Sunday, September 27, 2026

चुनाव से पहले पंजाब!

किसी भी राज्य में जब चुनाव की तारीख नजदीक आने लगती है, वहां की सियासी हवा भी रंग बदलने लगती है। पिछले कुछ महीने से अपनी निगाह पंजाब पर है, जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होंगे। वैसे इन दिनों देश में चुनाव और मुख्य चुनाव आयुक्त की खबरें सबसे अधिक सुर्खियां बटौर रही है।  

चुनाव को लेकर पंजाब में हर दल अब अलर्ट मोड में है। कोई यात्रा निकाल रहा है, कोई आरोप- प्रत्यारोप लगाने में जुटा है तो कोई इधर से उधर नेताओं को करने में लगा हुआ है।

इन सबके बीच कांग्रेस पार्टी युवाओं को अपने पाले में करने के लिए योजना बनाने लगी है। आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी पंजाब कांग्रेस का फोकस इस बार युवाओं पर है। कांग्रेस ने इस बार सचिन पायलट पर दांव लगाया है और उन्हें पंजाब का नया प्रभारी बनाया है। सचिन पायलट सूबे में युवाओं को एकजुट करने की पूरी तैयारी में जुट गए हैं। उन्होंने यूथ कांग्रेस पदाधिकारियों और युवा नेताओं से फीडबैक लेने का काम शुरू कर दिया है, जिसका उद्देश्य है ऐसे नेताओं की पहचान करना जो बूथ स्तर पर सक्रिय हो और युवाओं के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ सके। आने वाले दिनों में वे पंजाब की यात्रा भी करेंगे।

दरअसल, पंजाब में 18 से 29 साल के युवा मतदाताओं की संख्या करीब 48.9 लाख से अधिक है और ये कुल वोटरों की संख्या का करीब 22 फीसदी है। पंजाब के विभिन्न राजनीतिक दल इन्हें अपने पक्ष में करने की कवायद में जुटे हुए हैं। इसी क्रम में मंगलवार को सचिन पायलट ने दिल्ली के इंदिरा भवन में पंजाब युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष शुभम शर्मा समेत अन्य नेताओं के साथ बेठक की और उनका फीडबैक लिया।

इस बैठक का उद्देश्य 2027 के पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को मजबूत करना, जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं से समन्वय बढ़ाना और संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना है। कांग्रेस चुनावों से पहले एक तरह से 'जेन Z' वोटरों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती है।

दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के पंजाब प्रभारी सतीश पूनिया ने दावा किया है कि पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में उनकी पार्टी चमत्कार करेगी। उन्होंने एक बार फिर साफ किया कि पार्टी कुल 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और अपनी स्ट्रैटजी, मैनेजमेंट और कैंपेन के बलबूते बहुमत का आंकड़ा पार कर लेगी।

भाजपा- कांग्रेस की सियासी तैयारियों के बीच राज्य की सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) ने गुरुवार को कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह एहसास होने के बाद कि पंजाब ने बीजेपी को नकार दिया है, अब वे पंजाबियों से राजनीतिक बदला लेने और चुनाव से पहले उनके लिए मुश्किलें खड़ी करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल कर रहे हैं। आप के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि एनफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ईडी) के ऑपरेशन ने तीन दिनों से पूरे पंजाब में सरकारी कामकाज को प्रभावित किया है। इससे लोगों को बहुत परेशानी हो रही है, जबकि छापों में कुछ हासिल नहीं हुआ है।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार का विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों के खिलाफ ईडी, इनकम टैक्स विभाग और चुनाव आयोग का इस्तेमाल करना उनकी पहचान बन गया है, लेकिन पंजाब डरने वाला नहीं है और तीन करोड़ पंजाबी लोकतांत्रिक तरीके से भाजपा को जवाब देंगे।

राजनीतिक दलों की कथाओं के बीच पंजाब की राजनीति में एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला सियासी फेरबदल देखने को मिल रहा है। इंफोर्समेंट डायरेक्टरेट (ED) के पूर्व चर्चित और तेज तर्रार अधिकारी निरंजन सिंह राजनीति की पिच पर भाग्य आजमाने जा रहे हैं। उन्होंने पंजाब की खडूर साहिब सीट से सांसद और राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत आरोपी अमृतपाल सिंह की पार्टी ‘अकाली दल (वारिस पंजाब दे)’ का दामन थाम लिया है। उनके इस राजनीतिक कदम ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में खलबली मचा दी है।

मीडिया से बात करते हुए निरंजन सिंह ने वारिस पंजाब दे में शामिल होने का कारण भी बताया। उन्होंने वारिस पंजाब दे में शामिल होने का कारण पंजाब में नशे और भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान को बताया। बता दें कि अमृतपाल सिंह ने पंजाब में नशे के खिलाफ खालसा वहीर मुहिम शुरू की थी। उन्होंने दावा किया कि इस अभियान से बड़ी संख्या में युवाओं को नशा छोड़ने के लिए प्रेरणा मिली।
 
गौरतलब है कि निरंजन सिंह मई 2021 में सेवानिवृत्त हुए थे। उन्होंने कई चर्चित मादक पदार्थ मामलों की जांच की थी। इनमें करोड़ों रुपये के जगदीश भोला मादक पदार्थ तस्करी मामले की जांच भी शामिल है। उन्होंने पीएमएलए के तहत जांच किए गए इस मामले में पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया और सरवन सिंह फिल्लौर समेत कई वरिष्ठ नेताओं से पूछताछ की थी।

