Wednesday, September 01, 2021

बात पूर्णिया की: उम्मीद भरे दो साल

बात दो साल पहले की है, 2019 की गाँधी जयंती की. उस दिन पूर्णिया जिला समाहरणालय के सभागार में एक संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया था. कार्यक्रम में एक युवा ने सहजता से पुस्तकालय को लेकर सवाल किया था और जिलाधिकारी ने बेहद सादगी से सवाल का जवाब दिया था. जिलाधिकारी ने बड़ी सादगी से कहा कि सबकुछ संघर्ष से हासिल होता है. वे चाहते तो कह सकते थे कि सबकुछ हो जाएगा लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं कहा, यही सहजता, सरलता बताती है कि हमें गांधी के और करीब आना चाहिए. जिलाधिकारी ने उस दिन कहा था कि हमें महात्मा गांधी के भीतर की अच्छाइयों के संग उनके चरित्र का सम्यक व निष्पक्ष मूल्यांकन भी करना चाहिए,  तब जाकर ही हम गांधी को लेकर संवाद कर सकते हैं.
हम सूबा बिहार के पूर्णिया जिला से आते हैं, जिसके बारे में कभी कहा जाता था कि यहां की पानी में ही दोष है, बीमारियों का घर. फिर 1934 के भूकम्प के बाद पानी में भी बदलाव आता है और धीरे धीरे सब में बदलाव आने लगता है. लोगबाग बाहर से इस जिले में बसने लगते हैं. लेकिन इसके बावजूद यहां के लिए मैथिली में एक कहावत प्रचलित ही रह गई है - " जहर नै खाऊ, माहुर नै खाऊ , 
मरबाक होय त पुरैनिया आऊ " 

लेकिन वक्त के संग यह इलाका भी बदला. लोग बदले, कुछ अधिकारी आए जिन्होंने इस इलाके के रंग में रंगे लोगों के जीवन को सतरंगी बनाने की भरसक कोशिश की.

देश के पुराने जिले में एक पूर्णिया ने डूकरेल, बुकानन , ओ मैली जैसे बदलाव के वाहकों को देखा है. आईएएस अधिकारी आर एस शर्मा जैसे लोगों को पूर्णिया ने महसूस किया है, जिन्होंने पूर्णिया को रचा. 

कोई भी जिला अपने जिलाधिकारी की वजह से भी याद किया जा सकता है. यह सच है कि अपने कामकाज से यह महत्वपूर्ण पद किसी भी इलाके को बदल सकता है. पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार  इसके उदाहरण हैं. 

पिछले दो साल से जिलाधिकारी राहुल कुमार के काम काज की वजह से पूर्णिया जिला हमेशा सुर्खियों में रहा है. जिला में लाइब्रेरी कल्चर को जगाने की बात हो या फिर जिला मुख्यालय से सुदूर इलाकों का लगातार दौरा करने की बात हो. 

ऐसी ही एक घटना की अभी याद आ रही है. शनिवार, 18 जुलाई 2020, पूर्णिया जिला में एक साथ चार हजार से अधिक योजनाओं को 100 से अधिक गांव में शुरू किया गया. जिला के 60 अधिकारी अलग अलग ग्रामीण इलाके गए और योजनाओं की शुरुआत की. ऐसे वक्त में जब रोजगार को लेकर हर कोई परेशान है, उस समय एक विशेष अभियान शुरू कर गांव-गांव में रोजगार सृजन करना एक उम्मीद वाली खबर थी.

बिहार के किसी भी जिले के लिए यह एक अनोखा प्रयोग था, जहां एक ही दिन जिलाधिकारी हों या फिर अन्य अधिकारी सीधे गांव पहुंचते हैं और योजनाओं की शुरूआत करते हैं. इस स्पेशल ड्राइव में पंचायत सरकार भवन के शिलान्यास से लेकर सात निश्चय से संबंधित योजनाओं को हरी झंडी दिखाई गई थी.
इन दो सालों में बहुत कुछ बदला है. दो साल पहले तक पूर्णिया जिला स्वच्छता के आंकड़ों में पिछड़ा नजर आ रहा था, ग्रामीण इलाकों में शौचालय निर्माण को लेकर जोश दिख नहीं रहा था, अचानक एक दिन किसी गाँव में कुदाल लेकर शौचालय निर्माण के लिए गड्ढ़ा करते जिलाधिकारी राहुल कुमार दिख जाते हैं, यह सब पहली बार हो रहा था। इसके बाद की कहानी ही अलग है. 

बताते चलें कि पूर्णिया जिला 250 साल का हो चुका है,  इसका एक अर्थ यह भी है कि पूर्णिया के पास ढेर सारे अनुभव होंगे ठीक घर के उस बुजुर्ग की तरह जिसने सबकुछ आंखों के सामने बदलते देखा है. ऐसे में पूर्णिया को अपनी कहानी सुनानी होगी, अपने उस दर्द को बयां करना होगा जब 1934 में आए भूकंप में सबकुछ तबाह हो गया था लेकिन पूर्णिया फिर से उठ खड़ा हुआ.

