Friday, April 17, 2026

बंगाल डायरी: कहानी गुरुदेव के जोड़ासांको विधानसभा सीट की





कोलकाता, मतलब गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर का घर, ठाकुरबाड़ी। लेकिन क्या आपने इस इलाके को सियासी निगाह से देखने की कोशिश की है? यदि आपको लगता है कि पश्चिम बंगाल का जोड़ासांको केवल रवींद्रनाथ टौगोर के पैतृक घर के लिए जाना जाता है तो आप शायद यहां के सियासी कहानियों से अनजान हैं। तो चलिए आज घूम आते हैं जोड़ासांको विधानसभा सीट।
पश्चिम बंगाल की जोड़ासांको विधानसभा सीट राज्य की सबसे चर्चित और राजनीतिक रूप से संवेदनशील सीटों में गिनी जाती है।

जोड़ासांको पूरी तरह से शहरी क्षेत्र है। यह कोलकाता नगर निगम के 11 वार्डों को समेटे हुए है। चितरंजन एवेन्यू , कॉलेज स्ट्रीट और बड़ा बाजार जैसे व्यस्त इलाकों से यह क्षेत्र घिरा हुआ है। इस सीट की बनावट बड़ी पेचीदा है। यहां मारवाड़ी समुदाय, हिंदी भाषी लोग और पुराने बंगाली परिवारों का अनूठा मिश्रण है। रवींद्र सरानी (पुरानी चितपुर रोड) के किनारे बसा यह इलाका व्यापार का केंद्र है। यहां की तंग गलियों में हर रोज करोड़ों का कारोबार होता है।

यह सीट कोलकाता उत्तर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है और यहां शहरी मतदाताओं, व्यापारिक वर्ग, अल्पसंख्यक समुदाय और मध्यमवर्गीय आबादी का खास प्रभाव माना जाता है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों में इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस का दबदबा रहा है, हालांकि भारतीय जनता पार्टी ने लगातार अपना वोट शेयर बढ़ाकर मुकाबले को रोचक बना दिया है। ऐसे में 2026 के विधानसभा चुनाव में यहां कड़ा और दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है।

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में जोड़ासांको सीट से तृणमूल कांग्रेस के विवेक गुप्ता ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने भाजपा की मीना देवी पुरोहित को 12,743 वोटों के अंतर से हराया था।

लगातार तीन बार जीत दर्ज करने वाली तृणमूल कांग्रेस को इस बार यहां कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। टीएमसी ने इस बार जोड़ासांको सीट से मौजूदा विधायक विवेक गुप्ता का टिकट काटकर तृणमूल पार्षद विजय उपाध्याय को उम्मीदवार बनाया है। वहीं भाजपा ने इस बार यहां से पार्षद विजय ओझा को उम्मीदवार बनाया है। यह उनका पहला विधानसभा चुनाव है। 2021 में यहां से भाजपा ने मीना देवी पुरोहित को टिकट दिया था। विजय ओझा का दावा है कि उन्हें प्रचार के दौरान जनता से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है और लोग बदलाव के मूड में हैं। उन्होंने तृणमूल पर सिंडिकेट और जंगलराज का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि पार्षद होने के नाते वह प्रचार के दौरान भी लोगों के जरूरी काम निपटा रहे हैं।

इस बार जोड़ासांको सीट पर मुकाबला मुख्य रूप से टीएमसी  और भाजपा  के बीच सिमटा दिखाई देता है। शहरी मतदाता और मध्यम वर्ग का रुख इन चुनावों के नतीजों पर बड़ा असर डाल सकता है। अल्पसंख्यक वोट बैंक हालांकि परंपरागत रूप से तृणमूल के साथ रहा है, लेकिन भाजपा का बढ़ता संगठन और वोट प्रतिशत मुकाबले को कड़ा बना रहा है। इन चुनावों में महिला मतदाताओं की भूमिका भी अहम होगी। कुल मिलाकर राज्य में ममता बनर्जी की पकड़ मजबूत है, फिर भी शहरी सीटों पर भाजपा लगातार चुनौती दे रही है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जोड़ासांको में 2026 का चुनाव कड़ा, रोचक और निर्णायक होने की पूरी संभावना है।

गौरतलब है कि जोड़ासांको विधानसभा महानगर कोलकाता का एक बहुत ही महत्वपूर्ण केंद्र है। इसका एक कारण यह है कि यहां ठनठनिया कालीबाड़ी विश्व प्रसिद्ध है, वहीं गुरुद्वारा बड़ा सिख संगत, जहां गुरू नानक देव जी से लेकर नौवें गुरु तेगबहादुर के कदम पड़ने के कारण यह इलाका पावन हो गया था। कवि गुरु रवींद्रनाथ टैगोर की जन्मस्थली ठाकुरबाड़ी तो यहां है ही।

इधर, बड़ाबाजार पहले बंगाल का सबसे बड़ा व्यापारिक केंद्र रहा है। किसी को कपड़ा खरीदना हो, राशन-पानी, किताबें, बर्तन, पेन से लेकर कुछ भी थोक और खुदरा ग्राहक के लिए यही एक केंद्र था। बीते कुछ सालों में भले ही राज्य में व्यापारिक केंद्रों का विस्तार हो गया है, लेकिन यहां का महत्व कम नहीं हुआ है। इलाके को मारवाड़ी बहुल के तौर पर भी जाना जाता है।

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की जनसंख्या 2,34,845 है। 2019 लोकसभा चुनाव के अनुसार यहां कुल मतदाता 1,91,912 हैं। 79 प्रतिशत हिंदू और 21 प्रतिशत मुसलमान हैं। 03 फीसदी अनुसूचित जाति के लोग हैं। 59 प्रतिशत पुरुष और 41 प्रतिशत महिलाएं हैं। 81 फीसदी पुरुष और 84 फीसदी महिलाएं शिक्षित हैं।

यह राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश के हिंदी भाषियों का इलाका है। जोड़ासांको सीट से मारवाड़ी विधायकों ने ही लंबे समय तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया है। अपवाद के रूप में 1952 में फॉर्वर्ड ब्लॉक लेफ्ट के अमरेंद्रनाथ बसु ने कांग्रेस के भगवती प्रसाद खेतान को भारी बहुमत से हराया था। इसके बाद पूरे बीस साल कांग्रेस यहां बेताज बादशाह रही। 1957 से 1977 तक कांग्रेस के मारवाड़ी उम्मीदवार भारी मतों से विजयी होते रहे।
 
