ही बदल दी लेकिन सच यही है कि उस दौर में हर किसी को अवसाद से दूर रहने के लिए सकारात्मक खबरों की तलाश थी।

 

मार्च 2020 के आखिरी सप्ताह में द बेटर इंडिया हिंदी की संपादक मानबी कटोच जी से बात होती है। द बेटर इंडिया से अपना पुराना रिश्ता रहा है लेकिन कोरोना महामारी के दौरान खबरों का यह अड्डा मेरे लिए दवा की माफिक बन गया।

 

सकारात्मक खबरों को पढ़ते हुए आप न केवल खुद भीतर से मजबूत बनते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी ऐसी खबरों के बारे में बताते हैं।

 

हर दिन इस वेब स्पेस के लिए खबरों को संपादित करते हुए मन भीतर से मजबूत होता चला गया। देश के अलग-अलग हिस्सों से केवल और केवल ऐस ही खबरें आतीं थीं जिसे पढ़कर लगता था कि सवेरा दूर नहीं है। झारखंड के कामदेव पान की कहानी कुछ ऐसी ही थी, जिसने कारोबार बंद होने पर निराश होने की बजाय मैजिक बल्ब का आविष्कार कर दिया।

 

अप्रैल 2020 से लेकर दिसंबर 2020 तक ऐसी ही सैकड़ों खबरों से रोज मिलता रहा। मेरे लिए यह सारी खबरें दवा की माफिक रही। एक कहानी हाल ही में कर्नाटक से आई थी। यह कहानी कर्नाटक के रायचूर जिले में रहने वाली कविता मिश्रा की थी, जिन्होंने कंप्यूटर में डिप्लोमा किया हुआ है और साइकोलॉजी में मास्टर्स की है। लेकिन आज उनकी पहचान एक सफल किसान के तौर पर है।

 

जब स्कूल बंद था, उस वक्त बच्चों को लोग किस तरह पढ़ा रहे थे, इस संबंध में एक कहानी झारखंड से आई थी। झारखंड स्थित जरमुंडी ब्लॉक के राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय, डुमरथर के प्रिंसिपल डॉ. सपन कुमार ने इसे सच कर दिखाया है। उन्होंने जब देखा कि कोरोना संक्रमण की आशंका को दखते हुए बच्चे विद्यालय नहीं आ पा रहे हैं और ऑनलाइन शिक्षा पाने के लिए उनके पास स्मार्ट फोन और बेहतरीन मोबाइल नेटवर्क जैसे संसाधन नहीं हैं, तो उन्होंने स्कूल को ही उनके घर तक ले जाने का फैसला कर लिया।

 

अभिभावकों की इजाजत से उनके घरों की दीवार पर थोड़ी-थोड़ी दूरी के साथ ब्लैक बोर्ड बनवा दिए गए, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो सके। इन्हीं ब्लैक बोर्ड पर छात्र, शिक्षक के पढ़ाए पाठ लिखते हैं और सवालों के जवाब भी लिखते हैं। डॉ. सपन कुमार खुद कम्युनिटी लाउड स्पीकर के ज़रिए बच्चों को पढ़ाई करवा रहे थे।

 

सच कहूँ तो ऐसी खबरें पढ़कर लगता है कि हम कितना कुछ अपने स्तर पर कर सकते हैं, वो भी विरपरित से विपरित समय में।

 

शहरों में बागवानी के शौकिन लोगों की बात करें तो उनकी कहानी भी कम रोचक नहीं हैं। टेरैस गार्डनिंग से लेकर खाली पड़े जगहों पर फूल-पत्ती या सब्जी उगाने वाले लोगों की ढेर सारी स्टोरी मेरे सामने आई।

 

ऐसी ही एक कहानी जो दिल को छू गई वह कर्नाटक से आई थी। बेंगलुरू में रहने वाले सुरेश राव, स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया में बतौर सीनियर अकाउंटेंट कार्यरत हैं और साथ ही, पूरे पैशन से गार्डनिंग भी करते हैं। उन्होंने अपने खर्च से अनाथालय की छत को किचन गार्डन बना दिया, जहाँ से अब बच्चों को हरी-हरी ताजी सब्जियां मिलती है। वह कहते हैं कि इस काम से उन्हें अपने जीवन में सबसे अधिक संतुष्टि मिली।