हालांकि कोरोना जैसी वैश्विक महामारी की वजह से सबकुछ थम सा गया है लेकिन हम बेहतर कल की उम्मीद कर ही सकते हैं. कोरोना के समय में भी राहुल कुमार की सक्रियता की हर जगह तारीफ हो रही थी. उस कठिन वक्त में जब देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले अपनी माटी की तरफ लौटते हैं, उनके लिए पूर्णिया में कल्सटर में रोजगार का सृजन होता है. शहर के सदर अस्पताल में डेडिकेटेड कोविड हेल्थ केयर सेंटर बनाया जाता है. 

कठिन  से कठिन वक्त में सकारात्मक कार्यों के लिए वे हमेशा एक स्पेस तैयार करते रहते हैं, यही इनकी खासियत है. कल ही एक दिन में पूर्णिया जिला में रिकॉर्ड 96 हजार लोगों का टिकाकरण किया गया. 

इनको जब भी देखता हूँ, बेहतर कल  की उम्मीद ही दिखती है. और चलते-चलते उन्हीं की एक कविता की पंक्ति -
"ठिठक कर आत्मचिंतन कर लेना
हमेशा श्रेयष्कर होता है।
दिशा भाषा की हो
या कि ज़िन्दगी की,
अनियंत्रित ठीक नहीं होती।"

('तद्भव' के जून 2016 अंक में प्रकाशित कविता।)


Tuesday, August 17, 2021

गंध करते मोहल्ले की कहानी

बहुत दिन पहले जब एनडीटीवी पर 'रवीश की रिपोर्ट' आया करती थी तो उसमें एक रिपोर्ट खोड़ा कॉलोनी की दिखाई गई थी। रवीश कुमार ने गाजियाबाद स्थित खोड़ा कॉलोनी की दुर्दशा दिखाई थी। आज वह रिपोर्ट इस वजह से याद आ रही है क्योंकि हम सूबा बिहार के पूर्णिया शहर के जिस मोहल्ले में रहते हैं, वह गंदे-जमे पानी का नाला बन गया है। यदि ड्रोन से कोई इस मोहल्ले की तस्वीर लेगा तो रूप खोड़ा कॉलोनी की ही तरह दिखेगा।

सिक्स लेन सड़क के किनारे यह मोहल्ला बसा है, नाम है नवरतन हाता। नाम इतना सुंदर कि लगता है किसी वाटिका में ही यह मोहल्ला बसा हो ! केएफसी, पिज्जा हट जैसा चकमक आउटलेट वाला यह मोहल्ला जानवरों का अड्डा बन गया है, सुअर तो हर वक्त लोटते पोटते दिख जायेंगे। जानवरों के मल - मूत्र से यह मोहल्ला 'गम गम' करता रहता है।

इसी मोहल्ले में बिहार के मुख्य विपक्षी पार्टी राष्ट्रीय जनता
दल (राजद) का एक बड़ा सा आवासीय दफ्तर भी है, यहीं भारतीय खाद्य निगम का भी दफ्तर है। सदर एसडीओ का आवास भी इसी मोहल्ले के सीमांत पर है। खैर, यह कोई बड़ी बात नहीं है! 

सच यह है कि इस मोहल्ले का सड़क नाले में तब्दील हो चुका है। योजनाओं के नाम पर सड़कों को बिहार में इतनी बार तोड़ा जाता है कि सड़क खुद को खेत समझने लगती है। स्थिति और खराब तब हो जाती है जब सड़क की ऊंचाई हर बार बढ़ा दी जाती है, इससे होता यह है कि जिनका घर पुराना है, वह घर सड़क से नीचे हो जाती है और फिर बरसात में एक 'व्यवस्था द्वारा निर्मित बाढ़' का सामना लोगों को करना पड़ता है। कभी कभी तो लगता है कि घर का दरवाजा, खिड़की में तब्दील हो गया है। 

इस मोहल्ले में 'स्वच्छ भारत' आपको कीचड़ में जगमग करता दिखेगा। इस मोहल्ले के लोग भी कम काबिल नहीं हैं , घर का कूड़ा तो हम अधिकार पूर्वक सड़क पर फेंकते ही हैं, घर निर्माण का मलवा (ईंट पत्थर) भी बने बनाए सड़क पर पूरे विवेक से फेंकते हैं। आत्मनिर्भर भारत का सपना मानो इसी मोहल्ले के लोगों को पूरा करना है। 

यह बिहार के एक पुराने शहर के एक पुराने मोहल्ला का रंग है जो अब गंध कर रहा है। भले ही मुकेश अंबानी का जियो फाइबर यहां पहुंच गया है लेकिन जल जमाव से हमें अबतक निजात नहीं मिला है।

कभी कभी लगता है कि वार्ड मेंबर, विधायक, सांसद या फिर नगर आयुक्त से मिला जाए, फिर लगता है कि क्या उन्हें सच पता नहीं होगा ? दरअसल सिस्टम ही नाला और सड़क की तरह टूटी फूटी है, उस पर जनता का नेता बनने का शौक ! इस वजह से समस्या का अंत होता दिखता नहीं है, कुछ जादू ही हो जाए तो बात कुछ और हो ! 

