Monday, January 25, 2021

पूर्णिया में किताब दान अभियान और गाँव-गाँव में लाइब्रेरी की बात

किताबों के साथ हम सभी का रिश्ता रहा है। हम उस रिश्ते को हर उम्र में नए सिरे से अनुभव करते हैं। तकनीकी दौर में भी यह रिश्ता कमजोर नहीं हुआ है। हम सभी के घरों में किताबों का एक ठिकाना जरूर रहता है, जहाँ पहुँचकर हम सभी पन्नों में लिखे शब्दों की दुनिया में खो जाते हैं। एक वक्त था जब गाँव-गाँव में लाइब्रेरी हुआ करती थी, लोगबाग वहाँ जाते थे लेकिन समय की तेज रफ्तार में ऐसी जगहें कम होने लगी। ऐसे दौर में जब देश के अलग-अलग हिस्सों में विकास का मतलब निर्माण कार्यों को समझा जाने लगा है, ऐसे वक्त में कोई जिला यदि किताबों की बात करता है तो उसके मर्म को समझने की जरूरत है।



भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी राहुल कुमार बिहार के पूर्णिया जिला में कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। साल 2020 के जनवरी महीने में पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार ने एक अभियान की शुरुआत की थी- अभियान किताब दान। कोराना महामारी की वजह से यह अनोखा अभियान प्रभावित हुआ लेकिन इसके बावजूद लोगों ने 61000 किताबें इस अभियान में दान दी। और साल 2021 में इस अभियान को मूर्त रूप देने की शुरूआत राहुल कुमार ने कर दी है। 25 जनवरी को जिला के परोरा गाँव में राहुल कुमार ने एक पुस्तकालय की शुरूआत की, जिसमें इस अभियान से प्राप्त किताबों को रखा गया है।

मुझे याद है, 25 जनवरी 2020 को इस अभियान की जब शुरूआत हुई थी तो पहले दिन ही 400 किताबें प्राप्त हुई थी। जिला के समाहरणालय सभागार में किताब दान अभियान की शुरूआत हुई थी। राहुल कुमार ने उस दिन भी कहा था कि यह अभियान लोगों का है, इसमें हर कोई सहयोग करेगा और आज एक साल बाद जब परोरा गाँव में वह लोगों के बीच थे, उस वक्त भी उन्होंने यही बात दोहरायी।

दरअसल हम सभी के घरों में ऐसी ढेर सारी किताबें होती है, जिसे हम पढ़ चुके होते हैं और वह रखी रह जाती है। ऐसी किताबों को हम लाइब्रेरी तक पहुँचा सकते हैं ताकि शब्द की यात्रा जारी रहे। पूर्णिया के जिलाधिकारी का यह अभियान हमें बताता है कि गाँव-गाँव में किताबों का एक सुंदर सा ठिकाना बनना चाहिए। उनका कहना भी है कि जिला के हर पंचायत में एक मिनी लाइब्रेरी शुरू होगी। जिले में अब तक अभियान किताब दान के तहत 61 हजार पुस्तकें प्राप्त हुई है। इन पुस्तकों से पंचायतों में मिनी पुस्तकालय खोलने का सुझाव दिया गया है। जहाँ पंचायत सरकार भवन है वहाँ तथा अन्य भवनों में जगह देखी जा रही है। इसके लिए एक समिति भी बनाई जाएगी, जो पुस्तकालय की देख-रेख कर सकेगी।



पूर्णिया जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित परोरा गाँव में आज जब पंचायत भवन परिसर में लाइब्रेरी की शुरूआत हुई तो लगा बदलाव इस तरह भी लाया जा सकता है। जब भी किसी गाँव के ग्राम पंचायत भवन के परिसर में जाता हूँ तो सबसे पहले मन में गाँधी की छवि ही आती है। बापू ने ‘मेरे सपनों का भारत’ में पंचायती राज के बारे में जो विचार व्‍यक्‍त किये हैं वे आज वास्‍तविकता के धरातल पर साकार हो चुके है क्‍योंकि देश में समान तीन-स्‍तरीय पंचायती राज व्‍यवस्‍था लागू हो चुकी है जिसमें हर एक गाव को अपने पांव पर खड़े होने का अवसर मिल रहा है। बापू का मानना था कि जब पंचायती राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती। आज परोरा गाँव में लाइब्रेरी के बहाने बापू की लिखी बातें भी याद आने लगी।

