Friday, September 18, 2026

विधानसभा चुनाव से पहले ग्राउंड से सियासी पंजाबी बातें

पंजाब में विधानसभा चुनाव की तैयारी के बीच राजनीतिक दल अब सिर्फ रैलियों और बैठकों को लेकर ही नहीं सोच रहे हैं बल्कि अब वे ग्राउंड रिपोर्ट कार्ड भी बनाने लगे हैं। हर दल अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि जमीन पर उनकी असली स्थिति क्या है? कौन सा विधानसभा क्षेत्र मजबूत है, कहां पार्टी को नुकसान हो सकता है और किन सीटों पर उम्मीदवार बदलने की जरूरत पड़ सकती है, इसे लेकर सीट-टू-सीट सर्वे कराया जा रहा है। मतलब साफ है, आम आदमी पार्टी, शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, ये सभी अपने-अपने स्तर पर पता लगा रहे हैं कि उनकी पार्टी ग्राउंड में कितनी मजबूत है।

गौरतलब है कि पंजाब में कुल 117 विधानसभा सीटें हैं। आम आदमी पार्टी के पास फिलहाल 95 सीटें हैं। ऐसे में सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही आप के लिए अपने मौजूदा विधायकों की स्थिति जानना अहम है। वहीं कांग्रेस, बीजेपी और शिअद भी अपने संगठन, संभावित उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों की ताकत परख रहे हैं। इन सर्वे की रिपोर्ट के आधार पर चुनावी रणनीति, उम्मीदवारों और कमजोर सीटों पर फोकस तय किया जा सकता है।

इन सबके बीच यदि आपको पंजाब के चुनावी मुद्दों को समझना है तो प्रदेश के तीन प्रमुख क्षेत्रों की आवोहवा से वाकिफ होना होगा। सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्र हैं, मालवा, माझा और दोआबा। दरअसल, इन क्षेत्रों के मतदाताओं के मिजाज पर यहां के स्थानीय मुद्दों का खासा असर पड़ता है।


पंजाब में कुल 117 में से 69 विधानसभा सीटें मालवा क्षेत्र में आती हैं। पंजाब की राजनीति में कहा जाता है कि इसी क्षेत्र से उठी सियासी लहर पंजाब में सत्ता का रुख तय करती है। यही कारण है कि मालवा को पंजाब के मुख्यमंत्री की कुर्सी भी कहा जाता है। यह पंजाब का सबसे बड़ा क्षेत्र है और 15 जिलों में फैला हुआ है। प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह, भगवंत मान जैसे दिग्गज नाम इसी क्षेत्र से रहे हैं इसलिए सभी दल मालवा में बेहतर प्रदर्शन के लिए खास रणनीति बनाने में जुट चुके हैं।

साल 2022 के चुनावों की स्थिति देखें तो आप ने मालवा में एकतरफा जीत दर्ज की थी। यहां 69 में से आप को 66, कांग्रेस को 2 व शिरोमणि अकाली दल को एक सीट मिली थी। किसान और किसानी से जुड़े मसले, भूजल और कैंसर बेल्ट, बेरोजगारी व युवाओं का पलायन इस क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे हैं।

अब आपको लेकर चलते हैं माझा का इलाका। अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन और पठानकोट का इलाका माझा क्षेत्र कहा जाता है। यहां कुल 25 विधानसभा सीटें आती हैं। माझा को पंजाब की पंथक और राजनीतिक राजधानी माना जाता है। भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे होने के कारण यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा, तस्करी और रक्षा रणनीति की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। साल 2022 में यहां 25 में से आप ने 16 सीटें, कांग्रेस ने 7, शिअद-भाजपा ने 1-1 सीटें जीती थीं। इस क्षेत्र में आप के समक्ष अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने, जबकि कांग्रेस और शिअद को इस पारंपरिक गढ़ में पंथक और ग्रामीण वोट बैंक को वापस पाने की चुनौती रहेगी। पठानकोट और अमृतसर जैसे शहरी इलाकों में हिंदू-सिख समीकरण साधकर पार्टियां जनाधार जुटाने की तैयारी में हैं। नशाखोरी व सीमा पार तस्करी, सीमावर्ती किसानों व व्यापारियों की समस्याएं यहां प्रमुख मुद्दे हैं।

माझा के बाद सभी की निगाहें दोआबा पर रहती है। सतलुज और ब्यास नदियों के बीच का भूभाग दोआबा सूबे की राजनीति में खास स्थान रखता है। चार जिलों जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर तक फैले इस क्षेत्र में कुल 23 विधानसभा सीटें हैं। साल 2022 में आप ने यहां 10, कांग्रेस ने 9, भाजपा ने 1 व शिअद और बसपा ने 1-1 सीट जीती थीं। इस क्षेत्र में दलित और एनआरआई पंजाबी खासे असरदार रहते हैं। इसलिए दलों का जोर यहां इन दोनों वर्गों को साधने पर रहेगा। दोआबा में दलित वोट बैंक का ध्रुवीकरण, एनआरआई और आव्रजन नीतियां, अवैध खनन और औद्योगिक व बुनियादी विकास सरीखे मुद्दे चुनाव में खासे उछाले जाते रहे हैं।

इन सबके बीच भाजपा ने चुनावी रोडमैप तैयार करना शुरू कर दिया है। नशे के खिलाफ पार्टी मुखर है। भाजपा ने ‘ट्रिपल C’ यानी क्राइम, करप्शन और चिट्टा (ड्रग्स) को केंद्र में रखकर अपने प्रचार अभियान को हॉट पॉलिटिकल टॉपिक बनाने की सोच रही है। इसके साथ ही युवा, रोजगार, कानून-व्यवस्था और जातीय समीकरण पर भी पार्टी जोर देने की तैयारी में है।

दूसरी ओर आम आदमी पार्टी की नवगठित पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी (पीएसी) की गुरुवार को पहली बैठक हुई। आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में उनके आवास पर हुई बैठक में पीएसी से जुड़े पंजाब के नए सदस्य सीएम भगवंत सिंह मान और मंत्री हरपाल सिंह चीमा भी शामिल हुए। मनीष सिसोदिया ने बताया कि बैठक में मुख्य रूप से पंजाब, गोवा और गुजरात में होने वाले चुनावों को जितने को लेकर गहन मंथन हुआ। उन्होंने कहा कि पंजाब की जनता भगवंत सिंह मान के काम से बेहद खुश है और उन्हें दोबारा बतौर मुख्यमंत्री देखना चाहती है, जबकि गोवा और गुजरात की जनता भाजपा के कुशासन से त्रस्त हो चुकी है और अब बदलाव चाहती है।

हर दल के बड़े नेता अब पंजाब की तरफ नजर लगाए हुए हैं, आने वाले दिनों में चुनावी अभियानों से जुड़ी खबरें खूब सामने आएगी लेकिन असल बात तो वही है कि सत्ता में आम आदमी पार्टी वापसी कर पाएगी या फिर पंजाब की जनता कांग्रेस या फिर भाजपा को मौका देगी।

देखिए, आने वाले दिनों में पंजाब में क्या होता है, फिलहाल ग्राउंड की कहानी यही है कि सियासी रणनीतिकार सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्रों मालवा, माझा व दोआबा के लिए अलग-अलग चुनावी रणनीति बनाने में जुटे हैं। 

Saturday, September 05, 2026

यहां बातचीत कन्नड़ या अंग्रेजी में नहीं, बल्कि संस्कृत में होती है!



कर्नाटक में एक ऐसा गांव है, जहां आज भी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत की भाषा संस्कृत है! इस गांव का नाम है मत्तूर। राजनीति की कथा कहानियों से कोसों दूर आज हम आपको इसी गांव की कहानी सुनाने जा रहे हैं। 
मत्तूर गांव कर्नाटक के शिमोगा जिले में स्थित है, जो बेंगलुरु से करीब 320 किलोमीटर की दूरी पर है। यह गांव तुंगा नदी के किनारे बसा हुआ है। यहाँ के निवासियों की मातृभाषा ‘संकेथी’ होने के बावजूद, दैनिक बोलचाल में संस्कृत का व्यापक उपयोग किया जाना यहाँ की विलक्षणता को दर्शाता है।

मत्तूर की संस्कृत परंपरा का इतिहास काफी पुराना बताया जाता है। कहा जाता है कि 16वीं शताब्दी में राजा कृष्ण देव राय ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए मत्तूर गांव को केंद्र बनाया था। हालांकि आधुनिक दौर में यह भाषा धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगी थी, लेकिन गांव के बुजुर्गों के मुताबिक साल 1981 से गांव ने संस्कृत को फिर से अपनाना शुरू किया और तभी से यह भाषा यहां की पहचान बन गई।

वैदिक जड़ों की ओर वापसी का सफर 1981 में शुरू हुआ, जब शास्त्रीय भाषा को बढ़ावा देने वाली संस्था संस्कृत भारती ने मत्तूर में 10 दिवसीय संस्कृत कार्यशाला का आयोजन किया। इसमें पास के उडुपी स्थित पेजावर मठ के संत समेत कई अन्य लोग शामिल हुए। ग्रामीणों को संस्कृत को संरक्षित करने के इस अनूठे प्रयोग में उत्साहपूर्वक भाग लेते देख संत ने कहा, “एक ऐसी जगह जहाँ लोग संस्कृत बोलते हैं, जहाँ पूरे घर संस्कृत में बात करते हैं! आगे क्या? एक संस्कृत गाँव!” मत्तूर के निवासियों ने इस आह्वान को दिल से स्वीकार कर लिया। इस तरह संस्कृत गाँव की प्रमुख भाषा बन गई।

माना जाता है कि मत्तूर में संस्कृत के इस्तेमाल को बढ़ावा देने में वहां की स्थानीय धार्मिक और शैक्षिक परंपराओं ने अहम भूमिका निभाई है। इस गांव में वैदिक और संस्कृत शिक्षा की पुरानी परंपरा रही है। बच्चों को कम उम्र में ही संस्कृत से परिचित कराया जाता है, और कई परिवार अपनी रोज़मर्रा की बातचीत में इसका इस्तेमाल करते हैं।

ऐसे दौर में जब संस्कृत को अक्सर सिर्फ़ प्राचीन ग्रंथों और धार्मिक परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है, मत्तूर गांव यह दिखाता है कि सांस्कृतिक और शैक्षिक पहलों के ज़रिए किसी भाषा को पीढ़ियों तक कैसे जीवित रखा जा सकता है। 

मत्तूर गांव में प्रवेश करते ही सबसे पहले जो चीज हैरान करती है, वह है यहां के लोगों का संस्कृत में सहज बातचीत करना। गांव के बच्चे, बुजुर्ग और जवान सभी धाराप्रवाह संस्कृत में बात करते हैं। बाजार में सामान खरीदना हो, खेत में काम करना हो या फिर घर की आम बातचीत, यहां सब कुछ संस्कृत में ही होता है.। गांव में प्रवेश करते ही माहौल भी अलग महसूस होता है, यहां के लोगों की वेशभूषा और रहन-सहन भी परंपरागत भारतीय संस्कृति की झलक देते हैं।

मत्तूर में सब्जी विक्रेता से लेकर पुजारी तक, हर कोई संस्कृत समझता है। अधिकांश लोग धाराप्रवाह संस्कृत बोलते भी हैं। नदी किनारे वैदिक मंत्रों का पाठ करते बुजुर्गों का समूह और उनके पास से साइकिल पर तेजी से गुजरते हुए कुछ युवकों का प्राचीन भाषा में मोबाइल फोन पर बातचीत करते हुए निकलना कोई असामान्य बात नहीं है।

मत्तूर एक कृषि प्रधान गाँव है जहाँ मुख्य रूप से सुपारी और धान की खेती होती है। यहाँ संकेठी समुदाय के लोग रहते हैं, जो एक प्राचीन ब्राह्मण समुदाय है। यह समुदाय लगभग 600 वर्ष पूर्व केरल से आकर मत्तूर में बस गया था। संस्कृत के अलावा, वे संकेठी नामक एक दुर्लभ बोली भी बोलते हैं, जो संस्कृत, तमिल, कन्नड़ और तेलुगु के कुछ अंशों का मिश्रण है। संकेठी बोली की कोई लिखित लिपि नहीं है और इसे देवनागरी लिपि में पढ़ा जाता है।

हमारे एक पत्रकार साथी ने बताया कि मत्तूर ने 30 से अधिक संस्कृत प्रोफेसर तैयार किए हैं जो कुवेम्पु, बेंगलुरु, मैसूर और मैंगलोर विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं। मत्तूर कई प्रतिष्ठित हस्तियों का गृह ग्राम भी है, जिनमें भारतीय विद्या भवन, बैंगलोर के मथुर कृष्णमूर्ति, वायलिन वादक वेंकटराम औरगामाका प्रतिपादक एचआर केशवमूर्ति शामिल हैं।

भाषा और संस्कृति में रुचि रखने वालों के लिए, मत्तूर भारत में घूमने की एक दिलचस्प जगह है।

Friday, August 21, 2026

उत्तर-बंग के दौरे पर अमित शाह, सीमा सुरक्षा पर फोकस !




