Friday, February 13, 2026

बंगाल डायरी: फिर से सुर्खियों में हुमायूं कबीर

पश्चिम बंगाल में पिछले कुछ महीनों से एक नाम की सबसे ज्‍यादा चर्चा है, और यह नाम है- हुमांयू कबीर। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा में बाबरी मस्जिद शिलान्‍यास समारोह के बाद हुमांयू कबीर की बात देश भर में होने लगी। प्रदेश के भरतपुर से विधायक हुमायूं कबीर को हाल में तृणमूल कांग्रेस पार्टी की अनुशासन समिति ने पार्टी से सस्‍पेंड कर दिया था और उसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी- जन उन्नयन पार्टी की नींव रखी।
गुरुवार को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में जन उन्नयन पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर ने बाबरी यात्रा मार्च की शुरुआत कर फिर से सुर्खियां बटौरनी शुरु कर दी है। हुमांयू कबीर की यह यात्रा नदिया जिले के प्लासी से शुरू होकर मुर्शिदाबाद के रेजुनगर तक गई। मार्च के दौरान बड़ी संख्या में पार्टी कार्यकर्ता और समर्थक शामिल हुए, जिन्होंने सामाजिक न्याय और सांप्रदायिक सौहार्द से जुड़े मुद्दों को उठाने का दावा किया। हुमायूं कबीर ने कहा कि इस यात्रा का उद्देश्य लोगों को एकजुट करना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रति जागरूकता फैलाना है।

प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए मार्ग में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए। स्थानीय स्तर पर इस मार्च को लेकर राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है।

मुर्शिदाबाद में बाबरी यात्रा को लेकर पूरे प्रदेश में राजनीतिक गरमाहट तेज हो गई है। हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद की नींव रखने के बाद सैकड़ों समर्थकों के साथ 22 किलोमीटर लंबी पदयात्रा निकाली। यह यात्रा नादिया-मुर्शिदाबाद सीमा के पलाशी से बेलडांगा तक जा रही है। यात्रा के दौरान हुमायूं कबीर ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वह किसी से डरने वाले नहीं हैं और बाबरी मस्जिद का निर्माण होकर रहेगा। कबीर ने पुलिस प्रशासन पर पक्षपात का आरोप भी लगाया।

उन्होंने दावा किया कि आगामी विधानसभा चुनाव में मुसलमान 100 सीटें जीतकर पश्चिम बंगाल की राजनीति में निर्णायक शक्ति बनेंगे।

तृणमूल कांग्रेस से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर द्वारा प्रस्तावित 'बाबरी यात्रा' के रूट में अंतिम समय पर कटौती की गई है। गुरुवार सुबह शुरू होने वाली यह रैली पहले नदिया जिले के पलाशी से उत्तर दिनाजपुर के इटाहार तक 265 किलोमीटर की दूरी तय करने वाली थी, लेकिन अब यह केवल 22 किलोमीटर तक सीमित होकर मुर्शिदाबाद के रेजीनगर में समाप्त हो जाएगी।

रैली के स्वरूप में भी बड़ा बदलाव आया है। पूर्व योजना के अनुसार, इसमें 100 वाहनों का काफिला और लगभग 600 लोग शामिल होने थे, परंतु अब इसे एक साधारण पदयात्रा का रूप दे दिया गया है।

कबीर ने दावा किया कि तीनों जिलों से आवश्यक पुलिस अनुमति न मिल पाने के कारण रूट छोटा करना पड़ा, जबकि पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इतनी लंबी रैली के लिए औपचारिक अनुमति मांगी ही नहीं गई थी।

भरतपुर से विधायक कबीर ने कहा कि यह यात्रा बेलडांगा में प्रस्तावित 'बाबरी मस्जिद' के निर्माण को लेकर फैलाई जा रही भ्रांतियों को दूर करने के लिए है। उन्होंने बुधवार को मस्जिद की नींव रखते हुए बताया था कि लगभग 55 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह ढांचा तीन साल में तैयार होगा, जिसका गेट ही पांच करोड़ रुपये का होगा।

बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष व भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी ने बेलडांगा में 'बाबरी मस्जिद' के नाम से हो रहे निर्माण पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। अधिकारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें मंदिर या मस्जिद के निर्माण से कोई समस्या नहीं है, लेकिन वे बंगाल की धरती पर मुगल शासक बाबर के नाम का महिमामंडन बर्दाश्त नहीं करेंगे।

अधिकारी ने कहा कि हिंदू मंदिर बनाएं और मुस्लिम मस्जिद, इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन मैं बाबर का नाम नहीं लिखने दूंगा। आने वाले दिनों में भाजपा बंगाल से बाबर का नाम मिटाने के लिए काम करेगी।

दूसरी ओर, मस्जिद का निर्माण शुरू करने वाले हुमायूं कबीर ने भाजपा पर पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि दो साल के भीतर मस्जिद का ढांचा खड़ा कर दिया जाएगा और इसके साथ एक अस्पताल व विश्वविद्यालय भी बनाया जाएगा।

कबीर ने आरोप लगाया कि जब मुस्लिम मस्जिद बनाना चाहते हैं, तो विरोध किया जाता है। इस बीच, तृणमूल के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी कबीर पर निशाना साधते हुए कहा कि मंदिर-मस्जिद की राजनीति करने वाले कबीर और भाजपा में कोई अंतर नहीं है।

गौरतलब है कि हुमायूं कबीर मुर्शिदाबाद जिले की भरतपुर विधानसभा सीट से विधायक हैं। रेजिनगर के एक सामान्य परिवार से आने वाले हुमायूं कबीर का राजनीतिक सफर उठापटक भरा रहा है। उन्हें मुर्शिदाबाद की राजनीति का शानदार खिलाड़ी माना जाता है। उन्होंने मुर्शिदाबाद में कांग्रेस के दिग्गज नेता अधीर रंजन चौधरी के करीबी सहयोगी के रूप में राजनीति में कदम रखा। वह 2009 से कांग्रेस की मुर्शिदाबाद इकाई के महासचिव थे।

साल 2011 के विधानसभा चुनाव में हुमायूं कबीर कांग्रेस के टिकट पर रेजिनगर से पहली बार विधायक चुने गए। साल 2012 में अधीर रंजन चौधरी से मतभेदों की वजह से वह तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, उसी साल उपचुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। साल 2015 में उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण तृणमूल कांग्रेस से छह साल के लिए निलंबित कर दिया गया था। इसके बाद वह 2018 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए और 2019 का लोकसभा चुनाव मुर्शिदाबाद सीट से लड़ा, लेकिन हार गए।

साल 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले वह फिर से तृणमूल कांग्रेस में लौटे और भरतपुर से विधायक चुने गए। लेकिन फिर 2025 में वे ममता बनर्जी से दूरी बनाकर अपनी अलग पार्टी बना ली है।

हुमायूं कबीर अपने तीखे और कई बार सांप्रदायिक बयानों की वजह से पहले भी विवादों में रहे हैं। अप्रैल 2025 में वक्फ बिल को लेकर मुर्शिदाबाद में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद भी उनके बयानों पर काफी बवाल मचा था।

अब देखना है कि आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हुमांयू कबीर तृणमूल कांग्रेस या फिर भाजपा को कितना नुकसान पहुंचा पाते हैं। या फिर वे केवल बंगाल के सियासी मैदान के फुटबॉल बने रह जाएंगे!

