Monday, November 22, 2021

कुछ आदतें छूट गई

जाने कितने दिनों बाद क़लम पकड़ी है
पन्नों में लिखने की ख़्वाहिश जागी है
दफ़्तर वाली नौकरी छोड़े 
कुल जमा नौ साल हो गए
कि इन गुज़रे सालों में 
मैं कितना बदल गया
कुछ आदतें छूट गई
मसलन चमड़े का काला जूता पहनना 
सलीक़े से फ़ॉर्मल कपड़े पहनना
दिसंबर में जब ऑफ़िस में होती थी 
सर्द शाम में पार्टी 
तो सज सँवर कर कोर्ट पहनना
अब यह सब नहीं भाता है...
सच कहूँ तो अब जूते काटते हैं
ठीक स्कूल के दिनों की तरह!
अब चप्पल भाता है
जब भी किसी से मिलता हूँ 
सुनता हूँ उनकी बातें
तब ख़ुद ब ख़ुद पाँव नंगे हो जाते हैं
पाँव ज़मीन को स्पर्श करने को 
हर वक़्त बेचैन रहता है
जब भी अपने प्रियजनों को सुनने 
सामने बैठता हूँ 
बस सुनने की ख़्वाहिश रहती है
अब बोला कम
सुना ज़्यादा जाता है
ठीक वैसे ही जैसे 
अब छपने से अधिक
पढ़ना अच्छा लगता है !

Monday, November 08, 2021

70 साल का एक युवा पुस्तकालय!

बिहार के गाम-घर का पुस्तकालय अपनी स्थापना के 70 साल पूरे होने पर एक कार्यक्रम का आयोजन करता हैं, जहां बातचीत होती है, जहां कुछ युवा अपने स्टार्टअप की नुमाइश करते हैं, जहां आसपास के कवि इकट्ठा होते हैं और कविता पाठ करते हैं। यहां यह भी बताना जरूरी है कि पुस्तकालय को खड़ा करने का काम गाम-घर के लोगों ने ही किया। भवन से लेकर किताब तक, कुर्सी टेबल से लेकर कंप्यूटर तक..सबकुछ लोगों के आर्थिक सहयोग से। शायद सहकारिता शब्द ऐसे ही काम के लिए बना है। 
बिहार के मधुबनी जिला स्थित यदुनाथ सार्वजनिक पुस्तकालय रविवार को जब अपनी स्थापना के 70 साल पूरे होने पर पुस्तकालय परिसर में कार्यक्रम आयोजित कर रहा था तो लग रहा था मानो घर के किसी बुजुर्ग का जन्मदिन मनाने हम आंगन में जमा हुए हैं। एक ऐसा बुजुर्ग जो 70 की अवस्था में भी हर दिन नया सीखने के लिए तैयार है। एक ऐसा बुजुर्ग जिसके दुआर पर आप बैठकर दुनिया जहान की बात कर सकते हैं, जो यह सीखाता है कि खराब से खराब वक्त में भी निराश नहीं होना है, संवाद होना चाहिए, लोग साथ आएंगे और एक दिन सचमुच में ‘अच्छे दिन’ देखने को मिल जाएगा।

यहां पहुंचकर आप महसूस कर सकते हैं कि पुस्तकालय का अर्थ केवल किताबों का संकलन नहीं है। पुस्कालय जहां, संवाद के लिए जगह हो, नई तकनीक के लिए स्पेस हो, युवा उद्यमियों के संग वार्ता हो, नई पीढ़ी के लिए कंप्यूटर ट्रेनिंग हो...। यह सब मिथिला के इस पुस्तकालय परिसर में आपको दिख जाएगा, कुछ न कुछ हर दिन। 

राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 57 (NH 57) के ठीक किनारे स्थित यह पुस्तकालय मुझे भविष्य में गांव का एक ऐसा ठिकाना नजर आ रहा है, जिसके बदौलत इलाके की नई पहचान बनेगी, बस इसकी ब्रांडिंग की जरूरत है। दरअसल हाइवे पर पुस्तकालय होना बड़ी बात है। क्योंकि यह फोर लेन सड़क नहीं है बल्कि बिजनेस हाउस है। 