कांग्रेस के साथ वंदे मातरम विवाद के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पश्चिम बंगाल के दौरे पर गुरुवार रात सिलीगुड़ी पहुंचे। उनका यह दौरा मुख्य रूप से सीमा सुरक्षा और प्रशासनिक समीक्षा पर केंद्रित है।
गृह मंत्री के इस दौरे को रणनीतिक लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि सिलीगुड़ी कॉरिडोर भारत के लिए बेहद संवेदनशील इलाका है। यही संकरा गलियारा देश के पूर्वोत्तर राज्यों को बाकी भारत से जोड़ता है। ऐसे में यहां सीमा सुरक्षा, निगरानी, इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय सीधे तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

इस अहम दौरे में अमित शाह सशस्त्र सीमा बल के जवानों से मुलाकात करेंगे, सीमा सुरक्षा परियोजनाओं की शुरुआत करेंगे और साथ ही सीमा सुरक्षा बल, सशस्त्र सीमा बल, खुफिया एजेंसियों व राज्य अधिकारियों के साथ समीक्षा बैठक करेंगे। यह एक महीने में शाह का सिलीगुड़ी का दूसरा दौरा है।

गृह मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, इस दौरे का सबसे अहम फोकस देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन को मजबूत करना और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल सुनिश्चित करना है। गृह मंत्री सिलीगुड़ी में उच्चस्तरीय बैठक की अध्यक्षता करेंगे, जिसमें सीमा सुरक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों की समीक्षा की जाएगी।

गृह मंत्री अपने दौरे के पहले दिन शुक्रवार को सीमा सुरक्षा और सीमा प्रबंधन से जुड़े कई कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं। इस दौरान सीमा सुरक्षा को मजबूत करने वाली विभिन्न परियोजनाओं का उद्घाटन और कई परियोजनाओं की आधारशिला रखे जाने का कार्यक्रम है।

इन परियोजनाओं का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर सुरक्षा ढांचे को और मजबूत करना, सुरक्षा बलों की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ाना और आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है। सरकार लगातार देश की सीमाओं पर बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर, निगरानी व्यवस्था और तकनीकी क्षमता विकसित करने पर जोर दे रही है।

गृह मंत्री अपने दौरे के दौरान सशस्त्र सीमा बल यानी SSB के जवानों से भी मुलाकात करेंगे। SSB भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालता है।

गौरतलब है कि SSB भारत-नेपाल की करीब 1,751 किलोमीटर लंबी और भारत-भूटान की करीब 699 किलोमीटर लंबी सीमा की सुरक्षा करता है। दोनों सीमाएं सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और सिलीगुड़ी क्षेत्र इन सीमाओं के व्यापक सुरक्षा नेटवर्क का अहम हिस्सा है। भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा पर सुरक्षा की चुनौती अन्य अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से कुछ अलग है। इन सीमाओं पर लोगों की आवाजाही, भौगोलिक परिस्थितियां और खुली सीमा की प्रकृति सुरक्षा एजेंसियों के लिए अलग तरह की चुनौतियां पैदा करती हैं। ऐसे में इंटेलिजेंस इनपुट, स्थानीय स्तर पर समन्वय, निगरानी और तकनीकी संसाधनों की भूमिका लगातार बढ़ रही है।


नजर चिकन नेक’ पर


सिलीगुड़ी कॉरिडोर को आम बोलचाल में ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। यह भारत के नक्शे में एक संकरा भू-भाग है जो देश के उत्तर-पूर्वी राज्यों को भारत के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इसकी रणनीतिक स्थिति इसे देश के सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल करती है। ये कॉरिडोर लगभग 60 किलोमीटर लंबा और करीब 22 किलोमीटर तक चौड़ा बताया जाता है। इसके आसपास भारत की कई अंतरराष्ट्रीय सीमाएं हैं। एक तरफ बांग्लादेश, दूसरी तरफ नेपाल और भूटान तथा उत्तर में तिब्बत क्षेत्र है। इस वजह से सिलीगुड़ी कॉरिडोर का महत्व केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है, बल्कि ये पूरे पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। पूर्वोत्तर के आठ राज्यों तक सड़क और रेल संपर्क के लिए यह क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। किसी भी आपात स्थिति में इस कॉरिडोर की सुरक्षा और निर्बाध कनेक्टिविटी बेहद अहम हो जाती है।

यही कारण है कि केंद्र सरकार यहां इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा दोनों को लेकर लगातार समीक्षा करती रही है। अमित शाह की बैठक में सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा व्यवस्था, सीमा क्षेत्रों में निगरानी और सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय प्रमुख मुद्दों में हैं।



अमित शाह का पश्चिम बंगाल दौरा ऐसे वक्त में हो रहा है, जब भारत की पूर्वी सीमा पर सुरक्षा और बॉर्डर मैनेजमेंट लगातार केंद्र सरकार की प्राथमिकता में है। पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश के साथ लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है। इसके अलावा राज्य का उत्तरी हिस्सा नेपाल और भूटान की सीमाओं के करीब है।

इस लिहाज से सिलीगुड़ी में होने वाली बैठक का दायरा केवल भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा तक सीमित नहीं माना जा सकता। पूरे पूर्वी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था, सीमावर्ती इलाकों में कनेक्टिविटी और विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच समन्वय भी चर्चा का हिस्सा बन सकता है।

विभागीय सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार की रणनीति अब सीमा सुरक्षा को मल्टी-लेयर सिक्योरिटी मॉडल के तहत मजबूत करने की है। इसमें भौतिक सुरक्षा के साथ-साथ तकनीकी निगरानी, बेहतर सड़क और संचार नेटवर्क, इंटेलिजेंस इनपुट और एजेंसियों के बीच तत्काल सूचना साझा करना शामिल है।

अमित शाह के दौरे का एजेंडा केवल सीमा सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा। वह सिलीगुड़ी में तीन नए आपराधिक कानूनों पर आधारित एक प्रदर्शनी का भी उद्घाटन करेंगे। इन तीन कानूनों में भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) शामिल हैं। इन कानूनों ने औपनिवेशिक दौर से चले आ रहे पुराने आपराधिक कानूनों की जगह ली है और एक जुलाई 2024 से लागू हुए हैं।

प्रदर्शनी के जरिए नए कानूनों के प्रमुख प्रावधानों और उनके महत्व की जानकारी लोगों तक पहुंचाने की कोशिश की जाएगी। केंद्र सरकार देशभर में इन कानूनों को लेकर जागरूकता अभियान चला रही है, ताकि आम नागरिकों के साथ-साथ पुलिस, जांच एजेंसियों और न्याय व्यवस्था से जुड़े लोगों को इनके प्रावधानों की जानकारी हो।

अमित शाह की बैठक का एक अहम पहलू विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय भी है। सिलीगुड़ी जैसे रणनीतिक इलाके में ये समन्वय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

गृह मंत्री की बैठक में सुरक्षा एजेंसियों की मौजूदा तैयारियों के साथ भविष्य की चुनौतियों से निपटने की रणनीति पर भी चर्चा होने की संभावना है।

सिलीगुड़ी कॉरिडोर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर का सीधा संबंध सुरक्षा से है। मजबूत सड़क और संचार नेटवर्क न केवल आम लोगों की कनेक्टिविटी बेहतर करते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सुरक्षा बलों की तेज आवाजाही और लॉजिस्टिक सपोर्ट में भी मदद करते हैं।

अमित शाह के दौरे के दौरान जिन परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास होगा, उन्हें इसी व्यापक बॉर्डर सिक्योरिटी रणनीति के संदर्भ में देखा जा रहा है।

अमित शाह का ये दौरा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। एक तरफ भारत-नेपाल और भारत-भूटान सीमा की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभाल रहे SSB की तैयारियों की समीक्षा होगी। वहीं, दूसरी तरफ रणनीतिक सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा व्यवस्था पर भी नजर रहेगी। इसके अलावा बांग्लादेश सीमा से जुड़े व्यापक सुरक्षा परिदृश्य, पूर्वोत्तर की कनेक्टिविटी और सीमा क्षेत्रों में चल रही परियोजनाओं की प्रगति भी इस दौरे को महत्वपूर्ण बनाती है। कुल मिलाकर अमित शाह का सिलीगुड़ी दौरा ‘बॉर्डर सिक्योरिटी, बेहतर कॉर्डिनेशन और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर’ की केंद्र सरकार की रणनीति का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है।




Friday, August 14, 2026

महज 13 की उम्र में सीने पर खाई गोली, कहानी बिहार के बाल शहीदों की

आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं और लोकतंत्र में अपनी बात रखने की आजादी का अधिकार रखते हैं, उसके पीछे लाखों स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष, त्याग और बलिदान छिपा है। हजारों क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर झूले और असंख्य लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएं सहीं। लेकिन यह भी सच है कि इनमें से कई क्रांतिकारियों को हम सबने भूला दिया है। आज इस बात की आवश्यकता है कि हम अपने अंचल के उन लोगों की स्मृति को नमन करें जिनके बलिदान की वजह से हम सब को आजादी मिली।
बिहार के सीमांचल इलाके के इन्हीं गुमनाम और समर्पित सेनानियों की संघर्षगाथा आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं। जिस प्रकार अमर शहीद खुदीराम बोस ने कम उम्र में ही देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे, उसी प्रकार मात्र 13 वर्ष की अल्प आयु में 13 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश गोलियों का सामना करते हुए ध्रुव कुंडू ने कटिहार-पूर्णिया क्षेत्र में अद्वितीय शौर्य और बलिदान का परिचय दिया था।

देश की स्वतंत्रता के लिए 13 वर्ष की उम्र में बलिदान देने वाले अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में गुरुवार को पूर्णिया शहर में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

पूर्णिया शहर के ध्रुव उद्यान में अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहरवासियों ने हिस्सा लेकर ध्रुव कुंडू के साहस, संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए बलिदान को याद किया। कार्यक्रम के आयोजक, युवा सामाजिक कार्यकर्ता एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी शौर्य राय ने कहा कि ध्रुव कुंडू की स्मृति में शुरू की गई यह पहल किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्णिया के नागरिकों की साझी भावना है। उन्होंने कहा कि जिस बालक ने 13 वर्ष की उम्र में देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, उसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।

ध्रुव कुंडू का जन्म 1929 में कटिहार, बिहार के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉक्टर किशोरीलाल कुंडू के घर हुआ था। देशभक्त पिता का यह बेटा बचपन से ही अंग्रेज विरोधी गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता था| 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उनकी उम्र केवल 13 वर्ष थी फिर भी इन्होंने अंग्रेजों के प्रतिकार के लिए अपनी एक टोली बनाई| 11 अगस्त 1942 को ध्रुव के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने “रजिस्ट्री कार्यालय” के दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया। 13 अगस्त 1942 को कटिहार नगर के सब रजिस्ट्रार का कार्यालय भी उन्होंने ध्वस्त करा दिया| उन्होंने मुंसिफ कोर्ट सहित कई सरकारी दफ्तरों से अंग्रेजी हुकूमत के झंडे उखाड़ दिए और वहां भारतीय तिरंगा फहरा दिया। जब ध्रुव के नेतृत्व में क्रान्तिकारी दल मुंसिफ कोर्ट पर तिरंगा फहरा कर आगे बढ़ रहा था तो अंग्रेजों ने प्रतिकार के लिए क्रान्तिकारियों पर गोलियां चला दी| ध्रुव कुंडू घायल हो गए और उन्हें पूर्णिया सदर अस्पताल ले जाया गया लेकिन मात्र 13 वर्ष की उम्र में ही ध्रुव कुंडू ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

अपने वीर सपूत के बलिदान दिवस पर भले कुछ लोग हर साल अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करते हों, लेकिन उनकी यादों को सहेजने के लिए उनके नाम पर बने ध्रुव कुंडू स्मारक और पार्क अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

जिस उम्र में बच्चे खेलने कूदने में मस्त रहते उस उम्र में 13 वर्षीय ध्रुव कुंडू महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन में कूद पड़े थे। 1942 का यह आंदोलन 13 अगस्त तक आजादी की लहर बनकर फैल चुकी थी। जब गांधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन और करो या मरो का नारा दिया था तो पूर्णिया में भी हजारों लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम छेड़ दिया था। इस दौरान धमदाहा में 25 अगस्त को हजारों लोगों की भीड़ ने धमदाहा और रुपौली थाना को घेरकर आग लगा दिया था। इस घटना में अंग्रेजों की तरफ से अंधाधुंध गोली चलाई गयी थी, जिसमें धमदाहा में 14 और रुपौली में सात सपूत शहीद हुये थे।

आज भी पूर्णिया के टाउन हॉल, धमदाहा और रुपौली में बने शहीद स्मारक में इन शहीदों का नाम लिखा हुआ है। इसके अलावा 1942 में शहीद हुये 13 वर्षीय कुताय साह और ध्रुव कुंडू का भी स्मारक बना है। लेकिन, आज ये सभी स्मारक और शहीद स्थल उपेक्षा का शिकार होकर गुमनामी की कगार पर हैं।

पूर्णिया के इन शहीदों के बारे में बताया जाता है कि 9 अगस्त 1942 को पूर्णिया शहर के सिपाही टोला के पास 13 साल के बच्चा कुताय साह के साथ सैकड़ों लोग जब स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेजों का विरोध कर रहे थे। उस समय अंग्रेज अधकारी ने कुताय साह को चेतावनी दी। लेकिन, निडर कुताय साह ने अपनी शर्ट का बटन खोलकर अंग्रेजों को ललकारते हुये आगे बढ़ गए और कहा कि चलाओ गोली। तभी अंग्रेज अधिकारी ने उनके सीने में गोली मार दी जिस कारण वह वहीं शहीद हो गए। इसके बाद ध्रुव कुंडू को भी अंग्रेजों ने गोली मार दी। दोनों शहीदों के शव को मधुबनी महावीर मंदिर के प्रांगण में लाया गया जहां उनके नाम पर ध्रुव कुताय उद्यान बना है। लेकिन यह ऐतिहासिक धरोहर बदहाली और उपेक्षा का शिकार है।

सिपाही टोला मे बने कुताय साह स्मारक और बनभाग में बने ध्रुव कुन्डू का स्मारक भी जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। 

गुरुवार को पूर्णिया में अमर शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में स्थानीय लोगों की भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि लोग अपने अंचल की स्मृति को मिटने नहीं देंगे। 

कार्यक्रम के आयोजक शोधार्थी Shourya Roy ने बताया कि पूर्णिया और सीमांचल क्षेत्र के जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया है, उन्हें इतिहास और सार्वजनिक स्मृति में उनका वाजिब स्थान मिलना चाहिए। स्थानीय इतिहास और नायकों को संजोने से न केवल क्षेत्रीय पहचान मजबूत होती है, बल्कि युवाओं में देशप्रेम की भावना भी बलवती होती है।


Friday, August 07, 2026

संसद में जारी गतिरोध खत्म हो पाएगा?