ममता बनर्जी की पार्टी ने इस प्रतिष्ठित सीट पर 2001 में कब्जा जमाया जो आज तक बरकरार है। 2001 और 2006 में मुख्य मुकाबला दो मारवाड़ियों तृणमूल कांगेस के सत्य नारायण बजाज और ऑल इंडिया फॉर्वर्ड ब्लॉक के श्याम गुप्ता के बीच रहा। दोनों बार सत्यनारायण बजाज विजयी रहे। दरअसल, 1957 से लेकर 2006 तक इस सीट पर मारवाड़ी प्रत्याशी ही विजयी होते रहे। 2011 और 2016 में भी यहां से तृणमूल की ही जीत हुई थी।

1957 में कांग्रेस के आनंदीलाल पोद्दार, 1962 में कांग्रेस के बद्री प्रसाद पोद्दार, 1967 में कांग्रेस के आर के पोद्दार, 1969, 1971 और 1972 में कांग्रेस के देवकीनंदन पोद्दार विजयी रहे। 1977 में आपातकाल के बाद हुए विधानसभा चुनाव में जनता पार्टी के विष्णुकांत शास्त्री चुनाव जीते।

लेकिन अगले चुनाव में 1982 में कांग्रेस के मारवाड़ी उम्मीदवार देवकी नंदन पोद्दार फॉर्वर्ड ब्लॉक के मारवाड़ी उम्मीदवार श्याम सुंदर गुप्ता को हरा कर चुनाव जीत गए। देवकीनंदन पोद्दार ने मारवाडी बहुल जोड़ासांको सीट पर लंबी पारी खेली। वे 1987, 1991, 1996 में लगातार चुनाव जीते। इस सीट के चुनावी इतिहास में देवकीनंदन पोद्दार सबसे लोकप्रिय नेता रहे।

21वीं सदी की शुरुआत में 2001 में तृणमूल ने जब पहली बार अपना उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया तो मारवाड़ी बहुल इलाका देखते हुए मारवाड़ी सत्यनारायण बजाज को और 2006 में दिनेश बजाज को अपना उम्मीदवार बनाया। दोनों बार तृणमूल उम्मीदवार चुनाव जीते। हालांकि फॉर्वर्ड ब्लॉक ने भी मारवाड़ी श्यामसुंदर गुप्त को अपना उम्मीदवार बनाया लेकिन वे चुनाव नहीं जीत पाए।

महानगर कोलकाता के इस इलाके में हिंदी भाषी मतदाता परंपरागत रूप से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में यहां इस बार हर कोई एक ही सवाल पूछ रहा है- क्या टीएमसी अपनी अजेय बढ़त बनाए रख पाएगी या भाजपा जो लोकसभा चुनावों में अपना दम दिखाती है, विधानसभा में भी सेंध लगा पाएगी ?

बहुत कुछ बदल गया गुरुवार को !




बिहार की राजनीति में गुरुवार का दिन उस समय ऐतिहासिक बन गया, जब तीन अलग-अलग दलों के राष्ट्रीय अध्यक्षों ने एक साथ राज्यसभा चुनाव के लिए नामांकन पत्र दाखिल किया।

यह पहली बार है जब प्रदेश की राजनीति में इस तरह का दृश्य देखने को मिला। केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में नामांकन प्रक्रिया पूरी हुई, जिससे इस घटनाक्रम का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया।
गुरुवार का दिन देश की राजनीति में भी बड़े बदलाव की सूचना देने वाला भी रहा। लंबे अरसे से बिहार की सत्ता वाली राजनीति के पर्याय माने जाने वाले नीतीश कुनार ने राज्य से अंतत: दूरी बना ही ली, वे अब राज्यसभा की ओर जा रहे हैं।  

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने गुरुवार को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर दिया। उनके नामांकन के मौक़े पर गृह मंत्री अमित शाह भी पटना पहुंचे थे।

इस घटनाक्रम के बाद एक ही सवाल हर बिहारी पूछ रहा है कि बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? पाटलिपुत्र की धरती पर 20 साल बाद इस सवाल का जवाब ढूंढा जा रहा है। वरना, गठबंधन कोई हो, सीएम पद का उम्मीदवार फिक्स होता था।

इससे पहले अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर लगाई जा रही अटकलों पर नीतीश कुमार ने एक तरह का विराम लगा दिया और उन्होंने ख़ुद के राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने की पुष्टि की।

एक्स पर पोस्ट कर उन्होंने ये जानकारी दी।

इसके साथ ही यह तय हो गया कि बिहार में दो दशकों के बाद राज्य की सत्ता में एक बड़ा बदलाव होने जा रहा है।

नीतीश कुमार को लेकर बिहार के सियासी गलियारों में लगातार यह चर्चा चल रही थी कि वो बिहार की सत्ता से अलग राज्यसभा का रुख़ करने वाले हैं।

नीतीश कुमार साल 2005 से लगातार बिहार में सत्ता का पर्याय बने हुए थे।

उसके बाद से बिहार की सत्ता पर लगातार नीतीश ही बने हुए हैं।

नीतीश पहली बार साल 2000 में बिहार के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन वो अपना बहुमत साबित नहीं कर पाए थे।

इसके बाद साल 2005 में नीतीश कुमार ने बीजेपी के साथ बहुमत की सरकार बनाई थी।

हालांकि साल 2014-15 में कुछ महीनों के लिए उन्होंने अपनी पार्टी से जीतन राम मांझी को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था।

इसके बाद नीतीश कुमार वापस सीएम की कुर्सी पर आ गए थे और कहा जाता था कि बिहार में किसी भी गठबंधन की सरकार बने, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश कुमार ही होते हैं।



वहीं इन सबके बीच देश की संवैधानिक व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल करते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नौ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में नए राज्यपाल और उपराज्यपाल नियुक्त किए हैं। यह बदलाव ऐसे समय किया गया है जब कई राज्यों में राजनीतिक गतिविधियां तेज हैं और आने वाले समय में चुनावी माहौल भी बनने वाला है। केंद्र ने इस फेरबदल में अनुभवी राजनेताओं, पूर्व नौकरशाहों और प्रशासनिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को जिम्मेदारी देकर संवैधानिक संस्थाओं को और मजबूत करने का संदेश दिया है।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सीवी आनंद बोस का इस्तीफा स्वीकार कर लिया है इसके साथ ही केंद्र सरकार ने कई राज्यों में राज्यपाल और उपराज्यपाल के पदों पर नए बदलाव किए हैं राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी अधिसूचना में बताया गया कि अलग-अलग राज्यों में नई नियुक्तियां की गई हैं इन सभी अधिकारियों की जिम्मेदारी तब से शुरू होगी जब वे अपने नए पद का कार्यभार संभालेंगे माना जा रहा है कि इन बदलावों का मकसद राज्यों में प्रशासन को और मजबूत करना है।