कल जब पूर्णिया से लालगंज गांव पहुंचना हुआ तो उसके पीछे पुस्तकालय के संग एक निजी स्वार्थ भी था, वह था  Ogilvy Advertising के नेशनल क्रिएटिव डाइरेक्टर रह चुके राजकुमार झा को सुनना। राज सर मेरी जिंदगी की कमाई हैं, उन्हें मैं महसूस करता हूं। वह इन दिनों बिहार के अपने गांव फुलपरास में डेरा जमाए हुए हैं और रूरल टूरिज्म से लेकर कम्यूनिटी रेडियो जैसे तमाम तरह के काम को वह इस बार गांव में अंजाम दे रहे हैं। 

पुस्तकालय के इस कार्यक्रम में राज सर ने भागीदारी विषय पर एक छोटा सा व्याख्यान दिया, जिसमें उन्होंने इस बात पर जोड़ दिया कि किस तरह से पुस्तकालय को गांव के प्राइमिरी स्कूलों से जोड़ा जाए। दरअसल वह स्कूल आउटरिच प्रोग्राम को लेकर अपनी बात रख रहे थे। साथ ही उन्होंने कहा कि यह मुफ्त में न हो। साथ ही उन्होंने कार्यक्रमों में युवाओं को स्पेस देने की बात की ताकि नई पीढ़ी की बात सुनी जाए।  

इसके आलावा पुस्तकालय के अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष और सचिव को भी सुनने का मौका मिला। कोषाध्यक्ष ने जिस तरह से साल भर के खर्च और आमदनी का ब्यौरा दिया वह आकर्षित करने वाला रहा। इसके अलावा कार्यक्रम के अध्यक्ष मित्रनाथ जी को सुनकर भी बहुत कुछ नया सीखने को मिला। वह हिंदी-अंग्रेजी-उर्दू-मैथिली के जानकार हैं। एक शानदार वक्ता।  उन्होंने डॉक्टर अमरनाथ झा का जिक्र करते हुए बताया कि एक दफे उन्होंने किसी को कहा था - " लिखना - पढ़ना नहीं बल्कि पढ़ना - लिखना होना चाहिए... पहले पढ़ना जरुरी है.. "

मैं जब भी किसी व्यवस्थित पुस्तकालय को देखता हूं तो बाबूजी की याद आती है। वे पढ़ते थे, खूब पढ़ते थे। उनकी एक समृद्ध लाइब्रेरी हुआ करती थी, वे किताब बाँटते थे। उनकी कई आदतों में एक था- किताब बांटना। 17 साल की उम्र में उन्होंने एक निजी पुस्तकालय बनाया था, जिसे वे किताबों से समृद्ध करते रहे। धान, पटुआ, मूंग, गेंहू के संग वे दुआर को किताब से भी सजाते थे।

सच कहूँ तो रविवार को यदुनाथ सार्वजनिक पुस्तकालय पहुंचकर खुद को मानसिक रूप से समृद्ध करने का मौका मिला। हम सबकी आदत में किताब पढ़ना शामिल होना चाहिए। किताबें हमें भीतर से समृद्ध करती है, किताबें हमें विपरित से विपरित परिस्थितियों में राह दिखाती है।

Sunday, October 24, 2021

जीवन यात्रा..

सोशल मीडिया की एक चीज जो निजी तौर पर मुझे बहुत पसंद है, वह है -मेमोरी! आप दो साल, पांच साल, दस साल पहले क्या लिखते थे, क्या सोचते थे, किसी को देखने समझने का नजरिया क्या था ? ये सबकुछ बताता है आपका सोशल मीडिया एकाउंट. 

यह दुनिया हर पल बदलती है, हम बदल जाते हैं, मन के तार टूटते- जुड़ते हैं. ऐसे में खुद को बदलते देखने की आदत हमें अपने भीतर डालनी चाहिए. गौर से देखियेगा किसी वृक्ष को. हर साल उसकी पत्तियाँ झड़ जाती हैं लेकिन पतझड़ के बाद वह फिर से उसी रंग रौनक में धरती पर उजास बिखेर देती है.

फलदार वृक्ष फल देते हैं, फूल के पौधे फूल... पौधे का रंग-रूप वक्त के साथ बदल तो जाता है लेकिन  वह अपने गुण को नहीं बदलने देता है. आम का पेड़ अपनी डाली पर लीची का फल देना शुरू नहीं कर देता है! बदलाव की आँधी में वृक्ष बस वृक्ष ही रहता है! 

