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Monday, November 22, 2021

कुछ आदतें छूट गई

जाने कितने दिनों बाद क़लम पकड़ी है
पन्नों में लिखने की ख़्वाहिश जागी है
दफ़्तर वाली नौकरी छोड़े 
कुल जमा नौ साल हो गए
कि इन गुज़रे सालों में 
मैं कितना बदल गया
कुछ आदतें छूट गई
मसलन चमड़े का काला जूता पहनना 
सलीक़े से फ़ॉर्मल कपड़े पहनना
दिसंबर में जब ऑफ़िस में होती थी 
सर्द शाम में पार्टी 
तो सज सँवर कर कोर्ट पहनना
अब यह सब नहीं भाता है...
सच कहूँ तो अब जूते काटते हैं
ठीक स्कूल के दिनों की तरह!
अब चप्पल भाता है
जब भी किसी से मिलता हूँ 
सुनता हूँ उनकी बातें
तब ख़ुद ब ख़ुद पाँव नंगे हो जाते हैं
पाँव ज़मीन को स्पर्श करने को 
हर वक़्त बेचैन रहता है
जब भी अपने प्रियजनों को सुनने 
सामने बैठता हूँ 
बस सुनने की ख़्वाहिश रहती है
अब बोला कम
सुना ज़्यादा जाता है
ठीक वैसे ही जैसे 
अब छपने से अधिक
पढ़ना अच्छा लगता है !

Tuesday, December 17, 2019

वे चाहते थे...

वे चाहते थे कि सब एक रहे
बची चीजें बस बची रहे
किसानी बची रहे,
भले वे बचे न रहे
उनका चाहना उनके बचे रहने से बड़ा था
बिछावन पकड़ते ही उनका चाहना
न जाने कितने टुकड़ों में बंट गया
विश्वास में मानो दीमक लग गया
धीरे-धीरे दीमक सबको चाट जाता है
ठीक उसी तरह उनकी बची चीजों में भी
दीमक लग गया
वे सब देखते रह गए
देखते - देखते 
बची चीज और टुकड़ों में बंट गई
धीरे - धीरे उन्होंने चुप रहना सीख लिया
लेकिन उनकी चुप्पी भी भव्य थी
बरसों तक जो उनके साथ थे
सुख-दुख सब वेला में
अब उनसे दूर हो गए
लेकिन दूरियां भी उन्हें तोड़ नहीं सकी
मानो वे सब जानते थे
उनकी चुप्पी की भव्यता और बढ़ती गई
और एक दिन वे निकल पड़े 
अपनी ही चुप्पी की लंबी यात्रा पर..

Friday, January 11, 2019

कदंब के नाम पाती

अब जब
तुम सब हो गए हो बड़े
अब जब
तुम्हारी बस गई है
अपनी बस्ती
तो अब खुलकर
बातें करो आसमां से,
बातों ही बातों में कभी
तुम सब छू लेना बादलों को
और
पूछना सूरज से कि
ऊंचाई से हरी पत्तियां
कैसी लगती है?
किसी पूर्णिमा की रात
करना चाँद से गुफ्तगू
बारिश के मौसम में
बादल के कोमल हाथों से
पहले स्नान का सुख
हमें बताना साथी...
यूँ ही सिर ऊंचा किए
हमसे भी कभी
गुफ्तगू करना साथी
और बताना
पतझड़-सावन-बसंत-बहार
की कहानी

#ChankaResidency

Thursday, June 14, 2018

बाबूजी

हर दोपहर, जब आसपास 
कोई नहीं होता,
पहुँच जाता हूं 
उस माटी के पास,
जहाँ हर बारिश में 
उग आती है
श्याम तुलसी।
यहीं करता हूं आत्मालाप!
आज साहस से
याद करता हूं
बाबूजी के शव को।
अंतिम संस्कार की विधि को,
अग्नि में समाहित बाबूजी को।
मुझे याद है,
उस दिन
बाबूजी के दोनों पाँव
सबसे पहले
जलते हुए झूल गए थे..
लम्बे थे पिता
मानो थक कर कह रहे हों
हो गया अब!
अब नहीं चला जाता..
मानो वह कह रहे हों
कि अब तुम अकेले चलो..
भीड़ में एकदम अकेले..
उस दिन लपटों के बीच
लाल अंगार में
बाबूजी और भी लाल दिख रहे थे
ठीक वैसे ही जैसे
अस्त होता सूरज दिखता है
हर रोज...


