Friday, March 13, 2026

बंगाल डायरी : मुस्लिम बहुल सीट का गणित!


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तारीखों की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोलकाता आ रहे हैं। यहां के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में वह एक रैली को संबोधित करेंगे। लेकिन इन सबके बीच बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं के मन में क्या चल रहा है, हुमायूं कबीर की पार्टी किस ओर करवट लेगी, इन सब मुद्दों पर पर भी ध्यान देने की जरुरत है।
दरअसल तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित होने के बाद हुमायूं कबीर ने 'जनता उन्नयन पार्टी ' बनाई थी। इस नए राजनीतिक दल की एंट्री के बाद से ही बंगाल के मुस्लिम वोटों के लिए 2026 की चुनावी जंग आधिकारिक शुरुआत हो गई थी।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। यहां 112 सीट ऐसी है, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। वर्तमान विधानसभा में इन 112 सीटों में से 106 पहले से ही तृणमूल कांग्रेस के पाले हैं। अंक गणित के लिहाज से समझें तो उसे शेष 182 हिंदू-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल 42 और सीटें जीतने की जरूरत है।

2021 में तृणमूल कांग्रेस ने उन 182 सीटों में से 109 जीती थीं, सफलता दर 60 फीसदी थी। इस जीत के साथ तृणमूल को 215 सीटों का आरामदायक बहुमत दिलाया। वहीं मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने 72 हिंदू-बहुल सीटें जीतीं, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उसकी एक भी न चली।

इन सब आंकड़ों पर नजर घूमाने के बाद जब हम बंगाल में हुमायूं कबीर के उदय को देखते हैं तो बिहार विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन औवेसी की पार्टी के सियासी प्रयोग के बारे में सोचने लगते हैं। 2025 के बिहार चुनावों में ओवैसी की पार्टी ने सीमांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों में 5 सीटें जीतीं। औवेसी ने मुस्लिम वोटों में बिखराव लाने का काम किया और यही वजह रही कि इन इलाकों में महागठबंधन को कई सीटों का नुकसान हुआ। 2020 में भी औवेसी की पार्टी ने इन इलाकों में ऐसा ही कुछ किया था।

भाजपा के रणनीतिकार इस फार्मूले पर भी जोड़-घटाव कर रहे हैं लेकिन बिहार के सीमांत जिले और पश्चिम बंगाल की कहानी कई मायनों में अलग है। बिहार में, मुस्लिम मतदाता सीमावर्ती जिलों की एक संकीर्ण पट्टी में केंद्रित हैं। सीमांचल के 4 जिलों में ही 27 फीसदी मुस्लिम आबादी रहती है। जबकि बंगाल में मुस्लिम आबादी काफी अधिक होने के बावजूद वह कहीं अधिक बिखरी हुई है। कोलकाता के शहरी इलाकों, उत्तर के ग्रामीण बेल्ट और दक्षिण के तटीय क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी फैली है। शीर्ष 5 मुस्लिम बहुल जिलों में लगभग 90 सीटें आती हैं, लेकिन मुस्लिम राज्य भर के दर्जनों अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी अल्पसंख्यक हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल की जनसंख्या में मुस्लिम लगभग 27 फीसदी हैं। हालांकि भाजपा दावा करती है कि पिछले दशक में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के कारण बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 फीसदी या उससे अधिक हो गई है।

बंगाल के 3 जिले- मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी या उससे अधिक है। दो अन्य जिले- दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में यह 35 फीसदी से ऊपर है। इन क्षेत्रों में 89 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से अधिक है। साथ ही 112 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 25 फीसदी से अधिक है।

2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 35 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटर वाले 89 में से 87 सीटें जीती थीं, यह लगभग एकतरफा जीत था। 112 मुस्लिम-प्रभावित सीटों में से तृणमूल ने 106 पर कब्जा किया, जबकि भाजपा के पास केवल 5 सीटें रहीं। 30 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी की सफलता दर लगभग शून्य थी।

'एक्सिस माई इंडिया' के 2021 के एग्जिट पोल डेटा के अनुसार, लगभग 75 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने तृणमूल का समर्थन किया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 83 फीसदी हो गई।

वहीं इन सब आंकड़ों के कहानी के बीच पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने एलपीजी संकट के बीच सड़क पर उतरने का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने बताया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 16 मार्च को कॉलेज स्क्वायर से डोरिना क्रॉसिंग तक जुलूस निकालेंगी।

मुख्यमंत्री ने मौजूदा गैस संकट और बढ़ती कीमतों के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि पश्चिम एशिया संकट कई दिनों से बना हुआ है। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने समय रहते कोई तैयारी या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की। उनके अनुसार, गैस जैसी जरूरी वस्तु की आपूर्ति को लेकर केंद्र की लापरवाही के कारण आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

मतदाताओं के मिजाज, राजनीतिक दलों की रणनीति, रसोई गैस की किल्लतों की मौजूदा स्थितियों के बीच खबर आ रही है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 दो चरणों में कराये जा सकते हैं।

निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी। अधिकारी ने कहा कि निर्वाचन आयोग के नयी दिल्ली कार्यालय में एक और बैठक होगी, जिसके बाद बंगाल चुनाव 2026 पर अंतिम निर्णय लिया जायेगा। अधिकारी ने कहा कि पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीट के लिए चुनाव अगले महीने यानी अप्रैल में होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर राज्य की अधिकतर राजनीतिक पार्टियों ने कोलकाता में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ बैठक के दौरान एक या दो चरणों में चुनाव कराने की मांग की थी। सुरक्षा बल सहित अन्य अधिकारियों से भी ऐसे ही सुझाव मिले थे।

Friday, March 06, 2026

बहुत कुछ बदल गया गुरुवार को !




