Sunday, April 24, 2022

कथाकार अखिलेश

कुछ लोग होते हैं जो शब्दों के जरिये जीवन में आते हैं और फिर वे पानी की तरह जीवन में रच बस जाते हैं। ऐसे लोग अभिभावक कम, साथी अधिक जान पड़ते हैं। ऐसे लोगों के शब्दों में स्मृतियाँ होती है, ऐसे लोग जब लिखते हैं तो उनके साथ उनकी पूरी दुनिया चली आती है। स्मृतिहीनता के इस दौर में ऐसे लोग बहुत कम नज़र आते हैं। व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि ऐसे लोग कमाल के किस्सागो होते हैं। मेरे लिए कथाकार अखिलेश ऐसे ही लोग हैं, जिनमें लोक रचा- बसा है। 
आज अपने शहर में अखिलेश जी से मुलाकात हुई। एक आत्मीय मुलाकात। उन्हें पहले मंच पर सुनने का सुख मिला फिर उनके संग लंबी गुफ्तगू हुई। 

वह मंच पर जो हैं, वही आम बातचीत में भी।पहले बात मंच की। अखिलेश जी ने वैसे तो कई बातें कही लेकिन मैंने उनकी चार बातों को मन में रखने की कोशिश की, जिसके आसपास इन दिनों हम सब भटक रहे हैं। 

राष्ट्र और देश की बात करते हुए अखिलेश जी ने कहा कि देश एक सार्थक शब्द है। उनके इस वक्तव्य पर लंबी बात हो सकती है। इसके बाद उन्होंने कहा कि विवेक वैश्विक होनी चाहिए। ऐसे दौर में जब विवेक के दायरे को हम सब एक परिधि में घेरते जा रहे हैं, अखिलेश जी उसे बन्धन मुक्त करने की बात कर रहे हैं। तीसरी बात, जो उन्होंने कही वह है - आभासी यथार्थ। उन्होंने कहा कि हम सब आभासी यथार्थ देखते हैं स्मार्टफोन के जरिये, स्क्रीन के जरिये। ऐसे में जरूरत है कि हम मूल से जुड़ें, माटी से जुड़ें।और उनकी चौथी बात जिसने मुझे  आकर्षित किया, वह है नया समाज और नई समझ। कथाकार और संपादक अखिलेश कहते हैं कि नये समाज को नई समझ के साथ सामने रखने की जरूरत है। 

ये तो हुई मंच की बात। कार्यक्रम के बाद अखिलेश जी से बात करते हुए लगा कि एक कथाकार इस बदलते वक्त में बदलाव को महसूस करना चाहता है। वे गाम घर, मौसम, किसानी और शहर और गाँव के बीच मिटते फासले को समझने की कोशिश में हैं। उनके साथ टहलते- बतियाते अहसास हुआ कि लेखन स्मृतियों और अनुभवों का मोक्ष है। और दूसरी तरफ यह कथाकार की भी मुक्ति है।

इस किस्सागो कथाकार का संसार स्मृतियों से भरा पड़ा है। उनको सुनते हुए लगा कि अखिलेश जी का संस्मरण अलग ही मिजाज का है, किसी फलदार वृक्ष की तरह। उन्हें सुनते हुए लगा कि वे स्मृतियों और अनुभवों को बंधन में बांध देते हैं। वे एक किताब की तरह हैं, जिसमें न जाने कितने किस्से, लतीफे, हिदायतें और आपबीती के पृष्ठ हैं। वे एक ऐसे कथाकार हैं, जिनके पास व्यक्ति को भी देखने का नजरिया है और साथ ही खेत और तालाब को भी! 