Monday, October 03, 2016

लकीर-फकीर-कबीर

एक सीधी लकीर
एक टेढ़ी लकीर
एक तिरछी
एक आधी
एक पूरी लकीर!
ओहो!
एक पूरी लकीर ही
तो भरम है प्यारे!
तो, साहेबान
और क़द्रदान
बस खींचते जाओ
लकीर
सीधी
टेढ़ी
आधी
जो भी बने
बनाते चलो
लकीर तो
बस पड़ाव है प्यारे
मंज़िल तो फकीर है,
लाठी लिए कबीर है।

Sunday, June 22, 2014

बाबूजी की आंखें

अब लिखा नहीं जाता है,
दिन और रात बस अब
खोना अच्छा लगता है
जबसे बाबूजी को अस्पताल से घर लाया हूं
लगता है
लिखना और जीना दोनों ही
बहुत अलग चीज है
जो लिख देते हैं
वो सच में
बड़ी खूबसूरत दुनिया देखते हैं
और जो लिख नहीं पाते
वो देखते हैं...भोगते हैं
जीवन के उतार-चढाव को
आज जाने कितने दिनों बाद
जब कुछ लिखने का मन किया तो
मुक्तिबोध याद आए
रविवार की इस तपती दुपहरी में
उनकी कविता याद आई
बिस्तर पर लेटे
टूक-टूक देख रहे बाबूजी
और बाबूजी की दो आंखें
आंखों में आंसू .....
पिछले साल ही उनकी आंखों में
लगी थी दो लैंस..
दिल्ली की किसी अस्पताल में
आशा के साथ कि
अब आंखों में आंसू नहीं आएंगे
पर किसको पता था कि
आंखों में आंसू आना तो
नियम है जीवन का
दुख और सुख का व्याकरण
सचमुच में बड़ा जटील है
अब जान गया कि जीवन एक
लंबी कविता है
जिसमें कहानी भी है
उपन्यास भी...
मेरे लिए फिलहाल
जीवन की कहानी अमीर खुसरो की वह लाईन है
जिसमें वे कहते हैं- बहुत कठिन है डगर पनघट की.....

Saturday, March 02, 2013

संवेदनाओं का पुल- - सरिता शर्मा

मोहन राणा  विदेश में बसे उन हिन्दी लेखकों में हैं, जो प्रचलित वादों और विवादों से दूर रहकर चुपचाप अपने लेखन में जुटे हुए हैंउनकी सोच सर्वथा मौलिक है और अपनी जीवनदृष्टि को व्यक्त करने के लिए नए बिम्बों के इस्तेमाल से अपने अलग मुहावरे गढ़ते है.
अब तक उनके सात कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. उन्हों
ने ‘सबद’ ब्लॉग में आत्मकथ्य में अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में बहुत ईमानदारी से लिखा है, लेखक कविता और शब्द संरचना के बीच कार्बन पेपर की तरह है, जो हम छपा देखते-पढ़ते हैं वह दरअसल एक अनुभव का अनुवाद है जिसमें एक सच्चाई को उकेरा गया है.
 
कविता दो बार किसी भाषा में अनुवादित होती है. पहली बार जब उसे शब्दाकार दिया जाता है दूसरी बार जब उसे पढ़ा और सुना जाता है. कविता अकथनीय सच का अंर्तबोध है और प्रेम का दिशा सूचक, भय मुक्त जीवन को जीने का रास्ता है. हर शब्द इस रास्ते पर एक कदम है. और हर कदम एक रास्ता है.’


 कवि-आलोचक नंदकिशोर आचार्य के अनुसार मोहन राणा की कविता अपने उल्लेखनीय वैशिष्टय के कारण अलग से पहचानी जाती रही है क्योंकि उसे किसी खाते में खतियाना संभव नहीं लगता. यह कविता यदि किसी विचारात्मक खाँचे में नहीं अँटती तो इसका यह अर्थ नहीं लिया जाना चाहिए कि मोहन राणा की कविता विचार से परहेज करती है बल्कि वह यह जानती है कि कविता में विचार करने और कविता के विचार करने में क्या फर्क है. मोहन राणा के लिए काव्य रचना की प्रक्रिया अपने आपमें एक स्वायत्त विचार प्रक्रिया भी है.’
  