आज सुबह सुबह यह सब लिखते हुए गुजरा वक्त खूब याद आ रहा है. गांधी विहार, मुखर्जी नगर, कर्मपुरा, लाडो सराय, नोयडा, कानपुर होते हुए मन पूर्णिया पहुँच जाता है. हम चलते-चलते कहीं न कहीं पहुँच ही जाते हैं. 

हर किसी के जीवन में एक लंबी यात्रा का लेखा जोखा होता है, जिसका ऑडिट और कोई नहीं बल्कि उसे खुद करना होता है. यह एक जैविक प्रक्रिया है, जिसमें खुद के बदलाव को समझने बूझने का साहस खुद में पैदा करना होता है.

Friday, October 08, 2021

'सहज' अभिनेता पंकज त्रिपाठी

सहज अभिनेता पंकज त्रिपाठी की एक बातचीत याद आ रही है, जिसमें अचानक उनकी आँखें भर आती है. वह पटना के दिनों को याद करते हैं, शहनाई के एक कार्यक्रम का जिक्र करते हैं, जिसमें बिस्मिलाह खान आये थे. वह साइकिल से कार्यक्रम स्थल पहुँचते हैं, सुनते हैं और फिर लौट आते हैं. 
बरसों बाद जब वह अभिनय की दुनिया में आते हैं तो किसी शूटिंग के सिलसिले में भोपाल जाते हैं. सुबह होटल के कमरे में जब अखबार पढ़ते हैं तो पहले पन्ने पर बिस्मिलाह खान साहेब के निधन की खबर रहती है, वह रोने लगते हैं.. उस बातचीत में वह बताते हैं कि जब पटना में उन्होंने पहली बार शहनाई सुना तो उन्हें शास्त्रीय संगीत का कोई इल्म नहीं था, आज भी नहीं है, वह बिस्मिलाह खान से फिर कभी मिले भी नहीं लेकिन उनके निधन की खबर से वह टूट गए थे... यह बात आज इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि आँखों का बात बात पे भींग जाना बताता है कि आप मन से कैसे हैं, आप भीतर से कैसे हैं! 

कबीर कहते हैं न -
 
"सहज सहज सब कोई कहै,
सहज न चीन्हैं कोय |
जिन सहजै विषया तजै,
सहज कहावै सोय || "

यह सहजता आभूषण से कम नहीं!
फिल्म ' तीसरी कसम ' का वह संवाद याद आ रहा है, जिसमें हीरामन पूछता है - मन समझती हैं न! हीरामन की आँखें पूरी फिल्म में बोलती है, अंचल की सहजता यही है. अंचल के लोग कहीं चले जाएं, लेकिन उनकी आँखों में आँगन -दुआर का स्पेस बना रहता है. ऐसे लोग अपने साथ अपने गाम -घर को लेकर चलते हैं. वैसे यह भी सच है कि अपने संग माटी को लेकर चलना साहस का काम है, यह सबके बस की बात नहीं! 

आज यह सब लिखने के पीछे पंकज त्रिपाठी हैं. आज दोपहर चनका में उनका एक वीडियो देख रहा था, अमिताभ बच्चन के साथ, कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम का वीडियो क्लिप था. इसमें अमिताभ बच्चन जी अपने पंकज भैया से पूछते हैं बचपन के दिनों में गाम घर का कैसा वातावरण था? इस सवाल का जवाब पंकज त्रिपाठी जिस अंदाज में देते हैं, वह खुद में एक पाठ है. वह एक बार भी ग्राम जीवन को लेकर निराश नहीं दिखे, माचिस का घर में न होना, बिजली का न रहना, जिसे अक्सर समस्या कहकर हम गाँव को कोस देते हैं, उस मुद्दे पर सहज रहना, हर किसी के बस की बात नहीं और वह तब जब आगे अमिताभ बच्चन बैठें हों! 