 

द बेटर इंडिया के प्लेटफार्म पर जब आप खबरों को खंगालेंगे तो पता चलेगा कि देश भर में कितनी सारी प्रेरक कहानियां आपका इंतजार कर रही हैं, जिसे पढ़कर आपका भरोसा बढ़ेगा। कुछ ऐसी ही कहानी केरल के कासरगोड के रहने वाले 67 वर्षीय कुंजंबु की है, जो  पिछले 50 वर्षों से अधिक समय के दौरान 1000 से अधिक सुरंगे बना चुके हैं। जिसके फलस्वरूप आज गाँव के लोगों को पानी के लिए बोरवेल पर कोई निर्भरता नहीं है।

 

इनकी कहानी को पढ़ते हुए लगा कि मुश्किल से मुश्किल वक्त में भी हमें हार नहीं माननी चाहिए। हम अपने लिए तो बहुत कुछ करते हैं लेकिन समाज के लिए कुछ भी करने से पहले कितना सोच-विचार करने लगते हैं। ऐसे लोगों को कुंजंबु की कहानी कहानी पढ़नी चाहिए। जुनून और इच्छाशक्ति, ऐसे दो तत्व हैं, जिससे इंसान किसी भी लक्ष्य को हासिल कर सकता है। बिहार के माउंटेन मैन दशरथ माँझी , जिन्होंने केवल एक हथौड़ा और छेनी से पहाड़ को काट कर, सड़क बना डाला था। कुछ ऐसा ही काम कुंजंबु भी कर रहे हैं।

 

वेब साइट पर बात करने वाले समीक्षक अपनी निगाहों से अपने अनुशासन से कंटेट को देखते हैं और फिर उस प्लेटफार्म की समीक्षा करते हैं। लेकिन एक आम आदमी की भाषा में कहूं तो यह प्लेटफार्म बहुत तरीके से हमें बदल देती है, यह खुद मैं महसूस करता हूँ। इनकी खबरों से गुजरते हुए लगता है दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है, कितना कुछ अच्छा हो रहा है देश-दुनिया में

और चलते-चलते मेरी प्रिय कहानी को एक बार जरूर पढ़िए, जो मुंबई में 22 साल से एडवरटाइजिंग जगत में काम करने वाले राहुल कुलकर्णी और मराठी नाटक, टी.वी और फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री संपदा कुलकर्णी की है, जिन्होंने मुंबई शहर की चकाचौंध और सुख-सुविधाओं को छोड़कर कोंकण के एक छोटे से गाँव, फुणगुस में एक फार्म-स्टे बनाया है, जिसका नाम है-‘Farm Of Happiness’

 

इस तरह की कहानियों को पढ़कर आपको लगेगा कि जीवन में सकात्मक होना सबसे अधिक जरूरी है। यह एक ऐसा गुण है, जिसके बल पर आप मुश्किल से मुश्किल रास्तों को पार कर सकते हैं। यह गुण आपके नजरिए को बदल देता है। द बेटर इंडिया की खबरों में डुबकी लगाते वक्त कुछ ऐसा ही अहसास होता है। अकबर इलाहाबादी के शब्दों में कहूं तो

 

" कहीं नाउम्मीदी ने बिजली गिराई

कोई बीज उम्मीद के बो रहा है..."

 