खैर, एक चीज तो इस मोहल्ले के वासी कर ही सकते हैं, जो इस देश में अभी खूब प्रचलन में है - नाम बदलने का। मोहल्ले का नाम ' गंदा नाला' कर दिया जाए .... एक बड़ा सा बोर्ड हाइवे पर ही लगा दिया जाए नए नाम का !

Monday, August 09, 2021

बस अपने लिए खेती करता हूं ...

मैं खेती बस काम भर का करता हूं, आप पूछ सकते हैं कि काम भर का खेती क्या होता है? तो बताता चलूं कि अपने घर के डाइनिंग टेबल के लिए अपनी खेती होती है, थोड़ी सी जगह में धान, थोड़ा सा गेहूं, तेल के लिए सरसों, दाल के लिए मूंग, बारह महीने अलग अलग ऋतुओं के हिसाब से सब्जी। फिर कुछ जगह में  मक्का , फल के मौसम में आम -लीची , कटहल अमरूद अनार आदि। एक छोटा सा तालाब है, जिसमें मछली। 

दरअसल यह सब इसलिए लिख कर बता रहा हूं क्योंकि अक्सर लोग किसानी मुद्दे पर कुछ सवाल पूछ लेते हैं, पहले एक्सपर्ट की तरह बतकही कर लिया करता था लेकिन पिछले दो साल से खेती बाड़ी पर विशेषज्ञ दिखने का भरम त्याग चुका हूं। अब एक स्वार्थी किसान के रूप में आप सबके सामने हूं जो अब केवल और केवल अपने लिए उपजाता है। 

ऐसे लोग, जिन्हें दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए और भी बहुत कुछ करने को आता हो, उसे खेती तो मुनाफे के लिए करनी नहीं  चाहिए। दरअसल जितना मेहनत खेत मांगता है, वह सबके बस की बात नहीं है और फिर बाजार तो किसानी के लिए फिट कभी रहा ही नहीं, वह तो साहूकारों के लिए बना है।

मैं जब 2013 में बिहार लौटा था तो उस वक्त घर की जरूरत साफ अलग थी। धीरे धीरे खेती को अलग रूप देने की कोशिश करने लगा। फिर लगा कि जीवन में चाहिए आपको कितना ? इसे तय कौन करेगा ? समाज या खुद मैं? दिखावे के चक्कर में हम जीवन को विज्ञान की प्रयोगशाला और फिर बैंक का लॉकर बना देते हैं, जबकि मूल चीज मन की शांति है!

इसी शांति के लिए हम अब केवल खुद के लिए उपजाते हैं, खेत की तरह जीवन में भी हरियाली को महत्व देने लगे हैं। क्षणिक सुख के चक्कर में बहुत कुछ से हम हाथ धो बैठते हैं, इसलिए उतना ही जितनी की जरूरत है। बाद बाकी बहुत कुछ है जीवन में कर गुजरने के लिए ..

जीवन में बहुत कुछ ठहर कर भी देखना चाहिए। फसल को देखता हूं तो लगता है वह कितना कुछ देती है हम सबको। वृक्ष को देखिए, केवल देती है, उलट में हमसे कुछ नहीं लेती है। ये सब ठहर के देखने की चीज है। मुनाफे के चक्कर में हम सब फसल चक्र को तोड़ देते हैं, धरती के बारे में भी नहीं सोचते हैं।

किसान की डायरी लिखते हुए पिछले सात साल में इतने उतार चढ़ाव देखा हूं कि टूटकर जुड़ने की जुगत सीख चुका हूं, यह भी अनुभव है। कबीर की वाणी में " अनुभव गावे सो गीता.." शायद यही है।

किसान के साथ एक और विशेषण हम सब जोड़ देते हैं, और वह है दुख। दुख भला किस पेशे में नहीं है,ऐसे में सुख की तलाश भी किसान को करनी होगी। उसे अपने लिए उपजाना होगा, अपने लिए ....