निरंजन सिंह का प्रशासनिक और जांच का इतिहास काफी सुर्खियां बटोर चुका है। ईडी में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल और बेहद संवेदनशील मामलों की जांच की कमान संभाली थी। पंजाब के बहुचर्चित ड्रग्स मामले में अकाली दल के सीनियर नेता बिक्रम सिंह मजीठिया से लंबी पूछताछ करने वाले अधिकारियों में निरंजन सिंह प्रमुख रूप से शामिल थे। उस दौरान मजीठिया से पूछताछ और अचानक निरंजन सिंह के ट्रांसफर को लेकर पंजाब की राजनीति में भारी भूचाल आया था और यह मुद्दा लंबे समय तक सुर्खियों में रहा था। अब उसी तेवर वाले पूर्व अधिकारी का एक ऐसे सांसद की पार्टी में शामिल होना, जो खुद गंभीर आपराधिक मामलों और आतंकवाद से जुड़े आरोपों का सामना कर रहा है, सवाल उठाता है। इस सियासी कदम से आने वाले दिनों में पंजाब की राजनीति में नए समीकरण बनते नजर आ रहे हैं, जहां एक तरफ प्रशासनिक अनुभव और सख्त छवि का दावा है, तो दूसरी तरफ विवादित पृष्ठभूमि का साया है।

चुनाव नजदीक हो और बिजली बिल माफी की खबरें न आए तो सियासी खिचड़ी बनती नहीं दिखती है। ऐसे में पंजाब से खबर आई है कि राज्य सरकार ने 518 गोशालाओं के 100 करोड़ रुपये से अधिक के बिजली बिल माफ किए हैं। इनमें अमृतसर जिले की 14 गोशालाएं भी शामिल हैं। यह जानकारी पंजाब गो सेवा आयोग के उपाध्यक्ष कीमती भगत ने जिला प्रशासनिक परिसर में अधिकारियों और गोशाला प्रबंधकों के साथ बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में दी। दरअसल चुनाव से पहले ऐसी खबरें बताती है कि आने वाले समय में सूबे की सियासत अभी और भी कई रंग दिखाएगी।

Friday, September 18, 2026

विधानसभा चुनाव से पहले ग्राउंड से सियासी पंजाबी बातें

पंजाब में विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच राजनीतिक दल अब सिर्फ रैलियों और बैठकों को लेकर ही नहीं सोच रहे हैं बल्कि अब वे ग्राउंड रिपोर्ट कार्ड भी बनाने लगे हैं। हर दल अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि जमीन पर उनकी असली स्थिति क्या है? कौन सा विधानसभा क्षेत्र मजबूत है, कहां पार्टी को नुकसान हो सकता है और किन सीटों पर उम्मीदवार बदलने की जरूरत पड़ सकती है, इसे लेकर सीट-टू-सीट सर्वे कराया जा रहा है। मतलब साफ है, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, ये सभी अपने-अपने स्तर पर पता लगा रहे हैं कि उनकी पार्टी ग्राउंड में कितनी मजबूत है।

गौरतलब है कि पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं। आम आदमी पार्टी के पास फिलहाल 95 सीटें हैं। ऐसे में सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही आप के लिए अपने मौजूदा विधायकों की स्थिति जानना अहम है। वहीं कांग्रेस, बीजेपी और शिअद भी अपने संगठन, संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों की ताकत परख रहे हैं। इन सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर चुनावी रणनीति, उम्मीदवारों और कमजोर सीटों पर फोकस तय किया जा सकता है।

इन सबके बीच यदि आपको पंजाब के चुनावी मुद्दों को समझना है तो प्रदेश के तीन प्रमुख क्षेत्रों की आवोहवा से वाकिफ होना होगा। सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं, मालवा, माझा और दोआबा। दरअसल, इन क्षेत्रों के मतदाताओं के मिजाज पर यहां के स्थानीय मुद्दों का खासा असर पड़ता है।


पंजाब में कुल 117 में से 69 विधानसभा सीटें मालवा क्षेत्र में आती हैं। पंजाब की राजनीति में कहा जाता है कि इसी क्षेत्र से उठी सियासी लहर पंजाब में सत्ता का रुख तय करती है। यही कारण है कि मालवा को पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी कहा जाता है। यह पंजाब का सबसे बड़ा क्षेत्र है और 15 जिलों में फैला हुआ है। प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह, भगवंत मान जैसे दिग्गज नाम इसी क्षेत्र से रहे हैं इसलिए सभी दल मालवा में बेहतर प्रदर्शन के लिए खास रणनीति बनाने में जुट चुके हैं।

साल 2022 के चुनावों की स्थिति देखें तो आप ने मालवा में एकतरफा जीत दर्ज की थी। यहां 69 में से आप को 66, कांग्रेस को 2 व शिरोमणि अकाली दल को एक सीट मिली थी। किसान और किसानी से जुड़े मसले, भूजल और कैंसर बेल्ट, बेरोजगारी व युवाओं का पलायन इस क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे हैं।

अब आपको लेकर चलते हैं माझा का इलाका। अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन और पठानकोट का इलाका माझा क्षेत्र कहा जाता है। यहां कुल 25 विधानसभा सीटें आती हैं। माझा को पंजाब की पंथक और राजनीतिक राजधानी माना जाता है। भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे होने के कारण यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा, तस्करी और रक्षा रणनीति की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। साल 2022 में यहां 25 में से आप ने 16 सीटें, कांग्रेस ने 7, शिअद-भाजपा ने 1-1 सीटें जीती थीं। इस क्षेत्र में आप के समक्ष अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने, जबकि कांग्रेस और शिअद को इस पारंपरिक गढ़ में पंथक और ग्रामीण वोट बैंक को वापस पाने की चुनौती रहेगी। पठानकोट और अमृतसर जैसे शहरी इलाकों में हिंदू-सिख समीकरण साधकर पार्टियां जनाधार जुटाने की तैयारी में हैं। नशाखोरी व सीमा पार तस्करी, सीमावर्ती किसानों व व्यापारियों की समस्याएं यहां प्रमुख मुद्दे हैं।