Friday, January 30, 2026

विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल की डायरी

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं। कहीं पार्टी के भीतर पार्टी चल रही है तो कहीं गठबंधन के लिए नई नई तरकीब खोजी जा रही है। राज्य में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए अपनी आक्रमक छवि बनाए हुए है तो वहीं भारतीय जनता पार्टी की इच्छा है कि इस बार ममता दीदी के किले में कमल खिलाया जाए।  
इन सबके बीच खबर आ रही है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पश्चिम बंगाल यूनिट के सचिव मोहम्मद सलीम ने जनता उन्नयन पार्टी के चीफ हुमायूं कबीर से मुलाकात की है। इस बैठक से दोनों पार्टियों के बीच चुनाव से पहले गठबंधन की संभावना पर अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं। सलीम ने कहा कि चुनाव में सीट बंटवारे के प्रस्ताव पर सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट में चर्चा की जाएगी। उन्होंने हुमायूं कबीर से न्यू टाउन के एक होटल में करीब एक घंटे तक बैठक की थी।

गौरतलब है कि कबीर पहले तृणमूल कांग्रेस के विधायक थे, लेकिन हाल ही में उन्होंने मुर्शिदाबाद जिले में एक नई बाबरी मस्जिद की नींव रखकर सूबे की सियासत में हलचल मचा दी।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की पश्चिम बंगाल यूनिट के सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा, 'हम इस प्रस्ताव पर लेफ्ट फ्रंट में चर्चा करेंगे। उसके बाद फ्रंट से बाहर की लेफ्ट पार्टियों से बात होगी, फिर आईएसएफ से।'

सीपीएम के नेतृत्व वाले लेफ्ट फ्रंट ने 2021 के विधानसभा चुनाव में इंडियन सेक्युलर फ्रंट यानी कि आईएसएफ के साथ गठबंधन किया था, लेकिन कोई सीट नहीं जीत सके। सलीम ने कहा कि कबीर से मुलाकात उनके इरादों को समझने के लिए थी। उन्होंने बताया कि कई पार्टियां अभी चुनाव में सीट बंटवारे पर फैसला नहीं ले पाई हैं। सलीम ने गठबंधन पर चर्चा होने से इनकार किया और कहा, 'मैं उनसे जानना चाहता था कि वे क्या करना चाहते हैं और उनका मकसद क्या है।'

वहीं, कबीर ने इस मुलाकात को शिष्टाचार बैठक बताया, लेकिन चुनाव के लिए गठबंधन पर चर्चा होने की बात स्वीकार की। उन्होंने कहा, 'मैंने सलीम साहब से अपील की है कि गठबंधन बनाने की प्रक्रिया 15 फरवरी तक पूरी कर ली जाए।'

बता दें कि हुमायूं कबीर ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम से भी गठबंधन पर बात कर सकती है। खासकर मालदा और मुर्शिदाबाद जिले में दोनों पार्टी मिलकर काम करना चाहती है।

कबीर ने कहा, 'हमारा लक्ष्य भ्रष्ट सरकार को हराना है और राज्य के लोगों को पारदर्शी सरकार देना है।' ऐसा माना जा रहा है कि यदि सीपीएम और जनता उन्नयन पार्टी के बीच गठबंधन होता है, तो इससे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को नुकसान पहुंच सकता है, खासकर मुस्लिम बहुल इलाकों में। कबीर की पार्टी मुख्य रूप से मुस्लिम वोटों पर फोकस कर रही है, जो टीएमसी का मजबूत आधार है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, यह गठबंधन मुस्लिम वोटों को बांट सकता है, जिससे टीएमसी को नुकसान हो सकता है और भाजपा को अप्रत्यक्ष फायदा हो सकता है।

बंगाल चुनाव को लेकर यदि कांग्रेस की बात की जाए तो यह पार्टी एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। वर्षों तक लेफ्ट के साथ चुनावी गठबंधन का हिस्सा रही कांग्रेस अब उससे दूरी बनाने के संकेत दे रही है।

कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन 2016 से बंगाल की राजनीति में सक्रिय रहा। 2019 लोकसभा चुनाव में दोनों अलग हुए, लेकिन 2021 विधानसभा और 2024 लोकसभा चुनाव में फिर साथ आए। हालांकि यह प्रयोग कांग्रेस के लिए लगभग हर बार नुकसानदेह ही साबित हुआ। 2021 विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जब कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर 92 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका। उसका वोट शेयर घटकर महज 3 प्रतिशत रह गया।

वहीं हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव ने कोलकाता में ममता बनर्जी से मुलाकात कर उनकी तारीफ की थी। उन्होंने कहा कि देश में सिर्फ दीदी ही भाजपा का मुकाबला कर सकती हैं। अखिलेश ने भाजपा पर जांच एजेंसियों के गलत इस्तेमाल और चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। अखिलेश यादव ने भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि वह समाज में फूट डालने की राजनीति करती है।

इन सब आरोप प्रत्यारोपों के बीच भाजपा के नए अध्यक्ष नितिन नवीन अपने पहले बंगाल दौरे पर ममता बनर्जी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। दुर्गापुर में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने राज्य में 'डबल इंजन' की सरकार बनाने का आह्वान किया और टीएमसी पर बंगाल को बांग्लादेश की ओर धकेलने का गंभीर आरोप लगाया।

नितिन नवीन ने ऐतिहासिक भिरिंगी श्मशान काली मंदिर में पूजा-अर्चना के बाद सम्मेलन को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि विवेकानंद और रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी महान विभूतियों की यह भूमि आज अराजकता और भ्रष्टाचार की गवाह बन रही है। नवीन ने कार्यकर्ताओं के संघर्ष का अभिनंदन करते हुए कहा कि केवल भाजपा ही इस दमनकारी और अराजकतावादी सरकार के खिलाफ सीना तानकर खड़ी है।ममता बनर्जी पर सीधा हमला करते हुए नितिन नवीन ने कहा कि उन्होंने प्रदेश को भ्रष्टाचार के कारखाने में तब्दील कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि टीएमसी के विधायक और मंत्री 'टीएमसी टैक्स' वसूलने में लगे हुए हैं और जनता की खून-पसीने की कमाई को लूटा जा रहा है। नवीन के अनुसार, ममता बनर्जी ने भ्रष्टाचार खत्म करने का सपना दिखाकर सत्ता हासिल की थी, लेकिन आज राज्य में केवल घोटाले ही घोटाले हो रहे हैं।

हालांकि विधानसभा चुनाव के बाद ही पता चल पाएगा कि इन आरोप-प्रत्यारोपों को लेकर बंगाल के मतदाता क्या सोच रहे थे और ग्राउंड के नब्ज को किस दल ने पढ़ने की कोशिश की थी। फिलहाल तो बंगाल में हर दल चुनाव की तैयारी में है और हर कोई जीत हासिल करने के लिए मेहनत कर रही है।

Friday, January 23, 2026

अभिषेक बनर्जी के हाथ होगी टीएमसी की कमान !