कभी कभी सोचता हूँ कि जिला की कमान संभालने वाले अधिकारी को लोगबाग ढेर सारे विकास कार्यक्रमों, भवनों या अन्य सरकारी परियोजनाओं के लिए याद करते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें लोग बदलाव के लिए याद करते हैं। किताब दान अभियान की शुरूआत करने वाले राहुल कुमार ऐसे ही लोगों में एक हैं। पूर्णिया में गाँव -गाँव तक पुस्तकालय पहुँचाने का उनका अभियान दरअसल पूर्णिया के जन-जन का अभियान है। लोगबाग अपनी आदतों में किताब को शामिल करें, इससे बेहतर और क्या हो सकता है। 

आज जब परोरा गाँव से लौट रहा था तो सोचने लगा कि किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं.... लिखने वाले गुलज़ार काश पूर्णिया आते और गाँव के किसी लाइब्रेरी में पढ़ते लोगों को देखते तो फिर यह नहीं कहते बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें..’ 


यदि आप भी किताब दान करना चाहते हैं तो जिला शिक्षा पदाधिकारी पूर्णिया के कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं, नंबर है- 8544411773

Tuesday, January 12, 2021

वेब स्पेस पर उम्मीद वाला ठिकाना - The Better India

 

महामारी के दौरान हम सब घरों में बंद थे। सच कहूं तो हम सब खुद से जूझ रहे थे। हर एक इंसान अपने जीवन में पहली बार एक ऐसी महामारी के संक्रमण से जूझ रहा था, जिसके बारे में कुछ भी सटीक कहना नामुमकिन था। कल कैसा होगा, यह सोचकर बस अंधेरा ही दिखता था।

 

हम सभी के बही-खाते में साल 2020 की कहानी कुछ इस तरह ही शुरू हुई थी और इसी अंदाज में खत्म भी हुई। 2020 में सबकुछ बंद ही रहा। मैं भी खेती-बाड़ी, गाम-घर और अपने चनका रेसीडेंसी के कामकाज से दूर शहर के घर में बंद हो चुका था। किताबें एकमात्र सहारा थी। इस बीमारी ने पॉजीटिव शब्द की व्याख्या ही बदल दी लेकिन सच यही है कि उस दौर में हर किसी को अवसाद से दूर रहने के लिए सकारात्मक खबरों की तलाश थी।

 

मार्च 2020 के आखिरी सप्ताह में द बेटर इंडिया हिंदी की संपादक मानबी कटोच जी से बात होती है। द बेटर इंडिया से अपना पुराना रिश्ता रहा है लेकिन कोरोना महामारी के दौरान खबरों का यह अड्डा मेरे लिए दवा की माफिक बन गया।

 

सकारात्मक खबरों को पढ़ते हुए आप न केवल खुद भीतर से मजबूत बनते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों को भी ऐसी खबरों के बारे में बताते हैं।

 

हर दिन इस वेब स्पेस के लिए खबरों को संपादित करते हुए मन भीतर से मजबूत होता चला गया। देश के अलग-अलग हिस्सों से केवल और केवल ऐस ही खबरें आतीं थीं जिसे पढ़कर लगता था कि सवेरा दूर नहीं है। झारखंड के कामदेव पान की कहानी कुछ ऐसी ही थी, जिसने कारोबार बंद होने पर निराश होने की बजाय मैजिक बल्ब का आविष्कार कर दिया।

 

अप्रैल 2020 से लेकर दिसंबर 2020 तक ऐसी ही सैकड़ों खबरों से रोज मिलता रहा। मेरे लिए यह सारी खबरें दवा की माफिक रही। एक कहानी हाल ही में कर्नाटक से आई थी। यह कहानी कर्नाटक के रायचूर जिले में रहने वाली कविता मिश्रा की थी, जिन्होंने कंप्यूटर में डिप्लोमा किया हुआ है और साइकोलॉजी में मास्टर्स की है। लेकिन आज उनकी पहचान एक सफल किसान के तौर पर है।

 