माझा के बाद सभी की निगाहें दोआबा पर रहती है। सतलुज और ब्यास नदियों के बीच का भूभाग दोआबा सूबे की राजनीति में खास स्थान रखता है। चार जिलों जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर तक फैले इस क्षेत्र में कुल 23 विधानसभा सीटें हैं। साल 2022 में आप ने यहां 10, कांग्रेस ने 9, भाजपा ने 1 व शिअद और बसपा ने 1-1 सीट जीती थीं। इस क्षेत्र में दलित और एनआरआई पंजाबी खासे असरदार रहते हैं। इसलिए दलों का जोर यहां इन दोनों वर्गों को साधने पर रहेगा। दोआबा में दलित वोट बैंक का ध्रुवीकरण, एनआरआई और आव्रजन नीतियां, अवैध खनन और औद्योगिक व बुनियादी विकास सरीखे मुद्दे चुनाव में खासे उछाले जाते रहे हैं।

इन सबके बीच भाजपा ने चुनावी रोडमैप तैयार करना शुरू कर दिया है। नशे के खिलाफ पार्टी मुखर है। भाजपा ने ‘ट्रिपल C’ यानी क्राइम, करप्शन और चिट्टा (ड्रग्स) को केंद्र में रखकर अपने प्रचार अभियान को हॉट पॉलिटिकल टॉपिक बनाने की सोच रही है। इसके साथ ही युवा, रोजगार, कानून-व्यवस्था और जातीय समीकरण पर भी पार्टी जोर देने की तैयारी में है।

दूसरी ओर आम आदमी पार्टी की नवगठित पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) की गुरुवार को पहली बैठक हुई। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उनके आवास पर हुई बैठक में पीएसी से जुड़े पंजाब के नए सदस्य सीएम भगवंत सिंह मान और मंत्री हरपाल सिंह चीमा भी शामिल हुए। मनीष सिसोदिया ने बताया कि बैठक में मुख्य रूप से पंजाब, गोवा और गुजरात में होने वाले चुनावों को जितने को लेकर गहन मंथन हुआ। उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता भगवंत सिंह मान के काम से बेहद खुश है और उन्हें दोबारा बतौर मुख्यमंत्री देखना चाहती है, जबकि गोवा और गुजरात की जनता भाजपा के कुशासन से त्रस्त हो चुकी है और अब बदलाव चाहती है।

हर दल के बड़े नेता अब पंजाब की तरफ नजर लगाए हुए हैं, आने वाले दिनों में चुनावी अभियानों से जुड़ी खबरें खूब सामने आएगी लेकिन असल बात तो वही है कि सत्ता में आम आदमी पार्टी वापसी कर पाएगी या फिर पंजाब की जनता कांग्रेस या फिर भाजपा को मौका देगी।

देखिए, आने वाले दिनों में पंजाब में क्या होता है, फिलहाल ग्राउंड की कहानी यही है कि सियासी रणनीतिकार सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्रों मालवा, माझा व दोआबा के लिए अलग-अलग चुनावी रणनीति बनाने में जुटे हैं। 

Saturday, September 05, 2026

यहां बातचीत कन्नड़ या अंग्रेजी में नहीं, बल्कि संस्कृत में होती है!



कर्नाटक में एक ऐसा गांव है, जहां आज भी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत की भाषा संस्कृत है! इस गांव का नाम है मत्तूर। राजनीति की कथा कहानियों से कोसों दूर आज हम आपको इसी गांव की कहानी सुनाने जा रहे हैं। 
मत्तूर गांव कर्नाटक के शिमोगा जिले में स्थित है, जो बेंगलुरु से करीब 320 किलोमीटर की दूरी पर है। यह गांव तुंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहाँ के निवासियों की मातृभाषा ‘संकेथी’ होने के बावजूद, दैनिक बोलचाल में संस्कृत का व्यापक उपयोग किया जाना यहाँ की विलक्षणता को दर्शाता है।

मत्तूर की संस्कृत परंपरा का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में राजा कृष्ण देव राय ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए मत्तूर गांव को केंद्र बनाया था। हालांकि आधुनिक दौर में यह भाषा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी, लेकिन गांव के बुजुर्गों के मुताबिक साल 1981 से गांव ने संस्कृत को फिर से अपनाना शुरू किया और तभी से यह भाषा यहां की पहचान बन गई।

वैदिक जड़ों की ओर वापसी का सफर 1981 में शुरू हुआ, जब शास्त्रीय भाषा को बढ़ावा देने वाली संस्था संस्कृत भारती ने मत्तूर में 10 दिवसीय संस्कृत कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें पास के उडुपी स्थित पेजावर मठ के संत समेत कई अन्य लोग शामिल हुए। ग्रामीणों को संस्कृत को संरक्षित करने के इस अनूठे प्रयोग में उत्साहपूर्वक भाग लेते देख संत ने कहा, “एक ऐसी जगह जहाँ लोग संस्कृत बोलते हैं, जहाँ पूरे घर संस्कृत में बात करते हैं! आगे क्या? एक संस्कृत गाँव!” मत्तूर के निवासियों ने इस आह्वान को दिल से स्वीकार कर लिया। इस तरह संस्कृत गाँव की प्रमुख भाषा बन गई।

माना जाता है कि मत्तूर में संस्कृत के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में वहां की स्थानीय धार्मिक और शैक्षिक परंपराओं ने अहम भूमिका निभाई है। इस गांव में वैदिक और संस्कृत शिक्षा की पुरानी परंपरा रही है। बच्चों को कम उम्र में ही संस्कृत से परिचित कराया जाता है, और कई परिवार अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में इसका इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे दौर में जब संस्कृत को अक्सर सिर्फ़ प्राचीन ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है, मत्तूर गांव यह दिखाता है कि सांस्कृतिक और शैक्षिक पहलों के ज़रिए किसी भाषा को पीढ़ियों तक कैसे जीवित रखा जा सकता है। 