नई सूची के अनुसार हिमाचल प्रदेश के मौजूदा राज्यपाल शिव प्रताप शुक्ला को अब तेलंगाना का राज्यपाल बनाया गया है वहीं तेलंगाना के राज्यपाल जिष्णु देव वर्मा को महाराष्ट्र का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है इसके अलावा वरिष्ठ नेता नंद किशोर यादव को नागालैंड का राज्यपाल बनाया गया है केंद्र सरकार ने इन नियुक्तियों के जरिए अलग-अलग राज्यों में नई जिम्मेदारियां तय की हैं, ताकि प्रशासनिक कामकाज बेहतर तरीके से चल सके

सरकार ने लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन को बिहार का नया राज्यपाल नियुक्त किया है वहीं तमिलनाडु के राज्यपाल आर.एन. रवि को अब पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया है इसके साथ ही केरल के राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को अतिरिक्त जिम्मेदारी देते हुए तमिलनाडु का कार्यभार भी सौंपा गया है इन बदलावों के बाद कई राज्यों में नई प्रशासनिक टीम काम करेगी और सरकार को उम्मीद है कि इससे कामकाज में बेहतर तालमेल बनेगा।

कुछ केंद्र शासित प्रदेशों में भी बदलाव किए गए हैं लद्दाख के उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता को अब हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है वहीं दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना को लद्दाख का नया उपराज्यपाल नियुक्त किया गया है इसके अलावा पूर्व राजनयिक तरनजीत सिंह संधू को दिल्ली का नया उपराज्यपाल बनाया गया है माना जा रहा है कि इन बदलावों से केंद्र शासित प्रदेशों में प्रशासनिक काम और बेहतर ढंग से चल सकेगा।

नई नियुक्तियों को सरकार की बड़ी प्रशासनिक पहल माना जा रहा है खासकर पश्चिम बंगाल में आर.एन. रवि की नियुक्ति पर राजनीतिक हलकों की नजर है वह पहले तमिलनाडु में राज्यपाल रहते हुए कई मुद्दों को लेकर चर्चा में रहे थे वहीं बिहार में सैयद अता हसनैन की नियुक्ति को भी अहम माना जा रहा है, क्योंकि उन्हें सेना और प्रशासन का अच्छा अनुभव है दूसरी तरफ दिल्ली में तरनजीत सिंह संधू के उपराज्यपाल बनने के बाद उम्मीद की जा रही है कि केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच बेहतर तालमेल देखने को मिल सकता है।






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Girindra Nath Jha
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कौन कौन सुर्खियां बटौर रहा है बंगाल में !



पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण के मतदान से ठीक पहले राज्य की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। दोनों दलों के कद्दावर नेताओं की रैलियों से बंगाल में चुनावी तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों के बाद अब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बंगाल में मोर्चा संभाल लिया है। अमित शाह शुक्रवार (10 अप्रैल) को खड़गपुर में एक रोड शो करेंगे। शनिवार (11 अप्रैल) को बांकुड़ा के ओंडा में विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे। भाजपा का दावा है कि इन कार्यक्रमों से दक्षिण बंगाल के चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल जायेंगे।

वहीं गुरुवार को देश के तीन राज्यों में वोटिंग के बीच पश्चिम बंगाल में प्रचार के लिए पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ममता बनर्जी पर अप्रत्यक्ष तौर पर हमला बोला। प्रधानमंत्री मोदी ने हल्दिया में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा कि इस बार भबानीपुर में नंदीग्राम होगा। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भबानीपुर सीट से लड़ रही है। भाजपा ने उनके सामने सुवेंदु अधिकारी को उतारा है। 2021 के चुनावों में ममता बनर्जी नंदीग्राम से हार गई थी। नरेंद्र मोदी ने कहा कि बंगाल ने इस बार हर विपरीत परिस्थिति को पराजित करने का फैसला कर लिया है। भाजपा की विजय, इस उत्साह और उमंग में दिखाई पड़ती है। ये परिवर्तन की आंधी है। ये टीएमसी की निर्मम सरकार के जाने का ऐलान है। हल्दिया की जनसभा में पीएम मोदी टीएमसी नेता ममता बनर्जी के 10 प्रण के जवाब ने बंगाल में 6 वादे किए।

दूसरी ओर बंगाल में तृममूल के बागी और अब अपनी पार्टी बना चुके हुमायूं कबीर का एक ऑडियो क्लिप खूब सुर्खियां बटौर रहा है। तृणमूल कांग्रेस ने गुरुवार को अपने पूर्व विधायक हुमायूं कबीर और उनकी नई बनी 'आम आदमी उन्नयन पार्टी' (एएयूपी) पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ 1,000 करोड़ रुपए की डील करने का आरोप लगाया। यह डील पश्चिम बंगाल विधानसभा की उन सीटों पर अल्पसंख्यक वोटों को बांटने के लिए की गई है, जहां आगामी चुनावों में कबीर के उम्मीदवार असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रहे हैं। इस आरोप पर हुमायूं कबीर ने तुरंत पलटवार करते हुए इसका खंडन किया।

एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंत्रियों फिरहाद हकीम, अरूप बिस्वास और तृणमूल के प्रदेश महासचिव कुणाल घोष ने एक ऑडियो क्लिप जारी की, जिसमें कथित तौर पर कबीर को किसी अज्ञात व्यक्ति से इसी तरह की बातें करते हुए सुना गया। गौरतलब है कि इन तीनों ने यह ऑडियो क्लिप उस समय जारी करने का फैसला किया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूर्वी मेदिनीपुर जिले के हल्दिया में एक विशाल चुनावी रैली को संबोधित कर रहे थे। यह उस दिन राज्य में उनकी निर्धारित तीन रैलियों में से पहली थी।

ऑडियो क्लिप में कबीर को कथित तौर पर उस अज्ञात व्यक्ति को यह भरोसा दिलाते हुए सुना गया कि यदि भाजपा इस बार ज्यादातर हिंदू वोट हासिल करने में सफल हो जाती है, तो वह मुस्लिम मतदाताओं को बांटने में अहम भूमिका निभाएंगे, और वह ऐसा राज्य से तृणमूल को सत्ता से बाहर करने के लिए करेंगे। कबीर को उस अज्ञात व्यक्ति को यह भरोसा दिलाते हुए भी सुना गया कि यदि इस बार पश्चिम बंगाल में भाजपा सत्ता में आती है, तो वह और उनकी पार्टी नए भाजपा मुख्यमंत्री को शत-प्रतिशत समर्थन देंगे।