बिहार की राजनीति में गुरुवार का दिन उस समय ऐतिहासिक बन गया, जब तीन अलग-अलग दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों ने एक साथ राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया।

यह पहली बार है जब प्रदेश की राजनीति में इस तरह का दृश्य देखने को मिला। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में नामांकन प्रक्रिया पूरी हुई, जिससे इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया।
गुरुवार का दिन देश की राजनीति में भी बड़े बदलाव की सूचना देने वाला भी रहा। लंबे अरसे से बिहार की सत्ता वाली राजनीति के पर्याय माने जाने वाले नीतीश कुनार ने राज्य से अंतत: दूरी बना ही ली, वे अब राज्यसभा की ओर जा रहे हैं।  

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर दिया। उनके नामांकन के मौक़े पर गृह मंत्री अमित शाह भी पटना पहुंचे थे।

इस घटनाक्रम के बाद एक ही सवाल हर बिहारी पूछ रहा है कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? पाटलिपुत्र की धरती पर 20 साल बाद इस सवाल का जवाब ढूंढा जा रहा है। वरना, गठबंधन कोई हो, सीएम पद का उम्मीदवार फिक्स होता था।

इससे पहले अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर नीतीश कुमार ने एक तरह का विराम लगा दिया और उन्होंने ख़ुद के राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने की पुष्टि की।

एक्स पर पोस्ट कर उन्होंने ये जानकारी दी।

इसके साथ ही यह तय हो गया कि बिहार में दो दशकों के बाद राज्य की सत्ता में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है।

नीतीश कुमार को लेकर बिहार के सियासी गलियारों में लगातार यह चर्चा चल रही थी कि वो बिहार की सत्ता से अलग राज्यसभा का रुख़ करने वाले हैं।

नीतीश कुमार साल 2005 से लगातार बिहार में सत्ता का पर्याय बने हुए थे।

उसके बाद से बिहार की सत्ता पर लगातार नीतीश ही बने हुए हैं।

नीतीश पहली बार साल 2000 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन वो अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए थे।

इसके बाद साल 2005 में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ बहुमत की सरकार बनाई थी।

हालांकि साल 2014-15 में कुछ महीनों के लिए उन्होंने अपनी पार्टी से जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था।

इसके बाद नीतीश कुमार वापस सीएम की कुर्सी पर आ गए थे और कहा जाता था कि बिहार में किसी भी गठबंधन की सरकार बने, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही होते हैं।



वहीं इन सबके बीच देश की संवैधानिक व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नए राज्यपाल और उपराज्यपाल नियुक्त किए हैं। यह बदलाव ऐसे समय किया गया है जब कई राज्यों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं और आने वाले समय में चुनावी माहौल भी बनने वाला है। केंद्र ने इस फेरबदल में अनुभवी राजनेताओं, पूर्व नौकरशाहों और प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को जिम्मेदारी देकर संवैधानिक संस्थाओं को और मजबूत करने का संदेश दिया है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सीवी आनंद बोस का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है इसके साथ ही केंद्र सरकार ने कई राज्यों में राज्यपाल और उपराज्यपाल के पदों पर नए बदलाव किए हैं राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी अधिसूचना में बताया गया कि अलग-अलग राज्यों में नई नियुक्तियां की गई हैं इन सभी अधिकारियों की जिम्मेदारी तब से शुरू होगी जब वे अपने नए पद का कार्यभार संभालेंगे माना जा रहा है कि इन बदलावों का मकसद राज्यों में प्रशासन को और मजबूत करना है।

नई सूची के अनुसार हिमाचल प्रदेश के मौजूदा राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला को अब तेलंगाना का राज्यपाल बनाया गया है वहीं तेलंगाना के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा को महाराष्ट्र का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है इसके अलावा वरिष्ठ नेता नंद किशोर यादव को नागालैंड का राज्यपाल बनाया गया है केंद्र सरकार ने इन नियुक्तियों के जरिए अलग-अलग राज्यों में नई जिम्मेदारियां तय की हैं, ताकि प्रशासनिक कामकाज बेहतर तरीके से चल सके

सरकार ने लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन को बिहार का नया राज्यपाल नियुक्त किया है वहीं तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि को अब पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया है इसके साथ ही केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को अतिरिक्त जिम्मेदारी देते हुए तमिलनाडु का कार्यभार भी सौंपा गया है इन बदलावों के बाद कई राज्यों में नई प्रशासनिक टीम काम करेगी और सरकार को उम्मीद है कि इससे कामकाज में बेहतर तालमेल बनेगा।

कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में भी बदलाव किए गए हैं लद्दाख के उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता को अब हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है वहीं दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना को लद्दाख का नया उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है इसके अलावा पूर्व राजनयिक तरनजीत सिंह संधू को दिल्ली का नया उपराज्यपाल बनाया गया है माना जा रहा है कि इन बदलावों से केंद्र शासित प्रदेशों में प्रशासनिक काम और बेहतर ढंग से चल सकेगा।

नई नियुक्तियों को सरकार की बड़ी प्रशासनिक पहल माना जा रहा है खासकर पश्चिम बंगाल में आर.एन. रवि की नियुक्ति पर राजनीतिक हलकों की नजर है वह पहले तमिलनाडु में राज्यपाल रहते हुए कई मुद्दों को लेकर चर्चा में रहे थे वहीं बिहार में सैयद अता हसनैन की नियुक्ति को भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि उन्हें सेना और प्रशासन का अच्छा अनुभव है दूसरी तरफ दिल्ली में तरनजीत सिंह संधू के उपराज्यपाल बनने के बाद उम्मीद की जा रही है कि केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिल सकता है।






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Girindra Nath Jha
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Friday, February 27, 2026

अमित शाह की सीमांचल डायरी !