मत्तूर गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो चीज हैरान करती है, वह है यहां के लोगों का संस्कृत में सहज बातचीत करना। गांव के बच्चे, बुजुर्ग और जवान सभी धाराप्रवाह संस्कृत में बात करते हैं। बाजार में सामान खरीदना हो, खेत में काम करना हो या फिर घर की आम बातचीत, यहां सब कुछ संस्कृत में ही होता है.। गांव में प्रवेश करते ही माहौल भी अलग महसूस होता है, यहां के लोगों की वेशभूषा और रहन-सहन भी परंपरागत भारतीय संस्कृति की झलक देते हैं।

मत्तूर में सब्जी विक्रेता से लेकर पुजारी तक, हर कोई संस्कृत समझता है। अधिकांश लोग धाराप्रवाह संस्कृत बोलते भी हैं। नदी किनारे वैदिक मंत्रों का पाठ करते बुजुर्गों का समूह और उनके पास से साइकिल पर तेजी से गुजरते हुए कुछ युवकों का प्राचीन भाषा में मोबाइल फोन पर बातचीत करते हुए निकलना कोई असामान्य बात नहीं है।

मत्तूर एक कृषि प्रधान गाँव है जहाँ मुख्य रूप से सुपारी और धान की खेती होती है। यहाँ संकेठी समुदाय के लोग रहते हैं, जो एक प्राचीन ब्राह्मण समुदाय है। यह समुदाय लगभग 600 वर्ष पूर्व केरल से आकर मत्तूर में बस गया था। संस्कृत के अलावा, वे संकेठी नामक एक दुर्लभ बोली भी बोलते हैं, जो संस्कृत, तमिल, कन्नड़ और तेलुगु के कुछ अंशों का मिश्रण है। संकेठी बोली की कोई लिखित लिपि नहीं है और इसे देवनागरी लिपि में पढ़ा जाता है।

हमारे एक पत्रकार साथी ने बताया कि मत्तूर ने 30 से अधिक संस्कृत प्रोफेसर तैयार किए हैं जो कुवेम्पु, बेंगलुरु, मैसूर और मैंगलोर विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। मत्तूर कई प्रतिष्ठित हस्तियों का गृह ग्राम भी है, जिनमें भारतीय विद्या भवन, बैंगलोर के मथुर कृष्णमूर्ति, वायलिन वादक वेंकटराम औरगामाका प्रतिपादक एचआर केशवमूर्ति शामिल हैं।

भाषा और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए, मत्तूर भारत में घूमने की एक दिलचस्प जगह है।

Friday, August 21, 2026

उत्तर-बंग के दौरे पर अमित शाह, सीमा सुरक्षा पर फोकस !




कांग्रेस के साथ वंदे मातरम विवाद के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल के दौरे पर गुरुवार रात सिलीगुड़ी पहुंचे। उनका यह दौरा मुख्य रूप से सीमा सुरक्षा और प्रशासनिक समीक्षा पर केंद्रित है।
गृह मंत्री के इस दौरे को रणनीतिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए बेहद संवेदनशील इलाका है। यही संकरा गलियारा देश के पूर्वोत्तर राज्यों को बाकी भारत से जोड़ता है। ऐसे में यहां सीमा सुरक्षा, निगरानी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

इस अहम दौरे में अमित शाह सशस्त्र सीमा बल के जवानों से मुलाकात करेंगे, सीमा सुरक्षा परियोजनाओं की शुरुआत करेंगे और साथ ही सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल, खुफिया एजेंसियों व राज्य अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करेंगे। यह एक महीने में शाह का सिलीगुड़ी का दूसरा दौरा है।

गृह मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस दौरे का सबसे अहम फोकस देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन को मजबूत करना और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करना है। गृह मंत्री सिलीगुड़ी में उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करेंगे, जिसमें सीमा सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की समीक्षा की जाएगी।

गृह मंत्री अपने दौरे के पहले दिन शुक्रवार को सीमा सुरक्षा और सीमा प्रबंधन से जुड़े कई कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान सीमा सुरक्षा को मजबूत करने वाली विभिन्न परियोजनाओं का उद्घाटन और कई परियोजनाओं की आधारशिला रखे जाने का कार्यक्रम है।

इन परियोजनाओं का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करना, सुरक्षा बलों की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाना और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। सरकार लगातार देश की सीमाओं पर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, निगरानी व्यवस्था और तकनीकी क्षमता विकसित करने पर जोर दे रही है।

गृह मंत्री अपने दौरे के दौरान सशस्त्र सीमा बल यानी SSB के जवानों से भी मुलाकात करेंगे। SSB भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालता है।

गौरतलब है कि SSB भारत-नेपाल की करीब 1,751 किलोमीटर लंबी और भारत-भूटान की करीब 699 किलोमीटर लंबी सीमा की सुरक्षा करता है। दोनों सीमाएं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और सिलीगुड़ी क्षेत्र इन सीमाओं के व्यापक सुरक्षा नेटवर्क का अहम हिस्सा है। भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा पर सुरक्षा की चुनौती अन्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से कुछ अलग है। इन सीमाओं पर लोगों की आवाजाही, भौगोलिक परिस्थितियां और खुली सीमा की प्रकृति सुरक्षा एजेंसियों के लिए अलग तरह की चुनौतियां पैदा करती हैं। ऐसे में इंटेलिजेंस इनपुट, स्थानीय स्तर पर समन्वय, निगरानी और तकनीकी संसाधनों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।