ऑडियो क्लिप में, उन्हें विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के साथ नियमित संपर्क में होने का दावा करते हुए भी सुना गया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में हकीम ने कहा कि कबीर को अल्पसंख्यक मतदाताओं को मूर्ख समझने की गलती नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि वह पैसों के लिए अपनी अंतरात्मा भाजपा को बेच सकते हैं। लेकिन आम अल्पसंख्यक मतदाता ऐसा कभी नहीं करेंगे। वहीं कबीर ने इन आरोपों का खंडन किया और सबूत की मांग की है।
कबीर ने कहा कि 1,000 करोड़ रुपए बहुत बड़ी रकम है। भारतीय जनता पार्टी के साथ मेरा 1 करोड़ रुपए का भी कोई सौदा नहीं हुआ है। वे जो चाहें कह सकते हैं। लेकिन सबसे पहले, उन्हें इस बात का सबूत देना चाहिए कि या तो मैं भाजपा के किसी व्यक्ति से मिला हूं, या कोई भाजपा नेता मुझसे मिला है। उन्होंने यह भी कहा कि तृणमूल द्वारा जारी की गई ऑडियो क्लिप फर्जी है। कबीर ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस राजनीतिक रूप से मेरा मुकाबला नहीं कर सकी, और इसलिए अब उन्होंने ऐसी घटिया हरकतों का सहारा लिया है।

उन्होंने यह भी कहा कि मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद बनाने के अपने मिशन में वे शहीद होने के लिए भी तैयार हैं। यह मस्जिद यूपी के अयोध्या में 6 दिसंबर, 1992 को गिराए गए मूल ढांचे जैसी ही होगी। कबीर ने कहा कि मैं अपने मिशन में शहीद होने के लिए तैयार हूं। लेकिन मैं यह कह रहा हूं कि मस्जिद बनाने का काम पूरी तेजी से चल रहा है, और यह अगले दो सालों में पूरा हो जाएगा।

इन सब सियासी खबरों के बीच आज यानी शुक्रवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खड़गपुर सदर सीट से भाजपा उम्मीदवार दिलीप घोष के समर्थन में चुनाव प्रचार करने जा रहे हैं। यह मेगा रोड शो दोपहर करीब 3:00 बजे मालिंचा के अतुलमनी स्कूल के सामने से शुरू होगा और खरिदा के घड़ी इलाके में जाकर संपन्न होगा। शहर को बैनर-पोस्टर से पाट दिया गया है।
रोड शो के अगले दिन यानी शनिवार को अमित शाह बांकुड़ा जिले के ओंडा विधानसभा क्षेत्र के रामसागर में एक विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे। ओंडा में वह भाजपा विधायक और उम्मीदवार अमरनाथ शाखा, विष्णुपुर और कोतुलपुर के उम्मीदवारों के लिए लोगों से वोट की अपील करेंगे।

अमित शाह के इन कार्यक्रमों ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। भाजपा इसे चुनाव प्रचार की नयी गति मान रही है, तो तृणमूल कांग्रेस सहित विपक्षी दल भी केंद्रीय गृह मंत्री की गतिविधियों पर नजर बनाये हुए है। बांकुड़ा और खड़गपुर दोनों ही क्षेत्रों में भाजपा अपनी पकड़ मजबूत बनाये रखने की कोशिश में है।

दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक चुनावी जनसभा में कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण-एसआईआर के जरिये मतदाता सूची से 90 लाख से अधिक नाम हटाकर बंगाल पर कब्जा करने के भारतीय जनता पार्टी के कथित प्रयासों के बावजूद उनकी पार्टी आगामी चुनावों में जीत हासिल करेगी। मीनाखान में एक जनसभा में मुख्यमंत्री ने दावा किया कि मतदाता सूची से सभी धर्मों और समुदायों के लोगों के नाम हटाए गए हैं।

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Friday, April 10, 2026

बंगाल के पहाड़ी इलाकों की राजनीति और ममता-अमित शाह के आरोप-प्रत्यारोप

इस हफ्ते की बंगाल डायरी 
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पश्चिम बंगाल की राजनीति को देखने के लिए दो अलग-अलग चश्मों की जरूरत पड़ती है, क्योंकि जब आप मैदानों से निकलकर पहाड़ों की तरफ जाएंगे तो लगेगा कि यहां का समीकरण तो कुछ और ही कहानी सुना रहा है। हम बात कर रहे हैं दार्जिलिंग, कलिम्पोंग और कुर्सियांग जैसे इलाकों की। भारतीय जनता पार्टी हो या फिर तृणमूल कांग्रेस, इस इलाके में आने के बाद सबकी जुबान पर पहाडों के भविष्य की ही बात आती है।

जहां एक ओर पश्चिम बंगाल की अधिकांश सीटों पर मुकाबला तृणमूल कांग्रेस, भाजपा, वाम मोर्चा-एआईएसएफ गठबंधन और कांग्रेस के बीच सिमटा हुआ है। वहीं दार्जिलिंग की पहाड़ियों में प्रवेश करते ही चुनावी गणित साफ बदल जाती है। कुर्सियांग, कलिम्पोंग और दार्जिलिंग में चुनावी लड़ाई अब पंचकोणीय हो चुकी है।

इन क्षेत्रों में भाजपा को बिमल गुरुंग के गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM) का साथ मिला है, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने अनित थापा के भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा (BGPM) पर भरोसा जताया है। इसके साथ ही वाम मोर्चा-एआईएसएफ गठबंधन और कांग्रेस भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं।

इस बार दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की राजनीति में एक नई ताकत के रूप में अजय एडवर्ड उभरे हैं। उनकी पार्टी भारतीय गोरखा जनशक्ति मोर्चा (IGJF) की सबसे अधिक चर्चा है। स्थानीय लोगों का मानना है कि आईजीजेएफ का स्वतंत्र रूप से चुनावी मैदान में उतरना भाजपा और तृणमूल कांग्रेस, दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। गौरतलब है कि इन क्षेत्रों में गोरखा मतदाता ही जीत और हार का फैसला करते हैं।

अजय ने अपनी पार्टी इंडियन गोरखा जनशक्ति फ्रंट (आईजीजेएफ) के बैनर तले पहाड़ की तीन सीटों समेत कुल सात सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं।

साथ ही कुल 10 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। वह न केवल दार्जिलिंग पहाड़ बल्कि सिलीगुड़ी मैदानी क्षेत्र और डुवार्स में भी उम्मीदवार उतार रहे हैं। उनकी इन सीटों पर जीत हो या न हो लेकिन अन्य पार्टियों का खेल तो बिगाड़ ही सकते हैं।

अजय एडवर्ड खुद दार्जिलिंग विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे हैं।

कर्सियांग से वंदना राई, कालिम्पोंग से ब्रेनन ब्रिटो लेप्चा, माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी से निमेश सुंदास और सिलीगुड़ी से कृष्णानंद सिंह जैसे उम्मीदवारों की घोषणा हो चुकी है। उनका यह कदम दार्जिलिंग पहाड़ के साथ दोनों क्षेत्रों में गोरखा वोट बैंक को प्रभावित करने वाला माना जा रहा है।

अजय ने पहले हामरो पार्टी बनाई थी, जो दार्जिलिंग नगरपालिका चुनाव में सफल रही। बाद में कुछ नेताओं के दलबदल से नगरपालिका की सत्ता चली गई। इसके बाद उन्होंने आइजीजेएफ का गठन किया।