Tuesday, March 08, 2022

जीवन

सत्य को स्वीकारना साहस का काम है, क्योंकि सत्य 'क़ट्टा' है, चल गया तो चल गया। नहीं चला तो...! ऐसे में सत्य को स्वीकारना सबसे बड़ा साहस  है और हाँ, इस साहस का प्रदर्शन नहीं होता है, बस मन से हो जाता है वैसे ही जैसे क़ट्टा चल जाता है। 

कुछ लोगों के जीवन को देखता हूं तो "साहस" का अहसास होने लगता है। जिसके पास कुछ भी नहीं है, उसीसे जीवन में आनंद हासिल करने का पाठ पढ़ने को मिले तो लगता है- "धत्त, हम तो नाहक ही परेशान थे अबतक। ये सबकुछ तो माया है।"

यह सब टाइप करते हुए कबीर का लिखा मन में बजने लगता है- “माया महाठगिनी हम जानी ..निरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी.....” ठीक उसी पल मन के रास्ते पंडित कुमार गंधर्व की भी आवाज भी कानों में गूंज लगती है- “भक्तन के भक्ति व्है बैठी, ब्रह्मा के बह्मानी…..कहै कबीर सुनो भाई साधो, वह सब अकथ कहानी”

कभी कभी लगता है कि जीवन में कोई कथा संपूर्ण होती है क्या? इस दौरान मुझे जीवन आंधी के माफिक लगने लगती है, सबकुछ उड़ता नजर आने लगता है।

जब मेरे बाबूजी सक्रिय रूप से गाम - घर किया करते थे तो उस वक्त कई लोग उनके आसपास रहते थे, आते- जाते रहते थे। उनकी बैठकी में एक व्यक्ति जीप से अक्सर आया करते थे, खूब सिगरेट फूंका करते थे। वह धन, जमीन आदि की बात किया करते थे। किसी भी हाल में धन को हासिल करना उनका उदेश्य हुआ करता था। हालांकि वो आज भी वैसी ही बात करते हैं। बाद में पता चला कि वो किसी बड़े जमींदार परिवार से थे।

वहीं उनकी बैठकी में एक माली भी आते थे, जो सूरदास की बात करते थे। दोपहर के वक्त बाबूजी की बैठकी में वे बैठते और सूरदास के पद सुनाते। उनके कपड़े वाले झोले से सुंगध आती रहती थी, वन तुलसी और फूल की। वह शायद जानते थे कि माया के फेर में मन के भीतर कितनी कालिख भर जाती है। एक -आध घण्टे रहने के बाद वे जब जाने की तैयारी करते तो जाते वक्त झोले से एक मुट्ठी फूल और वन तुलसी की कुछ पत्तियां टेबल पर रख जाते। सब फूल सदाबहार गेंदा का होता था। उसकी खुशबू में हम खो जाते थे। 

बाबूजी की डायरी में उस जीप वाले भूपति का एक भी पन्ने में जिक्र नहीं है जबकि उस माली के बारे में लंबी कहानी लिखी है। और एक बात, बाबूजी उस माली से हम बच्चों को  मिलवाया करते थे लेकिन सिगरेट फूंकते, दुनिया जहान की बात करने वाले उस भूपति से बाबूजी ने कभी भी बच्चों को नहीं मिलवाया। 

दरअसल इस दुनियादारी में हम बहुत ही तेजी से भागते नज़र आ रहे हैं जबकि सत्य तो दुनियादारी में एक पर्दे की तरह है, जिसे उठाने के लिए हमें हल्का बनना होता है। दूब की तरह हल्का, जिसके ऊपर ओस की बूंद भी टिक जाती है। यही तो जीवन है, जहाँ हम हर किसी को ठहरने का मौका दे सकते हैं। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हम लूटपाट की योजना बनाते हैं या फिर जीवन जीते हुए एक मुट्ठी फूल और वन तुलसी की कुछ पत्तियां टेबल पर रख आगे बढ़ जाते हैं।

Tuesday, January 25, 2022

पुस्तकालय क्यों जरूरी है!

ये कुछ दृश्य हैं, जो विगत दो साल के दौरान पूर्णिया जिला में देखने को मिला, मसलन क्रिकेट मैच हो रहा हो, और मैदान में किताबों को जगह दी गई हो। 

शहर में कुछ बुजुर्ग, जो घर से निकलने में असमर्थ हैं लेकिन वे कुछ किताबें पुस्तकालय तक पहुंचाना चाहते हैं, फोन करते हैं और एक गाड़ी आती है, किताबें ले जाती है। हर पंचायत के पुस्तकालय के लिए लोगबाग किताबें दान कर रहे हों...