नजर चिकन नेक’ पर


सिलीगुड़ी कॉरिडोर को आम बोलचाल में ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। यह भारत के नक्शे में एक संकरा भू-भाग है जो देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों को भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इसकी रणनीतिक स्थिति इसे देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल करती है। ये कॉरिडोर लगभग 60 किलोमीटर लंबा और करीब 22 किलोमीटर तक चौड़ा बताया जाता है। इसके आसपास भारत की कई अंतरराष्ट्रीय सीमाएं हैं। एक तरफ बांग्लादेश, दूसरी तरफ नेपाल और भूटान तथा उत्तर में तिब्बत क्षेत्र है। इस वजह से सिलीगुड़ी कॉरिडोर का महत्व केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि ये पूरे पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। पूर्वोत्तर के आठ राज्यों तक सड़क और रेल संपर्क के लिए यह क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी भी आपात स्थिति में इस कॉरिडोर की सुरक्षा और निर्बाध कनेक्टिविटी बेहद अहम हो जाती है।

यही कारण है कि केंद्र सरकार यहां इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा दोनों को लेकर लगातार समीक्षा करती रही है। अमित शाह की बैठक में सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा व्यवस्था, सीमा क्षेत्रों में निगरानी और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय प्रमुख मुद्दों में हैं।



अमित शाह का पश्चिम बंगाल दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है, जब भारत की पूर्वी सीमा पर सुरक्षा और बॉर्डर मैनेजमेंट लगातार केंद्र सरकार की प्राथमिकता में है। पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसके अलावा राज्य का उत्तरी हिस्सा नेपाल और भूटान की सीमाओं के करीब है।

इस लिहाज से सिलीगुड़ी में होने वाली बैठक का दायरा केवल भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा तक सीमित नहीं माना जा सकता। पूरे पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था, सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय भी चर्चा का हिस्सा बन सकता है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार की रणनीति अब सीमा सुरक्षा को मल्टी-लेयर सिक्योरिटी मॉडल के तहत मजबूत करने की है। इसमें भौतिक सुरक्षा के साथ-साथ तकनीकी निगरानी, बेहतर सड़क और संचार नेटवर्क, इंटेलिजेंस इनपुट और एजेंसियों के बीच तत्काल सूचना साझा करना शामिल है।

अमित शाह के दौरे का एजेंडा केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। वह सिलीगुड़ी में तीन नए आपराधिक कानूनों पर आधारित एक प्रदर्शनी का भी उद्घाटन करेंगे। इन तीन कानूनों में भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) शामिल हैं। इन कानूनों ने औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे पुराने आपराधिक कानूनों की जगह ली है और एक जुलाई 2024 से लागू हुए हैं।

प्रदर्शनी के जरिए नए कानूनों के प्रमुख प्रावधानों और उनके महत्व की जानकारी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। केंद्र सरकार देशभर में इन कानूनों को लेकर जागरूकता अभियान चला रही है, ताकि आम नागरिकों के साथ-साथ पुलिस, जांच एजेंसियों और न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों को इनके प्रावधानों की जानकारी हो।

अमित शाह की बैठक का एक अहम पहलू विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय भी है। सिलीगुड़ी जैसे रणनीतिक इलाके में ये समन्वय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

गृह मंत्री की बैठक में सुरक्षा एजेंसियों की मौजूदा तैयारियों के साथ भविष्य की चुनौतियों से निपटने की रणनीति पर भी चर्चा होने की संभावना है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर का सीधा संबंध सुरक्षा से है। मजबूत सड़क और संचार नेटवर्क न केवल आम लोगों की कनेक्टिविटी बेहतर करते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सुरक्षा बलों की तेज आवाजाही और लॉजिस्टिक सपोर्ट में भी मदद करते हैं।

अमित शाह के दौरे के दौरान जिन परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास होगा, उन्हें इसी व्यापक बॉर्डर सिक्योरिटी रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।

अमित शाह का ये दौरा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। एक तरफ भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे SSB की तैयारियों की समीक्षा होगी। वहीं, दूसरी तरफ रणनीतिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा व्यवस्था पर भी नजर रहेगी। इसके अलावा बांग्लादेश सीमा से जुड़े व्यापक सुरक्षा परिदृश्य, पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी और सीमा क्षेत्रों में चल रही परियोजनाओं की प्रगति भी इस दौरे को महत्वपूर्ण बनाती है। कुल मिलाकर अमित शाह का सिलीगुड़ी दौरा ‘बॉर्डर सिक्योरिटी, बेहतर कॉर्डिनेशन और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ की केंद्र सरकार की रणनीति का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है।




Friday, August 14, 2026

महज 13 की उम्र में सीने पर खाई गोली, कहानी बिहार के बाल शहीदों की

आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं और लोकतंत्र में अपनी बात रखने की आजादी का अधिकार रखते हैं, उसके पीछे लाखों स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष, त्याग और बलिदान छिपा है। हजारों क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर झूले और असंख्य लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएं सहीं। लेकिन यह भी सच है कि इनमें से कई क्रांतिकारियों को हम सबने भूला दिया है। आज इस बात की आवश्यकता है कि हम अपने अंचल के उन लोगों की स्मृति को नमन करें जिनके बलिदान की वजह से हम सब को आजादी मिली।
बिहार के सीमांचल इलाके के इन्हीं गुमनाम और समर्पित सेनानियों की संघर्षगाथा आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं। जिस प्रकार अमर शहीद खुदीराम बोस ने कम उम्र में ही देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे, उसी प्रकार मात्र 13 वर्ष की अल्प आयु में 13 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश गोलियों का सामना करते हुए ध्रुव कुंडू ने कटिहार-पूर्णिया क्षेत्र में अद्वितीय शौर्य और बलिदान का परिचय दिया था।

देश की स्वतंत्रता के लिए 13 वर्ष की उम्र में बलिदान देने वाले अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में गुरुवार को पूर्णिया शहर में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

पूर्णिया शहर के ध्रुव उद्यान में अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहरवासियों ने हिस्सा लेकर ध्रुव कुंडू के साहस, संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए बलिदान को याद किया। कार्यक्रम के आयोजक, युवा सामाजिक कार्यकर्ता एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी शौर्य राय ने कहा कि ध्रुव कुंडू की स्मृति में शुरू की गई यह पहल किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्णिया के नागरिकों की साझी भावना है। उन्होंने कहा कि जिस बालक ने 13 वर्ष की उम्र में देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, उसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।