    रेत का पुल मोहन राणा का सातवाँ कविता संग्रह है जिसमें 80 कविताएँ हैं. कवितायेँ -रेत का पुल और तीसरा पहर इन दो खण्डों में विभाजित हैं .ये कविताएं अपने समय का प्रतिनिधित्व करती हैं . मोहन राणा सार्वभौमिक कवि हैं   जो यूरोप के भिन्न देशों में भ्रमण करते हुए हर जगह अपने अतीत को तलाश करते है.

 इन कविताओं में स्वयं को
पहचानने और समझने की लगातार कोशिश दिखाई देती है और ये विस्थापन से जन्मे अकेलेपन को दर्शाती हैं. कवि का खुद से संवाद चलता रहता है. इनमें जीवन के सूक्ष्म अनुभव महसूस किये जा सकते हैं. बाज़ार संस्कृति की शक्तियों के विरुद्ध उनकी सोच कविता में उभरकर आती है.


 पीछे रह गयी मातृभूमि रह- रह कर पुकारती है- उत्प्रवासी' कविता में- महाद्वीप एक से दूसरे तक ले जाते अपनी भाषा/ दुनिया और किसी अज्ञात के बीच एक घर साथ/ ले जाते आम और पीपल का गीत/ ले जाते कोई ग्रीष्म कोई दोपहर'. स्वाभाविक चुप्पी और आसपास के माहौल से सम्प्रेषण न कर पाने की व्यथा को प्रकट किया गया है.
अनबीता अतीत हमेशा साथ रहता है
. उनकी कविताओं में स्मृतियों की भी एक अहम भूमिका है. परसों का नाश्ता आज कविता में स्ट्रीम ऑफ कॉन्शियसनेस दिखाई देती है असावधान वर्तमान में हमेशा अतीत ही उपस्थित. रात कविता में स्मृतियाँ इस तरह आती हैं- 'फुसफुसाती वन देवी, पलकें बंद कर लो और जागो/ एक अँधेरे में जिसमें गुम हैं स्मृतियाँ/ कि उसे जीते हुए याद नहीं रहता कुछ देखकर भी वहां'.देवी,साती रेक्ष्य में देखते हैं.
      
