Tuesday, January 10, 2023

पिता, अब जहाँ हैं!

पिता की स्मृति अपने लिए आत्मालाप है। पिता जीवन में नायक की तरह दाखिल होते हैं, जो दुनिया को देखने का साहस देते हैं, अपनी नज़र से।
पिता जो अब हैं नहीं, लेकिन हैं, आसपास। श्याम तुलसी, कुछ फलदार पेड़, फूल - पत्ती और पानी की दुनिया के बीच वे स्थिर भाव से सबकुछ देखते नज़र आते हैं। उस जगह, जहाँ पिता हैं, वहाँ आम का पौधा, जो अब पेड़ बनने की राह पर आ चुका है, बाँह फैलाये मुस्कुरा रहा है। 

ठंड के इस मौसम में तालाब का पानी दोपहर में बड़ा मायावी दिखता है, दो दिन बाद धूप जो नसीब हुआ है। उधर, धूप उगते ही पक्षियों की चहचहाहट बढ़ सी गई है। 

पिता के जाने के बाद एक भाव आता है, जो कुछ कुछ पिता जैसा ही होता है, संयम का भाव! यह भाव जब आता है, एकांत का अहसास होता है। 

पिता के जाने के बाद स्मृति में ढेर सारी कहानियाँ आती- जाती रहती हैं। उन कहानियों में एक पगडंडी होती है, जिस पर चलते चलते कभी दिख जाते हैं पिता!  भरम ही सही लेकिन वो दिख जाते हैं, मुस्कुराते, कुछ कहते- समझाते... 

पिता अब जहाँ हैं, उसके आसपास हरी- हरी दूब पर दिख जाती है कभी-कभी नीलकंठ चिड़िया। गुजरे आठ सालों में बाबूजी की दुनिया और भी बड़ी हो चली है। वे दिखा रहे हैं ढेर सारी पगडंडियां, जिस पर चलते हुए मिल जाते हैं लोगबाग। 

मान्यताओं से इतर, एक राह होती है, जिसके सहारे हम पहुँचने की कोशिश करते हैं, पिता की स्मृति के समीप। पिता सब देखते हैं, अपने उन दिनों की कहानी सुनाते हैं, जिसमें माटी और माटी से जुड़े लोग होते हैं, हर रंग के... 

Friday, December 02, 2022

एकांत

कई बार लगता है कि एकांत ही आत्मालाप का सबसे बढ़िया रास्ता है, ठीक उस पगडंडी की तरह जिस पर लोगों की लगातार आवाजाही होती रहती है लेकिन असल में वह पगडंडी अकेला होता है। यदि आप गाम घर के पगडंडी को ध्यान से देखेंगे तो उसके एकांत को महसूस कर पाएंगे। 
दोपहर में जब खेत का काम लगभग खत्म हो चुका है, धूप मध्यम हो चुका है, तब चिड़ियों की आवाजें तेज हो गई है। इस मौसम में खेत सज संवर कर तैयार है। तैयार खेत के आल पर गिलहरियों की आवाजाही देखने वाली होती है। चंचल गिलहरियों को देखना असल में आत्मालाप ही है। खेत के आल पर चिड़ियों के बीच गिलहरियों को दौड़ते भागते देखना किसी योग की तरह है। आपको स्थिर मन से इन जीवों की चंचलता को अनुभव करना होगा। 
उधर, खेत से इतर आवासीय परिसर में पहाड़ी मैना और नीलकंठ चिड़ियाँ अपनी   आवाज़ों से जुगलबंदी कर रही है। आसपास कहीं बच्चे खेल कूद रहे हैं। बिजली के खंबे पर गिलहरियाँ कूद फ़ान रही है। आसपास जब इतनी चीजें एक साथ होती दिखती है, तब लगता है असल एकांत यही है, जहाँ हर एक जीव जीने की जुगत में कुछ न कुछ जरूर कर रहा है।