Thursday, May 20, 2021

बात ज्योति यादव की

इन दिनों हर कोई महामारी के संक्रमण से बचने के लिए अपने घर में बंद है। हम सभी मोबाइल और अन्य डिजिटल माध्यमों से दुनिया जहान की बात करते हैं, दुनिया को देखते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं। इस कठिन समय में मीडिया से जुड़े कुछ लोग स्टूडियो और ऑफिस से कोसों दूर ग्राउंड से रिपोर्टिंग कर रहे हैं, ऐसे लोग दरअसल हमारी पीड़ा को आवाज देने का काम कर रहे हैं। ऐसी ही एक रिपोर्टर है अपनी ज्योति यादव, जो घूम घूम कर सच लिख रही हैं, जो इस दौर में सहज नहीं है, इसके लिए साहस चाहिए, जो अब बहुत कम के पास है।


ज्योति पिछले साल भी दिल्ली, यूपी होते हुए बिहार आई थीं, जब लाखों प्रवासी श्रमिक पैदल ही दिल्ली पंजाब आदि से घर लौट रहे थे। ज्योति उस कठिन समय में भी कोरोना संक्रमण और ग्राउंड की सच्चाई से हम सब को द प्रिंट के प्लेटफार्म के जरिए रूबरू करा रही थी। उस समय भी वह गाँव-गाँव घूम रही थीं, बिहार के कैंपों में जा रहीं थीं, जहाँ 14 दिनों तक बाहर से आए लोगों को रखा जाता था। 2020में जब वह पूर्णिया पहुंची थी तो हमारी मुलाकात हुई थी।


इस बार जब कोरोना महामारी हर दिन तांडव मचा रहा है, हम सब हर रोज अपनों को खो रहे हैं, ऐसे क्रूर समय में रिपोर्टिंग के सिलसिले में ज्योति शहर और गाँव पहुँच रही हैं। दिल्ली – यूपी होते हुए वह एक दिन बिहार के अररिया जिला के रानीगंज पहुँच गईं, जहाँ कोविड की वजह से माँ और पिता दोनों की मौत हो जाती है।


ज्योति की रिपोर्ट जब आप पढ़ते हैं तो पता चलता है कि इन सुदूर इलाकों में संक्रमण ने कितने घरों को तहस नहस कर दिया है।


जब हमने ज्योति से पूछा कि आप रिपोर्टिंग के सिलसिले में घर से कब निकली तो उन्होंने कहा कि अब तो महीने से ऊपर हो चले हैं। वह दिल्ली से आठ अप्रैल को लखनऊ पहुंची और फिर 11 अप्रैल से उनकी यात्रा शुरू होती है। लखनऊ से बाराबंकी, सीतापुर, वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर, बलिया, मऊ, बक्सर,आरा, पटना, बेगूसराय, अररिया,मधेपुरा, पूर्णिया, दरभंगा, मधुबनी और बिहार के कई और इलाके उनकी यात्रा के पड़ाव रहे हैं। शहर और ग्रामीण इलाकों तक वह पहुंचती हैं और लोगबाग से बात कर रिपोर्ट तैयार करती हैं।


लखनऊ में शमशान घाट की स्टोरी तैयार करते वक्त ज्योति बीमार पड़ जाती है। यात्रा के शुरुआत में ही संक्रमण की आशंका की वजह से उन्होंने खुद को तीन दिन के लिए आइसोलेट कर लिया और फिर निकल पड़ी यात्रा पर।


मधेपुरा के मेडिकल कॉलेज अस्पताल हो या फिर दरभंगा का डीएमसीएच, ज्योति ने इन अस्पतालों की सच्चाई हम सब तक पहुंचाने का काम किया है। वह यूपी के पंचायत चुनाव में ड्यूटी करने वाली आठ माह की गर्भवती महिला की कहानी सबके सामने लाती हैं, जिसे जबरन काम पर तैनात किया गया था।


ज्योति कहती हैं कि यह इमोशनल एसाइनमेंट है। उन्होंने बताया कि कई जगह संक्रमित लोगों के परिजन हाथ पकड़ कर कोविड वार्ड ले जाते हैं और दिखाते हैं असलियत...। वह कहतीं हैं, “फोन सिर्फ शमशान घाट , कोविड वार्ड और मरे हुए लोगों की तस्वीरों से भरी पड़ी है....।”


ज्योति यादव के रिपोर्टों से गुजरते हुए कई बार लगता है कि देखकर लिखना कितना दुखदायी है, दुख, जिसका आपके पास कोई इलाज नहीं लेकिन जब आप अस्पतालों में मरीजों के परिजनों से मिलते हैं तो वह बस आपको आशा भरी निगाहों से देखते रह जाते हैं....आप उनसे बात करते हैं...उनके दुख को महसूस करते हैं...

Wednesday, May 12, 2021

पूर्णिया में नहीं होने दी ऑक्सीजन क्राइसिस..

आज सुबह-सुबह मैसेज मिलता है कि पूर्णिया में ऑक्सीजन प्लांट खराब हो गया है और भागलपुर से भी आज ऑक्सीजन नहीं पहुंचा कुछ तकनीकी कारणों से। इस मैसेज को पढ़ने के बाद तो लगा कि अब क्या? क्योंकि शहर के अस्पतालों में सैकड़ों मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट में हैं। 

सोशल मीडिया के अलग-अलग प्लेटफार्म पर लोग इस मसले पर अपनी बात रखने लगे, सचमुच यह एक बड़ी समस्या थी। एक ने कहा कि लोग सिलेंडर लेकर भटक रहे हैं, अस्पतालों में भी घंटे-दो घंटे की व्यवस्था है... यह सब पढ़कर मन और विचलित हो गया।