 मोहन राणा की इन कविताओं में मानव और प्रकृति के अनंत रहस्यों में से गुजरते हुए हम भटकन,  तकलीफ और संघर्ष से रूबरू होते हैं.  उनकी कविता प्रकृति की रमणीयता में भी हमें आकर्षित करती  हैं- जैसे पनकौआ कविता में छोटा होता जा रहा वसंत हर साल/ छोटा हो रहा है हर साल वसंत में.  
इसी तरह एक और कविता 
पानी का रंग से बानगी है कि ना यह गरमी का मौसम /ना पतझर का ना ही यह सर्दियों का कोई दिन/ कभी मैं अपने को ही पहचान कर भूल जाता हूँ’ और –मुटरी’ कविता में दिसंबर की सुबह जमे पाले में प्रकट हुई/बाहर कुहासे में ठिठुरता हुआ सन्नाटा. 
एमिली ब्रोंटे ने वुदरिंग हाइट्स में खिड़कियों
, दरवाजों और मौसम के बिम्बों का इस्तेमाल पात्रों की मनोस्थिति को उजागर करने के लिए किया है. मोहन राणा की कविताओं में खिड़की लगातार नजर आती है जिससे वे अतीत में और सुदूर झांकते रह्ते हैं- बंद कर दूँगा उसकी खिड़की पर गुलेल मारना.  पाठ कविता में 'कई खिड़कियाँ हैं इस घर में एक बाहर एक भीतर. नक्शानवीस में - समय के अंतराल में/ इन आतंकित गलियों में/ मैं देखता नहीं किसी खिड़की की ओर/ रूकता नहीं किसी दरवाजे के सामने'. 'दरवेश सिफ़त' में खिड़की निरर्थक समय का बोध कराती है.यहाँ कुछ स्थिति ही ऐसी हमारे इस मकान में खिड़कियाँ बहुत/ बाहर सब दिखता लगभग हर दिशा/ पर सवाल अक्सर होता कि कुछ दिखे मतलब का तो. दूर खिडकी पास दिल्ली में-  भाग रहा हूँ पर दूरियाँ बढ़ती चली जाती हैं'. खिड़कियाँ एकांत को और भी अधिक भयावह बनाती हैं-क्या करूँ इस दृश्य का/ हर दिशा में/ मैं ही हूँ मैं’’.
प्रवासी व्यक्ति होता है उसकी लिखी कविता नहीं, अपने निबंध - 'कवि और समय' में मारीना तस्वेतायेवा ने एक जगह लिखा - ' हर कवि अनिवार्य रूप से एक उत्प्रवासी है . मोहन राणा ब्रिटेन में हिंदी उत्प्रवासी कवि हैं. भीतर और बाहर के भूगोल के लगातार भ्रमण से उपजी तकलीफ से व्याप्त  उनकी कवितायेँ ग्लोबल दुनिया में जीवन-मूल्यों की तलाश करती हुई स्वप्नशीलता में ले जाती हैं. इनमें मन के मौसम के साथ- साथ बाहरी दुनिया की गतिविधियों को ध्यान में रखा गया है - बदलती हुई सीमाओँ के भूगोल में/मेरा भय ही मेरे साथ है'.
ग्लोबल होने के बावजूद मोहन राणा अपनी जड़ों से पूर्णतः असम्पृक्त नहीं हुए हैं
. 'अपना एक देस कविता में कवि देशवासियों द्वारा उसे भुला दिए जाने से आहत है. 'लोगों ने वहाँ बस याद किया भूलना ही/ था ना अपना एक देस बुलाया नहीं फिर. भारत में चल रही उथल- पुथल पर उनकी पकड़ बनी हुई है. अन्ना के आन्दोलन को वह विश्व के अन्य भागों में हुई क्रांतियों के परिप्रेक्ष्य में देखते हैं. 'भरम अनेक कविता में वह कहते हैं -'अन्ना हम तुम्हारे साथ हैं मिर्च की पिचकारी आँखों में/ और थप्पड़ किसी नेता कोबुरे वक्त की निशानी कहते हैं बुजुर्ग चश्मे को ठीक करते/ इन दांतों में अब दाने नहीं चबते हवा में मुक्के भांजते/ प्रतिरोध की आँखों में मिर्च की पिचकारी मारता जॉन पाइक/ जैसे छिड़कता हो/ गाफिल कोई नाशक दवा खरपतवार पर/ पालथी बैठे छात्रों के धीरज पर. 
  मोहन राणा  ने कबीर को बदले सन्दर्भों में इन्टरप्रेट किया है. टी. एस. एलियट की तरह उद्धरणों को अपने ढंग से आज के समय से जोड़ दिया गया है जैसे 'कबीरा कुँआ एक पानी भरे अनेक/ सबको नहीं मिलता पानी फिर भी/ मिलता भरम अनेक और 'भाखा महाठगिनी हम जानी. इन कविताओं में प्रेम सघन है मगर अपूर्णता और कसक भी बार- बार मुखरित होती है. – 'कभी लगता शायद दो ही मौसम हों अब से/ दो जैसे अच्छा बुरा/ सुख दुख/ प्रेम और भय/ तुम और मैं. प्रेम जीवन की संजीवनी है- 'जरूरी सामान की पर्चियों के साथ अकेले/ जीने के लिए केवल सांस ही नहीं / प्रेम की आँच मन के सायों में / हाथ जो गिरते हुए थाम लेता.
प्रेम की स्मृतियाँ उसे जिन्दा रखती हैं-
'पंक्तियों के बीच अनुपस्थित हो/ तुम एक खामोश पहचान/ जैसे भटकते बादलों में अनुपस्थित बारिश/ तुम अनुपस्थित हो जीवन के हर रिक्त स्थान में/ समय नहीं चाहता था कि मैं तुम्हें पहचान लूँ फिर से/ जैसे देखा था पहली बार खुद को भूल कर. 
 इन कविताओं में जीवनगान मुखर है.
'पनकौआ में कटु हकीकत जानते हुए भी कवि आशावान है -'पेड़ों पर कोंपले आएँगी/ बची हुई चिड़ियाएँ लौटेंगी दूर पास से/ आशा बनी है ऐलान ना होगा खबरों में/ किसी नई लड़ाई का. कवि के मन में कविता के प्रति गहरा विश्वास है –'कुछ दिन पहले कविता में यथार्थ की बात/ सोचते बोलते और कुछ दिन बीते रोवन का पेड़ हो गया दिसंबर और- 'कवितायेँ हवा की बनी पानी में पिघल गयी/ कागज गल के बनेंगे खाद पत्तों के साथ. विचलित कर देने वाले दौर में कवियों की तटस्थता चिंताजनक है. '
इस तेज आंधी में नहीं दीखता नारों की ढलानों पर असभ्य शाहों के विरुद्ध कोई बोलता/
खटकती है आम सहमति कि/ कवियों के सरोकार जनपद में कविता की अनुपस्थिति. 'शोकगीतकविता में भी यही दर्द उभरता है'आतंक के गलियारों में विलुप्त हैं शोकगीत इस बार/ चुप क्यों हैं शोकगीतों के कवि. हिंदी कवियों की माली हालत खबर होने को लेकर भी कवि चिंतित है. 'अपीलकविता में –'विनती है ईश्वर हिंदी का कवि कभी बूढा ना हो अस्वस्थ ना हो/ उसे मांग ना करनी पड़े इलाज के पैसे के लिए/ रहने के लिए एक घर के लिए बच्चों की पढाई के लिए.
 इन कविताओं में एकांत और उत्प्रवास की पीड़ा की मौलिक शिल्प में गहन अभिव्यक्ति है . यहाँ स्थितियों पर तात्कालिक प्रतिक्रिया मात्र नहीं है. पहले कवि उन्हें आत्मसात करता है, फिर तटस्थता से विचार करने बाद उन्हें शब्दों में ढाला जाता है.