 फूलबारी में सफेद और गुलाबी रंग के गुलाबों पर तितलियाँ मंडरा रही हैं। इन सबको देखते हुए मन में कोई संगीत बजने लगा है, स्मृति में दिल्ली विश्वविद्यालय के नॉर्थ कैंपस में किसी साल देखे स्पिक मैके की संगीत संध्या की याद ताज़ा हो चली है। हवा में गुलाबी ठंड का अहसास सरोद वादक अयान अली बंगश के करीब पहुंचा रही है। जीवन संगीत का आलाप ही तो है, हर कोई रियाज़ में लगा है, अपने- अपने एकांत में। #ChankaResidency

Friday, October 28, 2022

कथावाचक पंकज त्रिपाठी


मुझे जिस तरह फणीश्वर नाथ रेणु का साहित्य अपनी ओर खींचता है, ठीक उसी तरह अभिनेता पंकज त्रिपाठी की बोली बानी भी आकर्षित करती है। सच यह है कि मुझे किस्सागो लोग सबसे अधिक पसंद हैं। और अपने पंकज त्रिपाठी भैया भी कमाल के किस्सागो हैं। 
उनसे आप जब कोई सवाल पूछेंगे तो जवाब की रेखा ऐसी होगी मानो कोई पेंटिंग हो। वे बातों ही बातों में आपको अपने गाम-घर लेकर चले जायेंगे और फिर खेत-पथार के बीच छोड़ देंगे। उनकी बातों में आसपास के ढेर सारे लोग होते हैं, कई चरित्र नायक होते हैं। वे कहानियों में कहानी खोज लाते हैं। कल्पना की बात करते हैं, आसमां की बात करते हैं। सच पूछिए तो मुझे वे तो खेतिहर अभिनेता लगते हैं, जिसे पता होता है कि धान की खेती कैसे होगी, गेंहू में कितनी पटवन की आवश्यकता है। 

अभी यूट्यूब पर उनकी एक बातचीत सुन रहा था, ऋचा अनिरूद्ध जी के साथ। इसमें वे एक जगह कहते हैं- "हम आम, महुआ, परवल, टमाटर के बीच के अभिनेता हैं। "

उनकी यह बात सुनकर मुझे रेणु की कहानी रसप्रिया को याद आ गई। यह कहानी मुझे बहुत पसंद है। कहानी की शुरुआत इस वाक्य से होती है- “धूल में पड़े कीमती पत्थर को देखकर जौहरी की आँखों में एक नयी झलक झिलमिला गयी- अपरूप –रूप ! ”

दरअसल पंकज भैया का अभिनय और उनका किस्सागो चरित्र सचमुच ‘रेणु की रसप्रिया’ ही है। आप उनकी कोई बातचीत सुन लें, हर बातचीत में गाँव सबसे अधिक मुखर होता है। मुझे वे मुंबई में एक देहाती लगते हैं, जो अपने संग गाम - घर लिए चलता - फिरता रहता है। यदि आप फणीश्वर नाथ रेणु के साहित्य में रुचि रखते हैं तो उनके उपन्यास ' परती परिकथा' से भी परिचित होंगे। इस उपन्यास में एक भिम्मल मामा हैं। रेणु का यह पात्र कोई गैरवाजिब बात नहीं कहता लेकिन, उसको अपने ढंग से सुनाता है। यही पंकज त्रिपाठी भैया का अंदाज है। 

ऋचा जी के कार्यक्रम Zindagi with Richa में पंकज भैया मुझे रेणु के किसी स्केच की तरह लग रहे थे, जिसकी आँखों में गाँव है और आँखें भी कैसी, मानो वह गाँव से निकल रहा हो...

दो घंटे से अधिक लंबी इस बातचीत को सुनते हुए आप अनुभव कर सकते हैं कि पंकज त्रिपाठी भैया असल में कमाल के कथावाचक हैं। एक ऐसा कथावाचक जो पल भर में आपको हँसा देगा तो दूसरे ही पल आपको रूला भी देगा। 