शहर के मुख्य चौराहे के पास दीवार पर किताबों से संबंधित एक ‘ज्ञान की दीवार’ बना दी गई हो....

यह कुछ ऐसी बातें हैं जो इस दौर में सुनने और देखने  को बहुत कम मिलती है। क्योंकि विकास के मानकों में भौतिक चीजें हमारे आपके जीवन में इतनी हावी हो चली है कि किताबें बहुतों से दूर हो गई है। ऐसे में यदि कोई जिला किताब और पुस्तकालय के लिए अभियान चला रहा हो तो इसकी गंभीरता को समझने की जरूरत है।
पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार अक्सर कहते हैं कि समाज को समझने – बूझने का एक तरीका यह भी है कि उस समाज में किताबों को क्या स्थान है। 

वह कहते हैं, “किसी समाज या समुदाय के मिज़ाज या उसके टोन को परखने का एक प्रतिमान ये हो सकता है कि उसकी सामूहिक चेतना में किताबों को क्या स्थान प्राप्त है। पढ़ने वाला समाज प्रायः ज्यादा उदार, ज्यादा लचीला एवं ज्यादा विकासशील होता है। वह परिवर्तन के प्रति ज्यादा स्वीकार्यता भी रखता है। समुदाय से उतर कर जब हम व्यक्तिमात्र पर किताबों के प्रभाव की पड़ताल करते हैं तो पाते हैं कि किताब के आरंभ में व्यक्ति जो होता है अंत तक बिल्कुल वही नहीं रह जाता। प्रभाव कम, ज्यादा, अच्छा या बुरा कुछ भी हो सकता है, किन्तु व्यक्ति बिल्कुल वही नहीं रह जाता। ”

शायद यही वजह है कि साहित्य-कला अनुरागी जिलाधिकारी राहुल कुमार ने अभियान किताब दान की शुरुआत की।
 
मुझे याद है, 25 जनवरी 2020 को इस अभियान की जब शुरूआत हुई थी तो पहले दिन ही 400 किताबें प्राप्त हुई थी। जिला के समाहरणालय सभागार में किताब दान अभियान की शुरूआत हुई थी। राहुल कुमार ने उस दिन भी कहा था कि यह अभियान लोगों का है, इसमें हर कोई सहयोग करेगा। उस दौरान पूर्णिया के डीडीसी अमन समीर और ट्रेनी आईएएस प्रतिभा रानी जी भी मौजूद थीं। 

हालांकि कोराना महामारी की वजह से यह अनोखा अभियान प्रभावित हुआ लेकिन इसके बावजूद अबतक लोगों ने एक लाख पचास हजार किताबें इस अभियान में दान दी है जो जिला के विभिन्न पुस्तकालयों में पहुंच चुकी है।
मुझे उस वक्त सबसे अधिक खुशी मिली जब यह खबर सुनने को मिली कि दस साल का एक लड़का, जिसका नाम ‘सक्षम’ है, उसने अपने जन्मदिन पर इस अभियान में 151 पुस्तकें भेंट की। आप इससे समझ सकते हैं कि पूर्णिया जिला के लोगों के बीच किताब और पुस्तकालय ने किस अंदाज़ में अपनी जगह बना ली है। 

पिछले साल पूर्णिया जिला के परोरा गाँव के पुस्तकालय जब जाना हुआ था, तो वहां के युवाओं का उत्साह देखने लायक था। सच कहूं तो लगा कि क्या इवेंट की तरह उत्साह भी चलता बनेगा, लेकिन बात कुछ और थी। किताबों के प्रति लोगों का स्नेह बढ़ता गया और आज एक साल बाद फिर उसी पुस्तकालय परिसर पर जब पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार पहुंचे तो दोपहर बाद किताबों में घिरे लोग ही दिखे। यह दृश्य ही समाज में पुस्तकालय के महत्व को बताने के लिए काफी है।