जब स्कूल बंद था, उस वक्त बच्चों को लोग किस तरह पढ़ा रहे थे, इस संबंध में एक कहानी झारखंड से आई थी। झारखंड स्थित जरमुंडी ब्लॉक के राजकीय उत्क्रमित मध्य विद्यालय, डुमरथर के प्रिंसिपल डॉ. सपन कुमार ने इसे सच कर दिखाया है। उन्होंने जब देखा कि कोरोना संक्रमण की आशंका को दखते हुए बच्चे विद्यालय नहीं आ पा रहे हैं और ऑनलाइन शिक्षा पाने के लिए उनके पास स्मार्ट फोन और बेहतरीन मोबाइल नेटवर्क जैसे संसाधन नहीं हैं, तो उन्होंने स्कूल को ही उनके घर तक ले जाने का फैसला कर लिया।

 

अभिभावकों की इजाजत से उनके घरों की दीवार पर थोड़ी-थोड़ी दूरी के साथ ब्लैक बोर्ड बनवा दिए गए, ताकि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो सके। इन्हीं ब्लैक बोर्ड पर छात्र, शिक्षक के पढ़ाए पाठ लिखते हैं और सवालों के जवाब भी लिखते हैं। डॉ. सपन कुमार खुद कम्युनिटी लाउड स्पीकर के ज़रिए बच्चों को पढ़ाई करवा रहे थे।

 

सच कहूँ तो ऐसी खबरें पढ़कर लगता है कि हम कितना कुछ अपने स्तर पर कर सकते हैं, वो भी विरपरित से विपरित समय में।

 

शहरों में बागवानी के शौकिन लोगों की बात करें तो उनकी कहानी भी कम रोचक नहीं हैं। टेरैस गार्डनिंग से लेकर खाली पड़े जगहों पर फूल-पत्ती या सब्जी उगाने वाले लोगों की ढेर सारी स्टोरी मेरे सामने आई।

 

ऐसी ही एक कहानी जो दिल को छू गई वह कर्नाटक से आई थी। बेंगलुरू में रहने वाले सुरेश राव, स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया में बतौर सीनियर अकाउंटेंट कार्यरत हैं और साथ ही, पूरे पैशन से गार्डनिंग भी करते हैं। उन्होंने अपने खर्च से अनाथालय की छत को किचन गार्डन बना दिया, जहाँ से अब बच्चों को हरी-हरी ताजी सब्जियां मिलती है। वह कहते हैं कि इस काम से उन्हें अपने जीवन में सबसे अधिक संतुष्टि मिली।

 

द बेटर इंडिया के प्लेटफार्म पर जब आप खबरों को खंगालेंगे तो पता चलेगा कि देश भर में कितनी सारी प्रेरक कहानियां आपका इंतजार कर रही हैं, जिसे पढ़कर आपका भरोसा बढ़ेगा। कुछ ऐसी ही कहानी केरल के कासरगोड के रहने वाले 67 वर्षीय कुंजंबु की है, जो  पिछले 50 वर्षों से अधिक समय के दौरान 1000 से अधिक सुरंगे बना चुके हैं। जिसके फलस्वरूप आज गाँव के लोगों को पानी के लिए बोरवेल पर कोई निर्भरता नहीं है।

 

इनकी कहानी को पढ़ते हुए लगा कि मुश्किल से मुश्किल वक्त में भी हमें हार नहीं माननी चाहिए। हम अपने लिए तो बहुत कुछ करते हैं लेकिन समाज के लिए कुछ भी करने से पहले कितना सोच-विचार करने लगते हैं। ऐसे लोगों को कुंजंबु की कहानी कहानी पढ़नी चाहिए। जुनून और इच्छाशक्ति, ऐसे दो तत्व हैं, जिससे इंसान किसी भी लक्ष्य को हासिल कर सकता है। बिहार के माउंटेन मैन दशरथ माँझी , जिन्होंने केवल एक हथौड़ा और छेनी से पहाड़ को काट कर, सड़क बना डाला था। कुछ ऐसा ही काम कुंजंबु भी कर रहे हैं।

 

वेब साइट पर बात करने वाले समीक्षक अपनी निगाहों से अपने अनुशासन से कंटेट को देखते हैं और फिर उस प्लेटफार्म की समीक्षा करते हैं। लेकिन एक आम आदमी की भाषा में कहूं तो यह प्लेटफार्म बहुत तरीके से हमें बदल देती है, यह खुद मैं महसूस करता हूँ। इनकी खबरों से गुजरते हुए लगता है दुनिया इतनी भी बुरी नहीं है, कितना कुछ अच्छा हो रहा है देश-दुनिया में