मौजूदा मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन बिल को पारित कराने के लिए केंद्र सरकार अपनी अंतिम कोशिशों में जुट गई है। संसद में जारी गतिरोध खत्म करने के लिए संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजिजू ने तीन दिन में तीसरी बार लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से बात कर मनाने का प्रयास किया।

जैसा कि हम सभी को पता है कि इस सत्र में अभी तक लोकसभा में एक भी प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका है। पांच बिल पास हुए हैं, लेकिन बिना चर्चा के। यहां तक कि जब लोक परीक्षा संशोधन विधेयक पेश किया गया, तब भी वक्त का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पाया। भले ही बिल पास हो रहे हों और सरकार अपने विधायी कार्य आगे बढ़ा रही हो, लेकिन यह तस्वीर लोकतंत्र के लिए अच्छी नहीं है। संसदीय परंपरा में बहस और चर्चा सदन की कार्यवाही के सबसे जरूरी अंग हैं। इसी से बेहतरी का रास्ता मिलता है।

सूत्रों के अनुसार, नीट पेपर लीक आंदोलन में बल प्रयोग पर गृह मंत्री अमित शाह संसद में बयान दे सकते हैं, जिसके बाद गतिरोध खत्म होने की उम्मीद है। हालांकि,  नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पुरानी शर्तों को दोहराते हुए इस मसले पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की सलाह दी है। वहीं, राज्यसभा के सभापति ने भी रिजिजू से गतिरोध तोड़ने के लिए विपक्ष की भावनाएं शाह तक पहुंचाने को कहा है।

विपक्ष अगर गतिरोध तोड़ने पर राजी हो जाता है, तो सरकार की रणनीति मानसून सत्र का कार्यकाल बढ़ाने या स्वतंत्रता दिवस के तत्काल बाद विशेष सत्र बुलाकर परिसीमन व महिला आरक्षण का रास्ता साफ करने की है। सरकार के सूत्रों का कहना है कि इसके लिए जरूरी दो तिहाई सांसदों के समर्थन का रोडमैप तैयार है। डीएमके और एनसीपी (एसपी) ने सरकार को सकारात्मक संदेश दिया है। उधर, तमिलनाडु के सीएम विजय ने परिसीमन और इसके प्रभाव पर चर्चा के लिए आठ अगस्त को राज्य के सभी सांसदों की बैठक बुलाई है।

हालांकि, नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के साथ संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू की दो दिनों की बातचीत के बाद भी संसद में सरकार और कांग्रेस के बीच गतिरोध बरकरार है। इन सबके बीच कयास लगाए जा रहे हैं कि गृह मंत्री  अमित शाह आज संसद में विपक्ष के सवालों के जवाब दे सकते हैं जिसके बाद संसद में गतिरोध खत्म होने के आसार हैं।

दूसरी ओर राहुल गांधी विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) और महिला आरक्षण व परिसीमन से जुड़े विधेयकों पर सर्वदलीय बैठक की मांग पर अड़ गए हैं।

सर्वदलीय बैठक की जरूरत को नकारते हुए सरकार का कहना है कि सभी दलों से बात हो चुकी है। एक वरिष्ठ मंत्री ने कहा कि इन विधेयकों को पास कराने के लिए अगले एक-दो दिनों में फैसला ले लिया जाएगा।

गौरतलब है कि संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त को समाप्त हो रहा है। ऐसे में अगला हफ्ता अहम हो सकता है। दरअसल विपक्ष और खासतौर पर कांग्रेस के साथ चल रहे गतिरोध को दूर करने के लिए सरकार की ओर से बुधवार को गंभीर पहल शुरू हुई।

रिजीजू और राहुल गांधी की लगभग 50 मिनट तक हुई मुलाकात में नेता प्रतिपक्ष ने सहयोगी दलों से सलाह-मशविरा के लिए समय मांगा।

गुरुवार को विपक्षी गठबंधन आईएनडीआईए के घटक दलों की बैठक में सरकार की पहल पर विस्तार से चर्चा हुई, जिसमें सर्वदलीय बैठक बुलाने का फैसला लिया गया। फिर रिजीजू और राहुल गांधी के बीच फोन पर बातचीत हुई। इसमें नेता प्रतिपक्ष ने सर्वदलीय बैठक बुलाने की विपक्ष की मांग रखी।

उधर, रिजीजू का कहना था कि सरकार की पहले ही सभी दलों से बातचीत हो चुकी, सिर्फ कांग्रेस से वार्ता बाकी है। दरअसल तीनों विधेयकों की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार इन्हें बिना चर्चा के पास कराने के पक्ष में नहीं है, लेकिन कांग्रेस के रवैये के कारण यह संभव नहीं हो पा रहा है। सरकार इन विधेयकों से जुड़े सभी पक्षों से बातचीत कर उनकी आशंकाओं को दूर करने का प्रयास कर रही है।

सरकार ने स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल कांग्रेस के विरोध के कारण महत्वपूर्ण विधेयकों को रोका नहीं जा सकता है। हंगामे के बीच लोकसभा और राज्यसभा दोनों से कई विधेयक पारित किए जा चुके हैं।

वर्तमान मानसून सत्र के केवल पांच कार्यकारी दिन बचे हैं, ऐसे में सत्र का कार्यकाल बढ़ाने को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी है। सूत्रों का दावा है कि सरकार के पास दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा हो गया है। लेकिन सदन में वोटिंग के लिए सही माहौल बनाने में विपक्ष के सहयोग की आवश्यकता होगी।

एक अटकल यह भी है कि यदि सरकार ने परिसीमन पर आगे बढ़ने का निर्णय लिया तो इसे पहले राज्यसभा में पेश किया जा सकता है जहां सरकार के लिए संख्या बल जुटाना अपेक्षाकृत आसान है। ऐसा माना जा रहा है कि इस मामले में अंतिम निर्णय शुक्रवार यानि आज लिया जा सकता है।

इन सबके बीच गृहमंत्री अमित शाह संसद भवन लगातार आ रहे हैं और अधिकारियों संग बैठक कर रहे हैं। बिते दिनों अमित शाह ने एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों पर फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने की पहल शुरू की। इस सिलसिले में उन्होंने ईसाई समुदाय से जुड़े विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात कर चर्चा की।

इसके पहले शाह कैथोलिक बिशप कांफ्रेंस आफ इंडिया के प्रतिनिधियों से मुलाकात कर चुके हैं। संसद भवन परिसर में हुई मुलाकात में ईसाई प्रतिनिधिमंडल ने एफसीआरए में प्रस्तावित संशोधनों को लेकर अपनी आशंकाओं को खुलकर रखा।

सूत्रों के अनुसार शाह ने उनकी आशंकाओं को दूर करते हुए कहा कि प्रस्तावित संशोधनों के बारे में कई तरह से दुष्प्रचार किए जा रहे हैं। उन्होंने साफ किया कि संशोधनों में ईसाई सहित सभी समुदायों के हितों का ख्याल रखा है।

उन्होंने इन संसोधनों की जरूरत के बारे में भी विस्तार से बताया। शाह ने कहा कि सरकार की कोशिश सिर्फ विदेशी अनुदान में पारदर्शिता लाने और उन्हें सुचारू बनाने की है। सूत्रों के अनुसार एफसीआरए बिल पर सदन में 12 अगस्त को चर्चा हो सकती है।



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Friday, July 31, 2026

न विधायक न MLC, फिर कैसे मंत्री बने हुए हैं?

क्या कोई व्यक्ति बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य बने लंबे समय तक मंत्री बना रह सकता है? क्या संविधान में दी गई 6 महीने की छूट को बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है? यह वैधानिक सवाल इन दिनों देश के सर्वोच्च न्यायालय के सामने आया है।

बिहार सरकार के मंत्री दीपक प्रकाश के मामले में देश की सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत ने साफ कहा कि यह पूरी तरह कानून की व्याख्या का मामला है और राज्य सरकार को बताना होगा कि कोई व्यक्ति छह महीने से अधिक समय तक निर्वाचित हुए बिना मंत्री पद पर कैसे बना रह सकता है। इस टिप्पणी के बाद बिहार की राजनीति के साथ-साथ संवैधानिक मामलों के जानकारों की नजर भी इस मामले पर टिक गई है।

सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को बिहार के मंत्री दीपक प्रकाश से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से सवाल करते हुए कहा कि बिहार सरकार में पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य नहीं है। फिर भी वह 6 महीने से ज्यादा समय से अपने पद पर कैसे बने हुए हैं।

याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत से याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि छह महीने से ज्यादा समय बीत चुका है। दीपक प्रकाश न विधायक हैं और न ही एमएलसी, इसके बावजूद वह मंत्री पद पर बने हुए हैं। वकील ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में दखल लेने की अपील करते हुए कहा, 'माई लॉर्ड, अब छह महीने से ज़्यादा हो गए हैं। वह मंत्री बने हुए हैं।'

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह मामला पूरी तरह से कानून से जुड़ा है। राज्य सरकार को यह बताना होगा कि दीपक प्रकाश कुशवाहा, जो विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, वो किस संवैधानिक आधार पर छह महीने से ज्यादा समय तक मंत्री पद पर बने हुए हैं? मंत्री बने रहने की अनुमति देने का संवैधानिक आधार क्या है।

यह याचिका दीपक प्रकाश के राज्य विधानसभा या विधान परिषद के सदस्य न होने के बावजूद बिहार के पंचायती राज मंत्री के तौर पर बने रहने की संवैधानिक वैधता से जुड़ी है।

इससे पहले, सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक कार्यकर्ता और व्हिसलब्लोअर राकेश कुमार सिंह की ओर से दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर बिहार सरकार को नोटिस जारी किया था। याचिका में बिहार में नई सम्राट सरकार बनने के बाद दीपक प्रकाश की मंत्री के तौर पर दोबारा नियुक्ति को चुनौती दी गई थी।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 164(4) से जुड़ा एक अहम संवैधानिक सवाल उठाया गया है, जो किसी ऐसे व्यक्ति को, जो विधायक नहीं है, अधिकतम छह महीने तक मंत्री के तौर पर काम करने की अनुमति देता है; इस अवधि के भीतर उस व्यक्ति को विधायिका का सदस्य बनना ज़रूरी होता है।

क्या है पूरा मामला?
गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 15 अप्रैल, 2026 को पद छोड़ने से पहले दीपक प्रकाश ने पंचायती राज मंत्री के रूप में चार महीने और 26 दिनों तक कार्य किया, जिसके साथ ही उनका कार्यकाल समाप्त हो गया।

इसके बाद अगले 22 दिनों तक उन्होंने कोई भी मंत्री पद नहीं संभाला। 7 मई, 2026 को सम्राट चौधरी द्वारा नई सरकार बनाने के बाद, प्रकाश ने निर्वाचित न होने के बावजूद फिर से मंत्री पद की शपथ ली।

इसके बाद 30 मई को दायर याचिका में उनकी नियुक्ति को अमान्य घोषित करने की मांग की गई है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह संविधान के साथ धोखाधड़ी है। क्योंकि, दीपक प्रकाश अब तक कुल मिलाकर छह महीने से अधिक समय से पद पर बने हुए हैं, जबकि वे किसी भी सदन के लिए निर्वाचित नहीं हुए हैं।

क्या कहता है कानून?
अनुच्छेद 164(4) प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री द्वारा नियुक्त किए जाने पर मंत्रियों को निर्वाचित होने के लिए छह महीने की छूट अवधि प्रदान करता है। इसमें कहा गया है, "कोई भी मंत्री जो लगातार छह महीनों की अवधि के लिए राज्य के विधानमंडल का सदस्य नहीं है, उस अवधि की समाप्ति पर मंत्री नहीं रहेगा।"

इसलिए, यदि कोई मंत्री छह महीने की अवधि के भीतर निर्वाचित नहीं होता है, तो उसे पद से इस्तीफा देना होगा।

क्यों अलग है बिहार का मामला?
बिहार का मामला इसलिए अलग है क्योंकि मंत्री दीपक प्रकाश ने लगातार छह महीने तक पद पर कार्य नहीं किया है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में वे चार महीने और 26 दिन तक मंत्री रहे, जो छह महीने की छूट अवधि के भीतर था। इसके बाद सीएम स्रमाट चौधरी द्वारा फिर से नियुक्त किए जाने के बाद से दीपक प्रकाश ने कुछ महीने ही सेवा की है। लेकिन कुल मिलाकर, वे बिना निर्वाचित हुए छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर बने रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल
बता दें कि किसी मंत्री के पदभार ग्रहण करने के महीनों बाद उसे निर्वाचित कराने की प्रथा अपने आप में विवादास्पद नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी मंत्री के लिए छह महीने की समय सीमा से पहले इस्तीफा देना, कुछ दिनों बाद फिर से पदभार ग्रहण करना और यह दावा करना कि छह महीने की अवधि नए शपथ ग्रहण की तारीख से फिर से शुरू हो जाएगी, यह कानूनी रूप से कितना सही है?

आने वाले 4 अगस्त को दीपक प्रकाश केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल एक मंत्री की कुर्सी का फैसला नहीं होगा। इससे यह स्पष्ट होगा कि क्या छह महीने की संवैधानिक छूट दोबारा ली जा सकती है या नहीं। यदि कोर्ट कहती है कि दोनों कार्यकाल जोड़कर अवधि गिनी जाएगी तो भविष्य में कोई भी सरकार इस तरह की नियुक्ति नहीं कर सकेगी। वहीं यदि कोर्ट नई शपथ के साथ नई छह महीने की अवधि मानती है तो यह संविधान की नई न्यायिक व्याख्या होगी, ऐसे में 4 अगस्त की सुनवाई पर सिर्फ बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीतिक और कानूनी नजरें टिकी रहेंगी।

Friday, July 24, 2026

सबकी निगाहें दिल्ली पर!





नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जारी छात्रों के विरोध प्रदर्शन के बीच गुरुवार देर रात जहां एक ओर प्रधानमंत्री खुद सोशल मीडिया पर संदेश देते दिखे, वहीं आखिरकार 26 दिन बाद सोनम वांगचुक ने भी अपना अनशन तोड़ दिया। लेकिन निगाह अभी भी देश की छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर ही है।

ऐसे में सवाल यही है कि अब आज क्या होगा?