 ये कवितायें पढ़कर महसूस होता है
 मानो कवि शाश्वत सत्य की तलाश में निरंतर यात्रा पर हो. वास्तव में इस कविता संकलन को एक उत्प्रवासी की संवेदनाओं का पुल कहा जा सकता है जिसके आर- पार कवि स्मृतियों में विचरण करता रहता है.

पुल के एक छोर पर पीछे छूट गया भारत है और दूसरे छोर पर इंग्लैंड का वह शहर है जहाँ वह एकांतवास करता है.
इस संग्रह की कविताओं में कला और कथ्य  में परिपक्वता है. कुछ कवितायेँ अत्यधिक अमूर्त होने से दुरूह लगती हैं और कहीं- कहीं अकेलेपन की स्थिति में एकालाप अभिव्यंजना पर अधिक हावी हो जाता है. मगर समग्रता में यह कविता संकलन आज की कविता में महत्वपूर्ण स्थान रखता है.

Tuesday, February 21, 2012

उस आदमी को देखो

केदारनाथ सिंह की यह कविता मेरे लिए हरी बत्ती की तरह है, जो हर पल मुझे राह दिखाती है। मैंने इसे अपने ब्लॉग के हेडर पर भी लगाया है। एक पोस्ट पर आई टिप्पणी में यह सवाल उठाया गया कि मैंने क्यों नहीं कवि के नाम को उद्धृत  किया? सवाल जायज है लेकिन क्या करें, जो चढ़ जाता है, उसको लेकर मन में यह धारणा बन जाती है कि यह तो सब जानते होंगे, हालांकि यह धारणा ठीक नहीं है। अग्रज डॉ.अभिज्ञात जी का शुक्रिया, जिन्होंने चेताया।

पुनश्च: गलती तो गलती होती है, आज आप सब पढिए केदार जी यह कविता- उस आदमी को देखो


उस आदमी को देखो जो सड़क पार कर रहा है
वह कहाँ से आ रहा है
मुझे नहीं मालूम
कहाँ जायेगा
यह बताना कठिन है


पर इतना साफ़ है
वह सड़क के इस तरफ खड़ा है
और उस तरफ जाना चाहता है
उसका एक पाँव हवा में उठा है
और दूसरा उठने का इंतजार कर रहा है


जो उठा है
मैं सुन रहा हूँ वह दुसरे से कह रहा है
'जल्दी करो जल्दी करो
यह सड़क है'


और सडक ऐसी चीज है मित्रों
जो हमेशा वहीं  पड़ी रहती है
और चूँकि वह हमेशा वहीं पड़ी रहती है
इसलिए हर आदमी को हर बार
नये सिरे से पार करनी पड़ती है अपनी सड़क