और चलते-चलते मेरी प्रिय कहानी को एक बार जरूर पढ़िए, जो मुंबई में 22 साल से एडवरटाइजिंग जगत में काम करने वाले राहुल कुलकर्णी और मराठी नाटक, टी.वी और फिल्मों की जानी-मानी अभिनेत्री संपदा कुलकर्णी की है, जिन्होंने मुंबई शहर की चकाचौंध और सुख-सुविधाओं को छोड़कर कोंकण के एक छोटे से गाँव, फुणगुस में एक फार्म-स्टे बनाया है, जिसका नाम है-‘Farm Of Happiness’

 

इस तरह की कहानियों को पढ़कर आपको लगेगा कि जीवन में सकात्मक होना सबसे अधिक जरूरी है। यह एक ऐसा गुण है, जिसके बल पर आप मुश्किल से मुश्किल रास्तों को पार कर सकते हैं। यह गुण आपके नजरिए को बदल देता है। द बेटर इंडिया की खबरों में डुबकी लगाते वक्त कुछ ऐसा ही अहसास होता है। अकबर इलाहाबादी के शब्दों में कहूं तो

 

" कहीं नाउम्मीदी ने बिजली गिराई

कोई बीज उम्मीद के बो रहा है..."

 


Sunday, January 03, 2021

पद्मनारायण झा ' विरंचि ' जी की अनसुनी कहानी

जब युवा थे तो साहित्य में रुचि थी। फिर  राजनीति में रच बस गए। राजनीति में नीति को पकड़ कर रहे इस वजह से जीवन के उस मोड़ में जहां लोग ऊंचाई को हासिल करने के लिए जुगत में लगे रहते हैं, वो चुपचाप गाम में बस गए।
एक ऐसा शख्स जिसे कभी संजय गांधी ने बिहार में मंत्री पद का ऑफर दिया था लेकिन उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि जब अपने लोग कमजोर हो जाएं तो उन्हें छोड़ना नहीं चाहिए बल्कि उनका साथ बनाए रखना चाहिए। यह कहानी उस वक्त की है जब लोकदल को कांग्रेस तोड़ रही थी। हेमवती नंदन बहुगुणा के लोगों को संजय गांधी तोड़ने में लगे थे। इसी दौरान संजय गांधी ने बहुगुणा के सबसे करीबी पद्मनारायण झा ' विरंचि ' जी बुलाकर कहा कि वह कांग्रेस में शामिल हो जाएं और बिहार में मंत्री पद ले लें। इस प्रस्ताव को विरंचि जी ने ठुकराते हुए कहा - " संजय जी, अभी बहुगुणा जी की पार्टी कमजोर है। लोग उनका साथ छोड़ रहे हैं। लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता। मैं उनके साथ ही रहूंगा। मैं रमानंद तिवारी का शिष्य हूं  और समझौता करना नहीं जानता। "

यह सुनकर संजय गांधी ने कहा था - "मिस्टर झा, मेरा ऑफर कोई ठुकराता नहीं है, आप अलग हैं। "

राजीव गांधी जब पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे थे तो शूट पहनकर इस शख्स के पास आते हैं , और पूछते हैं - " मैं ठीक लग रहा हूं न ! "

देवेगौड़ा जब प्रधानमंत्री बने तो इस शख्स को बिहार के इनके गांव से बुला लाए। फिर मुलाकात के लिए उन्हें प्रधानमंत्री निवास बुलाया गया। संयोग से उस वक्त मुलाकातियों  में धीरू भाई अंबानी भी थे, वह भी पीएम के कॉल का इंतज़ार कर रहे थे और बड़ी बैचेनी से लॉबी में थे। दरअसल अंबानी से पहले उसी शख्स को मिलना था। अचानक उस शख्स ने अंबानी से कहा - "आपको  शायद जरूरी काम है, जाइए मिल आइए प्रधानमंत्री से..।" अंबानी जब मुलाकात कर बाहर आते हैं तो कहते हैं - " मुझे पहली बार कोई ऐसा शख्स मिला है जो प्रधानमंत्री का समय किसी और को दे दिया हो, मिस्टर झा आप प्लीज बंबई आइए, मेरा नंबर रखिए। " लेकिन इस शख्स ने कभी अंबानी से मुलाकात नहीं की।

