पिछले दिनों गृह मंत्री अमित शाह बंगाल के नादिया जिले के मायापुर गए, जो भक्ति आंदोलन का उद्गम स्थल है। अमित शाह ने मतुआ महासंघ के संस्थापक हरिचंद ठाकुर और उनके पुत्र गुरुचंद ठाकुर तथा वैष्णव संत भक्तिसिद्धांत सरस्वती जैसे समाज सुधारकों की जमकर प्रशंसा की।
अमित शाह ने अपनी इस यात्रा में एसआईआर से जुड़ी राजनीति को दरकिनार करते हुए आध्यात्मिक बातें की। वहीं इस इलाके की राजनीति पर यदि ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्ट नजर आता है कि नादिया जिले के सातों विधानसभा सीटों पर इस भक्ति समागम का खास महत्व है।
शाह ने यहां एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि हरिचंद और गुरुचंद ठाकुर तथा संपूर्ण मतुआ समाज ने सामाजिक कल्याण के विचार को आगे बढ़ाया। उन्होंने समुदाय के भीतर अस्पृश्यता के विरुद्ध उनके अभियान और शिक्षा एवं लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के प्रयासों का विशेष रूप से उल्लेख किया।
वहीं इस यात्रा के बहाने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर तृणमूल कांग्रेस ने जुबानी हमला बोला है। पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ पार्टी ने कहा कि भाजपा नेताओं को अब राम का नाम लेने में भी दिक्कत हो रही है।
अमित शाह के दिल्ली लौटने के बाद अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) ने अपने ऑफिशियल X हैंडल @AITCofficial पर 21 सेकेंड का एक वीडियो शेयर किया। यह वीडियो इस्कॉन के कार्यक्रम में भाषण दे रहे अमित शाह का है। वीडियो में अमित शाह ‘हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे…’ कह रहे हैं। इस महामंत्र का वहां मौजूद लोग भी जप करते हैं।
इसी वीडियो का एक हिस्सा काटकर तृणमूल कांग्रेस ने पोस्ट किया और लिखा- अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को भगवान राम का नाम लेने में भी दिक्कत हो रही है? टीएमसी ने आगे कहा- मायापुर में अमित शाह ने हरे कृष्ण महामंत्र का जप किया. शुरू की 2 लाइनों के बाद वह चुप हो गये. पार्टी ने पूछा कि ऐसा अज्ञानता में हुआ या उदासीनता की वजह से उन्होंने ऐसा किया?
तृणमूल कांग्रेस ने लिखा है कि 15वीं सदी में भक्ति आंदोलन के दौरान श्री श्री चैतन्य महाप्रभु के दौर में हरे कृष्ण महामंत्र उभरकर सामने आया। नदिया की पवित्र भूमि पर खड़े होकर, जो भूमि हमेशा श्री श्री चैतन्य महाप्रभु से जुड़ी हुई है, इस तरह का आधा-अधूरा आह्वान या तो समझ की कमी को दर्शाता है या श्रद्धा की कमी?
इस पर भाजपा ने कहा कि कोई मूर्ख ही ऐसी बात कर सकता है। जिसे धर्म का कोई ज्ञान नहीं, वही राम और कृष्ण को अलग-अलग समझ सकता है। गौरतलब है बुधवार को एक दिन के पश्चिम बंगाल दौरे पर आये अमित शाह नदिया जिले के मायापुर में थे। उन्होंने इस्कॉन मंदिर में भक्ति सिद्धांत सरस्वती ठाकुर की 152वीं जयंती पर आयोजित समारोह में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे का जप किया।
भक्तिसिद्धांत सरस्वती की 152वीं जयंती के अवसर पर अतिथि के रूप में उपस्थित अमित शाह ने कहा कि वह मायापुर में गृह मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि भारत और विदेश में 64 गौड़ीय मठों की संस्थापक के भक्त के रूप में आए हैं।
समारोह में उपस्थित लोगों को प्रधानमंत्री मोदी का हरे कृष्णा संदेश देते हुए शाह ने कहा, 'जब भी कोई विदेशी अतिथि मोदी जी से मिलने आता है, तो वे उन्हें भगवद गीता की एक प्रति भेंट करते हैं। भक्ति आंदोलन का केंद्र नादिया था और आने वाले दिनों में इसका विस्तार होगा। मुझे विश्वास है कि हम विकसित भारत और सनातन धर्म का संदेश विश्व तक पहुंचाने में सक्षम होंगे।'
अमित शाह की इस यात्रा को दक्षिणी पश्चिम बंगाल के बड़े हिस्से में प्रभावशाली समुदाय मतुआ महासंघ के साथ भाजपा के संबंधों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
दरअसल बंगाल की राजनीति में नदिया और मतुआ समीकरण का विशेष महत्व है। इस बात को हर पार्टी समझती है। नदिया जिले की सीटें नवद्वीप, नदिया उत्तर, नदिया दक्षिण और मतुआ प्रभावित उप‑क्षेत्र हमेशा चुनावी गणित तय करने में बड़ी भूमिका निभाते रहे हैं।
जैसा कि हम सब जानते हैं कि मतुआ समुदाय का इतिहास 200 साल से ज्यादा पुराना है। इसकी स्थापना हरिचंद ठाकुर ने की थी। तभी से यह समुदाय राजनीति के साथ गहराई से जुड़ा रहा है। आज़ादी के बाद प्रमथ रंजन ठाकुर हों, उनके निधन के बाद उनकी पत्नी बीणापाणि देवी, या फिर आज उनके बेटे और पोते – यह परिवार और समुदाय के चेहरे हमेशा बंगाल की राजनीति में अहम भूमिका निभाते रहे हैं।
मतुआ समुदाय बंगाल में बसे बंगाली हिंदुओं का बड़ा और संगठित वोटर समूह है। इस समुदाय का राजनीतिक झुकाव सीधे चुनाव परिणाम पर असर डालता है। मतुआ समुदाय की धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से भावनात्मक जुड़ाव बेहद गहरा है। ऐसे में अमित शाह का इस जयंती समारोह में आना राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी इस समुदाय तक अपना संवाद और मजबूत करना चाहती है।
नदिया जिला में सात विधानसभा सीट हैं। यदि इन सभी सीटों पर कोई एक दल ढंग से काम करे तो चुनावी हवा का रुख बदला जा सकता है। यही वजह है कि भाजपा और टीएमसी, दोनों ही पार्टियां इस पूरे क्षेत्र पर फोकस बढ़ा चुकी हैं।
जहां एक ओर भाजपा धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव के जरिए समुदाय को साधने की कोशिश कर रही है, वहीं टीएमसी अपने स्थानीय संगठन और मौजूदा समर्थन के आधार का सहारा ले रही है।