इन सबके बीच खबर आती है कि पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार सदर अस्पताल के कंट्रोल रूम में हैं और खुद सभी मसलों पर नजर बनाए हुए हैं। वह खुद इस मसले पर एक ट्वीट भी करते हैं लेकिन इन सबके बावजूद ऑक्सीजन की कमी को लेकर शहर भर में बात फैल चुकी थी। लोग परेशान थे। इस मुश्किल वक्त में ऐसी सूचना किसी को भी विचलित कर सकती है। 
इस मुश्किल घड़ी में जिलाधिकारी राहुल कुमार एक उम्मीद की तरह सामने आए। उन्होंने एक इमरजेंसी प्लान बनाया। जिला के अनुमंडल अस्पतालों से सिलेंडर मंगवाकर उन प्राइवेट अस्पतालों तक पहुँचाया, जहाँ इमरजेंसी जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई थी। राहुल कुमार ने बताया कि धमदाहा के सरकारी अस्पताल से 15 सिलेंडर मंगाकर मैक्स को 10 और जीवन अस्पताल को 5 सिलेंडर तत्काल दिया गया। दरअसल इन दोनों अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर की सबसे अधिक जरूरत थी।

इसके बाद राहुल कुमार ने अपने प्लान बी पर काम करना शुरु किया। उन्होंने कटिहार, किशनगंज और सुपौल के जिलाधिकारियों से संपर्क किया और वहाँ से ऑक्सीजन सिलेंडर लाने की योजना बनाई। साथ ही किशनगंज स्थित माता गुजरी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज के निदेशक दिलीप जायसवाल ने पहले 10 और फिर 30 जम्बो ऑक्सीजन सिलेंडर तुरंत पूर्णिया भेजा।

राहुल कुमार कहते हैं कि कटिहार से 10, किशनगंज से 10 और सुपौल से 15 सिलेंडर वहाँ के जिलाधिकारियों ने पूर्णिया भेजा। इसके अलावा पूर्णिया के अलग अलग सरकारी अस्पतालों से, जहाँ सिलेंडर की जरुरत नहीं थी, वहाँ से 100 सिलेंडर मंगवा लिए गए। ये सभी सिलेंडर उन सभी अस्पतालों को तत्काल मुहैया करवाया गया, जहां जरूरत थी। मरीजों को समस्या न हो, इसके लिए हर तरह की तैयारी हो रही थी। 

ऑक्सीजन क्राइसिस ऑपरेशन के दौरान राहुल कुमार लगातार कंट्रोल रुम में बने रहे। लगभग आठ घंटे तक यह ऑपरेशन चलता रहा, अलग अलग जिला से सिलेंडर आता रहा और उसे जरुरत के हिसाब से अस्पतालों को पहुँचाने का काम दिन भर जारी रहा। 

गौरतलब है कि पूर्णिया के मरंगा स्थित ऑक्सीजन प्लांट से हर दिन 350 और भागलपुर से 150 सिलेंडर पूर्णिया को मिलता है। ऐसे में यदि एक दिन भी प्लांट में गड़बड़ी आती है तो हम अंदाजा लगा सकते हैं कि स्थिति कितनी भयावह हो सकती है। बुधवार को भी जिला के 3 सरकारी और 10 प्राइवेट अस्पतालों में लगभग 250 मरीज ऑक्सीजन सपोर्ट पर थे और ऐसे समय में यदि मरीजों को ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी हो जाती तो एक बड़ी त्रासदी से हमारा सामना हो जाता। लेकिन जिला के अधिकारियों ने आज ऐसा नहीं होने दिया। राहुल कुमार कहते हैं, “यदि थोड़ी सी भी चूक होती तो कुछ भी हो सकता था लेकिन हमने अपने संसाधनों को बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया। साथ ही आसपास के जिला का पूरा सहयोग मिला, जिस वजह से मरीजों को कोई दिक्कत नहीं हुई।”

अब मरंगा स्थित ऑक्सीजन प्लांट पूरी तरह से ठीक है और काम करने लगा है। सच कहिए तो आज पूर्णिया बच गया। ऐसे वक्त में धैर्य की भी परीक्षा होती है। अक्सर हम सवाल उठाने लगते हैं, सवाल वाजिब है लेकिन लोगों के बीच भय का वातावरण बनाना ठीक नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर तो यहां तक पढ़ने को मिल गया कि आज ऑक्सीजन क्राइसिस से 20-25 मरीज की मौत तय है...ऐसी बातों को पढ़कर मन कमजोर होता है, जबकि यह वक्त मन मजबूत बनाकर रखने का है।

खैर, इस मुश्किल घड़ी में पूर्णिया के लिए राहुल कुमार जो कुछ भी कर रहे हैं, उसे याद रखा जाएगा। हर स्तर पर वह जरुरतमंदों की सहायता कर रहे हैं।उनकी बात जब भी होती है, अकबर इलाहाबादी का लिखा याद आ जाता है- 
“कहीं नाउम्मीदी ने बिजली गिराई, 
कोई बीज उम्मीद के बो रहा है...”