ध्रुव कुंडू का जन्म 1929 में कटिहार, बिहार के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉक्टर किशोरीलाल कुंडू के घर हुआ था। देशभक्त पिता का यह बेटा बचपन से ही अंग्रेज विरोधी गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता था| 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उनकी उम्र केवल 13 वर्ष थी फिर भी इन्होंने अंग्रेजों के प्रतिकार के लिए अपनी एक टोली बनाई| 11 अगस्त 1942 को ध्रुव के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने “रजिस्ट्री कार्यालय” के दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया। 13 अगस्त 1942 को कटिहार नगर के सब रजिस्ट्रार का कार्यालय भी उन्होंने ध्वस्त करा दिया| उन्होंने मुंसिफ कोर्ट सहित कई सरकारी दफ्तरों से अंग्रेजी हुकूमत के झंडे उखाड़ दिए और वहां भारतीय तिरंगा फहरा दिया। जब ध्रुव के नेतृत्व में क्रान्तिकारी दल मुंसिफ कोर्ट पर तिरंगा फहरा कर आगे बढ़ रहा था तो अंग्रेजों ने प्रतिकार के लिए क्रान्तिकारियों पर गोलियां चला दी| ध्रुव कुंडू घायल हो गए और उन्हें पूर्णिया सदर अस्पताल ले जाया गया लेकिन मात्र 13 वर्ष की उम्र में ही ध्रुव कुंडू ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

अपने वीर सपूत के बलिदान दिवस पर भले कुछ लोग हर साल अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करते हों, लेकिन उनकी यादों को सहेजने के लिए उनके नाम पर बने ध्रुव कुंडू स्मारक और पार्क अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

जिस उम्र में बच्चे खेलने कूदने में मस्त रहते उस उम्र में 13 वर्षीय ध्रुव कुंडू महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन में कूद पड़े थे। 1942 का यह आंदोलन 13 अगस्त तक आजादी की लहर बनकर फैल चुकी थी। जब गांधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन और करो या मरो का नारा दिया था तो पूर्णिया में भी हजारों लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम छेड़ दिया था। इस दौरान धमदाहा में 25 अगस्त को हजारों लोगों की भीड़ ने धमदाहा और रुपौली थाना को घेरकर आग लगा दिया था। इस घटना में अंग्रेजों की तरफ से अंधाधुंध गोली चलाई गयी थी, जिसमें धमदाहा में 14 और रुपौली में सात सपूत शहीद हुये थे।

आज भी पूर्णिया के टाउन हॉल, धमदाहा और रुपौली में बने शहीद स्मारक में इन शहीदों का नाम लिखा हुआ है। इसके अलावा 1942 में शहीद हुये 13 वर्षीय कुताय साह और ध्रुव कुंडू का भी स्मारक बना है। लेकिन, आज ये सभी स्मारक और शहीद स्थल उपेक्षा का शिकार होकर गुमनामी की कगार पर हैं।

पूर्णिया के इन शहीदों के बारे में बताया जाता है कि 9 अगस्त 1942 को पूर्णिया शहर के सिपाही टोला के पास 13 साल के बच्चा कुताय साह के साथ सैकड़ों लोग जब स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेजों का विरोध कर रहे थे। उस समय अंग्रेज अधकारी ने कुताय साह को चेतावनी दी। लेकिन, निडर कुताय साह ने अपनी शर्ट का बटन खोलकर अंग्रेजों को ललकारते हुये आगे बढ़ गए और कहा कि चलाओ गोली। तभी अंग्रेज अधिकारी ने उनके सीने में गोली मार दी जिस कारण वह वहीं शहीद हो गए। इसके बाद ध्रुव कुंडू को भी अंग्रेजों ने गोली मार दी। दोनों शहीदों के शव को मधुबनी महावीर मंदिर के प्रांगण में लाया गया जहां उनके नाम पर ध्रुव कुताय उद्यान बना है। लेकिन यह ऐतिहासिक धरोहर बदहाली और उपेक्षा का शिकार है।

सिपाही टोला मे बने कुताय साह स्मारक और बनभाग में बने ध्रुव कुन्डू का स्मारक भी जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। 

गुरुवार को पूर्णिया में अमर शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में स्थानीय लोगों की भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि लोग अपने अंचल की स्मृति को मिटने नहीं देंगे। 

कार्यक्रम के आयोजक शोधार्थी Shourya Roy ने बताया कि पूर्णिया और सीमांचल क्षेत्र के जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया है, उन्हें इतिहास और सार्वजनिक स्मृति में उनका वाजिब स्थान मिलना चाहिए। स्थानीय इतिहास और नायकों को संजोने से न केवल क्षेत्रीय पहचान मजबूत होती है, बल्कि युवाओं में देशप्रेम की भावना भी बलवती होती है।


Friday, August 07, 2026

संसद में जारी गतिरोध खत्म हो पाएगा?