पश्चिम बंगाल में अगले कुछ महीनों के अंदर विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। माना जा रहा है कि अप्रैल में दो-तीन चरणों में मतदान कराए जा सकते हैं। राज्य में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आमने – सामने है। दोनों ही इस बार सत्ता हासिल करने के लिए दम-खम के साथ ग्राउंड में जुटी हुई है।


मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं तो वहीं लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी के लिए टीएमसी ने भी कमर कस ली है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने इसके लिए बड़ी तैयारी की है और वह इन दिनों राज्य में यात्रा पर निकले हुए हैं। वे इस बार पूरा बंगाल ही मथने के प्लान में हैं। अपनी यात्रा में वह पूरे बंगाल के हर जिले तक पहुंचने में लगे हैं। यह यात्रा इसलिए भी अहम है क्योंकि इसी दौरान अभिषेक बनर्जी टीएमसी के विधायकों का फीडबैक भी जनता से लेंगे। ऐसे में यह यात्रा इस चीज को भी तय करेगी कि किसे चुनाव में टिकट मिलेगा और किसे नहीं। इसके अलावा उन सीटों पर भी वह कार्यकर्ताओं और जनता से फीडबैक लेंगे, जहां भाजपा के विधायक हैं। टीएमसी का प्लान यह है कि यदि किसी विधायक के खिलाफ ऐंटी-इनकम्बैंसी लोकल लेवल है तो उसे रिप्लेस कर दिया जाए। पार्टी नहीं चाहती कि किसी एक नेता या विधायक से नाराजगी का असर चुनाव जीत की संभावनाओं पर पड़े।


पूरे सूबे में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। बुधवार को पुरुलिया के हुड़ा थाना क्षेत्र स्थित लधुड़का के चंडेश्वर मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी पर जमकर हमला बोला।
 

उन्होंने दावा किया कि आगामी चुनाव में भाजपा राज्य में 50 सीटों के भीतर सिमट जाएगी और पुरुलिया जिले की सभी सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ेगा।

इस चुनाव में एक बार फिर अभिषेक बनर्जी टीएमसी को भीतरखाने से लीड करते दिख रहे हैं। दरअसल अभिषेक बनर्जी की पार्टी में भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। साल 2021 के बाद उन्हें राष्ट्रीय महासचिव का पद मिला। साल 2023 की यात्रा ने उन्हें पश्चिम बंगाल में स्थापित किया। साल 2024 लोकसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन की बैठक में वह हर जगह ममता बनर्जी के साथ नजर आने लगे। अगस्त 2025 में ममता बनर्जी ने उन्हें लोकसभा में टीएमसी का नेता बना दिया। अब उनके समर्थक कहते हैं कि ममता बनर्जी हो सकता है कि धीरे-धीरे राज्य की कमान अभिषेक बनर्जी को सौंप दें।

पश्चिम बंगाल में मार्च-अप्रैल 2026 में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अपनी राज्यवापी 'अबार जिते बांगला' की शुरुआत की है। इस नारे का मतलब है, बंगाल फिर जीतेगा। अभिषेक बनर्जी इस महीने के शुरुआत से ही बंगाल के अलग-अलग जिलों में घूम रहे हैं। वह रोड शो कर रहे हैं, जनसभाएं कर रहे हैं और लोगों से सीधे संवाद कर रहे हैं। अटकलें लग रहीं हैं कि अब ममता बनर्जी, राज्य में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देना चाहती हैं, कोलकाता में लोग तो यह भी कहने लगे हैं कि ममता दीदी इसी टर्म में उन्हें अपनी राजनीतिक विरासत सौंप सकती हैं।

अभिषेक बनर्जी, टीएमसी के युवा चेहरे हैं। वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक वारिस हैं। पार्टी में वह नंबर दो की हैसियत रखते हैं। बंगाल घूमते हुए वह ममता सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं। वह ममता सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं और साथ ही भाजपा पर हमला तेज किए हुए हैं।

टीएमसी में अभिषेक बनर्जी मतलब सत्ता की चाभी भी है। राज्य में उनकी पहचान ममता बनर्जी के भतीजे होने से जुड़ा है। लोगबाग तो यहां तक कहते हैं कि ‘ममता बनर्जी ऑफिस’ की तरह एक ऑफिस ‘अभिषेक बनर्जी’ का भी है जो सत्ता को नियंत्रित करता है।

अभिषेक बनर्जी ने अपने पॉलिटिकल कैंपेंन के जरिए पार्टी में अपनी अलग पहचान बनाई है। शुरुआती अभियानों में उन्होंने अपनी अलग छवि बनाई, अक्सर ममता के भरोसेमंद सहयोगी के रूप में देखे गए, लेकिन अब पार्टी के भीतर वे एक निर्णायक भूमिका गढ़ते हुए नजर आ रहे हैं।

पार्टी के भीतर समीकरणों को साधने और पुराने नेताओं के साथ मतभेदों के बीच संतुलन बनाने की उनकी क्षमता ने उनकी पकड़ मजबूत की है। 2024 के लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों के चयन, जैसे अपेक्षाकृत नए चेहरों को मौका देना, उनकी रणनीतिक समझ और राजनीतिक परंपराओं को चुनौती देने की इच्छा दिखाता है।

गौरतलब है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में अभिषेक तृणमूल के नंबर-दो नेता के रूप में उभरे और जल्द ही पार्टी के महासचिव बने। उस चुनाव में टीएमसी  ने 213 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि भाजपा 77 सीटों पर सिमट गई। वोट शेयर के लिहाज से भी तृणमूल ने 47.9 प्रतिशत के साथ रिकॉर्ड बनाया। 2016 में पार्टी ने 211 सीटें और 44.9 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था।

पश्चिम बंगाल के रायगंज इलाके में एक बुजुर्ग से बातचीत हो रही थी। उन्होंने बताया कि ‘लोग भले अभिषेक बनर्जी को टीएमसी का नेता मानते हों लेकिन हम लोग उन्हें पार्टी का मैकेनिक मानते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि कैसे वोटरों को पार्टी से जोड़ा जा सकता है।’

अभिषेक बनर्जी मतदाताओं से जुड़ने वाली कहानियां गढ़ने में माहिर हैं। हाल-फिलहाल चुनाव आयोग की कार्रवाइयों पर उनकी आपत्ति इसी रणनीति का हिस्सा है, वे इन्हें सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि बंगालियों की पहचान पर खतरा बताते हैं। केंद्र की नीतियों को दमनकारी बताकर वे बंगाल की अस्मिता को पार्टी का मुद्दा बनाना चाहते हैं।

टीएमसी में अभिषेक बनर्जी की भूमिका स्पष्ट हो रही है। संगठनात्मक फैसलों और राष्ट्रीय मुद्दों पर अभिषेक की बेबाक राय से पता चलता है कि ममता उन्हें भविष्य के नेतृत्व के रूप में स्थापित कर रही हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर टीएमसी को कड़ी चुनौती दी थी। लेकिन, 2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 294 में से 213 सीटें जीतकर जोरदार वापसी की। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी टीएमसी की बढ़त बरकरार रही। मगर, भाजपा का वोट शेयर भी खत्म नहीं हुआ। अब दो दलों के बीच सीधा मुकाबला है। देखते हैं कि बंगाल की जनता इस बार किसके हाथ सत्ता की चाभा सौंपती है, टीएमसी या भाजपा ?