Thursday, March 04, 2021

रेणु के बहाने : पलायन, राजनीति और किसानी...आज के हिरामन की तीन कसमें

खेत में जब भी फसल की हरियाली देखता हूँ तो लगता है कि रेणु हैं, हर खेत के मोड़ पर। उन्हें हम सब आंचलिक कथाकार कहते हैं लेकिन सच यह है कि वे उस फसल की तरह बिखरे हैं जिसमें गांव-शहर सब कुछ समाया हुआ है। उनका कथा संसार आंचलिक भी है और शहराती भी। यही कारण है कि रेणु आंचलिक होकर भी स्थानीय नहीं रह जाते। लेकिन जरा सोचिए, यदि इस दौर में रेणु होते तो क्या सोचते ? क्या होती उनकी तीन कसमें? महामारी, संक्रमण, देश-काल की राजनीति को यदि वे देखते – भोगते तो क्या वे पटना से हमेशा के लिए औराही लौट आते? क्या वे फिर से चुनाव लड़ते? क्या वे भी नई वाली हिंदी की बात करते या फिर वह भी निकालते किसान मार्च!

आज रेणु को याद करते हुए हम सब उनके साहित्य, जीवन और तमाम चीजों पर गुफ्तगू कर रहे हैं लेकिन आज हम आपको रेणु की ही बोली बानी में बताएंगे कि यदि फणीश्वर नाथ रेणु आज होते तो पलायन, राजनीति और किसानी मुद्दे पर क्या कहते....

दृश्य -एक
लोग महानगरों से लौट रहे हैं, हर दिन अखबार में पढ़ रहा हूँ कि महामारी, लॉकडाउन की वजह से नौकरी गंवाने वाले लोग अपने गाँव शहर लौट रहे हैं। सच कहूँ तो दुख होता है, लेकिन फिर सोचता हूँ कि लौटने वाले लोग घर ही तो लौटे हैं। मैं स्वार्थी हो गया हूँ शायद। मेरे टोले में लोगबाग लौट आएंगे तो चहल-पहल बढ़ जाएगी। गाँव मुर्दा तो नहीं लगेगा.. । फिर सोचता हूँ पलायन का दंश झेलना वाला यह अंचल अपनी माटी के लोगों का किस तरह स्वागत करेगा। क्या रोजगार का सृजन स्थानीय स्तर पर संभव है? क्या इस सदी में मैं फिर यह कह पाउंगा कि ‘आवरण दैवे पटुआ, पेट भरन देबे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान...’
सच कहूँ तो औराही के आसपास का जीवन भी अब बदल चुका है लेकिन उम्मीद तो मैं बेहतर कल के लिए ही करूंगा न। आशा है लौट रहे लोग अपने अंचल को संवारेंगे। मुझे परती परिकथा का अपना नायक जितेंद्र याद आ रहा है, वह भी तो लौटा था, उसके पास पुरखे की जमीन जायदाद थी लेकिन उनका क्या जिसके पास एक धूर जमीन भी नहीं है...जा रे जमाना....

दृश्य- दो
दरअसल बात ऐसी हुई कि पुलिस की लाठी से एक छात्र का सिर फट गया। उस समय पुलिस वालों को माइक पर आदेश दिया जा रहा था माइल्ड लाठी चार्ज का, जिसका मतलब होता है लाठी कमर के नीचे लगनी चाहिए, और इधर कई लड़के बुरी तरह घायल हो गए थे। मुझे याद है, उन्हें बचाने के लिए जयप्रकाश जी भी अपनी जीप से कूद आए और मैं भी लपका। जिस लड़के के सिर में चोट आई थी, वह लड़खड़ा कर गिरने लगा तो मैंने आगे बढ़कर उसे अपनी बांहों में ले लिया। मेरे सारे कपड़े उसके खून से तर हो गए। लोगों ने समझा यह मेरा खून है। कुछ भी हो, खून तो खून ही होता है- मेरा हो चाहे किसी और का...। आपको बताता चलूं कि यह घटना 74 की है। मन से कहूं तो राजनीति मेरे बस की बात नहीं। चुनाव भी लड़ा, जमानत जब्त हुई। आंदोलनों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया लेकिन सच कहूं तो मन टूट गया था। 74 में मुझे देह से अधिक चोट हृदय में लगी, बहुत बड़ी चोट है यह! अब तो मुखिया के चुनाव में भी धनबल का जोर दिखता है, विधायक की तो बात ही छोड़िए। लेकिन क्या यह सब सोचकर जो जहाँ है, वहीं चुप बैठ जाए? नहीं, यह उचित नहीं होगा। नए सवेरे की आशा है। मन है अपने गाम में एक आश्रम खोल दूं लोगों को स्वराज की बात कहूं, पता है लोग मजाक बनाएंगे लेकिन मुझे पता है कि मैं लोकतंत्र का मजाक नहीं उड़ा रहा हूं। क्या मेरे आश्रम में कोई जनप्रतिनिधि आएंगे, मेरी बात सुनने या फिर आएंगे केवल चुनाव के वक्त....मुझे अपनी ‘चुनावी लीला’ याद आने लगी है...