ऐसा माना जा रहा है कि शुक्रवार का दिन भी काफी हलचल भरा रहने वाला है। दरअसल शुक्रवार को ही कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने देशव्यापी प्रदर्शन का ऐलान किया है।
CJP ने एक पोस्टर जारी कर लोगों से सभी जिलों और शहरों में शांतिपूर्ण तरीके से इकट्ठा होकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने की अपील की है। कॉकरोच पार्टी ने कल एक नया नारा भी दिया- 'Every District. One Day. One Demand'

इस पार्टी ने देशव्यापी प्रदर्शन में जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ मारपीट का विरोध करने की अपील की गई है।

शुक्रवार को CJP के प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में सुरक्षा चाक-चौबंद कर दी गई है। दिल्ली मेट्रो ने सुबह 7:30 बजे से ही 16 मेट्रो स्टेशन भी बंद कर दिए हैं। हालांकि इस वजह से लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ेगा।

जैसा कि कल देर रात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने छात्रों के नाम एक वीडियो जारी किया था, जिसमें उन्होंने भरोसा दिलाया कि पेपर लीक जैसी घटनाओं पर सख्त कार्रवाई करेगी। उन्होंने कहा कि युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। उन्होंने कहा कि शुक्रवार को कैबिनेट में पेपर लीक के खिलाफ और सख्त फैसला लिया जाएगा।

ऐसे में आज हम सभी की निगाहें कैबिनेट मीटिंग पर भी होगी। यह मीटिंग इसलिए अहम है, क्योंकि इसमें पेपर लीक को लेकर सख्त फैसला लिया जा सकता है। क्योंकि पीएम मोदी ने वीडियो संदेश में बताया कि फास्ट ट्रैक कोर्ट और कठोर सजा के प्रावधान के साथ मसौदे पर शुक्रवार को कैबिनेट में चर्चा होगी। उन्होंने बताया कि इस बिल को जल्द से जल्द सदन में पास कराया जाएगा।

कल देर शाम के घटनाक्रम को लेकर हर कोई अपने-अपने अंदाज में सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। दरअसल सरकार ने पेपर लीक से जुड़े मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट भी बना दी और आखिरकार 26 दिन बाद सोनम वांगचुक ने अनशन भी तोड़ दिया। इससे पहले शिक्षा सचिव का भी ट्रांसफर हुआ।


गौरतलब है कि सोनम वांगचुक ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नीट पेपर लीक को लेकर जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन के समर्थन में 28 जून को अनशन शुरू किया था। इसी बीच तबीयत खराब होने के बाद सोनम को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश पर सोनम को मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

अनशन तोड़ने के बारे में गुरुवार रात सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "अभी-अभी केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह तथा लेह-लद्दाख की सर्वोच्च समिति के वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में मैंने 26 दिनों के बाद अपना अनशन तोड़ा। इससे पहले विभिन्न राजनीतिक दलों के 65 सांसदों ने मुझसे मुलाकात की थी या पत्र लिखकर मुझसे अनशन तोड़ने का आग्रह किया था। यह देश में संभावित हिंसा को देखते हुए और विभिन्न शर्तों पर लंबी बातचीत के बाद किया गया। मैं जल्द ही एक अलग वीडियो में इन शर्तों का विस्तार से वर्णन करूंगा। इस बीच, मैं आप सभी से आग्रह करता हूं कि किसी भी प्रकार की हिंसा को रोकने के लिए पूरी तरह सतर्क रहें।"

शिक्षा सचिव का तबादला
बदलते घटनाक्रम के बीच गुरुवार रात केंद्र सरकार ने शिक्षा मंत्रालय में शिक्षा सचिव विनीत जोशी का ट्रांसफर कर दिया। उनकी जगह नरेश पाल गंगवार को शिक्षा विभाग का नया सचिव नियुक्त किया गया। विनीत जोशी को अब पंचायती राज मंत्रालय का सचिव बनाया गया है। उनके साथ-साथ 10 और सीनियर आईएएस अधिकारियों के तबादले किए गए।

इन्हीं सबके बीच गुरुवार रात को पेपर लीक से जुड़े मामलों के ट्रायल के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट को नोटीफाई किया गया। दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट में फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाई जाएगी। दिल्ली हाई कोर्ट ने तीस हजारी कोर्ट के मीडिएशन सेंटर की इंचार्ज जज जस्टिस अनु ग्रोवर बालीगा का तबादला राउज एवेन्यू कोर्ट में स्पेशल जज के तौर पर किया है। पेपर लीक से जुड़े मामलों की सुनवाई यही करेंगी।

दूसरी तरफ नीट पेपर लीक मामले को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देर रात जारी किए गए वीडियो पर लोकसभा में नेता विपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने सवाल उठाए हैं। राहुल गांधी ने सरकार के सामने प्रमुखता से तीन मांगें रखी हैं और देर रात जारी किए गए वीडियो को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधा।

राहुल गांधी ने एक्स पर पोस्ट कर कहा, "मिस्टर मोदी, हमारे छात्र धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं. आधी रात को जारी इस बेकार वीडियो से उनकी समझदारी का अपमान न करें।"

राहुल गांधी ने आगे कहा कि सरकार इन तीन मांगों को पूरा करे। इनमें पहली और मुख्य मांग है धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा।

राहुल गांधी की दूसरी मांग है संसद चलो मार्च के दौरान छात्रों पर हुए लाठीचार्ज को लेकर, उनका कहना है कि जिन्होंने भी छात्रों को पीटा है उन सभी को सजा दी जाए। राहुल गांधी की तीसरी मांग है कि सरकार इन छात्रों से माफी मांगे. इससे पहले राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मोदी सरकार पर गंभीर सवाल उठाए थे।





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Friday, July 17, 2026

धनरोपनी महोत्सव के बहाने बात धान की!




बच्चों को प्रकृति से जोड़ने का प्रयास हर व्यक्ति को करना चाहिए, खासकर खेती- बाड़ी की दुनिया से शहरी बच्चों को रूबरू कराते रहना चाहिए। भागमभाग भरी जीवन शैली में किसानी की दुनिया से नई पीढ़ी को परिचित कराना भी हम सबका काम है। इसी कड़ी में गांव में धनरोपनी उत्सव को करीब से बच्चों को दिखाने का काम किया गया, जिसकी शुरुआत एक दशक पहले चनका रेसीडेंसी ने की थी।  
हमारे यहां धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है। धान हमारे लिए फसल भर नहीं है, वो हम सबके लिए ‘धान्या’ है। धान की बाली हमारे घर को ख़ुशी से भर देती है। साल भर वो कितने प्यार से हमारे घर आँगन को सम्भालती है। आँगन के चूल्हे पर भात बनकर या दूर शहरों में डाइनिंग टेबल पर प्लेट में सुगंधित चावल बनकर, धान सबका मन मोहती है।

हमारे अंचल में पहले धान का नाम बहुत ही प्यारा हुआ करता था, मसलन 'पंकज' 'मनसुरी', 'जया', 'चंदन', 'नाज़िर', 'पंझारी', 'बल्लम', 'रामदुलारी', 'पाखर', 'बिरनफूल' , 'सुज़ाता', 'कनकजीर' , 'कलमदान' , 'श्याम-जीर', 'विष्णुभोग' आदि। समय के साथ हाइब्रीड ने किसानी की दुनिया बदल दी। एक किसान के तौर पर मन तो यही करता है कि उन पुराने बीज को इकट्ठा कर पूर्णिया का बीज बैंक बनाया जाए, जहां हम अपने अंचल के धान को एक ब्रांड के तौर पर पेश करते।

बीज बैंक के बारे में लिखते हुए मुझे असम के जोरहाट के किसान मोहान चन्द्र बोरा याद आ रहे हैं। उन्होंने अन्नपूर्णा सीड लाइब्रेरी बनाई है, जहां धान की 270 किस्म के बीज हैं।  

धान की रोपनी और कटाई की बात जब भी होती है तो मन में कई गीत भी गूंजने लगते हैं जो अब खेत में सुनाई नहीं देते हैं। सुख की तलाश हम फसल की तैयारी में ही करते हैं। एक गीत पहले सुनते थे, जिसके बोल कुछ इस तरह हैं -
"सब दुख आब भागत, कटि गेल धान हो बाबा..."

हम खेती किसानी दुनिया के लोग अन्न की पूजा करते हैं। धान की जब भी बात होती है तो जापान का जिक्र जरूर करता हूं। जापान के ग्रामीण इलाक़ों में धान-देवता इनारी का मंदिर होता ही है।

जापान में एक और देवता हैं, जिनका नाम है- जीजो। जीजो के पांव हमेशा कीचड़ में सने रहते हैं। कहते हैं कि एक बार जीजो का एक भक्त बीमार पड़ गया, भगवान अपने भक्तों का खूब ध्यान रखते थे। उसके खेत में जीजो देवता रात भर काम करते रहे तभी से उनके पांव कीचड़ में सने रहने लगे।

धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है। मंहगाई और तमाम तरह की राजनीतिक उलट-बांसी के बीच किसानी की बात हमें उम्मीद से भर देती है और हम पूर्णिया से असम और जापान की बात करने लगते हैं जिसके केंद्र में केवल और केवल धान ही है।

जापान की दो प्रमुख कम्पनियां होंडा और टोयोटा का अर्थ धान होता है। होंडा का मतलब मुख्य धान खेत और टोयोटा का मतलब बम्पर फसल वाला धान खेत। जापान में एक हवाई अड्डा है- नरीटा, इसका अर्थ है लहलहाता धान खेत।

दरअसल जापान में धान को प्रधानता दी जाती है। ऐसी बात नहीं है कि वहां अन्य फसलों की खेती नहीं होती है लेकिन यह बड़ी बात है कि वहां खेत का अर्थ धान के खेत से जुड़ा है। वहां धान की आराधना की बड़ी पुरानी परंपरा है।
हम भी धान को कम स्नेह नहीं देते। हमारे यहां तो धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है। धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है। बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध के पिता का नाम था- शुद्धोदन यानी शुद्ध चावल। वट वृक्ष के नीचे तप में लीन गौतम बुद्ध ने एक वन-कन्या सुजाता के हाथ से खीर खाने के बाद बोध प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए. इस कहानी को पढ़कर लगता है शायद इसी वजह से 70 के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाक़ों में एक पुरानी नस्ल की धान का नाम 'सुज़ाता' होगा। इस धान का चावल बहुत ही सुगन्धित हुआ करता था।

गूगल करिएगा तो पता चलेगा कि दुनिया का 90 प्रतिशत धान एशिया में ही उगाया और खाया जाता है। धान के पौधे को हर तरह की जलवायु पसंद है. नेपाल और भूटान में 10 हजार फुट से ऊंचे पहाड़ हों या केरल में समुद्रतल से भी 10 फुट नीचे पाताल-धान दोनों जगह लहराते हैं। ऐसे में जापान ने धान और धान के खेतों की जो ब्रांडिंग की है इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

वैसे आपने कभी इस बात का पता लगाया है कि धान के नाम पर अपने देश में कोई कंपनी है या फिर कोई व्यावसायिक प्रतिष्ठान है? सारी लड़ाई अन्न को लेकर है। हम सभी अपनी ज़िंदगी सुख-चैन से जीने के लिए मेहनत करते हैं ताकि डाइनिंग टेबल पर हम भोजन कर सकें और दूसरों को भी खिला सकें लेकिन दूसरी ओर खेतों में लहलहाती फ़सलों के नाम पर क्या हम किसी कम्पनी का नाम नहीं रख सकते? या अपने घर का नाम हम धान- गेहूं- मक्का- गन्ना के उन्नत नस्लों के नाम पर नहीं रख सकते?

खेती – किसानी की दुनिया से नई पीढ़ी को करीब लाने के उदेश्य से 2014 में जब चनका रेसीडेंसी ने धनरोपनी उत्सव की शुरुआत की थी तो इस बात अंदाजा नहीं था कि यह कारवां बढ़ता ही चला जाएगा। इस बार भी हमने धन-रोपनी महोत्सव आयोजित किया। इस बार की धन रोपनी कई मायनों में खास रही क्योंकि इसमें बिहार बाल भवन किलकारी के कला प्रेमी बच्चों ने न केवल हिस्सा लिया बल्कि धान रोपाई से सम्बन्धित गीतों को अपनी आवाज़ भी दी।

धान के बहाने यह कहानी हमने इसी कारण सुनाई क्योंकि अन्न ही जीवन है और अन्न को हम सबके घर तक पहुंचाने वाले किसानी दुनिया के लोगों के जीवन से हम सब दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में जब भी आप बरसात के इस मौसम किसी गांव के करीब से गुजरिएगा तो एक बार जरूर किसी खेत के पास ठहरने का काम करिएगा, ताकि आप भी समझ सकें, कैसी है किसानों की दुनिया, किस रंग में हैं धान के खेत ! 




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अमित शाह का दो दिवसीय बंगाल दौरा: सीमा सुरक्षा को मजबूत करने पर रहेगा जोर, आला अधिकारियों के साथ करेंगे बैठक

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 17 से 19 जुलाई तक बंगाल के दो दिवसीय दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वह उत्तर बंगाल के सिलीगुड़ी और राजधानी कोलकाता में सीमा सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन तथा विभिन्न विकास परियोजनाओं की समीक्षा करेंगे। साथ ही कई कार्यक्रमों में भी हिस्सा लेंगे।
प्रदेश भाजपा द्वारा जारी निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार गृह मंत्री शुक्रवार रात नौ बजे उत्तर बंगाल के बागडोगरा हवाई अड्डे पर पहुंचेंगे।

वहां से वह सिलीगुड़ी के कदमतला स्थित सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के उत्तर बंगाल फ्रंटियर मुख्यालय जाएंगे, जहां वह रात्रि विश्राम करेंगे।

अगले दिन 18 जुलाई, शनिवार को वह सुबह साढ़े 11 बजे जुमागाछ स्थित बीएसएफ की 18वीं बटालियन की सीमा चौकी पहुंचेंगे। यहां प्रहरी सम्मेलन में भाग लेने के साथ पौधारोपण करेंगे तथा विभिन्न परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन करेंगे। वह सीमा प्रहरियों से संवाद भी करेंगे।

इसके बाद सिलीगुड़ी स्थित उत्तरकन्या सभागार में विभिन्न समीक्षा बैठकों में हिस्सा लेंगे। इनमें प्रशासनिक बैठक, बंगाल में नए आपराधिक कानूनों के क्रियान्वयन की समीक्षा तथा जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण व्यवस्था को लेकर बैठक शामिल है। शनिवार शाम को गृह मंत्री कोलकाता पहुंचेंगे और यहां अलीपुर स्थित सरकारी सौजन्य गेस्ट हाउस में रात्रि विश्राम करेंगे।

19 जुलाई, रविवार को अमित शाह सौजन्य गेस्ट हाउस में बंगाल की कानून-व्यवस्था को लेकर उच्चस्तरीय बैठक करेंगे। इसके बाद वह अलीपुर स्थित राष्ट्रीय पुस्तकालय में नवनिर्मित देश के पहले वर्ड म्यूजियम का उद्घाटन करेंगे।

दौरे के अंतिम कार्यक्रम में गृह मंत्री कोलकाता के न्यूटाउन स्थित विश्व बंगला कन्वेंशन सेंटर में आयोजित कार्यक्रम में वीडियो कांफ्रेंसिंग के माध्यम से हावड़ा जिले के सांकराइल में अमूल डेयरी के प्रस्तावित दुनिया के सबसे बड़े दही संयंत्र की आधारशिला रखेंगे।

Friday, July 10, 2026

आखिर क्यों महत्वपूर्ण साबित होगी ‘बॉर्डर डिस्ट्रिक्ट SPs कॉन्फ्रेंस-2026’ !

केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुरुवार नौ जुलाई को नई दिल्ली में सीमावर्ती जिलों के पुलिस अधीक्षकों के साथ एक बैठक की। इस महत्वपूर्ण बैठक का नाम ‘बॉर्डर डिस्ट्रिक्ट SPs कॉन्फ्रेंस-2026’ दिया गया था। सम्मेलन में बॉर्डर से लगते 119 जिलों के एसपी और अन्य अधिकारी शामिल हुए।
बैठक में जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तराखंड, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्य सहित सीमावर्ती राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस अधीक्षक शामिल हुए थे।

माना जा रहा है कि इस बैठक में अवैध घुसपैठ पर लगाम लगाने के प्लान पर सबसे अधिक चर्चा हुई। देश में अवैध घुसपैठिया के नेटवर्क को खत्म करने पर अमित शाह लगातार बोलते रहे हैं। ऐसे में यह मीटिंग अहम मानी जा रही थी , क्योंकि देश को नक्समु्क्त बनाने के बाद मोदी सरकार अब अवैध घुसपैठ पर एक्शन की तैयारी में है।

गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई बैठक में घुसपैठ, अवैध आप्रवासन, आबादी में बदलाव, बॉर्डर सिक्योरिटी, ड्रोन से खतरा और नशीले पदार्थों की तस्करी जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। यह बैठक अवैध आप्रवासन के खिलाफ केंद्र के तेज अभियान के बीच अहम है। केंद्र ने इसे बांग्लादेश के साथ अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर पर स्थित जिलों की आबादी की बनावट को बदलने की एक संगठित कोशिश का हिस्सा बताया है। बैठक में सुरक्षा से जुड़ी नई चिंताओं को उजागर कर और इन चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटने के उपायों पर विचार-विमर्श किया गया।

सीमांत जिला पुलिस अधीक्षक सम्मेलन-2026 को संबोधित करते हुये अमित शाह ने कहा कि इस सम्मेलन से समग्र सीमा सुरक्षा के दृष्टिकोण को संस्थागत रूप मिला है और आने वाले समय में तटीय सीमा सुरक्षा को सुनिश्चित करने की दिशा में भी हम समग्रता से आगे बढ़ेंगे। उन्होंने कहा कि इस सम्मेलन में सीमाओं की सुरक्षा से जुड़ी समस्याओं पर चर्चा, निराकरण की चिंता और इस दिशा में उपयुक्त उपायों को नीतिगत स्वरूप देने का काम होगा। मोदी सरकार, संबद्ध सीमा रक्षक बल, राज्य और जिला प्रशासन, भारत सरकार के संबंधित हितधारक और स्थानीय नागरिकों के परस्पर जुड़ाव के साथ एक मजबूत चतुष्कोणीय सुरक्षा ग्रिड का निर्माण कर रही है।

केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने कहा, ‘स्मार्ट बॉर्डर की कल्पना पर आधारित भारत की बॉर्डर सुरक्षा व्यवस्था आने वाले समय में विश्व में सबसे आधुनिक होगी। सुरक्षित सीमा, समृद्ध सीमांत और सजग समाज के साथ ही देश सुरक्षित हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश को जम्मू-कश्मीर और नॉर्थईस्ट में आतंकवाद और नक्सलवाद से निजात मिली है, जो हमारी साझी सफलता का सूचक है। आने वाले तीन सालों में हम नारकोटिक्स की समस्या को गंभीर क्षति पहुंचाकर इस पर विजय प्राप्त करेंगे। ’

उन्होंने कहा, ‘देश को घुसपैठियामुक्त बनाने और घुसपैठ हो ही न सके, इसके लिए एक मजबूत तंत्र का निर्माण कर रहे हैं। पहले समस्याएं स्थायी और समाधान अस्थायी थे, मोदी सरकार में समस्याओं की जड़ पर प्रहार कर समाधानों को स्थायी बनाया जा रहा है. मोदी सरकार ने बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर में 400 प्रतिशत वृद्धि कर वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ इसे आगे बढ़ाया है।’

अमित शाह ने कहा, ‘पीएम मोदी ने वायब्रेंट विलेजेज प्रोग्राम के तहत देश के अंतिम गांव को देश का प्रथम गांव कहा है. इसके तहत पलायन रोकने, रोजगार बढ़ाने और सरकारी योजनाओं का शत प्रतिशत क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है. मोदी ने जनसांख्यिकी परिवर्तन का अध्य्यन करने, उसमें असामान्य कारणों से हो रही वृद्धि को चिह्नित करने और भविष्य में इसे रोकने के उपाय सुझाने के लिए डेमोग्राफी मिशन की शुरूआत की है।‘

केंद्रीय गृह मंत्री ने सीमांत क्षेत्रों में असामान्य कारणों से जनसांख्यिकी में हो रहे बदलाव की सूचना जल्द से जल्द नीचे से उच्चतम स्तर तक पहुंचाने के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा, ‘मोदी सरकार 31,000 करोड़ रुपये की लागत से 1,610 किलोमीटर लंबे म्यांमार बॉर्डर पर बाड़बंदी कर रही है।’

उन्होंने कहा, ‘प्रॉक्सी वार, घुसपैठ, कट्टरपंथ का प्रसार, नारकोटिक्स, तस्करी, ड्रोन, साइबर अपराध, संगठित अपराध और जनसांख्यिकीय परिवर्तन रोकना, सीमा को रहने लायक बनाना और वहां से पलायन रोकना और सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारे उद्देश्य है।’ 

अमित शाह लगातार कहते रहे हैं कि हम एक ऐसा मजबूत सुरक्षा तंत्र बना रहे हैं। जिससे देश को घुसपैठियां मुक्त करने के साथ ही घुसपैठ ही नहीं हो सकेगी। गुरुवार को हुई बैठक में भी उन्होंने कहा कि उन्होंने कहा कि जिस तरह से देश को जम्मू कश्मीर और नॉर्थ-ईस्ट में आतंकवाद और नक्सलवाद से निजात मिली है। घुसपैठ को रोकने के साथ ही आने वाले 3 सालों में सरकार नारकोटिक्स की समस्या पर भी विजय प्राप्त करेगी। 

गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के दिमाग में सीमांत (बॉर्डर) जिलों की सुरक्षा और डेमोग्राफी (जनसांख्यिकी) को संतुलित रखने की सबसे बड़ी प्राथमिकता चल रही है। उनके मुख्य विजन और रणनीतियों में शामिल है। वे सीमावर्ती जिलों में हो रहे असामान्य जनसंख्या परिवर्तन और अवैध घुसपैठ के मूल कारणों का पता लगाने और सुधार के लिए एक विशेष मिशन की शुरुआत कर चुके हैं। ऐसे में इस बैठक के बाद सीमांत जिलों में होने वाली घटनाओं पर सबकी निगाहें रहेंगीं।

पंजाब :धर्म और पंथ की रणनीति से लेकर लोक लुभावन योजना तक!




पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने बुधवार को धुरी से बहुप्रतीक्षित ‘मुख्यमंत्री मावां-धीयां सत्कार योजना' लॉन्च की. लाभार्थी महिलाओं के खातों में तीन महीने की सम्मान राशि एकमुश्त जमा की गई. योजना के तहत पंजाब की महिलाओं के खाते में 1000-1500 रुपये हर महीने दिए जाने हैं. सामान्य वर्ग की महिलाओं को 1000 रुपये, और अनुसूचित जाति की महिलाओं को 1500 रुपये . 

आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल
ने मुख्यमंत्री मावां-धीयां सत्कार योजना को दुनिया का सबसे बड़ा महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम बताया था. सोशल साइट एक्स पर अरविंद केजरीवाल ने लिखा, पंजाब की सभी मां, बहनों और बेटियों को बहुत-बहुत बधाई. 1 जुलाई को उनके खाते में तीन महीने के पैसे एक साथ आएंगे. हर जनरल कैटेगरी की महिला को तीन हजार और हर SC कैटेगरी की महिला को 4500 रुपये मिलेंगे. एक परिवार में यदि एक से अधिक महिलाएं हैं, तो हर महिला को ये सम्मान राशि मिलेगी. पूरी दुनिया का ये सबसे बड़ा महिला सशक्तिकरण कार्यक्रम है.

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर 8 मार्च को विधानसभा के विशेष सत्र में इस योजना की घोषणा की थी. उसके बाद वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में इस योजना के लिए 9300 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया. पंजाब सरकार का दावा है कि योजना से पंजाब की करीब 97 फीसदी वयस्क महिलाओं को फायदा मिलेगा.

इस हफ्ते पंजाब की इस घटनाक्रम को देखकर आपको असम की याद आई होगी. देखा जाए तो भगवंत मान भी असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के रास्ते पर चल रहे हैं. असम चुनाव से पहले हिमंता बिस्वा सरमा ने महिलाओं को बिहू के मौके पर एकमुश्त बड़ी रकम की सौगात दी थी. 

आम आदमी पार्टी की सरकार ने दिल्ली में महिलाओं के लिए योजना शुरू की थी, लेकिन वक्त रहते उस पर अमल नहीं हो सका. लगता है, भगवंत मान दिल्ली में आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल की हार से सबक लेते हुए चुनाव से पहले ही महिलाओं के खाते में पैसा भेजने का फैसला किया है. 

चुनावी राजनीति में जनता तक रकम की सौगात पहुंचाने की कहानी अब हर राज्य में चुनाव से पहले देखने को मिल रही है, ऐसे में पंजाब की सरकार भी क्यों पीछे रहती! 

इन सब लोक लुभावन योजनाओं के बीच पंजाब की राजनीति धर्म और पंथ के इर्द-गिर्द भी घूमने लगी है। पिछले कुछ दिनों के भीतर ऐसे कुछ सियासी घटनाक्रम सामने आए हैं जिनका असर निश्चित ताैर पर भावी चुनाव पर पड़ेगा। इसी के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियां भावी समीकरणों से नफा और नुकसान के आकलन में जुट गई हैं।

दलों को जहां पंथक वोट बैंक बिखरने की आशंका सता रही हैं वहीं सिख-हिंदू एकता पर भी दलों की नजर गड़ी है।

पंजाब में सिख और हिंदू के बिखराव की बात कोई नहीं करेगा क्योंकि जीत के लिए यहां दोनों समुदाय के लोगों का वोट बेहद जरूरी है। यहां हिंदू और मुसलमान का शोर भी नहीं सुनाई देगा मगर फिर भी सियासत धूरी धार्मिक समीकरणों के आसपास ही घूमेगी।

शिरोमणि अकाली दल (शिअद) प्रदेश की सबसे पुराने पंथक पार्टी मानी जाती है मगर साल 2022 के बाद से थोड़ा हाशिये पर चल रही है। पहला झटका तब लगा जब शिरोमणि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) का गठन हुआ और दूसरी चोट शिरोमणि अकाली दल (पुनर सुरजीत) ने पहुंचाई। इस दौरान शिअद बिखरा और कुछ दिन पहले ही दाखा से शिअद के विधायक मनप्रीत सिंह अयाली भी शिरोमणि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के खेमे में चले गए। अयाली बड़े पंथक नेता माने जाते हैं, जो जाहिर तौर पर शिअद को नुकसान पहुंचाकर वारिस पंजाब दे को मजबूत करेंगे। इस घटनाक्रम के बाद पंथक वोट बैंक का बिखराव निश्चित माना जा रहा है।

दूसरी ओर, आम आदमी पार्टी पिछले दिनों से कुछ बड़े पंथक मसलों से संबंधित विवादों में उलझी हुई है। पहला विवाद बिना एसजीपीसी और श्री अकाल तख्त की रायशुमारी के सूबे में नया बेअदबी रोधी संशोधन कानून लागू कराना और दूसरा विवाद सीएम भगवंत सिंह मान की कथित विवादित वायरल वीडियो से जुड़ा है।

दोनों मामलों में श्री अकाल तख्त साहिब ने संज्ञान लेकर सीएम के खिलाफ हुक्मनामा जारी किया है। आप हाईकमान को लगता है कि इससे पंथक वोट बैंक का नुकसान हो सकता है, लिहाजा पार्टी ने अब हिंदू वोट बैंक पर भी पूरी नजरें गढ़ा ली हैं। पिछले दिनों हिंदू समुदाय के लोगों से जुड़ी पांच बड़ी घोषणाएं इसी का नतीजा हैं।

भाजपा-कांग्रेस को भी मालूम है कि जीत के लिए हिंदू-सिख वोट बैंक बेहद जरूरी है। भाजपा यह भी जानती है कि सूबे में पंथक वोट बैंक हमेशा उनसे दूर ही रहा है मगर इस बार पार्टी की रणनीति थोड़ी अलग है। भाजपा कुछ पंथक नेताओं को पार्टी से जाेड़ रही है और अध्यक्ष पद का चेहरा भी इस बार सिख ही दिया है। इतना हीं नहीं पार्टी महाराजा रणजीत सिंह के सरकार-ए-खालसा समावेशी शासन मॉडल को उजागर करते हुए यह साबित करने की कोशिश की है कि राज्य में सामाजिक सद्भाव और व्यापक प्रतिनिधित्व के प्रति भाजपा पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

कांग्रेस के पास सिख नेताओं की कमी तो नहीं है मगर फिलहाल पंथक और हिंदू वोट बैंक पर पकड़ और बनानी पड़ेगी। कांग्रेस का फोकस जट सिख और एससी वोट बैंक पर ज्यादा हो सकता है।

बीते दिनों बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों के दफ्तर में महाराजा रणजीत सिंह की तस्वीर लगाकर पार्टी ने पंथक राजनीति को लेकर बड़ा संदेश देने की कोशिश की थी. 2011 की जनगणना के अनुसार पंजाब की कुल आबादी में सिख समुदाय की हिस्सेदारी करीब 58 प्रतिशत है, जबकि हिंदू आबादी लगभग 39 प्रतिशत है. ऐसे में राज्य की राजनीति में सिख वोट बैंक की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है. पंजाब में अक्सर धार्मिक और पंथक मुद्दे चुनावी चर्चा के केंद्र में रहते हैं.

अब सामने विधानसभा चुनाव है! पंजाब के चुनाव पर सबकी नज़र है। आने वाले दिनों में पंजाब से ऐसे ही कई कहानियां सामने आएगी और चुनावी प्लेट के जायेके का रंग बदलने की कोशिश करेगी!

Girindra Nath Jha
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Friday, June 26, 2026

कौन हैं IPS महेश दीक्षित !


वरिष्ठ आइपीएस अधिकारी महेश दीक्षित इंटेलिजेंस ब्यूरो के नए प्रमुख होंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी है।

आंध्र प्रदेश कैडर के 1993 बैच के आइपीएस अधिकारी दीक्षित वर्तमान आइबी निदेशक तपन कुमार डेका की जगह लेंगे।
वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी डॉ. महेश दीक्षित को देश की सबसे अहम आंतरिक खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) का नया डायरेक्टर बनाया गया है. महेश दीक्षित 1993 बैच के आंध्र प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी हैं. वे अब तक आईबी में स्पेशल डायरेक्टर के तौर पर अहम जिम्मेदारी संभाल रहे थे. दीक्षित मौजूदा आईबी प्रमुख तपन कुमार डेका की जगह लेंगे. डेका 2022 से आईबी की कमान संभाल रहे थे.


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने उनकी नियुक्ति को मंजूरी दे दी है. कैबिनेट की नियुक्ति समिति द्वारा जारी आदेश में लिखा है कि कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमिटी ने इंटेलिजेंस ब्यूरो के स्पेशल डायरेक्टर, IPS महेश दीक्षित को इंटेलिजेंस ब्यूरो का डायरेक्टर बनाने को मंजूरी दे दी है. यह नियुक्ति आईपीएस तपन कुमार डेका की जगह पर होगी. उनका कार्यकाल पद संभालने की तारीख से दो साल या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, तक रहेगा.