पंकज जी के इस इंटरव्यू को देखते हुए मुझे रेणु जी का लिखा बिदापत-नाच याद आने लगा। बिदापत नाच में रेणु लिखते हैं-
“दुखी - दीन, अभावग्रस्तों ने घड़ी भर हँस-गाकर जी बहला लिया, अपनी जिंदगी पर भी दो-चार व्यंग्य बाण चला दिये, जी हल्का हो गया। अर्धमृत वासनाएं थोड़ी देर के लिए जगीं,  अतृप्त जिंदगी के कुछ क्षण सुख से बीते। मिहनत की कमाई मुट्ठी भर अन्न के साथ-साथ आज इन्हें थोड़ा सा ‘मोहक प्यार’ भी मिलेगा, इसमें संदेह नहीं। आप खोज रहे हैं – आर्ट, टेकनीक और न जाने क्या-क्या और मैं आपसे चलते-चलाते फिर भी अर्ज करता हूँ कि यह महज बिदापत नाच था।”

और फिर चलते-चलते यही कहूंगा कि अभिनय के क्षेत्र में पंकज त्रिपाठी जो भी हों, असल में वे रेणु के स्केच हैं...

Sunday, October 02, 2022

गांधी जी के नाम पर झूठ!

आज बापू की जयंती है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि हम सबसे अधिक झूठ बापू के ही नाम पर बोलते हैं। अब दो अक्टूबर को आयोजित होने वाले ग्राम सभा को ही लीजिये! यह भी एक झूठ है। जबकि यह लिखते हुए मुझे गांधी जी का यह लिखा याद आ रहा है - "अगर हिंदुस्‍तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्‍वीर की सच्‍चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी।”

पिछले एक दशक से बिहार के ग्रामीण इलाके में हूँ और सच कह रहा हूँ ' ग्राम सभा' का मजाक देख रहा हूँ। एक कॉपी या कहिये एक रजिस्टर में ग्राम सभा आयोजित होती है और उस कॉपी के पन्ने पर गांधी जयन्ती लिख कर झूठ का व्यापार किया जाता है।दरअसल यहीं से 'गांधी' नाम पर घोटाले की शुरुआत होती है। 

यह कटु सच है कि हम सबकी चुप्पी गांधी जी के नाम पर होने वाले झूठ के व्यापार को बढ़ावा देती आई है। इसके लिए हम सब दोषी हैं क्योंकि यह देश की संसद की बात नहीं, हमारे आपके पंचायत - वार्ड की है। 

आप दिल्ली- पटना या किसी भी सूबे के प्रधान को बड़ी आसानी से दो बात कह देते हैं लेकिन आँख के सामने घर-दुआर - पंचायत में होने वाली गलतियों पर गज़ब की चुप्पी साध लेते हैं। ईमानदारी से कहूँ तो ग्राम सभा में एक चुप्पी रहती है और फिर उस चुप्पी के एवज में लम्बा व्यापार चलता है। 

हमें इस चुप्पी की ही सजा मिल रही है। गांधी हमें अन्याय सहने की बात नहीं कह गए हैं। कम से कम गाँव में चुनाव के जरिये जिन्हें चुनते हैं, उनसे तो सवाल करिये। 

बापू की सादगी से सीखने का यह समय है। निजी तौर पर मुझे उनकी सादगी ही  खिंचती है। कोई आदमी इतनी ऊँचाई पर पहुँचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रखा होगा, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी। तो आइये, सादगी से ही सही सवाल करिये! 

#GandhiJayanti

Saturday, September 24, 2022

पितृपक्ष और बाबूजी

पितृपक्ष शब्द ही खुद में एक शास्त्र है। इस दौरान हम अपने पुरखों को याद करते हैं, उनकी स्मृति में कुछ न कुछ जरूर करते हैं। मेरे लिए पितृपक्ष शक्ति पूजा की तरह है। मेरे लिए पितृपक्ष की  अलग अलग तिथि पूर्वजों का आशीष है। 
बाबूजी हर दिन तर्पण करते थे, वे पुरखों को याद करते थे। तर्पण की परम्परा हमने बाबूजी से ही सीखी। वे नियम से तर्पण करते थे। शास्त्रीय - धार्मिक पद्धति के अलावा वे एक काम और किया करते थे, वह था अपने पूर्वजों के बारे में बच्चों को जानकारी देना। दादाजी की बातें वे बड़े नाटकीय अन्दाज़ में सुनाते थे।  वे उसमें वे शिक्षा, व्यवहार के संग खेती- बाड़ी को जोड़ते थे। सबसे बड़ी बात वे किसी की भी निंदा नहीं करते थे। उनके भीतर जो चलता हो लेकिन बाहर वे किसी की निंदा करने से बचते थे। अपने किये के प्रचार से वे हमेशा दूर रहे। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि हमने ये किया.. वे सबकुछ 'अपने पिता का किया' कहते थे। 