इसका मुख्य एजेंडा अलग गोरखालैंड राज्य की मांग, क्षेत्रीय पहचान, पारदर्शिता और पहाड़ी विकास है। वह अगर जीत गए तो ठीक, लेकिन वोटकटवा की भूमिका तक रह गए तो भाजपा के साथ तृणमूल का भी खेल बिगाड़ सकते हैं। उनकी पार्टी कुछ प्रतिशत गोरखा वोट ले जाती है तो मुख्य दलों का समीकरण बिगड़ सकता है।

दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र और सिलीगुड़ी समतल में गोरखा समुदाय का वोट बैंक काफी महत्वपूर्ण है। सिलीगुड़ी और आसपास के इलाकों में गोरखा, राजबंशी और अन्य समुदायों का मिश्रण है। आइजीजेएफ ने समतल क्षेत्रों में भी उम्मीदवार उतारकर गोरखा वोट को एकजुट करने की कोशिश की है।

इन इलाकों में घूमते हुए पता चलता है कि अगर आइजीजेएफ गोरखा वोट का एक हिस्सा काट लेती है तो दार्जिलिंग, कर्सियांग और कालिम्पोंग जैसी सीटों पर नतीजे प्रभावित हो सकते हैं।

सिलीगुड़ी समतल में गोरखा वोट का प्रभाव सिलीगुड़ी सीट के अलावा माटीगाड़ा-नक्सलबाड़ी और फांसीदेवा जैसी सीटों पर भी दिखता है। डुवार्स में भी इनका कुछ सीटों पर प्रभाव है।

हालांकि, हर दल सार्वजनिक रूप से यही दावा कर रहा है कि आईजीजेएफ के आने से उनकी राह आसान हुई है। भाजपा का तर्क है कि एडवर्ड्स भाजपा विरोधी गोरखा वोटों में सेंध लगाएंगे, जबकि तृणमूल का मानना है कि वे भाजपा के कोर वोट बैंक को नुकसान पहुंचाएंगे।

वहीं इन सबके बीच गुरुवार को भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से अपना नामांकन पत्र दाखिल किया। उनका नामांकन इसलिए खास बन गया क्योंकि गृह मंत्री अमित शाह खुद इसके लिए बंगाल पहुंचे थे। इस दौरान अमित शाह ने कहा- मैं पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान 15 दिनों तक बंगाल में रहूंगा। मैं आपसे बात करूंगा। मैं आज विशेष रूप से शुभेंदु अधिकारी के लिए नामांकन पत्र दाखिल करने आया हूं। उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी को अलविदा कह दीजिए।

आरोप-प्रत्यारोपों के बीच ममता बनर्जी भी ग्राउंड में आवाज बुलंद कर रहीं हैं। दरअसल सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस इस बार अपने विरोधी दलों से ज्यादा चुनाव आयोग पर हमला बोल रही है। बीरभूम जिले के नानूर में एक विशाल चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बुधवार को अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को अलर्ट किया है। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग के अधिकारियों को ‘विशेष मिशन’ पर भेजा गया है. इसका उद्देश्य तृणमूल कांग्रेस (TMC) के उम्मीदवारों का नामांकन रद्द करना हो सकता है।

ममता बनर्जी ने पार्टी के प्रत्याशियों को आगाह किया है कि सब कुछ बदल दिया गया है। बंगाल में अब एक नयी व्यवस्था है। निर्वाचन आयोग ने जिन नये अधिकारियों की नियुक्ति की है, उन्हें कथित तौर पर आपके नामांकन पत्र खारिज करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। इसलिए, नामांकन दाखिल करते समय हर एक बारीकी का ध्यान रखें और पूरी सावधानी बरतें।

ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला तेज करते हुए कहा कि भाजपा राजनीतिक लाभ के लिए केंद्रीय एजेंसियों का खुलेआम दुरुपयोग कर रही है। उन्होंने बीरभूम की धरती से केंद्र सरकार को चुनौती देते हुए कहा कि एजेंसियां चुनाव नहीं जीत सकतीं, जीत जनता के आशीर्वाद से ही मिलती है।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में पिछले पांच दशकों में ज़्यादातर वही पार्टियां सत्ता में रही हैं, जिनके मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी केंद्र की सत्ता में रहते हैं। नतीजतन, केंद्र और राज्य सरकार के बीच टकराव पश्चिम बंगाल की राजनीति की सच्चाई बन चुकी है। अब इस बार देखना है कि केंद्र की सत्ता बंगाल में अपना परचम लहरा पाती है या फिर इस बार भी चुकने वाली है।

Friday, March 27, 2026

बीजेपी और टीएमसी, दोनों की निगाहें नॉर्थ बंगाल पर!


पश्चिम बंगाल में इस बार का विधानसभा चुनाव सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी, दोनों के लिए ‘करो या मरो’ जैसी है। इस चुनाव में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला है। जहां भारतीय जनता पार्टी बंगाल की सत्ता में आने के लिए बेताब है तो वहीं टीएमसी अपना सियासी दुर्ग को बचाए रखने की कवायद में है।
टीएमसी सुप्रीमो और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी उत्तर और दक्षिण बंगाल के लिए अलग-अलग रणनीति बनाकर चुनावी जंग में प्रवेश कर चुकीं हैं। ममता बनर्जी ने जहां उत्तर बंगाल का मोर्चा संभाला है तो वहीं अपने भतीजे और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी को साउथ बंगाल में सक्रिय कर दिया है।

वहीं दूसरी ओर भाजपा के चुनाव प्रचार को तेज करने के लिए केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह लगातार पश्चिम बंगाल पर निगाह बनाए हुए हैं। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव को लेकर किए जा रहे भाजपा के चुनावी कैंपेन के बीच केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह आगामी 28 मार्च को राज्य का दौरा करेंगे। अपने इस दौरे में अमित शाह एक अहम प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे और उसमें ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के खिलाफ औपचारिक तौर पर चार्जशीट जारी करेंगे, जिसमें सत्तारूढ़ दल के खिलाफ भाजपा के आरोपों का ब्यौरा होगा।

बताया जा रहा है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ दिनों बाद, भाजपा अपना घोषणापत्र जारी करेगी, जिसे ‘संकल्प पत्र’ नाम दिया जाएगा।

बंगाल का यह चुनाव इस बार कई मायनों में दिलचस्प है। इस बार ममता बनर्जी खुद मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा के प्रमुख ठिकानों पर सेंध लगाने में जुटी हुई है। इसी कड़ी में उनकी निगाह उत्तर बंगाल के विधानसभा सीटों पर है। उन्होंने 24 मार्च से उत्तर बंगाल में चुनावी कैंपेन की शुरुआत की थी। दरअसल टीएमसी समझती है कि उत्तर बंगाल में भाजपा मजबूत है। ऐसे में ममता खुद उत्तर बंगाल में भाजपा की चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।