बिहार में सीमांचल की राजनीति अब करवट लेने लगी है। केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री अमित शाह इन सीमांत इलाकों को लेकर योजनाएं बनाने लगे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने बिहार के सीमांत जिले में तीन दिन का प्रवास किया।
सीमांचल के तीन दिवसीय दौरे के दौरान गृह मंत्री का मुख्य फोकस सीमा सुरक्षा, घुसपैठ और जनसांख्यिकीय बदलाव पर रहा। गुरुवार को अररिया में सीमावर्ती जिलों के अधिकारियों के साथ हुई बैठक में भी यही मुद्दे प्रमुख रहे। नेपाल-भारत सीमा पर उत्पन्न चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा की गई और संबंधित अधिकारियों को कई आवश्यक निर्देश दिए गए।

अररिया में उन्होंने सीमा सुरक्षा प्रबंधन और वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम पर समीक्षा की। समाहरणालय स्थित परमान सभागार में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने भारत–नेपाल सीमा सुरक्षा प्रबंधन के साथ दूसरे चरण के वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को लेकर समीक्षात्मक बैठक की।

भारत–नेपाल सीमा सुरक्षा के तहत खुली सीमा का लाभ उठाकर होने वाली अवैध गतिविधियों और घुसपैठ को रोकने के लिए प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ सीमा सुरक्षा में लगी एजेंसी एसएसबी को कई आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। इससे पहले बुधवार को उन्होंने किशनगंज में एक उच्च स्तरीय बैठक की थी।

अपने तीन दिवसीय दौरे में गृह मंत्री लगातार सीमावर्ती इलाकों में बदलती आबादी के पैटर्न पर खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों के साथ चर्चा की। अवैध प्रवासियों और उनके माध्यम से बनाए जा रहे वोट बैंक की पहचान को लेकर भी कड़े निर्देश दिए गए।

गृह मंत्री ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के जरिए सीमावर्ती गांवों में बुनियादी ढांचा मजबूत करने और पलायन रोकने जैसे मुद्दों पर अधिकारियों से राय लेते हुए चर्चा की। बिहार के सीमावर्ती गांवों के इंफ्रास्ट्रक्चर, संस्कृति, पर्यटन, जीवन और आर्थिक उन्नति को वाइब्रेंट करने की बात कही गई।

मोदी सरकार के लिए सीमावर्ती गांवों की सुरक्षा और सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता करार दिया गया है। बैठक में घुसपैठ मुक्त सीमांचल को लेकर अधिकारियों से सतर्कता बरतने और चिन्हित कर कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। किशनगंज और अररिया में हुई बैठकों में गृह मंत्री अमित शाह के अलावा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय, बिहार सरकार के डिप्टी सीएम एवं गृह मंत्री सम्राट चौधरी, मुख्य सचिव प्रत्यय अमृत, डीजीपी विनय कुमार, एसएसबी के डीजीपी समेत कई प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी तथा सात सीमावर्ती जिलों के डीएम–एसपी मौजूद थे।

सीमांचल का इलाका नेपाल और बांग्लादेश सीमा से सटा है और चिकन नेक कॉरिडोर के पास स्थित है। घुसपैठ और सीमावर्ती सुरक्षा को लेकर ये इलाका संवेदनशील है।

बता दें कि इससे पहले अररिया में अमित शाह ने सीमा सुरक्षा बल के जवानों को संबोधित किया। उन्होंने कहा, "बिहार सरकार के गृहमंत्रालय, डीएम, एसपी और कई संगठनों के साथ तीन दिन में मीटिंग कर के हम एक कार्ययोजना बना रहे हैं।"

गृह मंत्री ने कहा कि सीमा के 10 किलोमीटर के अंदर सभी अतिक्रमण हटाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि सीमा से घुसपैठिए सिर्फ चुनाव को प्रभावित नहीं करते हैं, वे गरीबों के राशन में भी हिस्सेदारी ले जाते हैं, रोगार में युवाओं की संभावनाओं को क्षीण करते हैं और राष्ट्र की सुरक्षा के लिए भी बहुत बड़ा चुनौती हैं। सीमा के 10 किलोमीटर के अंदर जितने अवैध अतिक्रमण हैं, उन सभी अतिक्रमणों को ध्वस्त किया जाएगा।

अमित शाह ने कहा कि सीमांचल से घुसपैठियों को बाहर करने का मिशन शुरू होने वाला है। घुसपैठियों की वजह से सीमांचल की डेमोग्राफी बदली है। सीमा की सुरक्षा के साथ-साथ अवैध स्मगलिंग, नार्कोटिक्स और कई गतिविधियां हैं जिनपर नजर रखनी होगी। इसकी एसओपी बनाई जानी चाहिए, ताकि नीचे से ही जवान अलर्ट रहे। खुली सीमा की सुरक्षा बड़ी चुनौती है। SSB जवानों के लिए सरकार सुविधाएं बढ़ा रही है। आप सीमा की सुरक्षा में लगे हैं आपका परिवार हमारी जिम्मेदारी है।

गौरतलब है कि नेपाल बॉर्डर की सुरक्षा का जिम्मा एसएसबी के पास है। भारत की जमीनी सीमाएं 7 देशों चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान से लगती है। जबकि, समुद्री सीमाएं श्रीलंका, मालदीव और इंडोनेशिया के साथ लगती हैं।

नेपाल और भूटान बॉर्डर की सुरक्षा एसएसबी, पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश बॉर्डर की सुरक्षा बीएसएफ, चीन बॉर्डर की सुरक्षा भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और म्यांमार बॉर्डर की सुरक्षा असम राइफल्स के जिम्मे है।

बिहार से सीधा नेपाल का बॉर्डर लगता है। जबकि, बांग्लादेश बॉर्डर की दूरी बिहार के किशनगंज से करीब 20 किमी है। भारत से नेपाल का 1751 किलोमीटर लंबा बॉर्डर लगता है। इसमें से सबसे अधिक 729 किमी बिहार से सटा है।