पितृपक्ष की परंपरा को समझने- बूझने के दौरान आज बाबूजी की बहुत याद आ रही है। लगता है वे आसपास कहीं टहल रहे हैं। हर दिन जब संघर्ष का दौर बढ़ता ही जा रहा है और सच पूछिए तो चुनौतियों से निपटने का साहस भी बढ़ता ही जा रहा है, ऐसे में लगता है कि बाबूजी ही मुझे साहस दे रहे हैं। अक्सर शाम में पूरब के खेत में घूमते हुए लगता है कि वे सफेद धोती और बाँह वाली कोठारी की गंजी में मेरे संग हैं।

लोग पितृपक्ष में परंपराओं के आधार पर बहुत कुछ करते हैं, मैं कोई अपवाद नहीं। लेकिन मैं उन चीज़ों से मोहब्बत करने लगा हूं, जिसे बाबूजी पसंद किया करते थे। खेत, पेड़-पौधे, ढ़ेर सारी किताबें, डायरी में लिखा उनका सच और उनकी काले रंग की राजदूत।

बाबूजी की पसंदीदा काले रंग की राजदूत को साफ़ कर रख दिया है, साइड स्टेण्ड में नहीं बल्कि मैन स्टेण्ड में। वे साइड स्टेण्ड में बाइक को देखकर टोक दिया करते थे और कहते थे : " हमेशा सीधा खड़े रहने की आदत सीखो, झुक जाओगे तो झुकते ही रहोगे..."

सच कहूं तो अब अपने भीतर, आस पास सबसे अधिक बाबूजी को महसूस करता हूं। पितृपक्ष में लोगबाग कुश-तिल और जल के साथ अपने पितरों को याद करते हैं। लेकिन मैं अपनी स्मृति से भी अपने पूर्वजों को याद करता हूं क्योंकि स्मृति की दूब हमेशा हरी होती है और इस मौसम में सुबह सुबह जब दूब पर ओस की बूँदें टिकी रहती है तो लगता है मानो दूब के सिर पे किसी ने मोती को सज़ा दिया है।

आज बाबूजी से जुड़ा सबकुछ याद आ रहा रहा है। उनका अंत कष्ट से भरा रहा। जीवन के अंतिम दो साल मानो वे कष्ट के हर रंग को देखना चाहते थे। पितृपक्ष में मुझे बाबूजी की दवा, बिछावन, व्हील चेयर, किताबों वाला आलमीरा...सबकुछ याद आता है, मेरे लिए स्मृति भी एक तरह का तर्पण ही है। 

मैं हर दिन सबकुछ उन्हें अर्पित करता हूं। वे मेरे लिए एक जज्बाती इंसान थे लेकिन यह भी सच है कि वे ऊपर से एक ठेठ-पिता थे,  जिसने कभी अपना दुख साझा नहीं किया, जिसने अपनी पीड़ा को कभी सार्वजनिक नहीं होने दिया।

आगच्छन्तु मे पितर इमं गृह्णन्त्वपोऽञ्जलिम्।।
ॐ पितरस्यस्तृप्यन्ताम्।।




Saturday, August 13, 2022

जीवन चलता ही रहता है!

जीवन चलता ही रहता है ! लेकिन स्मृति में बिछड़ गए लोग बने रहते हैं, हर मोड़ पर वह मुस्कुराते मिल जाते हैं। ऐसे लोग हमेशा संग में बने रहते हैं।

स्मृति ऐसी चीज है, जिसमें हम अपने को खोज ही लेते हैं, कहीं भी! कहीं बजते किसी गीत के बोल में, किसी पेंटिंग - स्केच में तो किसी बहते पानी में... 