Friday, January 16, 2026

क्या सिंगूर फिर से खबरों में आने वाला है ?

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सिंगूर एक ऐसा नाम है जिसने बीते दो दशकों के दौरान सूबे की राजनीति का रंग ही बदल दिया है। यह इलाका राजनीतिक बदलाव का प्रतीक है। इसी एक नाम ने ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल का चेहरा बनाने का काम किया है।  
जैसा कि हम सभी को पता है कि टाटा मोटर्स की नैनो कार फैक्ट्री के खिलाफ हुए भूमि आंदोलन ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह से उलट दिया था और 2011 में इसी आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन की नींव रखी। टाटा के सिंगूर से चले जाने के 18 साल बाद आज हालात पर स्थानीय लोग आत्ममंथन कर रहे हैं। यहां के एख पूर्व विधायक का कहना है कि ममता दीदी ने सिंगूर को भुला दिया है। हालांकि राजनीति में कुछ भुलाया नहीं जाता है, वक्त का पहिया घूमता है और देखिए न उसी सिंगूर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली प्रस्तावित है। भारतीय जनता पार्टी के नेता मंगल पांडे ने हाल ही प्रस्तावित रैली के जगहों का मुयाना भी किया था।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 18 जनवरी को सिंगूर के सिंगर भेरी मौजा में होने वाली निर्धारित रैली से पहले राज्य में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। यह मौजा उसी भूखंड का हिस्सा है, जिसे कभी कार फैक्टरी के लिए आरक्षित किया गया था।

केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सुकांत मजूमदार ने बुधवार को कहा कि सिंगूर बंगाल के “औद्योगिकीकरण के खोए हुए अवसर” का प्रतीक है।
सिंगूर में 18 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली होने वाली है। गौरतलब है कि सिंगूर में कभी टाटा की फैक्ट्री लगने वाली थी लेकिन विरोध के चलते फैक्ट्री नहीं लगी और गुजरात चली गई। इस बार भाजपा ने मोदी की रैली टीएमसी के दबदबे वाले इलाके में करने की ठानी है।

सिंगूर पश्चिम बंगाल के हुगली जिले में वही जगह है, जहाँ टाटा मोटर्स ने अपनी महत्वाकांक्षी नैनो परियोजना का संयंत्र लगाने का फ़ैसला किया था। लेकिन तृणमूल कांग्रेस और ख़ासकर ममता बनर्जी के विरोध के कारण टाटा को आख़िरकार यहाँ से इस परियोजना को समेटना पड़ा था।

जिस ममता बनर्जी के भारी विरोध और आंदोलन के कारण टाटा को यहाँ से अपनी लखटकिया नैनो परियोजना को समेटकर गुजरात के साणंद जाना पड़ा था, वही ममता बंगाल की सत्ता में हैं।

सिंगूर और नंदीग्राम में ज़मीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों ने ही ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में पहुंचने का रास्ता साफ़ किया था। सिंगूर आंदोलन राज्य के सरकारी स्कूलों में आठवीं क्लास की इतिहास की किताब का हिस्सा बन चुका है।

34 वर्षों के वाममोर्चा के शासन में परिवर्तन का श्रेय अगर किसी एक घटना को दिया जाये, तो वह सिंगूर ही है। सिंगूर आंदोलन के बीच से उठी परिवर्तन की हवा ने राज्य की सत्ता में लगभग अपराजेय बन गये मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) नीत वाममोर्चा गठबंधन को 2011 में जड़ से उखाड़ कर उड़ा दिया था तब से लेकर हाल तक वाम मोर्चा को नेतृत्व दे रही माकपा और उसके सहयोगी दल बंगाल की सियासत में लगातार कमजोर ही होते गये हैं।

हुगली लोकसभा क्षेत्र में सात विधानसभा क्षेत्रों में से एक है सिंगूर। तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने टाटा मोटर्स की नैनो कार परियोजना के लिए सिंगूर में ही जमीन अधिग्रहण करना शुरू किया था। टाटा मोटर्स के लिए 997 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया था। हालांकि सिंगूर की जमीन बेहद उपजाऊ होने के चलते कुछ किसान जमीन देने के प्रति अनिच्छुक थे। इसी मुद्दे पर वहां एक आंदोलन छिड़ गया, जिसका नेतृत्व तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने किया था। इसमें उनका साथ बंगाल के नागरिक समाज के कई विशिष्ट व्यक्तियों के अलावा देश भर के पर्यावरणविदों ने भी दिया था।

सिंगूर में जमीन अधिग्रहण के विरोध पर उतारू ममता बनर्जी को प्रशासन ने वहां जाने से रोक दिया था। इसके बाद हाथों में संविधान की किताब लिये ममता बनर्जी विधानसभा पहुंच गयी थीं और फिर विधानसभा में जबरदस्त तोड़फोड़ की घटना हो गयी। जमीन अधिग्रहण विरोधी आंदोलन के तहत ममता बनर्जी ने तब 26 दिनों का लगातार अनशन कर देशभर के लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचा था। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जो तब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, ने टाटा से बात कर नैनो कार परियोजना को अपने राज्य में मंगा लिया। जो कारखाना सिंगूर में लगना था, गुजरात के साणंद में लग गया।

2026 में एक बार फिर सिंगूर देश भर के लोगों की जुबान पर आने वाला है। इसकी शुरुआत हो चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 18 जनवरी को प्रस्तावित सिंगूर दौरे से पहले सभा स्थल को लेकर विवाद भी खड़ा हो गया है। स्थानीय मीडियाके अनुसार जिस जमीन पर प्रधानमंत्री मोदी की सभा प्रस्तावित है, उसे जबरन लेने का आरोप लगाया गया है। इसे लेकर स्थानीय किसानों व जमीन मालिकों में भारी असंतोष देखा जा रहा है। स्थानीय रिपोर्ट के अनुसार, गुरुवार तक कुल 26 लोगों ने अपनी जमीन सभा के लिए देने से साफ इनकार कर दिया है। इनमें छह लोगों ने बुधवार और 20 लोगों ने गुरुवार को बीडीओ और स्थानीय थानेदार को लिखित रूप में आपत्ति दर्ज करायी है।

इस मुद्दे पर गुरुवार शाम सिंगूर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में राज्य के कृषि विपणन विभाग के मंत्री बेचाराम मन्ना ने आरोप लगाया कि किसानों की सहमति के बिना जमीन लेने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि सिंगूर तृणमूल कांग्रेस और सिंगूर कृषि जमीन रक्षा कमेटी की ओर से इस कदम का कड़ा विरोध किया जा रहा है।

हालांकि जो होगा वह हम सबके सामने होगा लेकिन इतना तो तय है कि सिंगूर में प्रधानमंत्री की रैली का प्रतीकात्मक महत्व है, क्योंकि यह वही भूमि है, जिसने 34 साल से सत्ता में रहे वाम मोर्चा को राज्य से बाहर किया और ममता बनर्जी को सत्ता की चाबी दी थी। अब देखना है कि इस विधानसभा चुनाव बंगाल की सत्ता वाली चाभी किसके पास जाती है।

Friday, January 09, 2026

ममता बनर्जी को गुस्सा क्यों आया?