तो वह आदमी जो सड़क पार कर रहा है
हो सकता है तीन हजार सात सौ सैंतिस्वी बार
पार कर रहा हो फिर वही सड़क
जिसे कल वह फिर पार करेगा
और उसके अगले दिन फिर
और हो सकता है अगले असंख्य वर्षों तक
वह बार बार उसी को
और सिर्फ़ उसीको पार करता रहे


देखो देखो वह अब भी वहाँ खड़ा है
उत्सुक और नाराज
और मुझे यह अच्छा लग रहा है


मुझे आदमी का सड़क पार करना
हमेशा अच्छा लगता है
क्योंकि इस तरह
एक उम्मीद सी होती है
की दुनिया जो इस तरफ़ है 
शायद उससे कुछ बेहतर हो
सड़क के उस तरफ़ |


केदारनाथ सिंह -1972

Tuesday, February 07, 2012

तुम्हारे लिए

पंखुरी
तुम्हारा हंसना –ऐं ऐं ऐं...
तुम्हारा रोना- उं उं..हउं....
फिर सो जाना
फिर दोनों हाथों से
मुझे छू लेना
तुम्हारे स्पर्श में
नरम गरमी का अहसास
हर बार होता है,
मानो
ऐसा पहली बार होता है
हर सुबह,
उठते ही देखना- टुकटुक,
टुकुर टुकुर 
फिर धीरे से-मुस्कुरा देना
बेटी हो तुम मेरी
मैं पिता
होना पिता
होना बेटी
सबकुछ
तुम्हारे लिए
सब तुम्हारे लिए....
फिर एक दिन
तुमने खिलखिला कर हंस दिया
हम देखने लगे तुम्हें
तुम्हारी तरह
टकटकी लगाके
तुम्हारी अपनी आवाज की हंसी में
हम अपनी आवाज खोजने लगे
तुम्हारे लिए, बेटी
सब तुम्हारे लिए..
फिर आया वह दिन
जब तुमने पहली बार
पेट के बल
लेटना सीखा
दुनिया को
मानो लेटे लेटे
तुमने चख लिया ..
तुम्हीं ने हमें
दिया है अहसास
देखने का
दुनिया को
तुम्हारी पहली

खिल-खिल हंसी की
आवाज में ..
हमने भी दुनिया को
चख लिया,
शहद-शहद
तुम्हारे लिए.. 



(कानपुर, 6 फरवरी 2012, सुबह -पांच बजे) 

Thursday, January 05, 2012

स्मृति

'स्मृति'  किताब है, जिसमें कथा ही कथा है, जो विस्तार की फिराक में हर वक्त लगा रहता है लेकिन मैं कविता की खोज में हूं, कुछ शब्द हैं, कुछ राग हैं, केंद्र घर ही है, वही घर जो स्मृति में है।
 
१.
एक घर था, सामने खेत थे, 
यादों में आकर बड़ा परेशां करता है वह घर,
पता चला कि परेशानी उस घर को भी हो रही थी/
सुना है कि परेशां होकर
अब उस घर ने ही मुंह मोड़ लिया है,
पता नहीं किससे, मुझसे या खुद से ....
२.
उस घर ने पहली बार मुझसे कुछ कहा था/
आज भी याद है घर की वो बात/ घर ने कहा  था /
छोड़ते वक्त मेरे दीवार से माटी खरोंचकर ले जाना,
जब भी याद आए/ उस माटी को बस छू लेना
३.
घर के भीतर ही मेहमानखाना था, एक ही घर था,
पर न जाने वह कितनों को समेटा था/
लेकिन उस घर में एक कमरा था /
जो हर वक्त अंधेरे में डूबा रहता था/
मुझे उस घर ने ही एक दफे कहा था /
कि मेरे उस कमरे में मेरा शुकून सोया हुआ है/
उस कमरे को अंधेरे से ही मोहब्बत है
४.
उस दिन हंस रहा था घर, कह रहा था तुमने जीना सीखा है/
लेकिन मैंने उससे एक बात छुपाई थी/
सुबह को मैंने छोड़ दिया था वह घर/
बरसों बाद पता चला कि घर ने /
यूं ही नहीं कहा था कि तुमने जीना सीख लिया है
५.
घर में शहनाई बज रही थी, सब खुश थे/
हमने उस रात घर को आंसू बहाते देखा था /
शायद उसी रात घर के उस अंधेरे कमरे में दीप जली थी/
अंधेरे कमरे का शुकून किसी ने छिना था