अपनी इस यात्रा में केंद्रीय गृह मंत्री ने दूसरी सबसे अहम बात डेमोग्राफी को लेकर कही। उन्होंने कहा कि यह सरकार डेमोग्राफी परिवर्तन को लेकर भी संकल्पित है। इस संदर्भ में एक उच्च स्तरीय समिति सिर्फ सीमांचल ही नहीं बल्कि पूरे देश की बदली डेमोग्राफी का गहराई से अध्ययन कर रिपोर्ट करेगी। इसके बाद घुसपैठिये को देश से बाहर निकालने की कवायद को अंजाम दिया जाएगा। और इस कार्य की शुरुआत बिहार से होगी।

अमित शाह का बार बार सीमांचल के किसी जिले में आने को भविष्य की चुनावी राजनीति के रूप में देखा जा सकता है। इस इलाके की विधानसभा और लोकसभा सीटों पर भाजपा अपनी पकड़ और भी मजबूत करने की योजनाएं बनाती रही है। वहीं यह इलाका पश्चिम बंगाल से भी जुड़ा हुआ है, जहां आने वाले दिनों में विधानसभा चुनाव होंगे।

लोगबाग यह भी कह रहे हैं कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की नजर सीमांचल के उन सीटों पर हैं जहां मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत या इस से कम हो।

अब देखना यह है कि अमित शाह के इस दौरे के बाद बिहार के इन इलाकों में राजनीति कौन सा गुल खिलाती है। 


Friday, February 20, 2026

बंगाल डायरी: अमित शाह और टीएमसी के बहाने बात मतुआ समुदाय की


पिछले दिनों गृह मंत्री अमित शाह बंगाल के नादिया जिले के मायापुर गए, जो भक्ति आंदोलन का उद्गम स्थल है। अमित शाह ने मतुआ महासंघ के संस्थापक हरिचंद ठाकुर और उनके पुत्र गुरुचंद ठाकुर तथा वैष्णव संत भक्तिसिद्धांत सरस्वती जैसे समाज सुधारकों की जमकर प्रशंसा की।

अमित शाह ने अपनी इस यात्रा में एसआईआर से जुड़ी राजनीति को दरकिनार करते हुए आध्यात्मिक बातें की। वहीं इस इलाके की राजनीति पर यदि ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्ट नजर आता है कि नादिया जिले के सातों विधानसभा सीटों पर इस भक्ति समागम का खास महत्व है।

शाह ने यहां एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हरिचंद और गुरुचंद ठाकुर तथा संपूर्ण मतुआ समाज ने सामाजिक कल्याण के विचार को आगे बढ़ाया। उन्होंने समुदाय के भीतर अस्पृश्यता के विरुद्ध उनके अभियान और शिक्षा एवं लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के प्रयासों का विशेष रूप से उल्लेख किया।

वहीं इस यात्रा के बहाने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर तृणमूल कांग्रेस ने जुबानी हमला बोला है। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी ने कहा कि भाजपा नेताओं को अब राम का नाम लेने में भी दिक्कत हो रही है।

अमित शाह के दिल्ली लौटने के बाद अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) ने अपने ऑफिशियल X हैंडल @AITCofficial पर 21 सेकेंड का एक वीडियो शेयर किया। यह वीडियो इस्कॉन के कार्यक्रम में भाषण दे रहे अमित शाह का है। वीडियो में अमित शाह ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे…’ कह रहे हैं। इस महामंत्र का वहां मौजूद लोग भी जप करते हैं।

इसी वीडियो का एक हिस्सा काटकर तृणमूल कांग्रेस ने पोस्ट किया और लिखा- अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भगवान राम का नाम लेने में भी दिक्कत हो रही है? टीएमसी ने आगे कहा- मायापुर में अमित शाह ने हरे कृष्ण महामंत्र का जप किया. शुरू की 2 लाइनों के बाद वह चुप हो गये. पार्टी ने पूछा कि ऐसा अज्ञानता में हुआ या उदासीनता की वजह से उन्होंने ऐसा किया?

तृणमूल कांग्रेस ने लिखा है कि 15वीं सदी में भक्ति आंदोलन के दौरान श्री श्री चैतन्य महाप्रभु के दौर में हरे कृष्ण महामंत्र उभरकर सामने आया। नदिया की पवित्र भूमि पर खड़े होकर, जो भूमि हमेशा श्री श्री चैतन्य महाप्रभु से जुड़ी हुई है, इस तरह का आधा-अधूरा आह्वान या तो समझ की कमी को दर्शाता है या श्रद्धा की कमी?
इस पर भाजपा ने कहा कि कोई मूर्ख ही ऐसी बात कर सकता है। जिसे धर्म का कोई ज्ञान नहीं, वही राम और कृष्ण को अलग-अलग समझ सकता है। गौरतलब है बुधवार को एक दिन के पश्चिम बंगाल दौरे पर आये अमित शाह नदिया जिले के मायापुर में थे। उन्होंने इस्कॉन मंदिर में भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर की 152वीं जयंती पर आयोजित समारोह में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे का जप किया।


भक्तिसिद्धांत सरस्वती की 152वीं जयंती के अवसर पर अतिथि के रूप में उपस्थित अमित शाह ने कहा कि वह मायापुर में गृह मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि भारत और विदेश में 64 गौड़ीय मठों की संस्थापक के भक्त के रूप में आए हैं।