कौन हैं महेश दीक्षित!

डॉ महेश दीक्षित देश के सबसे अनुभवी इंटेलिजेंस ऑफिसर्स में गिने जाते हैं. उनके करियर के सबसे अहम अध्यायों में से एक अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने से पहले की तैयारी में उनकी भूमिका थी. 

तत्कालीन राज्य के जम्मू-कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठन के बाद, दीक्षित को इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण इंटेलिजेंस जिम्मेदारियां सौंपी गईं. अधिकारियों का मानना ​​है कि उन्होंने राजनीतिक रूप से संवेदनशील दौर में जनता का भरोसा बहाल करने में मदद की और साथ ही आतंकवाद और अलगाववादी तत्वों से पैदा होने वाली सुरक्षा चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना किया.

जम्मू-कश्मीर में अहम इंटेलिजेंस जिम्मेदारियां संभालने के दौरान, श्रीनगर ने 2023 में G20 टूरिज्म वर्किंग ग्रुप की बैठक की सफलतापूर्वक मेजबानी की. इस कार्यक्रम ने काफी अंतरराष्ट्रीय ध्यान और भागीदारी आकर्षित की. शिखर सम्मेलन का सुचारू संचालन क्षेत्र के बेहतर होते सुरक्षा माहौल को दिखाने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि माना गया. इसी दौरान, कई विदेशी राजनयिक प्रतिनिधिमंडलों ने कश्मीर का दौरा किया, जो इस क्षेत्र के साथ बढ़ते अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव को दर्शाता है. इस मामले की जानकारी रखने वाले अधिकारियों ने बताया कि दीक्षित ने जमीनी हकीकत और बदलती परिस्थितियों का सही आकलन करने में अहम भूमिका निभाई. इससे कूटनीतिक स्तर पर बेहतर तालमेल बनाने और जमीनी हालात में भरोसे को मजबूत करने में मदद मिली.

यह नियुक्ति एक अहम मोड़ पर हुई है, क्योंकि भारत आतंकवाद और कट्टरपंथ से लेकर साइबर खतरों और सीमा पार से गलत सूचना फैलाने वाले अभियानों जैसी सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है. नए IB प्रमुख के तौर पर, दीक्षित से उम्मीद है कि वे आंतरिक सुरक्षा को मजबूत करने और विभिन्न सुरक्षा व इंटेलिजेंस एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर बनाने के मकसद से इंटेलिजेंस ऑपरेशन्स की देखरेख करेंगे.

आईपीएस महेश दीक्षित के पास जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में काम करने का गहरा अनुभव है। उन्होंने श्रीनगर में सब्सिडियरी इंटेलिजेंस ब्यूरो (SIB) के प्रमुख के रूप में आतंकवाद विरोधी अभियानों का नेतृत्व किया था, जिसका अधिकार क्षेत्र पूरे जम्मू, कश्मीर और लेह लद्दाख तक फैला हुआ था। उनके इसी जमीनी और खुफिया ऑपरेशन्स के अनुभव को देखते हुए सरकार ने उन्हें देश की आंतरिक सुरक्षा की सबसे बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है।

33 साल के करियर में मिले कई पुरस्कार

1993 के बैच के आईपीएस अधिकारी महेश दीक्षित को अपने 33 साल के पूरे कार्यकाल में कई पदकों से सम्मानित हो चुके हैं। उन्हें 2004 में पुलिस आंतरिक सुरक्षा सेवा पदक और सराहनीय सेवा के लिए 2009 में पुलिस पदक मिला था। इसके अलावा 2016 में विशिष्ट सेवा के लिए राष्ट्रपति पुलिस पदक से नवाजा गया था।


Friday, June 19, 2026

पंजाब में चुनाव से पहले दलों की सियासी रणनीति की कहानी! क्या समय से पहले होंगे चुनाव?

पंजाब में विधानसभा चुनाव तय समय से पहले कराए जाने की संभावना को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। वर्ष 2027 में प्रस्तावित जनगणना और विधानसभा चुनाव के संभावित टकराव को देखते हुए चुनाव आयोग समय से पहले मतदान कराने के विकल्प पर विचार कर सकता है।
यदि यह ऐसा होता है तो फरवरी 2027 के बजाय नवंबर या दिसंबर 2026 में ही पंजाब सहित कुछ अन्य राज्यों में चुनाव कराए जा सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

जनगणना 2027 दो चरणों में आयोजित की जा रही है। पहला चरण हाउस लिस्टिंग का है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण पापुलेशन एन्यूमरेशन (पीई) फरवरी 2027 में प्रस्तावित है। इसी दौरान जातीय गणना भी कराई जाएगी। जनगणना और चुनाव, दोनों प्रक्रियाओं के लिए बड़ी संख्या में शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी लगती है। ऐसे में दोनों बड़े राष्ट्रीय कार्य एक ही समय पर होने से कर्मचारियों की उपलब्धता और प्रशासनिक प्रबंधन बड़ी चुनौती बन सकता है। इसी वजह से समयपूर्व चुनाव कराने के विकल्प पर मंथन चल रहा है। पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी इस संभावना को देखते हुए पहले ही चुनावी मोड में दिखाई दे रही है।

इन सबके बीच पंजाब में राजनीतिक पार्टियों ने जाति आधारित राजनीति को धार देना शुरू कर दिया है। आम आदमी पार्टी (AAP), शिरोमणि अकाली दल (SAD), बीजेपी और कांग्रेस चारों ही अलग-अलग समुदायों को साधने में जुट गए हैं। चुनाव से पहले इस तरह की हवा आम है!

ये चारों पार्टियां अपने पारंपरिक जनाधार को बचाने के साथ-साथ एक जातीय समीकरण बनाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। इन पार्टियों की नजर जाट सिख, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जातियां (SC) के अलावा व्यापारी, महिला और युवा वर्ग पर है।

आकड़ों के मुताबिक पंजाब की आबादी में सिखों की हिस्सेदारी लगभग 57 प्रतिशत है, जबकि हिंदू लगभग 38 प्रतिशत हैं। दशकों तक पंजाब में बीजेपी को मुख्य रूप से शहरी हिंदू वोटरों का ही समर्थन मिलता रहा है।  

हाल ही में बीजेपी ने सिख जाट नेता केवल सिंह ढिल्लों को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। बीजेपी का यह कदम पंजाब में उसकी 'हिंदू पार्टी' वाली छवि को बदलने और सिख वोटरों, खासकर प्रभावशाली जाट सिख समुदाय के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के तौर पर देख जा रहा है।
 
इसके अलावा बीजेपी ओबीसी, सैनी तथा अन्य पिछड़े वर्गों के बीच लगातार कोई न कोई कार्यक्रम या संवाद के जरिए पैठ बनाने का प्रयास कर रही है।
ऐसा लगता है जैसे बीजेपी की नजर रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण पंजाब  के मालवा, दोआबा और माझा पर है। केवल सिंह ढिल्लों मालवा इलाके से आते हैं, जहां पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 69 सीटें हैं। 

माझा इलाके में 25 सीटें, जबकि दोआबा में 23 सीटें हैं। मालवा इलाके में केवल सिंह ढिल्लों, पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जैसे जाट सिख नेताओं  के जरिए बीजेपी जाट वोटरों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने में लगी है। इसके अलावा दलित वोटबैंक को साधने के लिए बीजेपी के पास पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय सांपला, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री सोम प्रकाश और पूर्व मुख्य संसदीय सचिव अविनाश चंदर जैसे नेता हैं।

दूसरी तरफ अकाली दल की राजनीति पारंपरिक रूप से जाट सिख प्रभुत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अकाली दल का मुख्य समर्थन आधार प्रदेश में जाट सिख, पंथ सिख रहा है। वहीं, कांग्रेस का समर्थन आधार जाट सिख, दलित और कुछ हिंदूओं का समर्थन रहा है। साल 2022 में AAP के सत्ता में आने के बाद से इन पार्टियों के समर्थन आधार में सेंध लगी है। अकाली दल एक बार फिर से अपना पारंपरिक वोट वापस पाने में लगी है. हालांकि, SAD अपने वोट आधार से हटकर पहले 70 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में एससी-बीसी, महिला और युथ विंग को सक्रिय कर चुकी है। इसके अलावा SAD ने 67 विघानसभा क्षेत्रों में  व्यापार विंग के 67 विभिन्न विधानसभा हलकों के हलका प्रधानों की नियुक्ति की है। इस तरह ये पार्टी शहरी और गैर-पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने के प्रयासों में हैं। 
कांग्रेस हर स्तर पर पार्टी के समर्थन को मजबूत करने में जुटी
वहीं, कांग्रेस पार्टी दलित और जाट सिखों के समर्थन को वापस पाने में लगी है। पार्टी की मजबूती के लिए कांग्रेस जिला स्तर पर नियुक्तियों में विभिन्न सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर जोर दे रही है। इसके जरिए पार्टी उन वर्गों में अपनी पकड़ को मजबूत करेगी जहां उसका जनाधार कमजोर था। इसके अलावा कांग्रेस अपने एससी विभाग, ओबीसी विभाग, किसान कांग्रेस, महिला कांग्रेस, यूथ कांग्रेस और व्यापार प्रकोष्ठ को सक्रिय कर रही है ताकि हर स्तर पर अपने समर्थन को मजबूत कर सके।
 
इन सबके बीच पंजाब की सत्ताधारी पार्टी 
AAP का फोकस सत्ता में बने रहने और सत्ता विरोधी लहर को तोड़ना है। साल 2022 में AAP की जीत में दलित वर्ग, ग्रामीण मालवा क्षेत्र और जाट सिख किसानों की भूमिका रही थी। AAP विभिन्न समुदायों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए जिला और विधानसभा स्तर पर कल्याण बोर्ड का गठन कर रही है। प्रदेश सरकार पहले ही 21 राज्य स्तरीय कल्याण बोर्ड बना चुकी है। इसके जरिए विभिन्न समुदायों से सीधे बातचीत की जाएगी और उनसे सरकार के कामों को लेकर फीडबैक लिया जाएगा। 

समय पूर्व चुनाव और जाति की राजनीति की खबरों के बीच
पंजाब में एक सवाल लगातार चर्चा में बना हुआ है कि क्या 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल फिर से साथ आएंगे? दोनों दलों का करीब ढाई दशक पुराना गठबंधन कभी पंजाब की राजनीति का सबसे सफल समीकरण माना जाता था। लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर यह रिश्ता टूट गया और तब से दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। हाल के महीनों में इनके बीच गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं फिर तेज हुई हैं। बीजेपी के सीनियर नेता खुले तौर पर ऐलान कर चुके हैं कि पार्टी राज्य में अकेले चुनाव लड़ेगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तो मार्च 2026 में यहां तक कहा था कि बीजेपी अब पंजाब में ‘छोटा भाई’ नहीं बनेगी। लेकिन राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है, इसलिए अभी कुछ भी कहना सही साबित नहीं होगा!

Friday, June 12, 2026

एलएलसी निशांत कुमार 12 वीं पास!




एक समय बिहार में लालू यादव के बेटे तेज प्रताप और तेजस्वी की शिक्षा को सियासी मुद्दा बनाकर मीडिया में खूब परोसा जाता था। दरअसल, तेज प्रताप कॉलेज ड्रॉप आउट हैं और तेजस्वी यादव स्कूल ड्रॉप आउट। मतलब, उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। अब समय का फेर देखिए,  बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को लेकर 12 वीं पास का हल्ला जोड़ पकड़े हुए है। पिछले कुछ दिनों से यह मामला बिहार की हेडलाइन बनकर लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

कुछ महीने पहले तक जेडीयू के कई वरिष्ठ नेता निशांत को इंजीनियर बताते नहीं थकते थे। और तो और, इस बात पर न तो कभी नीतीश कुमार ने और ना ही निशांत ने किसी तरह की टिप्पणी दी। दरअसल ये बात तब सामने आई जब बिहार विधान परिषद के नॉमिनेशन फॉर्म में दर्ज किया गया कि निशांत सिर्फ 12वीं पास हैं।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, 'जिस नीतीश कुमार के बेटे को लोग इंजीनियर बताते नहीं थकते थे, वह 12वीं निकला। चुनावी हलफनामें में स्वयं बताया कि वह ग्रेजुएट नहीं है। ताउम्र परिवारवाद के विरोध की नौटंकी करने वाले बेईमान लोगों की सारी परतें खुलेंगी। इंतजार कीजिए।'

इस बीच अब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। गुरुवार (11 जून, 2026) को मीडिया से बातचीत में आरजेडी नेता ने इस पर बयान दिया। निशांत कुमार को लेकर तेजस्वी यादव ने कहा, "बिहार के शिक्षा मंत्री पर पूरा विश्वास है कि निशांत जी को इंजीनियर बनाने का काम करें. एक प्रोफेसर बन गए... एक इंजीनियर बन जाएंगे."

अब भले निशांत कुमार एलएलसी बन चुके हैं लेकिन राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार के बेटे और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर निशांत कुमार की शैक्षणिक योग्यता पर सियासत जारी है। उनकी तथाकथित बी.टेक  की डिग्री को लेकर सबसे पहले आरजेडी ने हल्ला बोल किया था।

हालांकि अबतक निशांत कुमार ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोला है। समाचार चैनलों के मुताबिक बुधवार (10 जून, 2026) को निशांत कुमार जब मीडिया के सामने आए तो पत्रकारों ने बी.टेक पर सवाल किया था पत्रकार पूछने लगे कि कुछ तो इस पर बोल दीजिए लेकिन निशांत कुमार सवालों को सुनकर चुप रहे। उन्होंने किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी थी

बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए दाखिल हलफनामे ने निशांत की डिग्री की सच्चाई सबके सामने खोलकर रख दी है।अब तक उन्हें इंजीनियर माना जाता रहा, लेकिन चुनावी दस्तावेजों से साफ हो गया कि उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी ही नहीं की थी।

हलफनामे के अनुसार निशांत कुमार ने 1998 में पटना साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (BIT Mesra) में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कंप्यूटर साइंस) में दाखिला लिया।
हालांकि, 8 सेमेस्टर के कोर्स में वे केवल 5 सेमेस्टर तक ही पढ़ाई कर सके और वर्ष 2001 में उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।
यानी लंबे समय से उन्हें “इंजीनियर” बताने की जो धारणा बनी हुई थी, वह अब गलत साबित हुई है। चुनावी हलफनामे में उनकी शैक्षणिक योग्यता ने इस भ्रम को पूरी तरह खत्म कर दिया।


विपक्ष का कहना है कि यह मामला केवल शैक्षणिक योग्यता का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक छवि का भी है जो वर्षों से निशांत कुमार के बारे में बनाई गई। राजद का दावा है कि कई जदयू नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उन्हें इंजीनियर बताया, जबकि इस पर कभी सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

गौरतलब है कि लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे बिहार के शीर्ष दिग्गज नेताओं ने शिक्षा और सुधारों की बात तो की, लेकिन उनके अपने ही घरों में इसका असर नहीं दिखा। तेजस्वी और चिराग के बाद अब विपक्ष के निशाने पर नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार हैं, जिन्हें '12वीं पास' बताकर घेरा जा रहा है। हालांकि इस मुद्दे पर सबकी स्थिति एक जैसी ही है,  इसे बिहार का दुर्भाग्य ही माना जाएगा!