वहीं उनके भतीजे और पार्टी के महासचिव अभिषेक बनर्जी साउथ बंगाल के जिलों पर फोकस कर रहे हैं, जो ममता बनर्जी की पार्टी का गढ़ माना जाता है।

दरअसल बंगाल में टीएमसी के दो ही प्रमुख चेहरे हैं, ममता बनर्जी और दूसरे अभिषेक बनर्जी। इस तरह टीएमसी ने अपने दोनों ही नेताओं को अलग-अलग इलाके में लगाकर भाजपा के खिलाफ चक्रव्यूह रचा है।

पश्चिम बंगाल में यदि भाजपा का कहीं गढ़ है तो वह उत्तर बंगाल ही है। ममता ने भाजपा के इसी सियासी दुर्ग पर चढ़ाई कर दी है। बीते मंगलवार को ममता दीदी ने दार्जिलिंग जिले के माटीगारा और जलपाईगुड़ी के मैनागुड़ी में जनसभा की थी।

ममता बनर्जी का यह कदम बंगाल के उत्तरी क्षेत्र में राजनीतिक पकड़ बनाने का दांव माना जा रहा, जहां पर भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनावों से गहरी पैठ बनाई थी। 2021 विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने इन इलाकों में अपनी पकड़ बनाए रखा था। हालांकि 2024 में टीएमसी ने बेहतर प्रदर्शन के बाद भी नार्थ बंगाल में अपनी जड़े नहीं जमा सकी। यही वजह है कि ममता बनर्जी ने 2026 के विधानसभा चुनाव में नार्थ बंगाल का मोर्चा खुद संभाल रखा है।

दरअसल साउथ और नॉर्थ बंगाल में काफी फर्क है। ये फर्क हमें कई मोर्चों पर साफ-साफ दिखता है। यही कारण है कि यहां अलग राज्य की मांग लंबे समय से होती रही है। बंगाल की राजधानी कोलकाता से नॉर्थ बंगाल की दूरी एक बड़ा कारण रहा है जिसके कारण यहां छोटी-छोटी राजनीतिक पार्टियों, समुदायों की मांगों ने अलग राज्य का जोर पकड़ा, दार्जिलिंग में अलग गोरखालैंड की मांग बढ़ती चली गई। 

चाय बागानों और आदिवासी इलाकों के जरिए भाजपा ने यहां अपनी पकड़ बनाई। इसी तरह कूचबिहार और दिनाजपुर जिलों के लिए भाजपा ने स्थानीय मुद्दों के साथ राजवंशी समुदाय को पकड़ा और सीटें भी हासिल कीं। हालांकि, इस बार उत्तर बंगाल में भाजपा के लिए मुश्किलें भी कम नहीं है। पार्टी के कुछ नेता पहले ही टीएमसी में शामिल हो चुके हैं। सिलीगुड़ी और आसपास विधानसभा क्षेत्र में टीएमसी लगातार मजबूत होते चली गई है। इसका सबसे बड़ा असर निकाय चुनावों में देखने को मिला है। पहली बार सिलीगुड़ी नगर निगम पर टीएमसी का पूरी तरह से कब्जा है, यहां तक कि सिलीगुड़ी महकमा परिषद जो कभी भी टीएमसी के पास नहीं रहा, उस पर भी ममता की पार्टी को जीत मिली है।

जहां तक भारतीय जनता पार्टी की बात है तो देश भर के नेता इन दिनों आपको बंगाल में दिख जाएंगे। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन भी के लिए भी यह चुनाव बेहद अहम है। आने वाले दिनों में वह सिलीगुड़ी और दुर्गापुर में लगातार बैठकें करने वाले हैं। इस बैठक में सुनील बंसल और केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव भी मौजूद रहेंगे। इस बैठक में आसपास के जिलों के नेताओं, प्रत्याशियों और अन्य महत्वपूर्ण लोगों को बुलाया गया है। भाजपा की रणनीति यह है कि गली-गली में घूमकर कैंपेन किया जाए। बड़े नेताओं को भी जमीनी प्रचार में उतारा जाए। बूथ लेवल मैनेजमेंट और केंद्रीय योजनाओं के प्रचार पर फिलहाल ज्यादा फोकस किया जा रहा है।

बंगाल चुनाव में जीत के लिए भाजपा कोई कोर कसर नहीं छोड़ रही है। बूथ लेवल पर माइक्रो मैनेजमेंट के लिए पार्टी ने कई राज्यों से कार्यकर्ताओं की फ़ौज पश्चिम बंगाल में तैनात की है।

इन सबके बीच टीएमसी में अब अभिषेक बनर्जी की भूमिका स्पष्ट हो रही है। संगठनात्मक फैसलों और राष्ट्रीय मुद्दों पर अभिषेक की बेबाक राय से पता चलता है कि ममता उन्हें भविष्य के नेतृत्व के रूप में स्थापित कर रही हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर टीएमसी को कड़ी चुनौती दी थी। लेकिन, 2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 294 में से 213 सीटें जीतकर जोरदार वापसी की। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी टीएमसी की बढ़त बरकरार रही। यही वजह है कि इस बार ममता बनर्जी ने अलग-अलग विधानसभा सीटों पर अभिषेक बनर्जी की सलाह मानी है।

पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को दो चरणों में चुनाव होंगे, जो पिछले विधानसभा चुनावों में हुए आठ चरणों के लंबे चुनाव की तुलना में एक महत्वपूर्ण कमी है। राज्य की सभी विधानसभा सीटों के नतीजे 4 मई को सामने आएंगे।


Girindra Nath Jha
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Friday, March 20, 2026

स्विंग सीटों’ का खेल- क्या यहीं तय होगी बंगाल की सत्ता?


बंगाल डायरी के कुछ फील्ड नोट्स
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पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस, एक बार फिर ममता बनर्जी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। ममता बनर्जी साल 2011 से राज्य की मुख्यमंत्री हैं।
अगर ममता बनर्जी अपनी पार्टी को फिर से जीत दिलाती हैं, तो वह पश्चिम बंगाल की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन सकती हैं, जिसने लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास बनाया हो। ऐसी जीत उन्हें देश के राजनीतिक इतिहास में सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली महिला नेताओं में से एक बना देगी।
 
उधर, दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी है, जो इस बार करो या मरो की तर्ज पर चुनावी मैदान में है। बंगाल में कमल खिलाने के लिए भाजपा राजानीति के हर उस दांव को खेलने में जुटी है, जिसे राजानीति में जायज माना जाता है।

2026 का यह चुनाव कई मायनों में ममता बनर्जी के लिए अब तक की सबसे कठिन राजनीतिक परीक्षा भी साबित हो सकता है।
 
ममता बनर्जी एक नहीं लगातार तीन बार राज्य की मुख्यमंत्री चुनी गईं और अब जब पश्चिम बंगाल एक बार फिर विधानसभा चुनाव की दहलीज़ पर खड़ा है, ममता बनर्जी चौथी बार तृणमूल कांग्रेस का चेहरा बनकर चुनावी मैदान में उतर चुकी हैं। 

ऐसे में ममता अगर अपनी पार्टी को फिर से जीत दिलाती हैं, तो वह पश्चिम बंगाल की पहली ऐसी मुख्यमंत्री बन सकती हैं, जिन्होंने लगातार चार बार विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास बनाया हो लेकिन क्या इतिहास रचना उनके लिए इतना आसान होगा?