सोशल मीडिया के इस दौर में सबकुछ एक झटके में सबके सामने आ जाता है। आप चाहें तो अपने काम को दुनिया जहान को दिखा सकते हैं। यह इस मीडियम का एक सकारात्मक पक्ष है लेकिन वहीं दूसरी ओर एक पक्ष यह भी है कि काम का रंग जबतक चढ़ता है, सोशल मीडिया के लिए वह काम तबतक पुराना हो जाता है। ऐसे में किताब दान अभियान की बात की जाए तो भला किताबों की बात, पढ़ने – लिखने की बात कब पुरानी हुई है। यदि समाज जागरूक है और उसके मन के स्पेस में किताबों के लिए जगह है तो जान लें, इस तरह के अभियान सिर पर रखे जाएंगे। हम उम्मीद तो बेहतर कल की कर ही सकते हैं। 

कभी कभी सोचता हूँ कि जिला की कमान संभालने वाले अधिकारी को लोगबाग ढेर सारे विकास कार्यक्रमों, भवनों या अन्य सरकारी परियोजनाओं के लिए याद करते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें लोग बदलाव के लिए याद करते हैं। किताब दान अभियान की शुरूआत करने वाले राहुल कुमार ऐसे ही लोगों में एक हैं। 

पूर्णिया में गाँव -गाँव तक पुस्तकालय पहुँचाने का उनका अभियान दरअसल पूर्णिया के जन-जन का अभियान है। लोगबाग अपनी आदतों में किताब को शामिल करें, इससे बेहतर और क्या हो सकता है।

राहुल कुमार के इस अभियान को पूर्णिया को अपनी आदत में शामिल करना चाहिए ताकि आने वाले समय में भी पुस्तकालय हर पंचायत में जीवित रहे, यह काम हम आप ही कर सकते हैं। उनके काम की जहां भी बात होती है, वह बड़ी दूर तक अपनी आवाज पहुंचाती है।

मैं इस अभियान को बहुत नजदीक से देखता आया हूं। उम्मीद है कि हर पंचायत में लाइब्रेरी जीवित रहेगी और लोगबाग गाँव के उस किताब घर को इज़्ज़त देंगे। इन सबके बीच यहां यह भी बताना जरूरी है कि पूर्णिया में महात्मा गांधी तीन दफे आए थे। 1925, 1927 और 1934 में गांधी जी यहां आए थे। यहां एक घटना का जिक्र जरूरी है। 13 अक्टूबर 1925 को बापू ने पूर्णिया के बिष्णुपुर इलाके का दौरा किया था। बापू को सुनने बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हुए थे। शाम को गांधी जी ने स्थानीय ग्रामीण श्री चौधरी लालचंद की दिवंगत पत्नी की स्मृति में बने एक पुस्तकालय मातृ मंदिर का उद्घाटन किया था। बापू ने अपने नोट्स में लिखा है कि ‘बिष्णुपुर जैसे दुर्गम जगह में एक पुस्तकालय का होना यह संकेत देता है कि यह स्थान कितना महत्वपूर्ण है।'

उस दौर में पुस्तकालय का होना यह बताता है कि पूर्णिया जिला के ग्रामीण इलाकों में पढ़ने के प्रति लोगों का खास जुड़ाव था। 

आज एक बार फिर पूर्णिया पुस्तकालय को लेकर गंभीर हुआ है और इसका श्रेय जाता है पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार को। तो चलिए, आइये हम सब अपने व्यस्त समय से कुछ पल निकालकर जिला के विभिन्न पंचायतों के लाईब्रेरी चलते हैं और किताबों के साथ समय गुजारते हैं। साथ ही उन किताबों को नजदीक से देखते हैं जिसने ' अभियान किताब दान ' के तहत इतनी लंबी दूरी तय की है। 

Monday, January 24, 2022

एक अधूरा सपना: सपने में रेणु से गुफ्तगू!


इन दिनों जब अपने मन के सुख के लिए  लिखना लगभग छूट गया है कि तभी अचानक सामने मुस्कुराते हुए रेणु आ जाते हैं। एक हाथ में काले रंग की प्यारी डायरी है तो दूसरे में छड़ी!