पिछले महीने सम्राट चौधरी सरकार के विस्तार के दौरान मंत्री पद की शपथ लेने वाले निशांत को स्वास्थ्य मंत्रालय का महत्वपूर्ण प्रभार सौंपा गया था। जबकि उपमुख्यमंत्री पद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं बिजेंद्र प्रसाद यादव और विजय कुमार चौधरी को दिए गए, जेडीयू ने निशांत को अपना भावी नेता घोषित किया है।

कैबिनेट में निशांत की तेजी से एंट्री और उसके बाद उन्हें एमएलसी बनाने की सियासी पहल दरअसल बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाता है। सालों तक नीतीश कुमार ने परिवारवाद का खुलकर विरोध किया और अपने परिवार को पार्टी के मामलों से दूर रखा।लेकिन अब जब यह वरिष्ठ नेता अपनी विरासत को सुरक्षित करने और पार्टी के भविष्य के नेतृत्व ढांचे को औपचारिक रूप देने की कोशिश कर रहे हैं, तो निशांत का आगे आना जेडीयू के भीतर एक सोची-समझी प्रक्रिया का संकेत है, जिससे राज्य के कामकाज में अगली पीढ़ी को आगे लाया जा रहा है।

गौरतलब है कि बिहार विधान परिषद चुनाव में सभी 10 उम्मीदवारों ने निर्विरोध जीत दर्ज कर ली है। कई उम्मीदवारों ने 11 जून को बिहार विधानमंडल जाकर जीत का सर्टिफिकेट भी लिया। कुल 10 सीटों के लिए 10 उम्मीदवार थे, इसलिए वोटिंग की नौबत ही नहीं आई।

भारतीय जनता पार्टी के सभी चारों उम्मीदवारों को जीत हासिल हो गई है। बिहार विधानपरिषद चुनाव में एनडीए के पास अपने 8 उम्मीदवारों के लिए पूरे वोट थे। जबकि नीतीश कुमार की खाली सीट पर भी जीत तय थी। इस तरह से बीजेपी के सभी चारों उम्मीदवार निर्विरोध विधान पार्षद निर्वाचित हो गए हैं।

उधर जदयू के भी चारों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए। इनमें से एक ललन मंडल उर्फ ललन प्रसाद पूर्व सीएम नीतीश कुमार की खाली की गई सीट से उम्मीदवार थे। यानी उपचुनाव में भी एनडीए को किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा।

लोजपा रामविलास ने एनडीए की तरफ से अपने उम्मीदवार अशरफ अंसारी को मैदान में उतारा था। वो चिराग पासवान के पुराने वफादार नेताओं में से एक हैं। अब वो भी एलएलसी चुनाव में निर्विरोध जीत कर पहली बार अपने संसदीय जीवन की शुरूआत करेंगे। वहीं राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने सुनील कुमार सिंह को उम्मीदवार बनाया था। राज्यसभा चुनाव की तरह राजद को यहां चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा और सुनील सिंह निर्विरोध विधान पार्षद चुन लिए गए।

Friday, June 05, 2026

कैसा रहेगा पंजाब का चुनावी जायका!


पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. भारतीय जनता पार्टी की तरह ही कांग्रेस ने भी अपनी कमर कस ली है और चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं. इसी क्रम में कांग्रेस ने राज्य संगठन में बड़े फेरबदल की योजना बना रही है और पंजाब प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी किसी और को सौंप रही है. 

गौरतलब है कि पंजाब चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने भी अपना प्रदेश अध्यक्ष बदला है. अब केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब बीजेपी की जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसके बाद कांग्रेस में भी बदलाव की चर्चा तेज हो गई. 

पिछले हफ्ते कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पंजाब के शीर्ष पांच नेताओं को दिल्ली बुलाया था. इस मीटिंग में पंजाब प्रदेश अध्यक्ष के नए नाम पर चर्चा हुई. इसके संकेत पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री और गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर रंधावा ने दिए.

जिन पांच नेताओं को दिल्ली बुलाया गया था उनमें चरणजीत सिंह चन्नी, प्रताप बाजवा, सुखजिंदर रंधावा, डॉ. अमर सिंह और राजा वडिंग शामिल थे. इनके अलावा, राहुल गांधी, कांग्रेस पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल और अन्य पार्टी नेता भी बैठक में मौजूद रहे.

वहीं दूसरी ओर पंजाब के राजनीतिक गलियारों में पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह की 'घर वापसी' की अटकलें तेज हो गई हैं. यानी, कैप्टन अमरिंदर बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में वापसी कर सकते हैं. ऐसी अटकलें इसलिए लगाई जा रही हैं, क्योंकि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा का कहना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के संपर्क में हैं.

कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस वापसी की अटकलें ऐसे समय लगाई जा रही हैं, जब कुछ ही महीनों में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले ही कैप्टन अमरिंदर कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में चले गए थे.

इन सबके बीच भाजपा ने पंजाब में नशे की समस्या को अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाने का फैसला किया है. पार्टी राज्यव्यापी जनसंपर्क कार्यक्रमों और यात्राओं की तैयारी कर रही है. उसका प्रयास है कि नशे के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ चुनावी वादा नहीं, बल्कि एक सामाजिक मिशन के रूप में पेश किया जाए. अमित शाह के लिए भी यह कोई नया मुद्दा नहीं है. वे इस पर काफी पहले से काम करते आए हैं.

यह एक ऐसा मुद्दा है जो जाति, क्षेत्र और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर लोगों को प्रभावित करती है. यह देखना बाकी है कि यह रणनीति मतदाताओं को कितना प्रभावित कर पाती है, लेकिन इतना तय है कि भाजपा इसे 2027 चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाने जा रही है. 

इस चुनाव में लंबे समय तक राज्य में सहयोगी दलों के सहारे अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने वाली बीजेपी अपने दम पर लड़ने और सत्ता के लिए मजबूत दावेदारी पेश करने की रणनीति पर काम कर रही है। यहीं कारण है कि वो अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय और आक्रामक नजर आ रही है।
वहीं अकेले चुनाव लड़ने की बात करते हुए भाजपा और भी बहुत कुछ सोच रही है. दशकों तक पंजाब में भाजपा, शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ गठबंधन के जरिए राजनीति करती रही है. लेकिन इस बार अकेले लड़ने की बात करके वह जनता के बीच अपनी आवाज मुखर तरीके से पहुंचाने की कोशिश में है.

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा ने पूरे राज्य में अपना अभियान तेज कर दिया है. इसके लिए वो काफी हद तक आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व नेताओं राघव चड्ढा और संदीप पाठक के अनुभव पर भरोसा कर रही है, जिन्होंने राज्य में आम आदमी पार्टी के उभार में अहम भूमिका निभाई थी.

भाजपा अपनी रणनीति के केंद्र में संगठनात्मक विस्तार और नशे की समस्या को भी रख रही है. राज्य में भाजपा का लक्ष्य साफ है, संगठन को मजबूत करना और नशे की समस्या को राजनीतिक मुद्दा बनाना है.

इस बार भाजपा अकेले चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार नजर आ रही है. पंजाब की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहने का दौर खत्म होता दिख रहा है. असम, बंगाल के नतीजों के बाद भाजपा नेताओं के अंदर बहुत उत्साह नजर आ रहा है.

माना जा रहा है कि यदि भाजपा पूरी ताकत और संसाधनों के साथ मैदान में उतरे, तो पंजाब में सत्ता हासिल करना अब कोई दूर का सपना नहीं है. 

लोगबाग कह रहे हैं कि पंजाब की राजनीतिक पटकथा में इस बार दो नेताओं की भूमिका अहम होने वाली है. पहला संदीप पाठक और दूसरा राघव चड्ढा. दोनों ने दिल्ली के बाहर आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी सफलता दिलाने में अहम योगदान दिया था. अब ये दोनों भाजपा में हैं.

संदीप पाठक को आम आदमी पार्टी के 'पंजाब मॉडल' का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता रहा है। पाठक ने बूथ स्तर की मैपिंग, डेटा विश्लेषण, सर्वेक्षण और स्वयंसेवकों के मजबूत नेटवर्क के जरिए 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की जमीनी पकड़ मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। राजनीति में उनका काम करने का तरीका हमेशा पर्दे के पीछे रहकर संगठन को मजबूत करने वाला माना जाता रहा है। वहीं, राघव चड्ढा ने पंजाब में आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरे के रूप में काम किया। उन्होंने दिल्ली नेतृत्व और पंजाब इकाई के बीच समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन दोनों नेताओं के आलावा भी आनेवाले दिनों में ऐसे कई चेहरे सामने आयेंगे जो 'पंजाबी पोलिटिकल जायके' को लजीज बनाने का काम करेंगे! 

आने वाले दिनों में पंजाब पर देश की निगाहें होगी! कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल की राजनीतिक गुटबाजी के बीच भाजपा अपने प्रचार तंत्र से किस अंदाज में प्रहार करेगी, इस पर सभी की नजर रहेगी! अभी तो पंजाब की चुनावी कहानी शुरू ही हुई है!

Friday, May 29, 2026

आइए, जानते हैं कि क्या है अन-नैचुरल डेमोग्राफिक चेंज !


पिछले कुछ सालों में असम, बंगाल, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड जैसे सीमावर्ती राज्यों के साथ-साथ बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और यूपी जैसे राज्यों में डेमोग्राफिक चेंज (जनसांख्यिकी बदलाव) को लेकर विवाद सामने आए हैं. इन इलाकों में अवैध प्रवास, सीमा पार से घुसपैठ और फर्जी पहचान पत्रों के सहारे बसने के आरोप लगते रहे हैं.
सरकार का मानना है कि इस बदलाव का सीधा असर वहां के स्थानीय संसाधनों, रोजगार, सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ रहा है. खासकर जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक पहचान और जमीन के अधिकारों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं. 

ऐसे में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या सचमुच में भारत की डेमोग्राफी क्या बदल रही है? अब इसकी स्टडी के लिए केंद्र सरकार ने एक हाई लेवल कमेटी बना दी है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब से कमेटी बनाए जाने का ऐलान किया है, तभी से इस मसले पर खूब चर्चा हो रही है. यह कमेटी एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. हालांकि, जरूरत पड़ी तो इसका कार्यकाल 6 महीने और बढ़ाया जा सकता है. 

इस कमेटी का काम घुसपैठ और दूसरे कारणों से बदल रही भारत की डेमोग्राफी पर स्टडी करना है. डेमोग्राफी चेंज से कैसे निपटा जा सकता है? इसे लेकर भी कमेटी अपने सुझाव देगी.

गृह मंत्री अमित शाह ने X पर पोस्ट कर कहा है कि अप्राकृतिक तरीके से डेमोग्राफी बदलना किसी भी देश के वर्तमान और भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है. इसी चुनौती से निपटने के लिए 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक हाई-लेवल कमेटी बनाने का ऐलान किया था और अब सरकार ने इस कमेटी का गठन कर दिया है.

केंद्र सरकार लंबे समय से डेमोग्राफी चेंज होने की बात करती रही है. पिछले साल 15 अगस्त को लाल किले से भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेमोग्राफी चेंज को एक बड़ी चुनौती बताया था.

अमित शाह डेमोग्राफी चेंज के लिए सबसे बड़ा कारण 'घुसपैठ' को मानते हैं. पिछले साल अक्टूबर में अमित शाह ने X पर आबादी को लेकर कुछ आंकड़े जारी किए थे. इसमें 1951 से 2011 तक की जनसंख्या के आंकड़े बताए गए थे.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और घुसपैठ बड़ा मुद्दा था. इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार का घेराव किया था. इसी आधार पर बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मात दी और पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की. ऐसे में अब केंद्र सरकार द्वारा डेमोग्राफिक चेंज पर हाई लेवल कमेटी गठित करना अहम माना जा रहा है. 

अब लोगबाग यह सवाल करने लगे हैं कि यह कमिटी आने वाले दिनों में कैसे काम करेगी. आसान भाषा में समझें तो यह कमेटी 6 काम करेगी- 
1. डेमोग्राफिक चेंज से जो चुनौतियां पैदा हुईं, उन पर विचार करना।
2. डेमोग्राफिक चेंज की वजहें- जैसे सीमापार से अवैध घुसपैठ, आर्थिक वजहें और दूसरे सोशियो-इनवायरमेंटल फैक्टर्स की स्टडी करना।
3. डेमोग्राफिक चेंज के पीछे कुछ और अंडरलाइंग फैक्टर- जैसे बस्तियां बसाने के असामान्य पैटर्न, माइग्रेशन वगैरह की पहचान करना।
4. धार्मिक या सामाजिक कम्युनिटीज में पॉपुलेशन चेंज की एनालिसिस करना। खास तौर पर वहां, जहां पॉपुलेशन नॉर्मल ट्रेंड से काफी अलग तरीके से बदल रही है।
5. देश में मौजूद घुसपैठियों को कानूनी तरीके से पहचानने, हिरासत में लेने और डिपोर्ट करने की स्थायी मैकेनिज्म बनाना।
6. बॉर्डर मैनेजमेंट, आबादी कंट्रोल करने और इससे जुड़ी चीजों को मॉनिटर करने के लिए एक मैकेनिज्म सुझाना।
इनके अलावा कमेटी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अवैध घुसपैठ, डेमोग्राफिक चेंज के मामले में बेहतर को-ऑर्डिनेशन के लिए पॉलिसी बनाने का भी सुझाव देगी।

यह समिति मुख्य रूप से इन तीन क्षेत्रों पर प्रमुखता से काम करेगी- 

• असामान्य बदलावों की जांच और विश्लेषण: समिति यह पता लगाएगी कि देश के किन खास क्षेत्रों और सामाजिक समुदायों में असामान्य रूप से जनसंख्या का असंतुलन पैदा हुआ है.
• अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन: भारत में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और उनके वापस भेजने के लिए एक स्थायी और मजबूत कानूनी व्यवस्था का सुझाव देना इस समिति का प्रमुख काम होगा.
• कड़े नियमों और नीति का निर्माण: भविष्य में किसी भी तरह की घुसपैठ को पूरी तरह रोकने के लिए सीमा प्रबंधन को कैसे मजबूत किया जाए, समिति इस पर सरकार को विस्तृत योजना सौंपेगी ताकि डेमोग्राफिक असंतुलन को सुधारा जा सके.