ऐसी कई कहानियों को खुद में ही समेटे पद्मनारायण झा ‘विरंचि’ जी अनंत यात्रा पर निकल गए। कल जब मधुबनी जिला  स्थित उनके गांव खोजपुर जाना हुआ तो लगा राजनीति में एकांत का भी स्थान है। उनके बेटे प्रशांत झा और सुशांत झा को बस देखता रह गया। उनका घर मुझे आश्रम की तरह लगा। वहां कोई हड़बड़ी का आभास नहीं हुआ, संतुष्टि का अनुभव हुआ।  हालांकि पिता के बिना जीवन क्या होता है, इसे लिखना सबसे कठिन काम है। 

समाजवादी चिंतक पद्मनारायण झा ‘विरंचि’ जी मैथिली के लेखक एवं कवि थे। वे सोशलिस्ट पार्टी के मुखपत्र 'जनता' के संपादक भी रहे थे।  1969 से 1973 तक वह मैथिली पत्रिका ' मिथिला मिहिर ' में  खूब लिखते थे। 

सुशांत भाई कह रहे थे कि यदि सबकुछ ठीक रहता तो शायद उनके पिता राजनीति में अपने अनुभव को किताब शक्ल देते, लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था।

कभी सत्ता के शीर्ष पर रहे लोगों के करीब रहने वाले विरंचि जी अचानक सबसे दूर हो गए, वह भी अपनी इच्छा से। शायद उन्होंने राजनीतिक लोगों से लंबी दूरी बना ली थी या कह सकते हैं कि वह इस समय के अनुकूल ही नहीं रहे, उनका मन और मिजाज आज की राजनीति के लिए नहीं बना था।

इच्छा थी उनसे लंबी बातचीत की, प्रधानमंत्रियों की कहानी उनसे सुनने का मन था। अपने परिवार को उन्होंने इन सब चीजों से बहुत दूर रखा। 

ऐसे वक्त में जब हर कोई अपने और अपने परिजनों के लिए हर कुछ करने को उतारू है, हमें पद्मनारायण झा ‘विरंचि’ जी को समझना चाहिए।

Wednesday, December 23, 2020

बिहारी किसान

कई बार लगता है कि लिखना चाहिए, फिर गेहूं - मक्का में लग जाता हूं। लेकिन आज एक पत्रकार साथी का फोन आया, उनका सवाल किसान आंदोलन और उसमें कहीं भी न दिख रहे बिहारी किसान को लेकर था। उनसे लंबी बात हुई। उनका सवाल वाजिब था कि बिहार के किसान चुप क्यों हैं?  

ऐसे सवाल मुझे मोड़ पर खड़े कर देते हैं, जहां से सारे रास्ते अनजान लगने लगते हैं। दरसअल मेरा मानना है कि बिहार के सभी जिले से किसान गायब हैं, मतलब एब्सेंट फार्मर। यह शब्द कुछ वैसा ही है जैसा Absentee landlord होता है। ऐसे में जो बिहार में किसानी कर रहा है, उनकी संख्या अब कम ही बची है।

आप किसी भी गांव में घूम आइए, खेती में लीज़ सिस्टम आपको दिख जाएगा। एकड़ के हिसाब से जमीन मालिक किसान से सालाना पैसा लेते हैं, ऐसे में आप पूछ सकते हैं कि किसान कौन हुआ? जोतदार या फिर जमीन मालिक। कहीं न कहीं यह भी एक वजह है कि किसान का कोई संगठन बिहार में दिखता नहीं है।

आप उन लोगों से बात करिए, जिनके घर में पहले खेती बाड़ी हुआ करती थी, वह आपको बताएंगे कि पलायन केवल श्रमिक वर्ग का ही नहीं हुआ है बल्कि जमीन मालिक किसान परिवारों का भी हुआ है। बिहार में पिछले २० साल में बड़ी संख्या में ऐसे लोगों का खेती से मोह भंग हुआ है जिनका घर परिवार पहले खेती बाड़ी से ही चलता था।