कमरे में आते ही बोलते हैं- "शिकायत है कि लिखते नहीं हो, जबकि मुझे पता है कि फील्ड नोट्स का खाता- खतियान जमा किये हुए हो! अरे लिखो भाई, गाम घर, शहर कस्बा की बातों को जगह दो। " फिर वे धप्प से सोफे पे बैठ गए। डायरी को टेबल पर रख दिया और छड़ी को दरवाजे के सहारे छोड़ दिया।

कुछ देर के लिए उन्होंने आँखों को मूंद लिया। ओह! क्या रूप था वो, अपरूप! फिर अचानक वे बोल उठते हैं- औराही गए थे क्या? जवाब में मैंने कहा- "दो बरख हो गए, इतना उलझा रहा कि रानीगंज से आगे निकला ही नहीं बाबा! "

रेणु ने फिर चुप्पी साध ली। वे अपनी हथेली को देखने लगे और बोल उठे - " हथेली पढ़ने की कला सबके बस की बात नहीं। तुम्हारी अलमारी में नागार्जुन की सभी किताबें हैं, देखकर आत्म सुख मिल रहा है, आँख को भी और मन को भी। मैं उनका कर्जदार हूँ। मेरे खेतों में उन्होंने रोपनी की थी, वे असल यात्री थे। अब जब अपनी दुनिया में हम मिलते हैं तो लोक परलोक की बात करते हैं..." यह कहते हुए रेणु हँसने लगे।

टेबल पर रखी डायरी को पलटते हुए रेणु कहते हैं, " चाय नहीं पिलाओगे? और हाँ,घर में नबका चावल है क्या? दरअसल नबका चावल का खिचड़ी खाये बहुत दिन हो गए। " मैंने तुरंत हामी भरी।

तबतक चाय आ चुकी थी, रेणु के हाथ में चाय की प्याली भी इतरा रही थी। वे फिर लिखने की बात करने लगे। उन्होंने कहा- " फसल और गाँव की राजनीति, इन दोनों पर बात करने वाले लोगों को मैं हमेशा ढूंढता रहता हूँ। जिस तरह गुलाब का पौधा होता है न, ठीक उसी तरह के लोग होते हैं, जो फसल और गाम घर की राजनीति की बात समझते हैं और इस मुद्दे पर बतियाते हैं। गुलाब फूल को सब छूना चाहता है लेकिन उसके पौधे को कांटे की वजह से कोई छूना नहीं चाहता। धरती की बातें करने वाले लोगों को लेकर भी मेरी यही राय रही है। उसकी बातों को तो लोगबाग सुन लेंगे लेकिन उसे बर्दाशत नहीं करेंगे लंबे वक्त तक और आगे चलकर वही भिम्मल मामा बन जाता है, जिसे तुमलोग पागल करार देते हो। "

रेणु आज फसलों की दुनिया में फिर से डूबने की चाहत में थे।  वह कहने लगे, " क्या तुम्हें पता है कि तुम्हारे जिला में पहले धान का नाम बहुत ही प्यारा हुआ करता था, मसलन 'पंकज' 'मनसुरी', 'जया', 'चंदन', 'नाज़िर', 'पंझारी', 'बल्लम', 'रामदुलारी', 'पाखर', 'बिरनफूल' , 'सुज़ाता', 'कनकजीर' , 'कलमदान' , 'श्याम-जीर', 'विष्णुभोग' । समय के साथ हाइब्रीड ने किसानी की दुनिया बदल दी। "

मैं बस उनको सुनना चाहता था, चुपचाप। उनकी बातों को सुनते हुए देहातीत सुख का आभास होता है। लेकिन रेणु ने जब धान की बात छेड़ दी  तो मन में कई गीत गूंजने लगे, जो अब खेत में सुनाई नहीं देते हैं। सुख की तलाश हम फसल की तैयारी में ही करते हैं। एक गीत पहले सुनते थे, जिसके बोल कुछ इस तरह हैं -
"सब दुख आब भागत, कटि गेल धान हो बाबा..."