Sunday, January 03, 2021

पद्मनारायण झा ' विरंचि ' जी की अनसुनी कहानी

जब युवा थे तो साहित्य में रुचि थी। फिर  राजनीति में रच बस गए। राजनीति में नीति को पकड़ कर रहे इस वजह से जीवन के उस मोड़ में जहां लोग ऊंचाई को हासिल करने के लिए जुगत में लगे रहते हैं, वो चुपचाप गाम में बस गए।
एक ऐसा शख्स जिसे कभी संजय गांधी ने बिहार में मंत्री पद का ऑफर दिया था लेकिन उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि जब अपने लोग कमजोर हो जाएं तो उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए बल्कि उनका साथ बनाए रखना चाहिए। यह कहानी उस वक्त की है जब लोकदल को कांग्रेस तोड़ रही थी। हेमवती नंदन बहुगुणा के लोगों को संजय गांधी तोड़ने में लगे थे। इसी दौरान संजय गांधी ने बहुगुणा के सबसे करीबी पद्मनारायण झा ' विरंचि ' जी बुलाकर कहा कि वह कांग्रेस में शामिल हो जाएं और बिहार में मंत्री पद ले लें। इस प्रस्ताव को विरंचि जी ने ठुकराते हुए कहा - " संजय जी, अभी बहुगुणा जी की पार्टी कमजोर है। लोग उनका साथ छोड़ रहे हैं। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं उनके साथ ही रहूंगा। मैं रमानंद तिवारी का शिष्य हूं  और समझौता करना नहीं जानता। "

यह सुनकर संजय गांधी ने कहा था - "मिस्टर झा, मेरा ऑफर कोई ठुकराता नहीं है, आप अलग हैं। "

राजीव गांधी जब पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे थे तो शूट पहनकर इस शख्स के पास आते हैं , और पूछते हैं - " मैं ठीक लग रहा हूं न ! "

देवेगौड़ा जब प्रधानमंत्री बने तो इस शख्स को बिहार के इनके गांव से बुला लाए। फिर मुलाकात के लिए उन्हें प्रधानमंत्री निवास बुलाया गया। संयोग से उस वक्त मुलाकातियों  में धीरू भाई अंबानी भी थे, वह भी पीएम के कॉल का इंतज़ार कर रहे थे और बड़ी बैचेनी से लॉबी में थे। दरअसल अंबानी से पहले उसी शख्स को मिलना था। अचानक उस शख्स ने अंबानी से कहा - "आपको  शायद जरूरी काम है, जाइए मिल आइए प्रधानमंत्री से..।" अंबानी जब मुलाकात कर बाहर आते हैं तो कहते हैं - " मुझे पहली बार कोई ऐसा शख्स मिला है जो प्रधानमंत्री का समय किसी और को दे दिया हो, मिस्टर झा आप प्लीज बंबई आइए, मेरा नंबर रखिए। " लेकिन इस शख्स ने कभी अंबानी से मुलाकात नहीं की।

ऐसी कई कहानियों को खुद में ही समेटे पद्मनारायण झा ‘विरंचि’ जी अनंत यात्रा पर निकल गए। कल जब मधुबनी जिला  स्थित उनके गांव खोजपुर जाना हुआ तो लगा राजनीति में एकांत का भी स्थान है। उनके बेटे प्रशांत झा और सुशांत झा को बस देखता रह गया। उनका घर मुझे आश्रम की तरह लगा। वहां कोई हड़बड़ी का आभास नहीं हुआ, संतुष्टि का अनुभव हुआ।  हालांकि पिता के बिना जीवन क्या होता है, इसे लिखना सबसे कठिन काम है। 

समाजवादी चिंतक पद्मनारायण झा ‘विरंचि’ जी मैथिली के लेखक एवं कवि थे। वे सोशलिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'जनता' के संपादक भी रहे थे।  1969 से 1973 तक वह मैथिली पत्रिका ' मिथिला मिहिर ' में  खूब लिखते थे। 

सुशांत भाई कह रहे थे कि यदि सबकुछ ठीक रहता तो शायद उनके पिता राजनीति में अपने अनुभव को किताब शक्ल देते, लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।

कभी सत्ता के शीर्ष पर रहे लोगों के करीब रहने वाले विरंचि जी अचानक सबसे दूर हो गए, वह भी अपनी इच्छा से। शायद उन्होंने राजनीतिक लोगों से लंबी दूरी बना ली थी या कह सकते हैं कि वह इस समय के अनुकूल ही नहीं रहे, उनका मन और मिजाज आज की राजनीति के लिए नहीं बना था।

इच्छा थी उनसे लंबी बातचीत की, प्रधानमंत्रियों की कहानी उनसे सुनने का मन था। अपने परिवार को उन्होंने इन सब चीजों से बहुत दूर रखा। 