अमिताभ के सवाल पर पंकज त्रिपाठी कहते हैं - " मेरे घर से आठ किलोमीटर की दूरी पर एक रेलवे स्टेशन है रतन सराय. आठ बजे एक ट्रेन आती थी, मेल, अठबजिया मेल.हॉर्न भी नहीं, इंजन का साउंड इतना क्रिस्टल सुनाई देता था कि वह पूरे गाँव का अलार्म था... हम नेचर के करीब थे.ऐसा बचपन था. हमारे दोस्त तारे- सितारे थे.. यही कारण है कि शायद वह सहजता आज भी मेरे भीतर है. बरक़रार रखा हूँ उसे जाने नहीं देता.. "

गाँव के पिछड़ेपन को लेकर बात करने वालों को सहजता का यह संवाद  सुनना चाहिए ताकि हम यह समझ सकें कि प्रकृति के करीब रहना क्या होता है. पंकज त्रिपाठी को सुनते हुए कबीर के संग फणीश्वर नाथ रेणु का जीवन भी याद आने लगता है. रेणु अपने साथ गांव लेकर चलते थे. इसका उदाहरण 'केथा' है. वे जहां भी जाते केथा साथ रखते. बिहार के ग्रामीण इलाकों में पुराने कपड़े से बुनकर बिछावन तैयार किया जाता है, जिसे केथा या गेनरा कहते हैं. रेणु जब मुंबई गए तो भी 'केथा ' साथ ले गए थे. दरअसल यही रेणु का ग्राम है, जिसे वे हिंदी के शहरों तक ले गए. उन्हें अपने गांव को कहीं ले जाने में हिचक नहीं होती थी. वे शहरों से आतंकित नहीं होते थे. रेणु एक साथ देहात -शहर जीते रहे, यही कारण है कि मुंबई में रहकर भी औराही हिंगना को देख सकते थे और चित्रित भी कर देते थे. रेणु के बारे में लोगबाग कहते हैं कि वे ग्रामीणता की नफासत को जानते थे और उसे बनाए रखते थे. 

अमिताभ बच्चन के सामने कुर्सी पर बैठे पंकज त्रिपाठी को देखकर लगा कि ग्राम्य जीवन की नफ़ासत को माया के फेर में बचाकर रखना क्या होता है, इसलिए मैंने लिखा कि सदी के महानायक के सवालों का जवाब पंकज त्रिपाठी जिस अंदाज में देते हैं, वह खुद में एक पाठ है. 

मेरे बाबूजी अक्सर चिकनी मिट्टी की व्याख्या करते थे. वे कहते थे कि चिकनी मिट्टी जब गीली होती है तब वह मुलायम दिखती है लेकिन जैसे ही तेज धूप और हवा में सूख जाती है तब माटी भी आवाज देने लगती है... उम्मीद है कि पंकज त्रिपाठी अपने अंचल को अपने भीतर यूँ ही संवार कर रखे रहेंगे. 

और चलते - चलते पंकज त्रिपाठी के लिए रामदरश मिश्र  जी की पंक्ति है -

"बनाया है मैंने ये घर धीरे-धीरे,
खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे-धीरे।
किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला,
कटा ज़िंदगी का सफ़र धीरे-धीरे।
जहाँ आप पहुँचे छ्लांगे लगाकर,
वहाँ मैं भी आया मगर धीरे-धीरे।"

Thursday, September 23, 2021

पितृपक्ष और बाबूजी

बाबूजी हर दिन तर्पण करते थे, वे पुरखों को याद करते थे। शास्त्रीय - धार्मिक पद्धति के अलावा वे एक काम और किया करते थे, वह था अपने पूर्वजों के बारे में बच्चों को जानकारी देना। दादाजी की बातें वे बड़े नाटकीय अन्दाज़ में सुनाते थे। उसमें वे शिक्षा, व्यवहार के संग खेती- बाड़ी को जोड़ते थे। वे कभी भी किसी की निंदा नहीं करते थे.
पितृपक्ष की परंपरा को समझने- बूझने के दौरान आज बाबूजी की बहुत याद आ रही है। लगता है वे भी कहीं से बारिश में खेतों में टहल रहे हैं। हर दिन जब संघर्ष का दौर बढ़ता ही जा रहा है और सच पूछिए तो चुनौतियों से निपटने का साहस भी बढ़ता ही जा रहा है, ऐसे में लगता है कि बाबूजी ही मुझे साहस दे रहे हैं। अक्सर शाम में पूरब के खेत में घूमते हुए लगता है कि वे सफेद धोती और बाँह वाली कोठारी की गंजी में मेरे संग हैं।