प्रवर्तन निदेशालय (ED) की टीम ने गुरुवार को पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC और उसके डायरेक्टर प्रतीक जैन के ठिकानों पर छापेमारी की. इस पर हाईवोल्टेज ड्रामा तब शुरू हो गया, जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी रेड वाली जगहों पर पहुंच गईं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव से पहले ED की टीम उनकी पार्टी से जुड़े दस्तावेजों को जब्त करने की कोशिश कर रही है!
विधानसभा चुनाव के दहलीज पर खड़े पश्चिम बंगाल में आई-पैक के चीफ प्रतीक जैन के घर पर गुरुवार को ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) की रेड को लेकर तृणमूल कांग्रेस और भाजपा में ठनती दिख रही है।

प्रतीक जैन के घर पर छापेमारी की सूचना पर ममता बनर्जी मौके पर पहुंचे और उन्होंने वहां से गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर लिया। ममता बनर्जी ने चिर परिचित अंदाज में हमला बोलते हुए गृह मंत्री अमित शाह को नॉटी होम मिनिस्टर भी कहा। बनर्जी ने आरोप लगाया कि ईडी से छापेमारी करवाकर बीजेपी ने तृणमूल की चुनावी रणनीति को चोरी किया।

ममता बनर्जी यहीं पर नहीं रुकीं उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा कि वह अपने गृह मंत्री को काबू में रखें। बंगाल में मार्च-अप्रैल में चुनाव होने हैं, तो वहीं दूसरी तरफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की छापेमारी के खिलाफ आई-पैक ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। तो वहीं दूसरी ईडी ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में कोयला तस्करी से जुड़े हवाला कारोबारी ने आई-पैक को करोड़ों रुपये के लेनदेन में मदद की।

ईडी ने गुरुवार सुबह ही कोलकाता में सलाहकार संस्था आई-पैक के दफ्तर और इसके प्रमुख प्रतीक जैन के घर तलाशी अभियान शुरू किया था। इसकी खबर मिलते ही मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले प्रतीक के घर गई और वहां से आई-पैक के दफ्तर। उन्होंने तलाशी के दौरान ही वहां से दर्जनों फाइलें और लैपटॉप को अपने कब्जे में लेकर गाड़ी में रख लिया।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार और भाजपा पर ईडी के जरिए आई-पैक के दफ्तर से तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से जुड़े दस्तावेजों को जब्त करने का प्रयास करने का आरोप लगाया है। 

दूसरी ओर, ईडी ने अपने बयान में कहा है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने संवैधानिक पद का दुरुपयोग करते हुए ईडी तलाशी के दौरान कई दस्तावेज और इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को जबरन कब्जे में ले लिया और अपने साथ ले गई।

गौरतलब है कि आई-पैक एक पेशेवर राजनीतिक सलाहकार फर्म है। यह देश के विभिन्न राजनीतिक दलों को चुनावी रणनीति बनाने और चुनाव अभियान के संचालन में मदद करती है। इसका पूरा नाम है इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमिटी। 

फिलहाल प्रतीक जैन इसके निदेशक है। वो तृणमूल कांग्रेस की आईटी सेल के प्रमुख भी हैं। इसी संस्था ने 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए कई रणनीति तैयार की थी।

इस पूरे घटनाक्रम में ममता बनर्जी की बात तो सभी कर रहे हैं लेकिन यहां आईपैक के चीफ प्रतीक जैन को भी जानने की जरुरत है। आईपैक के निदेशक प्रतीक जैन ने आईआईटी- मुंबई से बीटेक की डिग्री ली है। 

डिग्री पूरी करने के बाद उन्होंने वर्ष 2012 में डेलायट में एनालिस्ट के तौर पर काम किया। कुछ समय बाद ही उन्होंने प्रशांत किशोर के साथ सिटीजंस फॉर अकाउंटेबल गवर्नेंस की स्थापना की थी। यही आगे चल कर आई-पैक में बदला। उस समय उनके साथ ऋषिराज सिंह और विनेश चंदेल भी थे। बाद में प्रशांत किशोर ने इस संस्था से दूरी बना ली। अब प्रमुख के तौर पर प्रतीक जैन ही संस्था का कामकाज देखते हैं। इसके साथ ही वो तृणमूल कांग्रेस की आईटी सेल के प्रमुख भी हैं।

यहां यह समझने की भी जरुरत है कि आखिर ईडी ने तलाशी अभियान क्यों आरंभ किया। दरअसल कोयला घोटाले की जांच के सिलसिले में प्रतीक जैन के आवास और आई-पैक के दफ्तर पर तलाशी अभियान शुरू किया गया।

ईडी के तलाशी अभियान की खबर सामने आते ही गुरुवार को ममता बनर्जी शीर्ष प्रशासनिक और पुलिस अधिकारियों के साथ पहले प्रतीक जैन के घर पहुंची। वहां करीब एक घंटे रहने के दौरान वो अपने हाथों में हरे रंग की एक फाइल लेकर बाहर निकलीं और आरोप लगाया कि ईडी तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से जुड़े गोपनीय दस्तावेजों और उम्मीदवारों की सूची जब्त कर साथ ले जा रही थी। लेकिन उन्होंने उसे अपने कब्जे में ले लिया है।

उसके बाद वो भारी पुलिस बल के साथ साल्टलेक स्थित आई-पैक के दफ्तर पहुंची। वहां उनके पहुंचने के कुछ देर बाद ही पुलिस के जवान दर्जनों फाइलें और कई लैपटॉप ममता बनर्जी की कार में रखते देखे गए। वहां पुलिस और प्रशासन के तमाम शीर्ष अधिकारियों के अलावा तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेता भी मौजूद थे।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया, “केंद्रीय एजेंसी इस छापेमारी की आड़ में तृणमूल कांग्रेस की चुनावी रणनीति से जुड़ी जानकारियां ‘ट्रांसफर’ कर रही है। यह गंभीर अपराध है।” 

उन्होंने कहा, “आई-पैक सिर्फ एक निजी संस्था नहीं बल्कि तृणमूल कांग्रेस की अधिकृत टीम है। ईडी के इस हमले का जवाब आम लोग देंगे।