हम खेती किसानी दुनिया के लोग अन्न की पूजा करते हैं। धान की जब भी बात होती है तो जापान का जिक्र जरूर करता हूं। जापान के ग्रामीण इलाक़ों में धान-देवता इनारी का मंदिर होता ही है। रेणु को मैंने आज बातों ही बातों में जापान के एक देवता की कहानी सुना दी।

जापान में एक और देवता हैं, जिनका नाम है- जीजो। जीजो के पांव हमेशा कीचड़ में सने रहते हैं। कहते हैं कि एक बार जीजो का एक भक्त बीमार पड़ गया, भगवान अपने भक्तों का खूब ध्यान रखते थे। उसके खेत में जीजो देवता रात भर काम करते रहे तभी से उनके पांव कीचड़ में सने रहने लगे।

मेरी इस बात को सुनकर रेणु मुस्कुराने लगे और बोल उठे- खिचड़ी खिलाओगे! हम सब उन्हें डाइनिंग टेबल के पास ले जाते हैं। वे चाव से अन्न ग्रहण करते हैं। भोजन के बाद वह अचानक अलग रंग में आ जाते हैं, और कहते हैं, " कभी कभी लगता है क्या जीवन में कोई कथा संपूर्ण होती है..। इस दौरान मुझे जीवन आंधी के माफिक लगने लगती है, सबकुछ उड़ता नजर आने लगता है। एक दिन किसी से बात हो रही थी तो उसके भीतर का भय मुझे सामने दिखने लगा। वह भय मौत को लेकर थी। मौत शायद सबसे बड़ी पहेली है, हम-सब उस पहेली के मोहरे हैं। "

ओह! मेरी नींद टूट जाती है। सपना अधूरा रह जाता है, रेणु से गुफ्तगू बांकी ही रह जाती है। अक्सर जब तबियत बिगड़ती है, बुखार उतरता- चढ़ता है, रेणु सपने में आ ही जाते हैं।

सुबह में इस मौसम के फूल पर और दूब व पत्तियों पे पानी ठहरा रहता है। मुझे इन ठहरे पानी से बहुत लगाव  है। दूब-मेरा सबसे प्रिय, जिसे देखकर, जिसे स्पर्श कर मेरा मन, मेरा तन हरा हो जाता है। गाम में हर सुबह इसकी सुंदरता देखने लायक होती है। ओस की बूंद जब दूब पर टिकी दिखती है तो लगता है यही जीवन है, जहाँ हरियाली अपने ऊपर पानी को ठहरने का मौक़ा देती है। 

दरअसल इस उग्र बनते समाज में हम कहाँ किसी को अपने ऊपर चढ़ते देख पाते हैं। ऐसे में कभी दूब को देखिएगा, गाछ की पत्तियों को देखिएगा, वृक्षों में बने घोंसले को देखिएगा और हाँ, अपने प्रिय लेखकों से सपने में गुफ्तगू कीजियेगा। 

Tuesday, November 30, 2021

माटी की खुशबू

फसल चक्र के संग एक अलग खुशबू भी साथ- साथ चलती है. हाँ, यह अलग बात है कि बहुतों के लिए यह खुशबू नहीं बल्कि गंध है.

बचपन की स्मृति में चापाकल के पास जमने वाली कजली भी है, हरे रंग की, जिस पर गलती से भी पाँव गया तो फिसल जाना तय है. उसी स्मृति के आसपास जूट (पटसन) की खेती भी है. जूट के फसल को काटकर पानी में कुछ दिन रखा जाना और फिर उससे पाट निकाल कर दुआर पर जब उसे सूखाने के लिए लाया जाता था तो उसकी एक अलग महक हुआ करती थी. घर दुआर उस महक से सरोबार हो जाया करता था. जूट के संग संठी भी आती थी. बच्चे उससे खेल के सामान बनाया करते थे.

ऐसी महक धान से चावल बनाने के दौरान भी आंगन में आया करती थी. बड़े चूल्हे पर धान को बर्तन में उबाला जाना फिर उससे उसना चावल बनाया जाना. स्मृति में ऐसी कई खुशबू है. नाक के साथ ये सब मन में भी बैठा हुआ है. जब भी फणीश्वर नाथ रेणु की यह वाणी सुनता हूँ - 'आवरण देबे पटुआ, पेट भरण देबे धान, पूर्णिया के बसैया रहे चदरवा तान...' तो नाक में अचनाक धान और पटुआ की खुशबू पहुंच जाती है! 