लोग पितृपक्ष में परंपराओं के आधार पर बहुत कुछ करते हैं, मैं कोई अपवाद नहीं। लेकिन मैं उन चीज़ों से मोहब्बत करने लगा हूं, जिसे बाबूजी पसंद किया करते थे। खेत, पेड़-पौधे, ढ़ेर सारी किताबें और उनकी काले रंग की राजदूत।

बाबूजी की पसंदीदा काले रंग की राजदूत को साफ़ कर रख दिया है, साइड स्टेण्ड में नहीं बल्कि मैन स्टेण्ड में। वे साइड स्टेण्ड में बाइक को देखकर टोक दिया करते थे और कहते थे : " हमेशा सीधा खड़े रहने की आदत सीखो, झुक जाओगे तो झुकते ही रहोगे..."

सच कहूं तो अब अपने भीतर, आस पास सबसे अधिक बाबूजी को महसूस करता हूं। पितृपक्ष में लोगबाग कुश-तिल और जल के साथ अपने पितरों को याद करते हैं। लेकिन मैं अपनी स्मृति से भी अपने पूर्वजों को याद करता हूं क्योंकि स्मृति की दूब हमेशा हरी होती है और इस मौसम में सुबह सुबह जब दूब पर ओस की बूँदें टिकी रहती है तो लगता है मानो दूब के सिर पे किसी ने मोती को सज़ा दिया है।

आज बाबूजी से जुड़ा सबकुछ याद आ रहा रहा है।दवा, बिछावन, व्हील चेयर, किताबों वाला आलमीरा...सबकुछ आँखों के सामने है लेकिन बाबूजी नहीं हैं।

मैं हर दिन सबकुछ उन्हें अर्पित करता हूं। वे मेरे लिए एक जज्बाती इंसान थे लेकिन यह भी सच है कि वे ऊपर से एक ठेठ-पिता थे,  जिसने कभी भी अपना दुख, परेशानी साझा नहीं किया... 

Wednesday, September 01, 2021

बात पूर्णिया की: उम्मीद भरे दो साल

बात दो साल पहले की है, 2019 की गाँधी जयंती की. उस दिन पूर्णिया जिला समाहरणालय के सभागार में एक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम में एक युवा ने सहजता से पुस्तकालय को लेकर सवाल किया था और जिलाधिकारी ने बेहद सादगी से सवाल का जवाब दिया था. जिलाधिकारी ने बड़ी सादगी से कहा कि सबकुछ संघर्ष से हासिल होता है. वे चाहते तो कह सकते थे कि सबकुछ हो जाएगा लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं कहा, यही सहजता, सरलता बताती है कि हमें गांधी के और करीब आना चाहिए. जिलाधिकारी ने उस दिन कहा था कि हमें महात्मा गांधी के भीतर की अच्छाइयों के संग उनके चरित्र का सम्यक व निष्पक्ष मूल्यांकन भी करना चाहिए,  तब जाकर ही हम गांधी को लेकर संवाद कर सकते हैं.
हम सूबा बिहार के पूर्णिया जिला से आते हैं, जिसके बारे में कभी कहा जाता था कि यहां की पानी में ही दोष है, बीमारियों का घर. फिर 1934 के भूकम्प के बाद पानी में भी बदलाव आता है और धीरे धीरे सब में बदलाव आने लगता है. लोगबाग बाहर से इस जिले में बसने लगते हैं. लेकिन इसके बावजूद यहां के लिए मैथिली में एक कहावत प्रचलित ही रह गई है - " जहर नै खाऊ, माहुर नै खाऊ , 
मरबाक होय त पुरैनिया आऊ " 

लेकिन वक्त के संग यह इलाका भी बदला. लोग बदले, कुछ अधिकारी आए जिन्होंने इस इलाके के रंग में रंगे लोगों के जीवन को सतरंगी बनाने की भरसक कोशिश की.