दूसरी ओर, प्रवर्तन निदेशालय ने यहां जारी एक बयान में ममता बनर्जी पर अपने संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग कर कई दस्तावेजी और इलेक्ट्रॉनिक सबूत जबरन साथ ले जाने का आरोप लगाया है। 

बयान में कहा गया है कि ईडी कोयला घोटाले के मामले में ठोस जानकारी के आधार पर दस जगहों पर तलाशी अभियान चला रही है। यह अभियान न तो किसी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ है और न ही चुनाव से इसका कोई लेना-देना है।

Friday, January 02, 2026

बंगाल की चुनावी डायरी

बंगाल में अप्रैल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। भारतीय जनता पार्टी अपनी तैयारी में जुट गई है। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन के बंगाल दौरे पर थे और उन्होंने पार्टी की कोर कमेटी की बैठक भी की। वहीं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी पूरी तरह से चुनावी तैयारी में जुट गईं हैं।
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह अपने पश्चिम बंगाल प्रवास के दौरान भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से बात की। दिलीप घोष फिर से पूरी तरह से एक्टिव हो गए हैं और पार्टी के लिए चुनाव प्रचार की कमान संभालने वाले हैं। दिलीप घोष 6 जनवरी को एक रैली कर सकते हैं। वहीं उसके बाद 16 जनवरी को भी एक जनसभा को संबोधित कर सकते हैं।

गौरतलब है कि दिलीप घोष 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। हालांकि उस चुनाव में हार के बाद वह पहले की तरह एक्टिव नहीं दिखे। अब दिलीप घोष 6 जनवरी को बैरकपुर में एक रैली कर सकते हैं। एक हफ्ते बाद वह सामिक भट्टाचार्य के साथ दुर्गापुर में एक और रैली कर सकते हैं। सूत्रों ने बताया कि दिलीप घोष 13 जनवरी को उत्तरी बंगाल में बीजेपी के गढ़ कूचबिहार में भी एक रैली करने वाले हैं।

इन सबके बीच पश्चिम बंगाल में 15 साल से शासन कर रही तृणमूल कांग्रेस अपनी स्थापना के 28वें वर्ष और एक नये चुनावी चक्र में प्रवेश कर चुकी है।

ममता बनर्जी की पार्टी एक ओर अपनी वैचारिक स्थिति को नये सिरे से गढ़ रही है, तो दूसरी ओर वह बंगाली ‘अस्मिता’ को ‘बंगाली हिंदू पहचान’ की अधिक स्पष्ट अभिव्यक्ति के साथ जोड़ रही है। इसका उद्देश्य यह है कि वह अपने पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक को असहज किये बिना हिंदू समर्थन को मजबूत कर सके। इसका एक और मकसद है भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तुष्टीकरण के विमर्श का मुकाबला करना।

गौरतलब है कि कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने 1 जनवरी 1998 को वाम मोर्चा के जमे-जमाये शासन को चुनौती देने के उद्देश्य से तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। वर्ष 2011 में ‘मां, माटी, मानुष’ के नारे के इर्द-गिर्द जमीनी स्तर पर हुए व्यापक जन आंदोलन के दम पर टीएमसी सत्ता में आयी थी।

वर्ष 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव को अब महज 3 महीने बचे हैं। पार्टी एक बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सामना कर रही है, जहां अस्मिता की राजनीति अधिक तीखी हो चुकी है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ मुकाबला और भी कड़ा होता जा रहा है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की चुनावी रणनीति में भी यह बदलाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। उन्होंने दक्षिण बंगाल के दीघा में 213 फुट ऊंचे जगन्नाथ मंदिर, कोलकाता में दुर्गा मंदिर और सांस्कृतिक परिसर (दुर्गा आंगन) और सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर जैसी कई मंदिर परियोजनाओं के उद्घाटन या निर्माण की घोषणा की है।

ममता बनर्जी के आक्रमक रूख के समानांतर पश्चिम बंगाल के चुनावी रण में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कमान संभाल ली है। अपने तीन दिवसीय दौरे में शाह ने भाजपा कार्यकर्ताओं को राज्य की 294 में से दो-तिहाई सीटें जीतने का बड़ा टारगेट दिया है। इसके लिए उन्होंने घुसपैठ से लेकर सोनार बांग्ला तक 5 ऐसे मंत्र दिए हैं, जो बीजेपी की चुनावी रणनीति के प्रमुख स्तंभ होंगे।

भाजपा के रणनीतिकार अमित शाह ने बंगाल चुनाव के लिए जिस प्रचार अभियान की नींव रखी है, वह पांच मुख्य मुद्दों पर टिकी है। अमित शाह ने कार्यकर्ताओं को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जब वे वोटरों के बीच जाएं, तो इन्हीं पांच बातों को प्रमुखता से रखें।
1. घुसपैठियों की समस्या
2. वंदे मातरम
3. जय श्री राम
4. सोनार बांग्ला का निर्माण
5. बंगाल की विरासत को दोबारा स्थापित करना
ये वो शब्द और मुद्दे हैं जो आने वाले दिनों में हर भाजपा कार्यकर्ता की जुबान पर होंगे और हर चुनावी जनसभा में गूंजेंगे। गृह मंत्री का मानना है कि यही वो भावनात्मक और जमीनी मुद्दे हैं जो बंगाल की जनता को बीजेपी के पक्ष में एकजुट करेंगे।

इन सब ग्राउंड की कहानियों के बीच पश्चिम बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व लोकसभा में कांग्रेस दल के नेता अधीर रंजन चौधरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर सबको चौंका दिया।
प्रधानमंत्री संग मुलाकात में अधीर रंजन चौधरी ने विभिन्न राज्यों, विशेषकर बीजेपी शासित राज्यों में काम कर रहे बंगाली भाषी प्रवासी मजदूरों के खिलाफ कथित हिंसा और हमलों का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। अधीर चौधरी ने प्रधानमंत्री से इन घटनाओं का संज्ञान लेने और मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की। अधीर रंजन चौधरी की यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है, जब पश्चिम बंगाल में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हो रही हैं। इस वजह से इस बैठक ने राजनीतिक हलकों में अटकलों को भी जन्म दे दिया है।

अधीर चौधरी मुर्शिदाबाद जिले से आने वाले एक प्रभावशाली जमीनी नेता माने जाते हैं और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कट्टर आलोचक रहे हैं। इस मामले में उनका रुख बीजेपी से मेल खाता नजर आता है, जिससे राजनीतिक चर्चाएं और तेज हो गई हैं। अधीर चौधरी ने लंबे समय तक पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के लिए मजबूत आधार बनाए रखा। उन्होंने बेरहामपुर लोकसभा सीट से लगातार पांच बार जीत दर्ज की थी, जबकि राज्य में कांग्रेस संगठन धीरे-धीरे कमजोर होता चला गया। हालांकि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्हें तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार यूसुफ पठान के हाथों हार का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद अधीर चौधरी की पहचान एक मजबूत जमीनी नेता के रूप में बनी हुई है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति आने वाले दिनों में करवटें लेती दिखेगी। इन सबके बीच तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ अपनी रणनीति को धार देते हुए नया चुनावी नारा गढ़ दिया है!