दृश्य-तीन
किसान हर दौर में प्रासंगिक रहे हैं और रहेंगे। आप इस कौम को दबा नहीं सकते। आज किसान आंदोलन की बात हर घर में हो रही है, यदि कोई चुप है तो जान लें, वक्त सबसे हिसाब मांगता है। मुझे आज यह सोचकर हंसी आ रही है कि मैंने कभी यह लिखा था कि एक बीघा खेत में खेती कर लेना पाँच लेख और पाँच कहानियां लिखने से ज्यादा फायदेमंद है। अफसोस होता है, कि यह मैंने कैसे लिख दिया। किसान और हिंदी लेखन दोनों की स्थिति देखकर निराश हो जाता हूँ। मैं फसलों की बुआई या कटाई के समय गाँव आ ही जाता था। अब लगता है कि उस गुजरे वक्त में मैंने गाँव को कम समय दिया। हिंदी लेखन को अधिक दिया। वैसे 1949 में मैंने एक किसान यात्रा का नेतृत्व किया था। मेरे गाँव औराही हिंगना से शुरू हुई इस यात्रा में 550 किसान शामिल हुए थे। 13 दिनों तक पैदल चलकर हम सब पटना पहुँचे थे। मैं पटना पहुंचते ही बीमार हो गया। आज जब दिल्ली से और देश के अलग-अलग हिस्सों से किसान आंदोलन को लेकर खबरें सुनने को मिलती है तो मैं अपने पुराने दिनों को याद करने लगता हूँ।

और चलते-चलते..
खेती-बाड़ी करते हुए इस धरती के धनी कथाकर-कलाकार से मेरी अक्सर भेंट होती है, आप इसे मेरा भरम मान सकते हैं लेकिन जब भी रोज की डायरी लिखने बैठता हूँ तो लगता है फणीश्वर नाथ रेणु खड़े हैं सामने। छोटे-छोटे ब्योरों से लेखन का वातावरण गढ़ने की कला उनके पास थी। रेणु को पढ़ते हुए गांव को समझने की हम कोशिश तो कर ही सकते हैं। रेणु पर सोचते हुए अक्सर एक चीज मुझे चकित करती रही है कि आखिर क्या है रेणु के उपन्यासों - कहानियों में जो आज के डिजिटल युग में भी उतना ही लोकप्रिय है, जितना पहले थे।

परती परिकथा का परानपुर कितने रंग-रूप में रेणु हमारे सामने लाते हैं। गांव की बदलती हुई छवि को वे लिख देते हैं। वहीं मैला आंचल का मेरीगंज देखिए। हर गांव की अपनी कथा होती है, इतिहास होता है। इतिहास के साथ वर्तमान के जीवन की हलचल को रेणु शब्दों  में गढ़ देते हैं। गांव की कथा बांचते हुए रेणु देश और काल की छवियां सामने ला देते हैं।

रेणु अपने साथ गांव लेकर चलते थे। इसका उदाहरण 'केथा' है। वे जहां भी जाते केथा साथ रखते। बिहार के ग्रामीण इलाकों में पुराने कपड़े से बुनकर बिछावन तैयार किया जाता है, जिसे केथा या गेनरा कहते हैं। रेणु जब मुंबई गए तो भी 'केथा ' साथ ले गए थे। दरअसल यही रेणु का ग्राम है, जिसे वे हिंदी के शहरों तक ले गए। उन्हें अपने गांव को कहीं ले जाने में हिचक नहीं होती थी। वे शहरों से आतंकित नहीं होते थे. रेणु एक साथ देहात -शहर जीते रहे, यही कारण है कि मुंबई में रहकर भी औराही हिंगना को देख सकते थे और चित्रित भी कर देते थे। रेणु के बारे में लोगबाग कहते हैं कि वे ग्रामीणता की नफासत को जानते थे और उसे बनाए रखते थे।

गिरीन्द्र नाथ झा 

( रेणु जन्मशती पर दैनिक भास्कर में प्रकाशित) 




Monday, January 25, 2021

पूर्णिया में किताब दान अभियान और गाँव-गाँव में लाइब्रेरी की बात

किताबों के साथ हम सभी का रिश्ता रहा है। हम उस रिश्ते को हर उम्र में नए सिरे से अनुभव करते हैं। तकनीकी दौर में भी यह रिश्ता कमजोर नहीं हुआ है। हम सभी के घरों में किताबों का एक ठिकाना जरूर रहता है, जहाँ पहुँचकर हम सभी पन्नों में लिखे शब्दों की दुनिया में खो जाते हैं। एक वक्त था जब गाँव-गाँव में लाइब्रेरी हुआ करती थी, लोगबाग वहाँ जाते थे लेकिन समय की तेज रफ्तार में ऐसी जगहें कम होने लगी। ऐसे दौर में जब देश के अलग-अलग हिस्सों में विकास का मतलब निर्माण कार्यों को समझा जाने लगा है, ऐसे वक्त में कोई जिला यदि किताबों की बात करता है तो उसके मर्म को समझने की जरूरत है।



भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी राहुल कुमार बिहार के पूर्णिया जिला में कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। साल 2020 के जनवरी महीने में पूर्णिया के जिलाधिकारी राहुल कुमार ने एक अभियान की शुरुआत की थी- अभियान किताब दान। कोराना महामारी की वजह से यह अनोखा अभियान प्रभावित हुआ लेकिन इसके बावजूद लोगों ने 61000 किताबें इस अभियान में दान दी। और साल 2021 में इस अभियान को मूर्त रूप देने की शुरूआत राहुल कुमार ने कर दी है। 25 जनवरी को जिला के परोरा गाँव में राहुल कुमार ने एक पुस्तकालय की शुरूआत की, जिसमें इस अभियान से प्राप्त किताबों को रखा गया है।

मुझे याद है, 25 जनवरी 2020 को इस अभियान की जब शुरूआत हुई थी तो पहले दिन ही 400 किताबें प्राप्त हुई थी। जिला के समाहरणालय सभागार में किताब दान अभियान की शुरूआत हुई थी। राहुल कुमार ने उस दिन भी कहा था कि यह अभियान लोगों का है, इसमें हर कोई सहयोग करेगा और आज एक साल बाद जब परोरा गाँव में वह लोगों के बीच थे, उस वक्त भी उन्होंने यही बात दोहरायी।

दरअसल हम सभी के घरों में ऐसी ढेर सारी किताबें होती है, जिसे हम पढ़ चुके होते हैं और वह रखी रह जाती है। ऐसी किताबों को हम लाइब्रेरी तक पहुँचा सकते हैं ताकि शब्द की यात्रा जारी रहे। पूर्णिया के जिलाधिकारी का यह अभियान हमें बताता है कि गाँव-गाँव में किताबों का एक सुंदर सा ठिकाना बनना चाहिए। उनका कहना भी है कि जिला के हर पंचायत में एक मिनी लाइब्रेरी शुरू होगी। जिले में अब तक अभियान किताब दान के तहत 61 हजार पुस्तकें प्राप्त हुई है। इन पुस्तकों से पंचायतों में मिनी पुस्तकालय खोलने का सुझाव दिया गया है। जहाँ पंचायत सरकार भवन है वहाँ तथा अन्य भवनों में जगह देखी जा रही है। इसके लिए एक समिति भी बनाई जाएगी, जो पुस्तकालय की देख-रेख कर सकेगी।



पूर्णिया जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित परोरा गाँव में आज जब पंचायत भवन परिसर में लाइब्रेरी की शुरूआत हुई तो लगा बदलाव इस तरह भी लाया जा सकता है। जब भी किसी गाँव के ग्राम पंचायत भवन के परिसर में जाता हूँ तो सबसे पहले मन में गाँधी की छवि ही आती है। बापू ने ‘मेरे सपनों का भारत’ में पंचायती राज के बारे में जो विचार व्‍यक्‍त किये हैं वे आज वास्‍तविकता के धरातल पर साकार हो चुके है क्‍योंकि देश में समान तीन-स्‍तरीय पंचायती राज व्‍यवस्‍था लागू हो चुकी है जिसमें हर एक गाव को अपने पांव पर खड़े होने का अवसर मिल रहा है। बापू का मानना था कि जब पंचायती राज स्‍थापित हो जायेगा त‍ब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती। आज परोरा गाँव में लाइब्रेरी के बहाने बापू की लिखी बातें भी याद आने लगी।

कभी कभी सोचता हूँ कि जिला की कमान संभालने वाले अधिकारी को लोगबाग ढेर सारे विकास कार्यक्रमों, भवनों या अन्य सरकारी परियोजनाओं के लिए याद करते हैं लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जिन्हें लोग बदलाव के लिए याद करते हैं। किताब दान अभियान की शुरूआत करने वाले राहुल कुमार ऐसे ही लोगों में एक हैं। पूर्णिया में गाँव -गाँव तक पुस्तकालय पहुँचाने का उनका अभियान दरअसल पूर्णिया के जन-जन का अभियान है। लोगबाग अपनी आदतों में किताब को शामिल करें, इससे बेहतर और क्या हो सकता है। 

आज जब परोरा गाँव से लौट रहा था तो सोचने लगा कि किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं.... लिखने वाले गुलज़ार काश पूर्णिया आते और गाँव के किसी लाइब्रेरी में पढ़ते लोगों को देखते तो फिर यह नहीं कहते बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें..’ 


यदि आप भी किताब दान करना चाहते हैं तो जिला शिक्षा पदाधिकारी पूर्णिया के कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं, नंबर है- 8544411773