देश के पुराने जिले में एक पूर्णिया ने डूकरेल, बुकानन , ओ मैली जैसे बदलाव के वाहकों को देखा है. आईएएस अधिकारी आर एस शर्मा जैसे लोगों को पूर्णिया ने महसूस किया है, जिन्होंने पूर्णिया को रचा. 

कोई भी जिला अपने जिलाधिकारी की वजह से भी याद किया जा सकता है. यह सच है कि अपने कामकाज से यह महत्वपूर्ण पद किसी भी इलाके को बदल सकता है. पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार  इसके उदाहरण हैं. 

पिछले दो साल से जिलाधिकारी राहुल कुमार के काम काज की वजह से पूर्णिया जिला हमेशा सुर्खियों में रहा है. जिला में लाइब्रेरी कल्चर को जगाने की बात हो या फिर जिला मुख्यालय से सुदूर इलाकों का लगातार दौरा करने की बात हो. 

ऐसी ही एक घटना की अभी याद आ रही है. शनिवार, 18 जुलाई 2020, पूर्णिया जिला में एक साथ चार हजार से अधिक योजनाओं को 100 से अधिक गांव में शुरू किया गया. जिला के 60 अधिकारी अलग अलग ग्रामीण इलाके गए और योजनाओं की शुरुआत की. ऐसे वक्त में जब रोजगार को लेकर हर कोई परेशान है, उस समय एक विशेष अभियान शुरू कर गांव-गांव में रोजगार सृजन करना एक उम्मीद वाली खबर थी.

बिहार के किसी भी जिले के लिए यह एक अनोखा प्रयोग था, जहां एक ही दिन जिलाधिकारी हों या फिर अन्य अधिकारी सीधे गांव पहुंचते हैं और योजनाओं की शुरूआत करते हैं. इस स्पेशल ड्राइव में पंचायत सरकार भवन के शिलान्यास से लेकर सात निश्चय से संबंधित योजनाओं को हरी झंडी दिखाई गई थी.
इन दो सालों में बहुत कुछ बदला है. दो साल पहले तक पूर्णिया जिला स्वच्छता के आंकड़ों में पिछड़ा नजर आ रहा था, ग्रामीण इलाकों में शौचालय निर्माण को लेकर जोश दिख नहीं रहा था, अचानक एक दिन किसी गाँव में कुदाल लेकर शौचालय निर्माण के लिए गड्ढ़ा करते जिलाधिकारी राहुल कुमार दिख जाते हैं, यह सब पहली बार हो रहा था। इसके बाद की कहानी ही अलग है. 

बताते चलें कि पूर्णिया जिला 250 साल का हो चुका है,  इसका एक अर्थ यह भी है कि पूर्णिया के पास ढेर सारे अनुभव होंगे ठीक घर के उस बुजुर्ग की तरह जिसने सबकुछ आंखों के सामने बदलते देखा है. ऐसे में पूर्णिया को अपनी कहानी सुनानी होगी, अपने उस दर्द को बयां करना होगा जब 1934 में आए भूकंप में सबकुछ तबाह हो गया था लेकिन पूर्णिया फिर से उठ खड़ा हुआ.

हालांकि कोरोना जैसी वैश्विक महामारी की वजह से सबकुछ थम सा गया है लेकिन हम बेहतर कल की उम्मीद कर ही सकते हैं. कोरोना के समय में भी राहुल कुमार की सक्रियता की हर जगह तारीफ हो रही थी. उस कठिन वक्त में जब देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले अपनी माटी की तरफ लौटते हैं, उनके लिए पूर्णिया में कल्सटर में रोजगार का सृजन होता है. शहर के सदर अस्पताल में डेडिकेटेड कोविड हेल्थ केयर सेंटर बनाया जाता है. 

कठिन  से कठिन वक्त में सकारात्मक कार्यों के लिए वे हमेशा एक स्पेस तैयार करते रहते हैं, यही इनकी खासियत है. कल ही एक दिन में पूर्णिया जिला में रिकॉर्ड 96 हजार लोगों का टिकाकरण किया गया. 