पलायन की जब भी बात होती है तो हम श्रमिक की बात करते हैं जो पंजाब, दिल्ली या अन्य राज्यों में दिहाड़ी करने जाते हैं, जो स्किल्ड लेबर कहलाते हैं। लेकिन हम किसान परिवार के पलायन पर एक शब्द नहीं लिखते हैं या कोई आंकड़ा जारी नहीं करते हैं। हमें इस पलायन को समझना होगा।

आप उस परिवार से बात करें जो पहले 10-15 एकड़ जमीन पर खेती करता था। पहले घर के बच्चे पढ़ने के लिए बाहर जाते हैं, फिर नौकरी करते हैं और इसके बाद अपने माता - पिता को साथ ले आते हैं। वह खेती वाली जमीन को गांव में छोड़ बस जाते हैं शहर में। यह एक अजीब तरह का पलायन है। 

जमीन पर जो खेती करते हैं, वे किराया देते हैं। बात का एक सिरा यहां उस किराया देने वाले किसान से भी जुड़ा है। वह भी दरअसल माइग्रेंट लेबर ही है। फसल लगाकर वह भी निकल जाता है दूसरे राज्य में दिहाड़ी करने। वह हर साल कमाने के लिए बाहर जाता है, क्योंकि उसे खेती के लिए पैसा चाहिए।

बिहार में किसान का कोई भी मोर्चा नहीं होने की एक वजह यह भी है। दरसअल गाम का गाम खाली पड़ा है। बड़े जोतदार नौकरी पेशा हो गए हैं और उनकी जमीन पर जो फसल उगाता है, वह शायद खुद को किसान मानता ही नहीं है। बिहार में किसानी की असल पीड़ा यही है, कटु है लेकिन सत्य यही है।

आप मंडी, भाव आदि की बात करते रहिए लेकिन किसान के नाम पर बिहार में आंदोलन राजनीतिक दल के लोग ही करेंगे, किसान चुप ही रहेगा। दिल्ली, पटना में बैठे लोग जो आंकड़ा जारी कर दें लेकिन बिहार में किसानी करने वाले चुप ही रहेंगे। 

Sunday, December 06, 2020

रविवार की पाती, राहुल कुमार के नाम

गाम - घर करते हुए हम अक्सर यह सोचते हैं कि बदलाव की हवा हर बार गाम की गली, पगडंडी, खेत - खलिहान में सबसे अलग अंदाज़ में महसूस की जा सकती है। कई लोग हैं जो इस बदलाव के वाहक हैं या फिर उस हवा के गवाह ! 
हम जमीन से जुड़े लोग जब भी बदलाव की बात करते हैं, सवाल जरूर पूछते है। सवाल पूछना मना नहीं है, यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। हम सूबा बिहार के पूर्णिया जिला से आते हैं, जिसके बारे में कभी कहा जाता था कि यहां की पानी में ही दोष है, बीमारियों का घर। फिर 1934 के भूकम्प के बाद पानी में भी बदलाव आता है और धीरे धीरे सब में बदलाव आने लगता है। लोगबाग बाहर से इस जिले में बसने लगते हैं। लेकिन इसके बावजूद यहां के लिए मैथिली में एक कहावत प्रचलित ही रह गई है - " जहर नै खाऊ, माहुर नै खाऊ , मरबाक होय त पुरैनिया आऊ " 

लेकिन वक्त के संग यह इलाका भी बदला। लोग बदले, कुछ अधिकारी आए जिन्होंने इस इलाके के रंग में रंगे लोगों के जीवन को सतरंगी बनाने की भरसक कोशिश की। 

देश के पुराने जिले में एक पूर्णिया ने डूकरेल, बुकानन , ओ मैली जैसे बदलाव के वाहकों को देखा है। आईएएस अधिकारी आर एस शर्मा जैसे लोगों को पूर्णिया ने महसूस किया है, जिन्होंने पूर्णिया को रचा। 

कोई भी जिला अपने जिलाधिकारी की वजह से भी याद किया जा सकता है। यह सच है कि अपने कामकाज से यह महत्वपूर्ण पद किसी भी इलाके को बदल सकता है। आज यह सब लिखने की वजह यह दो तस्वीर है। 
जिला के कार्यालय से निकलकर जब जिलाधिकारी गाम की गली में पहुंचते हैं तो सिस्टम पर भरोसा बढ़ ही जाता है। 