बिछड़े लोग कुछ न कुछ सीख देकर ही बिछड़ते हैं। बिछड़ कर वे गुरु की माफिक हो जाते हैं, जो दुःख भी देते हैं तो कुछ सिखाने के लिए ही। उम्र से परे हो जाते हैं बिछड़े लोग, मानो आसमां में उमड़-घुमड़ रहे हों। उनका बरस जाना हमें भीतर से भींगो देता है। आँख जब भर आती है तो लगता है, कन्धे पे हाथ दिये वह मुस्कुरा रहा हो... 
किसी के चले जाने का दुःख कोई बयां नहीं कर सकता। हम दुःख में अपने बिछड़े को याद करते रोते हैं, दिन काटते हैं लेकिन आसपास सबकुछ चलता रहता है, तेज़ रफ्तार में...

जीवन यही है! हमारा दुःख हमारा होता है, हमें ही ख़ुद को संभालना होता है, आसपास सबकुछ चलता रहता है, बहता रहता है, गंगा नदी की तरह, जिसमें सबकुछ है, पत्थर भी, माटी भी,  पूर्णिमा भी अमावस भी।

Wednesday, July 20, 2022

खेत उजड़ता दिख रहा है

खेत उजड़ता दिख रहा है। बारिश इस बार धरती की प्यास नहीं बुझा रही है। डीजल फूँक कर जो धनरोपनी कर रहे हैं और जो खेत को परती छोड़कर बैठे हैं, दोनों ही निराश हैं।  किसानी कर रहे हमलोग परेशान हैं। फ़सल की आश जब नहीं दिख रही है, तब ऋण का बोझ हमें परेशान कर देता है। नींद ग़ायब हो जाती है। खेती नहीं कर रहे लोग ऐसे वक़्त में जब ‘क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए’ का ज्ञान देते हैं तो लगता है कि उन्हें कहूँ कि बस एक कट्ठा में खेती कर देख लें। 
दरअसल किसानी का पेशा प्रकृति से जुड़ा है, लाख वैज्ञानिक तरीक़े का इस्तेमाल कर लें लेकिन माटी को तो इस मौसम में बारिश ही चाहिए। 
सुखाड़ जैसी स्थिति आ गयी है। 

डीज़ल फूँक कर धनरोपनी नहीं कराने का फ़ैसला डराता भी है लेकिन क्या करें ? सरकार तमाम तरह की बात करती है, योजनाएँ बनाती हैं लेकिन किसान को मज़बूत करने के बजाय उसे मजबूर बना रही है।

योजना का लाभ उठाने के लिए हमें इतनी काग़ज़ी प्रक्रियाओं से जूझना पड़ता है कि हम हार जाते हैं। डीज़ल अनुदान लेने के लिए जिस तरह की प्रक्रिया प्रखंड-अंचल मुख्यालय में देखने को मिलती है तो लगता है इससे अच्छा किसी से पैसा उधार लेकर खेती कर ली जाए। यही हक़ीक़त है। 

किसान बाप के बेटे-बेटी को, जिसकी आजीविका खेती से चलती है उसे अपनी ही ज़मीन  लिए बाबू सब के दफ़्तरों का चक्कर लगाना पड़ता है। 

बारिश के अभाव ने मन को भी सूखा कर दिया है। किसानी का पेशा ऐसे समय में सबसे अधिक परेशान करता है।

उधर, मानसून सत्र को लेकर मुल्क मगन है और इधर हम धनरोपनी और पानी का रोना रो रहे हैं। हमारी समस्या में ग्लैमर नहीं है, हमारी परेशानी में ख़बर का ज़ायक़ेदार तड़का नहीं है, हमारी बात न्यूज़रूम की टीआरपी नहीं है, हमारे सूखते खेत सरकार बहादुर के लिए वोट का मसाला नहीं है, ऐसे में हम जहाँ थे, वहीं हैं। हम रोते हैं तो ही हुक्मरानों को अच्छा लगता है। हमारा रोना सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए डाइनिंग टेबल का रायता है। 

वैसे बारिश आज नहीं तो कल आएगी...फिर एक दिन हम बाढ़ में डूब जाएँगे तब अचानक हवाई दौरा शुरू हो जाएगा...2024 की तैयारी शुरू हो जाएगी।