ऐसी ही एक सुगंध मूंग की खेती से भी जुड़ी है. मूंग के फसल की तैयारी के बाद जब उसे धूप में सुखाया जाता था और फिर जब उससे दाल बनाने का आयोजन होता था, उस वक्त की याद से भी एक ठोस सुगंध जुड़ा है. मूंग को आँच पर गरम करना फिर उसे जाँत में डालकर दाल बनाने के दौरान एक जादुई गंध नाक में बैठ जाती थी.

स्मृति में माटी की ऐसी कई खुशबू है, जिसे समेटकर हम गाम - घर करते रहते हैं. ऐसी स्मृतियों को लिखने से अधिक जीने की जरूरत है.

Monday, November 22, 2021

कुछ आदतें छूट गई

जाने कितने दिनों बाद क़लम पकड़ी है
पन्नों में लिखने की ख़्वाहिश जागी है
दफ़्तर वाली नौकरी छोड़े 
कुल जमा नौ साल हो गए
कि इन गुज़रे सालों में 
मैं कितना बदल गया
कुछ आदतें छूट गई
मसलन चमड़े का काला जूता पहनना 
सलीक़े से फ़ॉर्मल कपड़े पहनना
दिसंबर में जब ऑफ़िस में होती थी 
सर्द शाम में पार्टी 
तो सज सँवर कर कोर्ट पहनना
अब यह सब नहीं भाता है...
सच कहूँ तो अब जूते काटते हैं
ठीक स्कूल के दिनों की तरह!
अब चप्पल भाता है
जब भी किसी से मिलता हूँ 
सुनता हूँ उनकी बातें
तब ख़ुद ब ख़ुद पाँव नंगे हो जाते हैं
पाँव ज़मीन को स्पर्श करने को 
हर वक़्त बेचैन रहता है
जब भी अपने प्रियजनों को सुनने 
सामने बैठता हूँ 
बस सुनने की ख़्वाहिश रहती है
अब बोला कम
सुना ज़्यादा जाता है
ठीक वैसे ही जैसे 
अब छपने से अधिक
पढ़ना अच्छा लगता है !

Monday, November 08, 2021

70 साल का एक युवा पुस्तकालय!

बिहार के गाम-घर का पुस्तकालय अपनी स्थापना के 70 साल पूरे होने पर एक कार्यक्रम का आयोजन करता हैं, जहां बातचीत होती है, जहां कुछ युवा अपने स्टार्टअप की नुमाइश करते हैं, जहां आसपास के कवि इकट्ठा होते हैं और कविता पाठ करते हैं। यहां यह भी बताना जरूरी है कि पुस्तकालय को खड़ा करने का काम गाम-घर के लोगों ने ही किया। भवन से लेकर किताब तक, कुर्सी टेबल से लेकर कंप्यूटर तक..सबकुछ लोगों के आर्थिक सहयोग से। शायद सहकारिता शब्द ऐसे ही काम के लिए बना है। 
बिहार के मधुबनी जिला स्थित यदुनाथ सार्वजनिक पुस्तकालय रविवार को जब अपनी स्थापना के 70 साल पूरे होने पर पुस्तकालय परिसर में कार्यक्रम आयोजित कर रहा था तो लग रहा था मानो घर के किसी बुजुर्ग का जन्मदिन मनाने हम आंगन में जमा हुए हैं। एक ऐसा बुजुर्ग जो 70 की अवस्था में भी हर दिन नया सीखने के लिए तैयार है। एक ऐसा बुजुर्ग जिसके दुआर पर आप बैठकर दुनिया जहान की बात कर सकते हैं, जो यह सीखाता है कि खराब से खराब वक्त में भी निराश नहीं होना है, संवाद होना चाहिए, लोग साथ आएंगे और एक दिन सचमुच में ‘अच्छे दिन’ देखने को मिल जाएगा।