टीएमसी का नया नारा है- "जोतोई कोरो हमला, आबार जीतबे बांग्ला'

(जितने भी हमले कर लो, बंगाल फिर जीतेगा)

अब देखना है कि इसके जवाब में अमित शाह कौन सा नारा अपनी पार्टी को देते हैं।



बिहार में पंचायत चुनाव पर भाजपा की नजर !



केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नव नियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन हाल ही में अपने गृह राज्य बिहार के दौरे पर आए थे। अपने बिहार दौरे में उनके एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

नितिन नबीन ने बिहार में कहा कि “पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर कार्यकर्ता को सक्रिय रहना होगा।

उनके इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी अब जमीनी स्तर पर संगठन को और मजबूत करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही है। उनके बयान को आगामी पंचायत चुनावों की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा स्थानीय निकाय चुनावों को इस बार बेहद गंभीरता से ले रही है।

अपने दौरे के दौरान नितिन नबीन ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर कार्यकर्ता को सक्रिय रहना होगा। संगठन की असली ताकत बूथ और पंचायत स्तर से ही निकलती है।” इस संदेश को संगठन की रीढ़ को और मजबूत करने की स्पष्ट अपील के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में उनके बयान को इस संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है कि भाजपा बिहार में पंचायत चुनावों को पार्टी स्तर पर लड़ने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रही है।

“पंचायत से पार्लियामेंट तक” का नारा यह दर्शाता है कि पार्टी स्थानीय निकाय चुनावों को संगठन विस्तार और राजनीतिक मजबूती का अहम मंच मान रही है।

बिहार विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद भाजपा राज्य में अपना विजय रथ और आगे दौड़ाने की तैयारी करने लगी है। भाजपा अब बिहार में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव में भी जीत दोहराने की तैयारी कर रही है। नितिन नबीन ने पटना में मंगलवार को पार्टी के कार्यकर्ताओं को पंचायत चुनाव के लिए कमर कस लेने की हिदायत दी। पटना में एक सभा में उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं की तारीफ की।

नितिन नबीन ने भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा, आप बस अपने काम पर विश्वास कीजिए। जिस तरह बिहार से हमें मैंडेट मिला है, तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। ये जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का समय है। इसलिए हम सभी को मेहनत करनी पड़ेगी। पंचायत से पार्लियामेंट तक हमें परचम लहराना है। इसलिए बिहार के पंचायत चुनाव के लिए हमें अभी से ही लग जाना है और बिहार को विकसित बिहार बनाना है।


भाजपा का तर्क है कि उनका संगठन बिहार में बूथ स्तर पर काफी मजबूत हो चुका है। परिणाम बिहार विधानसभा चुनाव में सबने देख ही लिया है। इसलिए अब पंचायत चुनाव लक्ष्य है। बिहार में दिसंबर 2026 से पहले पंचायत चुनाव संपन्न करा लिए जाएंगे। बुधवार को पटना में जब राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने बूथ लेवल एजेंटों के साथ बैठक की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि हमलोगों को बिहार पंचायत चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार होना है। इसके लिए अभी से ही हमलोगों को हर बूथ पर काम करना होगा।

भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार की जनता ने भाजपा को एक बहुत बड़ा मैंडेट दिया है। इस वजह से उस जनता के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। इसलिए सरकार की उपलब्धियों को नीचे धरातल तक ले जाने के साथ-साथ जनता से जुड़कर हमें काम करना पड़ेगा। जनता ने जिस अपेक्षा से हमें वोट दिया है हमें उनके अपेक्षाओं पर खरा उतरने का समय आ गया है। हमें सरकार की योजनाओं को जनता तक ले जाना होगा और फिर उसे धरातल पर उनके अनुसार काम करना होगा। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह का सपना है कि पंचायत से पार्लियामेंट तक भगवा लहराए। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि नरेंद्र मोदी का सपना है कि एक लाख से अधिक युवा नेतृत्व निकाला जाय। और यह तभी होगा जब एक लाख से अधिक हमारे युवा नेतृत्व पंचायत से पार्लियामेंट तक आगे बढ़ेंगे।

नितिन नबीन ने कहा कि आने वाले समय में बिहार पंचायत में और नगर निकाय में चुनाव होने हैं, इसलिए मैं सभी कार्यकर्ताओं को आगाह करता हूं कि अगर नेतृत्वकर्ता बनना है तो अपने-अपने क्षेत्र में जाइए और जनता से जुड़कर काम कीजिए। जनता की समस्याओं में खरा उतरिये। नितिन नबीन ने कहा कि जब आप ऐसा कीजिएगा तभी आप निश्चित रूप से आप में से कोई वार्ड काउंसलर बनेगा, कोई मुखिया बनेगा और कोई भविष्य का नेतृत्वकर्ता बनेगा। पंचायत निकाय चुनाव में हम सबको अभी से ही लग जाना होगा, तभी निश्चित रूप से यह चुनाव बदलते हुए बिहार की एक नई तस्वीर प्रदान करेगा। नितिन नबीन ने कहा कि अगर पंचायत और निकाय स्तर पर अगर अच्छा नेतृत्व खड़ा कर देंगे तो 2047 का बिहार भी विकसित बिहार बनकर उभरेगा।

गौरतलब है कि बिहार में 534 प्रखंड और 8387 पंचायत में भाजपा का संगठन फैला हुआ है। सबसे पहले कार्यकर्ता बूथ स्तर पर जुड़ते हैं। अब इसे शक्ति केंद्र कहा जाता है। इस शक्ति केंद्र में 12 से अधिक सदस्य होते हैं। इन सदस्यों में युवा, किसान, महिलाएं और समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल होते हैं। इसका एक प्रमुख होता है। इसके ऊपर मंडल होता है। 12 से 15 शक्ति केंद्रों को मिलाकार मंडल बनता है। यह प्रखंड स्तर पर रहता है। हर मंडल में एक कमेटी रहती है। इसमें 30 से अधिक सदस्य रहते हैं। इसमें कम से 10 महिलाएं भी रहती हैं। साथ ही सदस्यों में समाज के हर वर्ग के लोग रहें, इसका भी ख्याल रखा जाता है। मंडल समितियों के सदस्य ही जिला स्तर पर प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इससे ही जिला स्तर पर कमेटी बनती है। यानी हर एक स्तर पर एक अलग समिति होती है।

भारतीय जनता पार्टी बिहार में अपने इसी ग्राउंड नेटवर्क को पंचायत चुनाव से जोड़कर देख रही ही। पार्टी सूत्रों के अनुसार पंचायत चुनाव यदि पार्टी आधारित होती है तो भाजपा पूरे राज्य में ग्राम पंचायत से लेकर शहरी निकाय में कमल खिलाने के मूड में है। अब देखना यह है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव पार्टी आधारित होती है या नहीं।