समारोह में उपस्थित लोगों को प्रधानमंत्री मोदी का हरे कृष्णा संदेश देते हुए शाह ने कहा, 'जब भी कोई विदेशी अतिथि मोदी जी से मिलने आता है, तो वे उन्हें भगवद गीता की एक प्रति भेंट करते हैं। भक्ति आंदोलन का केंद्र नादिया था और आने वाले दिनों में इसका विस्तार होगा। मुझे विश्वास है कि हम विकसित भारत और सनातन धर्म का संदेश विश्व तक पहुंचाने में सक्षम होंगे।'

अमित शाह की इस यात्रा को दक्षिणी पश्चिम बंगाल के बड़े हिस्से में प्रभावशाली समुदाय मतुआ महासंघ के साथ भाजपा के संबंधों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।

दरअसल बंगाल की राजनीति में नदिया और मतुआ समीकरण का विशेष महत्व है। इस बात को हर पार्टी समझती है। नदिया जिले की सीटें नवद्वीप, नदिया उत्तर, नदिया दक्षिण और मतुआ प्रभावित उप‑क्षेत्र हमेशा चुनावी गणित तय करने में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं।

जैसा कि हम सब जानते हैं कि मतुआ समुदाय का इतिहास 200 साल से ज्यादा पुराना है। इसकी स्थापना हरिचंद ठाकुर ने की थी। तभी से यह समुदाय राजनीति के साथ गहराई से जुड़ा रहा है। आज़ादी के बाद प्रमथ रंजन ठाकुर हों, उनके निधन के बाद उनकी पत्नी बीणापाणि देवी, या फिर आज उनके बेटे और पोते – यह परिवार और समुदाय के चेहरे हमेशा बंगाल की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे हैं।

मतुआ समुदाय बंगाल में बसे बंगाली हिंदुओं का बड़ा और संगठित वोटर समूह है। इस समुदाय का राजनीतिक झुकाव सीधे चुनाव परिणाम पर असर डालता है। मतुआ समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से भावनात्मक जुड़ाव बेहद गहरा है। ऐसे में अमित शाह का इस जयंती समारोह में आना राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी इस समुदाय तक अपना संवाद और मजबूत करना चाहती है।

नदिया जिला में सात विधानसभा सीट हैं। यदि इन सभी सीटों पर कोई एक दल ढंग से काम करे तो चुनावी हवा का रुख बदला जा सकता है। यही वजह है कि भाजपा और टीएमसी, दोनों ही पार्टियां इस पूरे क्षेत्र पर फोकस बढ़ा चुकी हैं।

जहां एक ओर भाजपा धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के जरिए समुदाय को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं टीएमसी अपने स्थानीय संगठन और मौजूदा समर्थन के आधार का सहारा ले रही है।

Friday, February 13, 2026

बंगाल डायरी: फिर से सुर्खियों में हुमायूं कबीर

पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ महीनों से एक नाम की सबसे ज्‍यादा चर्चा है, और यह नाम है- हुमांयू कबीर। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद शिलान्‍यास समारोह के बाद हुमांयू कबीर की बात देश भर में होने लगी। प्रदेश के भरतपुर से विधायक हुमायूं कबीर को हाल में तृणमूल कांग्रेस पार्टी की अनुशासन समिति ने पार्टी से सस्‍पेंड कर दिया था और उसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी- जन उन्नयन पार्टी की नींव रखी।
गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में जन उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर ने बाबरी यात्रा मार्च की शुरुआत कर फिर से सुर्खियां बटौरनी शुरु कर दी है। हुमांयू कबीर की यह यात्रा नदिया जिले के प्लासी से शुरू होकर मुर्शिदाबाद के रेजुनगर तक गई। मार्च के दौरान बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुए, जिन्होंने सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द से जुड़े मुद्दों को उठाने का दावा किया। हुमायूं कबीर ने कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य लोगों को एकजुट करना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना है।

प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मार्ग में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए। स्थानीय स्तर पर इस मार्च को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है।

मुर्शिदाबाद में बाबरी यात्रा को लेकर पूरे प्रदेश में राजनीतिक गरमाहट तेज हो गई है। हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद सैकड़ों समर्थकों के साथ 22 किलोमीटर लंबी पदयात्रा निकाली। यह यात्रा नादिया-मुर्शिदाबाद सीमा के पलाशी से बेलडांगा तक जा रही है। यात्रा के दौरान हुमायूं कबीर ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वह किसी से डरने वाले नहीं हैं और बाबरी मस्जिद का निर्माण होकर रहेगा। कबीर ने पुलिस प्रशासन पर पक्षपात का आरोप भी लगाया।

उन्होंने दावा किया कि आगामी विधानसभा चुनाव में मुसलमान 100 सीटें जीतकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में निर्णायक शक्ति बनेंगे।

तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा प्रस्तावित 'बाबरी यात्रा' के रूट में अंतिम समय पर कटौती की गई है। गुरुवार सुबह शुरू होने वाली यह रैली पहले नदिया जिले के पलाशी से उत्तर दिनाजपुर के इटाहार तक 265 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली थी, लेकिन अब यह केवल 22 किलोमीटर तक सीमित होकर मुर्शिदाबाद के रेजीनगर में समाप्त हो जाएगी।

रैली के स्वरूप में भी बड़ा बदलाव आया है। पूर्व योजना के अनुसार, इसमें 100 वाहनों का काफिला और लगभग 600 लोग शामिल होने थे, परंतु अब इसे एक साधारण पदयात्रा का रूप दे दिया गया है।

कबीर ने दावा किया कि तीनों जिलों से आवश्यक पुलिस अनुमति न मिल पाने के कारण रूट छोटा करना पड़ा, जबकि पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इतनी लंबी रैली के लिए औपचारिक अनुमति मांगी ही नहीं गई थी।

भरतपुर से विधायक कबीर ने कहा कि यह यात्रा बेलडांगा में प्रस्तावित 'बाबरी मस्जिद' के निर्माण को लेकर फैलाई जा रही भ्रांतियों को दूर करने के लिए है। उन्होंने बुधवार को मस्जिद की नींव रखते हुए बताया था कि लगभग 55 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह ढांचा तीन साल में तैयार होगा, जिसका गेट ही पांच करोड़ रुपये का होगा।

बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष व भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी ने बेलडांगा में 'बाबरी मस्जिद' के नाम से हो रहे निर्माण पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें मंदिर या मस्जिद के निर्माण से कोई समस्या नहीं है, लेकिन वे बंगाल की धरती पर मुगल शासक बाबर के नाम का महिमामंडन बर्दाश्त नहीं करेंगे।

अधिकारी ने कहा कि हिंदू मंदिर बनाएं और मुस्लिम मस्जिद, इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन मैं बाबर का नाम नहीं लिखने दूंगा। आने वाले दिनों में भाजपा बंगाल से बाबर का नाम मिटाने के लिए काम करेगी।

दूसरी ओर, मस्जिद का निर्माण शुरू करने वाले हुमायूं कबीर ने भाजपा पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि दो साल के भीतर मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया जाएगा और इसके साथ एक अस्पताल व विश्वविद्यालय भी बनाया जाएगा।

कबीर ने आरोप लगाया कि जब मुस्लिम मस्जिद बनाना चाहते हैं, तो विरोध किया जाता है। इस बीच, तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी कबीर पर निशाना साधते हुए कहा कि मंदिर-मस्जिद की राजनीति करने वाले कबीर और भाजपा में कोई अंतर नहीं है।

गौरतलब है कि हुमायूं कबीर मुर्शिदाबाद जिले की भरतपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। रेजिनगर के एक सामान्य परिवार से आने वाले हुमायूं कबीर का राजनीतिक सफर उठापटक भरा रहा है। उन्हें मुर्शिदाबाद की राजनीति का शानदार खिलाड़ी माना जाता है। उन्होंने मुर्शिदाबाद में कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी के करीबी सहयोगी के रूप में राजनीति में कदम रखा। वह 2009 से कांग्रेस की मुर्शिदाबाद इकाई के महासचिव थे।

साल 2011 के विधानसभा चुनाव में हुमायूं कबीर कांग्रेस के टिकट पर रेजिनगर से पहली बार विधायक चुने गए। साल 2012 में अधीर रंजन चौधरी से मतभेदों की वजह से वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, उसी साल उपचुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। साल 2015 में उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण तृणमूल कांग्रेस से छह साल के लिए निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद वह 2018 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और 2019 का लोकसभा चुनाव मुर्शिदाबाद सीट से लड़ा, लेकिन हार गए।

साल 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले वह फिर से तृणमूल कांग्रेस में लौटे और भरतपुर से विधायक चुने गए। लेकिन फिर 2025 में वे ममता बनर्जी से दूरी बनाकर अपनी अलग पार्टी बना ली है।

हुमायूं कबीर अपने तीखे और कई बार सांप्रदायिक बयानों की वजह से पहले भी विवादों में रहे हैं। अप्रैल 2025 में वक्फ बिल को लेकर मुर्शिदाबाद में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद भी उनके बयानों पर काफी बवाल मचा था।

अब देखना है कि आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हुमांयू कबीर तृणमूल कांग्रेस या फिर भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा पाते हैं। या फिर वे केवल बंगाल के सियासी मैदान के फुटबॉल बने रह जाएंगे!

Friday, January 30, 2026

विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल की डायरी

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं। कहीं पार्टी के भीतर पार्टी चल रही है तो कहीं गठबंधन के लिए नई नई तरकीब खोजी जा रही है। राज्य में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए अपनी आक्रमक छवि बनाए हुए है तो वहीं भारतीय जनता पार्टी की इच्छा है कि इस बार ममता दीदी के किले में कमल खिलाया जाए।  
इन सबके बीच खबर आ रही है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पश्चिम बंगाल यूनिट के सचिव मोहम्मद सलीम ने जनता उन्नयन पार्टी के चीफ हुमायूं कबीर से मुलाकात की है। इस बैठक से दोनों पार्टियों के बीच चुनाव से पहले गठबंधन की संभावना पर अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं। सलीम ने कहा कि चुनाव में सीट बंटवारे के प्रस्ताव पर सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट में चर्चा की जाएगी। उन्होंने हुमायूं कबीर से न्यू टाउन के एक होटल में करीब एक घंटे तक बैठक की थी।

गौरतलब है कि कबीर पहले तृणमूल कांग्रेस के विधायक थे, लेकिन हाल ही में उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले में एक नई बाबरी मस्जिद की नींव रखकर सूबे की सियासत में हलचल मचा दी।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पश्चिम बंगाल यूनिट के सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा, 'हम इस प्रस्ताव पर लेफ्ट फ्रंट में चर्चा करेंगे। उसके बाद फ्रंट से बाहर की लेफ्ट पार्टियों से बात होगी, फिर आईएसएफ से।'

सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट ने 2021 के विधानसभा चुनाव में इंडियन सेक्युलर फ्रंट यानी कि आईएसएफ के साथ गठबंधन किया था, लेकिन कोई सीट नहीं जीत सके। सलीम ने कहा कि कबीर से मुलाकात उनके इरादों को समझने के लिए थी। उन्होंने बताया कि कई पार्टियां अभी चुनाव में सीट बंटवारे पर फैसला नहीं ले पाई हैं। सलीम ने गठबंधन पर चर्चा होने से इनकार किया और कहा, 'मैं उनसे जानना चाहता था कि वे क्या करना चाहते हैं और उनका मकसद क्या है।'

वहीं, कबीर ने इस मुलाकात को शिष्टाचार बैठक बताया, लेकिन चुनाव के लिए गठबंधन पर चर्चा होने की बात स्वीकार की। उन्होंने कहा, 'मैंने सलीम साहब से अपील की है कि गठबंधन बनाने की प्रक्रिया 15 फरवरी तक पूरी कर ली जाए।'