यहां पहुंचकर आप महसूस कर सकते हैं कि पुस्तकालय का अर्थ केवल किताबों का संकलन नहीं है। पुस्कालय जहां, संवाद के लिए जगह हो, नई तकनीक के लिए स्पेस हो, युवा उद्यमियों के संग वार्ता हो, नई पीढ़ी के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग हो...। यह सब मिथिला के इस पुस्तकालय परिसर में आपको दिख जाएगा, कुछ न कुछ हर दिन। 

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 57 (NH 57) के ठीक किनारे स्थित यह पुस्तकालय मुझे भविष्य में गांव का एक ऐसा ठिकाना नजर आ रहा है, जिसके बदौलत इलाके की नई पहचान बनेगी, बस इसकी ब्रांडिंग की जरूरत है। दरअसल हाइवे पर पुस्तकालय होना बड़ी बात है। क्योंकि यह फोर लेन सड़क नहीं है बल्कि बिजनेस हाउस है। 

कल जब पूर्णिया से लालगंज गांव पहुंचना हुआ तो उसके पीछे पुस्तकालय के संग एक निजी स्वार्थ भी था, वह था  Ogilvy Advertising के नेशनल क्रिएटिव डाइरेक्टर रह चुके राजकुमार झा को सुनना। राज सर मेरी जिंदगी की कमाई हैं, उन्हें मैं महसूस करता हूं। वह इन दिनों बिहार के अपने गांव फुलपरास में डेरा जमाए हुए हैं और रूरल टूरिज्म से लेकर कम्यूनिटी रेडियो जैसे तमाम तरह के काम को वह इस बार गांव में अंजाम दे रहे हैं। 

पुस्तकालय के इस कार्यक्रम में राज सर ने भागीदारी विषय पर एक छोटा सा व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने इस बात पर जोड़ दिया कि किस तरह से पुस्तकालय को गांव के प्राइमिरी स्कूलों से जोड़ा जाए। दरअसल वह स्कूल आउटरिच प्रोग्राम को लेकर अपनी बात रख रहे थे। साथ ही उन्होंने कहा कि यह मुफ्त में न हो। साथ ही उन्होंने कार्यक्रमों में युवाओं को स्पेस देने की बात की ताकि नई पीढ़ी की बात सुनी जाए।  

इसके आलावा पुस्तकालय के अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और सचिव को भी सुनने का मौका मिला। कोषाध्यक्ष ने जिस तरह से साल भर के खर्च और आमदनी का ब्यौरा दिया वह आकर्षित करने वाला रहा। इसके अलावा कार्यक्रम के अध्यक्ष मित्रनाथ जी को सुनकर भी बहुत कुछ नया सीखने को मिला। वह हिंदी-अंग्रेजी-उर्दू-मैथिली के जानकार हैं। एक शानदार वक्ता।  उन्होंने डॉक्टर अमरनाथ झा का जिक्र करते हुए बताया कि एक दफे उन्होंने किसी को कहा था - " लिखना - पढ़ना नहीं बल्कि पढ़ना - लिखना होना चाहिए... पहले पढ़ना जरुरी है.. "

मैं जब भी किसी व्यवस्थित पुस्तकालय को देखता हूं तो बाबूजी की याद आती है। वे पढ़ते थे, खूब पढ़ते थे। उनकी एक समृद्ध लाइब्रेरी हुआ करती थी, वे किताब बाँटते थे। उनकी कई आदतों में एक था- किताब बांटना। 17 साल की उम्र में उन्होंने एक निजी पुस्तकालय बनाया था, जिसे वे किताबों से समृद्ध करते रहे। धान, पटुआ, मूंग, गेंहू के संग वे दुआर को किताब से भी सजाते थे।

सच कहूँ तो रविवार को यदुनाथ सार्वजनिक पुस्तकालय पहुंचकर खुद को मानसिक रूप से समृद्ध करने का मौका मिला। हम सबकी आदत में किताब पढ़ना शामिल होना चाहिए। किताबें हमें भीतर से समृद्ध करती है, किताबें हमें विपरित से विपरित परिस्थितियों में राह दिखाती है।