बिहार में पंचायत चुनाव पर भाजपा की नजर !
गिरीन्द्र नाथ झा

केंद्र में सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी के नव नियुक्त राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन हाल ही में अपने गृह राज्य बिहार के दौरे पर आए थे। अपने बिहार दौरे में उनके एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

नितिन नबीन ने बिहार में कहा कि “पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर कार्यकर्ता को सक्रिय रहना होगा।

उनके इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि पार्टी अब जमीनी स्तर पर संगठन को और मजबूत करने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रही है। उनके बयान को आगामी पंचायत चुनावों की तैयारी से जोड़कर देखा जा रहा है, जिससे यह संकेत मिलता है कि भाजपा स्थानीय निकाय चुनावों को इस बार बेहद गंभीरता से ले रही है।

अपने दौरे के दौरान नितिन नबीन ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के विचारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा, “पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक हर कार्यकर्ता को सक्रिय रहना होगा। संगठन की असली ताकत बूथ और पंचायत स्तर से ही निकलती है।” इस संदेश को संगठन की रीढ़ को और मजबूत करने की स्पष्ट अपील के तौर पर देखा जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में उनके बयान को इस संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है कि भाजपा बिहार में पंचायत चुनावों को पार्टी स्तर पर लड़ने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार कर रही है।

“पंचायत से पार्लियामेंट तक” का नारा यह दर्शाता है कि पार्टी स्थानीय निकाय चुनावों को संगठन विस्तार और राजनीतिक मजबूती का अहम मंच मान रही है।

बिहार विधानसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद भाजपा राज्य में अपना विजय रथ और आगे दौड़ाने की तैयारी करने लगी है। भाजपा अब बिहार में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव में भी जीत दोहराने की तैयारी कर रही है। नितिन नबीन ने पटना में मंगलवार को पार्टी के कार्यकर्ताओं को पंचायत चुनाव के लिए कमर कस लेने की हिदायत दी। पटना में एक सभा में उन्होंने पार्टी के कार्यकर्ताओं की तारीफ की।

नितिन नबीन ने भाजपा कार्यकर्ताओं से कहा, आप बस अपने काम पर विश्वास कीजिए। जिस तरह बिहार से हमें मैंडेट मिला है, तो हमारी जिम्मेदारी और बढ़ गई है। ये जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का समय है। इसलिए हम सभी को मेहनत करनी पड़ेगी। पंचायत से पार्लियामेंट तक हमें परचम लहराना है। इसलिए बिहार के पंचायत चुनाव के लिए हमें अभी से ही लग जाना है और बिहार को विकसित बिहार बनाना है।


भाजपा का तर्क है कि उनका संगठन बिहार में बूथ स्तर पर काफी मजबूत हो चुका है। परिणाम बिहार विधानसभा चुनाव में सबने देख ही लिया है। इसलिए अब पंचायत चुनाव लक्ष्य है। बिहार में दिसंबर 2026 से पहले पंचायत चुनाव संपन्न करा लिए जाएंगे। बुधवार को पटना में जब राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने बूथ लेवल एजेंटों के साथ बैठक की तो उन्होंने स्पष्ट कहा कि हमलोगों को बिहार पंचायत चुनाव के लिए पूरी तरह तैयार होना है। इसके लिए अभी से ही हमलोगों को हर बूथ पर काम करना होगा।

भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि बिहार की जनता ने भाजपा को एक बहुत बड़ा मैंडेट दिया है। इस वजह से उस जनता के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। इसलिए सरकार की उपलब्धियों को नीचे धरातल तक ले जाने के साथ-साथ जनता से जुड़कर हमें काम करना पड़ेगा। जनता ने जिस अपेक्षा से हमें वोट दिया है हमें उनके अपेक्षाओं पर खरा उतरने का समय आ गया है। हमें सरकार की योजनाओं को जनता तक ले जाना होगा और फिर उसे धरातल पर उनके अनुसार काम करना होगा। भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन ने कहा कि गृह मंत्री अमित शाह का सपना है कि पंचायत से पार्लियामेंट तक भगवा लहराए। उन्होंने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि नरेंद्र मोदी का सपना है कि एक लाख से अधिक युवा नेतृत्व निकाला जाय। और यह तभी होगा जब एक लाख से अधिक हमारे युवा नेतृत्व पंचायत से पार्लियामेंट तक आगे बढ़ेंगे।

नितिन नबीन ने कहा कि आने वाले समय में बिहार पंचायत में और नगर निकाय में चुनाव होने हैं, इसलिए मैं सभी कार्यकर्ताओं को आगाह करता हूं कि अगर नेतृत्वकर्ता बनना है तो अपने-अपने क्षेत्र में जाइए और जनता से जुड़कर काम कीजिए। जनता की समस्याओं में खरा उतरिये। नितिन नबीन ने कहा कि जब आप ऐसा कीजिएगा तभी आप निश्चित रूप से आप में से कोई वार्ड काउंसलर बनेगा, कोई मुखिया बनेगा और कोई भविष्य का नेतृत्वकर्ता बनेगा। पंचायत निकाय चुनाव में हम सबको अभी से ही लग जाना होगा, तभी निश्चित रूप से यह चुनाव बदलते हुए बिहार की एक नई तस्वीर प्रदान करेगा। नितिन नबीन ने कहा कि अगर पंचायत और निकाय स्तर पर अगर अच्छा नेतृत्व खड़ा कर देंगे तो 2047 का बिहार भी विकसित बिहार बनकर उभरेगा।

गौरतलब है कि बिहार में 534 प्रखंड और 8387 पंचायत में भाजपा का संगठन फैला हुआ है। सबसे पहले कार्यकर्ता बूथ स्तर पर जुड़ते हैं। अब इसे शक्ति केंद्र कहा जाता है। इस शक्ति केंद्र में 12 से अधिक सदस्य होते हैं। इन सदस्यों में युवा, किसान, महिलाएं और समाज के प्रबुद्ध लोग शामिल होते हैं। इसका एक प्रमुख होता है। इसके ऊपर मंडल होता है। 12 से 15 शक्ति केंद्रों को मिलाकार मंडल बनता है। यह प्रखंड स्तर पर रहता है। हर मंडल में एक कमेटी रहती है। इसमें 30 से अधिक सदस्य रहते हैं। इसमें कम से 10 महिलाएं भी रहती हैं। साथ ही सदस्यों में समाज के हर वर्ग के लोग रहें, इसका भी ख्याल रखा जाता है। मंडल समितियों के सदस्य ही जिला स्तर पर प्रतिनिधियों को चुनते हैं। इससे ही जिला स्तर पर कमेटी बनती है। यानी हर एक स्तर पर एक अलग समिति होती है।

भारतीय जनता पार्टी बिहार में अपने इसी ग्राउंड नेटवर्क को पंचायत चुनाव से जोड़कर देख रही ही। पार्टी सूत्रों के अनुसार पंचायत चुनाव यदि पार्टी आधारित होती है तो भाजपा पूरे राज्य में ग्राम पंचायत से लेकर शहरी निकाय में कमल खिलाने के मूड में है। अब देखना यह है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव पार्टी आधारित होती है या नहीं।