बता दें कि हुमायूं कबीर ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम से भी गठबंधन पर बात कर सकती है। खासकर मालदा और मुर्शिदाबाद जिले में दोनों पार्टी मिलकर काम करना चाहती है।

कबीर ने कहा, 'हमारा लक्ष्य भ्रष्ट सरकार को हराना है और राज्य के लोगों को पारदर्शी सरकार देना है।' ऐसा माना जा रहा है कि यदि सीपीएम और जनता उन्नयन पार्टी के बीच गठबंधन होता है, तो इससे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को नुकसान पहुंच सकता है, खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में। कबीर की पार्टी मुख्य रूप से मुस्लिम वोटों पर फोकस कर रही है, जो टीएमसी का मजबूत आधार है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह गठबंधन मुस्लिम वोटों को बांट सकता है, जिससे टीएमसी को नुकसान हो सकता है और भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा हो सकता है।

बंगाल चुनाव को लेकर यदि कांग्रेस की बात की जाए तो यह पार्टी एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। वर्षों तक लेफ्ट के साथ चुनावी गठबंधन का हिस्सा रही कांग्रेस अब उससे दूरी बनाने के संकेत दे रही है।

कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन 2016 से बंगाल की राजनीति में सक्रिय रहा। 2019 लोकसभा चुनाव में दोनों अलग हुए, लेकिन 2021 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में फिर साथ आए। हालांकि यह प्रयोग कांग्रेस के लिए लगभग हर बार नुकसानदेह ही साबित हुआ। 2021 विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर 92 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका। उसका वोट शेयर घटकर महज 3 प्रतिशत रह गया।

वहीं हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कोलकाता में ममता बनर्जी से मुलाकात कर उनकी तारीफ की थी। उन्होंने कहा कि देश में सिर्फ दीदी ही भाजपा का मुकाबला कर सकती हैं। अखिलेश ने भाजपा पर जांच एजेंसियों के गलत इस्तेमाल और चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। अखिलेश यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि वह समाज में फूट डालने की राजनीति करती है।

इन सब आरोप प्रत्यारोपों के बीच भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नवीन अपने पहले बंगाल दौरे पर ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दुर्गापुर में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने राज्य में 'डबल इंजन' की सरकार बनाने का आह्वान किया और टीएमसी पर बंगाल को बांग्लादेश की ओर धकेलने का गंभीर आरोप लगाया।

नितिन नवीन ने ऐतिहासिक भिरिंगी श्मशान काली मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विवेकानंद और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी महान विभूतियों की यह भूमि आज अराजकता और भ्रष्टाचार की गवाह बन रही है। नवीन ने कार्यकर्ताओं के संघर्ष का अभिनंदन करते हुए कहा कि केवल भाजपा ही इस दमनकारी और अराजकतावादी सरकार के खिलाफ सीना तानकर खड़ी है।ममता बनर्जी पर सीधा हमला करते हुए नितिन नवीन ने कहा कि उन्होंने प्रदेश को भ्रष्टाचार के कारखाने में तब्दील कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी के विधायक और मंत्री 'टीएमसी टैक्स' वसूलने में लगे हुए हैं और जनता की खून-पसीने की कमाई को लूटा जा रहा है। नवीन के अनुसार, ममता बनर्जी ने भ्रष्टाचार खत्म करने का सपना दिखाकर सत्ता हासिल की थी, लेकिन आज राज्य में केवल घोटाले ही घोटाले हो रहे हैं।

हालांकि विधानसभा चुनाव के बाद ही पता चल पाएगा कि इन आरोप-प्रत्यारोपों को लेकर बंगाल के मतदाता क्या सोच रहे थे और ग्राउंड के नब्ज को किस दल ने पढ़ने की कोशिश की थी। फिलहाल तो बंगाल में हर दल चुनाव की तैयारी में है और हर कोई जीत हासिल करने के लिए मेहनत कर रही है।

Friday, January 23, 2026

अभिषेक बनर्जी के हाथ होगी टीएमसी की कमान !

पश्चिम बंगाल में अगले कुछ महीनों के अंदर विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। माना जा रहा है कि अप्रैल में दो-तीन चरणों में मतदान कराए जा सकते हैं। राज्य में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आमने – सामने है। दोनों ही इस बार सत्ता हासिल करने के लिए दम-खम के साथ ग्राउंड में जुटी हुई है।


मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं तो वहीं लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी के लिए टीएमसी ने भी कमर कस ली है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने इसके लिए बड़ी तैयारी की है और वह इन दिनों राज्य में यात्रा पर निकले हुए हैं। वे इस बार पूरा बंगाल ही मथने के प्लान में हैं। अपनी यात्रा में वह पूरे बंगाल के हर जिले तक पहुंचने में लगे हैं। यह यात्रा इसलिए भी अहम है क्योंकि इसी दौरान अभिषेक बनर्जी टीएमसी के विधायकों का फीडबैक भी जनता से लेंगे। ऐसे में यह यात्रा इस चीज को भी तय करेगी कि किसे चुनाव में टिकट मिलेगा और किसे नहीं। इसके अलावा उन सीटों पर भी वह कार्यकर्ताओं और जनता से फीडबैक लेंगे, जहां भाजपा के विधायक हैं। टीएमसी का प्लान यह है कि यदि किसी विधायक के खिलाफ ऐंटी-इनकम्बैंसी लोकल लेवल है तो उसे रिप्लेस कर दिया जाए। पार्टी नहीं चाहती कि किसी एक नेता या विधायक से नाराजगी का असर चुनाव जीत की संभावनाओं पर पड़े।


