Friday, August 14, 2026

महज 13 की उम्र में सीने पर खाई गोली, कहानी बिहार के बाल शहीदों की

आज हम जिस खुली हवा में सांस ले रहे हैं और लोकतंत्र में अपनी बात रखने की आजादी का अधिकार रखते हैं, उसके पीछे लाखों स्वतंत्रता सेनानियों का संघर्ष, त्याग और बलिदान छिपा है। हजारों क्रांतिकारी फांसी के फंदे पर झूले और असंख्य लोगों ने अंग्रेजी हुकूमत की यातनाएं सहीं। लेकिन यह भी सच है कि इनमें से कई क्रांतिकारियों को हम सबने भूला दिया है। आज इस बात की आवश्यकता है कि हम अपने अंचल के उन लोगों की स्मृति को नमन करें जिनके बलिदान की वजह से हम सब को आजादी मिली।
बिहार के सीमांचल इलाके के इन्हीं गुमनाम और समर्पित सेनानियों की संघर्षगाथा आज हम आपको सुनाने जा रहे हैं। जिस प्रकार अमर शहीद खुदीराम बोस ने कम उम्र में ही देश की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे, उसी प्रकार मात्र 13 वर्ष की अल्प आयु में 13 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ब्रिटिश गोलियों का सामना करते हुए ध्रुव कुंडू ने कटिहार-पूर्णिया क्षेत्र में अद्वितीय शौर्य और बलिदान का परिचय दिया था।

देश की स्वतंत्रता के लिए 13 वर्ष की उम्र में बलिदान देने वाले अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में गुरुवार को पूर्णिया शहर में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था।

पूर्णिया शहर के ध्रुव उद्यान में अमर बाल शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में शहरवासियों ने हिस्सा लेकर ध्रुव कुंडू के साहस, संघर्ष और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए बलिदान को याद किया। कार्यक्रम के आयोजक, युवा सामाजिक कार्यकर्ता एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी शौर्य राय ने कहा कि ध्रुव कुंडू की स्मृति में शुरू की गई यह पहल किसी एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्णिया के नागरिकों की साझी भावना है। उन्होंने कहा कि जिस बालक ने 13 वर्ष की उम्र में देश की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया, उसकी कहानी आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना सभी की जिम्मेदारी है।

ध्रुव कुंडू का जन्म 1929 में कटिहार, बिहार के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉक्टर किशोरीलाल कुंडू के घर हुआ था। देशभक्त पिता का यह बेटा बचपन से ही अंग्रेज विरोधी गतिविधियों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता था| 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय उनकी उम्र केवल 13 वर्ष थी फिर भी इन्होंने अंग्रेजों के प्रतिकार के लिए अपनी एक टोली बनाई| 11 अगस्त 1942 को ध्रुव के नेतृत्व में क्रान्तिकारियों ने “रजिस्ट्री कार्यालय” के दस्तावेजों को आग के हवाले कर दिया। 13 अगस्त 1942 को कटिहार नगर के सब रजिस्ट्रार का कार्यालय भी उन्होंने ध्वस्त करा दिया| उन्होंने मुंसिफ कोर्ट सहित कई सरकारी दफ्तरों से अंग्रेजी हुकूमत के झंडे उखाड़ दिए और वहां भारतीय तिरंगा फहरा दिया। जब ध्रुव के नेतृत्व में क्रान्तिकारी दल मुंसिफ कोर्ट पर तिरंगा फहरा कर आगे बढ़ रहा था तो अंग्रेजों ने प्रतिकार के लिए क्रान्तिकारियों पर गोलियां चला दी| ध्रुव कुंडू घायल हो गए और उन्हें पूर्णिया सदर अस्पताल ले जाया गया लेकिन मात्र 13 वर्ष की उम्र में ही ध्रुव कुंडू ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

अपने वीर सपूत के बलिदान दिवस पर भले कुछ लोग हर साल अपने स्तर पर कार्यक्रम आयोजित करते हों, लेकिन उनकी यादों को सहेजने के लिए उनके नाम पर बने ध्रुव कुंडू स्मारक और पार्क अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है।

जिस उम्र में बच्चे खेलने कूदने में मस्त रहते उस उम्र में 13 वर्षीय ध्रुव कुंडू महात्मा गांधी के 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' आंदोलन में कूद पड़े थे। 1942 का यह आंदोलन 13 अगस्त तक आजादी की लहर बनकर फैल चुकी थी। जब गांधी जी ने भारत छोड़ो आन्दोलन और करो या मरो का नारा दिया था तो पूर्णिया में भी हजारों लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संग्राम छेड़ दिया था। इस दौरान धमदाहा में 25 अगस्त को हजारों लोगों की भीड़ ने धमदाहा और रुपौली थाना को घेरकर आग लगा दिया था। इस घटना में अंग्रेजों की तरफ से अंधाधुंध गोली चलाई गयी थी, जिसमें धमदाहा में 14 और रुपौली में सात सपूत शहीद हुये थे।

आज भी पूर्णिया के टाउन हॉल, धमदाहा और रुपौली में बने शहीद स्मारक में इन शहीदों का नाम लिखा हुआ है। इसके अलावा 1942 में शहीद हुये 13 वर्षीय कुताय साह और ध्रुव कुंडू का भी स्मारक बना है। लेकिन, आज ये सभी स्मारक और शहीद स्थल उपेक्षा का शिकार होकर गुमनामी की कगार पर हैं।

पूर्णिया के इन शहीदों के बारे में बताया जाता है कि 9 अगस्त 1942 को पूर्णिया शहर के सिपाही टोला के पास 13 साल के बच्चा कुताय साह के साथ सैकड़ों लोग जब स्वतंत्रता संग्राम में अग्रेजों का विरोध कर रहे थे। उस समय अंग्रेज अधकारी ने कुताय साह को चेतावनी दी। लेकिन, निडर कुताय साह ने अपनी शर्ट का बटन खोलकर अंग्रेजों को ललकारते हुये आगे बढ़ गए और कहा कि चलाओ गोली। तभी अंग्रेज अधिकारी ने उनके सीने में गोली मार दी जिस कारण वह वहीं शहीद हो गए। इसके बाद ध्रुव कुंडू को भी अंग्रेजों ने गोली मार दी। दोनों शहीदों के शव को मधुबनी महावीर मंदिर के प्रांगण में लाया गया जहां उनके नाम पर ध्रुव कुताय उद्यान बना है। लेकिन यह ऐतिहासिक धरोहर बदहाली और उपेक्षा का शिकार है।

सिपाही टोला मे बने कुताय साह स्मारक और बनभाग में बने ध्रुव कुन्डू का स्मारक भी जीर्ण शीर्ण अवस्था में है। 

गुरुवार को पूर्णिया में अमर शहीद ध्रुव कुंडू की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में स्थानीय लोगों की भागीदारी ने यह सिद्ध किया कि लोग अपने अंचल की स्मृति को मिटने नहीं देंगे। 

कार्यक्रम के आयोजक शोधार्थी Shourya Roy ने बताया कि पूर्णिया और सीमांचल क्षेत्र के जिन स्वतंत्रता सेनानियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया है, उन्हें इतिहास और सार्वजनिक स्मृति में उनका वाजिब स्थान मिलना चाहिए। स्थानीय इतिहास और नायकों को संजोने से न केवल क्षेत्रीय पहचान मजबूत होती है, बल्कि युवाओं में देशप्रेम की भावना भी बलवती होती है।


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