मौजूदा मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए केंद्र सरकार अपनी अंतिम कोशिशों में जुट गई है। संसद में जारी गतिरोध खत्म करने के लिए संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने तीन दिन में तीसरी बार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से बात कर मनाने का प्रयास किया।

जैसा कि हम सभी को पता है कि इस सत्र में अभी तक लोकसभा में एक भी प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका है। पांच बिल पास हुए हैं, लेकिन बिना चर्चा के। यहां तक कि जब लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पेश किया गया, तब भी वक्त का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया। भले ही बिल पास हो रहे हों और सरकार अपने विधायी कार्य आगे बढ़ा रही हो, लेकिन यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। संसदीय परंपरा में बहस और चर्चा सदन की कार्यवाही के सबसे जरूरी अंग हैं। इसी से बेहतरी का रास्ता मिलता है।

सूत्रों के अनुसार, नीट पेपर लीक आंदोलन में बल प्रयोग पर गृह मंत्री अमित शाह संसद में बयान दे सकते हैं, जिसके बाद गतिरोध खत्म होने की उम्मीद है। हालांकि,  नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुरानी शर्तों को दोहराते हुए इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की सलाह दी है। वहीं, राज्यसभा के सभापति ने भी रिजिजू से गतिरोध तोड़ने के लिए विपक्ष की भावनाएं शाह तक पहुंचाने को कहा है।

विपक्ष अगर गतिरोध तोड़ने पर राजी हो जाता है, तो सरकार की रणनीति मानसून सत्र का कार्यकाल बढ़ाने या स्वतंत्रता दिवस के तत्काल बाद विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन व महिला आरक्षण का रास्ता साफ करने की है। सरकार के सूत्रों का कहना है कि इसके लिए जरूरी दो तिहाई सांसदों के समर्थन का रोडमैप तैयार है। डीएमके और एनसीपी (एसपी) ने सरकार को सकारात्मक संदेश दिया है। उधर, तमिलनाडु के सीएम विजय ने परिसीमन और इसके प्रभाव पर चर्चा के लिए आठ अगस्त को राज्य के सभी सांसदों की बैठक बुलाई है।

हालांकि, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू की दो दिनों की बातचीत के बाद भी संसद में सरकार और कांग्रेस के बीच गतिरोध बरकरार है। इन सबके बीच कयास लगाए जा रहे हैं कि गृह मंत्री  अमित शाह आज संसद में विपक्ष के सवालों के जवाब दे सकते हैं जिसके बाद संसद में गतिरोध खत्म होने के आसार हैं।

दूसरी ओर राहुल गांधी विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) और महिला आरक्षण व परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर सर्वदलीय बैठक की मांग पर अड़ गए हैं।

सर्वदलीय बैठक की जरूरत को नकारते हुए सरकार का कहना है कि सभी दलों से बात हो चुकी है। एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि इन विधेयकों को पास कराने के लिए अगले एक-दो दिनों में फैसला ले लिया जाएगा।

गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो रहा है। ऐसे में अगला हफ्ता अहम हो सकता है। दरअसल विपक्ष और खासतौर पर कांग्रेस के साथ चल रहे गतिरोध को दूर करने के लिए सरकार की ओर से बुधवार को गंभीर पहल शुरू हुई।

रिजीजू और राहुल गांधी की लगभग 50 मिनट तक हुई मुलाकात में नेता प्रतिपक्ष ने सहयोगी दलों से सलाह-मशविरा के लिए समय मांगा।

गुरुवार को विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए के घटक दलों की बैठक में सरकार की पहल पर विस्तार से चर्चा हुई, जिसमें सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला लिया गया। फिर रिजीजू और राहुल गांधी के बीच फोन पर बातचीत हुई। इसमें नेता प्रतिपक्ष ने सर्वदलीय बैठक बुलाने की विपक्ष की मांग रखी।

उधर, रिजीजू का कहना था कि सरकार की पहले ही सभी दलों से बातचीत हो चुकी, सिर्फ कांग्रेस से वार्ता बाकी है। दरअसल तीनों विधेयकों की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार इन्हें बिना चर्चा के पास कराने के पक्ष में नहीं है, लेकिन कांग्रेस के रवैये के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है। सरकार इन विधेयकों से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत कर उनकी आशंकाओं को दूर करने का प्रयास कर रही है।

सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल कांग्रेस के विरोध के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों को रोका नहीं जा सकता है। हंगामे के बीच लोकसभा और राज्यसभा दोनों से कई विधेयक पारित किए जा चुके हैं।

वर्तमान मानसून सत्र के केवल पांच कार्यकारी दिन बचे हैं, ऐसे में सत्र का कार्यकाल बढ़ाने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। सूत्रों का दावा है कि सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा हो गया है। लेकिन सदन में वोटिंग के लिए सही माहौल बनाने में विपक्ष के सहयोग की आवश्यकता होगी।

एक अटकल यह भी है कि यदि सरकार ने परिसीमन पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया तो इसे पहले राज्यसभा में पेश किया जा सकता है जहां सरकार के लिए संख्या बल जुटाना अपेक्षाकृत आसान है। ऐसा माना जा रहा है कि इस मामले में अंतिम निर्णय शुक्रवार यानि आज लिया जा सकता है।

इन सबके बीच गृहमंत्री अमित शाह संसद भवन लगातार आ रहे हैं और अधिकारियों संग बैठक कर रहे हैं। बिते दिनों अमित शाह ने एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों पर फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने की पहल शुरू की। इस सिलसिले में उन्होंने ईसाई समुदाय से जुड़े विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर चर्चा की।

इसके पहले शाह कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस आफ इंडिया के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर चुके हैं। संसद भवन परिसर में हुई मुलाकात में ईसाई प्रतिनिधिमंडल ने एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अपनी आशंकाओं को खुलकर रखा।

सूत्रों के अनुसार शाह ने उनकी आशंकाओं को दूर करते हुए कहा कि प्रस्तावित संशोधनों के बारे में कई तरह से दुष्प्रचार किए जा रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि संशोधनों में ईसाई सहित सभी समुदायों के हितों का ख्याल रखा है।

उन्होंने इन संसोधनों की जरूरत के बारे में भी विस्तार से बताया। शाह ने कहा कि सरकार की कोशिश सिर्फ विदेशी अनुदान में पारदर्शिता लाने और उन्हें सुचारू बनाने की है। सूत्रों के अनुसार एफसीआरए बिल पर सदन में 12 अगस्त को चर्चा हो सकती है।



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Girindra Nath Jha
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Friday, July 31, 2026

न विधायक न MLC, फिर कैसे मंत्री बने हुए हैं?