दरअसल सरकार पूरे देश के डेमोग्राफिक पैटर्न का वैज्ञानिक और संस्थागत अध्ययन कराना चाहती है, ताकि वास्तविक स्थिति के आधार पर ठोस नीतियां बनाई जा सकें. गौरतलब है कि भारत की बदलती डेमोग्राफी के पीछे घुसपैठ, धर्मांतरण, कथित लव जिहाद और ज्यादा आबादी को बड़ा कारण बताया जाता है. लेकिन अब तक आधिकारिक तौर पर इसका कोई ठोस कारण नहीं बताया गया है. उम्मीद है इस कमेटी की रिपोर्ट से इस सवाल का जवाब भी मिल जाएगा. 



Girindra Nath Jha
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Chanka Residency
09661893820

Friday, May 22, 2026

क्या पंजाब में 'उड़ता पंजाब' ही होगा चुनावी मुद्दा

पंजाब पिछले कई दशकों से नशे की समस्या से ग्रस्त है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि साल 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में नशा प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना था। पंजाब में ड्रग्स को लेकर बहस इसलिए ज्यादा होती है क्योंकि वहां लंबे समय से ड्रग्स एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रहा है। सीमा पार से तस्करी, ड्रोन के जरिए हेरोइन सप्लाई और युवाओं में नशे की लत जैसी घटनाओं ने राज्य को लगातार सुर्खियों में रखा। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देशभर में जब्त हुई हेरोइन का बड़ा हिस्सा पंजाब से बरामद किया गया था। सीमा से लगे इलाकों में ड्रोन के जरिए ड्रग्स गिराने की घटनाओं में भी तेजी आई है।
पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होंगे। विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में एक बार फिर ड्रग्स का मुद्दा उठ गया है। जहां एक तरफ पंजाब सरकार ने नशे के खिलाफ अभियान चलाया है। वहीं, विपक्षी पार्टियां सरकार पर नशे के खिलाफ काम ना करने का आरोप लगा रही हैं। विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा एक बड़े मुद्दे के रूप में उभरने लगा है।  

हालांकि नशे का मुद्दा केवल पंजाब का ही नहीं है, अन्य राज्य भी इसकी चपेट में हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2022 में देशभर में एनडीपीएस एक्ट के तहत करीब 1.15 लाख मामले दर्ज किए गए थे। इनमें सबसे ज्यादा केस केरल में सामने आए। महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर रहा जबकि पंजाब तीसरे नंबर पर पहुंचा। इसके बाद उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों का नाम भी सूची में शामिल रहा। आंकड़ों के अनुसार, कुल मामलों में केरल की हिस्सेदारी करीब 23 प्रतिशत, महाराष्ट्र की 12 प्रतिशत और पंजाब की लगभग 11 प्रतिशत रही। यानी सिर्फ इन तीन राज्यों में ही देश के बड़ी संख्या में ड्रग केस दर्ज हुए हैं। आंकड़ों में भले ही पंजाब में नशे की समस्या अन्य राज्यों से कम दिखाई देती हो लेकिन पंजाब में आज के समय में यह एक बड़ा मुद्दा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ दर्ज मामलों के आधार पर किसी राज्य को पूरी तरह नशे का केंद्र मान लेना सही नहीं होगा। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो खुद अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट करता है कि उसके आंकड़े पुलिस में दर्ज मामलों पर आधारित होते हैं। इसका मतलब यह है कि जहां पुलिस ज्यादा सक्रिय है, वहां केसों की संख्या भी ज्यादा दिखाई दे सकती है। कई राज्यों में बड़े स्तर पर एंटी ड्रग अभियान चलाए जाते हैं, जिसके चलते एफआईआर और गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ जाती है।

दरअसल पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं तो राजनीतिक दल अब नशे के मुद्दे पर सबसे अधिक मुखर दिखेगी। जहां एक ओर राज्य में सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को सक्रियता से उठा रही है वहीं अब भारतीय जनता पार्टी भी इस मुद्दे को केंद्र पर रखकर पॉलिटिकल कैंपेंन शुरु कर सकती है।

पश्चिम बंगाल और असम में मिली राजनीतिक सफलता के बाद अब भाजपा की नजरें पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव पर हैं। माना जा रहा है कि इस राज्य को फतह करने के लिए भाजपा बंगाल की रणनीति अपनाएगी। नशा और राज्य की सुरक्षा को पार्टी आगामी चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाएगी। माना जा रहा है कि भाजपा आगामी जून महीने में ही विधानसभा प्रभारियों की नियुक्ति कर देगी ताकि पंजाब में चुनावी अभियान ग्राउंड स्तर पर दिखने लगे।

पार्टी सूत्रों के अनुसार पश्चिम बंगाल में कमल खिलाने की योजना साकार होने से उत्साहित भाजपा अब पंजाब को भगवामय करने के लिए पूरी ताकत झोंकेगी। इसके लिए पार्टी पश्चिम बंगाल की तर्ज पर ही जून महीने में ही सभी विधानसभा सीटों और तीन क्षेत्रों माझा, दोआबा और मालवा के लिए प्रभारियों की नियुक्ति करेगी। बंगाल की तरह ही गृह मंत्री अमित शाह राज्य की सियासत की नब्ज टटोलकर संगठन को सक्रिय करने की मुहिम में जुट जाएंगे।

गौरतलब है कि बंगाल की तरह ही पंजाब भी सीमावर्ती राज्य है। पार्टी सूत्रों का कहना है बंगाल में बांग्लादेश से घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा था, जबकि पंजाब में पाकिस्तान से हो रही ड्रग्स की आपूर्ति बड़ा खतरा बनती जा रही है। बंगाल में इस खतरे को मुद्दा बनाने केलिए पार्टी ने परिवर्तन यात्राओं का सहारा लिया था। चूंकि ड्रग्स रैकेट को खत्म करने के वादे के साथ सत्ता में आई आम आदमी पार्टी इस मोर्चे पर बुरी तरह विफल रही है, ऐसे में पार्टी पंजाब को नशामुक्त करने का अभियान छेड़ते हुए पूरे राज्य में नशे के खिलाफ यात्रा निकालेगी।

वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल बुधवार को सीएम भगवत मान के साथ लुधियाना पहुंचे थे। वे शुक्रवार तक पंजाब में रहकर पार्टी की शीर्ष लीडरशिप के साथ विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर मंथन करेंगे। हलवारा हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के पक्ष में माहौल पहले से अधिक मजबूत हुआ है।

केजरीवाल ने दावा किया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी पिछला रिकॉर्ड भी तोड़ेगी। सामान्य तौर पर किसी भी सरकार के चार वर्ष पूरे होने के बाद लोगों में नाराजगी दिखाई देती है, लेकिन पंजाब में स्थिति इसके विपरीत है। उन्होंने कहा कि राज्य में आम आदमी पार्टी सरकार के प्रति लोगों में सकारात्मक माहौल है और जनता सरकार के कामों को लेकर चर्चा कर रही है.

सूत्रों के अनुसार आने वाले कुछ दिनों में पार्टी संगठन, चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने को लेकर कई अहम बैठकें हो सकती हैं। पार्टी नेतृत्व आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सक्रिय दिखाई दे रहा है।

पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी की आगामी रणनीति को लेकर यह दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी चुनाव से पहले संगठन को और मजबूत करने तथा सरकार की योजनाओं को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में जुटी हुई है।

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Friday, May 15, 2026

बंगाल में किस रंग में दिखेगी ममता की ‘लक्ष्मी भंडार योजना’





पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले से जब बंगाल के सुदूर इलाकों की यात्रा कर रहा था तो राज्य सरकार की जिस एक योजना की चर्चा हर एक की जुबान पर थी, वह थी ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षी ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना। अब जब ममता बनर्जी सत्ता गंवा चुकीं हैं तो भी इस योजना की खूब चर्चा हो रही है।

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से महिलाओं के मन में यह सवाल बार बार उठ रहा था कि क्या नई सरकार लक्ष्मी भंडार योजना में कोई फेरबदल करेगी या फिर बंद ही कर देगी ? शायद पश्चिम बंगाल की नई सरकार राज्य की महिलाओं के मन की बात सुन ली है क्योंकि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नयी भाजपा सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की महिलाओं को आर्थिक मदद देने वाली फ्लैगशिप योजना ‘लक्ष्मी भंडार’ न केवल जारी रहेगी, बल्कि इसे नये कलेवर और बढ़ी हुई राशि के साथ लागू किया जा सकता है।

सूत्रों के अनुसार भाजपा का मानना है कि जनहित की योजनाओं का नाम बदल सकता है, लेकिन लोगों को मिलने वाले लाभ बंद नहीं होना चाहिए। गौरतलब है कि इस बार के चुनाव में महिला वोट बैंक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2026 के बंगाल चुनाव में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर मतदान किया है। इन सबकी निगाहें अब नई सरकार पर है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि लक्ष्मी भंडार के जरिये राज्य की करोड़ों महिलाएं सीधे तौर पर लाभान्वित हो रही हैं और भारतीय जनता पार्टी महिला वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहेगी।

जिस तरह ममता बनर्जी ‘लक्ष्मी भंडार’ के जरिए महिला वोट बैंक में अपनी पैठ बनाए हुए थी, ठीक उसी तरह भारतीय जनता पार्टी भी अपनी एक महत्वाकांक्षी योजना के जरिए राज्य की महिलाओं को लाभ देने जा रही है। भाजपा की भी निगाह महिला वोट बैंक पर है। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में ‘अन्नपूर्णा भंडार’ का वादा किया था। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में लक्ष्मी भंडार को इसी योजना में मिला दिया जाएगा, जिसमें आर्थिक सहायता की राशि को बढ़ाकर 3,000 रुपए तक किया जा सकता है।

ब्रांड के लिहाज से काम करने वाली भाजपा चाहती है कि इस योजना को भी ‘मोदी की गारंटी’ की-वर्ड से जोड़कर रखा जाए। भाजपा हमेशा से डबल इंजन शब्द का इस्तेमाल करती है और इसी रास्ते पर चलकर वह कई राज्यों में सत्ता तक पहुंच रही है।

लक्ष्मी भंडार योजना को लेकर बंगाल की नई सरकार की रणनीति अपने पूर्ववर्ती सरकार से अलग है। नयी सरकार का आरोप रहा है कि पिछली सरकार में इन योजनाओं में लीकेज थी। अब इसे सीधे डीबीटी (DBT) के जरिये और भी पारदर्शी बनाया जायेगा, ताकि बिचौलिये खत्म हो सकें।

मुख्यमंत्री शुभेंदू अधिकारी लक्ष्मी भंडार के लाभार्थियों को केंद्र की ‘आयुष्मान भारत’ योजना से जोड़ना चाहते हैं ताकि महिलाओं को नकद राशि के साथ-साथ मुफ्त इलाज की सुविधा भी मिले। शुभेंदू अधिकारी ने बातचीत में बताया कि उनकी सरकार किसी भी लोक-कल्याणकारी कार्य को बाधित नहीं करेगी, बल्कि उसे केंद्र की योजनाओं के साथ जोड़कर और अधिक प्रभावी व लोककल्याणकारी बनायेगी।

विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस लगातार प्रचार कर रही थी कि यदि भाजपा सत्ता में आएगी तो लक्ष्मी भंडार बंद कर देगी। ऐसे में शुभेंदू अधिकारी के इस कदम को लेकर ममता बनर्जी की पार्टी ने लंबी चुप्पी साध ली है।

राज्य की नई सरकार और योजनाओं की चर्चा के बीच गुरुवार को बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक नए अवतार में दिखी। ममता बनर्जी बृहस्पतिवार को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनाव बाद हुई हिंसा के मामले में तृणमूल कार्यकर्ताओं की पैरवी करने पहुंची थीं। वहां उन्होंने बाकायदा काला गाउन पहनकर बहस की।

हालांकि ममता बनर्जी के गाउन में कलकत्ता हाईकोर्ट में पेश होने के मामले ने नया कानूनी मोड़ ले लिया है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए पश्चिम बंगाल बार काउंसिल से 48 घंटे के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
बीसीआई जांच कर रहा है कि क्या मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद ममता बनर्जी ने अपने लाइसेंस को रिन्यू करने के लिए बार काउंसिल में आवेदन किया था? क्या उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए भी अपना पंजीकरण सक्रिय रखा था? यह बार काउंसिल के नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उनके पास सक्रिय लाइसेंस नहीं था, तो कानूनी पोशाक (Legal Attire) पहनकर कोर्ट में जिरह करना उन्हें बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। 

ममता बनर्जी को भविष्य में वकालत करने से रोका जा सकता है। पश्चिम बंगाल बार काउंसिल को शनिवार तक अपनी रिपोर्ट दिल्ली भेजनी होगी। यदि रिपोर्ट में नियमों की अनदेखी पायी गयी, तो ममता बनर्जी को भविष्य में वकालत करने से रोका भी जा सकता है। फिलहाल, सबकी नजरें बार काउंसिल के अगले कदम पर टिकी हैं। बार काउंसिल ने पूछा कि क्या ममता का लाइसेंस सक्रिय है? बीसीआई ने पूछा है कि क्या ममता बनर्जी का वकालत का लाइसेंस सक्रिय है? क्या मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने नियमों का पालन किया था? इस रिपोर्ट के आने के बाद ममता बनर्जी की ‘प्रोफेशनल’ वकालत की स्थिति पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। 

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रधान सचिव श्रीरामंतो सेन की ओर से जारी पत्र में कई गंभीर सवाल उठाये गये हैं। बीसीआई ने पश्चिम बंगाल बार काउंसिल के सचिव को निर्देश दिया है कि 2 दिन के भीतर ममता बनर्जी के पंजीकरण (Registration) से जुड़ी पूरी जानकारी भेजी जाए। बार काउंसिल जानना चाहता है कि 2011 से 2026 तक, जब ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर थीं, तब उनके वकालत के लाइसेंस की स्थिति क्या थी।

गौरतलब है कि नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति संवैधानिक पद पर कार्यरत होता है या किसी अन्य लाभकारी पद पर रहता है, तो उसे वकालत का लाइसेंस अस्थायी रूप से निलंबित करना होता है। सेवा समाप्त होने के बाद ही इसे पुनः सक्रिय किया जा सकता है। इसी संदर्भ में बीसीआई ने यह जांच शुरू की है कि क्या सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था या नहीं।

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Girindra Nath Jha
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