ऐसे वक्त में जब हर कोई अपने और अपने परिजनों के लिए हर कुछ करने को उतारू है, हमें पद्मनारायण झा ‘विरंचि’ जी को समझना चाहिए।

Wednesday, December 23, 2020

बिहारी किसान

कई बार लगता है कि लिखना चाहिए, फिर गेहूं - मक्का में लग जाता हूं। लेकिन आज एक पत्रकार साथी का फोन आया, उनका सवाल किसान आंदोलन और उसमें कहीं भी न दिख रहे बिहारी किसान को लेकर था। उनसे लंबी बात हुई। उनका सवाल वाजिब था कि बिहार के किसान चुप क्यों हैं?  

ऐसे सवाल मुझे मोड़ पर खड़े कर देते हैं, जहां से सारे रास्ते अनजान लगने लगते हैं। दरसअल मेरा मानना है कि बिहार के सभी जिले से किसान गायब हैं, मतलब एब्सेंट फार्मर। यह शब्द कुछ वैसा ही है जैसा Absentee landlord होता है। ऐसे में जो बिहार में किसानी कर रहा है, उनकी संख्या अब कम ही बची है।

आप किसी भी गांव में घूम आइए, खेती में लीज़ सिस्टम आपको दिख जाएगा। एकड़ के हिसाब से जमीन मालिक किसान से सालाना पैसा लेते हैं, ऐसे में आप पूछ सकते हैं कि किसान कौन हुआ? जोतदार या फिर जमीन मालिक। कहीं न कहीं यह भी एक वजह है कि किसान का कोई संगठन बिहार में दिखता नहीं है।

आप उन लोगों से बात करिए, जिनके घर में पहले खेती बाड़ी हुआ करती थी, वह आपको बताएंगे कि पलायन केवल श्रमिक वर्ग का ही नहीं हुआ है बल्कि जमीन मालिक किसान परिवारों का भी हुआ है। बिहार में पिछले २० साल में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों का खेती से मोह भंग हुआ है जिनका घर परिवार पहले खेती बाड़ी से ही चलता था।

पलायन की जब भी बात होती है तो हम श्रमिक की बात करते हैं जो पंजाब, दिल्ली या अन्य राज्यों में दिहाड़ी करने जाते हैं, जो स्किल्ड लेबर कहलाते हैं। लेकिन हम किसान परिवार के पलायन पर एक शब्द नहीं लिखते हैं या कोई आंकड़ा जारी नहीं करते हैं। हमें इस पलायन को समझना होगा।

आप उस परिवार से बात करें जो पहले 10-15 एकड़ जमीन पर खेती करता था। पहले घर के बच्चे पढ़ने के लिए बाहर जाते हैं, फिर नौकरी करते हैं और इसके बाद अपने माता - पिता को साथ ले आते हैं। वह खेती वाली जमीन को गांव में छोड़ बस जाते हैं शहर में। यह एक अजीब तरह का पलायन है। 

जमीन पर जो खेती करते हैं, वे किराया देते हैं। बात का एक सिरा यहां उस किराया देने वाले किसान से भी जुड़ा है। वह भी दरअसल माइग्रेंट लेबर ही है। फसल लगाकर वह भी निकल जाता है दूसरे राज्य में दिहाड़ी करने। वह हर साल कमाने के लिए बाहर जाता है, क्योंकि उसे खेती के लिए पैसा चाहिए।

बिहार में किसान का कोई भी मोर्चा नहीं होने की एक वजह यह भी है। दरसअल गाम का गाम खाली पड़ा है। बड़े जोतदार नौकरी पेशा हो गए हैं और उनकी जमीन पर जो फसल उगाता है, वह शायद खुद को किसान मानता ही नहीं है। बिहार में किसानी की असल पीड़ा यही है, कटु है लेकिन सत्य यही है।

आप मंडी, भाव आदि की बात करते रहिए लेकिन किसान के नाम पर बिहार में आंदोलन राजनीतिक दल के लोग ही करेंगे, किसान चुप ही रहेगा। दिल्ली, पटना में बैठे लोग जो आंकड़ा जारी कर दें लेकिन बिहार में किसानी करने वाले चुप ही रहेंगे।