क्या कोई व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने लंबे समय तक मंत्री बना रह सकता है? क्या संविधान में दी गई 6 महीने की छूट को बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है? यह वैधानिक सवाल इन दिनों देश के सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया है।

बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश के मामले में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने साफ कहा कि यह पूरी तरह कानून की व्याख्या का मामला है और राज्य सरकार को बताना होगा कि कोई व्यक्ति छह महीने से अधिक समय तक निर्वाचित हुए बिना मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है। इस टिप्पणी के बाद बिहार की राजनीति के साथ-साथ संवैधानिक मामलों के जानकारों की नजर भी इस मामले पर टिक गई है।

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को बिहार के मंत्री दीपक प्रकाश से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से सवाल करते हुए कहा कि बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं है। फिर भी वह 6 महीने से ज्यादा समय से अपने पद पर कैसे बने हुए हैं।

याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत से याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि छह महीने से ज्यादा समय बीत चुका है। दीपक प्रकाश न विधायक हैं और न ही एमएलसी, इसके बावजूद वह मंत्री पद पर बने हुए हैं। वकील ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में दखल लेने की अपील करते हुए कहा, 'माई लॉर्ड, अब छह महीने से ज़्यादा हो गए हैं। वह मंत्री बने हुए हैं।'

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से कानून से जुड़ा है। राज्य सरकार को यह बताना होगा कि दीपक प्रकाश कुशवाहा, जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, वो किस संवैधानिक आधार पर छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री पद पर बने हुए हैं? मंत्री बने रहने की अनुमति देने का संवैधानिक आधार क्या है।

यह याचिका दीपक प्रकाश के राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य न होने के बावजूद बिहार के पंचायती राज मंत्री के तौर पर बने रहने की संवैधानिक वैधता से जुड़ी है।

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता और व्हिसलब्लोअर राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर बिहार सरकार को नोटिस जारी किया था। याचिका में बिहार में नई सम्राट सरकार बनने के बाद दीपक प्रकाश की मंत्री के तौर पर दोबारा नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) से जुड़ा एक अहम संवैधानिक सवाल उठाया गया है, जो किसी ऐसे व्यक्ति को, जो विधायक नहीं है, अधिकतम छह महीने तक मंत्री के तौर पर काम करने की अनुमति देता है; इस अवधि के भीतर उस व्यक्ति को विधायिका का सदस्य बनना ज़रूरी होता है।

क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 15 अप्रैल, 2026 को पद छोड़ने से पहले दीपक प्रकाश ने पंचायती राज मंत्री के रूप में चार महीने और 26 दिनों तक कार्य किया, जिसके साथ ही उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।

इसके बाद अगले 22 दिनों तक उन्होंने कोई भी मंत्री पद नहीं संभाला। 7 मई, 2026 को सम्राट चौधरी द्वारा नई सरकार बनाने के बाद, प्रकाश ने निर्वाचित न होने के बावजूद फिर से मंत्री पद की शपथ ली।

इसके बाद 30 मई को दायर याचिका में उनकी नियुक्ति को अमान्य घोषित करने की मांग की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह संविधान के साथ धोखाधड़ी है। क्योंकि, दीपक प्रकाश अब तक कुल मिलाकर छह महीने से अधिक समय से पद पर बने हुए हैं, जबकि वे किसी भी सदन के लिए निर्वाचित नहीं हुए हैं।

क्या कहता है कानून?
अनुच्छेद 164(4) प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री द्वारा नियुक्त किए जाने पर मंत्रियों को निर्वाचित होने के लिए छह महीने की छूट अवधि प्रदान करता है। इसमें कहा गया है, "कोई भी मंत्री जो लगातार छह महीनों की अवधि के लिए राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।"

इसलिए, यदि कोई मंत्री छह महीने की अवधि के भीतर निर्वाचित नहीं होता है, तो उसे पद से इस्तीफा देना होगा।

क्यों अलग है बिहार का मामला?
बिहार का मामला इसलिए अलग है क्योंकि मंत्री दीपक प्रकाश ने लगातार छह महीने तक पद पर कार्य नहीं किया है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में वे चार महीने और 26 दिन तक मंत्री रहे, जो छह महीने की छूट अवधि के भीतर था। इसके बाद सीएम स्रमाट चौधरी द्वारा फिर से नियुक्त किए जाने के बाद से दीपक प्रकाश ने कुछ महीने ही सेवा की है। लेकिन कुल मिलाकर, वे बिना निर्वाचित हुए छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर बने रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल
बता दें कि किसी मंत्री के पदभार ग्रहण करने के महीनों बाद उसे निर्वाचित कराने की प्रथा अपने आप में विवादास्पद नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी मंत्री के लिए छह महीने की समय सीमा से पहले इस्तीफा देना, कुछ दिनों बाद फिर से पदभार ग्रहण करना और यह दावा करना कि छह महीने की अवधि नए शपथ ग्रहण की तारीख से फिर से शुरू हो जाएगी, यह कानूनी रूप से कितना सही है?

आने वाले 4 अगस्त को दीपक प्रकाश केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल एक मंत्री की कुर्सी का फैसला नहीं होगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि क्या छह महीने की संवैधानिक छूट दोबारा ली जा सकती है या नहीं। यदि कोर्ट कहती है कि दोनों कार्यकाल जोड़कर अवधि गिनी जाएगी तो भविष्य में कोई भी सरकार इस तरह की नियुक्ति नहीं कर सकेगी। वहीं यदि कोर्ट नई शपथ के साथ नई छह महीने की अवधि मानती है तो यह संविधान की नई न्यायिक व्याख्या होगी, ऐसे में 4 अगस्त की सुनवाई पर सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक और कानूनी नजरें टिकी रहेंगी।