इनको जब भी देखता हूँ, बेहतर कल  की उम्मीद ही दिखती है. और चलते-चलते उन्हीं की एक कविता की पंक्ति -
"ठिठक कर आत्मचिंतन कर लेना
हमेशा श्रेयष्कर होता है।
दिशा भाषा की हो
या कि ज़िन्दगी की,
अनियंत्रित ठीक नहीं होती।"

('तद्भव' के जून 2016 अंक में प्रकाशित कविता।)


Tuesday, August 17, 2021

गंध करते मोहल्ले की कहानी

बहुत दिन पहले जब एनडीटीवी पर 'रवीश की रिपोर्ट' आया करती थी तो उसमें एक रिपोर्ट खोड़ा कॉलोनी की दिखाई गई थी। रवीश कुमार ने गाजियाबाद स्थित खोड़ा कॉलोनी की दुर्दशा दिखाई थी। आज वह रिपोर्ट इस वजह से याद आ रही है क्योंकि हम सूबा बिहार के पूर्णिया शहर के जिस मोहल्ले में रहते हैं, वह गंदे-जमे पानी का नाला बन गया है। यदि ड्रोन से कोई इस मोहल्ले की तस्वीर लेगा तो रूप खोड़ा कॉलोनी की ही तरह दिखेगा।

सिक्स लेन सड़क के किनारे यह मोहल्ला बसा है, नाम है नवरतन हाता। नाम इतना सुंदर कि लगता है किसी वाटिका में ही यह मोहल्ला बसा हो ! केएफसी, पिज्जा हट जैसा चकमक आउटलेट वाला यह मोहल्ला जानवरों का अड्डा बन गया है, सुअर तो हर वक्त लोटते पोटते दिख जायेंगे। जानवरों के मल - मूत्र से यह मोहल्ला 'गम गम' करता रहता है।

इसी मोहल्ले में बिहार के मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता
दल (राजद) का एक बड़ा सा आवासीय दफ्तर भी है, यहीं भारतीय खाद्य निगम का भी दफ्तर है। सदर एसडीओ का आवास भी इसी मोहल्ले के सीमांत पर है। खैर, यह कोई बड़ी बात नहीं है! 

सच यह है कि इस मोहल्ले का सड़क नाले में तब्दील हो चुका है। योजनाओं के नाम पर सड़कों को बिहार में इतनी बार तोड़ा जाता है कि सड़क खुद को खेत समझने लगती है। स्थिति और खराब तब हो जाती है जब सड़क की ऊंचाई हर बार बढ़ा दी जाती है, इससे होता यह है कि जिनका घर पुराना है, वह घर सड़क से नीचे हो जाती है और फिर बरसात में एक 'व्यवस्था द्वारा निर्मित बाढ़' का सामना लोगों को करना पड़ता है। कभी कभी तो लगता है कि घर का दरवाजा, खिड़की में तब्दील हो गया है। 

इस मोहल्ले में 'स्वच्छ भारत' आपको कीचड़ में जगमग करता दिखेगा। इस मोहल्ले के लोग भी कम काबिल नहीं हैं , घर का कूड़ा तो हम अधिकार पूर्वक सड़क पर फेंकते ही हैं, घर निर्माण का मलवा (ईंट पत्थर) भी बने बनाए सड़क पर पूरे विवेक से फेंकते हैं। आत्मनिर्भर भारत का सपना मानो इसी मोहल्ले के लोगों को पूरा करना है। 

यह बिहार के एक पुराने शहर के एक पुराने मोहल्ला का रंग है जो अब गंध कर रहा है। भले ही मुकेश अंबानी का जियो फाइबर यहां पहुंच गया है लेकिन जल जमाव से हमें अबतक निजात नहीं मिला है।

कभी कभी लगता है कि वार्ड मेंबर, विधायक, सांसद या फिर नगर आयुक्त से मिला जाए, फिर लगता है कि क्या उन्हें सच पता नहीं होगा ? दरअसल सिस्टम ही नाला और सड़क की तरह टूटी फूटी है, उस पर जनता का नेता बनने का शौक ! इस वजह से समस्या का अंत होता दिखता नहीं है, कुछ जादू ही हो जाए तो बात कुछ और हो ! 

खैर, एक चीज तो इस मोहल्ले के वासी कर ही सकते हैं, जो इस देश में अभी खूब प्रचलन में है - नाम बदलने का। मोहल्ले का नाम ' गंदा नाला' कर दिया जाए .... एक बड़ा सा बोर्ड हाइवे पर ही लगा दिया जाए नए नाम का !