जब जिला के आला अधिकारी उस अंतिम घर के लोग से मिलते हैं तो लगता है बदलाव की हवा बह रही है। हम आलोचना कर सकते हैं , सवाल उठा सकते हैं लेकिन इन सबके संग यदि कुछ अच्छा हो रहा है, जिससे किसी के जीवन में बदलाव दिख रहा है, तो उसकी तारीफ़ भी होनी चाहिए।

सबकुछ इस पर सबसे अधिक निर्भर करता है कि हमारा वर्तमान कैसा है। गांव में जब जिलाधिकारी अचानक पहुंचे और किसी बस्ती में उस एक व्यक्ति से बात करें और पूछें कि ' आप तक जो सरकारी योजना पहुंची है, उसकी हालत क्या है ' तो यकीन मानिए उस व्यक्ति का भरोसा जरूर बढ़ जाता है।

जिला पूर्णिया के गाम घर तक अक्सर पहुंचने वाले जिलाधिकारी राहुल कुमार की तारीफ़ तो करनी ही चाहिए। वह अक्सर निकल जाते हैं गांव की ओर। 
खासकर ऐसे वक्त में जब दूरी बढ़ने लगी है, ऐसे समय में जिला मुख्यालय से सुदूर इलाकों में पहुंचकर लोगों से मिलना, उनके सवालों को सुनना बहुत ही महत्वपूर्ण है।

राहुल कुमार की इस तरह की तस्वीर जब भी सामने आती है तो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता ' लीक पर वे चलें ' की यह पंक्ति गुनगुनाने लगता हूं :
 
"साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट,
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं।"

Monday, November 30, 2020

वही खाएगा, जो उपजाएगा

मुल्क में किसान फिर चर्चा में हैं। फिलहाल हम मक्का की बुआई में लगे हैं। मक्का हमारे लिए नकदी फसल है लेकिन सरकार इस फसल की कीमत तय नहीं करती है। 
खैर, अभी धान की कटाई -तैयारी के बाद हम धान को 900 से 1000 रुपये प्रति क्विंटल बेच कर मक्का का बीज खरीदे, जबकि धान की सरकारी कीमत 1500 से अधिक है लेकिन इसके लिए हमें बहुत इंतज़ार करना पड़ता है और साथ ही भ्रष्टाचार का भी साथ देना पड़ता है। 

फेसबुक टाइमलाइन पर किसान की भीड़ वाली तस्वीर और वीडियो देखकर मन बैचेन हो जाता है कि आखिर हम कब तक संघर्ष करते रहेंगे?

धान-दाल-गेहूं- दूध-सब्जी की कीमत को लेकर अचानक सब बात करने लगे हैं, लेकिन ईमानदारी से कहिये कि आप सब हमारी उपज की सही कीमत देने से क्यों हिचकिचाते हैं?

सरकार तो चाहे जिसकी रहे, हमारी सुनेगी नहीं लेकिन आप तो गोभी -आलू-चावल की सही कीमत हमें दे सकते हैं, जरा सोचियेगा।

दरअसल, हम किसानी कर रहे लोग हमेशा से सरकार-बाजार के सॉफ्ट टारगेट रहे हैं और यही वजह है कि हम भीड़ बनते जा रहे हैं। हमारे दुख को प्रचारित कर बड़ा बाजार बनाया जाता रहा है लेकिन वह दुख कैसे मिटे इसकी बात कोई नहीं करता।

पिछले छह साल से खेती बाड़ी कर रहा हूं इसलिए बहुत ही कड़वे लहजे में अपनी बात रखने का साहस कर रहा हूं। कटहल का एक कच्चा फल जो हम पांच रुपये में बेचते हैं, उसे आप चालीस रुपये प्रति किलोग्राम, अभी तो 125 रुपए प्रति किलोग्राम खरीदते हैं, क्या आपने कभी हमारी इस तरह की बातों को सुना है? इस पर अपने डाइनिंग टेबल पर चर्चा की है? 

आज आप किसान के कवर वाली फोटो प्रोफ़ाइल लगाकर तस्वीर आदि पोस्ट कर रहे हैं लेकिन क्या आप सीधे किसान से सब्जी खरीदकर कर उसे उसकी कीमत देते हैं?
 