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में तृणमूल कांग्रेस अपनी मजबूत जमीन बचाने की कोशिश में है तो वहीं भारतीय जनता पार्टी उन कमजोर कड़ियों को तलाश रही है, जहां सेंध लगाई जा सके।

आगामी चुनाव में असली मुकाबला उन सीटों पर है जो न ममता का स्थायी गढ़ है और न ही भारतीय जनता पार्टी का।

इन स्थायी गढ़ की कहानी को समझने के लिए आपको कोलकाता प्रेसीडेंसी क्षेत्र और उत्तर बंगाल के सीटों को समझना होगा। मसलन कोलकाता प्रेसीडेंसी इलाकों में तृणमूल की पकड़ मजबूत है, लेकिन उत्तर बंगाल के जलपाईगुड़ी और मालदा में उसकी स्थिति नाजुक है।

ग्राउंड को देखने के बाद आप यह कह सकते हैं कि दक्षिण बंगाल के मुकाबले उत्तर बंगाल, विशेषकर जलपाईगुड़ी और मालदा में तृणमूल की स्थिति काफी नाजुक नजर आती है। उदाहरण के लिए जलपाईगुड़ी में तृणमूल के पास केवल एक 'बेहद मजबूत' सीट है, जबकि अधिकांश सीटों पर वह 'कमजोर' या 'बेहद कमजोर' स्थिति में है।

इसी तरह मालदा जिले की स्थिति तो और भी खराब है, जहां तृणमूल 49 सीटों में से 28 सीटों पर 'कमजोर' श्रेणी में है जो भाजपा के लिए एक बड़ा मौका हो सकता है।

साल 2021 के चुनावों में जलपाईगुड़ी की 79% और मालदा की 82% सीटों पर मतदाताओं ने अपना मत बदल दिया था जो इन क्षेत्रों की अस्थिरता को दिखाता है।

उधर, पूरे पश्चिम बंगाल में 2021 के पिछले चुनाव के दौरान 130 सीटों पर सत्ता परिवर्तन हुआ था, यानी वहां मतदाताओं ने पुरानी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी पर भरोसा जताया था। इस बार मेदिनीपुर क्षेत्र असली रणक्षेत्र बनकर उभरा है, जहां 2021 में स्थिर रहने वाली सीटों और दल-बदल होने वाली सीटों के बीच मुकाबला लगभग बराबर है।

कुल मिलाकर आंकड़ों से स्पष्ट है कि जहां तृणमूल का प्रभाव कुछ खास क्षेत्रों में केंद्रित है। वहीं, बीजेपी को उन 'स्विंग' क्षेत्रों पर ध्यान देना होगा, जहां मतदाता किसी एक दल के साथ बंधे नहीं हैं।

वहीं पश्चिम बंगाल में भवानीपुर विधानसभा सीट सबसे अधिक सुर्खियों में रहने वाला है। भवानीपुर में चुनावी हलचल तेज है और यहां की लड़ाई सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि कोलकाता की बदलती पहचान पर है। जहां तक नाम का सवाल है, भवानीपुर का अलग आध्यात्मिक इतिहास है।

भवानीपुर को देवी भवानी का क्षेत्र माना जाता है और इसकी पहचान पवित्र कालीघाट मंदिर के ऐतिहासिक प्रवेश द्वार के रूप में भी रही है। हालांकि, यह इलाका एक शांत बाहरी बस्ती से अब पॉश इलाके के रूप में तब्दील हो चुका है। 

भवानीपुर की सामाजिक संरचना बहुत जटिल मानी जाती है। इस इलाके में पारंपरिक बंगाली परिवारों के मोहल्ले हैं, जहां राजनीतिक बहस आम बात है। गुजराती और मारवाड़ी समुदाय इस इलाके की अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार माने जाते हैं। 

भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में सिख और मुस्लिम समुदाय के साथ ही बिहार के लोगों की आबादी भी अच्छी तादाद में है। भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र में करीब 70 फीसदी गैर बंगाली आबादी है। साल 1984 में अपने सियासी सफर की शुरुआत के बाद से ही ममता बनर्जी भवानीपुर को अपने मजबूत गढ़ के रूप में देखती रही हैं।


तृणमूल कांग्रेस की बूथ स्तर की मशीनरी काफी मजबूत और सक्रिय दिखती है, जबकि भाजपा की उम्मीद शहरी मध्य वर्ग की नाराजगी पर टिकी है। पार्टी को इस नाराजगी के सहारे चुनावी समीकरण बदलने की उम्मीद है।
 
वहीं पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में हर किसी की नजर चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर पर भी टिकी हुई है। साल 2021 में ममता बनर्जी की जीत के 'चाणक्य' रहे पीके क्या इस बार भी टीएमसी के लिए फील्डिंग करेंगे? या फिर अपनी नई पार्टी जन सुराज के साथ बिहार तक ही सीमित रहेंगे?  यह सवाल बंगाल में खूब पूछा जा रहा है।

कभी पीके की कंपनी रही आईपैक, जो बंगाल में 2021 के चुनाव के बाद 2026 के चुनाव में भी टीएमसी के लिए रणनीति बना रही है, लेकिन उस टीम में अब पीके नहीं हैं। ऐसे में यह देखना होगा कि बिन पीके के ममता की पार्टी किस तरह की ग्राउंड रणनीति बनाने जा रही है।

दूसरी ओर यदि बंगाल के मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों की कहानी की बात है तो 2026 के चुनाव के लिए ममता ने अपनी फील्डिंग सजा ली है। उन्हें पता है कि 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटें चाहिए। इनमें से करीब 75 सीटें ऐसी हैं जहां मुस्लिम आबादी इतनी ज्यादा है कि वहां बीजेपी का जीतना नामुमकिन जैसा है।

 ऐसे में ममता का गणित सीधा है- 75 सीटें मुस्लिम वोटरों के दम पर 'पक्की' करो, और बाकी की 75 सीटें महिला वोटरों और 'लक्ष्मी भंडार' जैसी योजनाओं के जरिए हासिल कर लो। ममता के सामने कहीं हुमायूं कबीर और ओवैसी जैसे छुटपुट चैलेंज आ सकते हैं, लेकिन, उनका फिलहाल खास असर नहीं दिखता।

Friday, March 13, 2026

बंगाल डायरी : मुस्लिम बहुल सीट का गणित!


पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 की तारीखों की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोलकाता आ रहे हैं। यहां के ऐतिहासिक ब्रिगेड परेड ग्राउंड में वह एक रैली को संबोधित करेंगे। लेकिन इन सबके बीच बंगाल में मुस्लिम मतदाताओं के मन में क्या चल रहा है, हुमायूं कबीर की पार्टी किस ओर करवट लेगी, इन सब मुद्दों पर पर भी ध्यान देने की जरुरत है।
दरअसल तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित होने के बाद हुमायूं कबीर ने 'जनता उन्नयन पार्टी ' बनाई थी। इस नए राजनीतिक दल की एंट्री के बाद से ही बंगाल के मुस्लिम वोटों के लिए 2026 की चुनावी जंग आधिकारिक शुरुआत हो गई थी।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के 294 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत के लिए 148 सीटों की जरूरत होती है। यहां 112 सीट ऐसी है, जहां मुस्लिम मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं। वर्तमान विधानसभा में इन 112 सीटों में से 106 पहले से ही तृणमूल कांग्रेस के पाले हैं। अंक गणित के लिहाज से समझें तो उसे शेष 182 हिंदू-बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में से केवल 42 और सीटें जीतने की जरूरत है।

2021 में तृणमूल कांग्रेस ने उन 182 सीटों में से 109 जीती थीं, सफलता दर 60 फीसदी थी। इस जीत के साथ तृणमूल को 215 सीटों का आरामदायक बहुमत दिलाया। वहीं मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी ने 72 हिंदू-बहुल सीटें जीतीं, लेकिन मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में उसकी एक भी न चली।

इन सब आंकड़ों पर नजर घूमाने के बाद जब हम बंगाल में हुमायूं कबीर के उदय को देखते हैं तो बिहार विधानसभा चुनाव में असदुद्दीन औवेसी की पार्टी के सियासी प्रयोग के बारे में सोचने लगते हैं। 2025 के बिहार चुनावों में ओवैसी की पार्टी ने सीमांचल के मुस्लिम बहुल इलाकों में 5 सीटें जीतीं। औवेसी ने मुस्लिम वोटों में बिखराव लाने का काम किया और यही वजह रही कि इन इलाकों में महागठबंधन को कई सीटों का नुकसान हुआ। 2020 में भी औवेसी की पार्टी ने इन इलाकों में ऐसा ही कुछ किया था।

भाजपा के रणनीतिकार इस फार्मूले पर भी जोड़-घटाव कर रहे हैं लेकिन बिहार के सीमांत जिले और पश्चिम बंगाल की कहानी कई मायनों में अलग है। बिहार में, मुस्लिम मतदाता सीमावर्ती जिलों की एक संकीर्ण पट्टी में केंद्रित हैं। सीमांचल के 4 जिलों में ही 27 फीसदी मुस्लिम आबादी रहती है। जबकि बंगाल में मुस्लिम आबादी काफी अधिक होने के बावजूद वह कहीं अधिक बिखरी हुई है। कोलकाता के शहरी इलाकों, उत्तर के ग्रामीण बेल्ट और दक्षिण के तटीय क्षेत्रों में मुस्लिम आबादी फैली है। शीर्ष 5 मुस्लिम बहुल जिलों में लगभग 90 सीटें आती हैं, लेकिन मुस्लिम राज्य भर के दर्जनों अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में भी अल्पसंख्यक हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार बंगाल की जनसंख्या में मुस्लिम लगभग 27 फीसदी हैं। हालांकि भाजपा दावा करती है कि पिछले दशक में बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ के कारण बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 30 फीसदी या उससे अधिक हो गई है।

बंगाल के 3 जिले- मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर में मुस्लिम आबादी 50 फीसदी या उससे अधिक है। दो अन्य जिले- दक्षिण 24 परगना और बीरभूम में यह 35 फीसदी से ऊपर है। इन क्षेत्रों में 89 ऐसी विधानसभा सीटें हैं, जहां मुस्लिम आबादी 30 फीसदी से अधिक है। साथ ही 112 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोटरों की संख्या 25 फीसदी से अधिक है।

2021 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 35 फीसदी से अधिक मुस्लिम वोटर वाले 89 में से 87 सीटें जीती थीं, यह लगभग एकतरफा जीत था। 112 मुस्लिम-प्रभावित सीटों में से तृणमूल ने 106 पर कब्जा किया, जबकि भाजपा के पास केवल 5 सीटें रहीं। 30 फीसदी से अधिक मुस्लिम आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी की सफलता दर लगभग शून्य थी।

'एक्सिस माई इंडिया' के 2021 के एग्जिट पोल डेटा के अनुसार, लगभग 75 फीसदी मुस्लिम मतदाताओं ने तृणमूल का समर्थन किया था। 2024 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा बढ़कर 83 फीसदी हो गई।

वहीं इन सब आंकड़ों के कहानी के बीच पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ने एलपीजी संकट के बीच सड़क पर उतरने का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने बताया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी 16 मार्च को कॉलेज स्क्वायर से डोरिना क्रॉसिंग तक जुलूस निकालेंगी।

मुख्यमंत्री ने मौजूदा गैस संकट और बढ़ती कीमतों के लिए केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। उनका आरोप है कि पश्चिम एशिया संकट कई दिनों से बना हुआ है। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने समय रहते कोई तैयारी या वैकल्पिक व्यवस्था नहीं की। उनके अनुसार, गैस जैसी जरूरी वस्तु की आपूर्ति को लेकर केंद्र की लापरवाही के कारण आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

मतदाताओं के मिजाज, राजनीतिक दलों की रणनीति, रसोई गैस की किल्लतों की मौजूदा स्थितियों के बीच खबर आ रही है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 दो चरणों में कराये जा सकते हैं।

निर्वाचन आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बृहस्पतिवार को यह जानकारी दी। अधिकारी ने कहा कि निर्वाचन आयोग के नयी दिल्ली कार्यालय में एक और बैठक होगी, जिसके बाद बंगाल चुनाव 2026 पर अंतिम निर्णय लिया जायेगा। अधिकारी ने कहा कि पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीट के लिए चुनाव अगले महीने यानी अप्रैल में होने की संभावना है। उन्होंने कहा कि सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर राज्य की अधिकतर राजनीतिक पार्टियों ने कोलकाता में मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ बैठक के दौरान एक या दो चरणों में चुनाव कराने की मांग की थी। सुरक्षा बल सहित अन्य अधिकारियों से भी ऐसे ही सुझाव मिले थे।