पूरे सूबे में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। बुधवार को पुरुलिया के हुड़ा थाना क्षेत्र स्थित लधुड़का के चंडेश्वर मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी पर जमकर हमला बोला।
 

उन्होंने दावा किया कि आगामी चुनाव में भाजपा राज्य में 50 सीटों के भीतर सिमट जाएगी और पुरुलिया जिले की सभी सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ेगा।

इस चुनाव में एक बार फिर अभिषेक बनर्जी टीएमसी को भीतरखाने से लीड करते दिख रहे हैं। दरअसल अभिषेक बनर्जी की पार्टी में भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। साल 2021 के बाद उन्हें राष्ट्रीय महासचिव का पद मिला। साल 2023 की यात्रा ने उन्हें पश्चिम बंगाल में स्थापित किया। साल 2024 लोकसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन की बैठक में वह हर जगह ममता बनर्जी के साथ नजर आने लगे। अगस्त 2025 में ममता बनर्जी ने उन्हें लोकसभा में टीएमसी का नेता बना दिया। अब उनके समर्थक कहते हैं कि ममता बनर्जी हो सकता है कि धीरे-धीरे राज्य की कमान अभिषेक बनर्जी को सौंप दें।

पश्चिम बंगाल में मार्च-अप्रैल 2026 में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अपनी राज्यवापी 'अबार जिते बांगला' की शुरुआत की है। इस नारे का मतलब है, बंगाल फिर जीतेगा। अभिषेक बनर्जी इस महीने के शुरुआत से ही बंगाल के अलग-अलग जिलों में घूम रहे हैं। वह रोड शो कर रहे हैं, जनसभाएं कर रहे हैं और लोगों से सीधे संवाद कर रहे हैं। अटकलें लग रहीं हैं कि अब ममता बनर्जी, राज्य में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देना चाहती हैं, कोलकाता में लोग तो यह भी कहने लगे हैं कि ममता दीदी इसी टर्म में उन्हें अपनी राजनीतिक विरासत सौंप सकती हैं।

अभिषेक बनर्जी, टीएमसी के युवा चेहरे हैं। वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक वारिस हैं। पार्टी में वह नंबर दो की हैसियत रखते हैं। बंगाल घूमते हुए वह ममता सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं। वह ममता सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं और साथ ही भाजपा पर हमला तेज किए हुए हैं।

टीएमसी में अभिषेक बनर्जी मतलब सत्ता की चाभी भी है। राज्य में उनकी पहचान ममता बनर्जी के भतीजे होने से जुड़ा है। लोगबाग तो यहां तक कहते हैं कि ‘ममता बनर्जी ऑफिस’ की तरह एक ऑफिस ‘अभिषेक बनर्जी’ का भी है जो सत्ता को नियंत्रित करता है।

अभिषेक बनर्जी ने अपने पॉलिटिकल कैंपेंन के जरिए पार्टी में अपनी अलग पहचान बनाई है। शुरुआती अभियानों में उन्होंने अपनी अलग छवि बनाई, अक्सर ममता के भरोसेमंद सहयोगी के रूप में देखे गए, लेकिन अब पार्टी के भीतर वे एक निर्णायक भूमिका गढ़ते हुए नजर आ रहे हैं।

पार्टी के भीतर समीकरणों को साधने और पुराने नेताओं के साथ मतभेदों के बीच संतुलन बनाने की उनकी क्षमता ने उनकी पकड़ मजबूत की है। 2024 के लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों के चयन, जैसे अपेक्षाकृत नए चेहरों को मौका देना, उनकी रणनीतिक समझ और राजनीतिक परंपराओं को चुनौती देने की इच्छा दिखाता है।

गौरतलब है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में अभिषेक तृणमूल के नंबर-दो नेता के रूप में उभरे और जल्द ही पार्टी के महासचिव बने। उस चुनाव में टीएमसी  ने 213 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि भाजपा 77 सीटों पर सिमट गई। वोट शेयर के लिहाज से भी तृणमूल ने 47.9 प्रतिशत के साथ रिकॉर्ड बनाया। 2016 में पार्टी ने 211 सीटें और 44.9 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था।

पश्चिम बंगाल के रायगंज इलाके में एक बुजुर्ग से बातचीत हो रही थी। उन्होंने बताया कि ‘लोग भले अभिषेक बनर्जी को टीएमसी का नेता मानते हों लेकिन हम लोग उन्हें पार्टी का मैकेनिक मानते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि कैसे वोटरों को पार्टी से जोड़ा जा सकता है।’

अभिषेक बनर्जी मतदाताओं से जुड़ने वाली कहानियां गढ़ने में माहिर हैं। हाल-फिलहाल चुनाव आयोग की कार्रवाइयों पर उनकी आपत्ति इसी रणनीति का हिस्सा है, वे इन्हें सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि बंगालियों की पहचान पर खतरा बताते हैं। केंद्र की नीतियों को दमनकारी बताकर वे बंगाल की अस्मिता को पार्टी का मुद्दा बनाना चाहते हैं।

टीएमसी में अभिषेक बनर्जी की भूमिका स्पष्ट हो रही है। संगठनात्मक फैसलों और राष्ट्रीय मुद्दों पर अभिषेक की बेबाक राय से पता चलता है कि ममता उन्हें भविष्य के नेतृत्व के रूप में स्थापित कर रही हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर टीएमसी को कड़ी चुनौती दी थी। लेकिन, 2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 294 में से 213 सीटें जीतकर जोरदार वापसी की। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी टीएमसी की बढ़त बरकरार रही। मगर, भाजपा का वोट शेयर भी खत्म नहीं हुआ। अब दो दलों के बीच सीधा मुकाबला है। देखते हैं कि बंगाल की जनता इस बार किसके हाथ सत्ता की चाभा सौंपती है, टीएमसी या भाजपा ?