माफ करियेगा, यदि सब हमें उचित मूल्य दे दें तो हम सरकारी अनुदान की बात भी नहीं करेंगे। सारी लड़ाई कीमत की है और वह आप पर निर्भर है। आप चाहेंगे तो हम 12 महीने खुशहाल रह सकते हैं लेकिन हमारी बात सुनता कौन है! 

जो मार्च दिल्ली में हो रहा है न, दरअसल वह हर दिन पंचायत- जिला मुख्यालय में होना चाहिए। दिल्ली तो हमेशा से ऊंचा सुनती आई है साहेब, हम गाम-घर के लोग ऊंचा बोल ही नहीं सकते। हम असंगठित लोग हैं, हमें बांटकर रख दिया गया है, खेत की आल की तरह।

लेकिन हमने भी खेती को अब बस अपने लिए करना शुरू कर दिया है, बस अपने लिए! हम खाने भर का उपजाते हैं। कितना रोएं, अपने लिए उपजाकर ही अब हम संतुष्ट रहते हैं। हर किसान को अब स्वार्थी बनना होगा क्योंकि वह समय भी अब नजदीक है जब 'वही खायेगा, जो उपजायेगा' ...

Thursday, November 26, 2020

किसान, किसान किसान ...

किसान हर बार ठगे जाते हैं, उन्हें हर बार सड़क पर उतरना पड़ता है। यह सबसे मासूम सेक्टर है, जिसे हर बार कोई न कोई अपने ढंग से मैनेज करता रहा है।

पिछले छह साल से गाम - घर , किसानी करते हुए जिस नारे से नफ़रत हुई है, वह है : 'जय जवान, जय किसान ' ! यह  नारा नहीं बस जुमला है। 

किसान वही खड़ा है, जहां वह था, उसके खेत में बीज, खाद आदि देने वाला कॉरपोरेट हो गया है, और उपजाने वाला ऋण में फंसता रह गया। यहां इस गणित को समझना होगा, किसान को भी और सरकार को भी। किसान को किसानी पेशे की तरह लेना होगा, ऋण की तरह नहीं।

' जय किसान ' कह कर किसानी करने वालों को बरसों से ठगा जा रहा है।  अपनी मांगों को लेकर हर बार जब भी किसान सड़क पर उतरता है, लाठियां ही खाता है। किसान का असली संघर्ष तब शुरू होता है जब वह लौटकर खेत पहुंचता है। उसे अगली फसल के लिए खेत तैयार करना है, बीज चाहिए..! दरसअल हम संघर्ष करते रह जाते हैं, जो हमारा सच है।

आज सोशल मीडिया पर किसान शब्द ट्रेंड कर रहा है, जो तस्वीरें दिख रही है वह डराती है। किसान की आवाज़ कहां तक पहुंचेगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा लेकिन यह भी सच है कि किसानी कर रहे लोगों को संगठित होना होगा।

जिस तरह तस्वीर और वीडियो में सड़क पर भीड़ दिख रही है, गाड़ी और एंबुलेंस दिख रहे हैं, भीतर से लग रहा है कि कहीं इसे इवेंट न बना दिया जाए। नतीजा निकले, बस यही ख्वाहिश है।

एक किसान को क्या चाहिए? सवाल का जवाब बस एक ही है - फसल की वाजिब कीमत। बाद बाकी सबकुछ माया है, असल बात धान से लेकर अन्य सभी फसल की कीमत हासिल करना ही है। 

यदि कीमत ढंग से नहीं मिलेगी तो यकीन मानिए किसान किसानी करना छोड़ ही देगा, तब वह सिर्फ अपने लिए उपजाएगा,अपनी थाली के लिए अन्न, साग - सब्ज़ी उगाएगा। यह मत सोचिए कि हम मर जाएंगे, अपने लिए तो हम उपजा ही लेंगे।

निज़ाम को यह समझना चाहिए कि जिस तरह उद्योगपति उद्योग लगाता है मुनाफे लिए, हम किसान खेत में फसल भी मुनाफे लिए ही लगाते हैं, हम त्याग और करुणा की पाठशाला नहीं हैं, हमें भी जीवन के लिए सबकुछ चाहिए।

हमें सड़क पर उतरकर कैमरे के सामने या फिर लाठी और पानी से भिंगने का शौक नहीं है, हमें खेत में उतरने का शौक है, क्योंकि किसानी ही हमारा पेशा है। 

 #FarmerProtest